पराली का प्रलय: हत्यारे बनते किसान

 

आज सबेरे धूंआ की एक तीव्र गंध के कारण नींद खुल गई। थोड़ा सोचने पर लगा कि यह आम प्रदूषण नहीं है। फिर नोयडा का API index भी देखा। वह तो 183 ही था। फिर लगा कल रात एक शीशे का दरवाज़ा बन्द नहीं किया था, बाहर की थोड़ी ठन्ढी हवा के लिये। शीशे का दरवाज़ा बन्द किया । नित्य प्रात: का स्नान, पाठ, गीता स्वाध्याय और थोड़ा सामान्य शारीरिक व्यायाम को 6 बजे ख़त्म कर तैयार हो गया नीचे जा भ्रमण के लिये। पर बाहर निकलते ही वही तीव्र धूंये की गंध के कारण मास्क पहना। नीचे पहुँच घूमने की कोशिश की थोड़ी देर। मेनगेट के गार्डों से पूछा तो एक ने कहा पराली जल रही है चारों ओर नोयडा, हवा के कारण धुआँ यहाँ तक छा गया है। फिर याद आया कि अमरीका से आईबड़ी बहू ने कुछ दिन पहले बताया था कि जब वह पास के हापुड़ में रहते अपने मौसी जी घर गई थी तो देखी थी पराली जलते हुये। मीडिया ने क़रीब एक महीने पहले बताया था कि इस बार यह पराली का जलाना कम हुआ है।एक समाचार में बताया कि एक कम्पनी किसानों के खेतों से पराली उठा लेती है। इस पर मैंने पहले भी फ़ेसबुक में लिखा था। गड़करी के अनुसार एक बड़ी तेल कम्पनी ने पराली से एथानॉनल बनाने के लिये एक लाख लिटर के सालाना क्षमता की एक कम्पनी बनाई है। 10% तक पेट्रोल गाड़ियों एथानल मिलाने का क़ानून भी गया है। आयात कम करने  की बड़ी संभावना भी है। अभी भी किसान समझते नहीं या समझना चाहते नहीं कुछ लोगों के बहकाने से।* हमारे किसान अपनी जड़ मानसिकता को छोड़ने को तैयार नहीं और अन्नदाता से मृत्युदाता बन गया है पिछले सालों में। आज ज़मीन के मालिक अपने खेती की ज़मीनों को गाँव के कमजोर बेबस खेती से कमाने वाले लोगों को अच्छे सालाना रेट का रूपया ले पर साल भर के लिये दे देतें हैं, जो उसमें खेती कर अपने परिवार का पोषण करते हैं। हाँ, किसानों का सरकारी अनुदान ज़मीन के उन्हीं निक्कमें मालिकों को मिलता है जिनके नाम ज़मीन है सरकारी रिकॉर्ड में। जमीन्दारी प्रथा क़ानूनी ढंग से ख़त्म होने पर भी एक नये रूप में आ गई। ये खेतों से उत्पादन की कमाई पर आश्रित असली खेती करते लोग सभी तरह से खेतों से जितनी ज़्यादा कमाई जितनी कम खर्च पर कर सकते हैं, करते हैं चाहे ज़मीन का नुक़सान हो, या पर्यावरण का। वे नयी तकनीक क्यों सीखें।  सभी राजनीतिक नेता इस नई व्यवस्था में शामिल हैं। पराली के जलाने की शुरूआत उसी के कारण हुआ है और चल रहा है। सरकार निर्विकार भाव से टैक्स देनेवालों के पैसे किसानों पर खर्च कर वोट जीतने के प्रयास में लगी है।दुर्भाग्य है कि सरकार के प्रमुख  नीतिनिर्माताओं को यह पता ही नहीं या पता होने पर भी वह ज़ाहिर नहीं करना चाहते हैं। कौन अपना नुक़सान करे-  चाहे ज़मीन अपनी उपजाऊ क्षमता खोती जाये, पराली जले, या प्रदूषण फैले, और लोग बीमार हों या मरे।

पिछले साल मेरी पत्नी को जब न्यूरोलाजिस्ट ने कहा कि उन्हें डिमेंसिया हो गया है जिसे Clouded Dimentia कहते हैं। और उसका कारण है  प्रदूषण के कारण सुर्य की रोशनी का न हो अंधियारा छाया रहना जो हर साल पराली जलाने के समयकाल में दिल्ली के चारों ओर के इलाक़े में हो जाती है।इन्हीं दिनों ऐसे मरीज़ों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।  जिसका कोई इलाज ही नहीं है और यमुना की तरह के मरिज अपनी याददाश्त खोते जाते हैं। डाक्टर से कुछ दिनों पहले फिर पूछा था कि आनेवाली इस समस्या से कैसे लड़े।  वे दवाई चलाते रहने के लिये कहें और सूरज की रोशनी होने पर सबेरे धूप में थोड़ी देर बैठाने के लिये जब प्रदूषण कम हो।मैं नोयडा में 1997 में आया,  पर उस समय ऐसा नहीं होता था।पिछले दशकों में पंजाब से पराली का जलाना चालू हुआ, अब तो हरियाना, उत्तरप्रदेश आदि सभी प्रदेशों में फैलता जा रहा है। पंजाब को लोग अभी भी खेती करने के तरीक़ों में अगुआ मानते हैं। पर पंजाब कृषि में अपना वर्चस्व खो चुका है।

 

दिल्ली के मुख्य मंत्री जो दुर्भाग्य से हमारे आई. आई. टी-खडगपुर के विद्यार्थी थे और लोकप्रिय भी है। तभी तो बार बार चुने गये हैं। पर बिहार के इंजीनियर  मुख्य मंत्री नीतिश कुमार जैसे बिहार को निराश किये, वैसे ही केजरीवाल से हमें बड़ी उम्मीद थी दिल्ली के कायापलट सम्बंधी मुझे, पर ग़लत निकली। केजरीवाल  इंजीनियर का दिमाग़ खो दिये, केवल लोगों की  वोट जीतनेवाली कला में माहिर हो गये। दिल्ली का कुछ बदलाव नहीं कर पाये।यह तो अच्छा है कि दिल्ली देश की राजधानी भी है और अन्य स्वतंत्र एजेन्सियाँ भी है दिल्ली को आगे ले जा संसार में एक नया स्थान बनाने में मदद के लिये।

 

और अब जब पंजाब में जहां काँग्रेस पार्टी की सरकार थी, पिछले चुनाव में केजरीवाल का आप पार्टी आ चुकी है।पर केजरीवाल न पंजाब के किसानों को समझा पाये न पाये इस साल भी और  दिल्ली और आसपास के क्षेत्रीय शहरों में पराली जनित क़हर से बचाने का कोई प्रयास नहीं किये। क्या दिल्ली और इनके पास के इलाक़े में बढते प्रदूषण को रोकने का प्रयत्न किये, हाँ देश के प्रधान मंत्री बनने का सपना देख सकते हैं? क्या दिल्ली शहर संसार की नज़रों में एक अच्छा शहर बन पायेगा? क्या दिल्ली या उसके पास के क्षेत्रों में कोई विदेशी आ रहना पसंद करेगा या यहाँ विदेशी प्रर्यटक यहाँ आना चाहेंगे? क्या प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री और राजनीतिक दलों के नेतृत्व को हर दलगतऔर व्यक्तिगत विरोध या कठिनाई के बावजूद भी इस देश की प्रतिष्ठा को बचाने के लिये इस काम पर एक व्यापक प्रयास नहीं करना चाहिये था?

 

क्या इस क्षेत्रों के प्रबुद्ध नागरिकों को मिल इसलिये एक स्वार्थरहित आन्दोलन करने के लिये आगे नहीं बढ़ना चाहिये? क्या सभी स्कूलों के हेडमास्टरों और बच्चों स्कूलों को बन्द कर इसका बिरोध नहीं करना चाहिये जिससे बहरे अंधों को इस समस्या का समाधान ज़रूरी है समझ में आये? IT वालों को गाड़ी न चला घर से क्यों काम नहीं करना चाहिये प्रदूषण को कम करने के लिये? क्या धूँआ उगलते सब जेनेरेटरों, ट्रकों, ट्रैक्टरों को क्यों इस क्षेत्र में प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिये? क्यों बिजली के वाहनों  को और सूर्य शक्ति से बिजली उत्पादन को उन सभी को बढ़ावा नहीं देना चाहिये जिनके पास जगह है। क्या शहरी संस्थानों  के ख़ाली ज़मीन में या भवनों पर शौर्य उर्जा का उत्पादन करना ज़रूरी नहीं कर देना चाहिये? कब सभी काम सरकार पर हम छोड़ते रहेंगे? आज का दो मीडिया रिपोर्ट देखिये और कुछ सोचने और कुछ प्रयास के कदम उठाने की चर्चा करिये और सोचिये और इस अंचल को कालकोठरी बनने से बचाइये।  यह ८३ साल का बूढ़ा इसके लिये जो पहल करेगा उसके साथ होगा।

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आदिपुरुष के पटकथा लेखक और गीतकार के नाम यह निवेदन

आजकल मनोज मुंतशिर जो ‘आदिपुरुष’ फ़िल्म के पटकथा लेखक हैं और जिनका मैं अबतक प्रशंसक था, बड़ी चर्चा में हैं। मुझे समझ में नहीं आता तुलसीदास के रामायण में जब राम के लिये शायद यह नाम कहीं नहीं आता फिर आदि पुरूष राम कैसे बने जब वे त्रेता में हुए। वैसे ‘आदि पुरूष’ में ‘पुरूष’ मुख्य है जिसके ऊपर कुछ नहीं। कठोपनिषद् के श्लोक 1.3. 10 और 1.3.11 में ‘पुरूष’ को इस तरह कहा गया है-

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥1.3.10॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।

पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥1.3.11॥

-‘पुरुष’ से उच्चतर कुछ भी नहीं। वही सत्ता की पराकाष्ठा है, वही यात्रा का परम लक्ष्य (परा गति) है। पुरूष का न कोई आदि न अन्त।

सभी उपनिषदों में क़रीब क़रीब उन सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने जब वे सूक्ष्मतम पुरूष या ब्रह्म को जैसा अनुभव किया वैसा बताया है- जैसे ईशोपनिषद् के श्लोक 8 में, कठोपनिषद् के श्लोक १.३.१५ में। इन्हीं में सबसे छोटे उपनिषद माडूक्य में वह महावाक्य भी है ‘अयम् आत्मा ब्रह्म’ ‘This Atma is Brahman- यही आत्मा ब्रह्म है’।

राम एक सगुन ब्रह्म के रूप में अवतार हैं, उनका चित्रण केवल ज्ञानी ऋषियों की कथानक पर होना चाहिये। सदियों से इनकी मूर्तियाँ बनती रहीं हैं और उनके पहनावे का वर्णन दिया भी गया है। फिर आधुनिक काल में गीता प्रेस से प्रकाशित वाल्मीकीय रामायण, रामचरितमानस आदि में सभी पात्रों के चित्र आदि भी देखे गये हैं। क़रीब क़रीब सभी हिन्दूओं या अन्य धर्म के पाठकों या आम लोगों में वह छवि वसी हुई। उसको पूरी तरह से व्यक्ति इच्छानुसार बदलना शायद गलती है या बचपना।

मनोज के अपने बचाव में कही बातें बड़ी हास्यप्रद हैं। राम खड़ाऊँ पहन युद्ध नहीं किये थे, वे बिना कुछ पहने रहे अपने पूरे वनवास में, चित्रकूट में काफ़ी समय रहने के समय अपनी कुटिया में वे खड़ाऊँ पहनते थे, जैसा फ़िलहाल तक हमने गाँवों में देखा होगा।

युद्ध में विभीषण कहते हैं-

‘नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥’ क्या मनोज जी इसको पढ़े नहीं है? फिर युद्ध में चमड़े या कैनवास के चप्पल दिखाने की बात कहाँ आती है? हनुमान जी जैकेट पहनाने की क्या ज़रूरत है।

