वेदान्त, उपनिषद् एक परिचय

वेदान्त, उपनिषद् एक परिचय
हमारे चार वेद-ऋक्, साम, अथर्व, एवं यूज़र् आदि है। वेदान्त वेदों के ही भाग हैं। वेदान्त’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘वेदों का अंत’ (अथवा सार)। वेदान्त को तीन मुख्य ग्रंथों के द्वारा जाना जाता हैं: वे हैं उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता एवं ब्रह्मसूत्र। इन तीनों को प्रस्थानत्रयी कहा जाता है। इसमें उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्र को न्याय प्रस्थान कहते हैं। उपनिषद् चारों वेदों में किसी न किसी से हैं और उनके निचोड़ हैं। भारत की समग्र दार्शनिक चिन्तनधारा का स्रोत वेद से निकले उपनिषद पर ही आधारित रही है।
उपनिषद् शब्द का साधारण अर्थ है – ‘समीप उपवेशन’ या ‘समीप बैठना (विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना)। यह शब्द ‘उप’, ‘नि’ (उपसर्ग) तथा, ‘सद्’ (धातु) से मिलकर बनता है।’उप’ का का अर्थ है ‘समीप जाना’, शायद दार्शनिक अर्थ होगा ‘सत्य के समीप बढ़ना’,पर ‘गुरू के नज़दीक जाना’ ज़्यादा प्रासंगिक है,’सद्’ धातु के अर्थ है ‘बैठना’,’उप’ एवं ‘सद्’ को जोड़नेवाले ‘नि’ का अर्थ है ‘गुरू के आसन से शिष्य का आसन का ‘थोड़ा नीचे’, शिष्य को अपने को ज्ञान देनेवाले गुरू को सम्पूर्ण श्रेष्ठता देने के विश्वास एवं भावना से है। यह एक शान्ति मंत्र में भी कहा गया है-
श्लोक: ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।19।। (कठोपनिषद -कृष्ण यजुर्वेद),
अर्थ है- ॐ सह नाववतु – ईश्वर हमारी साथ-साथ रक्षा करें; सह नौ भुनक्तु – हमारा साथ-साथ पालन करें; सह वीर्यं करवावहै – हम दोनों को साथ-साथ पराक्रमी बनाएं; तेजस्विनावधीतमस्तु – हम दोनों तेजस्वी हो;मा विद्‌विषावहै – हम गुरु और शिष्य एक दूसरे से द्वेष न करें।
कुछ उपनिषदों में शिष्य नहीं दिखते, ऋषियों के असीम तपस्या, ध्यान आदि से अर्जित एवं प्रशिक्षित सत्य ज्ञान के निष्कर्ष दिये गये हैं एवं मार्ग भी बताया गया अध्यात्मिक चरम ज्ञान का जैसे ईसोपनिषद्, माडूक्योपनिषद्। पर अधिकांश उपनिषदों में शिष्यों के जिज्ञासाओं का एवं शिक्षा के दौर में उठे शंकाओं का गुरू द्वारा निराकरण किया गया है अपने सिद्ध प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर परस्पर शिष्य गुरू के प्रश्नोत्तर संवाद द्वारा। शिष्य बालक ऋृषिपुत्र नचिकेता है, समाज के प्रबुद्ध गृहस्थ शौनक हैं,राजा जनक भी हैं, राजपुत्र, असुर राजा विरोचन भी है एवं देवराज इन्द्र भी, एक विदुषी पत्नी मैत्रेयी भी
है, साधारण परिवार दासीपुत्र सत्यकाम बालक है- तत्कालीन समाज के सब तरह के लोग हैं विभिन्न उपनिषदों में।
उपनिषदों की संख्या कहीं १०८ मानी जाती हैं, कहीं २०० से भी ऊपर…। पर शंकराचार्य ने पहली बार जिन ११ उपनिषदों का भाष्य लिखा उन्हें की प्रमुख माना गया । वे हैं ईशोपनिषद्, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद्, माडुक्योपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, तैत्तरीयोपनिषद्, ऐतरेपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद्, बृहदारण्यकोपनिषद्। कुछ उपनिषद् केवल श्लोकों में हैं, कुछ गद्य में, कुछ मिले जुले हैं दोनों तरह की प्रस्तुति में। केवल एक ही उपनिषद् है जिसमें प्रणेता ऋषि ने अपना नाम भी दिया है,श्वेताश्वतरोपनिषद्- प्रणेता ऋषि श्वेताश्वतर हैं जो उपनिषद् में ही आता है। १०८ उपनिषदों में ऋग्वेदीय १० उपनिषद्, यजुर्वेदीय(शुक्ल-कृष्ण) ५१ उपनिषद्, सामवेदीय १६ उपनिषद्, तथा अथर्ववेदीय ३१ उपनिषद् हैं। इनमें प्राचीनतम हैं ईश, ऐतरेय, छान्दोग्य, प्रश्न,तैत्तिरीय,बृहदारण्यक, माण्डूक्य और मुण्डक। इनके बाद के प्राचीन हैं कठ,केन । श्वेताश्वतर सबसे बाद का माना जाता है।पर शंकराचार्य के भाष्य क्रम में इसे ले लेने से यह भी मुख्य उपनिषदों की श्रेणी में माना जाता है। उपनिषदों के चार महावाक्यों का बहुत महत्व है…सभी उपनिषदों में इन्हीं तथ्य को प्रधानता दी गई है।
उपनिषदों के ‘चार महा-वाक्य’ उन के विचारों के मुख्य निष्कर्ष हैं, अत: महत्वपूर्ण हैं। कृष्णयजुर्वेदीय उपनिषद्- शुक्रोरहस्यपनिषद् में उपनिषदों के इन चार महावाक्यों का उल्लेख है-
“ अथ महावाक्यानि चत्वारि। यथा।….
१. ‘ॐ प्रज्ञानम् ब्रह्म।’-‘ यह प्रज्ञान ब्रह्म है’ -ऐतेस्योपनिषद् १.३.३ ऋग्वेद से।
२. ‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि।’- ‘मैं ब्रह्म हूँ’ -बृहदारण्यको उपनिषद् १.४.१० यजुर्वेद से।
३. ‘ॐ तत्त्वमसि।’- ‘ वह ब्रह्म तू है’ – छान्दोग्योपनिषद् ६.८.७ सामवेद से।
४. ‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म।’- ‘यह आत्मा ब्रह्म है’- माण्डूक्योपनिषद् १-२ अथर्ववेद से।
*
पहला निष्कर्ष महावाक्यों पर आधारित है
वह ब्रह्म तू है…मैं ब्रह्म हूँ…यह प्रज्ञान ब्रह्म है…यह आत्मा ही ब्रह्म है… सरल अर्थ हर भूत- चर एवं चराचर, के अन्तर में एक ही आत्मा जो नित्य है, जिसकी का कभी नाश नहीं होता, विराजमान हैं और पूरी निस्पृहता से कार्य करती है…इसको हर व्यक्ति अनुभव कर सकता है, साक्षात्कार कर सकता है, अमरत्व पा सकता है। यही आत्मा अद्वैतवादी ब्राह्मण, पुरूष, परमात्मा भी है । सभी उपनिषद् इन निष्कर्ष तक पहुँचने के मार्ग का विवेचन करते हैं अपनी अपनी तरह से, शिष्य भी आत्म साक्षात्कार का अनुभव प्राप्त कर सकता है अगर निष्ठा आवश्यकता के अनुरूप हो। आत्मा ही को अद्वैतवादी वेदान्त ब्रह्म, ब्राह्मण, पुरूष ।भगवद्गीता में उन्हें प्रमात्मा, पुरूषोत्तम भी कहा गया है। मडुकोपनिषद् में शिष्य रूप में आये महाशालाधिपति शौनक को गुरू अंगिरस या अङ्गिरसं ने एक श्लोक में कहा है…उपाय की तरह बताया है नीचे का श्लोक:
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्‌ तन्मयो भवेत्‌ ॥२.२.४॥
-ॐ (प्रणव) है धनुष तथा आत्मा है बाण, और ‘वह’, अर्थात् ‘ब्रह्म’ को लक्ष्य के रूप में कहा गया है। ‘उसका’ प्रमाद रहित होकर वेधन करना चाहिये; जिस प्रकार बाण अपने लक्ष्य में विलुप्त हो जाता है उसी प्रकार मनुष्य को ‘उस’ में (ब्रह्म में) तन्मय हो जाना चाहिये।
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दूसरा औपनिषदिक निष्कर्ष है कि सभी जीवों में एक ही आत्मा है, सभी एक ही है अलग अलग रूप, नाम होने पर भी और इसी एकत्व के ज्ञान को आत्मसात् कर कोई अमरत्व पा सकता है….एक दूसरे के बीच के ईर्ष्या, द्वेष का कोई कारण ही नहीं है।उपनिषद् में वर्णित आत्मा को तत्वत्त: समझ पूरी दुनिया को सुखी एवं शान्तिमय बनाने का यही सरल रास्ता है। यही शिक्षा का मूल मंत्र होना चाहिये एक प्रदूषित रहित, आपसी विद्वेषरहित, सुखमय, शान्तिपूर्ण संसार बनाने का। देखिये उपनिषदों का इसके लिये क्या प्रयत्न है कुछ हज़ारों साल प्राचीन सच्चे ज्ञानी ऋषियों के श्लोकों में उनके अपने अनुभव के आधार पर।
ईशोपनिषद् कहता है पाँचवें एवं छठे श्लोक में:

