कुछ दिल की, कुछ दिमाग़ की-१

नीतीश कुमार अब पंद्रह या ज़्यादा साल से बिहार की गद्दी पर हैं और उनके पास अब कोई दूसरा बहाना नहीं है बिहार की चिरस्थायी बदहाली का. नीतीश ने कुछ सराहनीय क़दम उठाये जिसमें शराबबन्दी, दहेज और बाल बिबाह को समाप्त करने जैसी अच्छी नीतियाँ थीं. दुर्भाग्यवश इनको पूर्णत: सफल करने का रास्ता मज़बूत एवं अच्छी शिक्षा ब्यवस्था से गुज़रता है. इन चारों ध्येयों की सफलता के लिये प्रचार की ज़रूरत थी, राज्य के हर ब्यक्ति को समझने एवं समझाने की ज़रूरत थी.विशेषकर महिलाओं को, पिछड़े वर्ग के लोगों को, गाँव की जनता को अनौपचारिक ढंग से इन चारों ध्येयों की जानकारी देने की ज़रूरत थी. नीतीश को अपने सहपार्टियों के मज़बूत नेताओं, सभी राज्य कर्मचारियों के साथ साल के दो पखवाड़े घर घर जा इन विषयों पर उसी तरह चेष्टा करने की ज़रूरत थी जैसा वोट लेने के लिये वे करते हैं.प्रदेश के शिक्षकों और अभिभावकों से एक लम्बें एवं अन्तरंग वार्ता की ज़रूरत थी शिक्षा के स्तर को सुचारू करने की. स्कूली इंफ़्रास्ट्रक्चर, भवन, दोपहर का खाना, शौचालय अच्छी शिक्षा मिलने का गारण्टी नहीं है.हर शिक्षक को बच्चों को पढ़ने, पढानें में रूचि लेनी जरूरी है. सोचना होगा कमी कहाँ है कि दस दस साल तक हिन्दी, अंग्रेज़ी पढ़ने के बाद भी एक छात्र दस साल पढ़ने के बाद भी न भाषा बोल सकता है, न लिख सकता है, न पढ़ सकता है. किस तरह से हम इसको बदल सकते हैं. स्कूल आने में, रहने में कैसे बच्चे ख़ुशी महशूश करें? कैसे मिलजुल कर खेल खेल में ज्ञान अर्जन करें. कैसे हर तरह की किताबों को पढनें में रूचि बढ़े? भाषा की टेकस्टबुक्स की जगह ज़्यादा से ज्यादा उसी कक्षा के स्तर की अन्य भाषा में लिखीं किताबें पढ़े, जो अन्य बिषयों की आकर्षक ढंग से जानकारी दे? गाँव के स्कूलों में खेती के सामान्य ज्ञान दिया जाये मनोरंजन की तरह . बच्चे मोबाइल फ़ोनों से या टैबलेट से पढ़ना या अंकगणित करना सीखें. बिहार कैसे आगे आये शिक्षा में , हुनर में, अन्य उन्नत राज्यों की श्रेणी में या उनसे आगे? पर नीतिश को कहाँ समय है वोट और कुर्सी की राजनीति से जो केवल बरगलाने की कला में महारियत से मिल जाति है. महागठबंधन से भाजपा, और फिर से वापस अगर मीडिया की मानें…….इससे अच्छा है सभी सरकारी स्कूलों को बन्द कर दिया जाये या पूरी तरह प्राइवेट कर दिया जाये..

