July 15

आज की कविता

जीवन का अन्तिम यह कालखंड
कुछ बात पते की कहना है
मैं क्या जाना या क्या समझा?
क्या कहूँ कि जीवन क्या होता
क्या जीवन एक भ्रम मुश्किल सा
या बहुत सरल यह कहानी सा ।
होता है प्रारंभ एक शून्य से जो
हर समय कुछ जुड़ता रहता है
पर साथ भी घटता रहता कुछ
कोई आता है कोई जाता है
कुछ खोता है फिर कुछ मिल जाता।
फिर गुणा भाग भी देखा हूँ
एक में बढ़ना एक में घटना ।
पर अन्त तो आना है निश्चित
इससे कोई न बच पाया।
शून्य शुरू भी अन्त भी है
कुछ शून्य को अनन्त समझते
है अनन्त शुरू अनन्त अन्त ।
क्या सत्य जानना है मुश्किल
आजतक का अनुभव तो यही रहा
गर कुछ बदल गया जाते जाते
तो शायद बतला कर जाऊँ ।

July 15

आज की कविता

जीवन का अन्तिम यह कालखंड
कुछ बात पते की कहना है
मैं क्या जाना या क्या समझा?
क्या कहूँ कि जीवन क्या होता
क्या जीवन एक भ्रम मुश्किल सा
या बहुत सरल यह कहानी सा ।
होता है प्रारंभ एक शून्य से जो
हर समय कुछ जुड़ता रहता है
पर साथ भी घटता रहता कुछ
कोई आता है कोई जाता है
कुछ खोता है फिर कुछ मिल जाता।
फिर गुणा भाग भी देखा हूँ
एक में बढ़ना एक में घटना ।
पर अन्त तो आना है निश्चित
इससे कोई न बच पाया।
शून्य शुरू भी अन्त भी है
कुछ शून्य को अनन्त समझते
है अनन्त शुरू अनन्त अन्त ।
क्या सत्य जानना है मुश्किल
आजतक का अनुभव तो यही रहा
गर कुछ बदल गया जाते जाते
तो शायद बतला कर जाऊँ ।

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कुछ आध्यात्मिक विचार

२.८.२०२६
आज सबेरे मेरे पाठ में यह नीचे का श्लोक आ गया,जो दुनिया के सब बाल, युवा, गृहस्थ, वृद्ध के लिये सबके लिये उपयुक्त है। कृपया पढ़े, समझे पढ़ायें।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥५.२९॥
भोक्तारम् यज्ञ-तपसाम् सर्व-लोक-महेश्वरम् ।
सुहृदम् सर्व-भूतानाम् ज्ञात्वा मां शान्तिम् ऋच्छति ॥
मुझे यज्ञ और तपस्याओं का भोक्ता, समस्त लोकों का बलशाली ईश्वर, समस्त प्राणियों का मित्र जानकर मनुष्य शान्ति को प्राप्त होता है ।

स्वामी रामसुखदास के किये गीता की मेरे सबसे अच्छी व्याख्या में उन्होंने यह लिखा है-

भगवान सभी भक्तों के द्वारा होनेवाली सभी क्रियाओं के भोक्ता भी है (९.२७)। भक्तों के प्रेम के भोक्ता भी भगवान ही हैं। कोई किसी को श्रद्धा से नमस्कार करता है तो उसके भोक्ता भी भगवान ही हैं, क्योंकि सबमें में तो वही विराज मान है। कोई किसी अपने देवता की पूजन करता है तो उसके भी भी वही हैं। सम्पूर्ण संसार के कण-कण में वही हैं। अत: सभी के द्वारा किये गये सभी शुभ कर्मों के भोक्ता हैं, संपूर्ण लोकों के ईश्वरों केभी ईश्वर हैं और सबके सुहृद है- ऐसा दृढता पूर्वक स्वीकार से ममता हटकर भगवान में आत्मीयता हो जाती है, जिसके चलते परम शान्ति की प्राप्ति मिल जाती है। यही परम निर्वाण है, यही ब्रह्म-परमात्मा स्वरूप, सत्- चित-आनन्द स्थिति है।

भारत के सभी शास्त्र ग्रंथों- वेदों, उपनिषदों, रामायनों में कहा गया है। केवल एक प्राचीन ईशोपनिषद् (उपनिषद) का एक मंत्र दे रहा है नीचे-

यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥मंत्र ७॥
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य के अन्दर यह परमोच्च चेतना जाग गयी है कि स्वयम्भू आत्मसत्ता ही, परम आत्मा ही स्वयं सभी भूत, सभी सत्ताएं या सम्भूतियां बना है, उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र आत्मा की एकता ही देखता है।


In what I consider the best commentary on the Gita—authored by Swami Ramsukhdas—he writes:
The Lord is the enjoyer of all actions performed by all devotees (9.27). It is the Lord who accepts and enjoys the love offered by devotees. When someone offers salutations to another with reverence, the Lord is the ultimate recipient, for He resides within everyone. When someone worships a particular deity, He is the one being worshipped there as well. He pervades every single particle of the entire universe. Therefore, He is the enjoyer of all auspicious deeds performed by everyone, the Supreme Lord of the lords of all worlds, and the true friend of all. Firmly accepting this truth dissolves worldly attachments and fosters a deep sense of kinship with the Lord, leading to the attainment of supreme peace. This is supreme liberation (Nirvana); this is the state of Sat-Chit-Ananda (Truth, Consciousness, and Bliss)—the very nature of the Supreme Spirit (Brahman).

When a man has known Me as the Enjoyer of sacrifice and tapasya (of all askesis and energisms), the mighty lord of all the worlds, the friend of all creatures, he comes by the peace.