एतत् अस्य सर्वस्य अन्तः। तत् उ सर्वस्य अस्य वाह्यतः ॥ वह इस सबके भीतर है और वह इस सबके बाहर भी है

यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति च सर्वभूतेषु आत्मानम्। ततः न विजुगुप्सते।।
जो सभी भूतों को परम आत्मा में ही देखता है और सभी भूतों में परम आत्मा को, वह फिर सर्वत्र एक ही आत्मा के प्रत्यक्ष दर्शन करता है एवं फिर किसी से कतराता नहीं, घृणा नहीं करता।

यस्मिन् विजानतः आत्मा एव सर्वाणि भूतानि अभूत्। तत्र एकत्वम् अनुपश्यतः कः मोहः कः शोकः ॥
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न मनुष्य यह जान जाता है कि परम आत्मा ही स्वयं सभी भूत में वर्तमान है ।उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र आत्मा की एकता ही देखता है।
कठोपनिषद् में भी यही कहा गया है-
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥२.२.९/१०॥
समस्त प्राणियों में विद्यमान ‘अन्तरात्मा’ एक ही है परन्तु रूपरूप के सम्पर्क से वैसा-वैसा प्रतिरूप धारण करता है; इसी प्रकार वह उनसे बाहर भी है।
*
तथा एकः सर्वभूतान्तरात्मा लोकदुःखेन न लिप्यते। २.२.११॥
समस्त प्राणियों में विद्यमान् ‘अन्तरात्मा’ एक ही है, परन्तु सांसारिक दुːख उसे लिप्त नहीं करते इस कारण, वह दुःख तथा उसके भय से परे है।
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एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। २.२.१२
-समस्त प्राणियों के अन्तर् में स्थित, शान्त एवं सबको वश में रखने वाला एकमेव ‘आत्मा’ एक ही रूप को बहुविध रचता है।
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नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्‌।२.२.१३
-अनेक अनित्यो में ‘एक नित्य’, अनेक चेतन सत्ताओं में ‘एक तत्त्व’ ‘एकमेव’ होते हुए भी जो बहुतों की कामनाओं का विधान करता है।
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यह ज़रूरी है कि व्यक्ति पूरी एकनिष्ठा एवं विश्वास के साथ अपनी आत्मा को जानने समझने के लिये पूरी कोशिश करें क्योंकि वह उसके इसी शरीर में रहती है एवं बिना लगाव के जीवन पर्यन्त उसे संचालित करती है । ज्ञानी अगर आत्मांन्वेषन करना चाहता है तो वह आत्मा के साक्षात्कार इसे जीवन में कर पाने में समक्ष है। और वही आत्मा सभी चराचर जगत् के हर भूत (जीव)को संचालित करती है। यही आत्मा ही परमात्मा भी है जो हम बताए ही हैं। यही सभी उपनिषदों की मुख्य सीख है: गुरू का काम है अपने शिष्यों को, दुनिया के सब लोगों को इस सत्य को सीखना, समझना, जीवन मूल्य बनाना,जीवन के हर क्षण को ब्रह्म का सानिध्य पा अमरता प्राप्त करने का सामर्थ्य पाने के लिये सामर्थ्य देना।
हम में अधिकांश अपने आत्मा की शक्ति को समझने की कोशिश न कर अपनी ही कमियों से अपने इच्छा द्वेष के कारण जीवन यापन करता रहता है, साधारण जीवन जीता रहता है। जो ऐसा न कर एक निष्ठा से अपने कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों को एकनिष्ठा से अपने जीवन लक्ष्य पर बढ़ते तो उन्हें इसी जीवन में हम सफल होते देखते हैं हर क्षेत्र में, हर विधा में, बहुत शारीरिक कमियों के बावजूद।
-पुनश्च अगली बार

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उपनिषद् , विद्या, आधुनिक धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का बहाना


भारत के क्रमबद्ध ज्ञान सृजन की कहानी वेदों से शुरू हुई….अर्जन में उसके पहले के लोगों से चली आती ज्ञान परम्परा का भी ख़्याल रखा ही होगा ऋषियों ने और शायद इसीलिये स्रजनकर्ताओं ने अपने नाम का कहीं ज़िक्र नहीं किया। आज के उपलब्ध चारों वेद को रूप देने के बाद भी नई पीढ़ी के ऋषियों ने उस ज्ञान को अपने अनुसंधानों से पोषित किया….उन ज्ञानी ऋषियों ने अपने बारे न कुछ लिखा, न अपने शिष्यों को बताया और यही क्रम शतियों तक चलता रहा….
कल राकेश से बातचीत के सिलसिले में जब विषय आया किस तरह की शिक्षा की बात हमारे ऋषियों ने की. हाँ, वेदों के समय से कुछ ऋषि जहां जीवन सत्य की खोज में लगे जो आज विश्व द्वारा प्रशंसित है, वहीं कुछ अन्य खगोल एवं गणित विज्ञानों भी हज़ारों साल पहले पहुँचे जैसे सुलभशास्त्र, शून्य एवं अनन्त आदि से पता चलता है।पर लगता है उन्हें पराविद्या होने के कारण इतनी प्रसिद्धि नहीं मिली।

मंडूकोपनिषद् में बहुत साफ़ साफ़ दो तरह की विद्या का ज़िक्र है- परा विद्या एवं अपरा विद्या, जो यह भी बताता है कि उस समय में विद्या का क्षेत्र कितना बड़ा होता जा रहा था.
मंडूकोपनिषद् का श्लोक है: तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्शा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥१.५॥ मंडूकोपनिषद्
उसमें अपरा है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष। और परा विद्या वह है जिससे ‘अक्षर तत्त्व’ का ज्ञान होता है। ‘अक्षर तत्त्व’ अध्यात्म ज्ञान है, महत् ज्ञान को वह कहा गया है जिससे अमृतत्व पाया जा सकता है और सब दुखों से मुक्ति…।
सोचने की बात है कि वेदों की विद्या को भी अपरा कहा गया जिसे आज सेक्यूलर शिक्षा या आधुनिक शिक्षा कहा जाता है।

पर सबसे पुराने उपनिषदों में एक ईशोपनिषद् में प्रणेता ऋषि ने इसका खुलासा किया है कि दोनों विद्या एक दूसरे की पूरक हैं। और दोनों एकसाथ ज़रूरी किसी व्यक्ति के लिये।यहाँ परा-विद्या ‘विद्या’ हैं एवं अपरा-विद्या ‘अविद्या’।
श्लोक है:
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्य सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वाऽमृतमश्नुते ॥११
जो तत् को इस रूप में जानता है कि वह एक साथ विद्या और अविद्या दोनों है, वह अविद्या से मृत्यु को पार कर विद्या से अमरता का आस्वादन करता है।


आज भी सफल सुखमय, शान्तिमय सांसारिक जीवन के लिये आध्यात्मिक विद्या की नींव पर आधुनिक विद्या पाना ज़रूरी है। इसीलिये ऐसी ही शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत है और होनी चाहिये। हमने आध्यात्मिक शिक्षा से जीवन में नैतिकता के मूल्यों को भूला दिया संविधान के ‘सेक्यूलर’ शब्द की परिभाषा ठीक से नहीं देने एवं समझने के कारण । ‘भारत माता’, या ‘वन्देमातरम्’ सेक्यूलर नहीं रहा, फिर रामायण रचयिता तुलसीदास, कबीर, रैदास,रसखान को कैसे रखा जाये हमारे स्कूल की शिक्षा में । उपनिषदों को कौन सेक्यूलर (धर्म-निरपेक्ष)कहने देगा आज के राजनीतिक माहौल में जहां सभी जीवन मूल्य वोट की तराज़ू पर तौला जाता हो…। जब ब्राह्मण असुरों के कार्यों को श्रेष्ठ मानने लगे हैं एवं उसके लिये वे शूद्र बनने पर तैयार हैं एवं शूद्र और अन्य पिछड़ी जातियाँ रैदास या अन्य संतों को नहीं, शवरी, निषाद्, या केवट को नहीं आज के स्वार्थी नेताओं को न समझ उन्हें ही भगवान माँगने लगी हैं। अल्प संख्यक न कबीर रसखान, रहीम या साँई बाबा को नहीं मानते अपने धर्म के ठेकेदारों की बात मानते हैं….पर जो इसके बारे में कोई राय जानना चाहते हैं वे श्री. M के नाम से प्रसिद्ध श्रध्येय मुमताज़ अली खान के उपनिषदों की किताबों एवं व्याख्यानों से क्यों नहीं कुछ सीखते…