मैं और मेरी संगिनी किताबें: आजकल मैं दो किताबों में डूबा हूँ. सबेरे क़रीब घंटे भर तुलसीदास का रामचरितमानस मानस पढ़ता, समझता, मनन करता हूँ, फिर से, सन्यासी की तरह…यह लगातार चलता रहेगा पाँच बार तक. फिर भगवद्गीता लूंगां……यह होगा मेरा इन दोनों ग्रंथों को समझने का प्रयास……..दूसरी किताब बहुत बड़ी है क़रीब आठ सौ पन्नों की,पर आधुनिक इतिहास है रामचन्द्र गुहा की India After Gandhi. यह उस काल का इतिहास है जो हमारे समय में घटित हुआ है- देश की आज़ादी के समय मैं आठ साल का था.कलकत्ता के दंगों एवं उस समय के हालात के बहुत पक्षों से मैं अनभिज्ञ था.१९५२ में देश के प्रथम साधारण चुनाव के समय मैं ७-८ कक्षा में था बिरलापुर विद्यालय में. बिरला जूट के उप जेनेरल मैनेजर महावीर प्रसाद जैन कांग्रेस से संसद का चुनाव लड़ रहे थे, दादाजी को शिक्षकों में से इस काम के लिये चुना गया था. विद्यार्थी वालन्टियर्स में मैं भी था. जैन साहब की प्रचार के लिये पहले नेहरूजी और फिर जगजीवन राम थोड़ी दूर के कालीपुर मिल के मैदान में भाषण देने आये थे, हम भी गये थे कुछ छात्रों के साथ. मैंने दादाजी से जगजीवन राम के भाषण की सराहना की थी,पर नेहरूजी का भाषण अति सामान्य था.डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर में मृत्यु के समाचार से दादाजी बड़े दुखी हुये थे. प्रेसीडेन्सी xकालेज में पढ़ते समय डां राजेन्द्र प्रसाद आये थे. इडेन हिन्दू हॉस्टेल में वे जब आये तो उनसे बात भी हुई थी. १९६१ में हम हिन्दमोटर में काम करने लगे. तभी चीन का आक्रमण और नेहरू के सिद्धान्तों की शर्मनाक हार हुई थी. अब पता चल गया होगा कि राम चन्द्र गुहा की पुस्तक क्यों रूचि ले पढ़ रहा हूँ ….उस समय काल को जिया हूँ तो समझने में सरलता है. बहुत ब्यक्तियों के बारे बहुत जानकारी उस समय के परिस्थियाँ का ज्ञान, फिर अपना विश्लेषण चलता है पढ़ते पढ़ते और चलता रहेगा, अभी तो केवल ३४५ पेज ही पढ़ पाया हूँ..पर नेहरू की छवि देश को सम्मान नहीं दिला सकी, वल्कि अनादि काल के लिये लज्जित किया…………. कुछ ज़्यादा बाद कभी….

वर्तमान सरकार को दो जाँच-आयोग ज़रूर गठन करने चाहिये स्वतंत्रता के बाद के दो मृत्यु के बारे में. यह जरूरी है कि लोग जाने कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर के जेल में अचानक मृत्यु का असली कारण क्या था. डा. मुखर्जी राजनीति के अलावा भी एक गणमान्य शिक्षाविद थे,कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति एवं नेहरू के अन्तरिम मंत्रिमंडल में सहभागी मंत्री थे. साथ ही वे बंगाल के महान ब्यक्ति डा. अाशुतोष मुखर्जी के बेटे थे, जिनको बंगाल का बच्चा बच्चा आज भी जानता है. आख़िर नेहरू ने डा. मुखर्जी के प्रति ऐसा रवैया क्यों अपनाया कि उनकी मां,योगमाया देवी का उनके मरने के बाद के जाँच के अनुरोध के लिये लिखे पत्र का उत्तर देना भी उचित नहीं समझा.ऐसी ही ज़रूरत लाल बहादुर शास्त्री की तासकन्द में हुये मृत्यु के कारण के जाँच की भी है.ये दोनों मृत्यु आज भी बहुतों को एक सोची समझी साजिस की तरह लगती है. यह आज के सरकार का दायित्व बनता है कि इन शंकाओं का उचित समाधान ज़िम्मेदार जाँच समिति द्वारा कराया जाये.

यह अब कोई छिपी बात नहीं है कि मिडीया एवं बिरोधी दल देश के हर घटना को मोदी के नाम के साथ जोड़ने और उसका बिरोध करने में ब्यस्त है.आज का एक समाचार था बहराइच के एक राजा सुहेलदेव के बारे में. अमिस त्रिवेदी की कोई इसी नाम से किताब आ रही है. राजनीतिक दल कोई उनको दलित सम्प्रदाय का और कुछ अन्य उन्हें अन्य पिछड़ी जाति का बताने में लगे हैं. ऐसी प्रयत्नों को मिडीया को कोई बढ़ावा नहीं देना चाहिये. मैं तो कहूँगा ऐसी बातें समाचार को बननी ही नहीं चाहिये भारत हित में. पर बिचार की स्वतंत्रता के नाम पर लोगों में बिद्वेश फैला सभी बात को राजनीति एवं वोट से जोड़ा जाने लगा है. मिडीया हर विवादपूर्ण घटनाओं का बिस्तृत बयान कर अपना ब्यवसायिक उल्लू सीधा करना चाहता है.ऐसी ही एक घटना २०१४ में अशोक महान को कुसवाहा जाति का बता कर किया गया था. कब ब्यक्ति का परिचय केवल नाम से होने लगेगा जाति से नहीं.

