एक मज़ेदार सप्ताह, अनायास अनपेक्षित प्रसन्नता 

16.06.2016 सबेरे प्रात: भ्रमण से लौटा, कल के बारिस और तूफ़ान से गिरे फूलों के पौधों को बाँध कर सीधा किया. चाय के समय पुच्चु और सैन्नन भी साथ थे. फिर जैक एम्मा को स्कूल तक का साथ दे लौट आया. पुच्चु जी आफ़िस जाते भी मिले. फिर कुछ पढ़ने लिखने का काम किया. यमुना ब्रेक फ़ास्ट माँगी तो सीरियल दही के साथ निकाला. गरमी के कारण भीतर बैठ खाने लगा सोफ़ा पर, यमुना खाने के टेबल थीं. अचानक ऊपर से सीढ़ी उतरते राकेश को देखा तो स्वप्न सा लगा, फिर सम्भल आशीर्वाद दिया. राकेश कल रात ११ बजे ही आ गये थे. कल रात हमारे सो जाने के बाद पुच्चु सैन्नन जा उसे एअरपोर्ट से लाये थे. सबने मुझे बडी सावधानी से छकाया. और फिर हम चाय दिये, सैन्नन सीरियल का नाश्ता और राकेश से इधर उधर की बातें करते रहे.. कुछ देर बाद यमुना नहाने गईं, आईं पूजा पर बैठ गईं. कुछ देर बाद फिर कुछ सरगर्मी हुई, पूजास्थल के पास हँसी बौछार हो रही थी. केशव रमन खड़ा था, दादी को प्रणाम कर रहा था. केशव रमन भी आया है कल रात न सैन्नन बताई, न राकेश. आज के लड़के आश्चर्य चकित करने में हो गये हैं. पर हम ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. यही है प्रियजनों से मिलने का आनन्द. बहुत सालों के बाद इनसे मिला. बातचीत का सिलसिला ……..यमुना की राकेश , केशव से खाने पीने की मनुहारें……..जबतक यमुना की पूजा ख़त्म हुई, मैं दाल बना चुका था, नहाने के बाद चावल बना, और हम पूजा कर खाने पर बैठे.. केशव केवल दाल, दही खाया. राकेश अच्छी तरह खाया, मेरी बनाई सब्ज़ी एवं छोले की प्रशंसा करता रहा…..सैन्नन बताई ३.३० तक पुच्चु भी आ जायेगा……और तीसरे बार आश्चर्य तब हुआ जब पुच्चु आया और उसके साथ साथ राजेश …घर का पूरा माहौल ही बदल गया…..तीनों भाइयों को एक साथ ८ साल के बाद…….लौट आये थे उनके बचपन के दिन जब वे बड़े हो रहे थे …….हमारी खुसी का ठिकाना न था………सोचता था ऐसा मौक़ा शायद आये ही नहीं….पर कोई बहुत दूर सुन रहा था मेरी अतिमानवीय आकांक्षा को …..और यह सम्भव हो पाया. रात को पूर्व निर्धारित जगह ‘टावर’ रेस्टोरेंट में दक्षिण भारतीय खाना खाया गया…
17.6.2016 शुक्रवार सभी देर से उठे थे. यमुना के अनुसार राकेश क़रीब ३ बजे सबेरे तक अपने हैदराबाद स्थित भारतीय सहयोगियों के साथ मीटिंग करता रहा था. मैं सबेरे २ मील घूम आया, चाय बना पी लिया और बच्चों के लिये भी रख दिया. नाश्ते के बाद ग्रीन वे ट्रेल पर सभी पुरूष घूमने निकल गया. तीनों फ़ोटो लेते रहे इस मौक़े को यादगार बनाने के लिये. राजेश एवं केशव काफ़ी दौड़ भी लगाये. राकेश भी कभी कभी उनका साथ दिये…दोपहर का खाना चिपोतले में और शाम का चुई में…….

18.6.2016 शनिवार सबसे पहले राकेश नीचे आये. चाय के बाद उनके साथ एक मील घूम आया. राजेश जग गये थे और यमुना के साथ बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. जौरडन लेक जाना था जो मेरा केरी का प्रिय स्थान है. हर यात्रा में एक बार जाता रहा हूँ. हम सभी गये और भरपूर आनन्द उठाये….. बच्चे पानी में, पेड़ पर, खेल कर …………मैं तो घंटों बैठ लेक को देखते रह सकता हूँ ….बहूत अच्छा लगता है……..आज दो बजे के क़रीब राकेश, राजेश निकल गये कैलिफ़ोर्निया और अस्टिन के लिये, पुच्चु छोड़ आये….पुच्चु एवं सैन्न की मेज़बानी अनुकरणीय रही….तीनों का और उनके बच्चों का आपसी प्यार और सम्बन्ध मधुर बना रहे….इसे छोड़ और क्या अभिलाषा हो सकती है……

पूरा सप्ताह आनन्दमय रहा, अनायास बहुत अप्रत्याशित ख़ुशियाँ मिली, बहुत पुरानी यादें गुदगुदा गईं, और एक बात और उत्साहित कर गई- जो चाहता हूँ कठिन या सहज, वह हो जाता है मिल जाता. कैसे मालूम नहीं, पर शायद सर्वशक्तिमान की कृपा से होता हो. बहूत इच्छा थी कि तीनों बेटे कुछ दिन साथ रहते….आज की व्यक्तिगत व्यस्तता को देख यह सम्भव नहीं लगता था और मैं अपनी इच्छा आज थोपने में विश्वास नहीं करता…हाँ, समय देख ज़ाहिर ज़रूर कर देता हूँ….पर हो गया..

आज पितृ दिवस है फादर्स डे. आदर्श पिता को कठिन तपस्या करनी पड़ती है बच्चों को सफल बनाने के लिये.पता नहीं मैंने कितनी की, वह तो बच्चे बतायेंगे. पर आज भी प्रार्थना यही है कि हमारे बच्चे गौरवशाली पिता बनें और परम्परा चलती रहे, उनकी तपस्या और उस परम शक्ति की कृपा के कारण…….पर मेरे विचार में मातृदिवस ‘मदर्स डे’ को भारत में भी महत्वपूर्ण बना देना चाहिये……पिछले दिनों बहूत अच्छा रहा, राकेश, राजेश भी आनन्द के घर केरी में आ गये…. सोने में सुहागा की तरह केशव की उपस्थिति रही जो हमारी नई पीढ़ी सबसे बड़े सदस्य हैं….कुछ पुराने दिनों को याद करने का सुनहरा अवसर मिला….सब कुछ मिल गया….

पितृ दिवस- कुछ और विचार : अगर व्यक्ति किसी सर्व शक्तिमान में विश्वास रखता हो तो सहज भाव से इच्छित चीज़ें मिल जाती हैं. पिछले दिनों ऐसी ही दो वारदात मेरे साथ हुये: कुछ दिनों से इच्छा हो रही थी कि तीनों बेटे एक साथ कुछ दिन मेरे साथ रहें. इस इच्छा को मैंने किसी से व्यक्त नहीं किया था, पत्नी यमुना से भी नहीं. पर यह पिछले हफ़्ते सम्भव हो गया.राकेश, राजेश, यहाँ आ आनन्द के साथ तीन दिन रहे. हम आज की व्यस्त ज़िन्दगी इसे ईश्वरीय प्रदत्त सुख ही मानते हैं. इसी तरह कुछ दिनों से गणितज्ञ रामानुजन के बारे में जानने की इच्छा हो रही थी. उन पर बनी मुवी भी हालों में लग उठ गई थी. पर वह अंग्रेज़ी में थी. शायद ही अंग्रेज़ों की अंग्रेज़ी समझ आती. मैंने बहुत थोड़ी अंग्रेज़ी की फ़िल्में देखीं है. फादर्स डे पर आनन्द ने एक गिफ़्ट दिया. जब खुलवाने की प्रकिया पूरी हुई तो देखा वह रामानुजन पर लिखी उनकी जीवन गाथा है जिस पर फ़िल्म बनी है. सोचता हूँ किसी तमिल गणितज्ञ को यह किताब लिखनी चाहिये थी, और तमिल फ़िल्म के सबसे अच्छे निर्देशक को उस पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की एक फ़िल्म निर्देशित करना चाहिये था, जिसे विश्व के हर भाषा में डब करने की माँग होती……,, मेरी सोच में आज के अन्य भारतीय गणितज्ञ मंजुल भार्गव और उनका संस्कृत ज्ञान रामानुजन की कहानी सठीक ठंग से भारतीयों और दुनिया को बताने में ज्यादा सक्षम रहती. सोचने का क्रम चलता रहता है……,मुझे देश सम्बन्धी सपनों से तो कोई रोक नहीं सकता…..

