आज के परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास और उनके राम

आज के परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास उनके राम
नानापुराणनिगमागम के ज्ञानी तुलसीदास(१४९७-१६२३) ने अपने इष्टदेव की तरह श्री राम को ही क्यों चुना? उनके समय में एवं पहले से ही भक्त कवियों में कृष्ण छा चुके थे जयदेव (१२०० ई.), सूरदास(१६४८-१५८४), मीरा(१४९८–१५४६) सभी कृष्ण में रमें….बाल्मिकी रचित संस्कृत के पहले महाकाव्य के व्यक्तित्व में तुलसीदास ज़रूर वह सब पाये जो एक देश निर्माता कवि को चाहिये था. पूर्ण रूप से राम में समर्पित एवं अपनी विभिन्न तीर्थ यात्राओं के अनुभवी भक्त तुलसीदास देश के लोगों में व्याप्त कुरितियों एवं आम लोगों के तकलीफ़ों से भी वाक़िफ़ थे, और उनके ऐतिहासिक कारणों से भी.साथ ही दूरदर्शी भी थे संस्कृत के ‘कवि’शब्द के अर्थानुकूल..ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन्हें देश के सैकड़ों सालों से विदेशियों द्वारा पहले किये विध्वंसक आक्रमण एवं लूट,मन्दिरों एवं उनकी मूर्तियों के विनाश, देश के लोगों को दास बना ले जाने एवं बाद में हिन्दू राजाओं में एकताहीनता के कारण देश पर विजय प्राप्त कर शासक बन जाने एवं फिर उनका हिन्दू धर्म एवं भावना के प्रतिकूल आचरण करने आदि का इतिहास उनको मालूम न हो और उनको दुख नहीं देता हो.उन्हें इतिहास की जानकारी थी…कैसे सिकन्दर के आक्रमण के समय अम्भीक ने सिकन्दर का साथ पोल्स को हरवाया…कैसे पृथ्वीराज को जयेन्द्र ने धोखा दिया…कैसे न पंजाब, न गुजरात के अपने को महायोद्धा कहने वाले राजा एक होकर विदेशी आक्रमणों का सामना नहीं किये अपने ऐयाशी जीवन के लिये स्वार्थी बने रहे, आपस में लड़ते रहे, और फिर कैसे न हेमू का हिन्दू राजाओं ने साथ नहीं दिया, न महाराणा प्रताप का…यहाँ तक कि अपना भाई शक्ति सिंह ही धोखा दे गया और अपने राजा, महाराजा कहने वाले राजपूताना के अन्य वीर पर स्वार्थी लोग मुग़ल दरबार की शरण में आ गये बेटी बहन की शादी कर…एक राणा प्रताप अन्त तक भीलों को अपने साथ जोड़ लड़ते रहे अपनी कमजोर सेना के बावजूद भी ….कैसे तुलसीदास की तरह का विद्वान देश के पतन के इन कारणों से अपरिचित हो सकते हैं और उन पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा होगा…उनका समय काल अकबर एवं महाराणा प्रताप का था. अकबर के नौ रत्नों में एक राजा टोडरमल भी थे, जिनसे से वे सम्पर्क में थे. तत्कालीन संस्कृत के पंडितों से अवधी में लिखे अपने रामचरितमानस के विरोध और उसे नष्ट करने की धमकी के कारण वे एक प्रति सुरक्षित रखने के लिये टोडरमल के पास भिजवाये थे। तुलसीदास ने भारत का राज्य करने के लिये राम के चरित्र द्वारा भारत के लिये एक आदर्श पुरूष एवं राजा की कल्पना की.समाज के आम गृहस्थ परिवार के लिये भी एक अनुकरणीय आचरण की मर्यादा बनाई.अपने अलग अलग माँ के चार भाई थे…चार भाइयों की पत्नियाँ भी दो भाइयों की बेटी थी….पर उनके आचरण को देखिये कैसे चित्रित किया तुलसीदास ने आदर्श रूप में, सौतेली माँ के अनुचित हठ के कारण पिता के आदेश को सहर्ष स्वीकार किया. वन गये चौदह साल के लिये वनवासी की तरह….रास्ते के ऋषियों से ज्ञान अर्जित किया, साधारण से साधारण लोगों से पूर्ण श्रद्धा मिली अपने स्वभाव के कारण, चाहे वे केवट हो या निषाद राज, बानर हनुमान हों या सुग्रीव, तत्तकालीन दुष्ट तपस्वियों को सतानेवाले राक्षसों को पराजित किये, शबरी के जूठे बेर भी खाये प्रेम से, सबकी सहायता ली सीता हरण के बाद पहले खोजने में, जटायु से विभीषण तक की, फिर समुद्र पर पुल बनाते हुए ज्ञान का रास्ता छोड़े अहंकारी ब्राह्मण राजा रावण को भी हराया, …एकपत्नी व्रत का पालन किया, और फिर ‘हम दो हमारे दो’ का भी आदर्श दिया…
रामचरितमानस के दो प्रकरण- अपने समय के कलियुग काल का वर्णन
“भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।..द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन..”
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
..
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥
……
एवं रामराज्य के रूप का चित्र
“सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥…
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥…
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥…..
उनकी तत्कालीन सामाजिक पतन एवं उद्धार दोनों के सम्बंध में उनके विचारों की गहरी पैठ की कहानी कहता है।
तीस चालिस साल पहले तक रामायण उत्तर भारत के हिन्दी प्रदेश गाँव गाँव तक गाया, जाना, समझा जाता था…नई शिक्षा पद्धति, नई विदेशी आचरणों का नक़ल पूरी तरह से हमारी संस्कृति को नष्ट कर दिया और यह प्रभाव फैलता ही जा रहा है और उसका निराकरण भी नहीं दिखता…होइहे वही जो राम रूचि राखा कह हम संतोष कर रहे हैं…
हाँ, एक और बात
इसी कारण से वे कृष्ण की मूर्ति को देख कह पाये:
“काह कहौं छबि आजुकि भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै धरो धनुष शर हाथ ॥
क्योंकि उनके आदर्श थे:
नीलाम्बुजश्यामलकोमलांग सीतासमारोपितवामभागम्‌।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्‌॥
भारत की आज़ादी में रामचरितमानस का बहुत बड़ा हाथ रहा है…क्योंकि महात्मा गांधी गीता एवं रामचरितमानस के भक्त थे….

आज भी तुलसीदास का रामचरितमानस उतना ही सामयिक सामाजिक सांस्कृतिक अध्यात्मिक है जितना अपने समय था….गीता और रामचरितमानस के जीवन दर्शन का अभाव समाज में एवं देश के लिये विपर्यय ला रहा है….
हम भूल जाते हैं तुलसीदास का महत्व जिनके बारे में दो विदेशी विद्वान— प्रसिद्ध इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने उन्हें अपने समय का सबसे बड़ा व्यक्ति कहा है, यहाँ तक की अकबर से भी बड़ा एवं भाषाविद् सर जार्ज ग्रिफ़िथ ने उन्हें बताया, ‘ the greatest leader of the people after the Buddha’. यह अभी हाल में प्रकाशित पवन कुमार वर्मा की किताब ‘The greatest ode to Lord Ram’ में निम्नलिखित रूप में है-
The historian Vincent Smith has called him the greatest man of his age in India, greater than even Akbar himself. The linguist Sir George Griffith has described him as ‘ the greatest leader of the people after the Buddha’.
Let the Hindi knowing people of India not shun Tulsidas…..and it is only Ramcharitamanas that can keep the society together particularly in rural North India.

