मोदी की नई सरकार


एक तरह से चन्द्रबाबु नायडू का मोदी के साथ आना और ओड़िसा में बीजेपी के आने से देश में औद्योगिक प्रगति का एक नया दौर चालू होने का बातावरण बन रहा है। आन्ध्रप्रदेश और ओड़िसा समिल्लित समुद्रीय तट क्षेत्र चीना के सेनजेन प्रदेश की औद्योगिक क्षेत्र के बराबरी का ही एक औद्योगिक क्षेत्र बन जाने की संभावना रहेगी, क्योंकि औद्योगिकरण के क्षेत्र में मोदी की तरह ही नायडू भी रहे हैं। हैदराबाद का बंगलौर के बाद एक दूसरा देश के एक बड़े आई.टी केन्द्र की तरह उभरना केवल नायडू के कारण ही सम्भव हो पाया है। उनका अमरावती को प्रदेश की नई राजधानी की तरह एक विश्वस्तरीय नगर बनाना भी वह सपना है जो मोदी के सपनों से मेल खाता है। मोदीजी को नायडू की मदद करनी बिना किसी हिचक के। आँध्र कृषि क्षेत्र में भी बहुत आगे है और मोदी जी नायडू को आंध्र के कृषि क्षेत्र को पंजाब से बेहतर निर्यात करने वाला सबसे बड़ा प्रदेश बनवाने में मदद कर सकते हैं, वहाँ के किसानों की सभी उपज को पंजाब की तरह FCI से MSP पर ख़रीदवा कर। आंध्र में फ़ूड प्रोसेसिंग का सबसे बड़ा प्रदेश बनने का मादा है। इसी तरीक़े को उन्हें ओड़िसा में समुद्री किनारे को उन्नत बनाने में करना चाहिये और ओड़िसा को इसमें चन्द्रबाबू नायडू की सहायता लेनी चाहिये जो उनकी साख को बढ़ायेगा और भारत की उन्नति का रास्ता खोलेगा। ओड़िसा में एक बडा पोर्ट बनाने और उसे रेल रोड से जोड़ने की ज़रूरत है।
पर समझ में नहीं आता नीतिश जी कैसे बिहार के लोगों को शिक्षित और समृद्ध बनाने में और मोदी के दर्शन को जमीनस्तर लागू करने में मोदी की सहायता करेंगे, जिससे आम जनता खुश हो सकें। कैसे वे बिहार के शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करेंगे और कृषि क्षेत्र में कुछ अनुठी व्यवस्था ला सकेंगे? बिहार की शिक्षा व्यवस्था था पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी है और उसे एक बहुत मज़बूत इच्छाशक्ति का व्यक्ति फिर पटरी पर ला दौड़ा सकता है। बहुत कुछ किया जा सकता है, अगर वहाँ कृषि क्षेत्र में आमूल परिवर्तन किया जाये और एक सफल टेक्नीकल झुकाव वाले व्यक्ति की बात मानी राजनीति कुछ सालों के लिये एकदम छोडकर । जो मेरे विचारों से सहमत हो, बताइये।

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चुनाव २०२४-एक रोचक वाक़या

रास्ते में २०-२२ साल का नौजवान उबर ड्रॉइवर अचानक बात करने लगा उत्तरप्रदेश के वोटरों के मोदी के साथ विश्वासघात करने के लिये जिसने उत्तरप्रदेश के निचले वर्ग के लिये इतना किया और पर उसकी उत्तेजना मेरे समझ में नहीं आई। मैंने समझाने की कोशिश की। पर वह बार बार कहता रहा कि ये मतलबी अपने वर्ग को दिये सब सुविधाओं का लाभ उठाये, जो किसी ने इतने सालों में नहीं दिया। मैं जानना चाहा क्या दिया मोदी ने। उसका जबाब था, “सर, क्या वे ज़िन्दगी में कभी शौचालय बना पाते? क्या कभी उनको घर मुअस्सर होता? क्या घर में पानी के नल का सोच भी सकते थे सपने में या गैस के चूल्हे खाना बनाने का?…वह बोलता जा रहा था बिना मेरी तरफ़ से देखे बिना मेरी प्रतिक्रिया जाने या किसी प्रश्न किये….”ज़िन्दगी के क्या कभी सोचे भी होंगे बिजली के प्रकाश का घर में? कौन उन्हें आजतक मुफ्त प्रति व्यक्ति पाँच किलो अनाज देता सालों? कौन उसी घर के लोगों को सब्ज़ी या फल या, मछली आदि का ठेले पर या रास्ते में दुकान लगाने के लिये सस्ता बैंक से क़र्ज़ा दिलाता? क्या यह पैसा नहीं है? तब भी क्यों उनका सबसे बड़ा ख़र्चा ढर्रे पर है? और एक बोतल शराब पर गाँव के ठेकेदार उनका वोट ख़रीद लेता है और वोट देने के बाद सौ-दो सौ रूपया और देने का वायदा कर बूथ तक जाना पक्का कर लेता है? मैं उसे रोक रहा था, क्योंकि मुझे लगता था कि वह मेरा घर भूल जायेगा और मुझे देरी हो जायेगी। एकदम मेरे टावर के नीचे तक गाड़ी लाया, श्रद्धा से प्रणाम किया बार बार, फिर पता नहीं किस चीज़ के लिये ‘सारी’ भी कहा। उसे धन्यवाद कर और खुश रहने की नसीहत दे मैं निकल आया सीढ़ियाँ चढ़ने के लिये….
मैं अभी तक भी नहीं समझ पाया कि उसका मोदी या उनकी पार्टी के प्रति इतनी सहानुभूति क्यों है? हाँ, एक बात की याद आती है गाँव के पंचायत के चुनाव में ऐसा ही होता था-प्रति वोट कुछ ख़ास रक़म और…..दु:ख की बात है कि आज हर क्षेत्रों में काम पाने का ज़रिया ठीक्केदार ही हैं यहाँ फ़ैक्टरियों में, घर पर नर्स रखने केलिये, रसोइया, सुरक्षाकर्मी ..ये ठिक्केदार बहुत पैसेवाले होते जा रहें हैं। पर यह सिस्टम ग़लत है। यह उद्योगपतियों का लेबर कोस्ट कम करने का तरीक़ा है…
पुन्श्च: हाँ, एक बात और मैं उबर ड्राइवर के दुख का कारण के पक्ष में बता रहा हूँ। FE में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार एक रिपोर्ट के अनुसार, “भाजपा की हार अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों तक फैल गई। हारी हुई 92 सीटों में से 29 एससी और एसटी के लिए आरक्षित थीं, जिससे इन समुदायों के समर्थन में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई।”