विवेकानन्द ने बराबर यही प्रतिपादित किया। देश कब तक यह धर्म निरपेक्षता का पासा खेलते हुए देश के महाभारत युद्ध को ख़त्म ही नहीं होने देता…धर्म, जाति, रंग, प्रदेश, भाषा के नाम से जोड…..क्यों नहीं हम देशवासी भारतीय उपनिषद् के इन श्लोकों से सीख ले सकते….
यस्तु सर्वानि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
जो सभी जीवों में अवस्थित आत्मा को अपनी आत्मा से अलग नहीं मानता, जो अपनी आत्मा को सभी में देख सकता है वह कैसे एक दूसरे से घृणा या दुश्मनी कर सकता है…..
The Wise man, who realizes all beings as not distinct from his own Self, and his own Self as the Self of all beings, does not, by virtue of that perception, hate anyone.
यस्मिन्सर्वानि भूतानन्यात्मैवभुद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
जो सभी में स्थित आत्मा को अपनी ही आत्मा की तरह जानता समझता है, कैसे अंधकार या शोक में रह सकता है।
What delusion, what sorrow can there be for that wise man who realizes the unity of all existence by perceiving all beings as his own Self?’


सभी उपनिषदों ने इसे बार बार दुहराया और भगवद्गीता भी…अगर दुनिया के लोग समझ जाते यह उपनिषद्ज्ञान, यह पूरे विश्व का कल्याण कर देता केवल भारत ही क्यों?
कहीं कोई भूल दिखती है तो कृपया बताने की कृपा करें, पर पहले समझने की कोशिश करें….
….

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Totapuri and Sri Ramakrishna- Two Great Enlightened Sadhaks

By about the end of 1865, Sri Ramakrishna was twenty-nine years old. He had finished his ten years-long sādhanās based on the path of bhakti (devotion) in which the devotee looks upon God as a Person. He had been blessed with innumerable visions and other spiritual experiences. With the highest purity and renunciation, his mind had attained an extraordinary moral and spiritual sensitivity which made it plunge into a divine mood (समाधि) at the slightest spiritual suggestion. Absorbed in one of these moods, Sri Ramakrishna was one day sitting in a corner of the open portico at the bathing ghat of the Dakshineswar temple on the bank of Gangā. Just then a wandering monk, by name Totapuri, suddenly alighted from a boat at the steps of the ghat, and walked up to him. As soon as his eyes fell on Sri Ramakrishna, he felt an instant attraction for this young man and felt a conviction in his heart of hearts that he was not an ordinary. Let us first know about Totapari a little more.
Totapuri himself hailed from Punjab and entered the monastic life in his boyhood. He was endowed with a robust physique and an iron will.Because of his fascination for the impersonal God, the non-dual Brahman, he undertook forty years of unremitting spiritual practice, performed on the banks of sacred Narmada river in Central India, and obtained the fruit of this path of the Advaita, the experience of Nirvikalpa Samādhi.
Having achieved the blessed experience, Totapuri wandered from place to place without any aim or purpose of his own, but fulfilling inscrutable divine purposes. The incomparable strength and freedom behind that wandering gave a glimpse of that in Buddha’s inspiring charge to the enlightened soul.

Realising Brahman as the one Reality, Totapuri spent his life under the canopy of the heaven, alike in storm and sunshine, maintaining himself on alms. His wanderings took him to many a holy place in India, including Gangāsagar in Bengal, where holy Gangā meets the sea. It was on his return journey from there that he went to the Dakshineswar temple had been built because of the piety, generosity, and broad-mindedness of its founder, Rani Rasmani. It was then drawing holy men, ordinary and extraordinary, from all creeds and sects. Sri Ramakrishna was it’s priest then. Some of these enlightened ones, like Jatādhārī and Bhairavī Brāhmanī, had already met Sri Ramakrishna and guided him to realisation through their respective spiritual paths of the bhakti school. Totapuri represented an altogether different path of the impersonal God, the path blazoned by the sages of the Upanishads and the great Buddha.
As soon as Totapuri’s eyes fell on Sri Ramakrishna he recognised in him a fit aspirant for the path of the unconditioned and impersonal Brahman. He asked Sri Ramakrishna whether he would like to learn Vedānta. He told him ‘You seem to be an advanced seeker after truth. Would you like to be initiated in the path of Advaita realisation?’ Sri Ramakrishna felt a divine urge within to agree. Under Totapuri’s directions, Sri Ramakrishna performed the various ceremonies preliminary to the grand ceremony of sanyāsa — total renunciation of the world. One day, about two hours before dawn, both moved to a small hut in a sequestered spot, not far from Sri Ramakrishna’s room. Totapuri administered to Sri Ramakrishna the traditional monastic vows of complete renunciation of all the pleasures of life, both earthly and heavenly, and the holy vow to dedicate all one’s mind and heart to the highest truth of non-dual Brahman, and to be a source of fearlessness to all beings. And in the stillness of that early dawn, the teacher and the disciple re-enacted the momentous drama of tangible spiritual communication which has so often been enacted in India before. Prostrating himself before his teacher, Sri Ramakrishna then took his seat to receive instruction from Totapuri in the philosophy of Brahman.
In the words of Swami Saradananda one of the direct disciples of Sri Ramakrishna.
‘He (Totapuri) said to the Master: “The Brahman, the one substance which alone is eternally pure, eternally awakened, unlimited by time, space and causation, is absolutely real. Through Māyā, which makes the impossible possible, It causes, by virtue of its influence, to seem (sic) that It is divided into names and forms. Brahman is never really so. For at the time of samādhi, not even a drop, so to speak, of time and space, and name and form, produced by Māyā is perceived. Whatever, therefore, within the bounds of name and form can never be absolutely real. Shun it at a good distance. Break the firm cage of name and form with the overpowering strength of a lion and come out of it. Dive deep into the reality of the Self existing in yourself. Be one with It with the help of samādhi. You will then see universe, consisting of name and form, vanish as it were into the void; you will see the consciousness of the little “I” merge in that of the immense “I”, where it ceases to function; and you will have the immediate knowledge of the indivisible Existence-Knowledge-Bliss as yourself. The Brhadāranyaka Upanishad (II. iv. 14) says: ‘The consciousness, with the help of which a person sees another, knows another, or hears another, is little or limited; whatever is limited is worthless; for the supreme bliss is not there; but the knowledge established in which a person becomes devoid of the consciousness of seeing another, knowing another, and hearing another, is the immense or the unlimited one. With the help of that knowledge, one gets identified with the supreme bliss. What mind or intellect is able to know that which exists as Knower in the hearts of all?” ’
After instructing his disciple thus in the central ideas of the jnāna path of Vedānta, Totapuri exhorted Sri Ramakrishna to fix his mind on the unconditioned Brahman. This part of the momentous story is best told in the words of Sri Ramakrishna himself in his ‘Life of Sri Ramakrishna’:
‘After the initiation, Nangta, “the naked one” (this was the appellation which Sri Ramakrishna, out of respect, invariably used for his guru, who being a monk of the Nāgā Order, generally went about naked) began to teach me the various conclusions of the Advaita Vedānta and asked me to withdraw the mind completely from all objects and dive into the Ātman. But in spite of my all attempts I could not cross the realm of name and form and bring my mind to the unconditioned state. I had no difficulty in withdrawing the mind from all other objects except one, the all too familiar form of the blissful Mother—radiant and of the essence of pure Consciousness—which appeared before me as a living form. Again and again I tried to concentrate my mind on the Advaita teachings, but every time the Mother’s form stood in my way. In despair I said to the “the naked one”, “It is hopeless”. I cannot raise my mind to the unconditioned state and come face to face with the Ātman.” He grew exited and sharply said “What?” You can’t do it. But you have to.” He cast his eyes around and finding a piece of glass he took it up and pressing the point between my eyebrows said, “Concentrate the mind on this point.” Then with a stern determination I again sat to meditate, and as soon as the gracious form of the Divine Mother appeared before me. I used my discrimination as a sword and with it severed it in two. There remained no more obstruction to my mind, which at once soared beyond the relative plane, and I lost myself in samādhi.’
Sri Ramakrishna passed into the unconditioned state of the nirvikalpa samādhi; the body became motionless. He had realised Brahman, become one with Brahman, beyond all speech and thought.
Totapuri sat for a long time silently watching his disciple. Finding him still motionless, he left the hut, locking the door from outside lest anyone should intrude without his knowledge; he remained outside awaiting the disciple’s call from within to open the door. The day passed, night came, a second and a third day and a night also passed, and still there was no call. Totapuri was astonished. He opened the door and entered the room. He was speechless with wonder to see Sri Ramakrishna in the very same position in which he had left him. The face was calm, serene, and radiant. In breathless amazement he examined the disciples heart and respiration and touched again and again the disciples almost corpse like body. There was no sign of consciousness. He(Totapari) cried in bewilderment at the miracle of this young man achieving in a single day this highest realisation of nirvikalpa samādhi which had taken him forty years of hard practice to realise.
Totapuri immediately took steps to bring the mind of his disciple down to the world of phenomena. The little room rang with the holy mantra — Hari Om — uttered in a solemn tone by the teacher. Little by little Sri Ramakrishna’s mind came to an awareness of the outer world; and as he opened his eyes, he saw his teacher looking at him with tenderness and admiration. The disciple reverently prostrated himself before the teacher who in turn locked him in warm embrace.
I came across the story in a book of commentary on Kenopanishad by Nirvirakanand.
I read an extension of that today while reading the commentary of the famous Sadhak, famous as Shri. M:
“ Totapuri belonged to that order of sanyasins who do not stay for more than three days in one place because they do not want to get caught up with anything. But Totapuri lived for three months with Sri Ramakrishna because he found that Ramakrishna could achieve the state of nirvikalpa samadhi in three days, something which took Totapuri forty years to achieve! So he stayed, watching him in wonder.
At the end of his stay, he had such a severe stomach ache that he could not concentrate to get into his meditation or samadhi. Being a great Paramahansa who did not care for his body, he said to himself, “If I cannot fix my mind, this body is useless! Let me give it up!’ He walked into Ganga. It is said that however deep into water he went, he could not reach deep enough to drown himself. So he came back, and Ramakrishna said, ‘ If only you could accept the ‘Mother’ as an agent, you might get rid of your problem. You need not accept her as the Supreme Being, but as the link to the Supreme Being’. Finally, Totapuri is believed to have accepted Shakti, and left. Perhaps it was ordained that he should go to Dakshineswar to understand from Sri Ramakrishna that Shakti and Shivam, Prakriti and PURUSHA, are two sides of the same coin, like fire and its power to burn. They are not two things; one cannot separate them.. “