अभी हाल की राजनीति सरगर्मियाँ एक संकेत ज़रूर दे रहीं है कि भाजपा को रोकने या हराने के लिये कांग्रेस एक नई महागठबंधन की रणनीति से काम कर रही है. 2014 में कांग्रेस ने अपने सहयोगियों के लिए सिर्फ 76 सीटें छोड़ी थीं. 464 पर खुद लड़ी थी. लेकिन इस बार कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, तमिलनाडु, झारखंड, असम, आंध्र प्रदेश में जूनियर पार्टनर की भूमिका में चुनाव लडऩे के लिए खुद को तैयार कर रही है.अगर सभी दल सभी राज्यों में इसके लिये तैयार हो जायेंगे तो कांग्रेस का फ़ायदा हो सकता है और उसे ४४ से बहुत ज़्यादा सीटें मिल सकती हैं, अगर कोई बहुत बड़ी ग़लती न हो जाये या हवा का रूख पूरी तरह मोदी की तरफ़ न हो जाये.

कुछ महीने पहले तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने थूतूकुडी के स्टरलाइट काॅपर की फ़ैक्टरी में उत्पादन बंद करने के आदेश दिए. क्या वह देश हित में निर्णय है?क्यों कोई हज़ारों करोड़ का निवेस करेगा, अगर भीड़ एवं आन्दोलन सभी किये कराये को मटियामेट करने में सक्षम हो जायेंगे ?स्थानीय लोगों का विरोध क्या किसी बिदेशी या देश की अन्य स्वार्थी ब्यक्ति या संस्थान के षड्यंत्र का अनकहा, अनजाना हिस्सा नहीं हो सकता है? देश दुनिया मे जो दूसरे कॉपर की फ़ैक्टरियों के संयत्रण है उनसे यह फ़ैक्टरी किस तरह अलग थी? चूँकि यह तकनीकि मामला है देश का कोर्ट एक्सपर्ट की सहायता से सठीक निर्णय तो ले ही सकता है. पर वह अन्तिम निर्णय सब दलों को मान्य होना चाहिये. भीड़ की संख्या या उसके तोड़फोड़ की शक्ति पर निर्णय आश्रित नहीं होना चाहिये.सरकार को केवल कोर्ट के आदेश के अनुसार ही आदेश देने की आज़ादी है.

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Noida Authority and Ad hoc Projects

For last four years or so, most in F-Block would have seen or heard about at least two-three major projects of real interest coming up that can make the life of residents better in many ways.

1. Community Centre or Barat Ghar or for some ‘Club’ in plot along with the Meghdootam Park:The 4.67 crore glass-paned high roof building is almost ready. For such huge investment, all details as it would look and function after the final stage, would have been in place before the start of use by the intended beneficiaries. Recently I happened queried the security guard of the place about the status. He retorted, “ Sir,I just look after a Kuttakhana. There are a dozen or more of stray dogs, (may be few bitches too to keep on adding continuously to numbers).”

2. In reality, the huge project can hardly be considered complete.The building, as designed,must be fully air conditioned, otherwise in Noida climate, it will be only an oven in summer. Perhaps, it is still not there in the plan of Noida Authority. NA must be thinking of handing it over in winter so that the people would realise the problem only after 4-5 months.

3. For convenience of disabled, while there is a ramp built for ground floor, a lift from ground floor for reaching the first floor is missing. How can a public place be made out of reach for senior citizens and Divyangs?

4. Two bodies of residents claiming for taking over the administration of the building have also not come out with a road map. As I suggested in a write up earlier, the first floor can be made into an excellent modern library for kids, youths and senior citizens with entertainment corners for kids, a kitty corner for women and another for senior citizens with provision for a contracted canteen.However, we don’t know if NA would agree. From Amrapali Eden Eden Park I can arrange two selves of good books for the library. I am sure other complexes can also contribute in the same way. However, NA will have to agree to appoint a qualified good librarian.

5. And with the expenditure of approx R 5 crore already incurred, every day the authority is loosing Rs 10,000 at least as interest on expenditure.But who and why should one bother about it?