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चुनाव २०२४- कुछ प्रतिक्रिया

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मोहन भागवत का भाजपा नेतृत्व के विरूद्ध रणभेरी- हिन्दूओं की कमजोरी का द्योतक
श्रद्धेय मोहन भागवत जी का इस समय इस तरह का प्रेस के ज़रिये बयान देना हिन्दूओं के अनादि कमजोरी का एक उदाहरण है जिससे हिन्दुओं का लाभ कम और नुक़सान ज़्यादा होगा। भागवत् जी राजनीतिक दल बीजेपी का बदलता चाल पहले से ही देख रहे होंगे। उन्हें इसको ठीक समय पर ही बात कर लेनी चाहिये एक मीटिंग कर। आज मुसलमानों ने चाहे बहकावे ही हो आकर एक मुश्त भाजपा के प्रत्याशी के विरूद्ध वोट देते हैं, यह एक बड़ी समस्या ऐतिहासिकरूप से चली आ रही है।मोदी इसे शायद समझते हुए भी उन्हें मौक़ा देना चाहते थे। पिछड़े वर्ग पर मानवीय नाते से अप्रत्याशित रूप सभी किया खर्चा भी उस वर्ग के मानसिकता के कारण काम नहीं आया, जो सदियों की ग़ुलामी से अपना सद्य लाभ से प्रलोभित हो जाने के कारण बीजेपी के विरूद्ध हो गये। प्रधान मंत्री के इतनी प्रतिकूल अवस्था में भी जीत को अपने पक्ष में बदल देने के प्रयास भी जो छोटी बात नहीं थी, भागवत जी को इसके लिये बधाई देना चाहिये था।
संघ और चुनाव लड़नेवाले राजनीतिक दल को समय की नाजुकता समझनी चाहिये। अगर यह पहले तय नहीं हो पाया था तो कुछ समय और प्रतीक्षा कर संघ को बीजेपी नेतृत्व से बातचीत कर भविष्य के लिये रास्ता निकालना चाहिये था। साधारण हिन्दू वोटरों को तो यही समझ थी कि दोनों हिन्दू इकाइयों में तालमेल बना हुआ है। हम हिन्दू देश में हिन्दूओं की सरकार चाहते हैं जो हिन्दूओं की प्रतिष्ठा बढ़ाये। परिवारवादी पार्टियों को रोकना और देश को परिवारों के राज्यों से बचाने में सब हिन्दूओं की सहायता चाहिये। चाहे पिछड़ा वर्ग हो या हमारे मुसलमान भाई सबको समान मौक़ा मिला है अपने को सम्पन्न बनाने का। यह अलग की सुविधा चिरस्थायी व्यवस्था तो नहीं बन सकती।
हिन्दू समाज के हित में यह जरूरी है कि इतिहास की गलती न दुहराई क्योंकि देश हित में भी यही ठीक है। संघ और दल के हर सेवक पूरी ईमानदारी से देश पूरी तरह समर्पित हों। किसका वर्चस्व हो की भावना ही नहीं चाहिये। हमारा धर्म जब संसार हर भूत (प्राणी) में एकत्व पर ही टिका है, तो फिर हमारे धर्म के नेता ही यह न समझें तो कैसे चलेगा।
हाँ, एक बहुत बड़ी संख्या में हिन्दुओं के संत और महात्मा केवल पूरे देश में फैले अपने आश्रमों, मठों, मन्दिरों में ही रहने लगे है। अधिक से अधिक उनका शहरों से सम्पर्क होता है। वहाँ के धनी लोगों काफ़ी अर्थार्जन भी होता है। पर अभी भी भारत की एक बड़ी जनसंख्या गाँवों में रहती है , जिन्हें स्कूली शिक्षा भी नहीं मिली है। उन्हें कौन अपने सनातन धर्म को सरल सहज भाषा में समझायेगा। धार्मिक संस्थानों और उनके प्रमुखों को इस खाई को भरने का प्रयास करना चाहिये। सहज स्थानीय भाषा में उपनिषदों, गीता, मानस आदि का हिन्दू धर्म के आख़िरी छोर पर रहनेवाले हर व्यक्तितक पहुँचाने का भार तो किसी न किसी को लेना होगा।

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चुनाव २०२४ – कुछ विचार

चन्द्रबाबु नायडू ने वायदा किया है कि वे २०४७तक आंन्ध्रप्रदेश के लोगों को दुनिया का सर्व्वोच स्थान दिला देंगे और अपने प्रदेश को भारत के प्रदेशों में प्रथम स्थान पर पहुँचा देंगे।और उनके पिछले दौर के मुख्य मंत्री काल के उपलब्धियों का इतिहास हमें उनकी बात पर भरोसा करने का विश्वास दिलाता है। इस विषय पर मोदीजी साथ देंगे उनका, क्योंकि वे सब प्रदेशों को ही उन्नत बनाना चाहते हैं। मोदी और नायडू मिल आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों को दुनिया के सबसे बड़े मैनुफ़ैक्चरिंग केन्द्र में परिणत कर देंगे जैसे चीन का जियांग्सू , गुआंग्डोंग , शेडोंग , शंघाई और झेजियांग प्रांतों के तटीय क्षेत्र हैं ।मोदी यह भी कोशिश करेंगे के ओड़िसा के तटीय क्षेत्रों में भी वैसी ही प्रगति हो। सभी तरह के बड़े और छोटे कारख़ानों को लगाया और निर्यात किया जा सकता है वहाँ के बन्दरगाहों से। औद्योगीकरण से आंध्र प्रदेश तमिलनाडु को पछाड़ सकता है। बिशाखापट्टनम के बन्दरगाह के भीतर इलाक़ों में औद्योगिक क्षेत्र बना और अमरावती में एक नया ए. आई. आदि के अनुसंधान केन्द्र और उद्योग बना आँध्र बहुत आगे आ सकता है। साथ ही मुझे मालूम है अपने पुराने सम्पर्कों सें कि आंध्र का कृषि क्षेत्र भी बहुत पैदावार और बडा भी है।