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आज के परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास और उनके राम

आज के परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास उनके राम
नानापुराणनिगमागम के ज्ञानी तुलसीदास(१४९७-१६२३) ने अपने इष्टदेव की तरह श्री राम को ही क्यों चुना? उनके समय में एवं पहले से ही भक्त कवियों में कृष्ण छा चुके थे जयदेव (१२०० ई.), सूरदास(१६४८-१५८४), मीरा(१४९८–१५४६) सभी कृष्ण में रमें….बाल्मिकी रचित संस्कृत के पहले महाकाव्य के व्यक्तित्व में तुलसीदास ज़रूर वह सब पाये जो एक देश निर्माता कवि को चाहिये था. पूर्ण रूप से राम में समर्पित एवं अपनी विभिन्न तीर्थ यात्राओं के अनुभवी भक्त तुलसीदास देश के लोगों में व्याप्त कुरितियों एवं आम लोगों के तकलीफ़ों से भी वाक़िफ़ थे, और उनके ऐतिहासिक कारणों से भी.साथ ही दूरदर्शी भी थे संस्कृत के ‘कवि’शब्द के अर्थानुकूल..ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन्हें देश के सैकड़ों सालों से विदेशियों द्वारा पहले किये विध्वंसक आक्रमण एवं लूट,मन्दिरों एवं उनकी मूर्तियों के विनाश, देश के लोगों को दास बना ले जाने एवं बाद में हिन्दू राजाओं में एकताहीनता के कारण देश पर विजय प्राप्त कर शासक बन जाने एवं फिर उनका हिन्दू धर्म एवं भावना के प्रतिकूल आचरण करने आदि का इतिहास उनको मालूम न हो और उनको दुख नहीं देता हो.उन्हें इतिहास की जानकारी थी…कैसे सिकन्दर के आक्रमण के समय अम्भीक ने सिकन्दर का साथ पोल्स को हरवाया…कैसे पृथ्वीराज को जयेन्द्र ने धोखा दिया…कैसे न पंजाब, न गुजरात के अपने को महायोद्धा कहने वाले राजा एक होकर विदेशी आक्रमणों का सामना नहीं किये अपने ऐयाशी जीवन के लिये स्वार्थी बने रहे, आपस में लड़ते रहे, और फिर कैसे न हेमू का हिन्दू राजाओं ने साथ नहीं दिया, न महाराणा प्रताप का…यहाँ तक कि अपना भाई शक्ति सिंह ही धोखा दे गया और अपने राजा, महाराजा कहने वाले राजपूताना के अन्य वीर पर स्वार्थी लोग मुग़ल दरबार की शरण में आ गये बेटी बहन की शादी कर…एक राणा प्रताप अन्त तक भीलों को अपने साथ जोड़ लड़ते रहे अपनी कमजोर सेना के बावजूद भी ….कैसे तुलसीदास की तरह का विद्वान देश के पतन के इन कारणों से अपरिचित हो सकते हैं और उन पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा होगा…उनका समय काल अकबर एवं महाराणा प्रताप का था. अकबर के नौ रत्नों में एक राजा टोडरमल भी थे, जिनसे से वे सम्पर्क में थे. तत्कालीन संस्कृत के पंडितों से अवधी में लिखे अपने रामचरितमानस के विरोध और उसे नष्ट करने की धमकी के कारण वे एक प्रति सुरक्षित रखने के लिये टोडरमल के पास भिजवाये थे। तुलसीदास ने भारत का राज्य करने के लिये राम के चरित्र द्वारा भारत के लिये एक आदर्श पुरूष एवं राजा की कल्पना की.समाज के आम गृहस्थ परिवार के लिये भी एक अनुकरणीय आचरण की मर्यादा बनाई.अपने अलग अलग माँ के चार भाई थे…चार भाइयों की पत्नियाँ भी दो भाइयों की बेटी थी….पर उनके आचरण को देखिये कैसे चित्रित किया तुलसीदास ने आदर्श रूप में, सौतेली माँ के अनुचित हठ के कारण पिता के आदेश को सहर्ष स्वीकार किया. वन गये चौदह साल के लिये वनवासी की तरह….रास्ते के ऋषियों से ज्ञान अर्जित किया, साधारण से साधारण लोगों से पूर्ण श्रद्धा मिली अपने स्वभाव के कारण, चाहे वे केवट हो या निषाद राज, बानर हनुमान हों या सुग्रीव, तत्तकालीन दुष्ट तपस्वियों को सतानेवाले राक्षसों को पराजित किये, शबरी के जूठे बेर भी खाये प्रेम से, सबकी सहायता ली सीता हरण के बाद पहले खोजने में, जटायु से विभीषण तक की, फिर समुद्र पर पुल बनाते हुए ज्ञान का रास्ता छोड़े अहंकारी ब्राह्मण राजा रावण को भी हराया, …एकपत्नी व्रत का पालन किया, और फिर ‘हम दो हमारे दो’ का भी आदर्श दिया…
रामचरितमानस के दो प्रकरण- अपने समय के कलियुग काल का वर्णन
“भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।..द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन..”
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
..
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥
……
एवं रामराज्य के रूप का चित्र
“सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥…
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥…
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥…..
उनकी तत्कालीन सामाजिक पतन एवं उद्धार दोनों के सम्बंध में उनके विचारों की गहरी पैठ की कहानी कहता है।
तीस चालिस साल पहले तक रामायण उत्तर भारत के हिन्दी प्रदेश गाँव गाँव तक गाया, जाना, समझा जाता था…नई शिक्षा पद्धति, नई विदेशी आचरणों का नक़ल पूरी तरह से हमारी संस्कृति को नष्ट कर दिया और यह प्रभाव फैलता ही जा रहा है और उसका निराकरण भी नहीं दिखता…होइहे वही जो राम रूचि राखा कह हम संतोष कर रहे हैं…
हाँ, एक और बात
इसी कारण से वे कृष्ण की मूर्ति को देख कह पाये:
“काह कहौं छबि आजुकि भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै धरो धनुष शर हाथ ॥
क्योंकि उनके आदर्श थे:
नीलाम्बुजश्यामलकोमलांग सीतासमारोपितवामभागम्‌।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्‌॥
भारत की आज़ादी में रामचरितमानस का बहुत बड़ा हाथ रहा है…क्योंकि महात्मा गांधी गीता एवं रामचरितमानस के भक्त थे….