He in whom it is the Self – Being that has become all existences that are Becomings, for he has the perfect knowledge, how shall he be deluded, whence shall he have grief who sees everywhere oneness ? (महर्षि अरविन्द का अनुवाद)

By recognizing Me as the enjoyer of sacrifices and penances, the mighty Lord of all worlds, and the friend of all living beings, man attains peace.

राम चरित मानस: एक मित्र को लिखा पत्र

राम-सीता (पुरुष-प्रकृति, परमात्मा- माया)
एक दिन आपकों सीता के बारे में कुछ कहा था। आपने मुझे रामायन के उन अंशों को उद्धृत करने को कहा था। मुझे अब याद नहीं रहता। मैं उन अंशों उदृत कर कर भेज रहा हूँ ।

पुरुष और प्रकृति
रामचरितमानस (बालकाण्ड के मंगलाचरण से)
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥5॥

उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥5

२ शिव पार्वती जनकपुर की वाटिका में सीता का उमा का वन्दन-

नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥4॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥4॥

अयोध्या कांड वाल्मिकी की सीता-राम का स्वागत भाषण
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।

——*——-

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कुछ याद आया

अपने बरामद से

अपने बरामदे में लगे 

लोहे के सिकंचों के पीछे से

आज जो देखा, क्यों नहीं देख 

पाया था पहले।

होली के दिन प्रात: प्रात: 

लाल लाल सोने की थाली से 

प्यारे लगते सूरज को 

देखा और देखता रहा।

अनजानी ख़ुशी आँखों से 

पूरे शरीर को पुलकित कर गई, 

मैं देखता रहा जबतक संभव न रहा।

उसी दिन रात गये 

अचानक जब  नींद खुली

उसी बरामदे से एक और नजारा 

देखा

अद्भुत सुन्दर चाँद को 

अपनी छटा बिखेरते 

और देखता रहा 

जबतक आँखें झपने न लगी। 

क्यों हो गये आज 

सूरज चाँद दोनों इतने प्रेय

यह घर यह बरामदा तो 

बरसों से मेरा ही रहा 

पर इस सूरज और चाँद को 

पाने में कैसे लगे इतने दशक।

और आज ही एक और दृश्य 

शाम का था

मन को असीम आनन्द देता-

आसमान साफ था और आज नीला नीला 

दूर गगन में पक्षियों की छोटी छोटी पाँतें 

देखा लौटते हुए दूर बसेरे की तरफ ।

लगा था मैं भी दिन का थका हारा 

लौट रहा हूँ फिर 

अपने घर की तरफ 

सबेरे शायद इन्हें जाते देंख पाता नहीं

शायद हमारा समय रहा अलग अलग।

जीवन की शाम में अकेला रहते हुए

ऐसे ही छोटी छोटी बातें 

कुछ क्षण की ख़ुशी दे जातीं 

जीने का कुछ तो बहाना बन जातीं।

जीवन ऐसे ही निकल जाता है

एक पटाक्षेप जब होता है तबतक 

हमें ख़ुशी का बहाना ही

नहीं मिल पाता….

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बंगाल का चुनाव- मेरी प्रतिक्रियाएँ

पश्चिम बंगाल की राजसत्ता- मुख्य मंत्री और उनका सत्ताकाल

यह सब काल मैं देख सका हूँ –
*1. Glorious Period- Durgapur, Salt Lake, Kalyani
Bidhan Chandra Roy: Jan 1950 – July 1962 (First CM of the state)
Prafulla Chandra Sen: July 1962 – Feb 1967

*2 Congress on decline
Ajay Kumar Mukherjee: Mar 1967 – Nov 1967 (First term)
Prafulla Chandra Ghosh: Nov 1967 – Feb 1968

  • Period of uncertainty with slow deterioration
    President Rule: Feb 1968 – Feb 1969
    Ajoy Kumar Mukherjee: Feb 1969 – Mar 1970 (Second term)
    President’s Rule: Mar 1970 – Apr 1971
    Ajay Kumar Mukherjee: Apr 1971 – June 1971
    President’s Rule: June 1971 – Mar 1972
    Siddhartha Shankar Ray: Mar 1972 – Apr 1977
    President’s Rule: Apr 1977 – June 1977Jyoti

*Communist Era- all major industries getting winding up
Jyoti Basu: June 1977 – Nov 2000
Buddhadeb Bhattacharjee: Nov 2000 – May 2011
*
Mamta Era- Hope of revival vanished soon….Decline of communists era got speeded up she continued with cadres of communists converted as TMC member and bad practices like syndicate system flourished..
Mamta Banerjee: May 2011 – Present (as of May 2026)
*
4 May 2026 BJP Era begins with thumping majority. A new Era has begun with hope of Bengal getting its due place in five years (To be continued)
काश! अंग, बंग और कलिंग वैसे ही समृद्ध हो पाते जिसके लिये इतिहास उन्हें जानता है।
उदाहरण
बंगाल के चारों इंजीनियरिंग कालेज खड़गपुर, शिवपुर, यादवपुर और दुर्गापुर सभी आई. आई. टी. बन पाते। और १० नये मेडिकल कालेज होते AIMS भी से १०० नर्सिंग स्कूलों तक…
२०-२० केन्द्रीय और कस्तूरबा विद्यालय, सभी स्कूलों की शिक्षा STEM के विषयों को प्राथमिकता देती और सभी में अटल टिंकरिंग लैब होता। १००० आई.टी. आई सभी हुनर के इच्छुक बच्चे बच्चियों को प्रोत्साहित प्रशिक्षण के लिये।
सभी पुराने मैनुफैक्चरिंग के उद्योगों को फिर से नये रूप चालू किया जा सकता। हलदिया में पानी के जहाज़ बनाने की व्यवस्था…+++
बंगाल की हस्तकला मसलिन और प्रसिद्ध करघा कपड़ा उद्योग ……

सोनार बांग्ला की फिर वापसी- कला, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, नृत्य, नाटक, चित्रकला…