पर मोदी के दूसरे महत्वाकांक्षी सहयोगी बिहार के मुख्य मंत्री नीतिश जी क्या बदलेंगे? मोदी ने तो पहले बार दिल्ली की गद्दी सँभालते ही बिहार में दो रेलवे उद्योग के विश्वस्तरीय कारख़ाने लगवाया और सिद्ध कर दिया समुद्र तट का न होना पिछड़ेपन का कारण नहीं बन सकता। बिहार बहुत उद्योगिक केन्द्र अभी भी हैं जहां के पुराने कारख़ानों को किसी योग्य व्यक्ति के नेतृत्व में चालू करा बिहार के विकाश को गति दी जा सकती है।बिहार एथानल का सबसे बडा उत्पादन केन्द्र बन सकता है पूर्वांचल के गन्ना, मक्के, बाजरे की खेती करके और पूराने, नये चीनी मिलों कोअच्छे कर्मठ औद्योगिक मालिकों से चलवाकर। बिहार फ़ूड प्रोसेसिंग का भी देश का सबसे बड़ा क्षेत्र हो सकता है और निर्यातक भी, क्योंकि धान, गेहूं और गन्ने के अलावा बिहार साफ़ पानी की मछलियों, आलू और अन्य सब्ज़ियों का देश का सबसे बड़ा उत्पादन करने वाला प्रदेश बन सकता है। गंगा के कारण बिहार की मिट्टी इसके अनुकूल है और पानी की कमी भी नहीं हो सकती। साथ ही ब्रिटिश काल में ही नहरों का जाल बिछ गया था इस प्रदेश में। दूसरे दो संभावित उद्योग चमड़े और दूध का हो सकता है। एक रोचक खबर पिछले सुना और आज उसका विडियो भी उपलब्ध है- https://youtu.be/_juYRUvorZ0?si=BFzR19uV_2AYRpCg ।
प्रदेश को सोने की चिड़िया बनने की भगवानदत्त असीम संभावना है । पर प्रदेश की सबसे बड़ी कमजोरी वहाँ के लोगों का समय के साथ बिगड़ा आचरण और स्वभाव हो गया है जिसे पिछले चालिस पचास दसकों से बढ़ावा मिला है। बिहार आज देश का हर तरह से सबसे पिछड़ा प्रदेश बन गया है। वहाँ के राजनीतिक लोगों को शर्म भी नहीं आती चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, चाणक्य, आर्यभट्ट या नालन्दा का नाम लेने में जिनके वे वारिस हैं। हर व्यक्ति वहाँ जाति की बात करता है और अपनी जाति को छोड़ सब जातियों को नीचा दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। इसे बदलना होगा समाज के अगुवाओं को या नई पीढ़ी को।
नीतिश जी अगर कम से कम शिक्षा के लिये स्कूलों, कालेजों, और इंजीनियरिंग, मेडिकल के शिक्षा का प्रबंधन तो सुधार देते, तो यह जो उनका अमर बनने का आख़िरी मौक़ा है, सफल मुख्य मंत्री या नायक कहलाते। और अब यह एक भूल भी उनको बिहार के इतिहास का सबसे मतलबी नालायक बना देगी।

बिहार और आंध्र दोनों को चाहिये कि सभी राष्ट्रीय एक्सप्रेस वे पर कुछ प्राइवेट क्षेत्र के बड़ी और अच्छी कम्पनियों द्वारा सब सुबिधा एवं साधन सम्पन्न स्मार्ट नगर बसाये जो गाँवों के सम्पन्न लोगों को वहाँ बसने को प्रेरित करे और पुराने शहरों का पुन: निर्माण या बदलाव करने का मौक़ा दे।

दोनों ही राज्यों के मुख्य मंत्रियों को सभी उद्योगों को सरकारी या ग़ैरसरकारी तकनीकी शिक्षा संस्थानों से ९वी दसवी कक्षा के और उसके ऊपर के उत्सुक क्षात्रों को उद्योगों में कम से कम एक या दो सप्ताह की ट्रेनिंग करवाने की व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे बच्चों की रूचि का पता चले या बदले। पाठक्रम में औद्योगिक और विज्ञान के बड़े व्यक्ति सरल जीवनी पढ़ने की ब्यवस्था करे, राजनीतिक नेताओं के बारे में बता तो कुछ भी फ़ायदा नहीं। मैंने अपने ८५ साल में बंगाल और बिहार को पिछड़ते हुए देखा और अपने बाक़ी जीवन में गलती का अहसास कर बदलते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ । भगवान लोगों को सद्बुद्धि दें।

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देश का आज का विजनेस सम्प्रदाय-एक बिचार


देश के विदेश मंत्री का बिचार सुनिये –
Jaishankar’s Big Warning To Indian Businesses On China Trade। https://youtu.be/4H72VSILFss?si=mlDDNbfGaOJ6i5bN


अब पढिये कुछ मेरा ८५ साल का उद्योगक्षेत्र का अनुभव और अगर नहीं सहमत है तो बताइये।

देश के ग़द्दार विजनेस सम्प्रदाय का कोई धर्म ईमान नहीं हैं, एकमात्र ध्येय या लक्ष्य अपनी और अपनी सात पीढ़ी के लिये सम्पति जमा करने को छोड़ कर।


आप खुद बिचार करिये ये अरबपति जो अपने धन का नंगा प्रदर्शन कर और करवा रहे है कभी सोचते हैं कि कहाँ से आया है धन- क्या इसी भारत से नहीं? क्या वे खुद या उनकी संतानें अपने धन के बल पर अमर हो जायेंगे, सब दुखों से मुक्त? क्या कोई आजतक हुआ है? यही हमारे धर्मगुरुओं ने भी बताया है।


फिर
क्यों अपनी बच्चों की शादियों के समारोह में चार सौ बरात में निमंत्रित के अपने अपने विमान से आने के कारण जामनगर हवाई अड्डे के जैम हो जाने की खबर समाचार में आ जाता है? क्यों उनके अरबों के खर्च वाले शादी की चर्चा सब अख़बार करते है? उनके देश विदेश के शहरों में सैकड़ों करोड़ रूपये या विदेशी मु्द्रा के घरों या महलों का समाचार आये दिन होता है? क्यों आपके वारड्रोब का भंडार समाचार बनता है? क्यों क्यों आपका चार साल का पोता पैदा होते ही अरबों का मालिक बन जाता है?

अब आप बताये कितने अमरीका के उद्योगपति भारत में अपना घर ख़रीदते हैं? आप अपनी अमरीकन विश्वविद्यालयों को तो बड़ी राशि में अनुदान देते हैं जहां आप इसलिये पढ़ने गये क्योंकि भारत के टॉप यूनिवर्सिटी में आपको दाख़िला नहीं मिलता। कितने उद्योगपति IISc, IITs, या अन्य ऐसे संस्थाओं में करोड़ों का भी दान देते हैं, जब उनकी सेवा सब लेते हैं ज़रूरत पड़ने पर?