आज भी तुलसीदास का रामचरितमानस उतना ही सामयिक सामाजिक सांस्कृतिक अध्यात्मिक है जितना अपने समय था….गीता और रामचरितमानस के जीवन दर्शन का अभाव समाज में एवं देश के लिये विपर्यय ला रहा है….
हम भूल जाते हैं तुलसीदास का महत्व जिनके बारे में दो विदेशी विद्वान— प्रसिद्ध इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने उन्हें अपने समय का सबसे बड़ा व्यक्ति कहा है, यहाँ तक की अकबर से भी बड़ा एवं भाषाविद् सर जार्ज ग्रिफ़िथ ने उन्हें बताया, ‘ the greatest leader of the people after the Buddha’. यह अभी हाल में प्रकाशित पवन कुमार वर्मा की किताब ‘The greatest ode to Lord Ram’ में निम्नलिखित रूप में है-
The historian Vincent Smith has called him the greatest man of his age in India, greater than even Akbar himself. The linguist Sir George Griffith has described him as ‘ the greatest leader of the people after the Buddha’.
Let the Hindi knowing people of India not shun Tulsidas…..and it is only Ramcharitamanas that can keep the society together particularly in rural North India.

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सामयिक अध्यात्म

भारत हर दिन 11.72 लाख COVID-19 टेस्ट कर रहा है…..यह अपने आप में एक मिसाल है कि चाह होने पर भारत के लिये सब संभव है….इस लिये देश के हर व्यक्ति को समस्याओं से लड़ने की इच्छाशक्ति होनी ज़रूरी है….इसे हर माँ बाप के अपने बच्चों संस्कार और आचरण सीखाने पर निर्भर करता है…..शिक्षक का अपने छात्र के प्रति, मालिक का अपने मज़दूर के प्रति यही भावना रखनी चाहिये….हमारे देश के ऋषियों ने हज़ारों साल पहले कहा था यही सब पूरी निष्ठा से ज्ञानी खोज के बाद ….. तैत्तिरीय उपनिषद् कहता है….
“युवा स्यात्साधुयुवाऽध्यायकः। आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्।
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yuvā syātsādhuyuvā’dhyāyakaḥ| āśiṣṭho dṛḍhiṣṭho baliṣṭhaḥ | tasyeyaṁ pṛthivī sarvā vittasya pūrṇā syāt|
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युवाओं को चाहिये कि वह साधुचरित, बहुत अभ्यासी, आशावान, दृढनिश्चयी, और बलसम्पन्न बने। ऐसे युवकों के लिये यह सारी पृथ्वी द्रव्यमय बन जाती है।
……
दुर्भाग्यवश ग़ुलामी के दिनों में विदेशियों ने उन ऋषियों के अनुमोदित जीवन आचरणों और जीवन ध्येय को भूला अपनी सभ्यता के रंग में रंगने की शुरूआत की जिसे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे राजनेताओं ने फलने फूलने दिया…..और यह रंग हर रोज़ गहराता जा रहा है….जो देश जंगली थे वे हमें क्या सीखा सकते हैं…..उन्हीं की देखा देखी हम उनके ग़लत तरीक़ों एवं आचरणों को अपनाते जा रहे हैं और अपने को दूसरों से आगे समझते हैं…..आम ज़िन्दगी कुत्सित होती जा रही है….धन की लालसा में दादा दादी, माँ बाप का भी ख़्याल न कर उन्हें मार डालने की कहानियाँ भी पढ़ने सुनने को मिलती है ……देश की युवा पीढ़ी से बहुत कुछ उम्मीद थी…पर निराशा गहराता जा रहा है….
हम इसको ख़्याल क्यों नहीं करते कि यह ज़िन्दगी केवल त्याग करते हुए चलने पर ही चल सकती है…फिर गांधी का भी सबसे प्रिय ईशोपनिषद् का श्लोक जो उनके नित्य पाठ में था यही कहता है…

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
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जगत के सब चल अचल जीवों में ईश्वर हैं और यह जगत उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
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The Lord is enshrined in the hearts of all.
The Lord is the supreme Reality.
Rejoice in him through renunciation.
Cover nothing. All belongs to the Lord.

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आज के दिन २९.८.२०२०, एक और जन्मदिन

आज के दिन मैं अपने जीवन के कुछ सत्य सभी को बताने की कोशिश करने की धृष्टता कर रहा हूँ…
पूरे जीवन की उपलब्धियों केवल दैव कृपा से मिली…और कठिन परिश्रम से …घर से न ख़ास धनी थे, न शरीर से बहुत मज़बूत और न कोई ख़ास मेधा…गाँव में मैंने अनुभव किया कि सब जो साथ थे वे मुझसे बहुत अच्छे थे अंकगणित में भी और भाषा में भी.स्कूल में बंगाली माध्यम में मैं केवल एक ही हिन्दी माध्यम का छात्र छात्र था तो शिक्षकों की बातें बहुत अच्छी तरह समझ भी नहीं आती थी….पर फिर भी प्रथम होता रहा…उसके बाद प्रेसीडेन्सी कालेज में दाख़िला मिल गया १९५५ में, जहां मेरे सभी दोस्त बहुत तेज थे मुझसे….वहीं से आई.आई.टी, खडगपुर के लिये कोशिश की तो १९५७ में दाख़िला भी मिल गया मेकेनिकल इंजीनियरिंग में….पर सच बताऊँ इन दोनों कालेजों में अंग्रेज़ी माध्यम होने के कारण पूरे चार सालों में पढ़ाये गये विषयों में कोई ख़ास पैठ नहीं हुई….हिन्दुस्तान मोटर्स, उन दिनों के सबसे बड़े कारख़ानों में एक में एक था, काम भी मिल गया १९६१ में ४०० रू. महीने पर…हिन्दुस्तान मोटर्स में तो मेरे नीचे ऊपर बहुत तेज लोग थे पर वहाँ से भी एक सम्माननीय पद से १९९७ में रिटायर हो गया, सभी सदा मेरे तकनीकी ज्ञान और अथक मिहनत का आदर किये…यहाँ मेरा मंत्र था शुरू से ही काम सीखना अपने हाथों काम कर, बड़ों से, एवं सभी तत्तसंबधी प्राप्त लिखित चीजों को हर जगहों से पढ़ कर…अब पिछले एक डेढ़ साल से अध्यात्म का भूत सवार हो गया है….और उसी में अधिकांश समय जाता है….पर एक कठिन प्रयास और उन शिक्षाओं को ज़िन्दगी का हिस्सा बनाने का चल रहा है , यहाँ भी ईश्वर का ही आशा है. विश्वास है यहाँ भी दैव कृपा मिलेगी ही, क्योंकि मैं तो एक नौसिखियां हूँ, अपनी गलती या उनकी इच्छा के कारण बहुत देर से इसमें आया हूँ, पर परिश्रम कर रहा हूँ सब मानवीय कमज़ोरियों के साथ.. सहारा उपनिषद् के इस श्लोक की दूसरी पंक्ति…
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’।।
-कठोपनिषद् १.२.२३
आत्मा जिसे चाहती है उसी को यह’ लभ्य है, अपना दर्शन देती है.