‘फादर्स डे’ या पितृ दिवस जो ‘मदर्स डे’ के बाद मनाया जाता है अमरीका में कुछ और लिखने को कहता रहा है पिछले दिनों. हमारे यहाँ भारत में तो क़रीब पन्द्रह दिन का शायद साल में दो वार पूरा पितृ पक्ष मनाया जाता है दसहरा या दुर्गा पूजा के प्रारम्भ होने के पहले. पूरे पक्ष में पूर्वजों को अर्घ्य दिया जाता है, बहुत वर्जनाओं के साथ जीवन यापन किया जाता है. यही समय है जब लोग गया आदि ख़ास तीर्थ स्थलों में जा वहाँ के पंडों को यथा साध्य दान दक्षिणा देते हैं और पितरों के प्रेत योनि से मोक्ष को सुनिश्चित कर देने का आश्वासन पाते हैं
मैं भी अपने पूर्वजों के लिये गया गया था और वह सब किया था जो चाचाजी बताये थे. पर मन उस समय भी यही कहा था कि मुझे भले ही प्रेत योनि में रहना पड़ें मेरे बेटे मेरे लिये श्रद्धा का यह रास्ता न अपनायें. मुझे मालूम नहीं क्यों, पर मुझे पंडितों के बताये किसी कर्म कांड और उनके द्वारा बताये ज़रूरतों में कभी कोई विश्वास नहीं रहा. अगर हर भारतीय या हिन्दू उस पक्ष को पूर्वजों को याद करते हुये समाज के अभी भी पिछड़े वर्ग में अच्छी शिक्षा के प्रसार के लिये या उनके स्वास्थ्य सुधार के लिये कुछ मदद कर सके तो देश के हित में अच्छा होगा. और बहुत सारे हिन्दू कर्म कांडों को बदलना चाहिये और पंडितों के लिये नहीं समाज के लिये कुछ करना चाहिये.

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एक मज़ेदार सप्ताह, अनायास अनपेक्षित प्रसन्नता 

16.06.2016 सबेरे प्रात: भ्रमण से लौटा, कल के बारिस और तूफ़ान से गिरे फूलों के पौधों को बाँध कर सीधा किया. चाय के समय पुच्चु और सैन्नन भी साथ थे. फिर जैक एम्मा को स्कूल तक का साथ दे लौट आया. पुच्चु जी आफ़िस जाते भी मिले. फिर कुछ पढ़ने लिखने का काम किया. यमुना ब्रेक फ़ास्ट माँगी तो सीरियल दही के साथ निकाला. गरमी के कारण भीतर बैठ खाने लगा सोफ़ा पर, यमुना खाने के टेबल थीं. अचानक ऊपर से सीढ़ी उतरते राकेश को देखा तो स्वप्न सा लगा, फिर सम्भल आशीर्वाद दिया. राकेश कल रात ११ बजे ही आ गये थे. कल रात हमारे सो जाने के बाद पुच्चु सैन्नन जा उसे एअरपोर्ट से लाये थे. सबने मुझे बडी सावधानी से छकाया. और फिर हम चाय दिये, सैन्नन सीरियल का नाश्ता और राकेश से इधर उधर की बातें करते रहे.. कुछ देर बाद यमुना नहाने गईं, आईं पूजा पर बैठ गईं. कुछ देर बाद फिर कुछ सरगर्मी हुई, पूजास्थल के पास हँसी बौछार हो रही थी. केशव रमन खड़ा था, दादी को प्रणाम कर रहा था. केशव रमन भी आया है कल रात न सैन्नन बताई, न राकेश. आज के लड़के आश्चर्य चकित करने में हो गये हैं. पर हम ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. यही है प्रियजनों से मिलने का आनन्द. बहुत सालों के बाद इनसे मिला. बातचीत का सिलसिला ……..यमुना की राकेश , केशव से खाने पीने की मनुहारें……..जबतक यमुना की पूजा ख़त्म हुई, मैं दाल बना चुका था, नहाने के बाद चावल बना, और हम पूजा कर खाने पर बैठे.. केशव केवल दाल, दही खाया. राकेश अच्छी तरह खाया, मेरी बनाई सब्ज़ी एवं छोले की प्रशंसा करता रहा…..सैन्नन बताई ३.३० तक पुच्चु भी आ जायेगा……और तीसरे बार आश्चर्य तब हुआ जब पुच्चु आया और उसके साथ साथ राजेश …घर का पूरा माहौल ही बदल गया…..तीनों भाइयों को एक साथ ८ साल के बाद…….लौट आये थे उनके बचपन के दिन जब वे बड़े हो रहे थे …….हमारी खुसी का ठिकाना न था………सोचता था ऐसा मौक़ा शायद आये ही नहीं….पर कोई बहुत दूर सुन रहा था मेरी अतिमानवीय आकांक्षा को …..और यह सम्भव हो पाया. रात को पूर्व निर्धारित जगह ‘टावर’ रेस्टोरेंट में दक्षिण भारतीय खाना खाया गया…
17.6.2016 शुक्रवार सभी देर से उठे थे. यमुना के अनुसार राकेश क़रीब ३ बजे सबेरे तक अपने हैदराबाद स्थित भारतीय सहयोगियों के साथ मीटिंग करता रहा था. मैं सबेरे २ मील घूम आया, चाय बना पी लिया और बच्चों के लिये भी रख दिया. नाश्ते के बाद ग्रीन वे ट्रेल पर सभी पुरूष घूमने निकल गया. तीनों फ़ोटो लेते रहे इस मौक़े को यादगार बनाने के लिये. राजेश एवं केशव काफ़ी दौड़ भी लगाये. राकेश भी कभी कभी उनका साथ दिये…दोपहर का खाना चिपोतले में और शाम का चुई में…….

18.6.2016 शनिवार सबसे पहले राकेश नीचे आये. चाय के बाद उनके साथ एक मील घूम आया. राजेश जग गये थे और यमुना के साथ बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. जौरडन लेक जाना था जो मेरा केरी का प्रिय स्थान है. हर यात्रा में एक बार जाता रहा हूँ. हम सभी गये और भरपूर आनन्द उठाये….. बच्चे पानी में, पेड़ पर, खेल कर …………मैं तो घंटों बैठ लेक को देखते रह सकता हूँ ….बहूत अच्छा लगता है……..आज दो बजे के क़रीब राकेश, राजेश निकल गये कैलिफ़ोर्निया और अस्टिन के लिये, पुच्चु छोड़ आये….पुच्चु एवं सैन्न की मेज़बानी अनुकरणीय रही….तीनों का और उनके बच्चों का आपसी प्यार और सम्बन्ध मधुर बना रहे….इसे छोड़ और क्या अभिलाषा हो सकती है……

पूरा सप्ताह आनन्दमय रहा, अनायास बहुत अप्रत्याशित ख़ुशियाँ मिली, बहुत पुरानी यादें गुदगुदा गईं, और एक बात और उत्साहित कर गई- जो चाहता हूँ कठिन या सहज, वह हो जाता है मिल जाता. कैसे मालूम नहीं, पर शायद सर्वशक्तिमान की कृपा से होता हो. बहूत इच्छा थी कि तीनों बेटे कुछ दिन साथ रहते….आज की व्यक्तिगत व्यस्तता को देख यह सम्भव नहीं लगता था और मैं अपनी इच्छा आज थोपने में विश्वास नहीं करता…हाँ, समय देख ज़ाहिर ज़रूर कर देता हूँ….पर हो गया..

आज पितृ दिवस है फादर्स डे. आदर्श पिता को कठिन तपस्या करनी पड़ती है बच्चों को सफल बनाने के लिये.पता नहीं मैंने कितनी की, वह तो बच्चे बतायेंगे. पर आज भी प्रार्थना यही है कि हमारे बच्चे गौरवशाली पिता बनें और परम्परा चलती रहे, उनकी तपस्या और उस परम शक्ति की कृपा के कारण…….पर मेरे विचार में मातृदिवस ‘मदर्स डे’ को भारत में भी महत्वपूर्ण बना देना चाहिये……पिछले दिनों बहूत अच्छा रहा, राकेश, राजेश भी आनन्द के घर केरी में आ गये…. सोने में सुहागा की तरह केशव की उपस्थिति रही जो हमारी नई पीढ़ी सबसे बड़े सदस्य हैं….कुछ पुराने दिनों को याद करने का सुनहरा अवसर मिला….सब कुछ मिल गया….

पितृ दिवस- कुछ और विचार : अगर व्यक्ति किसी सर्व शक्तिमान में विश्वास रखता हो तो सहज भाव से इच्छित चीज़ें मिल जाती हैं. पिछले दिनों ऐसी ही दो वारदात मेरे साथ हुये: कुछ दिनों से इच्छा हो रही थी कि तीनों बेटे एक साथ कुछ दिन मेरे साथ रहें. इस इच्छा को मैंने किसी से व्यक्त नहीं किया था, पत्नी यमुना से भी नहीं. पर यह पिछले हफ़्ते सम्भव हो गया.राकेश, राजेश, यहाँ आ आनन्द के साथ तीन दिन रहे. हम आज की व्यस्त ज़िन्दगी इसे ईश्वरीय प्रदत्त सुख ही मानते हैं. इसी तरह कुछ दिनों से गणितज्ञ रामानुजन के बारे में जानने की इच्छा हो रही थी. उन पर बनी मुवी भी हालों में लग उठ गई थी. पर वह अंग्रेज़ी में थी. शायद ही अंग्रेज़ों की अंग्रेज़ी समझ आती. मैंने बहुत थोड़ी अंग्रेज़ी की फ़िल्में देखीं है. फादर्स डे पर आनन्द ने एक गिफ़्ट दिया. जब खुलवाने की प्रकिया पूरी हुई तो देखा वह रामानुजन पर लिखी उनकी जीवन गाथा है जिस पर फ़िल्म बनी है. सोचता हूँ किसी तमिल गणितज्ञ को यह किताब लिखनी चाहिये थी, और तमिल फ़िल्म के सबसे अच्छे निर्देशक को उस पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की एक फ़िल्म निर्देशित करना चाहिये था, जिसे विश्व के हर भाषा में डब करने की माँग होती……,, मेरी सोच में आज के अन्य भारतीय गणितज्ञ मंजुल भार्गव और उनका संस्कृत ज्ञान रामानुजन की कहानी सठीक ठंग से भारतीयों और दुनिया को बताने में ज्यादा सक्षम रहती. सोचने का क्रम चलता रहता है……,मुझे देश सम्बन्धी सपनों से तो कोई रोक नहीं सकता…..