अपने हर उद्योग में कितना आयात करते हैं चीन या अन्य देशों से? क्या आपने अपनी कोई इच्छाशक्ति और भारत में उपलब्ध ज्ञान को इन आयातित चीजों के बदले में उन्हें अपने यहाँ उत्पादित करने पर लगाया है या अच्छी गुणवत्ता की चीजों को ज़्यादा से ज़्यादा निर्यात कर चीन की श्रेणी में भारत को पहुँचाने का यत्न किया है? कितने उद्योगपति यहाँ बनते चीजों को चीन के कम्पनियों को सैंपल दे वहाँ से सस्ता वैसे ही दिखता माल आयात कर भारतीयों को बेंचते है और धन कमाते हैं?
विकसित भारत का सपना क्या एक साधारण घर के प्रधान मंत्री, जिसका कुल धन ३.५० करोड़ है, का ही होना चाहिये? आपने अपने सभी व्यवसायों के लिये २०४७ के विकसित भारत के मेल का सपना क्यों नहीं बनाया या अभी भी बनाने की कोशिश कर रहे हैं? आप अपने धन को R&D में खर्च कर अपनी कम्पनियों को दुनिया की सबसे बड़ी ब्रैंडेड कम्पनी क्यों नहीं बना सकते है? क्या नये अनुसंधान सरकारी अनुसंधान केन्द्रो में ही होना चाहिये? ये अरबपति क्यों अपने सबसे छोटे से छोटे कर्मचारी को संसार के ‘पर कैपिटा’ के बराबर मासिक वेतन नहीं देने का सपना देखते, या कम से कम अपने जीवन काल में करोडपति?


क्यों कम्पनी के कुल मुनाफ़ा के हक़दार केवल मालिक, शेयर होल्डर और ०.२ प्रतिशत उनके केवल सर्व्वोच अधिकारी ही होते है? आज भारत के व्यापार का सबसे बड़ा हिस्सेदार चीन बन गया है अमरीका को हटा। एक उदाहरण देखिये, टाटा, महिन्द्रा आदि बिजली के कार बहुत साल पहले बनाये, बाज़ार में भी लाये, पर आगे बढ़ टेस्स्ला की तरह नहीं बनने की कोशिश किये। वे आज भारत की ज़रूरत पूरा करने की भी कोई कोशिश करते भी नहीं दिखते, किसी अपना अस्तित्व बनाये रखने का ध्येय है। चीनी कार कम्पनियाँ आती जा रहीं हैं। बाहर के लोग भारत के मोटर उद्योग बार बार चेता रहे हैं, पर यहाँ कोई ऐसी हड़बड़ी नहीं हो जायेगा तो ठीक है, नहीं होगा तो हमारा क्या नुक़सान होगा। टाटा और महिन्द्रा दोनों विश्वस्तरीय कम्पनी बन सकते हैं, पर लगता है कहीं दृढनिष्ठा और आत्मविश्वास की कमी है।


आज विदेश मंत्री जयशंकर को बोलते देखा तो मुझे भी बहुत दुख हुआ और यह लिख बैठा। कौन पढ़ेगा, कौन सुनेगा, और कौन करेगा? पर अपने व्यक्ति प्यास की तरह पहले मोदीजी को एक ट्वीट किया” @narendramodi कृपया टाटा और महिन्द्रा को जल्दी EV cars के प्रोडक्शन को देश के ज़रूरत के बराबर करें हर महीनेलाखों में, नहीं तो चीन की EV की सैकड़ों कम्पनियाँ भारत में छा जायेंगीं ।टेस्सला या पैनासोनिक को गाड़ी की कम्पनी के पहले एक EV के बैट्री की कम्पनी यहाँ लगवाने की पहल कीजिये।”
और फिर यह ..
Jaishankar’s Big Warning To Indian Businesses On China Trade, Days After Xi Jinping’s Europe Tour”

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भारत बनाम चीन- भारत क्या जीत सकता-हाँ या नहीं, कैसे हाँ

भारत बनाम चीन- भारत क्या जीत सकता-हाँ या नहीं, कैसे हाँ
हमारी मानसिकता में समस्या से जुझने और हल निकालने का विचार इतने सालों की ग़ुलामी के कारण कम से कम होती गई है। आज फिर हर व्यक्ति में अपनी, समाज की, देश की वैसी मानसिकता को मिटाना है। चुनौती लेना है।

उसके उदाहरण है पिछले वर्षों की कुछ बदलाव की उपलब्धियों की कहानी। हमने कोविद की अपनी वैक्सीन बनाने की चुनौती ली, सफल हुए और अपने और अन्य देशों के करोड़ों की जान बचाई। ५ जी की और चन्द्रयान-३ की सफलता या अपनी डिजिटल अनुसंधानों से मोबाइल फ़ोन को हर हाथ में कहीं भी पैसे निकाल देने और लेने का साधन बना देने के पीछे भी उसी तरह की मानसिकता थी। हम चीन से मुक़ाबला अगर करने की सोचते हैं तो हर क्षेत्र और सामान बनानेवाले और आयात से अपनी जरूरत पूरा करनेवाले उद्योगों के मालिकों एवं उनके मैनेजरों इंजीनियरों वैसी मानसिकता लानी होगी। किसानों को कृषि क्षेत्र के हर पैदावार में विश्वस्तरीय उत्पादकता लाने के लिये भी उसी मानसिकता की जरूरत है। हर विद्यार्थी और उनके माता-पिता, शिक्षकों को वही उत्साह बच्चों में देना होगा। महंगे कोचिंग से देश का हर बच्चा न शिक्षा में, न हुनर में किसी काम का बन पायेगा। विशेषकर निजी क्षेत्र की बड़ी से बड़ी के साथ छोटी से छोटी इकाइयों के मालिकों और उनके द्वारा अपने यहाँ काम करते हर व्यक्ति में उसी मानसिकता को लाना होगा। अन्यथा केवल उनके पास में अकूत धनराशि होगी , चल अचल और बैंकों में या शेयरों में। हर सेक्टर के निजी औद्योगिक मालिक और उनके कुछ चुने हुए ऊपर के २-५ % एक्ज़ीक्यूटिव, कम्पनी के कुल लोगों के वेतन पर खर्च किये जाने वाली राशि का ८० % प्रतिशत हिस्सा लेते हैं, और ८-२०% जही राशि बाक़ी लोगों में बंटता हैं और सबसे नीचे की बड़ी संख्यक लोगों को तो बहुत ही कम वेतन या अन्य फायदा मिलता है, जिसके कारन न उनके पास घर होता है, न परिवार के लोगों को अच्छा खाना नसीब होता है, न उचित शिक्षा या हुनर। यह हाल विशेषकर पश्चिमी देशों के पूँजीपतियों की नक़ल के कारण हुआ है। यह भारतीय विचारधारा के पूरी तरह से विपरीत है।