6. RCC Covering of the Nalla on side of sector 50 along the 4-lane road between sector 50-51 started coming up as another welcome project:The project cost must be in crores. I imagine certain benefits coming out- less of stinks from the stagnant water and filth in it. The gas refilling of air conditioners in residences will reduce as claimed by some. Less of Mosquitos can be presumed.I wonder how the filth would be removed, whether manually or mechanically from left out openings.For last few months, the work on it was going on, but recently I found that it has stopped. But we all will certainly wish that NA must forbid painting all sorts of ads on the sidewall and stop the coming up many stalls causing visual torture and physical pollution for the residents of communities.

3. Medanta Hospital near Metro station: A large plot is lying barricaded for the hospital that would have certainly eased the medical requirements for residents around it. As it happened with the plot of central market near the Jain temple, it is not known if the project is on or off.

Will the Fora claiming to work for the locality and hoping to take the reign, take the issues with NA?

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जब जब होहीं धरम के हानि

एक ६५ वर्ष का ब्यक्ति एक १ साल की बच्ची के साथ बलात्कार करता है और उसकी हत्या कर देता है.तुलसी का कलिकाल असल होता दिखता है:’कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥’ इसी तरह की ख़बर छपती है- पिता अपनी नाबालिग़ बेटी के बच्चे का बलात्कार द्वारा पिता बनता है. समाचार पत्र भरे हैं ऐसे बलात्कार एवं दरिंदगी के समाचारों से.छोटे बच्चों से बड़ों तक में ड्रग की, शराबखोरी की आदत समाजमें ज़हर फैलाती जा रही है. बच्चों का बड़े पैमाने पर अपहरण गिरते समाज का संकेत है.हर व्यक्ति या व्यवसायी केवल असद् मार्ग से अकूत कमाई करता है सामान्य नागरिकों या देश को धोखा दे. करोड़ों की सम्पति के मालिकों को भी देश के क़ानून के रास्ते हट धन एकत्रित करने में आनन्द आ रहा है.देश में बेईमानी की अरबों की कमाई कर लोग बिदेश भाग जाते हैं. कमजोरों को कष्ट देने की घटनाएँ आम होती जा रहीं हैं. शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी लोग येन केन प्रकारेण धन अर्जन में लग गये हैं. स्कूल, कालेज में पढ़ाई लिखाई ख़त्म हो चली है. रोज़ लगता है अब वह समय आ गया है, जब परमेश्वर को प्रकट होना पड़ता है धरती पर? आसपास घटित होती चीज़ों की जानकारियां,टी वी पर अनवरत चलते समाचारों एवं इंटरनेट पर उपलब्ध कहानियों से तो यह परमेश्वर का अवतरण आवश्यक और अभिनन्दनीय लगता है. क्या यह कलिकाल की पराकाष्ठा है? नहीं, तो क्या होता है पराकाष्ठा पहुँचने पर?

अवतरण की अवस्था की यह बात पहले गीता में कही गई हैं

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥”

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥

फिर तुलसीदासजी ने उसी बात को रामचरितमानस में इस तरह कहा –

“जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।

जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।”

जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते है । और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है॥

पता नहीं हमारे काल में कोई ऐसा युगपुरूष हो या नहीं, पर अगर ऐसा हो तो वह कैसा होगा, क्या, किस तरह बदलेगा सोच कर रोमांच हो आता है? वह स्वर्णिम युग देखनेवाले धन्य होंगे.

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२०१९ का प्रारम्भ २०१८ में हीं

बिरोधी राजनीतिक पार्टियाँ एक साथ मिल भारतीय जनता पार्टी से लड़ना चाहती हैं राज्य और केन्द्र में सरकार बनाने के लिये, पर अपनी अलग स्वरूप बरक़रार रखते हुये जो देश के हित में ख़तरनाक है.

केवल दो पार्टियों के गठबंधन की मंत्री परिषद् बनाने में अगर इतनी तकलीफ़ हुई कर्नाटका में, तो बारह या बीस पार्टियों के गठबंधन की केन्द्र में क्या अवस्था होगी, अगर जीत गये. कितने उप प्रधान मंत्री होंगे और कितने कितने अलग अलग दलों के मंत्री , फिर उनके विभाग का झगड़ा होगा. दिक़्क़त है सबको सत्ता चाहिये, सबकी बात चलनी चाहिये. सरकार बनवाने में मदद देने का हर दल क़ीमत और लाभांश लेने में पूरी शक्ति लगा देगा देश के हित का बिना ख़्याल किये. कहीं देश न बिक जाये इसमें.