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सामयिक अध्यात्म

भारत हर दिन 11.72 लाख COVID-19 टेस्ट कर रहा है…..यह अपने आप में एक मिसाल है कि चाह होने पर भारत के लिये सब संभव है….इस लिये देश के हर व्यक्ति को समस्याओं से लड़ने की इच्छाशक्ति होनी ज़रूरी है….इसे हर माँ बाप के अपने बच्चों संस्कार और आचरण सीखाने पर निर्भर करता है…..शिक्षक का अपने छात्र के प्रति, मालिक का अपने मज़दूर के प्रति यही भावना रखनी चाहिये….हमारे देश के ऋषियों ने हज़ारों साल पहले कहा था यही सब पूरी निष्ठा से ज्ञानी खोज के बाद ….. तैत्तिरीय उपनिषद् कहता है….
“युवा स्यात्साधुयुवाऽध्यायकः। आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्।
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yuvā syātsādhuyuvā’dhyāyakaḥ| āśiṣṭho dṛḍhiṣṭho baliṣṭhaḥ | tasyeyaṁ pṛthivī sarvā vittasya pūrṇā syāt|
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युवाओं को चाहिये कि वह साधुचरित, बहुत अभ्यासी, आशावान, दृढनिश्चयी, और बलसम्पन्न बने। ऐसे युवकों के लिये यह सारी पृथ्वी द्रव्यमय बन जाती है।
……
दुर्भाग्यवश ग़ुलामी के दिनों में विदेशियों ने उन ऋषियों के अनुमोदित जीवन आचरणों और जीवन ध्येय को भूला अपनी सभ्यता के रंग में रंगने की शुरूआत की जिसे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे राजनेताओं ने फलने फूलने दिया…..और यह रंग हर रोज़ गहराता जा रहा है….जो देश जंगली थे वे हमें क्या सीखा सकते हैं…..उन्हीं की देखा देखी हम उनके ग़लत तरीक़ों एवं आचरणों को अपनाते जा रहे हैं और अपने को दूसरों से आगे समझते हैं…..आम ज़िन्दगी कुत्सित होती जा रही है….धन की लालसा में दादा दादी, माँ बाप का भी ख़्याल न कर उन्हें मार डालने की कहानियाँ भी पढ़ने सुनने को मिलती है ……देश की युवा पीढ़ी से बहुत कुछ उम्मीद थी…पर निराशा गहराता जा रहा है….
हम इसको ख़्याल क्यों नहीं करते कि यह ज़िन्दगी केवल त्याग करते हुए चलने पर ही चल सकती है…फिर गांधी का भी सबसे प्रिय ईशोपनिषद् का श्लोक जो उनके नित्य पाठ में था यही कहता है…

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
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जगत के सब चल अचल जीवों में ईश्वर हैं और यह जगत उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
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The Lord is enshrined in the hearts of all.
The Lord is the supreme Reality.
Rejoice in him through renunciation.
Cover nothing. All belongs to the Lord.

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आज के दिन २९.८.२०२०, एक और जन्मदिन

आज के दिन मैं अपने जीवन के कुछ सत्य सभी को बताने की कोशिश करने की धृष्टता कर रहा हूँ…
पूरे जीवन की उपलब्धियों केवल दैव कृपा से मिली…और कठिन परिश्रम से …घर से न ख़ास धनी थे, न शरीर से बहुत मज़बूत और न कोई ख़ास मेधा…गाँव में मैंने अनुभव किया कि सब जो साथ थे वे मुझसे बहुत अच्छे थे अंकगणित में भी और भाषा में भी.स्कूल में बंगाली माध्यम में मैं केवल एक ही हिन्दी माध्यम का छात्र छात्र था तो शिक्षकों की बातें बहुत अच्छी तरह समझ भी नहीं आती थी….पर फिर भी प्रथम होता रहा…उसके बाद प्रेसीडेन्सी कालेज में दाख़िला मिल गया १९५५ में, जहां मेरे सभी दोस्त बहुत तेज थे मुझसे….वहीं से आई.आई.टी, खडगपुर के लिये कोशिश की तो १९५७ में दाख़िला भी मिल गया मेकेनिकल इंजीनियरिंग में….पर सच बताऊँ इन दोनों कालेजों में अंग्रेज़ी माध्यम होने के कारण पूरे चार सालों में पढ़ाये गये विषयों में कोई ख़ास पैठ नहीं हुई….हिन्दुस्तान मोटर्स, उन दिनों के सबसे बड़े कारख़ानों में एक में एक था, काम भी मिल गया १९६१ में ४०० रू. महीने पर…हिन्दुस्तान मोटर्स में तो मेरे नीचे ऊपर बहुत तेज लोग थे पर वहाँ से भी एक सम्माननीय पद से १९९७ में रिटायर हो गया, सभी सदा मेरे तकनीकी ज्ञान और अथक मिहनत का आदर किये…यहाँ मेरा मंत्र था शुरू से ही काम सीखना अपने हाथों काम कर, बड़ों से, एवं सभी तत्तसंबधी प्राप्त लिखित चीजों को हर जगहों से पढ़ कर…अब पिछले एक डेढ़ साल से अध्यात्म का भूत सवार हो गया है….और उसी में अधिकांश समय जाता है….पर एक कठिन प्रयास और उन शिक्षाओं को ज़िन्दगी का हिस्सा बनाने का चल रहा है , यहाँ भी ईश्वर का ही आशा है. विश्वास है यहाँ भी दैव कृपा मिलेगी ही, क्योंकि मैं तो एक नौसिखियां हूँ, अपनी गलती या उनकी इच्छा के कारण बहुत देर से इसमें आया हूँ, पर परिश्रम कर रहा हूँ सब मानवीय कमज़ोरियों के साथ.. सहारा उपनिषद् के इस श्लोक की दूसरी पंक्ति…
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’।।
-कठोपनिषद् १.२.२३
आत्मा जिसे चाहती है उसी को यह’ लभ्य है, अपना दर्शन देती है.

और फिर तुलसीबाबा जब अयोद्ध्या कांड में बाल्मिकी के मुख से राम को उनके मुख से राम को कहलाती है..
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
शायद मैं भी उनकी कृपा पा जाऊँ. और यह इस बाक़ी जीवन में नहीं दिये तो अगले किसी जन्म में देंगे….
मैं तो बस उपनिषदों के इन श्लोकों का जाप करता रहूँगा…क्योंकि जप भी एक मार्ग बताया गया है….
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
जगत का सब कुछ ईश्वर का है, उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् सतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥
उत्तम कर्मों को करते हुए इस जगत् में सौ वर्षों तक जीने की इच्छा रखो। ऐसे कर्म तुम वमें लिप्त न होंगे, उत्तम कर्म से अन्य कोई मार्ग नहीं है।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्, विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो, भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥१८॥
हे अग्नि देव! हमें परमेश्वर की सेवा में पहुँचाने के लिये शुभ मार्ग से ले चलिये; आप सम्पूर्ण कर्मों को जाननेवाले हैं, हमारे इस मार्ग से सभी पाप दूर कर दीजिये, आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।