मैं खुद उन पुराने बड़े पूँजीपतियों के यहाँ काम किया है १९६१-२००० तक और पहले भी औद्योगिक छोटे शहरों में ही रहा हूँ जहां मेरे दादाजी और चाचा काम करते थे।उस समय के मालिकों की सोच कुछ ज्यादा भारतीय थी परम्परागत थी। रामराज्य के सपने को साकार करती। वे अपने नीचे नीचे कर्मचारियों के बारे में सोचते थे और उनको सब तरह की सुविधा देते थे। रहने का घर, बच्चों के पढ़ने के स्कूल, या दक्षता की शिक्षा की व्यवस्था। मैंने उषा सिलाई मशीन और फ़ैन बनाने वाली कम्पनी के प्रमुख मैनेजर टी. आर. गुप्ता को सुना था, बात की थी और उनके बारे पढ़ा था। जो साल में ६ महीने का वेतन एक ख़ास अवसर पर हर साल हर को देते थे। यह कहानी लम्बी हो जायेगी। व्यवस्थित सेक्टरों के उद्योगपतियों को इसी तरह की सोच रखनी होगी। हर कर्मचारियों को कम्पनी का भाग बना हर चुनौती का मुक़ाबला करने की मानसिकता बनानी होगी जिससे हर छोटे बड़े और नये चीजों का अपने यहां बना या बनवा सकें, और निर्यात पर विशेषकर चीन जैसे देश पर नहीं निर्भर रहना पड़े। नये पुराने, छोटे बड़े सभी तरह के उद्योगों के नेतृत्व को जुझारू मानसिकता लाने की जरूरत है, केवल सरकारी रेवड़ी से एक दिन मौज किया जा सकता है, बराबर नहीं। पर चुनौतियों से लड़ने के बल पर आप हर कर्मी को मौज की ज़िन्दगी मुहैया करा सकेंगे और पुण्य कमा सकेंगे ।


प्रधानमंत्री ने भारत में एक विमान विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की कामना की, क्योंकि उन्होंने भारत के एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम), विशाल प्रतिभा पूल और भारत में स्थिर सरकार के मजबूत नेटवर्क की क्षमता पर प्रकाश डाला, ताकि बोइंग जैसी कंपनियां एक विनिर्माण संयंत्र शुरू कर सकें भारत में। वे बोइंग के अमरीका के बाहर भारत में बने सबसे बड़े डिजाइन सेंटर का उद्घाटन करते हुए कहा। इन उद्योगों के सर्वेसर्वा विश्व स्तर भारत सहित विश्व के लिये ज़रूरी स्तर पर अनुसंधान, गुणवत्ता एवं उत्पादन की क्षमता बनाने की मानसिकता होगी और उसी के अनुरूप अपने सभी कर्मियों को ढालना होगा, केवल निजी धनार्जन की नहीं।


(PM wished to build an aircraft manufacturing ecosystem in India as he highlighted the potential of India’s strong network of MSMEs (micro, small and medium enterprises), huge talent pool, and stable government in India, so that the companies like Boeing starts a manufacturing plant in India.)

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देश एक संक्रमण काल में

देश एक संक्रमण काल में
पूरा शीतकालीन संसद का अधिवेशन में प्रदशित दृश्य मुझे अपने कार्य काल में हिन्दुस्तान मोटर्स में यूनियन के नेताओं के मनमानी हुड़दंगों की याद दिलाता है। जब इच्छा हो काम बन्द कर दे। संसद में देश की समस्याओं पर बहस क्यों नहीं होती? विपक्षी दल देश की समस्याओं पर बहस क्यों नहीं करना चाहता? क्यों विपक्ष कोई भी उल्टा सीधा माँग रख कर हल्ला क्यों करने लगता है? यह क्या यूनियन और मालिक वाले ढंग से चलेगा । देश के लिये यह सब अशोभनीय है। देश के सीमा पार के दुश्मन देश खुश हो रहे होंगे। कभी कभी इन सब बारदातों में उन्हीं विदेशी ताकतों का हाथ दिखने लगता है। एक प्रश्न यह भी आता है कि क्यों सदन को न चलने देनेवाले लोगों की तनख़्वाह कटनी चाहिये? अजीब लगता है हम पुराने लोगों को….समाचार पत्र लेना या टीवी के न्यूज़ चैनेल देखना तो बन्द कर दिया हूँ। लोगों की इन पर किये जानेवाली बातों भी सुनना बन्द कर दिया जाये। अगर संसद ही मर्यादाहीन आचरण करे, तो समाज के कुछ राक्षसी प्रवृति के लोग जो आचरण कर रहें है, उसे कौन रोकेगा। सभी धर्म के ठेकेदार तो शहरों के मालदारों से पैसे कमाने व्यस्त हैं, गाँव में हिन्दू को अपढ गंवार तथाकथित ब्राहमण जाति के लोगों पर छोड़ दिया गया है। बड़े बड़े या शादी ब्याह, मृत्यु आदि अवसर ही इन पंडितों की कमाई का साधन है। कौन लोगों के आचरण को बनायेगा। ऊपर से उनके प्रतिनिधि अगर ऐसे हों।


बड़ी संख्या में सांसदों को निलम्बित करना यद्पि ठीक नहीं है, विपक्षियों के कार्य तो वोट बैंक को आकर्षित करने के लिये किया जा रहा है। जया बच्चन अपनी स्वतंत्र पहचान छोड़ अमिताभ की बीवी बन अपने को एक ऐसे दल जो पूरी तरह के साथ एक वेईमान परिवार का रहा है । क्यों अपने यहाँ के कुछ शिक्षित लोग भी गांधी परिवार का समर्थन कर रहा है जिनमें सब तरह के दुर्गुण हैं। कबतक नेहरू और ग़लत ढंग से गांधी कहला यह परिवार देश के सहज साधारण बुद्धि के लोगों को बरगाला रहेगा।


देश के लोगों को एक उचित निर्णय लेना होगा, जब एक तरफ़ सुनहरा भविष्य दिखता हो, दूसरे तरफ़ पूरा अंधकार। खड़गे जो पूरी तरह से सोनिया गांधी के चमचे हैं, क्या प्रधान मंत्री बनने योग्य है। देश साम्यवादी विचारों के लोगी साजिश एक महान राष्ट्र इस अद्भुत प्रजातंत्र के कारण अपनी अपनी विराशत खो देगा?


