कल उन फ़ोटों को Whatsapp पर देखा। कुछ यादें आ गईं। शाम को बिरलापुर में रहते अपने चचेरे भाई से बात किया। बिरलापुर की फैक्ट्री लोढा चला रहे हैं ठीक ठाक। और पूरा बिरलापुर करीब करीब वैसे ही है।
मेरी ज़िन्दगी का दो बड़ा हिस्सा दो बिरला परिवार के औद्योगिक संस्थानों में बीता है। पहला बचपन से स्कूली शिक्षा तक बिरलापुर में जो माधव प्रसाद बिरला के एक मात्र भारतीय स्थापित बिरला जूट मिल्स के अहाते में था। मुझे वहां के शीर्ष मैनेजरों- स्व. राम लाल थिरानी एवं महावीर प्रसादजी का असीम प्यार मिला अच्छे विद्यार्थी होने के कारण। करीब ६ साल बाद प्रेसीडेंसी कालेज एवं चार साल आई.आई.टी, खड़गपुर के १९६१ में हिन्दुस्तान मोटर्स में आ गया और अन्त तक रहा। जया इंजीनियरिंग से आये मशीन शॉप के पहले प्रबंधक शिवप्रसाद, बी.एमशारदा, एन.के बिरला, और फिर श्री एस.एल. भट्टर जी अपनी न हारने की प्रवृत्ति के के बहुतों का प्यार शायद आदर भी पाया। पहले तीनों का मैं प्रिय था, पर भट्टरजी में शायद मेरी हिन्दुस्तान मोटर्स में अर्जित इंजीनियरिंग की जानकारियों के कारण कुछ शंकाओं के बारे में मुझ पर ही विश्वास करते थे। मैंने अपनी फ़ोटो ऑटोबायोग्राफ़ी में कुछ व्यक्तिगत विवरण हैं। https://drishtikona.com/wp-content/uploads/2012/08/over-the-years1.pdf ( इस वेबसाइट पर आप मेरे संकलित चार उपनिषदों, गीता, और रामचरितमानस के चुने हुए अंश मेरी भूमिका के साथ पढ़ सकते हैं और एक भारत के प्राचीन काल से लेकर १९-२० सदी के प्रमुख वैज्ञानिकों बारे में हैं।मेरी कुछ कविताएँ एवं लेख भी हैं जो आप अपनी रूचि के अनुसार पढ़ सकते हैं।
विभिन्न विभागों में काम करते हुए बहुत बदलाव किया जो उस समय के मैनुफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी के मान दंड बन गये और देश के अन्य बड़ी बड़ी कम्पनियों में भी मुझे जाना गया। यूरोप और जापान के साथ दक्षिण एशिया- तैवान, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि एसिया के देशों के दौरों में बहुत सीखा और सिखाया भी, इज्जत भी मिला।
पर अन्त में एक ऐसा पीढ़ी गत बदलाव लाया जो निजी कम्पनियों में स्वाभाविक होता है मालिकों की पीढ़ी बदलने पर। बिरला परिवार और देश की सबसे बड़ी जानीमानी हिन्दुस्तान मोटर्स में भी वही हुआ। और २०१५ में एक दिन अपनी शताब्दी पूरा करनेके पहले ही हिन्दुस्तान मोटर्स बन्द हो गई।आज हज़ारों लोगों की जीवन के हजारों लाखों सबसे यादगार यादों के घर खंडहर बनते जा रहे हैं।
क्या बिरला कहानेवाले वे युवा से वृद्ध हुए मालिक अपने बाप दादा के इज्जत को ताक पर रख हिन्दमोटर का आशियानों का यह हाल कर दिये? क्या हिन्दुस्तान की वस्ती को बचा कर अमर नहीं हो सकने का ख्याल नहीं आया होगा?
आज एक सड़क के पच्छिम की पूरे के पूरे की बस्ती वैसी की वैसी एक हिन्दमोटर रेसीडेंट एसोसिएशन बना उसके हवाले नहीं कि जा सकती थी?
बहुत बहुत पहले मैंने के डी रूंगटाजी को कहा था कि नौकरी करने लायक न रहने पर बिरला जी को कहूंगा कि हमें तालाब किनारे का एक टी एच का घर दे देंगे और मैं वहीं रहना चाहूँगा।
आज भी अगर औरंगज़ेब रोड या जहां कहीं भी चन्द्रकान्त जी हैं, उनसे मेरा यही अनुरोध रहेगा।
हाँ, अपने आख़िरी सालों में एक दिन चन्द कान्त बिरला फैक्ट्री में आये थे और राउडं पर। मैं भट्टरजी के साथ थोड़ा पीछे था। भट्टरजी अचानक मुझसे पूछ बैठे-‘ क्या इस फैक्ट्री को बचाने का कोई उपाय नहीं हैं।’ मेरे मुँह से निकल गया था, हाँ है, इस फैक्ट्री को ४-५ स्वतंत्र इकाइओं में बांट दीजिये और उन्हें व्यवसायिक रूप से अलग कर दीजिये योग्य लोगों के मातहत।’ कुछ मिनट चुप रहे…’ फिर बात करेंगे।’