बंगाल चुनाव-कुछ लोगों की, कुछ जगहों की बातें

एक्ज़िट पोल आ चुका है। पर पता नहीं क्यों मेरा आज इस पर विश्वास नहीं रहा। सभी एसी पोल करानेवाली कंपनियाँ व्यवसायिक बन चुकी हैं और उनके विचारों में कहीं न कहीं से राजनीतिक प्रभाव निकल ही आता है।

पर यह पहली बार है कि इस बार यूट्यूब के कारण कुछ अच्छी जानकारियों को पा सका, बंगाल के, विशेषकर कोलकाता के बारे में, अपने आदर्श बंगाली महापुरूषों के जीवन सम्बन्धी और स्थान सम्बन्धी।

कोलकाता से ट्राम गईं या नहीं पता नहीं, पर यह ज़रूर जान पाया कि आदमी द्वारा खींचा जाने वाला रिक्शा ज़रूर अभी वहाँ हैं। मुझे अभी याद है कलकत्ता में बरसात के दादाजी कभी कभी मजबूर कर मजबूर कर देते उस पर चढ़ने के लिये। मुझे बहुत बुरा लगता था। अंग्रेजों के जमाने में वह चलता था।

कोलकाता में अभी भी हमारी एम्बेसडर पीली टैक्सियां हैं शान से चलती हुईं। हिन्दुस्तान मोटर्स के दिन आ जाते हैं। वैसे दक्षिण भारत में दिखने को मिलतीं हैं।वैसे ओला, उबर की टैक्सियाँ ही आजकल पूरे देश में दिखाई देती हैं।

कल मैंने एक वीडियो सर आशुतोष मुखर्जी (मुखोपाध्याय) के घर का देखा। सर आशुतोष मुखर्जी को बांग्ला बाघ ( Bengal Tiger) कहा जाता था, वे अपने समय के नामी गणितज्ञ और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।उनके प्रसिध्द पुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी और रामा प्रसाद मुखर्जी थे।बाद में श्यामा प्रसाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़े और राजनीतिक दल जन संघ की स्थापना की जिससे भारतीय जनता दल आया बाद में। वे नेहरू के प्रथम सरकार में रहे और काफी कुछ किया। बाद में कश्मीर में उनकी मृत्यु हुई। रामा प्रसाद मुखर्जी कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस थे।शायद इन्हीं के लड़के शिवतोष मुखर्जी, प्रेसीडेंसी कालेज में वायलोजी के मेरे प्रोफेसर भी रहे।

असीम दासगुप्ता जो प्रेसीडेंसी कालेज से अर्थशास्त्र के उनके जीवन सम्बन्धी वार्तालाप को सुना।वे अमरीका में भी पढ़ाने गये थे।

इन्हीं सबमें समय निकल जाता है आजकल

बंगाल प्रेम और मेरा कड़वा अनुभव
मैं बहुत बचपन में सात आठ की उम्र से बिहार के गांव से दादाजी बंगाल में आया था। वहीं पढ़ा, पहले ‘बिरलापुर विद्यालय’, फिर प्रेसीडेंसी कालेज और उसके आई. आई. आई. टी। प्रेसीडेंसी कालेज के हिन्दू हास्टेल में शाकाहारी खानेवाला मैं शायद ही किसी दिन पेट भर पाया। हिन्दी भाषी और बहुत थोड़े ही थे २-३। पर बिरलापुर और प्रेसीडेंसी में बहुत कम दोस्त बन पाये।लगता काफी बंगाली शायद हमें हेय दृष्टि से देखते थे। पर खड़गपुर माहौल बदल गया और भारत के हर कोने के लड़के मिले। हाँ, स्टाफ़ में अधिकतर लोकल थे। उनसे बहुत सावधानी बरतनी पड़ती थी। अम्बैसेडर बनाने वाली उत्तरपारा के नज़दीक की हिन्दुस्तान मोटर्स फिर देश के हर देश के लोग थे। कामगारों और निचले सुपरवाइज़र स्तर तो बंगाली थे पर ग़ैर बंगालियों की काफ़ी संख्या थी। लेबर यूनियन बड़ी तगड़ी थी पहले कांग्रेस की, फिर कम्युनिस्ट की और उनका प्रबंधन बहुत समझदारी से करना पड़ा। मैं वहां करीब ३७ साल तक काम किया।कुछ दिन बिधाननगर साल्टलेक में रहा, क्योंकि मैंने वहाँ मकान बनवाया था। पर माहौल पूरा बंगाली तरीक़े का था और कहीं आना जाना संभव नहीं लग रहा था कभी कभी पड़ोसी सेन बाबू के घर को छोड। अपने निर्णय की ग़लती का धीरे धीरे अहसास होने लगा। और २००५-७ तक राजेश राजेश सेफाली के अमरीका जाने पर बेंच दिया, क्योंकि लगा कि नोयडा में रहते हुए अपनी विधान नगर की CJ ब्लॉक की सम्पत्ति बचानी मुश्किल होगी।
बंगाली भद्र कहानेवाले पुरूष एवं महिला बंगाल के बाहर जा कुछ और बन जाते स्थानुसार। पर बंगाल की माया नहीं छोड़ते। पहले ही जैसे थे आज भी वहां पहुंचते वैसे से ही हो जाते हैं। आज आख़िरी चुनाव का दिन है। चल रहा है। कल मैं एक यूट्यूब इस विषय पर, जिसे मैं आप सबके लिये साझा कर रहा हूँ, जो देखेंगे , वे मान लेंगे कि मैंने ठीक कहा या नहीं।
राष्ट्रीय सेवा संघ बहुत वर्षों से वहां काम कर रही है। पहली संसद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, उनका योगदान बंगाल हर व्यक्ति जानता है और भी लोग भद्र परिवार जो हिंदू परम्परा के साथ हैं। कोलकाता के पुराने लोग १९४७ के अगस्त महीने के स्वतंत्रता दिवस पर महात्मा गांधी कलकत्ता में थे क्योंकि वहां उस समय सबसे बड़ा हिन्दू मुसलमान का दंगा हुआ था। कुछ बंगाली हिन्दू ही मिहनत कर कलकत्ता को भारत में रख पाये।
पर उसके बंगाल के सभी चीफ मिनिस्टर प्रधानमंत्री को वह सम्मानित दर्जा नहीं दिये जो देना चाहिये। बिधानचन्द्र राय न दिल्ली जाते थे पर नेहरू से काम करवा लेतेथे। इसी कारण पहली आई आई टी खड़गपुर में बनी। जो नया काम हुआ, उद्योग फूले फले उन्हीं के समय हुआ। बंगाल पूरे देश की शिरमौर बना रहा।
पर बिधान राय के बाद बंगाल के पतन का वह दौर चला कम्युनिस्ट ज्योति बसु के लम्बे राज्य काल में, जिसके के कारण उनके बाद के कम्युनिस्ट नेता नहीं सँभाल पाये। ममता कांग्रेस में रही, फिर अटल बिहारी की सरकार में भी मंत्री बनीं। वही मौक़ा देख अपनी नई पार्टी बना बंगाल का चुनाव जीत मुख्य मंत्री हैं और अब तो अपने भतीजे को अपना उत्तराधिकारी बना परिवारवादी राजघराना बनाने में सफल हो गई। शायद आजीवन वही या उसका परिवार ही राज्य करे गांधी परिवार की तरह। ममता से बहुत उम्मीदें थीं, पर वह अपनी गद्दी को बचाये रखने के लिये सब कुछ करती रहीं है, करतीं रहेंगी।
इस बार के चुनाव में मोदी, अमित साह और बहुत से भाजपा के लोग पूरा जोर लगा दिये है, पर बंगाल लोगों को मा, माटी, मानुस प्यारा है, भारतवर्ष से भी ज्यादा। आप इस यूट्यूब को जरूर देखें हिन्दी, अंग्रेज़ी दोनों में वार्तालाप है। मैंने कुछ चीज नोट की- १. रास्ते की दुकानों के मालिक अधिकांश ग़ैरबंगाली हैं, उनके लिये यह काम निम्न है। २. कलकत्ता में आदमी के खींचे जानेवाले रिक्शे अभी हैं। ३. एम्बेसडर कार पीली टैक्सी की तरह चलती है।