कभी लगता है कि इसके पीछे विदेशी बडी शक्तियाँ और वहाँ के सोरोस के अरबपति लोगों और चीन की तरह धनी दुश्मन देशों का हाथ हैं। देश का दुर्भाग्य है कि नेहरू परिवार के प्रति लोग उनकी अपनी विदेश यात्राओं दिये व्यक्तव्यो को देखने सुनने के बाद उस परिवार को यहाँ रहने ही दे रहे हैं, पर उनको मनमानी करने की छूट है। कांग्रेस की अकूत सम्पत्तियों के मालिक हैं।क्या सब विरोधी पार्टियाँ देश के लिये बहरी, गूंगी, अंधी बन गईं और यही देश के असंख्य बुद्धिजीवियों का भी है।क्या हम ‘जननी, जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’, ‘ कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’, ‘श्रेयान् स्वधर्मः विगुणः पर-धर्मात् स्वनुष्ठितात्’?

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आज के प्रदेशों के चुनावों के नतीजे- एक विचार


भारत एक अजीब देश है शायद यह हरदम ही ऐसा ही था। इतिहास गवाह है। हवा ऊपर से नीचे नहीं बही, ऊपर से नीचे ही बहती रही। कांग्रेस, चाहे केरल हो, या कर्नाटक या तेलंगाना या तमिलनाडू- अगर वोट पाती है या जीतती है तो स्थानीय परिवारिक दलों के प्रदेश में वर्चस्व मिलने पर किये जानेवाले मनमानी हरकतों के कारण होती है। चन्द्रशेखर बेताज बादशाह होते जा रह थे और उनके उत्तराधिकारी उनके बेटे योग्य होते हुए भी नवीन पट्टनायक नहीं बन पाये दस सालों में। यही हाल पश्चिम बंगाल का भी है, वहाँ भी क्षेत्रीय भावना दृढ़ रही है और इसी कारण भाजपा कुछ थोडी उठी पर फिर नीचे आ गई। पर वहाँ बीजेपी असफल रही। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को क्षेत्रीय शक्ति बननी होगी। वहाँ के अच्छे लोगों को पार्टी में शामिल करना होगा। उन्हें क्षेत्रानुसार रणनीति बदलनी होगी। हिन्दी प्रदेशों के नेताओं के बल पर बीजेपी सरकार पूरे देश का नेतृत्व नहीं कर सकती। सफल नहीं हो सकती। मुझसे बहुत विद्वान बीजेपी में होंगे और उन्हें इन प्रदेशों की रणनीति का कुछ आज की लीक से हटकर एक दम नया और कारगर रास्ता खोजना पडेगा। उन्हें एक इन रणनीतियों में पारंगत नेता खोजना होगा या तैयार करना पडेगा। अगर तेलंगाना की विजय को गांधी परिवार अपनी विजय मानती है तो यह बड़ी गलती होगी।जीत दिलाने वाला अखिल भारतीय छात्र परिषद से निकला और आज तेलंगाना मुख्य मंत्री बनेगा। दक्षिण के आज के कांग्रेस के प्रेसीडेंट खरगे और कर्नाटक के कुछ नेताओं का तेलंगाना के राजशेखर को हराने में मुख्य भूमिका रही है। राहुल गांधी या प्रियंका गांधी या उनकी माताजी का इसमें कोई बडा योगदान नहीं समझना चाहिये। दुर्भाग्य है अब कांग्रेस के पास नये नेता नहीं हैं २०२४ के चुनाव के लिये। इन्दिरा, राजीव गांधी जमाने के नेता या तो नहीं रहे या बहुत ही वृद्ध या बदनाम हो चुके हैं। कमलनाथ और गहलोत उन्हीं में है। देश के मजबूत विपक्षी पार्टी होनी चाहिये। पर भारत में ३०-४० पार्टियों का गठबंधन कभी ज़रूरी शक्तिशाली विपक्षी पार्टी नहीं बना सकता। अब देश हित बहुत सारी पार्टियाँ को विलय हो, दो या तीन राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां पैदा होनी चाहिये।
जहाँ तक भाजपा का सवाल है, २०२४ के बाद मोदीजी अपने समान ही कुछ लोगों को उत्तराधिकारी बनने के लिये तैयार करने चाहिये। यह उनका राष्ट्रीय हित का दान होगा और तभी २०४७ का ‘अमृत उन्नत भारत’ बना सकेगा।

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सनातन धर्म की वैज्ञानिक वर्ण-व्यवस्था

उपनिषदों में असुरों की बात आई है। गीता के अध्याय 16 में  देव एवं असुर दो भाग किया गया मनुष्यों का ही- ‘द्वौभूत सर्गो लोकेऽस्मिन्दैव असुर एव च’-  (16.6)। उपनिषदों के कहानियों में कुछ व्यक्ति व्यक्तियों के जाति के नाम आये हैं। भगवद्गीता में चांडाल के लिये ‘श्वपाक’ शब्द का व्यवहार हुआ है (5.18) यहाँ तक कि कृष्ण के लिये भी ‘यादव’ शब्द का उपयोग किया गया है।(11.41) महाभारत में रथचलानेवालों के लिये ‘सूत’ (कर्ण को सूतपुत्र), मतंग मुनि को जन्म से ‘चांडाल’ कहा गया है-

स्थाने मतंगो ब्राह्मण्यं नालभद भरतर्षभ। चणडालोयोनौ जातो हि कथं ब्राह्मण्यमाप्नुयात्॥

– युधिष्ठिर ने कहा, हे भीष्मपितामह, कृपया मुझे बताएं कि मतंग महर्षि जो चांडाल के रूप में पैदा हुए थे, अपने जीवन में ही ब्राह्मण कैसे हुए?’ महाभारत अनुशासनपर्व

न शूद्रा भगवद्भक्ता विप्रा भागवता: स्मृता:। सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये ह्यभक्ता जनार्दन।

यदि भगवद्भक्त शूद्र है तो वह शूद्र नहीं, परमश्रेष्ठ ब्राह्मण है। वास्तव में सभी सवर्णों में शूद्र वह है, जो भगवान् की भक्ति रहित है।’ (महाभारत)