‘फादर्स डे’ या पितृ दिवस जो ‘मदर्स डे’ के बाद मनाया जाता है अमरीका में कुछ और लिखने को कहता रहा है पिछले दिनों. हमारे यहाँ भारत में तो क़रीब पन्द्रह दिन का शायद साल में दो वार पूरा पितृ पक्ष मनाया जाता है दसहरा या दुर्गा पूजा के प्रारम्भ होने के पहले. पूरे पक्ष में पूर्वजों को अर्घ्य दिया जाता है, बहुत वर्जनाओं के साथ जीवन यापन किया जाता है. यही समय है जब लोग गया आदि ख़ास तीर्थ स्थलों में जा वहाँ के पंडों को यथा साध्य दान दक्षिणा देते हैं और पितरों के प्रेत योनि से मोक्ष को सुनिश्चित कर देने का आश्वासन पाते हैं
मैं भी अपने पूर्वजों के लिये गया गया था और वह सब किया था जो चाचाजी बताये थे. पर मन उस समय भी यही कहा था कि मुझे भले ही प्रेत योनि में रहना पड़ें मेरे बेटे मेरे लिये श्रद्धा का यह रास्ता न अपनायें. मुझे मालूम नहीं क्यों, पर मुझे पंडितों के बताये किसी कर्म कांड और उनके द्वारा बताये ज़रूरतों में कभी कोई विश्वास नहीं रहा. अगर हर भारतीय या हिन्दू उस पक्ष को पूर्वजों को याद करते हुये समाज के अभी भी पिछड़े वर्ग में अच्छी शिक्षा के प्रसार के लिये या उनके स्वास्थ्य सुधार के लिये कुछ मदद कर सके तो देश के हित में अच्छा होगा. और बहुत सारे हिन्दू कर्म कांडों को बदलना चाहिये और पंडितों के लिये नहीं समाज के लिये कुछ करना चाहिये.

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Books of That I read in US 2016 

History has always been my favourite subject and that only of India- ancient and medieval. I had brought Irfan Habib edited ‘Akbar and his India’ from India. The book talks of Akbar and religions such as Jain, Sikh in separate chapters, but does deal exclusively his effort to bring Hindus on his side. It was interesting to note about Bengali Saint Chitanya fight with a Quazi. 
A new Steve Jobs has been on horizon with his revolutionary technology intervention. His is Elon Musk with Tesla, SpaceX, Hyperboles coming out of his ideas of a new era in transportation. US is getting into a big manufacturing sector with electric cars, Giga factory, energy storage. I went through his biography ‘Elon Musk- Tesla, SpaceX, and the Quest for a Fantastic Future by by Ashlee Vance. 

When Anand was in Cisco Bangalore, ‘Incarnations- India in 50 lives’ by Sunil Khilnani got launched in India. It was at that time not available in US. I requested him to bring it with him. When We came to live in Cary, I went through it. It is interesting but with very little factual information about the greats of India from Budhha to Dhirubhai Ambani. 

I picked up from Anand’s bookshelf another wonderful book ‘The Wright Brothers’ by David McCullough, have completed reading, and trying to understand how the hilarious innovation got materialised and gave shape to the wishes and dream that was as old as the human race. But the humane side of the family story touched me more. The main hero of the story are four persons- a highly religious father, two brothers(out of fours), and a loving sister: Milton Wright, Wilbur, Orville, Katherine. As the story goes, Bishop Milton Wright, a great believer in the educational toys, brought home one day a toy from France, a small helicopter. It was little more than a stick with twin propellers and twisted rubber bands, probably cost 50 cents. “Look, boys,” said the Bishop, something concealed in his hands. When he let go it flew to the ceiling. They called it the “bat”. And perhaps made Wilbur and Orville to work to resolve the secret of flying and come out with their Flyers, the first mechanical means for humans to fly in open sky safely and start of today’s aviation industry serving the world. To give an idea of the time period, Wilbur was born on April 16, 1867, and Orville four years later.

Anand on Fathers Day gifted me ‘The Man who knew Infinity-A life of the genius Ramanujan’ by Robert Kanigel. I have been reading this but perhaps, with Yamuna ailments that is making me to decide to return back home, I shall not be able to complete it. I don’t wish to take it with me. Rather I want to leave it back for Emma and Zach, who may read and get inspired. With the two books mentioned above, I can now convincingly confirm that the Indian system of judging a student and giving jobs and recognitions must get discarded. India must have lost many Ramanujam and many Rabindranath because they failed to get a Hardy or a Yeat.

Last book was the latest by Ruchir Sharma, ‘The Rise and Fall of Nations- Forces of change in the post-crisis world’. It was a wonderful feel to read: “In 2007, the year before the global financial crisis hit, the number of economies growing faster than 7 percent reached a post war peak at more than sixty, including China, India, and Russia. Currently, there are only nine economies growing that fast, and only one of them is reasonably large: India.” Ruchir puts India in ‘good’ category while puts China in ‘ugly’. The book also has a chapter each on ‘Good Billionaires, Bad Billionaires’- a new concept, ‘Factories First’, and ‘The Price of Onions’. A brief summary of Ruchir’s book appeared in media. It was as follows: 

Ruchir Sharma’s 10 rules from ‘The Rise and Fall of Nations

1. “Critical cause of the missing growth was, of all things, a shrinking supply of people in the active workforce.”

2. “The fortunes of a nation are likely to turn for the better when a new leader rises in the wake of a crisis.”

3. “It is the rise of an entrenched class of bad billionaires in traditionally corruption-prone and unproductive ind­ustries that is likely to choke off growth and to feed popular anger on which populist demagogues thrive.”

4. “In recent years, many countries have been raising the government share of the economy to bloated proportions…and enforcing insensible rules in an unp­redictable way that make it difficult for private companies to thrive.”

5. “to carve out a geographic sweet spot, a country needs to open its doors on three fronts: to trade with its neighbours, the wider world as well as its own provinces and second cities.”

6. “the best investment binges are those that go toward manufacturing, technology and infrastructure…the worst binges tend to be in the property sector.”

7. “watching the prices of stocks and houses is as important as tracking the price of onions.”

8. “when the current account is back in surplus, and the country is once again pulling in enough money from abroad to cover its foreign bills, it’s a sign of an impending turnaround.”

9. “rising debt levels can be a sign of healthy growth, so long as debt is not growing too much faster than the economy for too long.”

10. “the most-loved nations will rarely have the best economic prospects in the next five to ten years.”

And when we almost got ready to depart for India, Anand got the biography of another great man, ‘Einstein -His Life and Universe’ authored by Walter Isaacson as Rakesh during his stay here last week talked about this book. There was another biography in Anand’s bookshelf ‘Einstein- a life’ written by by Denis Brian. During my last visit in 2014, I had tried to go through but gave as it was pretty difficult to enjoy reading. In US, sometimes I get into the books made for the school students. I had read one on Einstein when in Austin in 2014. This year too Anand had bought a children book on Einstein ‘Who was Einstein’ by Jess Brallier for Emma. She has gone through it and remembers the content pretty well as she revealed the story of the brain of Einstein that was preserved for scientific study. I found the mention of the same in the last chapter of Isaacson’s book.
As a student Einstein never did well with rote learning. As a theorist, his success came not from the brute strength of his mental processing power but from his imagination and creativity. A society’s competitive advantage will come not from how well it’s schools teach the multiplication and periodic tables, but from how well they stimulate imagination and creativity.

Einstein was passionate not only in scientific pursuits but also the personal ones as narrated by his biographer not only in his lifetime but also after he was not there…..At college Einstein fell madly in love with the only woman in his physics class, a Serbian named Mileva Maric. They had an illegitimate daughter, then married and had two sons. Mileva helped Einstein to check the math in his papers, but eventually their relationship disintegrated. Einstein offered a deal to Mileva. He would win the Nobel Prize some day, he said, if she gave him a divorce, he would give her the prize money. She thought for a week and accepted. It was seventeen year after the deal. He was awarded the prize and she collected as mutually agreed,

The pathologist at Princeton Hospital, Thomas Harvey using an electric saw …..removed his brain….. And decided, without asking permission, to embalm Einstein’s brain and keep it……Einstein’s grand daughter, Evelyn Einstein who had heard of rumours that made her suspect that possibly, just possibly, she might actually be Einstein’s own daughter. She had been born after Elsa’s death, when Einstein was spending time with a variety of women. Perhaps she had been the result of one of those liaisons, and he had arranged for to be adopted by Hans Albert……”

Even the great men are just human beings with all their greatness and weaknesses.

