बेचारों के जंगल में -५

८.१०.२०१७

पंजाब के किसान, एक समय परिश्रम और श्रेष्ठ उत्पादकता के मिशाल थे, उसका लाभ भी उन्हें मिलता गया, निम्नतम समर्थन मूल्य बढ़ता रहा, प्रान्त की सरकार से उपर से बोनस, बिजली के ख़र्च की माफ़ी मिली, सरकारी क़र्ज़ भले ही बढ़ता गया, भारतीय खाद्य निगम की ख़रीद की प्राथमिकता मिलती रही, और साथ ही पंजाब के किसान समृद्ध होते चले गये और नई पीढ़ी आलसी, यहाँ तक की नशाखोर बनती गई, आमदनी से ज्यादा ख़र्च करती गई, बिहार और अन्य पिछड़े प्रदेशों के लोग मज़दूरी के लिये मिल गये थे बहुत ही कम दाम में. पर साथ ही अधिक पानी के उपयोग से जलस्तर घटता गया. हर सरकार उनके द्वारा उठाये माँगों की भरपाई करते हुये, उन्हें अपने कर्तव्यों से विमुख करती गई, आमदनी के अनुसार ख़र्च न कर बैंकों से क़र्ज़ ले खेती को छोड़ भी अन्य चीज़ों में ख़र्च बढ़ाते गये….बैंकों का क़र्ज़ समय पर न लौटाने से उसका भार भी बढ़ता गया, कुछ नशे में डूबे, तो कुछ आत्महत्या कर बचने का उपाय किये..अब हालत ये हो गई कि कुछ थोड़े मिहनत और ख़र्च के लिये अपना या देश के अन्य लोगों के नुकाशान को भी न समझ खेत कटने के बाद बचे डंठल को आसानी से जला कर आवोहवा को ख़राब करने की ठान ली है. उन डंठलों हके समय रहते अच्छे उपयोग की बात न सोच बहकावे आ एकजुट हो उन्हें जलाने का निर्णय लिया है. नये मुख्य मंत्री भी भोट के चलते उनका साथ दे रहे हैं, माँग है धान के लिये प्रति क्विण्टल २०० रूपये का बोनस दिया जाये तभी वे जलाने को छोड़ दूसरे तरीक़ों को अपनायेंगे. वे यह भी जानते हैं कि खेत के ऊपर डंठलों को जलाने से ज़मीन के उपजाऊ तत्व भी जल जाते हैं और उसकी भरपाई के लिये उन्हें वह केवल अधिक खाद डाल ही कर पायेंगे. वे उसे बाहर के लोगोंको भी नहीं बेंचना चाहते, केवल सरकार पर दबाब डालना चाहते हैं………अगर देश का हर ब्यक्ति सरकार को ऐंठने में ही ख़ुश है चाहे वे ब्यपारी हों या किसान, चाहे मिल मज़दूर या बाबू या शिक्षक राजनीतिक प्रश्रय से , तो देश कैसे आगे जायेगा .

६.१०.२०१७

कल शुक्रवार, अक्टूबर६, को सोनी पर नौ बजे रात के अमिताभ बच्चन के ‘कौन बनेगा करोडपति’ में एक महिला खेल रहीं थीं मीनाक्षी जैन कक्षा दस तक पढ़ी गृहिणी. कितना आत्म विश्वास था मीनाक्षी में? कितना पढ़तीं होंगी? इसबार के के बी सी में काफ़ी ऐसीं महिलाऐं आ रही देश के बिभिन्न प्रान्तों से साधारण परिवारों से. कुछ दिन पहले एक हरियाना की महिला आईं थीं घर में सिलाई करतीं हैं, सिखाती भी हैं. फिर एक करोड़ जीतनेवाली जमशेदपुर की अनामिका मजुमदार …..पर सबमें आत्मविश्वास उतना दृढ़ नहीं होता जितना मीनाक्षी में था…उतना ही गहरा पिता प्रेम ….क्यों इन सब को देखने के बाद भी लोग ग़लत तरीक़ा अपना सर्टिफ़िकेट और डिग्री बटोरने में लगे हैं… क्यों शिक्षा की घिनौनी ब्यवस्था समाज में आन्दोलन और बदलाव का सबब नहीं बनती…..क्यों कम्पनियाँ विषय के ज्ञान और हुनर के हिसाब से नौकरी नहीं देतीं……चारों तरफ़ के मन को दुखित करने वाले वातावरण में साधारण महिलाओं की उपलब्धियाँ कहीं शूकुन दे जाती है, सीना गर्व से फूल जाता है, आँखों में कहीं नमी भी होती है…..चाहे जी डी पी कुछ भी हो देश बढ़ रहा है आगे……..आप सब अगर इसी तरह पढ़ाई को बढ़ावा देते रहे….लोग अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिये पुस्तकालयों में जायें या किताबों का लेन देन करें… तिलक की जगह लड़की लड़के के मन की सौ-हज़ार पुस्तकें माँगे, तो देश की जी डी पी भी बढ़ जायेगी.. चिन्ता नहीं है…