और फिर तुलसीबाबा जब अयोद्ध्या कांड में बाल्मिकी के मुख से राम को उनके मुख से राम को कहलाती है..
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
शायद मैं भी उनकी कृपा पा जाऊँ. और यह इस बाक़ी जीवन में नहीं दिये तो अगले किसी जन्म में देंगे….
मैं तो बस उपनिषदों के इन श्लोकों का जाप करता रहूँगा…क्योंकि जप भी एक मार्ग बताया गया है….
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
जगत का सब कुछ ईश्वर का है, उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् सतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥
उत्तम कर्मों को करते हुए इस जगत् में सौ वर्षों तक जीने की इच्छा रखो। ऐसे कर्म तुम वमें लिप्त न होंगे, उत्तम कर्म से अन्य कोई मार्ग नहीं है।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्, विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो, भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥१८॥
हे अग्नि देव! हमें परमेश्वर की सेवा में पहुँचाने के लिये शुभ मार्ग से ले चलिये; आप सम्पूर्ण कर्मों को जाननेवाले हैं, हमारे इस मार्ग से सभी पाप दूर कर दीजिये, आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।

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सत्यकाम की कहानी

छान्दोग्योपनिषद् सामवेद के छान्दोग्य ब्राह्मण में है अध्याय ४ के चौथे खंड से आरम्भ होती है सत्यकाम की कहानी और इसके रचना का समय आठवीं से छठवीं ई.पू.का माना जाता है। हम आज जब उस समय की एक कथा कहते हैं तो पश्चिम के विद्वान और उनकी विचार के क़ायल लोग उसे उस समय के असभ्य अशिक्षित समाज की बात मानेंगे. पर छान्दोग्य उपनिषद् की यह कथा उनका और उनके द्वारा फैलाए हर समझदार पाठकों को अपनी गलती का अहसास करायेगा.. अपने अज्ञान का भी ….अगर इसके पीछे का पात्रों के आत्मबल का विचार करें. सत्यकाम एक क़रीब बारह साल का बालक इसका नायक है, पर उसकी प्रेरणा उसकी सत्यनिष्ठ माँ हैं एवं उनकी साहसिकता को आदर करनेवाले सत्यकाम के ब्राह्मण गुरू हैं जो परशुराम या द्रोण के स्तर के ब्राह्मणों से बहुत ऊपर के हैं…. सत्यकाम का पालन पोषण करनेवाली गृहस्थी की एकमात्र मालकिन माँ जाबाला है. उन दिनों की उच्चतम परम्परा के अनुसार एक दिन बालक सत्यकाम माँ के पास आकर उनसे कहता है,”पूज्य माँ, मैं सोचता हूँ कि अब मेरी वह उम्र हो गई जब मुझे एक गुरू के घर जाकर उनके संरक्षण में ब्रह्मचर्य पालन करते हुए ज्ञानार्जन के लिये रहना चाहिये. प्रथानुसार वे मुझसे पूछेंगे कि मैं किस कुल का हूँ, गोत्र क्या है? कृपया इसे बताइए जिससे मैं उन्हें उनके जिज्ञासा का उत्तर दे सकूँ.” जाबाला ने गम्भीरता से बिना हिचकिचाहट के उत्तर दिया, “बेटा, मुझे नहीं मालूम कि तुम किस कुल के हो. जब तुम्हारा जन्म हुआ उस समय मैं जवान थी और अलग अलग घरों में उनके लोगों की सेवा में व्यस्त रहती हुई उनका काम करती थी अपने भरण पोषण के लिये. मैं तुम्हारे कुल के बारे में कुछ भी नहीं जानती.पर तुम्हारा नाम सत्यकाम है और मेरा जाबाला, जब तुमसे गुरू प्रश्न करें, क्यों नहीं तुम अपना परिचय सत्यकाम जाबाला के नाम से दो?” सत्यकाम हारिद्रुमत के पुत्र गौतम के पास जाकर आग्रह करते हुए कहा,”पूज्य गुरू श्रीमान,मैं यहाँ ब्रह्मचर्य पूर्वक आपके सान्निध्य में रहने आया हूँ.” गौतम ने पूछा, ‘ सौम्य! तू किस गोत्र का है?” सत्यकाम ने उत्तर दिया, “ भगवत्, मैं किस गोत्र का हूँ उसे नहीं जानता. मैंने माता से पूछा था. उनका उत्तर था, “युवावस्था में जब कि मैं बहुत काम-धंधा करनेवाली परिचारिका थी, और बहुत घरों में काम करती थी, मैंने तुम्हें जन्म दिया. मैं नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है? मैं जाबाला नामावली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है. अत: हे गुरों! मैं सत्यकाम जाबाल हूँ.’गौतम ने प्रसन्नता से कहा-‘ ऐसा स्पष्ट भाषण ब्राह्मण छोड़ दूसरा नहीं कर सकता. प्रथा के अनुसार समिधा ले आ, मैं तुझे अपने संरक्षण मे रख लूँ…..” आज कितनी ऐसे महिलाएँ होंगी जो जाबाला की तरह इतनी इतनी स्पष्टता से अपने पुत्र से यह कह सके? …..हम में या शिक्षकों में कितने ऐसे जो ऐसे बालक के उतनी उदारता से पेश आयें जिस तरह आचार्य गौतम आयें…यह समाज का ज्ञान सीमा है कि दो तीन हज़ार सालों के बीत जाने पर भी हिन्दू समाज मानवीय उदारता में इतना पिछड़ा है…कहानी आगे जाती है, पर वह सत्यकाम की ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति की है प्रकृति, पशु, पक्षियों से….फिर कभी…..

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कठोपनिषद् की कहानी

कठोपनिषद् की कहानी: कठोपनिषद् उन दस प्रमुख उपनिषदों में से एक है, जिन पर शंकराचार्य ने अपना भाष्य लिखा था। यह मृत्यु के देवता यमराज के साथ एक पिता और उनके इकलौते पुत्र नचिकेता के संवाद की एक अनूठी कहानी है. यम ही नचिकेता के आध्यात्मिक गुरु भी हैं इस उपनिषद् में. नचिकेता के पिता वज्रसेवा हैं जो मोक्ष प्राप्त करने के लिए अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मणों को दान दे रहे थे। नचिकेता उनका इकलौता बेटा है, एक बहुत छोटा लड़का है, लेकिन जो कुछ भी उसने शास्त्रों से सीखा है, उसके लिए बहुत वफादार है।जब नचिकेता ने दान के बीच देखा कि उनमें वे गायें भी हैं जो बुढ्ढी हैं एवं दूध नहीं दे सकती, तो वह अपने पिता के गलत काम के बारे में हैरान और आश्चर्यचकित हो गये|धर्मग्रंथ ऐसी गायों को दान में देने पर रोक लगाते हैं। अपने पिता को यह समझने में मदद करने के लिए, उन्होंने तीन बार अपने पिता से पूछा, “आप मुझे किसे देंगे?” नचिकेता खुद पर अपने पिता का आधिपत्य मानता था। उनके पिता नाराज हो गए, अपना आपा खो दिए और ग़ुस्से में कहे, “मैं तुम्हें यम, मृत्यु के देवता को देता हूँ. नचिकेता इसे अपने दिल में ले यमालय को चल दिये। जब नचिकेता यम के निवास पर पहुंचे तो यम अपने महल से बाहर गये थे कुछ दिनों को लिए और किसी ने भी इस अद्वितीय अतिथि का स्वागत नहीं किया। अतिथि का पूर्ण सम्मान करने का नियम यम के निवास के लिए भी एक महत्वपूर्ण ज़रूरी तरीक़ा था। यम के वापस आने से पहले नचिकेता को तीन रातों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी सभी कष्टों के बावजूद. जब यम वापस लौटे एवं नचिकेता के आतिथ्यरहित इंतजार के बारे में जाने तो उन्होंने कहा, “हे आध्यात्मिक अतिथि, मैं आपको उन तीन रातों की तकलीफदायी प्रतीक्षा की क्षतिपूर्ति करने के लिए तीन वरदान देता हूं, आपके हर कष्टकारी रात के लिये एक । आइए हम सुनें कि नचिकेता ने पहले वरदान के रूप में क्या मांगा? “मेरे आपके पास से लौटने के बाद मेरे पिता मुझ पर क्रोध प्रकट न करें, वह मुझे पहचान लें और पहले की तरह मेरे वापस लौटने पर अपना हार्दिक प्यार जताए।” यम ने सकारात्मक रूप से कहा, “मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ। तुम्हारे पिता तुम्हें पहले की तरह प्यार से स्वागत करेंगे, जब तम यहां से वापस जा उनसे मिलोगे। आपको मुक्त हुए देख वे फिर से चैन की नींद सोयेंगे।”
क्या हम इस बात की सराहना कर सकते हैं कि पिता के सबसे भयानक शाप देने के बाद भी एक बेटा ने ऐसा प्रदान मांगा? हमारी अगली पीढ़ी को इस कहानी से कुछ सबक लेना चाहिए? हम सिर्फ अपनी ही पुरानी शिष्टाचार की परंपराओं से अलग क्यों होते जा रहे हैं और हम बने बच्चों को अपने अमूल्य धरोहर इन शास्त्रों की कथाओं से क्यों नहीं उनके बचपन में अवगत कराते? अपने हम उम्र के किसी मोड़ पर तो इन ग्रंथों के मूल या सरल उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन करने की कोशिश करें. और नहीं तो सरल अमर चित्रकथा सीरिज़ को ही पढ़ें..आज बहुत ही आकर्षक अंग्रेजी या आंचलिक भाषाओं में लिखी ये पुस्तकें उपलब्ध हैं.
नचिकेता के पहले वरदान ने न केवल उसकी जान बचाई, बल्कि वह अमर भी हो गया। उसके अन्य दो वरदानों ने साधकों के लिए स्वर्गीय जीवन पाने या अमरता प्राप्त करने का मार्ग खोल दिया.दूसरे वरदान में नचिकेता स्वर्गलोक, जहां सभी व्यक्ति ज़रा, मृत्यु आदि से मुक्त होते हैं, पाने के लिये जिस यज्ञ का आयोजन करना ज़रूरी है, यमराज से उसकी सम्पूर्ण जानकारी ली…यमराज के विस्तृत उपदेश को नचिकेता ने आत्मसात् कर बताकर उन्हें प्रसन्न किया…यमराज ने वरदान में कुछ और जोड़ दिया….’इस विशेष यज्ञ को आज के बाद नचिकेता यज्ञ के नाम से जाना जायेगा एवं ऊपर से एक दिव्य रत्नों की माला भी दी….और तीसरे इच्छित वर बताने का अनुरोध किया. नचिकेता का तीसरा वर एक प्रश्न के उत्तर के लिया था. प्रश्न था, ‘कोई कहता है कि मरने के बाद यह आत्मा रहती है, और कोई ऐसा कहते हैं कि नहीं रहता’. आप मुझे इसका निर्णायक ज्ञान दें, मेरे तीसरे वर में…यमराज ने बहुत प्रलोभन दिये नचिकेता को इस बर को छोड़ और सब सुख माँगने की, पर नचिकेता टस से मस न हुआ…यमराज के मुख से कठोपनिषद् का मूल विषय ब्रह्मज्ञान से अमरत्व को इसी जन्म मे कैसे पाया जा सकता है…
इस हजारों साल पहले हमारे ऋषियों द्वारा लिखे गए उपनिषद् में मृत्यु के देवता यमराज ने खुद नचिकेता को सिखाया था जो कभी नहीं हुआ। क्या है मृत्यु एवं कैसे व्यक्ति अमरत्व प्राप्त कर सकता है.आज भी शायद मानवता के लिए भारतीय धर्मग्रंथों के योगदान के बारे में अधिकांश शोध, व्यापक रूप से ख्याति प्राप्त विदेशी विश्वविद्यालयों में हो रहे हैं।कभी कभी लगता है कि हमारी शिक्षा विभाग ने इस काम को धार्मिक, आध्यात्मिक संस्थानों के ज़िम्मे कर दिया है. एक विवेकानन्द द्वारा स्थापित ‘वेदान्त सोसाइटी’ अपनी बहुत शाखाओं के ज़रिये भारतीय के प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान को देश विदेश में बच्चों से ले सब उम्र के लोगों को समझा और फैला रहे हैं।आज यह सब इंटरनेट यू ट्यूब पर उपलब्ध है. हम इसका उपयोग क्यों नहीं करें…क्योंकि यही ज्ञान सर्वोपरि है। पढ़िये …समझिये, मनन करिये और जीवन में ही अमरत्व की कोशिश कीजिये…..