“Bengal Elections | Who’s On Track To Victory? Bengal’s Most Iconic Ride | NDTV Chai Stop” on YouTube-

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हिन्दमोटर कॉलोनी को खंडहर होने की तस्वीरों को देख 

कल उन फ़ोटों को Whatsapp पर देखा। कुछ यादें आ गईं। शाम को बिरलापुर में रहते अपने चचेरे भाई से बात किया। बिरलापुर की फैक्ट्री लोढा चला रहे हैं ठीक ठाक। और पूरा बिरलापुर करीब करीब  वैसे ही है। 

मेरी ज़िन्दगी का दो बड़ा हिस्सा दो बिरला परिवार के औद्योगिक संस्थानों में बीता है। पहला बचपन से स्कूली शिक्षा तक बिरलापुर में जो माधव प्रसाद बिरला के एक मात्र भारतीय स्थापित बिरला जूट मिल्स के अहाते में था। मुझे वहां के शीर्ष मैनेजरों- स्व. राम लाल थिरानी एवं महावीर प्रसादजी का असीम प्यार मिला अच्छे विद्यार्थी होने के कारण। करीब ६ साल बाद प्रेसीडेंसी कालेज एवं चार साल आई.आई.टी, खड़गपुर के १९६१ में हिन्दुस्तान मोटर्स में आ गया और अन्त तक रहा। जया इंजीनियरिंग से आये मशीन शॉप के पहले प्रबंधक शिवप्रसाद, बी.एमशारदा, एन.के बिरला, और फिर श्री एस.एल. भट्टर जी अपनी न हारने की प्रवृत्ति के के बहुतों का प्यार शायद आदर भी पाया। पहले तीनों का मैं प्रिय था, पर भट्टरजी में शायद मेरी हिन्दुस्तान मोटर्स में अर्जित इंजीनियरिंग की जानकारियों के कारण कुछ शंकाओं के बारे में मुझ पर ही विश्वास करते थे। मैंने अपनी फ़ोटो ऑटोबायोग्राफ़ी में कुछ व्यक्तिगत विवरण हैं। https://drishtikona.com/wp-content/uploads/2012/08/over-the-years1.pdf ( इस वेबसाइट पर आप मेरे संकलित चार उपनिषदों, गीता, और रामचरितमानस के चुने हुए अंश मेरी भूमिका के साथ पढ़ सकते हैं और एक भारत के प्राचीन काल से लेकर १९-२० सदी के प्रमुख वैज्ञानिकों बारे में हैं।मेरी कुछ कविताएँ एवं लेख भी हैं जो आप अपनी रूचि के अनुसार पढ़ सकते हैं।

विभिन्न विभागों में काम करते हुए बहुत बदलाव किया जो उस समय के मैनुफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी के मान दंड बन गये और देश के अन्य बड़ी बड़ी कम्पनियों में भी मुझे जाना गया। यूरोप और जापान के साथ दक्षिण एशिया- तैवान, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि एसिया  के देशों के दौरों में बहुत सीखा और सिखाया भी, इज्जत भी मिला। 

पर अन्त में एक ऐसा पीढ़ी गत बदलाव लाया जो निजी कम्पनियों में स्वाभाविक होता है मालिकों की पीढ़ी बदलने पर। बिरला परिवार और देश की सबसे बड़ी जानीमानी हिन्दुस्तान मोटर्स में भी वही हुआ। और २०१५ में एक दिन अपनी शताब्दी पूरा करनेके पहले ही हिन्दुस्तान मोटर्स बन्द हो गई।आज हज़ारों लोगों की जीवन के हजारों लाखों सबसे यादगार यादों के घर खंडहर बनते जा रहे हैं। 

क्या बिरला कहानेवाले वे युवा से वृद्ध हुए मालिक अपने बाप दादा के इज्जत को ताक पर रख हिन्दमोटर का आशियानों का यह हाल कर दिये? क्या हिन्दुस्तान की वस्ती को बचा कर अमर नहीं हो सकने का ख्याल नहीं आया होगा? 