आदर्श रूप से वे सब पार्टियाँ सेक्युलर है तो फिर मिलकर एक पार्टी बना लें जैसा जयप्रकाश नारायण के चलते इन्दिरा के काल में हुआ था जनता पार्टी के नाम से. दुख तब हुआ था जब मोरारजी सरकार में फूट डाला जा सका और सरकार गिरा दी गई.पर आज की बिरोधी अधिकांश पार्टियाँ पारिवारिक हैं क्षेत्रीय हैं.

इन सभी दलों को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिये वह कौन मज़बूत और प्रभावकारी नेता होगा? क्या इस पर विना विवाद समझौता हो जायेगा? अगर हो गया तो अंकगणित बिरोधी दलों के संगठन के पक्ष में होगा, पर रासायनिक एकत्व की ज़रूरत होगी सरकार सुचारू रूप से चलाने के लिये….

मोदी के नेतृत्व में भारत को मैं मानता हूँ एक नई दिशा एवं गति मिली है, जो त्रुटिहीन तो नहीं है पर पुराने अनुभवों पर नई लगती है. इतने बड़े और बिविधता पूर्ण देश के लिये पाँच चाल का समय बहुत कम है कुछ सार्थक बदलाव के लिये. एक और टर्म उपलब्धियों को मापने एवं समझने के लिये आवश्यक होगा. अगर पिछली सरकार को जनता ने दस साल का समय दिया तो मोदी को कम से कम दस साल तो मिलना ही चाहिये. इससे उनके २०२२ तक समाप्त होनेवाले परियोजनाओं को स्वरूप देने का काम भी हो जायेगा जो उनकी क्षमता का मापदंड भी होगा.इनकी और बिरोधी दलो की कार्यप्रणाली में कौन ज़्यादा प्रिय है लोगों को समझ भी आ जायेगा.

ख़ैर, यह देश के सामूहिक निश्चय पर निर्भर होगा.आज की मीडिया या बिरोधी पार्टियों के अनुमान या चाह कोई सठीक दिशा नहीं दिखा रहे हैं। काफी लोग पक्ष या विपक्ष में हैं आज की सरकार के. बाबाओं के भविष्यवाणी में मैं विश्वास नहीं करता.

मोदी एवं भारतीय जनता पार्टी बाक़ी समय में कोई चमत्कारी निर्णय ले क्या हवा का रूख पूरी तरह अपने पक्ष में बदल सकेगी, और फिर से सत्ता में आ जायेगी, कहा नहीं जा सकता ?

पर अगले चुनाव में अगर सब बिरोधी दलों का गठबंधन हो गया तो सबसे ज़्यादा फ़ायदा कांग्रेस को होगा..कांग्रेस के भोट बिरोधी दलों के प्रत्याशियों को जीता सके या नहीं मालूम नहीं, पर गठबंधन के अन्य घटकों के भोट कांग्रेस में आ जाने से कांग्रेस एक सम्मानजनक परिस्थिति में आ सकती है आज के ४४-४५ की अपेक्षा.

देखिये क्या देती है भारत की जनता अपनी राय….पर २०१८ में हीं चालू हो गईं हैं सरगर्मियाँ,लगता है २०१९ जल्दी आ गया है…

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Narendra Modi’s Four Years, as I see it

Modi has been unique in his way of doing the things in a country which finds it difficult to drop decades if not centuries of legacy of dishonesty, lethargy, and deficiency.

1. Modi started by inviting all Saarc country heads in his oath ceremony and even this year’s Republic Day Parade had unique presence of ten country heads of ASEAN.

2. Narendra Modi sought to influence people’s thought processes, behaviours and choices through social campaigns on, for example, promotion of girl child and making villages open-defecation-free.

3. Modi became poster boy for many of his reforms, be it Swachh Bharat in a country where for most of the country men, it is difficult to drop even the habits that costs life.

4. Modi lent his own voice to urging people to practise yoga to stay healthy, to use khadi clothes that can help generate incomes for khadi workers, to give up LPG subsidy in favour of those who cannot afford it, to switch over to using LED bulbs for conserving electricity, and so forth.

5. Modi believed in removing the root causes of farmers’ owes, and empowering them but was forced to go to loan waivers.

6. Free LPG, electricity, houses and under implementation healthcare scheme for rural poor are the landmarks of his motives and will be game changer. Interestingly, Modi has been highly innovative in his approach.