Another conclusion that I made this time after reading all the books: India can produce Einstein but not Wright brothers or Elon Musk, unless the mind sets of the society changes. Let all policy makers think on this issue.

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Wandering Mind While in Cary

1.

Age a Number: (At Eighty: Finally, I met the old man I see everyday early morning going out somewhere and coming back in the evening in a company uniform from the front verandah of our house where we usually keep sitting (photo from our veranda). Friday about 7.15am, I was on my my morning walk. He was coming from the other side on the walking track in our community, Harmony. I hesitated first first but then asked, ‘Sorry, If you don’t mind, I have a query about you. Can I ask?’ He nodded. I put my question, ‘Where do you go so early?’ ‘I am going for work. I work with Walmart.’ I fired my next question, ‘What is your age, Sir?’ ‘Eighty’ He answered and walked past me hurriedly. He is to walk two miles or so and similar distance he walks back in the evening. He is short in height, but pretty smart. He must be living with his offsprings or in his own house. I couldn’t find any more details about him, but I got a great respect for such hard working senior. …..,And then few days ago, I caught him again on the front side road while waiting for Anand for my evening walk. He was returning from his work and had some banana in plastic bag. To my queries, he told me ‘Myself Jagdish, born and brought up in Bombay, came in 2008 to US, and live with the family of my son down the Alliance Circle. My son टcame in US in 1989.’ We must keep ourselves active till last and if required, work too even with low remuneration? How does it matter, if it is just good enough to keep me busy? I can only adore such spirit.)

2

A Waiting Opportunity: (Bank of America Merrill Lynch has highlighted an opportunity for businesses and economic growth: the explosion of the global middle class.”In a world starved for growth, we believe that the answer lies in uplifting the 4.5 billion people at the base of the economic pyramid.” Can the younger Indian entrepreneurs, particularly the most enthusiastic ones going for start-ups keep this in mind? It must look into the manufacturing possibilities at the bottom of pyramids too. Can some workers groups in every village be skilled to manufacture items that the bottom billions will consume and market it through e-commerce platforms? http://www.businessinsider.com/market-could-be-biggest-in-history-of-commerce-2016-6 

BAML advisory reminds me of Late American Indian management thinker CK Prahalad who had pioneered the subject of ‘bottom billion’ well in 2002 in an article, ‘The Fortune at the Bottom of the Pyramid’ in Strategy+Business followed by a book http://people.eecs.berkeley.edu/~brewer/ict4b/Fortune-BoP.pdf)

Educating India-We must give back: (Every time I come across the name of Former President, the Missile Man Abdul Kalam, a question comes in mind. Why other intellectuals and Giants of their own fields don’t emulate at least one of the traits of Kalam- the deep, almost missionary interest in talking to the students and workers of various educational and research institutes? Think of the impact on the students when persons such as Ratan Tata, Narayana Murthy, Nandan Nilekani, Ramadoorai, Vishal Sikka, or for that matter Manmohan Singh, Amartya Sen or Jagdish Bhagwati talking to the, on contemporary subjects such as Entrepreneurship and innovation, developmental economy, poverty elimination, possibility of manufacturing in rural India, business enterprises for bottom billion. I remember my own talk in IIT, Kharagpur on ‘Re-engineering of engineering courses’ or in IIT- BHU on ‘Latest in Automobile Manufacturing’. India can find hundreds and thousands of such experts to cover almost all top 1000-1500 educational institutes. It can bring all academics in line with the contemporary developments and the future requirements in their fields and help in creating India as one of significant Knowledge Hubs of the world. Interactions between academics and practising professionals must only be for summer jobs, training and placements but must be a continuous one. I always appeal all the established and successful technocrats that I meet in India or here in US to keep in touch with their own schools and colleges that they attended and talk with its teachers and students whenever they can visit there without any trouble. This may be their biggest contribution almost at no cost. India must looking out for them.) http://www.businessinsider.in/Less-than-8-ofIndian-engineers-are-employable-Report/articleshow/52747075.cms 

4. 

Modi’s Contribution to Yoga: Why should there be politics with Yoga in India just because Modi is trying to make it a part of every human being as a preventive measure to keep the quality of life at the best? Lakhs of people across India and abroad observed by stretching themselves in various postures to mark the second International Yoga Day on June21? Why did the politicians of ruling political parties of Bihar, one of birthplaces of Yoga, not participate in it? Embrace yoga like you have taken to mobile phones, as “it gives us health assurance at zero budget”, said Modi in Chandigarh. Let the best of India enlighten the world for making it a better place to live. 

5

23.06.2016

Bihar and IIT: Every season when the final list of successful students come out for the admission in IITs, the media gets agog with many success stories. One can find the story of Anand Kumar’s Super 30 of Patna in all print and digital media. Additional Director General of Police Abhyanand has his many -30s: Rahmani 30 and Triveni 30 in Patna, Ang 30 at Bhagalpur, Nalanda 30 at Biharsharif and Magadh 30 at Gaya: The students get free food and lodging during their nine-month coaching stint. A village near Gaya has approximately 109 IITians and is popularly known as the “Village of IITian. Similar stories from all around India appear in media. With very miserable condition of education at grassroots level in rural Bihar, these stories don’t excite me much. I start smelling some amount of marketing in them. But still I have two wishes: First, the government of state or centre must bear the total expenditure of those from financially weak families without following the caste based reservation schemes. Second, the students getting this assistance must sign an ‘agreement of promise’ to help getting at least one similarly poor student when they start earning sufficiently as a social responsibility. And this must be monitored by an agency, may be the institute itself.

24.06.2016

A new entrepreneurial idea: Even most of the bigger villages are not having a well defined market area or complex. Even though some shops are there, they operate through their ancestral houses in different part of the village. Some entrepreneur collaborating with some rich interested person of the village can think of investing in setting up a well located simply constructed market complex with 4-5 shops (as many as viable) and other infrastructure such as some open place for locally produced perishables. Even a poor woman can come sell her vegetables or fruits grown in her court yard. It can also have an open area where service providers e.g skilled persons- key makers, lock repairer, electrician or mobile phone repairer can be located. Can some give a thought on this idea that can engage some left out ones in the villages engagement? 

28.06.2016 

P.V. Narasimha Rao-My Tribute

Rao + Manmohan- Sonia (<5)= Economy Revived

Manmohan +Sonia(10)= Policy Paralysis

P.V. Narasimha Rao has been called: ‘modern India’s Chanakya’, ‘Half Lion: How P.V. Narasimha Rao Transformed India’, ‘a bad number two, but a very good number one, very ineffectual as foreign minister, superb prime minister, certainly among the best of the choices available’, ‘erudite, patient, ambiguous, shrewd’, “when in doubt, pout”. 

Rao could speak 9 Indian languages (Telegu, Hindi, Oriya, Bengali, Gujarati, Kannada, Sanskrit, Tamil and Urdu) and 8 foreign languages ( English, French, Arabic, Spanish, German, Greek, Latin and Persian).

Sonia, a reluctant dowager, wished to rule from behind but always denied that in public. “Rao had simultaneously played both lion and mouse with Sonia.”  

Alas, Because of Sonia, Rao couldn’t get a memorial in Delhi. But Rao certainly deserves ‘Bharat Ratna’.

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Between Government and Private jobs: Look at some of the observations on pay rise of government employees: 1. The bureaucrats typically get paid much less compared to the private sector. 2. The legion of peons, drivers, secretaries and teachers get paid 3-4 times as much; and with little pressure on performance, deliver very little. A government school teacher, before the pay panel award, with no experience gets paid R52,000 as compared to a mere R19,000 (at the top end) in the private sector; a fresh government nurse gets 3.4 times her private sector counterpart, a driver 1.8-2 times. 4. As an MBBS, doctor gets much more a pay in a government hospital if you’re an MBBS but as the skill levels rise—to an MD or an MS—private jobs pay much more. And Jaitley has promised to increased further the salary of lower grades. Government appears to be totally helpless to remove these discrepancies with a fear of trade unions and opposition hounding on it. I tweeted PM seeking his attention to the need of eliminating all the lower ranks e.g clerks, orderly, etc. by re-educating/skilling them and stopping entries after superannuation of the persons of these ranks.

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Focus on Two Main Priorities: Somehow, I strongly feel that the Education and Healthcare ministries must come directly under the watch of the Prime Minister and the Chief Ministers. Dismal conditions of education and health, particularly in rural India demands this change to get the necessary focus. By assigning these two functions of utmost importance for every family to junior ministers, it hardly gets the necessary attention, thrust and accountability. With the PM directly involved with it, the situation may change. Let us look first at education: “ASER 2014 found that 25 per cent in Class VIII could not read texts meant for the Class II level; the number of children in rural schools in Class II who could not even recognise the alphabet is up from 13.4 per cent in 2010 to 32.5 per cent in 2014. Reading levels for children in government schools show a sharp decline from 2010 to 2012. Half of all children in Class V have not yet learned basic skills that they should have acquired in Class II. And close to 50 per cent of children will finish eight years of schooling without having learnt the basic skills of arithmetic.” Years after years, the quality of education is deteriorating, as it is not only the salaries of teachers and infrastructure (in last few years there is plenty of improvement) that were needed. The government intention and contribution in improvement of education are in doubt. Everything is in real mess. And now the health: “2. 1.2 million children under the age of five died of totally preventable diseases in 2015. India’s key health indicator — Infant Mortality Rate (IMR) was 38 in 2014, lagging behind Bangladesh (IMR of 31) and Nepal (IMR of 29). One quote will be good enough to show the negligence,”Mothers are not dying because we do not know how to save them, but because the society has not decided that their lives are worth saving.” And in last 70 years, hardly few panchayats of rural India has got a basic small dispensary even. At least I have not heard of any in many panchayats of Bihar that I know. With PM and CMs in charge of health, this may change in three years if they wish with the resources with them.