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सत्यकाम की कहानी

छान्दोग्योपनिषद् सामवेद के छान्दोग्य ब्राह्मण में है अध्याय ४ के चौथे खंड से आरम्भ होती है सत्यकाम की कहानी और इसके रचना का समय आठवीं से छठवीं ई.पू.का माना जाता है। हम आज जब उस समय की एक कथा कहते हैं तो पश्चिम के विद्वान और उनकी विचार के क़ायल लोग उसे उस समय के असभ्य अशिक्षित समाज की बात मानेंगे. पर छान्दोग्य उपनिषद् की यह कथा उनका और उनके द्वारा फैलाए हर समझदार पाठकों को अपनी गलती का अहसास करायेगा.. अपने अज्ञान का भी ….अगर इसके पीछे का पात्रों के आत्मबल का विचार करें. सत्यकाम एक क़रीब बारह साल का बालक इसका नायक है, पर उसकी प्रेरणा उसकी सत्यनिष्ठ माँ हैं एवं उनकी साहसिकता को आदर करनेवाले सत्यकाम के ब्राह्मण गुरू हैं जो परशुराम या द्रोण के स्तर के ब्राह्मणों से बहुत ऊपर के हैं…. सत्यकाम का पालन पोषण करनेवाली गृहस्थी की एकमात्र मालकिन माँ जाबाला है. उन दिनों की उच्चतम परम्परा के अनुसार एक दिन बालक सत्यकाम माँ के पास आकर उनसे कहता है,”पूज्य माँ, मैं सोचता हूँ कि अब मेरी वह उम्र हो गई जब मुझे एक गुरू के घर जाकर उनके संरक्षण में ब्रह्मचर्य पालन करते हुए ज्ञानार्जन के लिये रहना चाहिये. प्रथानुसार वे मुझसे पूछेंगे कि मैं किस कुल का हूँ, गोत्र क्या है? कृपया इसे बताइए जिससे मैं उन्हें उनके जिज्ञासा का उत्तर दे सकूँ.” जाबाला ने गम्भीरता से बिना हिचकिचाहट के उत्तर दिया, “बेटा, मुझे नहीं मालूम कि तुम किस कुल के हो. जब तुम्हारा जन्म हुआ उस समय मैं जवान थी और अलग अलग घरों में उनके लोगों की सेवा में व्यस्त रहती हुई उनका काम करती थी अपने भरण पोषण के लिये. मैं तुम्हारे कुल के बारे में कुछ भी नहीं जानती.पर तुम्हारा नाम सत्यकाम है और मेरा जाबाला, जब तुमसे गुरू प्रश्न करें, क्यों नहीं तुम अपना परिचय सत्यकाम जाबाला के नाम से दो?” सत्यकाम हारिद्रुमत के पुत्र गौतम के पास जाकर आग्रह करते हुए कहा,”पूज्य गुरू श्रीमान,मैं यहाँ ब्रह्मचर्य पूर्वक आपके सान्निध्य में रहने आया हूँ.” गौतम ने पूछा, ‘ सौम्य! तू किस गोत्र का है?” सत्यकाम ने उत्तर दिया, “ भगवत्, मैं किस गोत्र का हूँ उसे नहीं जानता. मैंने माता से पूछा था. उनका उत्तर था, “युवावस्था में जब कि मैं बहुत काम-धंधा करनेवाली परिचारिका थी, और बहुत घरों में काम करती थी, मैंने तुम्हें जन्म दिया. मैं नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है? मैं जाबाला नामावली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है. अत: हे गुरों! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ.’गौतम ने प्रसन्नता से कहा-‘ ऐसा स्पष्ट भाषण ब्राह्मण छोड़ दूसरा नहीं कर सकता. प्रथा के अनुसार समिधा ले आ, मैं तुझे अपने संरक्षण मे रख लूँ…..” आज कितनी ऐसे महिलाएँ होंगी जो जाबाला की तरह इतनी इतनी स्पष्टता से अपने पुत्र से यह कह सके? …..हम में या शिक्षकों में कितने ऐसे जो ऐसे बालक के उतनी उदारता से पेश आयें जिस तरह आचार्य गौतम आयें…यह समाज का ज्ञान सीमा है कि दो तीन हज़ार सालों के बीत जाने पर भी हिन्दू समाज मानवीय उदारता में इतना पिछड़ा है…कहानी आगे जाती है, पर वह सत्यकाम की ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति की है प्रकृति, पशु, पक्षियों से….फिर कभी…..

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कठोपनिषद् की कहानी

कठोपनिषद् की कहानी: कठोपनिषद् उन दस प्रमुख उपनिषदों में से एक है, जिन पर शंकराचार्य ने अपना भाष्य लिखा था। यह मृत्यु के देवता यमराज के साथ एक पिता और उनके इकलौते पुत्र नचिकेता के संवाद की एक अनूठी कहानी है. यम ही नचिकेता के आध्यात्मिक गुरु भी हैं इस उपनिषद् में. नचिकेता के पिता वज्रसेवा हैं जो मोक्ष प्राप्त करने के लिए अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मणों को दान दे रहे थे। नचिकेता उनका इकलौता बेटा है, एक बहुत छोटा लड़का है, लेकिन जो कुछ भी उसने शास्त्रों से सीखा है, उसके लिए बहुत वफादार है।जब नचिकेता ने दान के बीच देखा कि उनमें वे गायें भी हैं जो बुढ्ढी हैं एवं दूध नहीं दे सकती, तो वह अपने पिता के गलत काम के बारे में हैरान और आश्चर्यचकित हो गये|धर्मग्रंथ ऐसी गायों को दान में देने पर रोक लगाते हैं। अपने पिता को यह समझने में मदद करने के लिए, उन्होंने तीन बार अपने पिता से पूछा, “आप मुझे किसे देंगे?” नचिकेता खुद पर अपने पिता का आधिपत्य मानता था। उनके पिता नाराज हो गए, अपना आपा खो दिए और ग़ुस्से में कहे, “मैं तुम्हें यम, मृत्यु के देवता को देता हूँ. नचिकेता इसे अपने दिल में ले यमालय को चल दिये। जब नचिकेता यम के निवास पर पहुंचे तो यम अपने महल से बाहर गये थे कुछ दिनों को लिए और किसी ने भी इस अद्वितीय अतिथि का स्वागत नहीं किया। अतिथि का पूर्ण सम्मान करने का नियम यम के निवास के लिए भी एक महत्वपूर्ण ज़रूरी तरीक़ा था। यम के वापस आने से पहले नचिकेता को तीन रातों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी सभी कष्टों के बावजूद. जब यम वापस लौटे एवं नचिकेता के आतिथ्यरहित इंतजार के बारे में जाने तो उन्होंने कहा, “हे आध्यात्मिक अतिथि, मैं आपको उन तीन रातों की तकलीफदायी प्रतीक्षा की क्षतिपूर्ति करने के लिए तीन वरदान देता हूं, आपके हर कष्टकारी रात के लिये एक । आइए हम सुनें कि नचिकेता ने पहले वरदान के रूप में क्या मांगा? “मेरे आपके पास से लौटने के बाद मेरे पिता मुझ पर क्रोध प्रकट न करें, वह मुझे पहचान लें और पहले की तरह मेरे वापस लौटने पर अपना हार्दिक प्यार जताए।” यम ने सकारात्मक रूप से कहा, “मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ। तुम्हारे पिता तुम्हें पहले की तरह प्यार से स्वागत करेंगे, जब तम यहां से वापस जा उनसे मिलोगे। आपको मुक्त हुए देख वे फिर से चैन की नींद सोयेंगे।”
क्या हम इस बात की सराहना कर सकते हैं कि पिता के सबसे भयानक शाप देने के बाद भी एक बेटा ने ऐसा प्रदान मांगा? हमारी अगली पीढ़ी को इस कहानी से कुछ सबक लेना चाहिए? हम सिर्फ अपनी ही पुरानी शिष्टाचार की परंपराओं से अलग क्यों होते जा रहे हैं और हम बने बच्चों को अपने अमूल्य धरोहर इन शास्त्रों की कथाओं से क्यों नहीं उनके बचपन में अवगत कराते? अपने हम उम्र के किसी मोड़ पर तो इन ग्रंथों के मूल या सरल उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन करने की कोशिश करें. और नहीं तो सरल अमर चित्रकथा सीरिज़ को ही पढ़ें..आज बहुत ही आकर्षक अंग्रेजी या आंचलिक भाषाओं में लिखी ये पुस्तकें उपलब्ध हैं.
नचिकेता के पहले वरदान ने न केवल उसकी जान बचाई, बल्कि वह अमर भी हो गया। उसके अन्य दो वरदानों ने साधकों के लिए स्वर्गीय जीवन पाने या अमरता प्राप्त करने का मार्ग खोल दिया.दूसरे वरदान में नचिकेता स्वर्गलोक, जहां सभी व्यक्ति ज़रा, मृत्यु आदि से मुक्त होते हैं, पाने के लिये जिस यज्ञ का आयोजन करना ज़रूरी है, यमराज से उसकी सम्पूर्ण जानकारी ली…यमराज के विस्तृत उपदेश को नचिकेता ने आत्मसात् कर बताकर उन्हें प्रसन्न किया…यमराज ने वरदान में कुछ और जोड़ दिया….’इस विशेष यज्ञ को आज के बाद नचिकेता यज्ञ के नाम से जाना जायेगा एवं ऊपर से एक दिव्य रत्नों की माला भी दी….और तीसरे इच्छित वर बताने का अनुरोध किया. नचिकेता का तीसरा वर एक प्रश्न के उत्तर के लिया था. प्रश्न था, ‘कोई कहता है कि मरने के बाद यह आत्मा रहती है, और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता’. आप मुझे इसका निर्णायक ज्ञान दें, मेरे तीसरे वर में…यमराज ने बहुत प्रलोभन दिये नचिकेता को इस बर को छोड़ और सब सुख माँगने की, पर नचिकेता टस से मस न हुआ…यमराज के मुख से कठोपनिषद् का मूल विषय ब्रह्मज्ञान से अमरत्व को इसी जन्म मे कैसे पाया जा सकता है…
इस हजारों साल पहले हमारे ऋषियों द्वारा लिखे गए उपनिषद् में मृत्यु के देवता यमराज ने खुद नचिकेता को सिखाया था जो कभी नहीं हुआ। क्या है मृत्यु एवं कैसे व्यक्ति अमरत्व प्राप्त कर सकता है.आज भी शायद मानवता के लिए भारतीय धर्मग्रंथों के योगदान के बारे में अधिकांश शोध, व्यापक रूप से ख्याति प्राप्त विदेशी विश्वविद्यालयों में हो रहे हैं।कभी कभी लगता है कि हमारी शिक्षा विभाग ने इस काम को धार्मिक, आध्यात्मिक संस्थानों के ज़िम्मे कर दिया है. एक विवेकानन्द द्वारा स्थापित ‘वेदान्त सोसाइटी’ अपनी बहुत शाखाओं के ज़रिये भारतीय के प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान को देश विदेश में बच्चों से ले सब उम्र के लोगों को समझा और फैला रहे हैं।आज यह सब इंटरनेट यू ट्यूब पर उपलब्ध है. हम इसका उपयोग क्यों नहीं करें…क्योंकि यही ज्ञान सर्वोपरि है। पढ़िये …समझिये, मनन करिये और जीवन में ही अमरत्व की कोशिश कीजिये…..