7. Demonetisation and GST revealed how deep dishonesty has percolated in all sectors, be it jewellery or PSBs.GST will make tax evasion tougher.Demonetisation set off surge in digital transactions making life less risky.Indian economy is becoming formal.

8. Thrust on better connectivity, road, air, waterways, ports, internet, mobile phones is visible all around.

8. Modi is steadily keeping the pressure on eradication of corruption.

9. While on one hand naxalism is shrinking, ease of doing business is improving. Innovations and entrepreneurship have got into fast forward mode.

10. NDA rules today 20 states. Modi is the only hurdle for all odd opposition political hues.

Four years are too short a time to solve the problems pertaining to India of 1.3 billion or more citizens living with varying mindset of the Stone Age as well as that of IoT age.

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वर्णाश्रम की सामयिकता-आज के संदर्भ में

प्राचीन भारत के समाज शास्त्री मनीषियों ने दो सार्वभौम व्यवस्था की खोज की और स्थापित किया.अगर बिना पक्षपात और संकीर्ण मनोभाव के देखा जाये, वे आज भी उतना ही सामयिक एवं सर्वपयोगी है जितना उस समय थे. अगर उसे सठीक तरह समझा जाये; (राजनीतिक फ़ायदे या स्वार्थ की दृष्टि से न देखा जाये या ग़लत प्रचार न किया जाये भड़काऊ तरीक़े से), तो हिन्दू समाज के अलगाववादी मानसिकता एवं आपसी झगड़े या मनोमालिन्य ख़त्म हो सकते हैं उस रास्ते चल. नई पीढ़ी अगर ठीक तरह समझ जाये जो उनका मूल उद्देश्य था, तो वे उसे महत्व देंगे और आज की कुरीतियों को हटाने में मदद और गति. और वे दो ब्यवस्थाऐं थी वर्ण एवं आश्रम .

वर्ण: वर्ण का शब्दिक अर्थ है – वरण करना, रंग, एवं वृत्ति के अनुरूप. गुण और कर्म के आधार पर चार वर्णो का निर्माण किया गया है.विभिन्न वृत्तियों के काम को सम्यक् भाव से पालन के लिये ब्यक्ति के कर्म एवं स्वभाव को जानना बहुत जरूरी है. भारत में समाज के सभी लोगों को चार वर्णों में विभाजित किया गया ब्यक्ति के कर्म एवं स्वभाव के आधार पर जन्म के आधार पर नहीं, पिता-माता के वर्ण के आधार पर नहीं: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. भगवद्गीता के १८ वे अध्याय के श्लोक ४१-४३ में इन वर्णों को कर्म, स्वभाव के अनुसार वर्णित और परिभाषित किया गया है।

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१॥

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥४२॥

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥४३॥

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥४४॥

(भावार्थ :हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ॥41॥ (कहीं जन्म आधारित वर्ण का ज़िक्र नहीं है।)

अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ॥42॥शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ॥43॥खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ॥44॥)

हर ब्यक्ति अपने रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में अपने घर में या बाहर इन चारों वर्णों के उल्लेखित कर्म को स्वभाविक रूप में करता है, सीखता है और दक्ष बनता है.आज किसी परिवार को चलाने के लिये भी उपरोक्त चारों प्रकार के कर्म एवं स्वभाव की ज़रूरत पड़ती है.घर के हर सफ़ाई के काम के लिये हममें शूद्र के स्वभाव और लगन की ज़रूरत होती है, रोज़मर्रा के कामों में धन कमाने और सद्व्यय के कर्म हमें वैश्य स्वभाव की तरह करने पड़ते हैं, हमारी सम्पन्नता उस स्वभाव के गुण एवं क्षमता पर निर्भर होती है ।सुरक्षा तो महत्वपूर्ण बन गई है, इसके लिये क्षत्रिय स्वभाव एवं कर्म की शक्ति और दक्षता चाहिये ।हमें परिवार को उत्तम स्तर पर लाने के लिये इसी तरह शिक्षा, ज्ञान,शुचिता आदि की ज़रूरत होती है जो ब्राह्मणों के कर्म स्वभाव में परिभाषित है . आज अपनी जीविका के लिये हर ब्यक्ति नौकरी करता है.हर काम में किसी ख़ास स्वभाव और ज्ञान की ज्यादा या कम ज़रूरत होती है. अत: कर्म स्वभाव के चारों वर्णों का काम कर ही जीवन में सफल हो सकता है.