10

Doubtful Intentions of India Inc: I wonder why India’s companies on an investment strike today. Even with huge domestic telecom and electronics market that can sustain investment in manufacturing in this area, the big investors such as Mukesh Ambani and Sunil Mittal wish to remain only in service related to this sector giving all advantages to the Chinese and Taiwanese. Why did Birlas and others went out of manufacturing preferring to stick with financial companies? Why are greenfield manufacturing companies not getting setup but for few MSMEs? Why do entrepreneurs such as Kishor Biyani prefer trading business of Malaysian furniture and selling them through Home Town and Home Centre? Is the business a rocket science or is there shortage of excellently skilled carpenters? It is all the lust of easy money that is their DNA. India will always be laggard if manufacturing sector does not grow in big way to meet the thirst of huge middle class of India. And this must attract those with business acumen. http://economictimes.indiatimes.com/markets/stocks/news/the-loan-market-says-it-all-indias-companies-are-on-an-investment-strike/articleshow/53072915.cms Interestingly, a report of 2011, also have the same headline-‘Is India Inc set to go on Investment strike? Will the country take a note of it?

http://www.firstpost.com/business/is-india-inc-set-to-go-on-investment-strike-152251.html

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Smriti Irani in new role: I have seen many enjoying the transfer of Smriti Irani from HRD ministry as a righteous act of Modi blaming her for all the chaos and conflict in universities of Hyderabad, Jadavpur or more notoriously reported JNU. However, I consider her very innovative in her approach to improve the education in country in India. She has been pleasantly different in her approach to root out the basic ills. Her Swachh India approach through school was praiseworthy. Her push for getting the best professors for India was another welcome move. I wish the new education minister will continue to push her ideas. Her transfer to textiles is pretty challenging, as she is push its exports to a respectable height. I wish in next three years she could attain a textile exports of 100 billion dollars. I wish her the best. She was one of the best in the last cabinet.

PS: An efficient minister can prove his worth even in less important ministry. I am sure with her aggressive targets, she does in textile too. However, textile is not a less important ministry with the data below-

•$ 100 Billion is the size, by revenue, that the textile and apparel industry in India is projected to reach by 2016-17, from $67 Billion in 2013-14

•45 Million people are employed directly in the textile industry, making it the largest employer after agriculture

•35 million is the number of additional jobs the new the new textile policy aims to create

•$36 billion is the amount textile and garment exports earn every year, which is equal to 14% of India’s export earnings

•$300 billion is the value the new textile policy aims to clock in exports by 2024-25

•2% of GDP is accounted for by the textile industry, making it crucial to the economy

•10% is the industry’s contribution to overall manufacturing production in the country

•100 is the number of countries to which India exports its textiles and garment. The United States and the European Union account for two-thirds of India’s textiles exports

•Rs. 6,000 crore is the special package cleared by cabinet for the textile ministry, just days before the reshuffle.

Is it not a very important ministry?

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Opportunities for Start-ups in Farming : Rich and educated in agriculture sciences and engineering or just experienced ones in farming techniques in Bihar with business acumen can become new entrepreneurs in farming sector in hundreds. Here is a report of new approaches to improve productivity of farming and potentials for further innovations that can bring prosperity in Rural Region

http://economictimes.indiatimes.com/small-biz/startups/how-startup-em3-agri-services-is-tackling-farmers-distress-the-uber-way/articleshow/53133968.cms

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Encouraging Reading Habit: Emma and Zach have just finished grade 1 and 3 respectively from Turner Creek Road Elementary School and next week they will move to grade 2 and 4. On one evening few days ago, Emma came to me to show her medal. It was for her proficiency in reading. She has been excellent in reading in her grade 3 class. Emma recorded 1360 minutes per quarter in reading. When I asked Shannon to know how many books she would have gone through in the year. “May be about 200 or more”, was her reply. I was surprised as well as excited about the performance. While Shannon bought herself larger percentage of the books-both fiction and non-fiction, Emma brought books from her school library too. Teachers do ask some question about the content of the book to verify if she has picked up the story or content well. Zach has also read similar number of books. I have a personal experience of that. Zach has been bringing books from his school library, sit with me, read it, and then got my signature on a form given by his teacher to have reading record. At all places I visited in US, I found kids and teens really in love of reading as many books as possible. US system does not have text books of languages as in India. I wonder why can’t our state school systems, teachers, parents in India make reading popular in kids? India must drop the system of textbooks prescribed by board and ask questions from it almost making rote necessary. Instead they must insist and ensure on reading books of various grade levels, both fictions and non-fictions taking the parents in the loop. Will it not make a great thing if in every sub-community of one village, a student reads a book for 15-20 minutes to their parents and they just listen to it as they watch and listen TV serials and news? Can’t they do even this much and learn many things not known to them, in turn? Can’t our writers and authors of vernacular and English write good books for students of K-12 building knowledge of all kind in an interesting manner and helping in improving the vocabulary gradually? This has been our ancient Indian tradition too. Teachers must be accountable and answerable too. Why is that the teens of India fail to pass the basic learning parameter of reading of any agency? Why a class V teen can’t read the book of class II? Why can’t the schooling of K-12, almost thirteen years through rural government schools, can’t make a student proficient in reading, speaking and writing of a language-be it English or his chosen vernacular? 


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An US Graduation Celebration: Sunday, July 3, 2016 we had an opportunity to attend a graduation reception of Akanksha at Brier Creek Country Club in Raleigh, NC courtesy an invitation of Ajay Ray. It was a unique and first such experience for me in US. The huge number of invited young generation families of NRI American Indians appeared to be bubbling with its aspirations. As I understand, Akanksha has completed her grade 12 and will enter the famous Duke University for her graduate course in International Policy. The reception had everything- good food and drinks plus very nice entertainment from kids with their dances. But the most loved among those were the speeches about Akanksha from her friends and other close acquaintances and to my surprise many of them wished to see her as the Secretary of State one day. I see in her all the possibilities to reach anywhere high up and sincerely wish her to be in the highest position some day soon in American hierarchy. Many other boys and girls present there, as I came to know, were also getting into other top US universities such as Harvard, Stanford. I got also impressed with so huge a presence of people from Bihar that I had never experienced in last 10-12 years that I am visiting US, though I felt bad that I could talk with only one such Bihar couple from Pittsburg. As one must appreciate why I think so. With all my grandchildren here in US, naturally I was dreaming about their future too all along.But one thing is sure that Ajay and his wife Priyanka have a huge helping social circle. But perhaps the happiest two must be the parents of Ajay who attended the function of their granddaughter. We wish them and their kids a great future……..Graduation at different levels of schooling is pretty popular, and it starts at preschool stage itself….But the one after grade12 is the most significant, as its performance decides the course of professional career as in India too. However, it is hardly celebrated in the manner it is done in US as much as I know even today with almost every family with someone or the other in US.


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A Bihari at Las Vegas: July 13, Wednesday evening Anand returned after his 4-days/3nights official sojourn of Las Vegas. We really missed him, but perhaps Yamuna, his mother missed him the most. Practically all these days she almost remained sick from various troubles. This may be a natural phenomenon of the nearness and attachment of relation. During tea and walk thereafter, Anand shared his experiences of Las Vegas. The story of an unknown but extrovert Bihari young man working for Cisco San Jose office who met Anand and spent some time before his panel discussion, was really interesting. He was from Barauni and educated at BIT, Sindri and ,in turn, the stranger could also find out the whereabouts of Anand.