अब मैं रामचरितमानस के अयोध्या कांड में सीता,राम,लक्ष्मण के अपने आश्रम में आने पर बाल्मिकी ने जो उनके स्वागत में कहा-

संत तुलसीदास जिन्हें भगवान राम बार बार दर्शन दिये, फिर जिन्होंने राम और सीता के बारे लिखा अयोध्याकांड में वाल्मीकि के आश्रम में ऋषि ने कैसे राम का स्वागत किया लिखा-

‘श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।

जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ।।’

(यह साफ़ है राम सगुन ब्रह्म है जो राम एवं फिर कृष्ण की तरह अवतार लेते हैं।गीता में अर्जुन को दिखाये अपने विश्वरूप के वारे में कहा गया देश विदेश में प्रसिद्ध श्लोक है-

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥11.12॥

-यदि आकाश में सहस्रों सूर्यों की ज्योति एक साथ उठी हुई हो तो वह ज्योति उस महापुरुष के देह की ज्योति के सदृश कदाचित् ही हो सके ।

जो उपनिषदों के श्लोक में एक अन्य सुन्दर और लोकप्रिय रूप में कहा गया है-

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥

-वहाँ सूर्य प्रकाशमान नहीं हो सकता तथा चन्द्रमा आभाहीन हो जाता है, समस्त तारागण ज्योतिहीन हो जाते हैं; वहाँ विद्युत् भी नहीं चमकती, न ही कोई पार्थिव अग्नि प्रकाशित होती है। कारण, जो कुछ भी प्रकाशमान् है, वह ‘उस’ की ज्योति की प्रतिच्छाया है, ‘उस’ की आभा से ही यह सब प्रतिभासित होता है।)

और फिर तुलसीदास के बाल्मिकी आगे कहते हैं-

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।

जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥127॥

फिर वह जगह बताते हैं जहाँ उनका निवास हो-

‘काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया।…

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥

जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥

तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥..

अगर मनोज की राम कथा इन मूल्यों पर ध्यान देती तो अच्छा होता।

आश्चर्य है राम की कथा और राम के रूप में तुलसीदास के सगुन राम के आदर्श चरित्र को क्यों नहीं दिखाने की कोशिश की गई| तुलसीदास से ज्ञानी और वास्तव के कवि तो आजतक कम से कम हिन्दी में नहीं हुए। मनोज राम के बारे में अलग अलग रामयणों को उद्धृत करते हैं। वाल्मीकीय रामायण के समय का काल और कल्पना अलग थी, तुलसीदास की अलग। जानकी जी जो स्वंय ब्रह्म राम की माया हैं वे रावण के कुटिया में उनका हरण करते ही माया रूप ले लीं। अग्नि परीक्षणों माया जली और पवित्र सीता प्रगट हुईं।वे जब चाहती रावण को भस्म कर सकती थी।

अब मैं उनके पुष्पक विमान सम्बन्धी ग़लतफ़हमी को दूर कर रहा हूँ। वह विमान कुबेर से जीत कर रावण लाया क्योंकि कोई असुर चरित्र का व्यक्ति विमान बना ही नहीं सकता।

अब मैं मनोज जी के कुछ व्यक्तिगत बातों पर कुछ कहना चाहूँगा-

१. कुछ समय से वे बार बार अपने को ब्राह्मण बताते रहते हैं और सनातनी। https://youtu.be/KzcVxyk_t90 कभी कभी इसमें राहुल गांधी के कुछ कथनों की याद आने लगती है।वह बचकानी लगती है। ब्राह्मण पैदा नहीं होते बनते हैं और प्रमाणित करते अपनी करनी द्वारा।

गीता की परिभाषा में ब्राह्मण के कर्म हैं-

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥18.42॥

-शान्त भाव, आत्मसंयम, तपस्या, मन और शरीर की पवित्रता, तितिक्षा, क्षमा, सरल व्यवहार, ज्ञान, विज्ञान, आध्यात्मिक सत्य को स्वीकार करना (उसमें श्रद्धा विश्वास)—ये ब्राह्मण के कर्म हैं जो उसके स्वभाव से उत्पन्न होते हैं ।

या

वे किस सम्पदा के धनी हैं गीता अध्याय 16 के 1-3 श्लोकों में दैवी सम्पदा या बाक़ी अध्याय में दिये आसुरी सम्पदा। अपने हृदय से पूछें और फिर जबाब दें या आम लोगों के सामने कहें। मैंने कल उन्हें कल Tweet किया था।

ब्राह्मण की एक परिभाषा दी गई है जिसे साथ के एक चित्र में देख सकते हैं।

मनोज मुंतशिर में लगता है अब थोड़ा अहंकार भाव आने लगा बढ़ती लोकप्रियता के साथ । अच्छा होता कि कवि, गीतकार या लेखक को केवल सम्पदा अर्जन और संग्रह का मशीन न बना अपने क्षेत्रों देश विदेश में नाम कमाते आम व्यक्ति को उच्च स्तर का बनने की प्रेरणा अपनी कृतियों से। तुलसी के राम के आदर्श पर अगर भरत चला होता तो न हम ग़ुलाम बने रहते सदियों तक, न आज के समाज की वह दशा होती जो तुलसीदास ने कलिकाल का वर्णन करते लिखा था और कागभुसुडी से पक्षीराज गरूड को कहलावाया था कुछ चौपाइयों के द्वारा-

नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥

गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥

हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥

मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥

नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥

कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनहिं चेरि निबेरि गती॥

सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥

कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥

नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥

क्या उस महान संत की अद्भुत दूरदर्शिता नहीं बताती।

हाँ, अगर वह उनका लक्ष्य होता।

२. वे अपने बारह वर्षीय लड़के पर दोष लगाते हैं कि भारतीय या हिन्दू मूल्यों को नहीं समझना और अभी ही अमरीकन बच्चों की तरह की फ़िल्म देखना चाहते हैं अतः: वही सोचकर यह फ़िल्म कुछ अमरीका पैटर्न पर बनी है और उसके पात्रों के पहनावे भी। इसका दोष केवल उनकी और उनकी पत्नी द्वारा बच्चों को पालने के एवं उसके सामने आदर्श रखने रखने के ज्ञान या चाहत पर है। मैं खुद अब 83 साल का IIT खडगपुर का 1957 का मेकेनिकल इंजीनियर। मेरे तीनों बेटे अमरीका में हैं, पाँच पोते भी। पर जब मैंने एक को एकनाथ ईश्वरन की अंग्रेज़ी में काव्य रूप में लिखी The Upanishads भेजा, वह एक बार में ख़त्म कर ही उठा। अपने दायित्व एक नागरिक, पिता, पति, पुत्र, भाई, बहन रूप में समझिये फिर आप एक युगान्तरकारी फ़िल्म की कथा लेखक या गीतकार बनिये या फ़िल्म बनाइये।हम फ़िल्म निर्माता से कुछ ज़्यादा उम्मीद नहीं करते, पर आपसे ज़रूर- पैसा साथ में नहीं जाता, पर देवदास की तरह सफल कहानी लिखना या फिर उसका फ़िल्म।

तुलसीदास आज के हिन्दूओं के लिये राम चरित्र का वर्णन किया है- आदर्श बीर एवं महान व्यक्ति- बालकांड में जनकपुर जाते वक्त यज्ञों के बाधक असुरों का संहार, समाज त्यक्त अहिल्या देवी का सम्मान दिला समाजिक सम्मान दिलाना, मज़बूत संयुक्त परिवार के आदर्श पुत्र, भाई; पूरे देश भर से आये आयु में बहुत बड़े बलवान द्वारा न टूटनेवाले धनुष को तोड़ना, माता के कारण पिता की आज्ञा पर १४ साल का वनवास पूरी मर्यादा बनाते हुए, ऋषियों से ज्ञान प्राप्त किया, रक्षा की, निम्न जाति कहे जानेवाले केवट, निषाद, कोल, भील को गले लगाया, निम्न जाति की ही शबरी को जीवन्मुक्त बनाया, पक्षीराज जटायु को सम्मान दिया, फिर बालि के अन्याय रूप से वनवासित भाई वानरराज सुग्रीव को दोस्त बना उनकी सहायता ली, और तब हुआ समुद्र पर पुल बांध लंकापति से युद्ध और विजय का गुर बताना विभीषण को-

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥4॥

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥5॥

और आख़िरी में

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥80 क॥

काश! आज भी हम तुलसीदास की रामचरितमानस को अपने समझते और अपने बच्चों को समझाते। राम भारत के आदर्श पुरूष हैं और सीता आदर्श नारी और उसी तरह उनका सम्मान होते रहना चाहिये पीढ़ी दर पीढ़ी….अगर हम भारतीय या हिन्दू बने रहना चाहते हैं।

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निरर्थक है बिना समझे नित्य पाठ 

हम धर्मग्रंथ का नित्य पाठ कर अपने कर्तव्य का अन्त क्यों कर देते हैं? उसके सर्जनकर्ता की इच्छा को क्यों नहीं समझते हैं? वह तो इन ग्रंथों को समाज के पढ़े लिखे या अपढ समझदार व्यक्तियों में अपने जीवन के स्वभाव एवं आचरण में बदलाव लाने के लिये लिखा गया था- चाहे वह उपनिषद् हो या गीता हो या फिर रामचरितमानस या सिख धर्म का ‘सुखमनी साहब’।  

कुछ दिनों पहले आम्रपाली के नीचे के छोटे मैदान में हम दो-तीन सबेरे बात करते करते घूम रहे थे। हम में एक सरदार जी थे जो अभी कार्य रत हैं। बात सिख धर्म की एक रोज़ाना पाठ्य पुस्तिका ‘सुखमनी साहिब’ की हो रही थी। एक मेरी पहिचान की महिला यह सुन रही थी। देखा वे ऊपर गई एक नई प्रति ले आईं और बहुत प्रेम से भेंट दिया जो हिन्दी में थी और वे समझीं मैं सब पढ़ कर समझ जाऊँगा। मैंने सादर भेंट स्वीकार की।पर घर आकर पाया कि उस पुस्तक में केवल गुरूमुखी में लिखी बानियों को हिन्दी में लिख दिया गया है। कुछ समझ नहीं सका और अपनी कमजोरी बता दाता को क्षमा मांगते हुए लौटा दिया। पर जब यह बात अपने सेक्टर ४१ के पुराने दोस्त अरोड़ा जी को बताया, तो मुझे विना बताए हुए एक और किताब अर्थ के साथ वाला मंगा दिये अपना पैसा लगा। पढ़ रहा हूँ और कुछ समझ आने लगा है-

‘काम क्रोध अरू लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव।

नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरुदेव॥६.१॥

हे नानक!(विनती कर और कह) हे गुरदेव!हे प्रभु!मैं (आपकी)शर्ण में आ गया हूँ, ( मेरे ऊपर) कृपा कर, (मेरा) काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार दू हो जाये।’

गीता के ॐअक्षर ब्रह्म की तरह संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में बालकांड में ‘राम नाम की महिमा’ का विस्तार से  वर्णन किया है। सुखमनी भी गुरुनाम की महिमा और आज के लोगों के संसारिक सुखों में सब भूल सत् की तरफ़ से मुँह मोड़ असत् में लगे हुए लोगों के लिये है। अधिकांश सांसारिक लोग किसी मूल्य पर धन अर्जित करने और संग्रह करने, शारीरिक सुख की सब सुविधाओं को जुटाने में लगे हैं। भगवान को समझने के लिये और साथ ही समाज को सद् रास्ते पर चलने के लिये आम लोगों में अच्छे चरित्र और स्वभाव में सदाचार ज़रूरी है। इसकी कमी दिनों दिन  होती जा रही है। भगवद् गीता भी यही कहता है- 

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥16.21॥

काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार (सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को ‘नरक के द्वार’ कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

अब देखिये रामचरितमानस के लोकप्रिय कांड (सुन्दर कांड) में यही कहा है- 

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥38॥

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ- ये सब नरक के रास्ते हैं, इन सबको छोड़कर श्री रामचंद्रजी को भजिए, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं।

हनुमान चालीसा और सुन्दर कांड बहुत हिन्दी भाषी पढ़ते हैं एक नित्य उपासना के कर्म की तरह, पर कुछ कामना मन में लिये। हनुमान चालीसा से सरल भाषा में कुछ लिखा ही नहीं सकता। उसमें भी एवं फिर रामचरितमानस के लोकप्रिय सुन्दर कांड में बहुत शिक्षाएँ  दे रखी है। कृपया ध्यान दीजिये- 

पहले हनुमान चालीसा से 

१. ‘बल, बुद्धि विद्या देहु मोही, हरहु कलेश विकार॥’

२.‘ महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी॥’

३.‘ सब सुख लहें तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥’

सुखमनी में राम का ज़िक्र भी है श्रद्धा से नित्य जपे जानेवाले में सुखमनी में। पर आश्चर्य तब हुआ जब आज श्री अरोड़ा ने कहा कि वे नित्य पाठ तो करते हैं, पर समझना क्यों ज़रूरी है। सभी धर्म ग्रंथों को पढ़ अगर हम समझें नहीं फिर बदलेंगे कैसे अपना आचरण? धर्म मार्ग पर चलेंगे कैसे हम सब तो उलझें ही रहेंगे सांसारिक समस्यायों या कुछ कामना की पूर्ति के काम में या अनित्य चीजों के संग्रह में बुढ़ाती तक?