बाल्मिकीय रामायण के बालकाण्ड में एक कहानी है। राजा राम के गुरू वशिष्ठ ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण थे। पर विश्वामित्र जो क्षत्रिय वर्ण के प्रसिद्ध राजा थे और राम के धनुर्विद्या के गुरू। राम के समय तक अपनी इन्द्रियों को अनवरत बहुत काल तक की तपस्या से वश में कर ब्राह्मण बन चुके थे और यह खुद ब्रह्मा और वशिष्ठ दोनों के द्वारा अनुमोदित किया गया था।        

शायद हमारे धार्मिक ग्रंथों में भगवद्गीता के अध्याय ४ के १३ श्लोक में मनुष्य समुदाय के चार वर्णों को भगवान कृष्ण अपने द्वारा बनाया बताते है।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥4.13॥

भगवद्गीता के 18 अध्याय के श्लोक 40 से 45 में ये चारों वर्ण परिभाषित हैं और उसमें उसके निर्णय का आधार ‘स्वभावप्रभैवगुणो’ बताया गया है। फिर बाद के श्लोकों में चारों वर्णों के कर्म बताये गये है। नीचे वे श्लोक हैं-

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ 18.41॥

–हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ॥41॥

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥18.42॥

अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ॥42॥

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥18.43॥

–शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ॥43॥

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥18.44॥

खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम ‘सत्य व्यवहार’ है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ॥44॥

 

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥18.46॥

–जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है (जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त है), उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है ॥46॥

ऊँची जाति के लोग के अपने कर्मों को न करने और निचले वर्ण लोग के ऊँचे वर्ण के कर्मों को करने फल क्या होगा?

श्रीमद्भागवत (3.33.7 और 7.9.10) श्लोकों में कहा गया है कि अपने वर्तमान जीवन के कर्म से चांडाल ब्राह्मण बन सकता है और ब्राह्मण चांडाल। श्लोक नीचे दिया जा रहा है-

यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यजकम्। यदन्यात्रापि दृश्येत तत् तेनैव विनिर्दिशेत्॥7.11.35॥ श्रीमद्भागवत

जिस मनुष्य के वर्ण को बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है, वह यदि दूसरे वर्णवाले में भी मिलते हैं तो उसे भी उसी वर्ण का समझ लेना चाहिये।

मनुस्मृति में भी इसी तरह का आदेश है-

पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकांछठान्।हैतुकान्बकवृत्तींश्च वांमात्रेणणापि नार्चयेत्॥ मनुस्मृति 4.30

-‘पाखण्डी, विरूद्ध कर्म करनेवाले, बैडालव्रती, शठ, हेतुवादी, बकवादी, ब्राह्मणों का वचनमात्र से भी आदर न करें।’

न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रतिके द्विजे। न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित् ॥मनुस्मृति 4.192

-‘धर्मज्ञ गृहाश्रमी बैडालव्रती और वेद को नहीं जाननेवाले ब्राहमण के लिये पानी भी न दे।’

भगवत् गीता में ही चांडाल और ब्राहमण को पंडितों एक दृष्टि देखने की शिक्षा गई है (5.18 श्लोक)। स्त्रियों में सबसे नीच समझे जानीवाली वैश्या, वैश्य (पता नहीं ‘वैश्य’ क्यों) और शूद्र को भगवान ब्रह्म कृष्ण अपनी भक्ति का और मोक्ष का समान अधिकार देते है (9.32 श्लोक)

आज की सामाजिक अनुसार एक परिवर्तन

हम सभी, विशेषकर मध्यम वर्ग के लोग अगर गृहस्थ जीवन में सभी वर्णों के गुणों का समन्वय ठीक तरह से अपने नहीं कर सकते हैं तो वे एक अच्छे सुखी व्यक्ति या अच्छे नागरिक नहीं बन सकते। इसे सभी समझते सकते हैं।

हम जिस किसी काम में लगें हमें उस ख़ास विषय का विशेष ज्ञान अर्जन करते रहना होगा, अपने किये व्यवसाय या नौकरी में उन्नति के लिये। अपने बच्चों को पढ़ाने के लिये अपने भी जब तक हो सके उसके लिये ज़रूरी ज्ञानों को यथासंभव अर्जित करना होगा। साथ अपनी जिवीका चलाने के हम जो काम करने उसमें पदोन्नति हमें अलग स्तर पर ज़रूरी ज्ञानों को भी सीखना होगा ( ऐसा करते समय हम ब्राह्मण होते हैं)। हम अपने जीवन को सम्पन्न बनाने के लिये विना व्यवसाय-बुद्धि (वैश्य गुण) से अर्जित धन को ज़रूरत के अनुसार खर्च या निवेस कर ही वर्तमान और भविष्य की ज़रूरतों के लिये उसे बढ़ा नहीं सकते। बिना क्षत्रियों के गुणों के हम न अपनी नौकरी और न अपनी सम्पति, न अपने परिवार की रक्षा कर सकते। और बिना परिचायात्मक कर्म किये तो हम एक दिन भी नहीं जी सकते। हमें अपने घर के कर्म, साफ़ सफ़ाई करना, अन्य काम करते ही रहना होगा (यहाँ तक की अपने बाथ रूम के कमोड आदि की सफ़ाई भी) सोचिये, यही सब परिचार्यत्मक कर्म (शूद्र) है। सोच कर देखिये कोई भी इससे विचार असहमत नहीं होगा। साथ जो हमारा जीविका का कर्म है, वह अपने जाति के कर्म अनुसार नीचा होने पर भी करना होगा, उदाहरण के लिये डाक्टर, नर्स आदि सभी बड़े छोटे कर्म।

आशा है, वर्ण व्यवस्था के सिद्धान्त आपको पसन्द आये होंगे।

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जातिय आधार पर जनगणना, इतिहास, धार्मिकता

बिहार पहला राज्य है जो अपने जनसंख्या की लोगों का जाति के आधार पर किया एक सर्वे प्रकाशित किया, जो बहुत चर्चे में है। देशहित विकाश के ज़रूरी मुद्दों को छोड़ बिरोधी दल का देश के लोगों में आपसी मतभेद ला चुनावी जीत हासिल करने का यह शायद दुनिया के किसी देश का पहला प्रयत्न है। अन्य बिरोधी दल शासित प्रदेश सरकारें भी जाति के आधार पर जनगणना कराने की वायदा कर रहीं हैं। दसकों शासन करनेवाली कांग्रेस, विशेषकर राहुल गांधी, जातिगत जनगणना के सबसे बड़े पक्षधरों रहें हैं आते प्रदेशों और फिर २०२४ के आम चुनावों को देखते हुए। देश में जाति की बात करना और किसी से उसकी जाति पूछना मेरे समझ में किसी भारतीय हिन्दू का एक राष्ट्रीय एकता को तोड़ने का महापाप कर्म है।