आज एक सड़क के पच्छिम की पूरे के पूरे की बस्ती वैसी की वैसी एक हिन्दमोटर रेसीडेंट एसोसिएशन बना उसके हवाले नहीं कि जा सकती थी? 

बहुत बहुत पहले मैंने के डी रूंगटाजी को कहा था कि नौकरी करने लायक न रहने पर बिरला जी को कहूंगा कि हमें तालाब किनारे का एक टी एच का घर दे देंगे और मैं वहीं रहना चाहूँगा। 

आज भी अगर औरंगज़ेब रोड या जहां कहीं भी चन्द्रकान्त जी हैं, उनसे मेरा यही अनुरोध रहेगा। 

हाँ, अपने आख़िरी सालों में एक दिन चन्द कान्त बिरला फैक्ट्री में आये थे और राउडं पर। मैं भट्टरजी के साथ थोड़ा पीछे था। भट्टरजी अचानक मुझसे पूछ बैठे-‘ क्या इस फैक्ट्री को बचाने का कोई उपाय नहीं हैं।’ मेरे मुँह से निकल गया था, हाँ है, इस फैक्ट्री को ४-५ स्वतंत्र इकाइओं में बांट दीजिये और उन्हें व्यवसायिक रूप से अलग कर दीजिये योग्य लोगों के मातहत।’ कुछ मिनट चुप रहे…’ फिर बात करेंगे।’

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सनातन धर्म की विडंबना

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति । ऋ. 1.164.46
-एक ही सत्य को विद्वान अलग अलग रूपों में व्यक्त करते हैं।
ये विद्वान कौन ऋषि से जिन्हें वेद ने अलग अलग रूपों में व्यक्त करने का अधिकार दिया था। उनमें बहुतों ने अपना नाम भी नहीं बताया, न अपनी जाति या वर्ण के बारे में कहीं कुछ लिखा। वे किसी से पूजे जाने की इच्छा नहीं रखें।वे साक्षात् परमात्म त्तत्व का स्वयं में अनुभव किये और बहुत बाद में आज तक अपने ज्ञान के कारण सभी वर्ग और श्रेणी के लोगों से पूजे गये। वे ब्रह्मज्ञानी बने और ब्रह्म विद्या की शिक्षा दी कुछ योग्य शिष्यों को ब्रह्मविद बनाया।
और शंकराचार्य आदि ब्रह्मज्ञानी सदियों बाद उन ग्रंथों का भाष्य लिखा, जो हमें अपने अलग अलग भाषाओं में उपलब्ध हैं। वे सनातन धर्म के प्रचार प्रसार में जीवन खपा दिया।

हजार साल के करीब तुलसीदास हुए, उन्होंने महर्षि बल्मिकी के रामायण पर आधारित राम की कथा लिखी।

तुलसीदास जी ने भी मानस में लिखा-
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता

  • हरि अनंत हैं यानि उनका कोई पार नहीं पा सकता और इसी तरह उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं।

पर वे संत कौन कहे जायेंगे और असंत कौन तुलसीदास के रामचरितमानस में बहुत जगह, बहुत प्रसंग में वर्णित किया है। वालकाण्ड, अरण्यकाण्ड में, उत्तर काण्ड में और भी जगह।
यह समस्या तुलसीदास के समय भी आई होगी, अत: कलिकाल के लोगों के आचरण का उत्तरकाण्ड में बहुत बेवाक रूप से वर्णन किया है।

उपनिषदों भी इस विषय पर एकाध श्लोक हैं- पर महाभारत काल में परमात्मा के सगुण अवतार कृष्ण ने युद्ध के मैदान में भगवदगीता का उपदेश दिया, जिस गीता को सनातन धर्म सबसे श्रेष्ठ ग्रंथ माना गया। कृष्ण ने इसकी जरूरत को अच्छी तरह समझी। जब एक तरफ परमात्म तत्त्व को एकमात्र सत् बताया, दैवी सम्पदा, आसुरी सम्पदा, नरक आदि का विस्तार से वर्णन किया। अध्याय सोलह में दैवी सम्पदा पर केवल ढाई श्लोक दिये जब बाद बाक़ी पूरा अध्याय केवल आसुरी सम्पदा की विस्तृत चर्चा की, यमराज वाले भीषण यातना मिलने वाले नरक का कारण बताया, सभी के समझ में आनेवाले आचरणों को बता कर।आज ज़रूरत है उस एक अध्याय के उपदेश को सब भाषाओं के संतों को पूरे देश के हर नागरिक तक सरल भाषा में पहुँचाने की ज़रूरत है। इससे ही देश जगेगा। दुःख यह कि आज के संत जो ख़ासी धन राशि कमाना सीखे हैं, श्रोता से कमाई कर, वे इसे नहीं करेंगे।
फिर कौन करेगा यह?