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अध्यात्म यात्रा की यादें

हिन्दुस्तान मोटर्स में काम करते समय मुझे एक दिन हावड़ा स्टेशन पर महात्मा गांधी साहित्य की किताबों की एक छोटी दुकान खुली दिखी नई नई….मैंने वहीं से एक छोटी पॉकेट में आनेवाली पुस्तक ख़रीदी थी ‘आश्रम भजनावलि’. पहली पुस्तक जब याद नहीं खो गई या पूरी तरह फट गई तो आज की मेरे पासवाली प्रति को जाकर ख़रीद लाया था और अभी तक बचा रखी है.इसने मुझे अध्यात्म की तरफ़ रुझान बढ़ाने में मदद की. यह नवजीवन प्रकाशन मन्दिर से १९२२ में पहले प्रकाशित हुई. मेरी पुस्तक में ८-२-‘४७ की मो.क. गांधी की प्रस्तावना है, जो प्रसादपुर में लिखी गई थी. मुझे मालूम नहीं प्रसादपुर कहाँ है, पर गांधी उन दिनों वहीं होंगे.इसके अनुसार संग्रह करनेवाले कै० खरे शास्त्री थे. संस्कृत श्लोकों के अर्थ भाई किशोरलाल मशरूवाला ने लिखा था.गांधी ने लिखा है, ‘इस संग्रह में किसी एक सम्प्रदाय का ख़्याल नहीं रखा गया है.सब जगह से जितने रत्न मिल गये, इकट्ठे कर लिये गये हैं. इसलिए इसे काफ़ी हिन्दू, मुसलमान, खि्रस्ती पारसी शौक़ से पढ़ते हैं.’ मैं बरसों से इसके ‘नित्यपाठ’ एवं ‘प्रांत:स्मरणम्’ का पाठ करता रहता हूँ.


आश्चर्य है कि नित्यपाठ का एकमात्र श्लोक ईशोपनिषद् का पहला श्लोक है, जिसके बारे में महात्मा गांधी कहे थे कि अगर किसी कारण हिन्दू शास्त्र के प्राचीन सभी ग्रंथ नष्ट हो गये रहते और किसी तरह केवल एक यह श्लोक बच गया रहता तो भी हिन्दू धर्म सनातन ही रहता.वह श्लोक है-
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
जगत के सब चल अचल जीवों में ईश्वर हैं और यह जगत उनका बनाया है. ‘तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।

और प्रांत:स्मरणम् का पहला श्लोक पूरे उपनिषद् का सबसे महत्वपूर्ण खोज लिये है, जो मांडूक्य उपनिषद्,जिसे शंकराचार्य ने सर्वश्रेष्ठ कहा था, से उसका पूरा सार लिए…हुए है:
प्रात: स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ॥ – श्रीमच्छंकरभगवत: कृत
मैं प्रात:काल, हृदय में स्फुरित होते हुए आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ, जो सत, चित और आनन्दरूप है, परमहंसों का प्राप्य स्थान है और जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं से विलक्षण है, जो स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत अवस्था को नित्य जानता है, वह स्फुरणा रहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पंचभूतों का संघात(शरीर) मैं नहीं हूँ। ‘तुरीयम्’ चौथी आत्मा की अवस्था है स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत अवस्था से भी परे….

उम्र के इस मोड़ पर इन्हीं सब के बारे में पढ़ने सोचने में दिन निकल जाता है और समय छोटा लगने लगता है….तुरीयम् के बारे में आधुनिक विज्ञानी भी आज चिन्तन कर रहे हैं और आश्चर्य करते हैं कि हज़ारों साल पहले कैसे भारतीय ऋषि यहाँ तक पहुँचे….हम अपनी धरोहर से कुछ सीखने की कोशिश क्यों नहीं करे…जो एक सुखी शान्तिमय जीवन जीने में मददगार हो.

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भारत की एक आध्यात्मिक यात्रा- एक सरल विवरण