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फिर कुछ दिल के ग़ुब्बार

बिहार की नियति: लालू को जीत दिलानेवाले, अपनानेवाले (लोगों के कथनानुसार) बिहार के यादव, दलित एवं मुसलमान या अन्य भोटर भाइयों ! देखो किसके लिये भोट दिये हो…….देखो कैसा बेवक़ूफ़ बने……..लालू ने इतिहास रचा ….. बिना मैट्रिक किये लड़के को उप मुख्य मंत्री …..दूसरे भोचड बेटे को स्वास्थ्य मंत्री ……..बेटी को राज्य सभा में …….सभी करोड़ों के मालिक हैं……बिना योग्यता के ………….और अपने किये कुकृत्यों के कारण क़ानून से अपनी रक्षा के लिये मुम्बई के एक स्वार्थी वक़ील को बिहार से राज्य सभा भेज दिया………तुम्हें ये एेसे ही बरगलाते रहेंगे…..अच्छी पढ़ाई की ब्यवस्था नहीं करेंगे…..अयोग्य आलसी शिक्षकों से लोगों को पिछड़ा बनाये रहेंगे…..किसी तरह पढ़ भी जाओगे तो नौकरी के लिये दूसरे प्रदेशों में ही जाना होगा….इनकी कुकर्मों के उदाहरण हैं बिहार के बारहवीं कक्षा के टापर..क्या इस तरह आयेगी ख़ुशहाली ….,.,.अब तो जागो……जाति, धर्म की बात न कर देश हित प्रगति पर ध्यान दो….अच्छी शिक्षा हक़ से माँगो ….. हर गाँव में स्वास्थ्य केन्द्र माँगों ………वही समृद्धि देगा……सुख देगा…..ख़ुशी देगा……….वही स्वर्ग देगा और जन्नत भी…..,,

हम सभी पढ़ चुके हैं अबतक बिहार परीक्षा बोर्ड के अव्वलों की कहानी……..पहले नक़ल के अभिनव तरीक़ों और जोखिमों को उठाते हुये जग प्रसिद्ध बना बिहार अब आगे बढ़ गया है कुछ क़दम………अगर जैसा सभी टी.वी. दर्शकों को देश भर में ज्ञात हो चुका है अव्वलों की ज्ञान गाथा…..हम बाक़ियों को कैसे लें………कैसे समझें कि उनके प्राप्तांक ढीक है, आगे की पढ़ाई वाला कालेज उनके स्कोर को महत्व दे या नहीं……….क्या नौकरी देने वाले उद्योग उन परीक्षाओं को कोई मूल्य दे या नहीं…….पर जो वर्ग या मानसिकता यह करा रही है उसके बारे में तो कोई कुछ कहता नहीं………बोर्ड के अधिकारी……शिक्षा मंत्रालय के बडी बडी परीक्षाएँ पास कर उस स्थान पहुँचे दिग्गज महानुभाव ………कबतक अपने को बेचते रहेंगे ……..इस सामाजिक अन्याय का उत्तरदायी कौन है……..कौन उन लोगों को सुरक्षा और सम्मान देगा जो इस अपराजेय ब्यवस्था के शिकार बनते रहे हैं ….. कौन यह विश्वास पैदा करेगा कि आगे भी ऐसा ही नहीं होता रहेगा……और मज़े की बात यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री वहीं बरक़रार हैं…..वे अभी भी अपने को महान मानते हैं…अपने राज्य को, संस्कृति को सबसे आगे…….अपने पूर्वजों के कृतित्व को कबतक भंजातें रहेंगे…….कुछ कहते हैं भुगतो अपने निर्णय का फल…….पर कोई बताये तो हल क्या है……क्या पैसे के लिये हम सब बेंच देंगे……फिर तो कोई हमारा देश भी ख़रीद लेगा…….

भारतीय राजनीति: आज़ादी के क़रीब ७० साल बाद भी हम राजनीति के क्षेत्र में एक दायित्व पूर्ण पार्टी ब्यवस्था की स्थापना नहीं कर पाये हैं. अधिकांश पार्टियाँ एक न एक परिवार की जागीर बनी हुईं हैं – कांग्रेस के सोनिया राहुल अभी तक नाना और दादा की देश हित किये त्याग की दुहाई दे एक क्षत्र मालिक बने हुये हैं, अपना कुछ कृतित्व न होते हुये भी. अपना जड़ ख़ुद खोद रहे हैं जब कि पूरे देश के समझदार लोग इसे एक दूसरी बडी पार्टी की तरह बचे रहना पसन्द करेगा. आज भी कांग्रेस के शासन को अगर वे जनतांत्रिक आधार पर कर दें तो पार्टी की उम्र बढ़ जायेगी और उनका सम्मान भी जनता में और देश की यह दूसरी राष्ट्रीय पार्टी बनी रह सकती है जो देश हित ज़रूरी है. दुर्भाग्यवश यह राष्ट्रीय पार्टी केवल चमचों या मनसबदारों की पार्टी बन रह गयी है. पर यहां कोई बदलाव के आसार नज़र नहीं आते. सोनिया, राहुल और उनके सिपासलारों का केवल एक सूत्रीय एजेंडा है मोदी का हर बात में बिरोध, भले ही उससे देश का कितना भी बडा अहित क्यों न होता हो. अब राज्य सभा में चिदम्बरम, कपिल सिबल, और जयराम रमेश को एक मात्र इसी काम के लिये लाया गया है. 

सपा मुलायम सिंह यादव के परिवार की रह गई जब लोक सभा चुनाव में उनके दल से केवल उनके परिवार वाले जीत सके. आज़म खान तो थे हीं मुसलमानों के नाम पर, अब अमर सिंह भी लाये गये केवल राजपूतों का भोट लेने के लिये जैसे सभी राजपूत यादवों की तरह बेवक़ूफ़ बनाये जा सकते हैं. प्रदेश की सारी सम्पदा को अपने पास कर लेने का एक मात्र ध्येय है इनकी राजनीति का. 

राजद लालू प्रसाद के पूरी तरह अधीन है. वे तो चुनाव लड़ नहीं सकते क़ानूनी पावन्दी के कारण. बिहार में दो बेटे मंत्री बन गये. उनमें एक उप मुख्य मंत्री बन नीतीश से बढ़ चढ़ कर बोल रहा है. अब बडी बेटी राज्य सभा में आ गई. याद रहे कि यह उनकी वही बेटी है जो बिहार के नामी पटना मेडिकल कालेज में सर्वप्रथम आई थी और जिसे उसके शुभचिन्तकों ने प्रैक्टिस नहीं करने की सलाह दी थी जिसे मीसा ने माना भी. लालू प्रसाद ने राम जेठमलानी को भी राज्य सभा में भेजा है. कारण सभी जानते हैं. जेठमलानी लालू को क़ानूनी तकलीफ़ों में उपचार होंगे. 

दूसरे अन्य प्रदेशों में भी पारिवारिक पार्टियाँ हीं महत्व रखती हैं- शिव सेना थैकरे परिवार की, या शिरोमणी अकाली दल बादल की, और इसी तरह डी. एम. के करूना निधि की. तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में भी नायडू और राव के बेटे आ रहे हैं बागडोर सम्भालने. 

कुछ पार्टियाँ एक ब्यक्तिविशेष के बल पर चल रहीं हैं- टी. एम. सी ममता बनर्जी , आम आदमी केजरीवाल, जेडीयू नीतीश कुमार. इनकी ब्यक्तिगत महात्वाकाक्षायें देश के हित के ऊपर है. सभी देश के प्रधानमंत्री बनने की होड़ में है. नीतीश को लीजिये-कभी राष्ट्रीय पार्टी बनाने की कोशिश, कभी गठबंधन की बातें करते हैं. जनता द्वारा दी पद की शक्ति का उपयोग कर अपने राज्य को शिरमौर बनाने पर ध्यान नहीं देते. पिछले दस सालों में शिक्षा क्षेत्र को सुधार नहीं पाये, न स्वास्थ्य क्षेत्र को. साठ सालों के बाद भी हर पंचायत में एक सामान्य स्वास्थ्य केन्द्र तक नहीं है. एक राज्य को समृद्ध बना न सके, पूरे देश को क्या बनायेंगे. अबोध जनता को बरगला अपना उल्लू सीधा करना इनका एकमात्र लक्ष्य है. 

इन पार्टियों का एकमात्र लक्ष्य केवल पार्टी के लिये साम, दाम, दंड या भेद से धन संग्रह करना होता है, अत: बाहुबलियों का वर्चस्व होता है. यह स्थिति उस परिवार के या ब्यक्ति के लिये तो फ़ायदेमन्द है पर क्या देश का भला हो सकता है? दुख की बात एक और है- ये पार्टियाँ अपने सदस्यों को कोई समाज निमित्त सेवा कार्य करने को प्रोत्साहन नहीं देतीं. राष्ट्रपिता गांधी भी समाजसुधार के रास्ते राजनीति में आये और शिक्षा, स्वास्थ्य एवं घरेलू उद्योग के ज़रिये समाज में सुधार किये. आज भी कांग्रेस सेवा दल है, पता ही नहीं चलता क्या करता है. मोदी का स्वच्छ भारत, और योग का बढ़ावा शायद राजनीतिक लाभ भले नहीं दें, पर लोकहित एक बडा क़दम हैं. राष्ट्रीय सेवा संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल हिन्दू समाज से जातिगत भेदभाव को मिटाने का काम अच्छी सूझबूझ से तेज़ी से कर सकता था. साधु समाज को लोक कल्याण के कामों में लगाया जा सकता था. पढ़ी लिखी नयी पीढ़ी को एक सही राजनीति द्वारा ही राजनीति के साथ जोड़ा जा सकता है. सभी पार्टियों में शायद ही प्रजातांत्रिक तरीक़े से महत्वपूर्ण निर्णय लिये जाते हैं. पर समझ नहीं आता कि हमारी पार्टियाँ समय रहते ब्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ पायेंगी या नहीं. पुरानी पीढ़ी का होने के कारण कभी कभी अफ़सोस होता है ……