अगर सनातन हिन्दू केवल तुलसी के विचार से जो संत हैं उन्हीं को संत माने तो कोई दिक्कत नहीं। धीरे धीर असंत भी केवल भेषभूषा से अपने को असंत घोषित कर दें या कोई भी अपने को आत्मश्लद्धा के विभिन्न तरीक़े से संत बना लेता है, शिष्यमंडली बना लेता है जो उस संत का गुणगान कर, विभिन्न प्रकार के प्रचार के तरीक़े से महान संत बना दे, तो साधारण बुद्धि का विना संसारिक हथकंडों को न जानता उस असंत को अस्वीकार कैसे कर दे। कैसे तो पहचान हो। आजकल तो भीषण रूप से घातक सोशल मीडिया के भरोसे शायद यह संभव ही नहीं है।

इस बात को हमारे देशभक्तों को सोचना है…आप पढ़िये, समझिये, और सनातन को अपनाइये।एक श्लोक में सनातन सिद्धांत है..आप ईशोपनिषद का पहला श्लोक ले सकते हैं –
या भगवद्गीता का एक और आत्मसात् कर।
पूछ सकते हैं….my email- irsharma@gmail.com

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यह बदलता बिहार क्या सच में बदल जायेगा?


महीनों पहले ग़ाज़ीपुर के चमड़े के एक उद्योग के बारे में पढ़ा और सुना था। वे रशिया के थल सेना के जवानों को और अन्य नागरिक ज़रूरतों को पूरा करते थे। वैसी फ़ैक्टरियाँ हर ज़िलों में जहाँ कच्चे माल चमड़े के लिये बहुतायत में पशु अभी भी हैं, लग सकती थीं। यह आम जनता के व्यवहार का उद्योग है, पूरे विश्व के लिये बनाया जा सकता है।
कल ‘प्रिन्ट’ में एक लम्बा लेख देख देखा। बिहार के बहुत जरूरी पुराने रोज़गारी का काम देने वाले बहुत सारे खुलते उद्योगों के बारे पढ़ अच्छा लगा। बिहार में पहले इंजीनियरिंग कालेज और आई.टी.आई बहुत ही कम थे। लड़के लड़कियां विशेषकर गाँवों की, सब किसी तरह किसी विषय में स्नातक बन जातीं थी। वही बहुत समझा जाता था। मुझे अन्य प्रदेश के लड़कियों को हर क्षेत्र में हर विज्ञान और तकनीकी विषयों पढ़ने नौकरी की संख्या लड़कों के बराबर हो रही थी। जानकर दुख होता था। पर शायद यह बदल रहा है, पर विशेषकर गाँवों के बच्चों में यह जोश नहीं आया है। आशा है जल्दी अन्य प्रदेशों से बिहार की लड़कियां, खेल-कूद, नृत्य-संगीत आदि में भी प्रदेश का नाम बढ़ायेंगी। ये समाचार सुन, पढ़ अच्छा लगता है। लड़कियों में केन्द्र सरकार से मिलती अभूतपूर्व प्राथमिकता को देखते हुए, जल्दी बिहार की लड़कियां भी देश हर शहरों में स्वतंत्र रूप से काम करतीं दिखेंगीं। कल ही प्रधानमंत्री ने बहुत सारे केंद्रीय विद्यालयों एवं परिवर्द्धित आई.टी. आई बनवाने की घोषणा किये हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण रूप से पंचायतें और ब्लॉकों में काम करते आफ़िसर इतने भ्रष्ट हो चुके हैं कि मनरेगा से लेकर किसी भी केंद्रीय प्रोजेक्टों का पूरा लाभ सहीं योग्य लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता।
बिहार की लोगों की इन घटिया मनःस्थिति के लिये कौन ज़िम्मेदार है, केवल वहाँ के अब बुजुर्ग बनते लोग। उन्हें इसकी आत्मग्लानि नहीं, पर अगर कोई अपने धर्म सठीक पालन न करने पर राज्य, या केन्द्र सरकार तो ज़िम्मेदार नहीं हो सकती।
लोगों को इस बात का कोई असर ही नहीं पड़ता।
मेरे ख्याल से दुर्भाग्य वश बिहार राजनीति के जातिवाद को लेकर पिछड़ेपन में पड़ा हुआ रह गया। नेता ही नहीं बिहार में काम करते सैकड़ों आई.ए.एस आफ़िसर ही बिहार का बेड़ा पार अपनी दृढनिष्टा से कर सकने में सक्षम हो सकते हैं।
लेख तो अंग्रेज़ी में था, पर भाषा सरल है, नहीं कोई समझदार इसका गुग्ल ट्रांसलेशन की मदद से हिन्दी अनुवाद भी कर सकता है अगर पढ़ने की इच्छा है।
बिहार के लोगों को मानसिकता तो बदलनी ही होगी।
अगर आम लोगों में थोड़ी भी देशभक्ति है तो केवल देश करनेवालों को ही वोट दें, जो बिहार को सम्पन्न समृद्ध बना सकता है। कुछ नोटों के लिये ईमान न बेंचें।

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बदलते बिहार के पीछे का प्रयास

जानें माने समाचार पत्र ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ में आज एक बिहार के कृषि क्षेत्र की उपलब्धियों पर बडा सकारात्मक रिपोर्ट दिखा। वैसे तो लगता है यह किसी इस समस के सरकार के व्यक्ति का प्रयत्न है चुनाव के देखते हुए। पर फिर भी बहुत सारी सराहनीय बातें तो ज़रूर हैं। काश, बिहार के कृषि क्षेत्र के सफल प्रयोग करने वाले व्यक्ति द्वारा लिखा गया होता, तो यह ज्यादा विश्वसनीय होता।

“उत्तरी और मध्य जिलों में चावल गहनीकरण और गेहूँ गहनीकरण प्रणाली ने किसानों को बिना किसी अतिरिक्त रासायनिक आदानों या सिंचाई के अपनी उपज बढ़ाने में मदद की है। सरकार ने जलवायु-अनुकूल फसलों को भी प्रोत्साहित किया है और महिला स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया है। राज्य सरकार ने 2023-24 में कृषि यंत्रीकरण के लिए ₹11,900 लाख स्वीकृत किए हैं। 2020-21 और 2024-25 के बीच बिहार के 30 जिलों में जलवायु-अनुकूल कृषि कार्यक्रम लागू किए गए।”