हम बहुत हिन्दू एक भजन ‘ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन….’ को गाते होंगे, पर विना समझे। देखिये उसकी आख़िरी पंक्ति है- 

‘ मम हृदयकंज निवास करू कामादिखलदल गंजनम्।’ काम इत्यादि दुष्ट समूह से हम अपने को बचा पायेंगे।

जबतक हम अपने से इन सब कमियों को दूर करने का प्रयत्न न करेंगे तो तब तक केवल पाठ करते रहने से क्या फ़ायदा होगा। केवल मन की संतुष्टि के सिवाय कि हम भी पूजा तो करते हीं हैं।

मैंने अपने बचपन में गाँव के किसी न किसी के परिवार के बाहरी बैठक रात में रामचरितमानस ढोलक झाल पर  झूम झूम गाया जाते देखा था। पर बहुत कम ही इसके अर्थ समझते थे, कहानी वाले भाग को छोड़। दो-तीन साल पहले हमारे मेघदूत के समउम्र दोस्त और विद्वान श्री महेन्द्र सिंह जी ने भी एक दिन सुन्दरकांड का विशेष घर में आयोजन किया था। मैं भी था पर शायद ही जुटे समाज में सुन्दरकांड की सीखों से कुछ ख़ास मतलब था। पाठ के व्यवसायिक ढंग-बाजा आदि के संग के रागमय पाठ को सबने सराहा। पर कभी कुछ विषय वस्तु को समझाने का न पंडित महाशय ने प्रयत्न किया, न किसी ने अनुरोध किया। क्या इस तरह के पाठ करने या सुनने से कुछ हमें कुछ  मिलेगा, या जब बुढ़ौती में भी सब विकारपूर्ण काम में लगे रहेंगे। 

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Today’s Requirement for be world class company

Today every country including the USA and Germany, Japan must take lessons from Elon Musk and Management expert Porter who told the companies to remember the principle of making, growing and then destroying from ancient Hindu philosophy. The companies must get a small pool of technocrats but so many MBAs but engineers with appreciation of designing a cutting edge product, each bit of manufacturing processes and equipment with built-in top quality and about all inputs that go into the product, and keep on destroying the old at all levels. The two individuals from the USA have shown that one is Elon Musk of Tesla and the other is Steeve Jobs and Tim Cook of Apple. They kept the products,processes following the Hindu philosophy or for some who do not like Porter’s input.

Both kept a sharp eye on product design improvement and manufacturing processes of each step in mind. Musk adopted Giga Press and developed special aluminium alloy for integrating body building processes cutting cost at all levels of manufacturing. Everything input in the car is special and unique, adding to engineering marvels. Their 4860 battery and its mass production process are just exemplary. So was done at Apple too.Long back I had gone through their manufacturing mobile phone aluminium cell with high speed machining…


Here are a few u-tubes videos showing the change in the auto sector with Tesla that can’t be bettered or even copied by other competitors of the world.. China May do it but they must have someone like Elon Musk or Steeve Jobs to become one.

I give a challenging task to all global technocrats to develop air conditioners that will not transfer heat from outside to the atmosphere increasing day by day the summer temperature unless something all around development gets executed by all countries with mutual cooperation in sharing technologies rather than making money out of it for a class of population.

Giga Castings with Sandy | Evolution of Tesla Bodies In White” https://youtu.be/WNWYk4DdT_
Model Y teardown https://youtu.be/wLafQaE2zLo
4860 Battery pack https://youtu.be/ozesI3OZEG0

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Bhagwad Gita- Who were Asuras and Devas?

Bhagwad Gita- Who are Asuras?

There is confusion and misconception among people that the people called Asuras or Rakshasas or Nisachars of Ramayana or other epics and puranas’s stories and tales were some different beings mostly with ferocious and larger human’s’type limbs, face and teeth with lot of bodily strength, eating human beings and animals and remaining asleep after drinking alcohol like Kumbhakarana. But the reason for this ignorance is some ancient religious books and over the folk tales and mythological stories.Even Tulsidas told such a formidable form and behavior of Ramcharitmanas Asura in the Sundarkand case, “Kahun Mahish Manush Dhenu Khar Aj Khal Nisachar Bhachhihi”, further Ravana tells Mandodari, “Jaun Aavai Markat Katkai, Jiahin Bichare Nisichar Khai” Going to Kumbhakarna, Ravana first tells about the chief demons of his army “Durmukh Surripu Manuj Ahari” have been killed in the battle with Ram and then he arranges for Kumbhakarna “Ravan Mageu Koti Ghat Mad Aru Mahisha Anek” then Kumbhakarna “Mahishkhai Khai Kari madira pana” went to war. Tulsidas himself was a great scholar, fully knowledgeable of the Bhagavad Gita, then why did he used these these exaggerations for the demons? At I don’t know the logic. After the composition of Vedas, Upanishads and Gita, all this was written to scare the common people. The exaggerations of the later stories are the flight of imaginations of the authors of various time. However, people forget that Ravana was Brahmana and highly learned, and his other two brothers were also Brahmins. Actually, as I understand, Bibhisan represented sattvik nature, Ravana rajas and Kumbhakarna tamas in every way.


In Mahabharat war, there are stories related to four of the principal Rakshasas, viz., Vegavat, Maharudra, Vidyujihva, and Pramathin, who particated from Pandava side.Bhim married a rakshani Hidimba and their son Ghatotkach participated in Mahabharat.

There is a story in the Chandogya Upanishad. Prajapati told all the gods and demons about the all powerful Self. Then Indra on behalf of the Devas and Virochana on behalf of the Asuras went to Prajapati to know, seek and feel the Self so that they could fulfill all their desires. Virochan after 32 years of waiting trading misunderstood Self and taught Asuras to enjoy worldly life to fulfil their desires. Indra in three or four time spent in total 101 years. He could understand the real Self and taught the same to devas the route to learn and realise the Self, Brahman , the ultimate Reality.


Even In the oldest verses of the Samhita layer of Vedic texts, the Asuras are any spiritual, divine beings including those with good or bad intentions, and constructive or destructive inclinations or nature.

In Bhagwad Gita Krishna in Chapter 16 called, The Yoga of Division Between the Divine and the Demonical Endowments, दैवासुरसंपद्विभागयोगः, daivāsurasaṁpadvibhāgayogaḥ clarifies the difference of the words.
Basically there was no difference between the two except for their nature and natural actions.


In chapter 16,6
..Krishna says:
द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥
Dwau bhootasargau loke’smin daiva aasura eva cha;
Daivo vistarashah proktah aasuram paartha me shrinu.

*

There are two types of beings in this world—the divine and the demoniacal; the divinehas been described at length (in slokas 1-3)hear from Me, O Arjuna, of the demoniacal!

*

इस लोक में मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, ( श्लोक १-३) में, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन, (जो पूरे अध्याय के अनेक श्लोकों में दिया है।

Following are the nature of demonic persons, hypocrisy, arrogance, self-conceit, harshness and also anger and ignorance. They do not know not what to do and what to refrain from, neither purity nor right conduct nor truth is found in them. According to them this universe is without truth, without a (moral) basis, without a God, brought about by mutual union, with lust for its cause; what else?Holding the above view, these ruined souls of small intellects and fierce deeds, come forth as enemies of the world and cause of its destruction.9 Filled with insatiable desires, full of hypocrisy, pride and arrogance, holding evil ideas through delusion, they work with impure resolves. Giving themselves over to immeasurable cares ending only with death, regarding gratification of lust as their highest aim, and feeling sure that that is all. Bound by a hundred ties of hope, given over to lust and anger, they strive to obtain by unlawful means the hoards of wealth for sensual enjoyment. They keep on thinking, “This has been gained by me today; this desire I shall obtain; this is mine and next that much wealth too shall be mine in future.” “That enemy has been slain by me and others also I shall slay. I am the lord; I enjoy; I am perfect, powerful and happy”.“I am rich and born in a noble family. Who else is equal to me? I will sacrifice. I will give(charity). I will rejoice,”—thus, deluded by ignorance…Bewildered by many a fancy, entangled in the snare of delusion, addicted to the gratification of lust, Self-conceited, stubborn, filled with the intoxication and pride of wealth, they perform sacrifices in name, through ostentation, contrary to scriptural ordinances. Given over to egoism, power, haughtiness, lust and anger, these malicious people hate Me (Isswara) in their own bodies and those of others. Finally Krishna warns: “These cruel haters, the worst among men in the world,—I hurl all these evil-doers forever into the wombs of demons only”. And finally an advice for the people of Divine nature, he says lust, anger, and greed – these nature is the three gate of this hell, destructive of the Self—,— therefore one should abandon these three. A man who is liberated from these three gates to darkness, practices what is good for him and thus goes to the Supreme goal!

For a reference the following constitutes the divine nature in sloka16.1-3:
Fearlessness, purity of heart, steadfastness in Yoga and knowledge, alms-giving, control of the senses, sacrifice, study of scriptures, austerity and straightforwardness, ….Harmlessness, truth, absence of anger, renunciation, peacefulness, absence of crookedness, compassion towards beings, uncovetousness, gentleness, modesty, absence of fickleness, vigour, forgiveness, fortitude, purity, absence of hatred, absence of pride.

If you are interested you can see it in https://drishtikona.files.wordpress.com/2022/07/irs-my-favourite-shlokas-from-scriptures.pdf . It provides about 200 best slokas from our most respected scriptures: 50 from four Upanishads in verse and 150 slokas from Bhagwad Gita in bigger bold coloured print in the chapters that you can easily find from the the table of content with sufficient details to satisfy you. Even all the others are equally important. By memorising it all gradually with five slokas after your thirties. You get benefits mentioned in Gita in Chapter 18:

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥

And he who shall study this sacred discourse of ours, by him I shall be worshipped with the sacrifice of knowledge.

और जो मनुष्य हमारे इस धर्म से युक्त संवाद का अध्ययन करेगा, उससे मैं ज्ञान यज्ञ के द्वारा अर्चित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।

You will know everything that Upanishads and Bhagwad Gita means for a person of any religion, caste, creed and country who wish to be a great person for the society and nation .Your comments and suggestions will be always welcome. You can mail to irsharma@gmail.com Thanks

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Some Important Slokas from Bhagavad Gita 

Some slokas from Bhagavad Gita-1

Bhagavad Gita has many single slokas emphasizing that through just one basic discipline of your mind, you may ultimately reach Reality or Moksha or immortality. You can try it. Even if you are not seeking the realization, it will certainly improve your worldly life as you grow up in the life with any profession you go in. First one for today is from Chapter 2’s  sloka 15 about keeping the sameness of mind in two extreme opposite situations. 