हर कर्म संस्थान में लोगों को उनकी इन चारों तरह के अपने कर्म एवं स्वभाव की दक्षता के अनुसार ही दायित्व मिलता है. व्यक्ति साधारण कर्मचारी या कामगार से प्रारम्भ कर कर्म, स्वभाव के अनुसार ऊपर उठ संस्थान के बड़े से बड़े पद तक पहुँच सकता है ग्रंथों में परिभाषित चारों वर्णों के कामों को करते हुये.

आज की जाति प्रथा पैदा ही हुई वर्ण ब्यवस्था के सदियों बाद जब भारत छोटे छोटे राज्यों में बँटता गया. और आज की जातियों को अलग अलग समाज के स्वार्थी ठेकेदारों या पुराने समय में स्वार्थी पंडितों ने उनके उस समय के कार्य दक्षता के अनुसार अलग, अलग समय में अलग अलग जाति का नाम दे दिया और एक दूसरे को छोटा बड़ा बना दिया जो आज हज़ारों की संख्या में हैं.समय के साथ यह एक प्रणाली समाज का अंग बन गई। जातियों की श्रेष्ठता की भी एक रैंकिंग कर दी गई.यहां तक की एक वर्ण में ही बिभिन्न जातियाँ बनती गई, हर अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ मानने की होड़ में लग गया. और हर किसी ब्यक्ति की जाति उसके माता या पिता की जाति मान ली गईं. पिछले सदी में हुये प्रगति के कारण आज की जाति ब्यवस्था हमारे कामों के सम्पादन में बढ़ते नई ब्यवस्था एवं उपयोग में लाये साधनों के कारण वैसे भी अनर्थक हो गई. विज्ञान, ब्यवसाय या शिक्षा,हुनर, रोटी रोज़ी के आज के धंधों को देखते हुये उन पुराने जातियों के नाम बदल जाने चाहिये. आज के संदर्भ वे वेमायने हैं, एक फ़ौज़िया तो क्षत्रिय ही है भले ही वह किसी जाति का हो, इसी तरह हर शिक्षक ब्राह्मण . मैंने अगर शिक्षा इंजीनियरिंग की है और काम भी उसी तरह, तो मेरी जाति का नया नाम इंजीनियर होना चाहिये. इसीतरह अगर कोई डाक्टरों की पढ़ाई की और पेशा बनाया तो उसकी जाति का नाम डाक्टर होनी चाहिये. जितनी जल्दी हम पुरानी जातिप्रथा को तिलांजलि दे सकें उतना ही अच्छा है देश की समृद्धता के लिये. यही असली देश सेवा होगा.

आश्रम: हर ब्यक्ति के जीवन के औसतन उम्र को सौ का मान, उसको चार आश्रमों -(१) ब्रह्मचर्य, (२) गार्हस्थ्य, (३) वानप्रस्थ और (४) संन्यास मे बाँटा था हमारे पूर्वज ज्ञानी समाजशास्त्रियों ने. आश्चर्य है आज भी औसतन उम्र वही हैं: २५ तक ब्रह्मचर्य, ५० तक गार्हस्थ्य, ७५ तक वानप्रस्थ और उसके बाद संन्यास, का नाम दिया.ब्रह्मचर्य आश्रम के २५ वर्ष तक सर्वोच्चतम्म शिक्षा, किसी विधा में बढ़िया हुनर अर्जित कर जीवनयापन के कार्य करने के लिये तैयार हो जांयें, और उसके बाद गृहस्थ आश्रम के ५० की उम्र तक अपनी आजीविका की आय को बढ़ाते हुये और उच्चतम ऊँचाइयों को पहुँचते हुये अधिकाधिक कमाई कर दाम्पत्य एवं गृहस्थ की सफलत्तम ज़िन्दगी जीने का प्रयास करें, वानप्रस्थ में धीरे धीरे अपना उत्तराधिकारी तैयार कर कार्यभार से किसी समय मुक्त कर लेनी की तैयारी करने का काल है. संन्यास आश्रम में हर ब्यक्ति को सभी आकर्षणों एवं सम्बन्धों से दूर हो भी ख़ुद को ख़ुश रख जीने की कोशिश करने का है. कुछ व्यतिक्रम हो सकता है कुछ साल कम अधिक, पर साधारणत: जीवन का ढंग आश्रम की तरह चलता है आज भी.