इस रिपोर्ट में ही नीचे का यह फ़ोटो भी छपा है। हमारे गाँव,ननिहाल और ससुराल के गाँवों में भी बचपन से यह रोपनी करते हुए रोपनिहारिनों को देखा हूँ वे सब औरतें होतीं थीं। पुरुष केवल धान के बीजों को रोपने लायक हो जाने पर उखाड़ कर एक आंटी बना देते थे, फिर उन्हें बंडल या बोझा में माथे पर रखने रोपनी के लिये रोपे जाने वाले तैयार खेत में ले जाते थे, जहाँ रोपनिहारिनों एक समूह रोपनी करता था जब तक पूरा खेत नहीं भर जाता था। ये दोनों काम आज भी अधिकांश वैसे ही होता है, जो बहुत अस्वास्थ्यकर तरीका है। पैरों के अंगुलियों में बहुत तरह की तकलीफ़ हो जाती थीं, गन्दे पानी में देर तक काम करने के कारण। बाद में यह भी देखा कि पुरुषों ने भी यह काम करना चालू कर दिया।

आज बहुत तरह की मशीनें आ गई हैं, मशहूर महिन्द्रा ट्रैक्टर की कम्पनी भी इन मशीनों को बनाती है। साथ ही बहुत सस्ते छोटी मशीनें भी बाज़ार में हैं। मेरे ख्याल से इस काम को मशीन से करना ही ज़्यादा आसान और स्वास्थ्यकर होगा। सरकार को इन मशीनों को आसान तरीक़े से उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिये। सम्पन्नता आने पर और सरकारी मदद से शायद इसको करना चाहिये छोटे बड़े सभी किसानों के लिये। पहले फसल तैयार होने पर कटाई का काम भी हाथ से ही होता था, अब करीब अधिकांश मशीनों से होता है। साथ ही इस काम के लिये पैरों हाथों को चमड़े की तकलीफ़ों से बचाने का सरल उपाय सोचना चाहिये।

पंजाब इन मशीनों को बनाने बहुत दिनों से आगे है। दुर्भाग्य है कि पंजाब आज मैनुफैक्चरिंग में पीछे पड़ता जा रहा है। हमारे समय में वहां मैनुफैक्चरिंग में व्यवहृत सभी मशीनें बनती थीं। पर अब तो सिख के धार्मिक चिन्ह छोटी कटार भी चीन से आती हैं।

हमारे देश के व्यापारियों ने अपने फायदे के देश की रीढ़ मैनुफैक्चरिंग उद्योग का सबसे ज़्यादा नुक़सान किया है, अपने यहाँ से चीन में सैम्पल भेज हर चीजों को सस्ते बनवा आयात करने का, जो कोई सरकार रोकने सक्षम नहीं हो सकी, नहीं तो आजतक दिवाली की गणेश लक्ष्मी की मूर्तियां, आतिसवाजी, बिजली की लाइटिंग , यहां तक कि रक्षाबंधन की राखी तक चीन से क्यों आती। दैन्दिन के घर के उपयोग के व्यवहार किये जाने बस्तुओं में चीन के बने स्पेयर पार्ट ही बाज़ार हर दूकान पर क्यों मिलते! सरकारी मशीनरी को शायद यह पता ही नहीं या सरकारी अफ़सरों के कारण यह हुआ है और चलता जा रहा है। इसी कारण से चीन में बने बनारसी ओर कांजीवरम की नक़ली चीन में बनी साड़ियाँ भारत के दुकानों पर मिल जायेंगे।

कब तक चलेगा यह खेल व्यवसायियों का?

केवल प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भरता का दिन रात का पूरे देशवासियों से अनुरोध क्या माने रखता है? यही सदियों की पराधीनता से पैदा हुई मानसिकता का इतना नुक़सानदेहय परिणाम , जो देश झेल रहा है हर सौविलियन डालर से हमसे अधिक चीन से आयात का कारण।
(अनुरोध- जरूरी सुधार कर लें)