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥2.15

Yam hi na vyathayantyete purusham purusharshabha;

Samaduhkha sukham dheeram so’mritatwaaya kalpate.

The wise man to whom pleasure and pain are the same, these opposite situations do not afflict him. Such a man is fit for attaining immortality!

दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है।

Can we control our sense organs to bear the sorrow and make ourselves mentally strong in understanding that  the sorrow will be only temporary? In the same way, one must control the over-happiness too with some pleasurable happenings which come quite often, as that will be over very soon. Controlling of the sense organs through mind and intellect is possible through constantly practising for it.

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Sloka 51 from the same chapter 2

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥2.51॥

Karmajam buddhiyuktaa hi phalam tyaktwaa maneeshinah;

Janmabandha vinirmuktaah padam gacchantyanaamayam.

The wise, possessed of Knowledge, having abandoned the fruits of their actions, and being freed from the fetters of birth, go to the place which is beyond all. With the desire of the fruit of action gone, one is released from the bonds of birth and death and attains to immortal bliss.

Expect queries and comments to continue with the series.

Some slokas from Bhagavad Gita-2

In the end of  Chapter 2 named सांख्ययोग, ‘The Path of Knowledge’, the subject of स्थितधी:, sthitadhih, the man of steady wisdom has appeared. And from the sloka 2. 54-72, that is, till the end of the chapter that the various aspects of such a person have came from Bhagwan Krishna replies to the Arjuna queries on the subject in 2.54: ‘What is the description of him who has steady wisdom and is merged in the Superconscious State? How does one person of steady wisdom speak? How does he walk?’ 

There are two very important slokas that talk about the full renouncement of the desire, काम. I began my Gita journey from learning and repeating these 19 slokas till memorised that was in ‘स्थितप्रज्ञ- लक्षणानि’ in Mahatma Gandhi promoted ‘Ashram Bhajanavali’ for those living in his various ashrams in those that Mahatma founded.

In the Bhagavad Gita with the commentary of Sankracharya, the translator Swami Gambhirananda before starting this section translated this word, sthitadhi, ‘the characteristics of one who has the realisation of the Self.’ First sloka answering the question of Arjuna in 2.54, Krishna says: 

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥2.55॥

Prajahaati yadaa kaamaan sarvaan paartha manogataan;

Aatmanyevaatmanaa tushtah sthitaprajnastadochyate.

When a man completely casts off all the desires of the mind and is satisfied in the Self by the Self, then he is said to be one of steady wisdom!  

जब यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

(Note- All the pleasures of the world are worthless to an illumined sage who is ever content in the immortal Self.) 

As per a sloka from  Kathopanishad  almost in the end of it: 

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।

अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥2.3.14॥

When all the desires that are in the heart of a man get destroyed, then this mortal man becomes immortal and attains Brahman here itself in this life in this very human body.

जब मनुष्य के हृदय में आश्रित प्रत्येक कामना की जकड़ ढीली पड़ जाती है, तब यह मर्त्य (मानव) अमर हो जाता है; वह यहीं, इसी मानव शरीर में ‘ब्रह्म’ का रसास्वादन करता है।

But even in concluding two verses of Chapter 2 of Bhagavad Gita and on the स्थितप्रज्ञ- लक्षणानि’, the same theme is repeated: 

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥2.71॥ 

Vihaaya kaamaan yah sarvaan pumaamshcharati nihsprihah;

Nirmamo nirahankaarah sa shaantim adhigacchati.

The man attains peace, who, abandoning all desires, moves about without longing, without the sense of ‘mine-ness’ and without egoism.

वह (स्थितप्रज्ञ) पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, और वह शान्ति को प्राप्त है।

And the concluding sloka of the chapter and the subject is: 

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।

स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥2.72॥

Eshaa braahmee sthitih paartha nainaam praapya vimuhyati;

Sthitwaasyaamantakaale’pi brahmanirvaanamricchati.

This is the Brahmanic eternal state,  O son of Pritha! Attaining this, none is deluded and his discriminatory capacity in tact. Being established therein, even at the end of life, one attains to oneness with Brahman.

हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है।

Can one give up his desires from the mind,(which is considered by Upanishads and Gita both as the biggest enemy of a person, now or well in time? In one of the slokas in Gita, the wise person must keep on trying to give up desires fully before the last moment in life, then he becomes free.  

Please appreciate the anarchy prevailing among the people in our nation and perhaps in the world over. Please go through these 19 slokas on Sthitpragya once every day and, maybe, every morning as an educated man’s worship. I am hundred percent sure. It will bring a change in you if you understand its importance, for a peaceful happy life.

Some slokas from Bhagavad Gita-3

The main purpose of this series is that we, Hindu can and must become happier by bringing in the preparatory spiritual disciplines in primary secondary education system. Gita has hundreds of slokas about its importance even in worldly life. In the following verse, Gita emphasizes detachment while working on the assigned work with focused mind and dedication. Realization of Brahman is for those who wish to go that path through Yoga of Action or Yoga of Knowledge…. Even for those who are worldly householders  these disciplines are the starting point for success and reach pinnacle in every field. Can one disagree that with only the extreme concentration of mind only one can attain exceptionally an R&D mind or breakthrough innovations or even solving some day-to- day difficult problems.   

In Chapter 3 of Gita with a query from Arjuna, Krishna preaches on the Yoga of Action with a very revealing sloka: 

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥3.19॥

Tasmaad asaktah satatam kaaryam karma samaachara;

Asakto hyaacharan karma param aapnoti poorushah.

If one always perform action which should be done without attachment, the man reaches the Supreme meaning realises Brahman, the ultimate Goal.

इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

In this chapter itself there is another sloka where the desire (related wife, son and wealth) has been called the toughest enemy of every person: 

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥3.43॥

Evam buddheh param buddhwaa samstabhyaatmaanam aatmanaa;

Jahi shatrum mahaabaaho kaamaroopam duraasadam.

Thus, knowing Him who is superior to the intellect and restraining the self by the Self, you slay your toughest enemy in the form of desire, hard to conquer? Subdue the mind with practice. It is difficult to conquer desire because it is of a highly complex and incomprehensible nature. But if a man of discrimination and dispassion, who does constant and intense Sadhana, can conquer it quite easily and the result will be great achievement in worldly life.

इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल। Think for a moment every the various desire we have, many of them even unnecessary that throw it after getting it. Reduce your desires to minimum, you can immense happiness. How much property or other luxury objects should be sufficient. Is there is any need for this endless hankerings that ultimately brings only mental tortures or get wasted..and thrown out as garbage.

Some slokas from Bhagwad Gita-4

One of the biggest problems of India today is not extreme poverty only. The more shocking news for India is the increasing influence of those who hardly know and appreciate the basic spiritual disciplines required to build the society of good people in India. Unfortunately these people are the leaders in every field. The society is dividing itself faster and faster every day through vested interests. The whole society but few are in chaos bringing politics in every thing in life, be it castes, religions, even secular and Real Knowledge. No one right in the villages any more talks about Ramayana, or farming techniques and how to improve farming productivity. Our religious activities have become limited to going to temple, somehow chanting or reading some portion of a religious book or singing some bhajans, if at all by some. It is required but with one-mindedness and total dedication, not just like a superficial karm-kand or charity of some money for moksha to beggars, may be fake ones at least in big cities. We are going faster and further and further away from our ancient culture and values required in a good person in our now globally appreciated scriptures such as Upanishads and Bhagavad Gita. And the situation is deteriorating every day. 

By just following a maximum of 50 slokas from them one can build the unimaginable exemplary characters and strength of our people. If understanding 50 slokas is difficult, Indians can certainly understand and follow just two slokas in their lives, which can make India the topmost nation. And our priests, leaders and gurus alive must reach to mass rather than talking only in circles of rich clients. I have written earlier but shall repeat if the readers wish so.

Some readers have raised objections for the slokas mentioned in earlier entries of this series as all slokas, if practiced properly, lead to reaching the Brahman that is the universal Self too. It is too difficult to understand for common materialistic people, particularly for the younger, but even the people well-above sixty today keep themselves busy in the worldly life of enjoying their sense-organs and hardly give time for what Hindu scriptures have recommended. However, the main theme in last 3 slokas, where those individual disciplines of life such as getting rid of the desires as they are biggest enemy of a person and to work always without attachment to avoid incurring sin, and keeping oneself untroubled in mind in pain or pleasure as these are temporary. Even if one does not wish for the realisation of Brahman, the person will certainly like to have a happy peaceful life. And the discipline mentioned in those slokas will certainly do that. You may not appreciate that but I can say from experiences of working life that I could not reach where I could have because of no my lack of control over my anger (though that used to be the right reason according to me). It never works actually and does never give peace. You only repent for it when nothing can be done any more to neutralise the effect of your anger and a general impression getting created in your colleagues and superiors. I was advised against my shortcomings even by very senior mature well- wishers. But I could not drop that weakness from my behaviour. Now I am having the next sloka from Chapter 4 of Gita that mentions some very important human disciplines that if not followed creates permanent damages of this divine human life for everyone.

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥4.10॥

Veetaraagabhayakrodhaa manmayaa maam upaashritaah;

Bahavo jnaana tapasaa pootaa madbhaavam aagataah.

Freed from attachment, fear and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of right knowledge of your being, many have attained to My Being.

जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए हैं और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते हैं, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं।

**

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।

समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥4.22॥

Yadricchaalaabhasantushto dwandwaateeto vimatsarah;

Samah siddhaavasiddhau cha kritwaapi na nibadhyate.

Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites* and envy, even-minded in success and failure, though acting, one is not bound.

जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला व्यक्ति कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता।

Some slokas from Bhagwad Gita-5

Sameness and then equanimity 

The attainment of mind-control to keep yourself cool in facing the pairs of opposite-situations has been an important subject propounded in Gita and ultimately it led to the realisation of Brahman for Karma Yoga, Dhyan Yoga, and Gyan Yoga.

It starts right in Chapter 2 with Krishna preaching to Arjuna about the importance of the same in sloka 2.48: 

योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥2.48॥

Yogasthah kuru karmaani sangam tyaktwaa dhananjaya;

Siddhyasiddhyoh samo bhootwaa samatwam yoga uchyate.

By established in Yoga, undertake actions, casting off attachment and equipoised in success and failure. Equanimity is called Yoga.

तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व ही योग कहलाता है।

Here in the above there is only one situation, success and failure. Gita contains many, where one is to have sameness, i.e. between friend and enemy, cold and heat, honour and dishonour, with a lump of earth, stone and gold, good and bad, loss and gain, denunciation and praise, agreeable and disagreeable, pleasant and unpleasant, censure and praise…etc. 

And then from Upanishads, Manusmriti, Gita, Ashtavakra Gita reaches the sameness or equanimity of the Self in all beings and in everything in the universe. The importance of equanimity in our outlook as basic discipline must be brought in day to day life. It is of great importance for a peaceful life. It is something to be internally realised. It has been the subject of many slokas in different chapters and yoga practice too.

This sloka 18 of Chapter 5 is one of the best on the value of having attained समत्व, with the change in the outlook about all the beings in the universe to sameness with the same Self in every one of them.

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥5.18॥

Vidyaavinaya sampanne braahmane gavi hastini;

Shuni chaiva shvapaake cha panditaah samadarshinah.

The learned ones look with equanimity on a Brahamana endowed with learning and humility, a cow, an elephant and even a dog as well as an eater of dog’s meat.

ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।

Almost on the same line is a sloka in Chapter 6 of Gita

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।

साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥6.9॥

Suhrinmitraary udaaseena madhyastha dweshya bandhushu;

Saadhushwapi cha paapeshu samabuddhirvishishyate.