उपनिषदों, यहां तक की भगवद्गीता में भी वैदिक काल के देवों के नाम ही है जैसे ईश्वर, रूद्र, अग्नि, वायु, सूर्य, फिर इन्द्र. उपनिषद् काल तक हिन्दू धर्म के त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव तथा उमा एवं काली का नाम मिलता है….पर वे सभी वेद् के सर्वश्रेष्ठ आदि देव- पुरूष या ब्राह्मण का ही अर्थ रखते हैं. शायद सबसे पुराना उपनिषद् ईशोपनिषद् है. इसके पहले ही श्लोक में ‘ईशा’ शब्द आया है ईश्वर के लिये…फिर पूषन्(श्लोक १५), एवं अग्नि (श्लोक १८)
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥
कठोपनिषद के दूसरे वरदान में अग्नि के यज्ञीय बात आई है, जो ब्राह्मण से उत्पन्न हैं….पर फिर यमराज ने उपनिषद् के नायक नचिकेता को उसके तीसरे वरदान के फलस्वरूप अमरत्व के रहस्य को समझाते हुए विष्णु के धाम की बात कही है-
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्‌ ॥१.३.९॥
मुण्डकोपनिषद् का प्रारम्भ ही ब्रह्मा से हुआ है-
ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥
शंकराचार्य के प्रिय उपनिषद् -श्वेताश्वतरोपनिषद् जिसे बाक़ी मुख्य उपनिषदों से बाद का माना जाता है.आदि शंकराचार्य ने जिन 10 उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा है.
इसके प्रणेता ऋषि ने महेश्वर, शिव को प्रधानता दी है…
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं च महेश्वरम्‌।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्‌॥४.१०॥
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्ठारमनेकरूपम्‌।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति॥४.१४॥
केनोपनिषद् में उमा, हेमवती के रूप में ब्राह्मण प्रकट हो इन्द्र को बताते हैं कि वह यक्ष ब्राह्मण ही थे जिन्होंने देवताओं को जीत दिलाई.उमा के रूप में ब्राह्मण ही थे जो पहले एक यक्षों रूप में अग्नि एवं वायु के शक्ति की परीक्षा लिये थे और फिर इन्द्र के नज़दीक आने पर अदृश्य हो उमा रूप में आये…
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्शमिति ॥३.१२॥
फिर मूंडकोपनिषद् में यज्ञाग्नि की ज्वालाओं निम्न रूप से वर्णन किया है
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा।
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥१.२.४॥
उपनिषद् केवल इन देवताओं का अलग अलग नाम एवं रूप में एक ब्राह्मण की ही बात करता है जो हर जीव में आत्मा की तरह उपस्थित रहता है..
उपनिषदों के ऋषियों के उसी पुरूष और ब्राह्मण को भगवद् गीता में पुरुषोत्तम (अध्याय १५) को के नाम से बताया…. अद्वैत यही है…
पर उपनिषदों के इन धर्म,दर्शन,ज्ञान सम्बन्धी विचारों की जानकारी संस्कृत के जानकारों की कमी और शायद बौद्ध एवं जैन धर्म के राजकीय संरक्षण के कारण बाद के वर्षों में क्षीण होती गई…एक बार फिर जागरण काल आया शंकराचार्य से जिन्होंने उपनिषदों को ढूँढ निकाला..और उनकी रहस्यात्मकता को अपने सरल भाष्यों के द्वारा ख़त्म किया…गीता की, दस उपनिषदों की अपेक्षाकृत सरल संस्कृत में भाष्य लिखा. अपनी स्वतंत्र रचना भी की..हिन्दू घर्म को पुनः देश में बौद्ध एवं जैन धर्मों से आगे ले जाने में सफल रहे, अपनी छोटी उम्र में भी पूरे भारत के हर कोनों में शास्त्रार्थ द्वारा एवं चारों धामों एवं मठों को स्थापित कर. पर बाद में फिर नेतृत्व एवं धर्म से जुड़े लोगों की अज्ञानता और लगन के कारण, त्री देवों एवं देवियों को भी लोग अलग अलग स्वतंत्र वरिष्ठता दे बाँट दिये धर्म को. समाज में वैष्णव, शैव, शाक्त आदि अनुयायी वर्ग बने….यहाँ तक कि वर्चस्व के लिये घोर हिंसा का मार्ग भी अपनाया गया….१०- ११ वीं सदी तक देश के पराधीन हो गया, संस्कृत जनता से कटती गई….आंचलिक भाषाएँ पनपी और तब धर्म के उद्धार की ज़िम्मेवारी का काम भक्त कवियों ने लिया…..हिन्दू धर्म को फिर एक करने का काम तुलसीदास कृत रामचरितमानस एवं अन्य भाषा के भक्त कवियों की पुस्तकों द्वारा हुआ….तुलसी के आराध्य तो विष्णु के अवतार राम हुए, पर मानस में बार बार उन्होंने जिस तरह राम से शिव की बंदना, एवं शिव से राम की बन्दना कराई वह बहुत महत्वपूर्ण बनी विभेद मिटाने में….यही नहीं उन्होंने जो शिव पत्नी उमा एवं सीता के बारे जो लिखा ….वह उन देवियों को फिर उपनिषद् के सर्वोच्च ब्राह्मण के स्तर पर ले गया…केवल दो दोहा/चौपाइयों द्वारा- पहले बालकांड से उमा वर्णन जनकपुर के राजा जनक की पुष्पवाटिका का एवं दूसरा सीता का बल्मिकी द्वारा अयोद्ध्याकांड में बनवास के प्रारम्भ में राम सीता लक्ष्मण से भेंट होने पर स्तुति से दिया जा रहा है….इस समय….
पहला
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
-आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥
दूसरा
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
-हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह।
-हे राम! आपका स्वरूप वाणी के अगोचर, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरंतर उसका ‘नेति-नेति’ कहकर वर्णन करते हैं॥
काश! भारत की नई पीढ़ी इनमें रूचि दिखातीं ….वेदान्त सोसाइटी, चिन्मयानन्द मिशन, आदि बहुत संस्थाएँ काफ़ी काम कर रही हैं….पर इन सबका आम जनता तक पहुँचाना नहीं हो पा रहा….देश में आर्थनीतिक बदलाव के साथ पुराने आध्यात्मिक ज्ञान एवं आचरण का समावेश भी ज़रूरी है….कुछ नक़ली गुरू देश में व्याप्त अशिक्षा के कारण लोगों को बरगला अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं…काश! शिक्षित एवं सम्पन्न वर्ग कुछ पहल करता….

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बृहदारण्यकोपनिषद् और तत्कालीन समाज में नारी

बृहदारण्यकोपनिषद् और तत्कालीन समाज में नारी: आजकल जब इस उपनिषद् को पढ़ने समझने की कोशिश कर रहा हूँ तो एक सांसारिक व्यक्ति होने के चलते उस समय के कुछ सामाजिक पक्षों की ओर सोचने के लिये बाध्य होना पड़ता है. उपनिषदों में वेद के सबसे उच्चतम ज्ञान का निचोड़ है- आत्मा- ब्राह्मण को इसी जन्म में मिल कैसे एक व्यक्ति खुद ब्राह्मण हो सकता है.

याज्ञवल्क्य उस समय के एक महान गुरू थे…जिनकी धाक पूरे सिद्ध ऋषियों में थी…जनक उस काल के एक अध्यात्म ज्ञान के ज्ञाता और प्रशंसक और बहुत ही समृद्ध राजा थे…उनके महल में सभी ज्ञानी ऋषियों की पहुँच थी और उनका आदर एवं सम्मान था..उनके जिज्ञाशाओं की तृप्ति होने पर ऋषि विशेष को बहुत धन राशि भी मिलती थी….एक प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य खुद को अपने समय का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी कह दस हज़ार स्वर्ण मुद्रा एवं एक हज़ार गाय प्राप्त करते हैं जनक से…यहाँ तक कि एक बार याज्ञवल्क्य के ब्रह्मज्ञान के उत्तर से संतुष्ट हो एक प्रकरण में वे यह भी कहते हैं याज्ञवल्क्य से, ‘मैं अपने एवं मेरे साम्राज्य को आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ.’

पर बृहदारण्यक उपनिषद् तत्कालीन तीन नारी का ज़िक्र कर उस समय के समाज में उनके महत्व को दर्शाता है…गार्गी सबसे श्रेष्ठ लगती हैं ज्ञान की दृष्टि से…वे एक कथा में याज्ञवल्क्य से उनकी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये प्रश्न करती हैं एवं अन्त में याज्ञवल्क्य के सावधान करने पर पीछे हट जाती है….( अध्याय ३,ब्राह्मण ६)..पर दूसरी बार गार्गी एकत्रित विद्वान ऋषियों से कहती हैं कि वे दो प्रश्न पूछेंगी याज्ञवल्क्य से और उसके उत्तर वे अगर ठीक देते हैं तो सभी को मान लेना चाहिये कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं. बहुत विद्वतापूर्ण वे प्रश्न हैं और याज्ञवल्क्य के उत्तर भी. गार्गी सबसे कहती हैं कि वाक़ई याज्ञवल्क्य सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी हैं….( अध्याय ३ का ब्राह्मण ८).

पर दोनों अन्य नारियाँ याज्ञवल्क्य की पत्नियाँ हैं- पहली कात्यायनी एवं छोटी मैत्रेयी. मैत्रेयी को ब्राह्मण का ज्ञान था. मैत्रेयी एवं याज्ञवल्क्य की वार्ता बृहदारण्यकोपनिषद् में दो बार आई है (अध्याय २ के चौथे ब्राह्मण, और फिर से अध्याय ४ के पाँचवें ब्राह्मण में) मुझे इसका कारण मालूम नहीं है…याज्ञवल्क्य संन्यास लेना चाहते हैं अपनी सम्पत्ति का दोनों पत्नियों में बँटवारा कर और यह बात जब वह अपनी प्रिय पत्नी मैत्रेयी से कहती हैं, तो मैत्रेयी पूछती है कि क्या संसार का सब धन मुझे अमरत्व दे सकता है. याज्ञवल्क्य का उत्तर ही इस ब्राह्मण की विषयवस्तु है..

विद्वानों के अनुसार इस उपनिषद् का समय काल ईसा के ९०० से ६०० पूर्व का माना जाता है.मुझे इनके अलावा किसी विशेष नारी नाम का अब तक ज्ञान नहीं, अगर पता चलेगा तो फिर लिखूँगा.