जाति प्रथा सनातन धर्म की देन नहीं है और बढ़ते हुनरों की ज़रूरत के अनुसार इनकी संख्या बढ़ती गईं। शायद आज भारत में जातियों की संख्या हज़ारों में हैं। साथ ही जातियों में बहुत उप-जातियाँ भी बन गईं हैं, जिनमें एक दूसरे शादी नहीं करते, और एक को दूसरों से नीचा या ऊँचा कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के बारे में तो मुझे पता है। पर अन्य जातियों में यह होगा ही।


समय बदल गया है जब जाति की कोई आवश्यकता नहीं है। सभी वर्गों को शिक्षित होने और हुनर सीखने का अधिकार है। आज सबसे ज़्यादा कमाई व्यवसाय में है, आज की सरकार भी यही प्रयत्न कर रही है, किसी जाति के अध्यवसायी चाहे पुरूष हों या स्त्री स्टार्ट-अप एवं छोटे व्यवसायों के लिये भी बहुत कम दर के व्याज पर क़र्ज़ देकर उन्हें सम्पन्न बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। फिर जाति आधारित संरक्षण क्यों? कबतक कुछ परिवारवादी राजनेता वर्ग देश के लोगों की कमज़ोरियों का फ़ायदा ले वोट की राजनीति करते रहेंगे। आजतक इन प्रदेशों उन राजनेताओं ने, जो मुख्य मंत्री बने, चाहे बिहार के लालू- परिवार हों, मुलायम सिंह यादव हों, या पंजाब का बादल हों, हरियाना के चौताला या महाराष्ट्र के शरद पवार, या ठाकरे हों, या तेलगांना का या आंध्रप्रदेश के चन्द्रबाबू नायडू या तमिलनाडु के करूणानिधि, आदि और अब ममता बनर्जी या फिर केन्द्र का गांधी परिवार- केवल अपने परिवार के लिये अकूत सम्पति जमा करने और अपने ही परिवार के लोग उनके उत्तराधिकारी बनाने को निश्चित करने के वोट बैंक की राजनीति को छोड़ कोई राष्ट्र को एक करने, समाज के सबसे कम आय करनेवाले निचले वर्ग के लोगों की ज़िन्दगी ख़ुशहाली लाने में न मन से प्रयत्न किये और वैसा कुछ बदलाव आया। देश के प्रधान मंत्रियों में न लाल बहादुर शास्त्री, न अटल बिहारी बाजपेयी, और अब नरेन्द्र मोदी या अन्य राजनेताओं जैसे कामराज नादर, बिधान चन्द्र राय और आज के ओड़िसा के नवीन पट्टनायक… के मुख्य मंत्री की तरह के ईमानदार और लोग हुए।

तथाकथित बड़ी तीन या चार बड़ी जातियों पतन के रास्ते पर है। अपने को बड़ी जाति की पुरानी मानशिकता मिट नहीं रही है। न वें पढने में बड़ी संख्या में आगे हैं, न हुनर सीखने में दिलचस्पी रखते हैं। अब कुछ वर्षों में सम्पन्नता जाति के आधार पर ज्यादा कम नहीं होगी, उसका आधार होगा है, शिक्षा या हुनर और उसमें दक्षता।


भारत में करीब 3,000 जातियाँ और 25,000 उप-जातियाँ हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशिष्ट काम में दक्षता से संबंधित हैं। कैसे बाँटेंगे, सभी जातियों में उनकी आबादी के अनुसार उनका हक़। कैसे राहुल गांधी का भारतीय जनता को बरगलाता यह ट्वीट ‘Jitni Abadi Utna Haq’ – this is our pledge,” Rahul posted on ‘X’, ज़मीनी हक़ीक़त बनायेंगे। फिर वे क्या अपने को अपने परनाना जवाहरलाल नेहरू से भी समझदार समझते हैं? Jawaharlal Nehru had said: “This way (ever larger scope of reservation) lies not only folly but also disaster. Let us help the backward groups by all means, but never at the cost of efficiency.” जवाहरलाल नेहरू ने कहा था: “इस तरह (आरक्षण का व्यापक दायरा) न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि विनाशकारी भी है। आइए हम पिछड़े समूहों की हर तरह से मदद करें, लेकिन दक्षता की कीमत पर कभी नहीं।”

दुर्भाग्य है कि अब जाति प्रथा पर बहस राजनीतिज्ञ कर रहे हैं, ज्ञानी, कोई व्यास या शंकराचार्य नहीं, जिनके लिये न राष्ट्र महत्व रखना है, देश का विश्व के देशों में वरीयता का स्थान।


संरक्षण के बाद दूसरा बदलाव का दौर आया। बहुत बढ़ई, लोहार, भांट आदि अपने को शर्मा कहने लगे। कायस्थ ऊँची जातियों में रहीं होगी, पर वे भी अपने को चित्रगुप्त के बंशज पर टीक गये।

जाति प्रथा में पिता माता की जाति पर बच्चों की जातियाँ होती हैं। इस प्रथा में न कोई वैज्ञानिकता है, न आज के बदलते समाज पर यह लागू हो सकता है। मैं भूमिहार या ब्राह्मण कैसे हो सकता हूँ, जब न खेती करता हूँ, न ब्राह्मण के गुण रखता हूँ। राजा या सैनिक बनना केवल क्षत्रियों तक कभी सीमित नहीं रहा। तथाकथित नीच जाति का होते हुये एकलव्य सबसे मशहूर धनुर्धर बना और एक ब्राह्मण धनुर्धर क्षत्रिय अर्जुन के कारण उससे बरगला कर अंगूँठा काट माँग लिये।मंतग चंडाल होते हुए भी अपनी तपस्या से ब्राह्मण बन गये। आज जब सभी जाति के लोगों के लिये, स्त्री, पुरूष, नपुंसक सबके लिये सभी पेशा, नौकरियाँ खुली हैं, चाहे सेना हो या खेल का मैदान या राजनीति। महिला अपने देश की सफलत्तम वित्त मंत्री हैं, बड़ी जाति के नहीं तथाकथित निचले वर्ग से आया ब्यक्ति देश का अबतक के हुये महानतम प्रधान मंत्रियों में एक है। यही भारत का सनातन धर्म है, क्योंकि हमारे ऋषियों ने सिखाया है-

यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥५॥
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ६॥

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