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अध्यात्म यात्रा की यादें

हिन्दुस्तान मोटर्स में काम करते समय मुझे एक दिन हावड़ा स्टेशन पर महात्मा गांधी साहित्य की किताबों की एक छोटी दुकान खुली दिखी नई नई….मैंने वहीं से एक छोटी पॉकेट में आनेवाली पुस्तक ख़रीदी थी ‘आश्रम भजनावलि’. पहली पुस्तक जब याद नहीं खो गई या पूरी तरह फट गई तो आज की मेरे पासवाली प्रति को जाकर ख़रीद लाया था और अभी तक बचा रखी है.इसने मुझे अध्यात्म की तरफ़ रुझान बढ़ाने में मदद की. यह नवजीवन प्रकाशन मन्दिर से १९२२ में पहले प्रकाशित हुई. मेरी पुस्तक में ८-२-‘४७ की मो.क. गांधी की प्रस्तावना है, जो प्रसादपुर में लिखी गई थी. मुझे मालूम नहीं प्रसादपुर कहाँ है, पर गांधी उन दिनों वहीं होंगे.इसके अनुसार संग्रह करनेवाले कै० खरे शास्त्री थे. संस्कृत श्लोकों के अर्थ भाई किशोरलाल मशरूवाला ने लिखा था.गांधी ने लिखा है, ‘इस संग्रह में किसी एक सम्प्रदाय का ख़्याल नहीं रखा गया है.सब जगह से जितने रत्न मिल गये, इकट्ठे कर लिये गये हैं. इसलिए इसे काफ़ी हिन्दू, मुसलमान, खि्रस्ती पारसी शौक़ से पढ़ते हैं.’ मैं बरसों से इसके ‘नित्यपाठ’ एवं ‘प्रांत:स्मरणम्’ का पाठ करता रहता हूँ.


आश्चर्य है कि नित्यपाठ का एकमात्र श्लोक ईशोपनिषद् का पहला श्लोक है, जिसके बारे में महात्मा गांधी कहे थे कि अगर किसी कारण हिन्दू शास्त्र के प्राचीन सभी ग्रंथ नष्ट हो गये रहते और किसी तरह केवल एक यह श्लोक बच गया रहता तो भी हिन्दू धर्म सनातन ही रहता.वह श्लोक है-
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
जगत के सब चल अचल जीवों में ईश्वर हैं और यह जगत उनका बनाया है. ‘तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।

और प्रांत:स्मरणम् का पहला श्लोक पूरे उपनिषद् का सबसे महत्वपूर्ण खोज लिये है, जो मांडूक्य उपनिषद्,जिसे शंकराचार्य ने सर्वश्रेष्ठ कहा था, से उसका पूरा सार लिए…हुए है:
प्रात: स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ॥ – श्रीमच्छंकरभगवत: कृत
मैं प्रात:काल, हृदय में स्फुरित होते हुए आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ, जो सत, चित और आनन्दरूप है, परमहंसों का प्राप्य स्थान है और जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं से विलक्षण है, जो स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत अवस्था को नित्य जानता है, वह स्फुरणा रहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पंचभूतों का संघात(शरीर) मैं नहीं हूँ। ‘तुरीयम्’ चौथी आत्मा की अवस्था है स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत अवस्था से भी परे….

उम्र के इस मोड़ पर इन्हीं सब के बारे में पढ़ने सोचने में दिन निकल जाता है और समय छोटा लगने लगता है….तुरीयम् के बारे में आधुनिक विज्ञानी भी आज चिन्तन कर रहे हैं और आश्चर्य करते हैं कि हज़ारों साल पहले कैसे भारतीय ऋषि यहाँ तक पहुँचे….हम अपनी धरोहर से कुछ सीखने की कोशिश क्यों नहीं करे…जो एक सुखी शान्तिमय जीवन जीने में मददगार हो.

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भारत की एक आध्यात्मिक यात्रा- एक सरल विवरण