He excels who has the sameness of view with regards to a benefactor, a friend, a foe, a neutral, an arbiter, the hateful, a relative, good people and even sinners.

सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है।

And the next sloka is 

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥15.19॥

Ihaiva tairjitah sargo yeshaam saamye sthitam manah;

Nirdosham hi samam brahma tasmaad brahmani te sthitaah.

Here itself is rebirth conquered by them whose minds are established on sameness. Since Brahman is the same in all and free from defects, therefore they are established in the Brahman. 

जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं।

Why people of every religion, caste all over India are making the total situation worse day by day by making themselves different. We neither appreciate human dignity, nor do we understand the real religion, which thousands of years ago our sages had perceived and called Sanatan keeping in mind the future generations. Why do today’s political leaders and religious leaders not teach the whole country and abroad to live in harmony following the ideas of modern great man Swami Vivekananda on Mahatma Gandhi or many eminent saints? Why every person in all community is busy day and night doing every work thinking of his personal interest?

पूरे भारत के हर धर्म, जाति के लोग क्यों अपने को अलग अलग बनाकर दिन पर दिन बदतर स्थिति बनाते जा रहें हैं। हम न मानवीय मर्यादा में रहते हैं, न असली धर्म को समझते हैं जिसे हज़ारों पहले हमारे ऋषियों ने अपनी आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखते हुये सनातन कहा था। क्यों आज के राजनीतिक नेता एवं धर्मगुरु आधुनिक महापुरुष स्वामी विवेकानन्द के विचारों पर चल पूरे देश और विदेश को एक सौहार्द भाव में रहने की शिक्षा नहीं देते? क्यों हर व्यक्ति, समुदाय अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की सोचते हर काम करने दिन रात व्यस्त है?

Some slokas from Bhagavad Gita-6

Bhagavad  Gita emphasizes on controlling our sense-organs and mind and practice to get rid of some of our weaknesses. I can tell that I suffered badly due to my hot temperament and missed many chances to move up the ladder. But for my anger, there was no one in the organization who could compete with me. As a second example, I shall talk about the desire and how my desire to have big houses built or bought keep accumulating unnecessary things normally not required, brought me in tension and trouble and have been and will be difficult to dispose off including the big collections of books, though I have done my best to give away tonnes of things already till now from the houses that at a life I loved to have. We should have foreseen the changing social system and breaking of the joint family. All three of my sons are settled in the US and not going to return. I would have gone for a two-bedroom apartment. Instead I kept on building big houses (a bungalow in my maternal place where my parents were living, then a three-storied with 4 bed-rooms in every floor in Salt Lake, Kolkata, again a 180sq. mtrs. Kothi in sector 41, Noida and selling them, and then the present one a 4-bedrooms flat in high-rising housing complex, even with scarce resources instead of enjoying life in smaller places. Ultimately now I am looking for a good old age home that can provide all the needs, as we are in our 80s at around 70-80K per month for us. But I have still not succeeded. When one passes away, the home must take care of the left out one even till his or her body is disposed of. However, we both have donated our bodies to the department of anatomy in AIIMS, New Delhi and do not wish to have any functions or karma-kand done after the death. Please take lessons from experiences for a successful career even if you are not spirituality prepared enough or interested in the realization of the ultimate Reality. Following slokas of Chapter are regarding  the same subject where Krishna advises Arjun through him to everyone to achieve these personal disciplines before the end of this life.

1

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्छरीरविमोक्षणात् ।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥5.23॥

Shaknoteehaiva yah sodhum praak shareera vimokshanaat;

Kaamakrodhodbhavam vegam sa yuktah sa sukhee narah.

He, who is still here in this world, before the liberation from the body, is able to withstand the impulse born of desire and anger, is a Yogi, and a happy man.

जो व्यक्ति इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी भी।

2

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्‌।

अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌॥5.26॥

Kaamakrodhaviyuktaanaam yateenaam yatachetasaam;

Abhito brahma nirvaanam vartate viditaatmanaam.

Absolute freedom, Bliss exists on all sides for those self-controlled wise persons who are free from desire and anger, who have controlled their thoughts and who have realized the Self.

काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है

3

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।

विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥5.28॥

Yatendriya manobuddhir munir mokshaparaayanah;

Vigatecchaabhaya krodho yah sadaa mukta eva sah.

With the senses, the mind and the intellect always controlled, having liberation as his supreme Goal, free from desire, fear and anger—the wiseman is verily liberated forever.

जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि जो परमेश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला है, इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।

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कितने श्लोकों में आप समझना चाहते हैं गीता का पूर्ण सार एवं पाना चाहते हैं उसके लाभ?

कितने श्लोकों में आप समझना चाहते हैं गीता का पूर्ण सार एवं पाना चाहते हैं उसके लाभ?
भगवद्गीता भारत की एक अनमोल धरोहर है जिसका दुनिया के सभी मुख्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और वहाँ के विद्वान इसकी देश की नई पीढ़ियों को अच्छे नागरिक जीवन की नींव डालने के लिये ज़रूरी समझने लगे हैं। पर भारत में आम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिये कुछ ख़ास काम नहीं हुआ और बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। कर्मयोग, भक्ति योग, ज्ञान योग तो गीता के विषय हैं ही, पर साथ में गीता में स्थितप्रज्ञ, ज्ञानी, योगी, ज्ञानी, गुणातीत, दैवी सम्पदा युक्त व्यक्तियों के लक्षणों का भी वर्णन भी है जिसमें दिये आचरणों की तालिका को अपने जीवन मूल्य बनाकर भी हम सभी आम लोगों को ब्रह्म तक को प्राप्त कर सकने की चेष्टा की जा सकती है। यह सरल भाव से बताया गया है। पर शायद जीवन में ठीक समय पर इसकी चेष्टा न करने पर यह दुस्तर से दुस्तर होता जाता है। गीता पर हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में बहुत अच्छी व्याख्यायें आ गई हैं। उनमें एक तो ज़रूर हर हिन्दू के घर में होना चाहिये और उसका पाठ और उस पर चर्चा भी होना चाहिये सभी परिवार के लोगों द्वारा साथ बैठ २०-३० मिनट के लिये ही सही नित्य दिन।

मूल भगवद्गीता में कुल ७०० या ७०१* श्लोक १८ अध्यायों में हैं। इतने श्लोक आम व्यक्ति के लिये याद करना बहुत मुश्किल है। अत: समय समय पर इसका समाधान देश के कुछ भगवद्गीता के प्रसिद्ध पंडितों द्वारा सुझाया गया है। रमन महर्षि और स्वामी शिवानन्द ने अलग अलग केवल एक ही उस श्लोक को बताये जिसे उन्होंने समस्त गीता का सार कहा।
रमन महर्षि ने श्लोक १०.२० को वह दर्जा दिया-
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०.२०॥

स्वामी शिवानन्द ने गीता के आख़िरी श्लोक १८.७८ को:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८.७८॥

स्वामी शिवानन्द ने फिर सप्तश्लोकी गीता बता उसे पूरे गीता का सार कहा। यह उन्होंने अपनी गीता की व्याख्या की पुस्तक में दिया है। इन्हें छोड़ गीता प्रेस के श्रोत्र रत्नावली में भी एक सप्तश्लोकी गीता दी गई है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक दस श्लोकीय गीता बनाया है। http://brahmanisone.blogspot.com/search/label/Collections%20of%20Gita%20Verses
महर्षि रमन ने बाद में अपने शिष्यों के कहने पर एक दूसरा चयन किया जिसमें उन्होंने ४२ श्लोकों का संचयन किया जो पूरे गीता के सार की तरह है।यह इंटरनेट पर हैं।http://brahmanisone.blogspot.com/2008/12/selected-verses-from-gita-by-ramana.html


फिर एक ऐसा ही प्रयास कृष्णकृपामूर्ति श्री ए. एसी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के शिष्यों ने उनकी लिखित ‘श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप’के आधार पर पूरे गीता से १०८ श्लोकों का चयन कर किया है। वह भी इंटरनेट पर है-https://prabhupadagita.com/category/108-important-bhagavad-gita-slokas/


पर ये सभी महानुभाव बहुत पहुँचे हुए ज्ञानी थे। मैंने गीता का कोविद के क़रीब तीन वर्षों में पूरा समय अध्ययन किया और यह क्रम अभी भी चल रहा है- नित्य पठन, मनन, चिन्तन द्वारा, अपनी उम्र की कठिनाइयों के बावजूद।


और मैं समझता हूँ कि कुछ ज़रूरी श्लोकों को गीता ज्ञानियों से उतना महत्व नहीं मिला, जितना आज की सामाजिक अवस्था को देखते हुए ज़रूरी हैं और वे उन श्लोकों को लोगों तक ले नहीं गये, क्योंकि कुछ ख़ास वर्गों को उससे नुक़सान होता हुआ दिखा और इसी लिये छोड़ दिये गये। उदाहरण के लिये कृष्ण का अध्याय ९ का २९-३२ श्लोक हैं- श्लोकों को शामिल करने से बहुत सारे प्रचलित दुर्भाव आज समाज से ख़त्म हो जायेगा। जिसे आज की नये पीढ़ी के लोगों को जानना चाहिये और साथ ही अज्ञानी पंडितों की व्याख्याओं को ग़लत कर देगा। उनमें दो श्लोक हैं-कृष्ण कहते हैं-
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥९.३०॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९.३२॥
कितना क्रान्तिकारी संदेश है। हम क्यों वर्ग के कुछ लोगों छोटा समझते हैं, उनसे दुर्व्यवहार करते हैं। यह न करने का उपदेश तो हज़ारों साल पहले उपनिषदों के ऋषियों ने दिया था।
गीता में सभी कर्मों में यज्ञ, दान, तप को कर्त्तव्य कर्म कहा गया है और उनकी सठीक परिभाषा भी बताया है जिसके बारे में शायद ही हिन्दू समाज में कोई सम्यक् समझ है लोगों में और आजतक के आम लोगों के सम्पर्क में आनेवाले तथा कथित पंडितों में।
पंडितों ने सभी धार्मिक पुस्तकों को निहित स्वार्थ के कारण संस्कृत में ही बने रहने दिया और मान्यता दी और मातृभाषा में न लिखे गये और न उन्हें मान्यता मिली। यहाँ तक की कर्मकांड सम्बन्धी पुस्तिकाओं के बारे में भी यही सत्य है और तथाकथित करोड़ों पंडितों के जीविका का आधार कर्मकांड सम्बन्धी पूजा करवाना हो गया है।आज शहरों में इन पंडितों की खासी अच्छी कमाई है, यद्यपि इन पंडितों को संस्कृत का कोई ज्ञान नहीं हो। शायद ही उनमें कुछ उपनिषद् एवं गीता के दो चार श्लोक और सही अर्थ जानते हों। गाँवों की ही हालत तो और ख़राब है। देश में विशेष कर हिन्दी प्रदेशों में इसमें एक बड़ा सुधार बहुत ज़रूरी है, अगर सही हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति बचानी है जिस पर हम गर्व करते हैं, पर जानने समझने कोई कोशिश नहीं करते। हर धार्मिक अनुष्ठान के लिये लिये पंडित खोजे जाते हैं और उनकी फ़ीस आज के डाक्टरों और अध्यापकों की तरह मनमाने भाव से बढ़ते जा रहे है। हिन्दूओं को इस सम्बन्ध में समझ की एवं सुधार की ज़रूरत है। पहले तो जो किये जा रहे हैं वे कितने धर्म की ठीक व्याख्या करते हैं फिर क्या हमारे हिन्दू ज्ञानियों इन्हीं कर्मकांड करने की व्यवस्था बताई थी।


आज मैं भगवद्गीता की चर्चा कर रहा हूँ और मेरे एक संकलन के बारे में बता रहा हूँ। यह संकलन भगवद्गीता के १५० मेरे मनपसन्द श्लोकों का ही है, पर जिसे पढ़ने में केवल बीस मिनट लगते हैं, श्लोक सभी अध्यायों से हैं, और गीता का पूरा सार बता देते हैं। अगर इस सम्बन्ध में किसी का कोई प्रश्न या सुझाव है तो कृपया सम्पर्क करे irsharma@gmail.com हिन्दी या इंग्लिश में।

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Background To My Selection of Favourite Slokas of Hindu Scriptures

Background To My Selection of Favourite Slokas of Hindu Scriptures

My interest in memorising verses from religious books started during my early school days in my native village. My grandfather was a teacher at Birlapur, near Calcutta in Bangal, which is now West Bengal after partition in 1947. He had been living alone there with one of my uncles. Once when he came during some vacation, he invited Shri Gangadyal Pandey, recently appointed government teacher of the village primary school to live with our family and be our tutor. Tulsidas’ Ramcharitmanas and another equally popular book those days, ‘Radheshyam Ramayan’ were available with us at home. We started reading and memorising some popular verses from them for the competition of the Antakshari, that Pandeyji would organise quite often with groups of school students. Interestingly, Radheshyam Ramayan was a handwritten one. My grandfather and some of his students had copied it in their own hand-writing . I wonder even now how difficult it would have been for them to complete such a huge book. My grandfather had told me once on my query that he did it to improve his own handwriting. I have a few pages of it even now with me. It was in very readable simple Hindi unlike the regional dialect Awadhi used by Tulsidas. I do not know if it is today available as printed book.