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उपनिषद – आज भी उपयोगी

उपनिषदों की सार्थकता: बृहदारण्यकोपनिषद् में अध्याय ५ के दूसरे ब्राह्मण में एक छोटी कहानी है. तीन शब्दों में हर प्रकृति के व्यक्तियों के लिये आदर्श आचरण का ज्ञान भरा, जो आज भी सार्थक लगता है. प्रजापति के तीन – देव, आदमी, एवं असुर- वर्गों के पुत्र उनके साथ रहते थे.उनके ब्रह्मचर्य संयम का निर्धारित काल ख़त्म हुआ और वे स्वतंत्र गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने को तैयार दिखे. उस समय देव ने पिता प्रजापति से अनुरोध किया, ‘हमें अब अपनी शिक्षा दीजिये.’ प्रजापति ने एक शब्दांश कहा,’दा’, और पूछा, ‘क्या समझ गये?’ उन्होंने कहा, ‘जी हाँ, आपने कहा, ‘अपने को आत्म नियंत्रित करो’. प्रजापति ने कहा, ‘हाँ, ठीक समझें’.फिर आदमी ने प्रजापति से वहीं देव वाला ही अनुरोध किया, ‘क्या होगा हमारे आचरण के लिये आपका सुझाव?’प्रजापति ने उत्तर में वही शब्दांश ’दा’दुहरा दिया और पूछा, ‘ क्या समझें?’ आदमी ने कहा, ‘दान करते रहो, आपका आदेश है.’ प्रजापति ने सहमति जताई. आख़िर में असुर का भी वही प्रश्न आया और प्रजापति ने उत्तर में वही शब्दांश कहा, ‘दा’. अब असुर को बताना था वह क्या समझा. उसने कहा, ‘आपने समझाया, दया करते रहो’. प्रजापति ने हामी भरी….बृहदारण्यकोपनिषद् में एक मोड़ देते हुए ऋषि लिखते है आज जब बादल गर्जन करता है तो प्रजापति के उन्हीं गुणों को पृथ्वी के लोगों के लिये दुहराते हैं…उसी ‘दा-दा-दा’से: “तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रय शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ।”
That very thing is repeated even today by the heavenly voice, in the form of thunder, as “Da,” “Da,” “Da,” which means: “Control yourselves,” “Give,” and “Have compassion.” Therefore one should learn these three: self-control, giving and mercy.
The verse 5.2.3 recommends three virtues: self-restraint (दमः, Damah), charity (दानं, Daanam), and compassion for all life (दया, Daya).
भगवद् गीता के १४वें अध्याय में कहा है….हर मनुष्य अपने में सत्त्व, रजस, तामस गुणों को समेटे है….किसी में कोई ज़्यादा, अन्यों में अन्य अन्य. पर अपने संयम, ज्ञान, यज्ञ, तप आदि कर्मों से अपने को देवताओं की श्रेणी में ले जा सकता है और इनके अभाव में आलस्य के चलते अवहेलना कर असुर, या राक्षसी प्रवृति का भी बन सकता है…. गीता के अध्याय १६ में दैवी एवं आसुरी गुणों की चर्चा जो आज के लिये बहुत सामयिक लगती है….हमारी शिक्षा और आज का परिवेश इन गुणों को मनुष्यों में कम करता जा रहा है. जीवन मूल्य एवं लक्ष्य दोनों में अपनी ज़िन्दगी में ही इतना बदलाव देख रहा हूँ….इतना कह सकता हूँ दावे के साथ कि ई.पू. १००० -८०० के ऋषियों के उपदेशों में उनके तप एवं योग के अनुभवों पर हमें एक बार सोचना ज़रूर चाहिये….अगर भारत अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ रखना चाहता है.

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हिन्दुओं में धर्म से बढ़ती दूरी

हिन्दुओं में धर्म से बढ़ती दूरी
पता नहीं क्यों लगता है कि अपने को शिक्षित माननेवाले लोगों में एक होड़ मची है अभिजात वर्ग का कहाने की, नास्तिक बनकर, पुरानी सब मान्यताओं को बिना कारण समझे,गंवारपन या पुरानपंथी होने की संज्ञा देने की;धार्मिक प्रार्थना को एक और अनावश्यक तकलीफ़ समझ उससे छुटकारा लेने की. कुछ लोग व्रत करते हैं, पर इससे धार्मिकता को नहीं जोड़ना चाहते…उसके साथ प्रार्थना शामिल नहीं करना चाहते…मेरे विचार से हर व्यक्ति को किसी न किसी तरह की प्रार्थना करनी चाहिये. ये प्रार्थनाऐं अगर आपकी सब कामनाओं में सफलता नहीं दिलाये, पर फिर भी एक दैविक शक्ति में विश्वास बहुत आत्म बल बढ़ाता है, संतोष भी मिलता है. उस दैवी शक्ति को हम किसी नाम से पुकारे, वह आपके सभी कामों में सफलता न भी दे, पर दैविक हस्तक्षेप का भी एक महत्वपूर्ण आख़िरी स्थान ज़रूर होता है आपके नियत कामों की सफलता में सब अन्य बातों के साथ.कभी कभी यही दैव रक्षा भी करता है किसी बड़ी विपदा से अगर हम सोच कर देखें तो.
भगवत् गीता के अध्याय १८ में एक श्लोक हैं जो इसका एक समुचित व्याख्या करता है-
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌ ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा ‘दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌’॥
समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए पाँच कारण हैं- अधिष्ठान, कर्ता, विविध करण, विविध एवं पृथक् पृथक् चेष्टाएँ एवं पाँचवा देव….जब अन्त में लगता है कि सब करके की भी एक कार्य पूरा नहीं हुआ तो पता चलता है उसी दैव योग के चलते हम एक भयंकर हादसे से बच गये… मुझे पूर्ण विश्वास है अच्छे आचरणों की जो शिक्षा हमें बचपन में समय समय पर गुरूजनों से मिली मेरी ज़िन्दगी को सफल सुखी बनाने में जाने अनजाने काम आई…
मुझे याद है कि मेरी तथाकथित अशिक्षित केवल भोजपुरी जानने वाली परदादी मुझे गोद में ले याद कराती थीं- ‘राम अ गति, देहु सुमति’…मुझे तो सुमति का मतलब भी नहीं मालूम था तब. पर लगता है अच्छे शब्दों का असर तो पड़ता है भावी जीवन पर अगर हमें विश्वास हो…बहुत पहले गाँव के स्कूल में दूसरी तीसरी कक्षा तक पढ़ते समय रामायण की पुरी कहानी मुझे एवं मेरे चाचाजी को सुनाते थे आदरणीय अध्यापक स्वर्गीय पांडे जी…जो सदा याद रही और वही बढ़ते उम्र के साथ साथ हमारे अध्यात्मिक रुझान का कारण भी बनी शायद अन्य कारणों के साथ…. अध्यापक गंगा दयाल पांडे जी सबेरे प्रार्थना कराते थे, ‘हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये,लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें…’हिन्दी के पाठों में भक्त कवियों के दोहे होते थे जो हमने रट रट कर याद किये जो अच्छे आचरण की सीख देते थे…और बुरे आचरणों से दूर रहने के लिये सावधान करते हुए..ज़रूर हमें एक इंसान बनने में मदद किये. आज पता नहीं वे सब पढ़ाए जाते हैं या नहीं….या आधुनिकतावाद के चलते राजनीति उन्हें स्कूल की किताबों से हटा दी या अंग्रेज़ी मीडियम की प्राथमिकता के कारण ख़त्म हो गया रटने का रिवाज….
पढ़े हुए लोगों की नई पीढ़ी के माता-पिता तुलसीदास के रामचरितमानस को पढ़ने की अगर सीख न दे या कठिन समझे और न बता पायें, अगर वे तुलसीदास की ही जन साधारण में बहुत प्रचलित ‘हनुमान चालीसा’ की प्रथम चार पंक्तियों को भी प्रतिदिन सबेरे बोलते हुए प्रार्थना करते, कराते तो अच्छा होता, और अगर उतना भी नहीं तो केवल दो से भी काम चल जायेगा..नीचे की दो पंक्तियों को स्मरण करने कराने की कोशिश करें, गुनगुना लें, सबेरे शाम, अच्छा लगेगा.
‘बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ।।’
अगर वह भी नहीं तो केवल यही सुमिरन कर लें, ‘सब कुछ मिले तुम्हारे सरना, तुम रक्षक काहू को डरना।’ यह बहुत सेक्यूलर(secular) भी है….
मैं अपनी कहानी कहना चाहता हूँ….जो अच्छी लगे तो पढ़ें, काफ़ी लोगों के साथ ऐसा ही कुछ हुआ होगा.
समय, दायित्व एवं उम्र के साथ मेरी अध्यात्म एवं धार्मिक ग्रंथों की ओर रुझान भी बढ़ता गया, समय पर मेरी पत्नी एवं तीनों बच्चों के कारण इसे और बल मिल पाया…पहले सुन्दर कांड का पाठ हर मंगलवार को चालू हुआ, फिर शनिवार भी जुड़ गया….फिर रामचरितमानस का मासापरायण आरम्भ हुआ, इसकी प्रेरणा दादाजी की परम्परा को चालू रखने की इच्छा से हुई…फिर उन्हीं की यादों का पालन करता हुआ साल के दोनों नवरात्रों में रामचरितमानस का नवान्हपरायण….जो बहुत बार बहुत कठिन कार्य भार एवं व्यस्तता के बाद में भी देश विदेश के होटलों में, बहुत सबेरे की फ़्लाइट होने पर भी चलता रहा बिना बन्द हुए…हाँ, २०९७ में नोएडा आने के बाद २००० के हार्टऑटेक एवं ऑपरेशन के बाद अचानक सब कुछ कुछ समय के लिये बन्द हो गया….बहुत ख़राब लगता था…पर दैव योग समझ संतोष कर लिया…कुछ समय बाद अपने ही सब सामान्य हो गया…और अब नौकरी के कार्यभार से मुक्त होने पर मन रामचरितमानस से भगवत् गीता…और तत्पश्चात् उपनिषदों में रम गया है..पाठ की तरह नहीं, समझने के लिये…..दैनिक पाठ केवल रामचरितमानस के सुन्दरकांड का करता हूँ…..उसी से प्रेरित हो कभी कभी लिख भी देता हूँ, पता नहीं अच्छा, सामान्य या घटिया…एक आजीवन इंजीनियर गृहस्थ से अपेक्षा भी ज़्यादा बड़ी नहीं होनी चाहिये.. कोविद-१९ में मेरी आध्यात्मिक कार्यवाही मेरी सबेरे नीचे दिये चार श्लोकों से प्रारंभ होती है….महात्मा गांधी के चुने हुए श्लोकों ये हैं…पहला ईशोपनिषद् से है….जिसे वे नित्य (हरदम)पाठ कहते थे…अन्य अलग अलग जगहों से…