नीतीश एक महाढोंगी हैं. आजकल मद्य निषेद्ध पर भोलीभाली औरतों को अपने को चुनाव जीतने के लिये मसीहा मसीहा बनाने के लिये रिझाने में लगे हैं. कोई उनसे यह तो पूछे कि किस काल में बिहार में शराब की सबसे ज्यादा तदाद में दुकानें खुलीं और उसके लिये इजाज़त देते समय क्यों नीतीश जी को उसके दूरगामी परिणाम का ख़्याल नहीं आया? कुँआ खोदने पर शाबाशी, कुँआ भरने पर शाबाशी. इससे बडा ढोंग क्या हो सकता है. मोदी से ब्यक्तिगत ईर्ष्या के कारण बी.जे.पी से अलग हुये और चुनाव जीतने के लिये बिहार के लिये ख़तरनाक लालू और देश के लिये ख़तरनाक गांधी से हाथ मिलाये. इससे बडा ढोंग क्या हो सकता है? अब जब तय है कि लालू परिवार के हाथ बिहार बीक गया तो बाहर बाहर रह अपनी साख बनाये रखने का ढोंग करते नीतीश क्यों बेवक़ूफ़ बना रहे हैं महिलाओं को. और नीतीश का पिछले दिनों जग ज़ाहिर हुये टापरस् की कहानी का न्याय देखिये जो नीतीश के ढोंग का अप्रतिम प्रमाण है: एक भोली भाली लड़की जेल में. इस नीरीह बच्ची को जेल भेज और मीडिया में उसका फ़ोटो छपा उसका आज और भविष्य दोनों का गला घोंट दिये नीतीश नाम कमाने के चक्कर में. शर्म आती है ….बिहार का कहाने में….जेल रूबि राय को नहीं उसके बाप और उसके आकाओं को होना चाहिये. अगर इस दुर्वस्था के लिये कोई ज़िम्मेवार है तो वे हैं नीतीश, जो बड़े दावे तो किये, पर न शिक्षा को, न स्वास्थ्य विभाग को दस सालों में सुधार पाये. आज जब सब छोटे बड़े के शिक्षा का द्वार खुला है, क्यों नहीं नीतीश शिक्षा को अपने नियंत्रण में रख देश के अन्य उन्नत राज्यों की बराबरी में ला सकते. आज बिहार में गाँवों में स्कूल तो हैं, पर शिक्षा नहीं, जब की अधिकांश बिहार गाँवों में बसता है. बिहार की स्कूली शिक्षा मर चुकी है और केवल बाहुबलियों के कोचिंग सेन्टरों तक सीमट चुकी है और इसका दायित्व नीतीश क्यों नहीं लेते. आज बिहार के हर तबके के अधिकांश बिहारियों को क्यों बिहार के बाहर निकलना पड़ता है नौकरी के लिये, बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिये? अगर शिक्षा क्षेत्र में इस तरह का व्यापक घूसख़ोरी का आलम ला दिया गया है तो लालू, नीतीश छोड़ किसका दोष है जो मिल कर पिछले २६ साल से बिहार के मालिक हैं …,कल कोई कह रहा था, ‘अगर रूबि राय को जेल दिया गया है तो राज्य सभा सदस्य मीसा भारती को क्यों नहीं दिया गया?’ ………कितना कुछ कहा जाये…पर मन का दर्द कहने का मन कर जाता है, क्योंकि मैं भी उसी प्रदेश में पैदा हुआ था…….और जन्मभूमि को स्वर्गादपि गरीयसी मानता हूँ….मेरा तो नीतीश से यही अनुरोध है कि किसी शेखचिल्ली मानसिकता में न पड़ केन्द्र की भरपूर सहायता ले बिहार के गाँवों में शिक्षा और स्वास्थ्य की ब्यवस्था पर ब्यक्तिगत रूप से ध्यान दें….मुझे दुख होता है शिक्षकों की लापरवाही पर जो बारह साल में बच्चों को हिन्दी, इंग्लिश पढ़ना, लिखना और बोलना नहीं सीखा सकते इस डिजिटल शताब्दी में भी….और शर्म आती है किसी को यह बताते कि जितने गाँवों को मैं जानता हूँ बिहार में उनमें किसी में कोई स्वास्थ्य केन्द्र नहीं है..,,,…

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Some Historical Entries

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Who should be the icons of Indian Muslims? Why can’t Indian Muslims adore Dara Sikoh instead of Aurangzeb? Recently I came across two articles on Dara Sikoh, the eldest son of Shahjahan. While reading Sunil Khilnani’s recent book, Reincarnations, I found that one life out of fifty was that of Dara Sikoh. I read another article,’Not-Plassey 1757, but-Samugarh1658 fateful-day in history that fixed the subcontinents future fate’ in Times of India recently too about Dara Sikoh by Murad Ali Baig. Dara was liberal and Indian culture and Hindi scriptures with highest regard. Dara had translated the Bhagwad Gita and Upanishads from Sanskrit into Persian. With the eldest and most favourite son of the India empire of Shahjahan becoming a Sanskrit scholar, it may be assumed that there had been considerable Hindu-Muslim amity in the time of Shahjahan.’ Dara’s own book called the ‘Mingling of the Oceans’ showed the many similarities between the Quran and the Brahma Shastras. But Shahjahan was imprisoned and Dara got defeated by Aurangzeb. “At the trial the imperial Qazi asked Dara to hand him the jade thumb ring that was still on his left hand. He is reported to have turned it over and asked why the green stone was inscribed with the words ‘Allah’ on one side and ‘Prabhu’ on the other. Dara evidently replied that the creator was known by many names and called God, Allah, Prabhu, Jehova, Ahura Mazda and many more names by devout people in many different lands. He added that it is written in the Quran that Allah had sent down 1,24,000 messengers to show all the people of the world the way of righteousness and he believed that these messengers had been sent not only to Muslims but to all the people of the world in every age…….Aurangzeb casually signed the order of execution after the Qazis found Dara guilty of heresy.” History took a different turn. 

http://blogs.timesofindia.indiatimes.com/toi-edit-page/not-plassey-1757-but-samugarh-1658-fateful-day-in-history-that-fixed-the-subcontinents-future-fate/?utm_source=TOInewHP_TILwidget&utm_campaign=TOInewHP&utm_medium=Widget_Stry&nbsp;

Tarek Fatah, an author, columnist and broadcaster, and an Indian born in Pakistan in 1949, in a blog in Times of India, May 31, claimed to have suggested to young Muslim youths in Delhi, ‘as a start they launch a petition asking the Indian and Delhi governments to rename the city’s ‘Aurangzeb Road’ and henceforth call it ‘Dara Shikoh Road’ after the poet prince who was beheaded by younger brother Aurangzeb. There was scattered laughter followed by silence.’ Can Indian Muslims expect even that the majority Hindu community today must forget what Aurangzeb and other like him did to Hindus? Hindus just expect that Indian Muslims don’t take pride in what Pakistani views.

http://blogs.timesofindia.indiatimes.com/toi-edit-page/where-v-k-singh-errs-akbar-and-aurangzeb-are-not-two-sides-of-the-same-coin-they-are-opposites/?utm_source=TOInewHP_TILwidget&utm_campaign=TOInewHP&utm_medium=Widget_Stry&nbsp;

Akbar may remain part of Indian history because the way Akbar treated Hindus as described by many historians. Richard von Garbe wrote in his book ‘Akbar, Emperor of India’, “Of decided significance for Akbar’s success, was his patronage of the native population”. Akbar won over Hindu masses by granting them not only freedom to their faith but even adopted some of their practices out of respect and for the unity of his subjects. According to writer Mridula Chari, Mughal Emperor Akbar also embarked on a grand project to translate and transliterate the definitive Brahminical version of the Ramayana epic of 24,000 verses from Sanskrit into Persian. Completed in 1584, Akbar’s Ramayana was the first time the grand Hindu epic became available to the outside world. But how can Hindu not respect Prithaviraj and Rana Pratap more than Gaznavi, Ghori and Akbar. They had fought the daring battles for keeping their land independent. I wish Indian Muslims become generous and accommodative, and Indian Muslims allow their brethren Hindus to build the temples on the three sites of utmost value. And why should they not! as they are part of the brutal large scale conversions of Emperors like Aurangzeb. Muslims of India as responsible Indian citizens should take the right decision for their improved integrity in India by asking themselves these questions. Was Dara a lesser Muslim in the eyes of the Indian Muslim? Is Javed Akhatar, who said, ‘It is his right to say ’Vande Mataram’ and ‘Bharat mata ki jai’ a lesser Muslim than AIMIM MP Asaddudin Owaisi? Muslims must never vouch for what Aurangzeb did and what Owaisi or Muslims wish them to do today, to save this left over country that has been founded after sacrificing a major portion of Bharat against the will of the majority in a hurry because of the greed of few politicians. History says so. Indians now wish to live in peace with prosperity of everyone as the national goal. And under any pretext a real Indian will not like to loose even an inch of this land or any further division just for satisfying some rogues. We Indians of any caste, creed, religion must get harmonised to make the country a totally integrated nation. And the solution lies in increasing the modern education in Muslims and fortunately happening as reported-‘Student population rises 30%, Muslims beat national average’. http://timesofindia.indiatimes.com/india/Student-population-rises-30-Muslims-beat-national-average/articleshow/52680570.cms&nbsp;

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According to a new book ‘Ayodhya Revisited’ penned by Kishore Kunal, one of the distinguished IPS officers, “Babar never ordered demolition of the Ram Janmabhoomi Temple at Ayodhya. He never visited Ayodhya. The claim of the historians that Mir Baqi, the then governor of Oudh, got the Babri mosque constructed in 1528 is also fictitious,”The four great Mughal emperors – Babar, Akbar, Shahjahan and Jehangir – were liberals and never ordered demolition of any temple in the country. It was Aurangzeb who demolished Ayodhya Temple. Kunal is also planning to file an intervention petition in the Supreme Court, where the Ayodhya case is pending judgment following an appeal filed against the Allahabad high court judgment. 

http://timesofindia.indiatimes.com/city/patna/Aurangzeb-not-Babar-got-Ayodhya-temple-demolished/articleshow/52610272.cms. ……

Will the history taught in our school be revised? ”

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A new study funded by an IIT Kharagpur grant which brought together a geologist, a palaeoscientist and physicists from four scientific institutions to work on the excavations of a now-deceased ASI archaeologist, has found that the Indus Valley Civilisation was at least 8,000 years old, and not around 5,000 years old as previously believed.