However, even in those days I got advice through a few Sanskrit slokas too. Our teachers and other elders used to quote them very frequently. I remember two:
1
काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥
‘A student should be alert like a crow, have concentration like that of a crane and sleep like that of a dog that wakes up even at slightest of the noise. The student should eat too much. Also he should stay away from daily household affairs.’
2
As I remember, the other sloka started with ‘विद्यां ददाति विनयं’..विनयाद् याति पात्रताम्।..’ ‘Knowledge gives us humility, with humility comes merit.’ I do not know if the parents these days will vouch for that method for improving the conduct of their school going children.

In 1950, both myself and my uncle moved to Birlapur and got admitted into Birlapur Vidyalaya straight in class six and started regular education. My grandmother this time was with us. In those days, Sanskrit was a subject for the high school final examination. We had to study it for four years from class 7. I could hardly love it enough to pursue it after the school days to appreciate its richness. The ‘pandit-mosay’ teaching was too harsh on us. That might be the reason for my lost love. But I spent most of my student life till I became a qualified engineer with my grandfather. He kept on mending and motivating me with help of the verses of English and Sanskrit. Let me quote one English one first-“Early to bed and early to rise; That makes a man healthy, wealthy and wise.” He would also recite the famous shloka from Bhagwad Gita, “या निशा सर्वभूतानामं, तस्या जागर्ति संयमी”… (2.69) quite often and explain. Early sleeping and getting up got built into my lifestyle and still continues at 82+. All that I have studied or written, some available on my site or published, was done in early morning hours between 3 AM and dawn.

I vividly remember one day of 1957. I was appearing for my final examination of Intermediate Science from Presidency College, Calcutta. It was the day when I was very much confused and morose during the break time between the examination scheduled in two sessions. The first paper of Chemistry in the first half of the day was very tough. Many of my friends in Eden Hostel had decided to drop. In that break time, suddenly I found my grandfather entering my hostel room. He heard quietly my worry and then his advice came promptly this time too in a Gita sloka ,“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा भलेषु कदाचन..(2.47). I appeared and succeeded with pretty good scores. Interestingly in IIT, Kharagpur, the Institute’s logo was ‘योग: कर्मसु कौशलम्’. My grandfather had only explained its source (the famous sloka of Bhagavad Gita, (2.50) in one of his regular visits to Kharagpur. I ponder now why someone out of the Institute’s faculties could not have done that in a pretty elaborate manner in the initial academic programme of orientation talks for the benefits of the fresh students. Perhaps, they did not find that necessary. All those good advice of the early years made me succeed in everything I pursued in my life till date and to overcome many hurdles in life.

I started my career at Hindustan Motors in 1961. I became engrossed in worldly means of enjoyment with friends and got totally distanced from our religious duties. Only the teachings of childhood helped me to dedicate myself to hard work and be successful in a professional career. In 1966, Yamuna, my wife, joined me at Hindustan Motors residential complex. I gradually returned to our religious practices, such as pujas, ‘vratas’, celebrations of festivals etc. at home. Over the years, we got three sons (hoping the third one to be a girl child, however that was not to happen). I had to be an example for my children and cousin brothers too. And one day, after a gala night function on occasion of a new year’s eve at HM club, I vowed to drop drinking and resort to vegetarian foods forever and that I have followed strictly till today.

I don’t remember exactly when I started regular morning puja before going to my work. I started with the reading of some portions of the Ramcharitmanas without fail in Yamuna’s puja room. This interest grew with time. I had seen my grandfather completing Ramcharitamanas every month (Masaparayana) and then even in nine days (Navaparayana) in two Navratri festival times in the year. By 1990, I also started doing that. And this interest grew more intensively over the years. I did carry on with that under all odd conditions. It continued even while travelling in the country or abroad too. Sometimes, I had to get up very early in the morning for that. That practice had become a routine part of my life at that time at Hindustan Motors till I shifted to live in our house in Salt Lake that was built.

In 1997, I retired from Hindustan Motors under the newly started rule of the then new young Chairman. I completed 37 years in Hindustan Motors, Uttarpara. Thereafter, I joined Harig Crankshaft as President. In late December 1999, I had a heart attack in the factory and had to undergo open-heart surgery at Escort Hospital, New Delhi in early 2000. Every routine got disturbed. After a month, I started going to work. However in October 2000, I found I was the same person working for 12-16 hours a day in HM. I decided to take full retirement from professional work yielding to my conscience that was welcomely consented by my children. I completed my last technical book, ‘Latest Trends in Machining’ available on http://www.drishtikona.com. I started giving more time for morning puja. After that, I focused more on long and regular morning walk and reading good latest books on current subjects, mainly on ancient Indian history and current topics, and biographies. We visited many places of tourist importance in India. But the puja continued with praying as the first thing after getting up in morning, followed by the reading of full ‘Sundarkand’ of Ramcharitmanas after the morning bath every day without fail.

On 24th April 2000, I came across, ‘The Curative Powers of the Holy Gita’- a book with about 33 Slokas of Bhagawad Gita compiled by one T. R. Seshadri* and bought it. Soon I started reading its all slokas in the early morning puja. The love story of Gita had started. Very soon, I added the whole passage on स्थिप्रज्ञता from chapter 2 of Gita and then some Slokas of Upanishads. All those were in a booklet published by the Gandhi’ ashram in my morning puja that I had for long time. Over a period, I memorised them.

All the three sons had got well-settled in the US. I saw my life is slowly inching towards the ‘van-prastha’ stage unknowingly that our ancient sages suggested.

COVID-Era brought a big change in living style

With the onslaught of the Covid-19 pandemic in early 2000 and its total lock out thereafter, when we got almost imprisoned in our apartment. I switched over to a serious study of Bhagwad Gita and thereafter major Upanishads. Over a period, I procured the commentaries of Gita and Upanishads authored by a number of reputed wisemen. (#)
Every day in the early morning, I spent hours on studying all the commentaries one by one and revisiting them again and again. I kept on noting down some good slokas of my liking in my yellow notebook and memorising them in day time. With my advanced age, isolation and perhaps maturity, I started appreciating the knowledge provided in them more and more. I enjoyed every bit of it as it threw some new light almost every time I picked up one of those slokas again. The culture of deep understanding of the issues imbibed during my hard work in different fields requiring different technical knowledge and it’s experiences helped me here too. The content of these scriptures became easier and I felt sometimes overjoyed when I looked back at my work life issues and even domestic issues. I can say honestly, many times only some divine solutions come in our mind and help in getting our worldly problems solved. It has happened many times with me.

My motivation behind this compilation of Best Slokas of Bhagavad Gita

As I went on studying different books, and commentaries on Gita, I came to know that few such attempts have already been made by some of our great wisemen in modern India.

  1. Bhagavan Ramana Maharshi (Born: 30 December 1879, Died: 14 April 1950.)
    A visiting Pandit (wise man) once requested Bhagavan Ramana Maharshi to select the best slokas of Bhagavad, as the Gita as such contains a total of 700 slokas. That becomes very difficult if not impossible to keep in mind for a normal person. The selected ones must be just enough in number to remember and understand the message of the whole of Bhagavad Gita. Bhagavan Raman thereupon first mentioned only verse 20 of Chapter X verse saying it is one sloka that provides the essence of Bhagavad Gita.
    अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
    अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
    हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥
    ‘I am the Self, Oh Gudakesa (Arjun), dwelling in the Heart of every being; I am the beginning and the middle and also the end of all beings.’
    Later on, Maharshi Ramana also selected forty-two verses that represented the whole of Gita that provides its essence and can easily be remembered by the interested ones. (http://brahmanisone.blogspot.com/2008/12/selected-verses-from-gita-by-ramana.html )
  2. Swami Sivanand (8 September 1887 – 14 July 1963)
    Swami Sivanand of The Divine Society has advocated another one such sloka in his commentary on Bhagavad Gita and called it एकश्लोकीय गीता. That is the last sloka 18.78 of Bhagavad Gita, with which Sanjaya concludes Gita.
    यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
    हे राजन! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है.
    Wherever is Krishna, the Lord of Yoga, wherever is Partha, the archer, there are prosperity, victory, happiness and sound policy; this is my conviction.
    Swami Sivananda has also selected seven Slokas that contain the essence of the whole Gita and called it सप्तश्लोकी गीता with 7 Slokas (8-13,11-36,13-13,8-9,15-1,15-15,9-34).
    There are more सप्तश्लोकी गीता recommended by wise men. Swami Dayanand Saraswati has selected ten most representative best Slokas of Gita. http://brahmanisone.blogspot.com/search/label/Collections%20of%20Gita%20Verses
  3. Swami Vivekanand (12 January 1863— 4 July 1902)
    Vivekananda in ‘The Mission of Vedanta’ writes, “ …Aye, if there is anything in the Gita that I like most, is in these two verses, (XIII 27, 28) coming out strong as the very gist, the very essence, of Krishna’s teaching:
    समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्
    विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥13.27॥
    He who sees the supreme Lord dwelling in all beings, the Imperishable in things that perish, he sees indeed.
    समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
    न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥13.28॥
    For seeing the Lord as the same, everywhere present, he does not destroy the Self by the self, and thus he goes to the highest goal.”
  4. Swami Prabhupada, Founder of ISKON (1 September 1896-14 November 1977) A group of his learned disciples have published a collection of 108 best Slokas of Gita based on his commentary on Bhagavad Gita, published in 1972. One of my contemporary and engineer friend N S Ramakrishnan uses these for online management training tools.
    https://prabhupadagita.com/category/108-important-bhagavad-gita-slokas/

My own attempt to select ‘My Best of Bhagavad Gita’ slokas.

Over the years, I have picked up about 250 Slokas of Bhagavad Gita now judging from my own experiential views. I have identified 150 Slokas of them (in dark italics with font size 16 in the collection) as an appropriate one that one can memorise easily if there is a strong will. I have memorised them and many more from the bigger collection as on today. If now at 82+, I have been able to memorise more than 250 including Upanishads in two years of lock out of COVID- pandemic, it should be possible for the interested persons to do it.

Very soon I lost my madness about the writings on political, social economic issues, reading newspapers, and wasting time on tv with useless serials. I also stopped watching news channels and hearing the fake news and useless debates through howling at each other by so-called representatives of the common people. Earlier I thought my writings on Facebook and blogs bring changes among highly politicised friends and acquaintances for having a society with its clear identity. I was just totally mistaken. Today the world has changed.Even for getting something published, you need a lot of contacts and different skills. I never had it.