उपनिषदों, यहां तक की भगवद्गीता में भी वैदिक काल के देवों के नाम ही है जैसे ईश्वर, रूद्र, अग्नि, वायु, सूर्य, फिर इन्द्र. उपनिषद् काल तक हिन्दू धर्म के त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव तथा उमा एवं काली का नाम मिलता है….पर वे सभी वेद् के सर्वश्रेष्ठ आदि देव- पुरूष या ब्राह्मण का ही अर्थ रखते हैं. शायद सबसे पुराना उपनिषद् ईशोपनिषद् है. इसके पहले ही श्लोक में ‘ईशा’ शब्द आया है ईश्वर के लिये…फिर पूषन्(श्लोक १५), एवं अग्नि (श्लोक १८)
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥
कठोपनिषद के दूसरे वरदान में अग्नि के यज्ञीय बात आई है, जो ब्राह्मण से उत्पन्न हैं….पर फिर यमराज ने उपनिषद् के नायक नचिकेता को उसके तीसरे वरदान के फलस्वरूप अमरत्व के रहस्य को समझाते हुए विष्णु के धाम की बात कही है-
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्‌ ॥१.३.९॥
मुण्डकोपनिषद् का प्रारम्भ ही ब्रह्मा से हुआ है-
ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥
शंकराचार्य के प्रिय उपनिषद् -श्वेताश्वतरोपनिषद् जिसे बाक़ी मुख्य उपनिषदों से बाद का माना जाता है.आदि शंकराचार्य ने जिन 10 उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा है.
इसके प्रणेता ऋषि ने महेश्वर, शिव को प्रधानता दी है…
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं च महेश्वरम्‌।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्‌॥४.१०॥
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्ठारमनेकरूपम्‌।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति॥४.१४॥
केनोपनिषद् में उमा, हेमवती के रूप में ब्राह्मण प्रकट हो इन्द्र को बताते हैं कि वह यक्ष ब्राह्मण ही थे जिन्होंने देवताओं को जीत दिलाई.उमा के रूप में ब्राह्मण ही थे जो पहले एक यक्षों रूप में अग्नि एवं वायु के शक्ति की परीक्षा लिये थे और फिर इन्द्र के नज़दीक आने पर अदृश्य हो उमा रूप में आये…
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्शमिति ॥३.१२॥
फिर मूंडकोपनिषद् में यज्ञाग्नि की ज्वालाओं निम्न रूप से वर्णन किया है
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा।
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥१.२.४॥
उपनिषद् केवल इन देवताओं का अलग अलग नाम एवं रूप में एक ब्राह्मण की ही बात करता है जो हर जीव में आत्मा की तरह उपस्थित रहता है..
उपनिषदों के ऋषियों के उसी पुरूष और ब्राह्मण को भगवद् गीता में पुरुषोत्तम (अध्याय १५) को के नाम से बताया…. अद्वैत यही है…
पर उपनिषदों के इन धर्म,दर्शन,ज्ञान सम्बन्धी विचारों की जानकारी संस्कृत के जानकारों की कमी और शायद बौद्ध एवं जैन धर्म के राजकीय संरक्षण के कारण बाद के वर्षों में क्षीण होती गई…एक बार फिर जागरण काल आया शंकराचार्य से जिन्होंने उपनिषदों को ढूँढ निकाला..और उनकी रहस्यात्मकता को अपने सरल भाष्यों के द्वारा ख़त्म किया…गीता की, दस उपनिषदों की अपेक्षाकृत सरल संस्कृत में भाष्य लिखा. अपनी स्वतंत्र रचना भी की..हिन्दू घर्म को पुनः देश में बौद्ध एवं जैन धर्मों से आगे ले जाने में सफल रहे, अपनी छोटी उम्र में भी पूरे भारत के हर कोनों में शास्त्रार्थ द्वारा एवं चारों धामों एवं मठों को स्थापित कर. पर बाद में फिर नेतृत्व एवं धर्म से जुड़े लोगों की अज्ञानता और लगन के कारण, त्री देवों एवं देवियों को भी लोग अलग अलग स्वतंत्र वरिष्ठता दे बाँट दिये धर्म को. समाज में वैष्णव, शैव, शाक्त आदि अनुयायी वर्ग बने….यहाँ तक कि वर्चस्व के लिये घोर हिंसा का मार्ग भी अपनाया गया….१०- ११ वीं सदी तक देश के पराधीन हो गया, संस्कृत जनता से कटती गई….आंचलिक भाषाएँ पनपी और तब धर्म के उद्धार की ज़िम्मेवारी का काम भक्त कवियों ने लिया…..हिन्दू धर्म को फिर एक करने का काम तुलसीदास कृत रामचरितमानस एवं अन्य भाषा के भक्त कवियों की पुस्तकों द्वारा हुआ….तुलसी के आराध्य तो विष्णु के अवतार राम हुए, पर मानस में बार बार उन्होंने जिस तरह राम से शिव की बंदना, एवं शिव से राम की बन्दना कराई वह बहुत महत्वपूर्ण बनी विभेद मिटाने में….यही नहीं उन्होंने जो शिव पत्नी उमा एवं सीता के बारे जो लिखा ….वह उन देवियों को फिर उपनिषद् के सर्वोच्च ब्राह्मण के स्तर पर ले गया…केवल दो दोहा/चौपाइयों द्वारा- पहले बालकांड से उमा वर्णन जनकपुर के राजा जनक की पुष्पवाटिका का एवं दूसरा सीता का बल्मिकी द्वारा अयोद्ध्याकांड में बनवास के प्रारम्भ में राम सीता लक्ष्मण से भेंट होने पर स्तुति से दिया जा रहा है….इस समय….
पहला
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
-आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥
दूसरा
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
-हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह।
-हे राम! आपका स्वरूप वाणी के अगोचर, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरंतर उसका ‘नेति-नेति’ कहकर वर्णन करते हैं॥
काश! भारत की नई पीढ़ी इनमें रूचि दिखातीं ….वेदान्त सोसाइटी, चिन्मयानन्द मिशन, आदि बहुत संस्थाएँ काफ़ी काम कर रही हैं….पर इन सबका आम जनता तक पहुँचाना नहीं हो पा रहा….देश में आर्थनीतिक बदलाव के साथ पुराने आध्यात्मिक ज्ञान एवं आचरण का समावेश भी ज़रूरी है….कुछ नक़ली गुरू देश में व्याप्त अशिक्षा के कारण लोगों को बरगला अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं…काश! शिक्षित एवं सम्पन्न वर्ग कुछ पहल करता….

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बृहदारण्यकोपनिषद् और तत्कालीन समाज में नारी

बृहदारण्यकोपनिषद् और तत्कालीन समाज में नारी: आजकल जब इस उपनिषद् को पढ़ने समझने की कोशिश कर रहा हूँ तो एक सांसारिक व्यक्ति होने के चलते उस समय के कुछ सामाजिक पक्षों की ओर सोचने के लिये बाध्य होना पड़ता है. उपनिषदों में वेद के सबसे उच्चतम ज्ञान का निचोड़ है- आत्मा- ब्राह्मण को इसी जन्म में मिल कैसे एक व्यक्ति खुद ब्राह्मण हो सकता है.

याज्ञवल्क्य उस समय के एक महान गुरू थे…जिनकी धाक पूरे सिद्ध ऋषियों में थी…जनक उस काल के एक अध्यात्म ज्ञान के ज्ञाता और प्रशंसक और बहुत ही समृद्ध राजा थे…उनके महल में सभी ज्ञानी ऋषियों की पहुँच थी और उनका आदर एवं सम्मान था..उनके जिज्ञाशाओं की तृप्ति होने पर ऋषि विशेष को बहुत धन राशि भी मिलती थी….एक प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य खुद को अपने समय का सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी कह दस हज़ार स्वर्ण मुद्रा एवं एक हज़ार गाय प्राप्त करते हैं जनक से…यहाँ तक कि एक बार याज्ञवल्क्य के ब्रह्मज्ञान के उत्तर से संतुष्ट हो एक प्रकरण में वे यह भी कहते हैं याज्ञवल्क्य से, ‘मैं अपने एवं मेरे साम्राज्य को आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ.’

पर बृहदारण्यक उपनिषद् तत्कालीन तीन नारी का ज़िक्र कर उस समय के समाज में उनके महत्व को दर्शाता है…गार्गी सबसे श्रेष्ठ लगती हैं ज्ञान की दृष्टि से…वे एक कथा में याज्ञवल्क्य से उनकी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये प्रश्न करती हैं एवं अन्त में याज्ञवल्क्य के सावधान करने पर पीछे हट जाती है….( अध्याय ३,ब्राह्मण ६)..पर दूसरी बार गार्गी एकत्रित विद्वान ऋषियों से कहती हैं कि वे दो प्रश्न पूछेंगी याज्ञवल्क्य से और उसके उत्तर वे अगर ठीक देते हैं तो सभी को मान लेना चाहिये कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं. बहुत विद्वतापूर्ण वे प्रश्न हैं और याज्ञवल्क्य के उत्तर भी. गार्गी सबसे कहती हैं कि वाक़ई याज्ञवल्क्य सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी हैं….( अध्याय ३ का ब्राह्मण ८).

पर दोनों अन्य नारियाँ याज्ञवल्क्य की पत्नियाँ हैं- पहली कात्यायनी एवं छोटी मैत्रेयी. मैत्रेयी को ब्राह्मण का ज्ञान था. मैत्रेयी एवं याज्ञवल्क्य की वार्ता बृहदारण्यकोपनिषद् में दो बार आई है (अध्याय २ के चौथे ब्राह्मण, और फिर से अध्याय ४ के पाँचवें ब्राह्मण में) मुझे इसका कारण मालूम नहीं है…याज्ञवल्क्य संन्यास लेना चाहते हैं अपनी सम्पत्ति का दोनों पत्नियों में बँटवारा कर और यह बात जब वह अपनी प्रिय पत्नी मैत्रेयी से कहती हैं, तो मैत्रेयी पूछती है कि क्या संसार का सब धन मुझे अमरत्व दे सकता है. याज्ञवल्क्य का उत्तर ही इस ब्राह्मण की विषयवस्तु है..

विद्वानों के अनुसार इस उपनिषद् का समय काल ईसा के ९०० से ६०० पूर्व का माना जाता है.मुझे इनके अलावा किसी विशेष नारी नाम का अब तक ज्ञान नहीं, अगर पता चलेगा तो फिर लिखूँगा.

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