हरि ओम्
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥
जगत के सब चर अचर में ईश्वर व्याप्त हैं। तुम त्याग पूर्वक जीवन का आनन्द लो, किसी अन्य के धन का लोभ कभी न करो।

प्रात: स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ:।।
मैं प्रात:काल, हृदय में स्फुरित होते हुए आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ, जो सत, चित और आनन्दरूप है, जो ‘तुरीयम्’परमहंसों की अवस्था है और जो स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत- तीनों अवस्थाओं में जाग्रत रहता है, वह स्फुरणा रहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पंचभूतों का शरीर मैं नहीं हूँ।

न त्वहम् कामये राज्यम् न स्वर्गम् न पुनर्भवम्।
कामये दु:खतप्तानम् प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
न तो मुझे राज्य की कामना है और न ही स्वर्ग चाहिए, न ही पुनर्जन्म चाहिए। मुझे दु:ख में जलते हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश चाहिए।

स्वस्ति: प्रजाभ्यः परिपालयंतां, न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः ।
गो ब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं, लोकाः समस्ताः सुखिनोभवंतु ॥
हे ईश्वर! शक्ति शाली और सत्तातंत्र द्वारा सभी लोगों की भलाई न्यायूपर्वक हो..ईश्वर सभी विद्वानों और भले लोगों का हर दिन शुभ करें…सारा लोक सुखी हो!

और सोने के जाने पहले हम दोनों एक नामकीर्तन एवं शान्तिपाठ करते है…‘श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव…’ यह कठिन समय भी कटता जा रहा है उस अदृश्य शक्ति के बल पर….कट ही जायेगा…बहुत कुछ सीखाते हुए….काश! हम सब समझ पाते…हम दूसरी संस्कृतियों, या देशों से ग़लत अनुकरण करना बन्द करें एवं अपने मिट्टी ऋषियों के बताए रास्ते चलें जो सार्वभौम है सनातन है….हम का मानने का तरीक़ा अलग हो सकता है, पर ध्येय एक होना चाहिये सुदृढ़ राष्ट्र, मनसा वाचा कर्मसा स्वस्थ समाज…हम मानें कि हम सभी में वहीं आत्मा व्याप्त है, एक ही के हम अलग अलग नाम रूप हैं….
अगर अच्छा लगे तो आप भी ऐसा सोचें, करें….अगर लाभ नहीं तो हानि नहीं होगी, इतना विश्वास है, सृष्टि के रचयिता, पालक के प्रति ….

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कोरोना अनुभव

कोविद-१९ की ज़रूरत-कुछ अनुभव, कुछ जरूरात
सोनिया गांधी, और अन्य सभी विरोधी राजनीतिक दल के लोगों और कार्यकर्ताओं, देश के सारे NGOs, समाजसेवी संस्थाओं, सभी व्यवसाय मालिकों से कुछ निवेदन हैं देशहित यह कदम उठाने का, कोविद-१९ के पहले के तरीक़ों को भूल कुछ ऐसे नये तरीक़े अपनाने का, नये कदम उठाने का जो फिर आज की भययुक्त जीवन से मुक्ति दिलाये एवं पिछले ६० दिनों की त्रासदीपूर्ण अवस्था फिर से न आये….विशेषकर प्रवासी ग़रीबों की यह अवस्था न हो. एक दूसरे से अपने को बेहतर एवं दूसरे को निकम्मा बताने में समय एवं शक्ति का अपव्यय न करें…देश एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा है….चीन उत्तरी सीमा पर आक्रामक रूख बढ़ा रहा है…भारत का सबसे नज़दीकी नेपाल हिन्दू राष्ट्र होते हुए भी चीन के बहकावे में या प्रश्रय से सीमा का कोई प्रश्न खड़ा कर माहौल भारत के ख़िलाफ़ बना रहा है…बंगाल का cyclone Amphan कई दशकों का सबसे ख़तरनाक रहा और बहुत जान माल का नुक़सान हुआ, और कलकत्ता में बहुत जगह बिजली बहाल नहीं हो पाई काफ़ी दिनों तक सेना की सहायता के बावजूद, गर्मी अपने चरम सीमा पर है….राजस्थान में लोकस्ट से फसल बड़ी मात्रा में नुक़सान हुआ….देश की आर्थिक अवस्था चरमरा रही है…प्रवासी समस्या लौटने के इंतज़ाम के बाद भी हल होती नहीं दिख रही है….उधर कल कारख़ानों एवं व्यवसायों के धीरे धीरे खुलने की छूट के बावजूद वहाँ लोगों की कमी के कारण से काम सामान्य स्थिति में नहीं हो पा रहा है….कोविद-१९ की लड़ाई सब प्रयास के बाद बढ़ती जा रही है…ऐसी अवस्था में सभी नागरिकों का दायित्व बढ़ जाता है विशेषकर कर विरोधी दलों का एवं मीडिया का….इनमें से कोई भी समस्या का हल आसान नहीं है….सभी का एक जुट सकारात्मक भावना रख, देश-हित का ख़्याल रख बोलना, करना ही सहायक हो सकता है और वापस ला सकता है सामान्य स्थिति और सभी के चेहरों के भय को हटा ख़ुशी की आशा.