The collection on my website should also help in understanding the universal messages of Upanishads and Bhagavad Gita without any price.

Another idea was to improve on my own spiritual strength and to train myself to work without a desire for any fruit, giving up as much as I can.

I still think as the devotee chants a name or a mantra, the repetition of the Slokas of Upanishads and Bhagavad Gita again may correct mine and others’ conduct and help in becoming good human beings.

I repeat the memorised Slokas as many times as I get the opportunity. I keep my mind busy while walking alone through repeating these Slokas. It gives me great personal satisfaction and happiness because of a hope that I shall succeed in the remaining years of my physical existence in this body form to be a better man, if not enlightened in this life.

After Gita I decided to include some slokas from the major four Upanishads- Isha, Kena, Katha, and Manduka in my favourite list of slokas in the yellow notebook.

My inspirations in selecting favourite slokas of Upanishads

Some great persons of the nineteenth and twentieth centuries, whom we all know and highly respect, have often quoted some from Upanishads, as they truly represent the pinnacle of Hindu spiritual philosophy.

Vivekanand’s love for the following verse from Katha Upanishad is well known:
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।१.३.१४॥

Mahatma Gandhi’s view on the first sloka of Ishopanishad was eye-opener for me. I am giving that one for Mahatma Gandhi wrote:
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥1॥
“During the last few months (I have studied the Ishopanishad), and I have now come to the final conclusion that if all the Upanishads and all other scriptures would have been suddenly destroyed for some reason and if only the first verse of the Ishopanishad would have been in the memory of Hindus Even if this first Sloka was in the memories of some Hindus, Hinduism would have lived forever.”(“पिछले कुछ महीनों के दौरान (मैंने ईशोपनिषद् का अध्ययन) किया है, और मैं अब अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यदि सभी उपनिषद और अन्य सभी धर्मग्रंथ अचानक से किसी कारण से नष्ट हो गए होते और यदि ईशोपनिषद का केवल पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति में ज़िन्दा रहता, तब भी हिंदू धर्म हमेशा जीवित रहता।”)
Eknath Easwaran in his book, ‘The Upanishad’ has written, “ What Gandhi had in mind with his great tribute, he made clear in his reply to a journalist who wanted the secret of his life in three words: “Renounce and enjoy!” (tena tyaktena bhunjitah) from the same first verse.
(अमरीका में गीता, उपनिषद् आदि के विद्वान प्रोफ़ेसर भारतीय मूल के एकनाथ एश्वरन गांधी के उपरोक्त विचार के बारे में अपनी पुस्तक ‘Upanishads’ में लिखा है-“गांधी ने अपने पहले श्लोक के विचार को और स्पष्ट किया था एक पत्रकार के अपने पहले के प्रकट किये विचार संम्बन्धी सवाल के जवाब में. पत्रकार को जो उनके जीवन के रहस्य को तीन शब्दों में जानना चाहता था, गांधी ने जवाब दिया- “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” मेरे जीवन का रहस्य है जो ईशोपनिषद् के पहले श्लोक का अंश है।”)

The great creators of the constitution of India included a great phrase from Mandukopanishad:
सत्यमेव जयते नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत्‌ सत्यस्य परमं निधानम्‌ ॥३.१.६॥
My own preference go for one another sloka rom Ishopanishad:
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥7॥
Upanishads though may appear different, but the main goal of the sages of the Upanishads was one. They all tell about how to realise the Self or Brahman, the Ultimate Reality in their own way.

These days I read my yellow note-book that has about 300 Slokas of Bhagavad Gita, Upanishads and some portions of Ramcharitmanas. After bath, I get back to the puja room and read the full Sunderkand before lunch. And in the evening I read with my wife Chapter 15 of Bhagavad Gita before our dinner. She blows a conch-shell at the end.
An essential note for readers
I tried to limit or exclude those slokas specifically giving the nature of persons with lower state of mind such as aasuri or tamasik, rajasik because of the actions in previous lives or because of getting into the bad company of people of lower nature in the early part of life or in the absence of a proper example or guide. The ultimate objective of Gita propounded is that any person though he may have a tamasik nature initially, must try to improve himself to rajsik and then to sattavik. In the same way, in varnas, the objective was to improve upon from the Surda to vaishya, then to kshatriya and then Brahmin.

However, for realising the the Ultimate Reality, Atman, Purushottam or Brahman used as synonyms in Upanishads and Gita as well one must go beyond sattvik level too and to become गुणातीत, ‘gunateeta’. Bhagavad Gita has given in great detail the shortcomings of Rajshik , Tamasik, and Aasuri nature in Chapter 14 , 16 and 18 . Anyone interested in knowing about them, can always go back to the Gita with original Slokas in Sanskrit and varying commentaries in all languages by many wise men. I have also included a few slokas giving Krishna views about the class of persons whom the pundits guiding the society over years had abandoned them totally. Refer to the slokas 9.29- 32 such as:
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌ ॥९.३२॥
These Hindu scriptures were and are for every human being of any caste, faith and country. Any can go through it freely, practise it and get benefitted.

  1. To give a total glimpse of the Hindu Ancient Scriptures I added just a few Slokas from Vedas. With these additions, I hope my collections will be more comprehensive.

I hope this compilation will be useful for my children and their friends in the US, who left this country much before they would have come to know about these scriptures and it’s basic philosophy. Even in India, over the years, the newer generations get educated in English media copying the western system and giving value to their norms. I am sure people will gradually get interested in studying the basics of spiritual knowledge too along with secular knowledge. Particularly after a particular time in life, as we age we start losing our interest in what we had been doing and need guidance or knowledge about something more than the secular knowledge that we keep on gaining over years in life. Life is more than enjoying life in getting wealth required for satisfying our sensual needs or in the preservation of wealth for the future generation. It has happened to me. Today I realise over time that I have wasted energy and money in collecting and their preservation for these worldly things in our life. But the end, though may be a very painful one sometimes, is unavoidable. All your favourite procured and preserved things with so much pain will be sold to kabadi only. When I look at my huge collections of books at different stages of life or the almirahs and boxes full of clothes and other items, mostly of my wife or by her, I feel really shocked and sad to think of its value now. I hope this collection will serve as an initiation in spiritual knowledge for everyone of all ages, and provide help to understand the need of simple life with minimal essential things. Unfortunately, till you are two, the wishes of one may not come true.
However before I end this introduction, I shall like to emphasise that those verses that are not part of this collection, may be equally important for some. I appeal to every serious interested person to do one customised collection like this one for himself and to leave it back as a legacy. Every Indian must keep a Bhagwad Gita and an Ishopanishad or Kathopanishad in their home library with commentaries in the language one is most comfortable with.

One understands, gets benefited, and enjoys Bhagwad Gita more if he treats himself as Arjuna and Shri Krishna as Self. I have tried and found its benefits. It will certainly help us in attaining integration of our personality- of the body, intellect, and soul or Self, and be a good person certainly by getting over some of our weaknesses such as greed, anger, desire, etc. and start respecting fellow beings over the years of the beginning of the reading and understanding it maturely. I wish I could have started seriously to go through the scriptures much earlier in my life.

I intend to keep some blank pages at the end of each main section of this collection so that the readers can replace and add some other verses too. I shall always like to get a comment on my email: irsharma@gmail.com . Please do send.

*I came to know only February 2022 from a letter from Shri T S R Murthy, my close friend at Hindustan Motors and neighbour to Dr.T. R. Seshadri was his brother, had graduated from IIT, Kharagpur in 1958, and held many top positions in government organisations, and also wrote two books on engineering and beside the book I referred to, he also authored ‘Hinduism Revisited’ and passed away in January 2022.

Reference books

Books that I studied to understand Bhagavad Gita after we got imprisoned in our apartment and I had to cook also for our survival. This was something that I had never done ever.

These books were all bought online. The names of the books are in order I laid my hand first and selected to go through and went through them one by one and then a number of time, to understand the content that was totally new to me but perhaps that existed there dormant because of the Here are the lists of books on Bhagavad Gita first, followed thereafter with those on Upanishads:

Bhagwad Gita
I started with ‘Bhagwad Gita as it is’ by A. C. Bhaktivedanta swami Prabhupada both Hindi and English versions
• Swami B. G. Narsingha
• Swami Chinmayananda The Holy Gita and Hindi translation by Swami Tejomayananda
• Bhagwad Gita for Daily Living by Eknath Easwaran
• Swami Sivananda, The Divine Society
• ‘God with Arjuna- Bhagavad Gita by Paramhans Yogananda and its Hindi translation.
• श्रीमद्भगवद्गीता गीता (साधक- संजीवनी) by Swami Ramsukhdas in Hindi, Gita Press
• Bhagavad Gita of Madhusudan Sarasvati With the Annotation ‘ Gudharthak Dipika, translated by Swami Gambhirananda, Advaita Ashrama
• Bhagavad Gita with the commentary of Sankracharya, translated by Swami Gambhiranand
• Swami Chidbhavananda Kindle edition
• Universal Message of the Bhagavad Gita by Swami Ranganathananda
(3 volumes)
Internet site 1. Aravinda: http://bhagavadgita.org.in/Chapters
Internet site of IIT, Kanpur: https://www.gitasupersite.iitk.ac.in

Ver recently I found a book in Hindi where all Gita slokas are translated in poem form in Hindi. (संस्कृति-संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (मूल और पद्यानुवाद), पृष्ट १९१-२४७). हिन्दी प्रेमियों को देखना चाहिये।

Upanishads
I got introduced to Upanishads through Eknath Easwaran’s ‘The Upanishad’, JAICO Publishing House. That made me look into गीता प्रेस प्रकाशन के कल्याण पत्रिका के तेईसवें वर्ष के विशेषांक, ‘उपनिषद् अंक’ and I find interesting as well easy for me to understand in Hindi almost all major Upanishads. It was there in my personal library for many years.

Other books that I bought and went through were-

‘Eight Upanishads’ in two volumes with commentary of Sankracharya by Swami Gambhiranand.

‘The Brihadaranyaka Upanishad’ by Swami Sivananda with his wonderful commentary in English

‘The Upanishads’ (6 Upanishads- Ishavasya, Kena, Mandukya, Katha, Prashna, and Mundaka) in two volumes Sri M- with lucidly explained commentaries of Slokas.

‘The Upanishads’ in two volumes by Nikhilanada published Advaita Ashrama
‘The Mandukya Upanishads with Gaudapada’s Karika and Sankara’s commentary
‘ईशादि नौ उपनिषद्’– व्याख्याकार हरिकृष्णदास गोयन्दका, गीता प्रेस

‘The Message of the Upanishads by Swami Ranganathananda, Advaita Ashram

Kathopanishad- A Dialogue with Death; Isavasya Upanishad- God in and as everything; Mundakopanishad- Tale of Two Birds: Jiva and Isvara: commentary by Swami Chinmayanand and translated in Hindi by Swami Tejomayananda.