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भागवत पुराण, तुलसीकृत रामचरितमानस और कलिकाल

प्राचीन समय से ही कलियुग को सबसे निकृष्ट युग बताया गया.बहुत ग्रंथों में इस का ज़िक्र है. दो जानता हूं- भागवत पुराण एवं रामचरितमानस मानस.भागवत पुराण के अंश की जानकारी डा. यू.डी.चौबे से मिली. किसी जानकार ब्यक्ति ने उनके पास भेजा था, बाद में मैंने उसे एक ब्लाग में इंटरनेट पर भी देखा. भागवत पुराण का लेखन तुलसीदास के पहले हुआ होगा समय काल का पता नहीं.

भागवत पुराण में कलियुग के हालातों का वर्णन बहुत पहले ही कर दिया था। भागवत पुराण की सबसे पहले भविष्यवाणी थी कि इस दौर में व्यक्ति के अच्छे कुल की पहचान सिर्फ धन के आधार पर ही होगी। धन के लिए वे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों का रक्त बहाने में भी हिचक नहीं महसूस करेंगे। कुछ बानगी देखिये-

2.वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।

धर्मन्याय व्यवस्थायां

कारणं बलमेव हि ॥

*कलयुग में वही व्यक्ति गुणी माना जायेगा जिसके पास ज्यादा धन है. न्याय और कानून सिर्फ एक शक्ति के आधार पे होगा !*

3. दाम्पत्येऽभिरुचि र्हेतुः

मायैव व्यावहारिके ।

स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः

विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥

*कलयुग में स्त्री-पुरुष बिना विवाह के केवल रूचि के अनुसार ही रहेंगे.*

*व्यापार की सफलता के लिए मनुष्य छल करेगा और ब्राह्मण सिर्फ नाम के होंगे.*

4. लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।

अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं

पाण्डित्ये चापलं वचः ॥

*घूस देने वाले व्यक्ति ही न्याय पा सकेंगे और जो धन नहीं खर्च पायेगा उसे न्याय के लिए दर-दर की ठोकरे खानी होंगी. स्वार्थी और चालाक लोगों को कलयुग में विद्वान माना जायेगा.

तुलसीदास की रचनाओं से बचपन से परिचय हो गया दादाजी के चलते और बढ़ता गया समय और उम्र के साथ…..अब जीवन के संध्याकाल में उन्हीं के साथ साथ काफ़ी समय व्यतीत होता है, बाक़ी गीता के साथ…..पर कलिकाल की सठीकता पर कुछ प्रश्न उभरते हैं- उत्तर नहीं मिलते , अगर आप सुधीजन को कुछ ज्ञात हो तो बतायें!

१.क्या तुलसीदास भविष्यद्रष्टा थे और भविष्य को अपने दिव्य दृष्टि से देख सकते थे जिसकी उन्होंने चर्चा की है विस्तार के साथ रामचरितमानस के उत्तर कांड में काकभुसुन्डी के शब्दों में की है?

२.क्याआम कवि की तरह तुलसीदास अपने समय के समाज में अर्थात् १५-१६वीं सदी के भारत में घटित हो रहे चीज़ों, आहार व्यवहार का वर्णन किया है?

३. क्या उस समय ही बदलाव आ रहा था समाज में जिसकी झलक देख तुलसीदास कलि के समय उसके विस्तार की सम्भावना समझ लिख डाले?

कृपया इसे महत्व दीजिये. कुछ उदाहरण उनके कुछ कलि काल के कल्पना से….

१.’नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥’

२.’कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥

नहिं तोष बिचार न सीतलता।’

कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है।

३.’सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।।…..

ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥’

पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता।जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए।

५.’नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ।।’

राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं।

६. ‘जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥”

जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥

७. ‘जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।

मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥’

जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं।

८. ‘नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं।।’

सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं।

९ ‘हरइ सिष्य धन सोक न हरई।’गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता ।

१०.’बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥

तपसी धनवंत दरिद्र गृही।’

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र।

पर दो बातें उन भविष्यवाणियों में ग़लत भी लगती हैं. दोनों महापुरूषों के अनुसार १. ब्यक्ति की आयु बहुत कम होजायेगी. आज औसतन आयु सत्तर वर्ष के लगभग है. २. हरदम अकाल पड़ता रहेगा और इससे बहुतों की मृत्यु होगी. अकाल अब तो पड़ते नहीं और वैसी स्थिति से निबटने के लिये सारा संसार सहायक बनने को तैयार है. कुछ भी हो सोचने के लिये बाध्य तो करतीं हैं उन महापुरूषों की भविष्यवाणियां.

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