If their evidence, published in Nature – the world’s most highly-cited interdisciplinary science journal – and using the ‘optically stimulated luminescence’ method on ancient pottery shards, is correct then it substantially pushes back the beginnings of ancient Indian civilisation. It proves that it took root well before the heyday of the pharaohs of Egypt (7000-3000 BC) or the Mesopotamian civilisation (6500-3100 BC) in the valley of the Tigris and Euphrates. The researchers have also found evidence of a pre-Harappan civilisation that existed for at least a thousand years before this, which may force a global rethink on the generally accepted timelines of so-called ‘cradles of civilisation’. Read it if you wish to know the details. In a similar manners, if the researches are carried out by Indian experts without any bias, many new truths will appear. 

http://blogs.timesofindia.indiatimes.com/academic-interest/before-the-pharaohs-fresh-scientific-evidence-should-make-us-question-earlier-views-about-the-indus-valley-civilisation/?utm_source=TOInewHP_TILwidget&utm_campaign=TOInewHP&utm_medium=Widget_Stry

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भारतीय राजनीति और पार्टियाँ 

आज़ादी के क़रीब ७० साल बाद भी हम राजनीति के क्षेत्र में एक दायित्व पूर्ण पार्टी ब्यवस्था की स्थापना नहीं कर पाये हैं. अधिकांश पार्टियाँ एक न एक परिवार की जागीर बनी हुईं हैं – कांग्रेस के सोनिया राहुल अभी तक नाना और दादा की देश हित किये त्याग की दुहाई दे एक क्षत्र मालिक बने हुये हैं, अपना कुछ कृतित्व न होते हुये भी. अपना जड़ ख़ुद खोद रहे हैं जब कि पूरे देश के समझदार लोग इसे एक दूसरी बडी पार्टी की तरह बचे रहना पसन्द करेगा. आज भी कांग्रेस के शासन को अगर वे जनतांत्रिक आधार पर कर दें तो पार्टी की उम्र बढ़ जायेगी और उनका सम्मान भी जनता में और देश की यह दूसरी राष्ट्रीय पार्टी बनी रह सकती है जो देश हित ज़रूरी है. दुर्भाग्यवश यह राष्ट्रीय पार्टी केवल चमचों या मनसबदारों की पार्टी बन रह गयी है. पर यहां कोई बदलाव के आसार नज़र नहीं आते. सोनिया, राहुल और उनके सिपासलारों का केवल एक सूत्रीय एजेंडा है मोदी का हर बात में बिरोध, भले ही उससे देश का कितना भी बडा अहित क्यों न होता हो. अब राज्य सभा में चिदम्बरम, कपिल सिबल, और जयराम रमेश को एक मात्र इसी काम के लिये लाया गया है. 
सपा मुलायम सिंह यादव के परिवार की रह गई जब लोक सभा चुनाव में उनके दल से केवल उनके परिवार वाले जीत सके. आज़म खान तो थे हीं मुसलमानों के नाम पर, अब अमर सिंह भी लाये गये केवल राजपूतों का भोट लेने के लिये जैसे सभी राजपूत यादवों की तरह बेवक़ूफ़ बनाये जा सकते हैं. प्रदेश की सारी सम्पदा को अपने पास कर लेने का एक मात्र ध्येय है इनकी राजनीति का. 

राजद लालू प्रसाद के पूरी तरह अधीन है. वे तो चुनाव लड़ नहीं सकते क़ानूनी पावन्दी के कारण. बिहार में दो बेटे मंत्री बन गये. उनमें एक उप मुख्य मंत्री बन नीतीश से बढ़ चढ़ कर बोल रहा है. अब बडी बेटी राज्य सभा में आ गई. याद रहे कि यह उनकी वही बेटी है जो बिहार के नामी पटना मेडिकल कालेज में सर्वप्रथम आई थी और जिसे उसके शुभचिन्तकों ने प्रैक्टिस नहीं करने की सलाह दी थी जिसे मीसा ने माना भी. लालू प्रसाद ने राम जेठमलानी को भी राज्य सभा में भेजा है. कारण सभी जानते हैं. जेठमलानी लालू को क़ानूनी तकलीफ़ों में उपचार होंगे. 

दूसरे अन्य प्रदेशों में भी पारिवारिक पार्टियाँ हीं महत्व रखती हैं- शिव सेना थैकरे परिवार की, या शिरोमणी अकाली दल बादल की, और इसी तरह डी. एम. के करूना निधि की. तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में भी नायडू और राव के बेटे आ रहे हैं बागडोर सम्भालने. 

कुछ पार्टियाँ एक ब्यक्तिविशेष के बल पर चल रहीं हैं- टी. एम. सी ममता बनर्जी , आम आदमी केजरीवाल, जेडीयू नीतीश कुमार. इनकी ब्यक्तिगत महात्वाकाक्षायें देश के हित के ऊपर है. सभी देश के प्रधानमंत्री बनने की होड़ में है. नीतीश को लीजिये-कभी राष्ट्रीय पार्टी बनाने की कोशिश, कभी गठबंधन की बातें करते हैं. जनता द्वारा दी पद की शक्ति का उपयोग कर अपने राज्य को शिरमौर बनाने पर ध्यान नहीं देते. पिछले दस सालों में शिक्षा क्षेत्र को सुधार नहीं पाये, न स्वास्थ्य क्षेत्र को. साठ सालों के बाद भी हर पंचायत में एक सामान्य स्वास्थ्य केन्द्र तक नहीं है. एक राज्य को समृद्ध बना न सके, पूरे देश को क्या बनायेंगे. अबोध जनता को बरगला अपना उल्लू सीधा करना इनका एकमात्र लक्ष्य है. 

इन पार्टियों का एकमात्र लक्ष्य केवल पार्टी के लिये साम, दाम, दंड या भेद से धन संग्रह करना होता है, अत: बाहुबलियों का वर्चस्व होता है. यह स्थिति उस परिवार के या ब्यक्ति के लिये तो फ़ायदेमन्द है पर क्या देश का भला हो सकता है? दुख की बात एक और है- ये पार्टियाँ अपने सदस्यों को कोई समाज निमित्त सेवा कार्य करने को प्रोत्साहन नहीं देतीं. राष्ट्रपिता गांधी भी समाजसुधार के रास्ते राजनीति में आये और शिक्षा, स्वास्थ्य एवं घरेलू उद्योग के ज़रिये समाज में सुधार किये. आज भी कांग्रेस सेवा दल है, पता ही नहीं चलता क्या करता है. मोदी का स्वच्छ भारत, और योग का बढ़ावा शायद राजनीतिक लाभ भले नहीं दें, पर लोकहित एक बडा क़दम हैं. राष्ट्रीय सेवा संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल हिन्दू समाज से जातिगत भेदभाव को मिटाने का काम अच्छी सूझबूझ से तेज़ी से कर सकता था. साधु समाज को लोक कल्याण के कामों में लगाया जा सकता था. पढ़ी लिखी नयी पीढ़ी को एक सही राजनीति द्वारा ही राजनीति के साथ जोड़ा जा सकता है. सभी पार्टियों में शायद ही प्रजातांत्रिक तरीक़े से महत्वपूर्ण निर्णय लिये जाते हैं. पर समझ नहीं आता कि हमारी पार्टियाँ समय रहते ब्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ पायेंगी या नहीं. पुरानी पीढ़ी का होने के कारण कभी कभी अफ़सोस होता है ……कभी कभी लगता है प्रजातंत्र की सफलता के लिये क़रीब शत प्रतिशत शिक्षित एवं समझदार नागरिकों की ज़रूरत है और शायद इसीलिये आज के राजनीतिज्ञ -लालू प्रसाद, मुलायम जैसे लोगों को शिक्षित करने में ध्यान नहीं देते. क्या भोले भोटर समझ पायेंगे इनकी चाल…..शिक्षित वर्ग अपने स्वार्थ सबसे ही ऊपर नहीं उठ पा रहा है….सब आज की अपनी कमाई में व्यस्त हैं. देश के कल का किसे चिन्ता है….वे किसी और वर्ग का काम है और कौन है वह वर्ग कोई नहीं जानता.

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