Two important Internet sites for Upanishads and Gita:

Paramahansa Yogananda – http://yogananda.com.au/upa/Upanishads01.html
Arvinda https://upanishads.org.in/upanishads


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उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष-

उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष- जो दुनिया को बचा सकते थे,हैं अगर धर्म के सदस्य कम से कम यह मान लें जो बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष दर्शन है।

भारत के ब्रह्मज्ञानी ऋषियों का दुनिया के सभी व्यक्ति-विशेष एवं अपने समाज,देश,पूरे विश्व की व्यक्तिगत एवं सामूहिक समृद्धि शान्ति के लिये अति आवश्यक संदेश है। साथ ही यह सब भूतों को श्रद्धा की दृष्टि से देखने एवं उनके अच्छे जीवन यापन पर ध्यान रखने की इस धरती की आबोहवा एवं वातावरण को हमारे जीवनयापन के अनुकूल करने का सर्वाधिक ज़रूरी आवश्यक संदेश
भी देता है। इसके अभाव का फल हमें भुगतना पड़ता है जैसे आज हमारे चारों ओर हो रहा हर समय हर जगह, क़रीब क़रीब हम सभी देश एवं मनुष्य जाति के सदस्यों के द्वारा।
उपनिषदों का पहला संदेश इसके एक अति प्राचीनों में एक ईशोपनिषद में है:
१. ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’- ‘ब्रह्म जगत के सबमें ब्रह्म का वास है।’ ‘īśā vāsyamidaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat |‘ All in the world is enveloped by the Lord.’ आप शरीर में अशरीरी ‘आत्मा’ का वास है। एक इतने प्रसिद्ध केनोपनिषद् में इस शक्ति के बारे में कहा है-‘आत्मना विन्दते वीर्यं’,व्यक्ति को आत्मा से वीर्य (शक्ति) प्राप्त होता है; ’ātmanā vindate vīryaṁ’-by the self one finds the force to attain;(2.4)।उसकी महिमा एवं शक्ति को समझ एवं वह हर विधा में सर्व शक्तिशाली है। उसके की पूजा श्रद्धा कर अपने इस शरीर से अपनी इच्छित इच्छाओं को प्राप्त कर सकते हैं इसी जीवन है, जिसके उदाहरण इतिहास एवं आज भी भी आपके चारों ओर तरफ़ देख सकते हैं।उस आत्मा के बल से ही कहा गया है, ‘पङ्गुं लङ्घयते गिरीम्’, ‘पंगु चढ़ गिरिवर गहन’,It causes the lame to scale mountain tops’. आपके सामने है एक पैर कट जाने के बाद भी अरूनिमा सिन्हा एवरेस्ट पर चढ़ गईं।https://economictimes.indiatimes.com/magazines/panache/arunima-sinha-worlds-first-woman-amputee-to-scale-everest-now-has-a-doctorate/articleshow/66541484.cms?from=mdr.
प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफ़ेन हॉकिंग की Stephen Hawking की कहानी दुनिया हर बच्चा बच्चा जानता है-https://en.wikipedia.org/wiki/Stephen_Hawking.
दूसरा संदेश सबमें एकत्व है।
२. सभी जीवों में ब्रह्म है और मैं भी वही ब्रह्म हूँ । यह दिन चार वाक्यों में में तीन ब्रह्मवाक्य कहते हैं- १.
‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि।’- ‘मैं ब्रह्म हूँ’ -बृहदारण्यको उपनिषद् १.४.१० यजुर्वेद से।

‘ॐ तत्त्वमसि।’- ‘वह ब्रह्म तू है’ – छान्दोग्योपनिषद् ६.८.७ सामवेद से।
‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म।’- ‘यह आत्मा ब्रह्म है’- माण्डूक्योपनिषद् १-२ अथर्ववेद से।

सभी भूतों में एक ही आत्मा है जो ही ‘ब्रह्म’है- सभी मनुष्य, जीव, पेड़,पौधे, जलाशय, पर्वत, आदि…में बिना किसी देश,प्रदेश, जाति, धर्म, रंग, लिंग,गरीब, अमीर, मोटे पतले, बच्चा, युवा,वृद्ध आदि के अन्तर से। फिर क्यों आपसी द्वेष, कलह, युद्ध, घृणा, आदि नकारात्मक एवं हिंसा के भाव, क्यों इस बराबरी की, एकत्व की पहचान कराना सभी को हम हर एक का प्रथम धर्म हो। सबसे पहले हिन्दू समाज या अपने को हिन्दू कहने वाले नहीं समझते और समझाते। सबसे आश्चर्य की बात है कि जिनको इसे समझाने का अधिकार है वे ही इसे नहीं समझते।सदियों की ग़ुलामी एवं व्यापक ग़लत अशिक्षा का प्रसार और तथा कथित अज्ञानी पंडितों का स्वार्थ इसी शिक्षा पोषण इतना गहरे जा चुका है कि वह हमें केवल अंधकार अंधकार ही चारों ओर दिखता है। खैर, देश का विभिन्न क्षेत्रों का नेतृत्व जिनके हाथ में है उन्हें ही यह करना होगा।
यहाँ हम इसके सम्बन्ध में प्राचीनतम ग्रंथों से हाल तक के उन दिव्य ग्रंथों से लिये श्लोकों एवं अन्य रूप में इस विषय पर ज़िक्र करूँगा ।
ईशोपनिषद् का हज़ारों साल पहले ही एकत्व भाव दो श्लोकों में साफ़ साफ़ यही निर्देश देता है-
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
ऐसा ही भाव क़रीब क़रीब सारे उपनिषदों में कहा गया है।

फिर महाभारत काल या उससे भी पहले की रचना भगवद्गीता में इस विषय ‘सबमें एक ही आत्मा की बात को बार बार विभिन्न रूपों क़रीब क़रीब सभी अध्यायों में कहा गया है। विशेषकर अध्याय ६ एवं अध्याय १३ में-
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६.२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६.३१॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६.३२॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९.६॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌ ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२७॥
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ॥१३.२८॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१३.३०॥
और उपरोक्त धर्मग्रंथों को बाद में अष्टावक्र रचित
अष्टावक्र गीता
सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥६॥
sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |
vijñāya nirahaṃkāro nirmamastvaṃ sukhī bhava || 6 ||
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥

All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

अष्टावक्र गीता

सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥१५.६॥
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥
इसके पहले अध्याय ६ के चौथे श्लोक में कहा है-‘अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि’ I am, indeed, in all beings and all beings are in Me, this the true knowledge.
Unity in Diversity: All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

https://www.narayanseva.org/blog/15-inspirational-people-with-disabilities
https://wecapable.com/famous-disabled-people-world/
https://www.sunrisemedical.co.uk/blog/famous-people-with-disabilities

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उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष- जो दुनिया को बचा सकते थे,हैं

उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष- जो दुनिया को बचा सकते थे,हैं अगर धर्म के सदस्य कम से कम यह मान लें जो बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष दर्शन है।

भारत के ब्रह्मज्ञानी ऋषियों का दुनिया के सभी व्यक्ति-विशेष एवं अपने समाज,देश,पूरे विश्व की व्यक्तिगत एवं सामूहिक समृद्धि शान्ति के लिये अति आवश्यक संदेश है। साथ ही यह सब भूतों को श्रद्धा की दृष्टि से देखने एवं उनके अच्छे जीवन यापन पर ध्यान रखने की इस धरती की आबोहवा एवं वातावरण को हमारे जीवनयापन के अनुकूल करने का सर्वाधिक ज़रूरी आवश्यक संदेश
भी देता है। इसके अभाव का फल हमें भुगतना पड़ता है जैसे आज हमारे चारों ओर हो रहा हर समय हर जगह, क़रीब क़रीब हम सभी देश एवं मनुष्य जाति के सदस्यों के द्वारा।
उपनिषदों का पहला संदेश इसके एक अति प्राचीनों में एक ईशोपनिषद में है:
१. ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’- ‘ब्रह्म जगत के सबमें ब्रह्म का वास है।’ ‘īśā vāsyamidaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat |‘ All in the world is enveloped by the Lord.’ आप शरीर में अशरीरी ‘आत्मा’ का वास है। एक इतने प्रसिद्ध केनोपनिषद् में इस शक्ति के बारे में कहा है-‘आत्मना विन्दते वीर्यं’,व्यक्ति को आत्मा से वीर्य (शक्ति) प्राप्त होता है; ’ātmanā vindate vīryaṁ’-by the self one finds the force to attain;(2.4)।उसकी महिमा एवं शक्ति को समझ एवं वह हर विधा में सर्व शक्तिशाली है। उसके की पूजा श्रद्धा कर अपने इस शरीर से अपनी इच्छित इच्छाओं को प्राप्त कर सकते हैं इसी जीवन है, जिसके उदाहरण इतिहास एवं आज भी भी आपके चारों ओर तरफ़ देख सकते हैं।उस आत्मा के बल से ही कहा गया है, ‘पङ्गुं लङ्घयते गिरीम्’, ‘पंगु चढ़ गिरिवर गहन’,It causes the lame to scale mountain tops’. आपके सामने है एक पैर कट जाने के बाद भी अरूनिमा सिन्हा एवरेस्ट पर चढ़ गईं।https://economictimes.indiatimes.com/magazines/panache/arunima-sinha-worlds-first-woman-amputee-to-scale-everest-now-has-a-doctorate/articleshow/66541484.cms?from=mdr.
प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफ़ेन हॉकिंग की Stephen Hawking की कहानी दुनिया हर बच्चा बच्चा जानता है-https://en.wikipedia.org/wiki/Stephen_Hawking.
दूसरा संदेश सबमें एकत्व है।
२. सभी जीवों में ब्रह्म है और मैं भी वही ब्रह्म हूँ । यह दिन चार वाक्यों में में तीन ब्रह्मवाक्य कहते हैं- १.
‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि।’- ‘मैं ब्रह्म हूँ’ -बृहदारण्यको उपनिषद् १.४.१० यजुर्वेद से।

‘ॐ तत्त्वमसि।’- ‘वह ब्रह्म तू है’ – छान्दोग्योपनिषद् ६.८.७ सामवेद से।
‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म।’- ‘यह आत्मा ब्रह्म है’- माण्डूक्योपनिषद् १-२ अथर्ववेद से।

सभी भूतों में एक ही आत्मा है जो ही ‘ब्रह्म’है- सभी मनुष्य, जीव, पेड़,पौधे, जलाशय, पर्वत, आदि…में बिना किसी देश,प्रदेश, जाति, धर्म, रंग, लिंग,गरीब, अमीर, मोटे पतले, बच्चा, युवा,वृद्ध आदि के अन्तर से। फिर क्यों आपसी द्वेष, कलह, युद्ध, घृणा, आदि नकारात्मक एवं हिंसा के भाव, क्यों इस बराबरी की, एकत्व की पहचान कराना सभी को हम हर एक का प्रथम धर्म हो। सबसे पहले हिन्दू समाज या अपने को हिन्दू कहने वाले नहीं समझते और समझाते। सबसे आश्चर्य की बात है कि जिनको इसे समझाने का अधिकार है वे ही इसे नहीं समझते।सदियों की ग़ुलामी एवं व्यापक ग़लत अशिक्षा का प्रसार और तथा कथित अज्ञानी पंडितों का स्वार्थ इसी शिक्षा पोषण इतना गहरे जा चुका है कि वह हमें केवल अंधकार अंधकार ही चारों ओर दिखता है। खैर, देश का विभिन्न क्षेत्रों का नेतृत्व जिनके हाथ में है उन्हें ही यह करना होगा।
यहाँ हम इसके सम्बन्ध में प्राचीनतम ग्रंथों से हाल तक के उन दिव्य ग्रंथों से लिये श्लोकों एवं अन्य रूप में इस विषय पर ज़िक्र करूँगा ।
ईशोपनिषद् का हज़ारों साल पहले ही एकत्व भाव दो श्लोकों में साफ़ साफ़ यही निर्देश देता है-
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
ऐसा ही भाव क़रीब क़रीब सारे उपनिषदों में कहा गया है।

फिर महाभारत काल या उससे भी पहले की रचना भगवद्गीता में इस विषय ‘सबमें एक ही आत्मा की बात को बार बार विभिन्न रूपों क़रीब क़रीब सभी अध्यायों में कहा गया है। विशेषकर अध्याय ६ एवं अध्याय १३ में-
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६.२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६.३१॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६.३२॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९.६॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌ ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२७॥
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ॥१३.२८॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१३.३०॥
और उपरोक्त धर्मग्रंथों को बाद में अष्टावक्र रचित
अष्टावक्र गीता
सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥६॥
sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |
vijñāya nirahaṃkāro nirmamastvaṃ sukhī bhava || 6 ||
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥

All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

अष्टावक्र गीता

सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥१५.६॥
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥
इसके पहले अध्याय ६ के चौथे श्लोक में कहा है-‘अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि’ I am, indeed, in all beings and all beings are in Me, this the true knowledge.
Unity in Diversity: All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

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