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चीनी दिवाली-कुछ प्रश्न


क्या जितनी चीन की चीज़ें दिवाली या अन्य त्योहारों या व्यक्तिगत आयोजन में आती हैं, उन्हें भारत सरकार की अनुमति से आती हैं और सरकार इसको ज़रूरी आयात समझती है? क्या इसके बिना यानी न होने पर हिन्दुस्तान के लोग को दूसरे देशवासी दिवाली का सम्मान नहीं देंगे? या ये जब चीन में भी नहीं बनते तो थो भारत में दिवाली या अन्य त्योहार नहीं आयोजित किये जाते थे? मैं जब आई.आई.टी, खड़गपुर में था, हमारे होस्टलों में बड़े पैमाने पर दीपोत्सव होता था तेल के दीप जला कर। कल अयोध्या में दीपोत्सव हुआ उनमें वैसे ही दीपों का व्यवहार हुआ। हमारी मानसिकता इतनी राष्ट्रीयता की बिरोधी क्यों होती जा रही थी।
शायद इस पीढ़ी को याद नहीं होगा कि स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री के प्रधान मंत्री काल अन्न के अभाव के कारण जबतक हम पैदावार नहीं बढ़ाते, हम हफ़्ते में एक दिन खाना नहीं खायेंगे का आवाहन।
या तो हिन्दुस्तान के वैज्ञानिक और मैनुफैक्चरिंग उद्योगों के मालिक और नये स्टार्ट अप इन सभी चीजों को ज़रूरत के हिसाब से अपने यहाँ बनायें या नहीं तो तबतक हम पुराने तरीक़े से दीप जला दिवाली मनायेंगे। मिट्टी या धातुओं के लक्ष्मी गणेश से पूजा कर लेंगे। अपने देश की राखी बाँधेंगे ।
शर्म आनी चाहिये देश के लोगों इस देश तरह देश को नीचा दिखाने की आदत से। ऑटोमोबाइल उद्योग आज परमानेंट मैगनेट के लिये हाय तोबा मचा रहे है, उद्योग बन्द होने का रोना रोते हैं, उन्हें चीन की वस्तुओं को देश में बनाने का कोशिश करना चाहिये था। क्यों चीन का हम पर १०० विलियन डालर भार हर साल बढ़ता जा रहा है। यह कितना सही है। हम क्या कर रहे हैं, हमारे उद्योंगों के विलियनअर मालिक अनुसंधान या नई टेक्नोलॉजी क्यों नहीं लाते। क्या सभी सरकार करेगी? हमारे सैंकड़ों रिसर्च संस्थानों के वैज्ञानिक क्या कर रहें हैं। क्या वैज्ञानिक विषयों पर लेख लिखकर उनका दायित्व ख़त्म हो जाता है? हम सभी अपने अपने दरबों में केवल अपनी कमाई और अपनी शोहरत के लिये काम में लगे हैं।
गलती लिखा गया हो तो शुद्ध कर लीजियेगा। मेरे दिल की भावनाओं की कद्र करिये अपने उन दोस्त मित्रों से इन विषयों के बातचीत करने का एक आन्दोलनात्मक कार्य करिये। शायद वह योग्य लोगों को जो देश के इस सम्बंध में कुछ कर सकते हैं उनके कानों तक पहुँच जाये? एक समूह देश की इस समस्या राष्ट्रीय स्तर उपाय निकाल ले। पूरी भगवद्गीता इसी त्याग और तपस्या के विषय पर आधारित है। यही देश के यज्ञ, दान और तप है सबका।
दिवाली की शुभकामना

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बिहार का चुनाव- बिहार हित में मेरे बिचार

बिहार का चुनाव- बिहार हित में मेरे बिचार
कभी कभी आश्चर्य होता है कि हमें भारत के सबसे बड़े सपने- देश की स्वतंत्रता को हासिल करने के वाद के इन कुछ सालों के बाद ही हमें देश को जाति आधारित, भाषा आधारित, क्षेत्र आधारित दिन प्रतिदिन बढ़ती विचारों को कभी कभी अनुशासन, आचरण के हर सीमाओं का उलंघन होता क्यों देखना पड़ रहा है?
और असहनीय पीड़ा और मानसिक तनाव तब होता है जब यह तथाकथित आधुनिक उच्च शिक्षा युक्त लोगों के द्वारा उकसाया जाता है।
इन सालों में हमारा व्यवसाय, उद्योग विश्वप्रसिद्ध क्यों नहीं हो पाया, हमें आर्थिक प्रगति की गति को बढ़ाने में इतना समय क्यों न लग गया? हमारी शिक्षा पद्धति उस स्तर पर ले जाने में क्यों सक्षम हो सकी। हम दूसरे सभी अपने से पिछड़ी व्यवस्था से क्यों पीछे होने का रोज अहसास होता है।
क्या स्वतंत्रता के बाद के प्रजातांत्रिक तरीक़े से अपनाई जा रही बहुत व्यवस्थाओं के कारणों तो नहीं है? हम शिक्षा को प्रारंभ में ही प्रत्येक नागरिक का ज़रूरी कर्तव्य और फिर अधिकार को क्यों अंजाम न दे पाये? अवैज्ञानिक जातिप्रथा का पूर्ण रूप उन्मूलन क्यों न कर पाये। हमने जब राजनीति में परिवारवाद का कुरूप के सब नुक़सान सालों देखने के बाद भी प्रश्न क्यों नहीं उठा पाये? क्यों येन केन प्रकारेण सरकार चलाने वाली बात आई, और अधिकांश नागरिकों में उसी तरह येन केन प्रकारेण अकूत सम्पति के जमा करने पर कोई थोड़ा सा भी अंकुश नहीं लगा पाये? क्यों अभी भी हम विदेशों में पढ़ने और अपने देश में करोड़ों की कमाई कर बाहर के देशों में अपने ख़रीदे महलों में बसनेवाली मनोवृति पर क्यों नहीं किसी तरह का लगाम लगा पाये?
प्रजातंत्र के कारण कैसे एक व्यक्ति या परिवार विना किसी कर्मठता, योग्यता के बाद भी देश के लिये अहितकर पद्धति अपना गद्दी पर क़ब्ज़ा किये रहे और देश की सरकार और क़ानूनी ढाँचा कुछ न कर पाये? क्यों बिहार इतना पिछड़ गया? क्या तथा कथित सरकारी महकमें इतने अक्रिय और बेईमान हो गये?
बदलते हुए भारत के बावजूद भी राज्यस्तर या संस्था विशेष को केवल अपने .०१% लोगों को पूरा लाभ लेने की छूट लेती रही?
बिहार बंगाल पिछले पचास साल में इस स्तर पर पहुँच गया जिसके बारे में सोच कर इतना कुछ लिखना पड़ा।
कहीं किसी सनातन शास्त्र में आज की तरह के हज़ारों जातियों का ज़िक्र है। गीता में अध्याय १४ में सभी व्यक्ति वस्तुओं में तीन तरह के गुणों का ज़िक्र है और अध्याय १६ में दैवी और आसुरी आचरण बताया गया है। वर्ण के केवल चार हैं और वे वैज्ञानिक हैं। आज के माहौल में वर्ण व्यवस्था जो समाज हर व्यक्ति को खुद अपनी विशेषता पर आधारित वर्ण व्यवस्था एक सार्वभौमिक रूप से मानने योग्य है।

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