Most of the 60+ journalists such Sekhar Gupta, T N Nina , Tavleen, and many have outlived their creative part of professional life and must retire or switch over to writing something more useful. One similar column writer Pawan Kumar Verma has already started about the Sanakaracharya and Ramcharitamanas of Tulsidas. I wish Sekhar and Ninan switches over to write down well researched autobiographies of great achievers of India from ancient days to the present period- scientists, technocrats, industrialists, literary luminaries, social reformers, educationists, and about the great institutions….. in English and may be other Indian languages for various level of the readers in India. Can they write something that can bring back the large population of India to reading, the only way a nation can produce better innovators such as Wright Brothers, Bill Gates, N R Narayan Murthy, Dhirubhai Ambani or even of Jagdish Chandra Bose, C S R Rao, Abdul Kalam, and hundreds of them to inspire the next generation…..They must write why Bihar and UP have failed in education and health sector or in getting industries. Or on topics of how India can become as clean and green as developed countries……How India can become a more accepted soft power….Will you agree with me? I find sometimes some glimpses of such writing and I include in my entries for others to appreciate it…

A really bold statement from UP Chief Minister Yogi Adityanath on migrant workers returned to UP, “These workers are our biggest resource and will give them employment in Uttar Pradesh as state government is going to set up a commission for their employment.” “They are our people… and if some states want them back, they have to seek permission from the state government,” Adityanath said. I wish he uses services of Experts to put resources in building mini-food processing plant in different areas. Land in UP is fertile. Water is not scarce. Potatoes, tomatoes, onions and many other vegetables and fruits such as mangoes, guava of best qualities can be grown and processed. Let CM use the services of his best in industry (from ITC for wheat based items to even Guru Ramdev ) to help in his drive. Leather industry and milk can be other areas where UP can huge success. Let Yogi set example. Let some apparel industry with design centres come around Varanasi, Lucknow and other cities to give jobs to women in large number. I am sure his commission will come with some innovative and exemplary ideas in this task for the people at the bottom of line. I wish Yogi gets the school curriculum to include practical training sewing etc as well as farm machineries and food processing. Some old traditional practice of food processing in rural UP can be commercially activated and commercialised. https://www.financialexpress.com/india-news/social-security-insurance-yogi-adityanath-migrant-commission-plan-details-for-workers-5-points/1969779/

Let the industry and the nation learn from our recent experiences. “Until three months ago, not a single N95 mask or personal protective equipment (PPE) was manufactured in India. Today, we have 104 domestic firms making PPEs and four manufacturing N95 masks. Over 2.6 lakh PPEs and two lakh N95 masks are being manufactured in India, daily. Domestic manufacturing of ventilators has strengthened manifold — orders for more than 59,000 units have been placed with nine manufacturers. While this shows the adaptiveness of Indian industry, the shift to domestic production must happen on a larger scale for a wider set of sectors in the long run.” Let it be repeated at least for non-fossil energy and its hardwares such as solar energy production and storage, battery production for EVs, the need of the days, electricity storage system, and hundreds and thousands of other items that the world and our country consumes. Why can’t our old and new industrial entrepreneurs give first priority to product developmental R&D, and manufacturing for one-off to very large scale production with technologies such as 3D printing to flexible agile, automated production facilities? Why should they compete only with Amazon and Walmart and focus on the business of the street corner shopkeepers making so many more unemployed and not start a Tesla like companies that has become global and respected manufacturing company so fast? Are Indians shorts of that type of talents that can create some Indian Microsoft, Amazon as data centres as main business, or Facebook? Why did the auto components companies allow the Chinese to enter its arena to meet all the requirements of globally well placed automobile sector because of capacity, cost or quality? Why should every sector from real estates to textile garments, keep on importing so many small little things from China or other SE countries? Why the farmers of different are not encouraged to produce more oil producing crops to stop import of all cooking oils? Unless every state government makes its itself independent in its food requirements such onion, tomatoes and potatoes, the traders will hoard and create scarcity. Every panchayat must educate and train its people to start the MSMEs that they can start competitively. The states must focus and find ways too its people, particularly to those who can do only manual work, the serious problem of migrant workers that we observed in last months can’t be solved. The citizens of the states must make its politicians, legislature responsible for it and not the centre or Railways or other agency. The present government even after loosing election in Bihar for the first time after many year in any state initiated setting of two very big industrial units of globally famous companies for Railway engines in Bihar with huge potentials for the state to become a manufacturing state. But the engineer Chief Minister hardly bothered to take the maximum advantages from these, leave any of his serious effort to bring industrialised and saved his skin with some excuse or the other. Bihar is either producing impotents or incapable sons and daughters who can not take it out from the miseries our of migrants by giving right leadership in every basic sectors- administration, education, healthcare, and job creation. Nitin Gadkari wishes to set up MSMEs at all panchayat levels. He all suggested how ethanols and other fuel oil can be produced from other plants, wastes and biomass. Will Bihar take a real go in these areas or come out with some excuses? Bihar can itself employ a large number of its people in training skills as mechanics, plumbers, masons, cooks, drivers, hairdressers, small merchants of local goods for e- marketing companies like Amazon, Flipkart, Jiomart or Patanjali ….If there is political will, there can be a million jobs created in a short time. However, it requires a political Will. All chief ministers of Bihar after the first two were created on basis of caste politics and not for capability, how can Bihar would have evolved differently than what it has? The state known for Mauryas and Guptas, Aryabhata and Chanakya are known and famous for remaining poorest and worst in all these 70+ years after independence and now known as supplier of only migrants to the whole country from Kashmir to Kerala, to Gujarat to May be Gauhati. Every family of Bihar has broken with its member out of its home to other states to work more as labourer, and only a small percentage in all fields of activities working as shop assistant, officers, managers, executives and even industrialists…None wishes to go back and he feels he would become and called useless….I am telling this with my personal experience. First time in 1961, when my grandfather returned from spending life in West Bengal and thereafter I have experienced myself many time …..

As reported in the Sunday column of Coomi Kapoor, a very senior journalist in Indian Express, Maharashtra Chief Secretary Ajoy Mehta is probably running the state. “Chief Minister Uddhav Thackeray assumes that the post of chief secretary is similar to that of a CEO of a company and his role is that of a hands-off chairperson. Thackeray rarely visits the Mantralaya, and shows up at the chief minister’s official residence, Varsha, only when he makes a video recording for television. “ It is also well-known that the wife of Uddhav Thackeray and his MLA son, Aditya Thackeray are the other two who are deciding all policies and Aditya talks more often with media. On migrant issues, Uddhava right from beginning wished them to be sent out. Over the period all governments including those of BJP running the states never bothered to take care of the living conditions of the migrants who man all small big companies, and work in unorganised sectors and constitutes a very good percentage of Mumbai’s teeming population. Mumbai requires decongesting and so also all the small and big cities that have overgrown. Everywhere, these migrant workers live in some sorts of slums or ghetto. The companies and other business houses or individuals using these migrant workers hardly bother to look at them as human being with compassion and look after their basic needs. It is out and out exploitation. Quite a lot of them are engaged through agents who take away a good commission from both sides. The employers never consider them the backbone of their operations. Even the state governments and the big employers never thought of creating special housing colonies of suitable design with facilities like hospital, school, markets, transport facilities etc. In recent announcement, an important plan was announced by the Finance Minister and fund allocated to create special housing facilities of different types for renting to migrants in PPP mode, even involving the employers’s associations.
Let us hope the state governments and city administrations with take some real positive time bound programme to get it implemented and constructed fast..With the misery seen on the streets and expressways, let us hope the issue will be considered and taken up sincerely.
Let the home states educate and skill the migrants before they go out.
Let the migrants not move to these cities with families to live in slums and ghettos.
Migrant workers must start thinking about their own role for today’s condition.
Let the opposition not deal it as political point for vote bank and the media must not create chaos in the society by putting all blame on the present governments only.
Will the former centre and state ministers and bureaucrats have a realisation of their failures? Will Chidambaram and Yashwant Sinha instead of pinpointing the mistakes of this government and its ministers start feeling sorry for today’s condition of all slum ful cities and towns grown in hundreds and their failure to take an effective plan to make the cities decongested and slum-less?
Will the administration have data at hand and be more prompt in response as pointed out by Anil Dhankar?

As per a report, nearly 22 million tenant farmers miss out on the benefits of government schemes like Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi Yojana (PM-Kisan), because of poor documentation and uncooperative landowners, as reported in a Business Standard. The State governments and the centre must remove these anomalies that the small farmers are facing. The real farmers must not face the problem faced by the farmer in the story in selling its products. It must be eased out by taking these buying facilities within kilometres of every farming village. The landowners must realise themselves that after taking full rental of the whole year in advance, the benefits given in the name of the farmers by the government must go to the tenant farmers who are taking all the risks. The land owners must realise this, and if not agreeable, must start farming scientifically with latest techniques. Done so, the farming has become both interesting and profitable. Unfortunately, as the tenant farmers hold the right of farming just for one year, how can they take care of saving the land from the damage it causes with excessive or wrong chemical based fertilisers, insecticides and pesticides?

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