२.१०.२०१७

स्वच्छ भारत अभियान-राजनीति क्यों? आज दिन भर ९ बजे से ९ बजे रात तक NDTV पर अमिताभ बच्चन का स्वच्छ भारत अभियान पर प्रोग्राम चलता रहा जो पिछले तीन सालों से चल रहा है. देश के अलग अलग शहरों में जो स्वच्छता के बहुत से ब्यक्तिगत और सामुदायिक प्रयास हो रहे हैं, उसकी झाँकी देखने को मिलती है. बहुत प्रभावशाली लगता है यह प्रयास और महशूश होता है कुछ सालों में पूरे देश में स्वच्छता दिखाई देने लगेगी . इसी बीच मोदी के आज के भाषण का भी सीधा प्रसारण सुना, आप भी ज़रूर सुनें और ज्यादा से ज्यादा दोस्तों से शेयर करें. मोदी का एक कहना बडा सठीक लगा – पूरी जी जान लगा देने पर भी, चाहने पर भी सौ गांधी और एक लाख मोदी भी देश के स्वच्छता को उन्नत देशों के स्तर का नहीं बना सकते पर अगर १३५ करोड़ देशवासियों के साझे प्रयास से यह सम्भव हो सकता है. स्वच्छता आन्दोलन की सफलता हर ब्यक्ति की अपनी जीवन पद्धति और आदतों मे स्वास्थ्य हित बदलाव लाने पर है जिसका पहला क़दम शौचालयों के निर्माण, ब्यवहार और रख रखाव की ज़रूरत और उसके लाभ, उसके साथ जुड़े आत्मगौरव की समझ पर है.

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ग़ैर ज़िम्मेदार नागरिक: यह कैसा बनता जा रहा है अपना प्रजातंत्र जहाँ नागरिक अपने ब्यक्तिगत दायित्व को समझता नहीं, कोई ज़िम्मेदारी लेना नहीं चाहते, सभी ग़लतियों के लिये उस समय की सरकार ज़िम्मेदार है. करीब एक महीना पहले ही सासाराम में मेरे गाँव का एक नवयुवक ट्रेन के नीचे आ गया अपनी सुरक्षा का बिना ध्यान रखे अपनी हड़बड़ी में किये ग़लती के कारण. नोयडा की ६- लेन की सड़कों पर ऊपर से पार करने की ब्यवस्था हैं, पर उसका उपयोग मिहनत के कारण बहुत कम ही होता है. बहुत जगहों पर रोड डिभाडर को तोड़ रास्ता बना लिया गया है. और इस क़ानून बिरोधी कार्य को रोकने का कोई तरीक़ा नहीं. मुम्बई में हुई दुर्घटना में भीड के लोगों के मौत की कितनी ज़िम्मेवारी लोगों के ग़लती की थी वहाँ हुई भगदड़ में, कोई नहीं सोचता, सब सरकार पर डाल देते हैं उस घटना की ज़िम्मेवारी-रेलवे ने ब्यवस्था नहीं की दूसरे पूल की या वर्तमान पूल को चौड़ा करने की. दिग्गज बिरोधी लोग , राज थाकरे, यहाँ तक कि चिदाम्बरम की तरह के लोग कह गये कि भारत में बुलेट ट्रेन की क्या ज़रूरत. जब इनके शासन काल में माल डिब्बों को निश्चित सीमा से ज्यादा लोड कर रेल की पटरियों को नुकशान पहुँचाया गया तो वे कुछ नहीं बोले. मुम्बई में लोगों के मुँहों में माइक को ठूँस ठूँस कर रिपोर्टरों ने सरकार की लापरवाही पर बयान दिलवाये, रेल मंत्री मुम्बई जा डेरा डाल दिये, भोट पर आँच नहीं आये के दबाव में दस दस लाख के मुवावजे देने की घोषणा की गई…..किसी में साहस नहीं लोगों को सुधारने का ….मुझे यह सोच तकलीफ़ होता है ….क्या लोगों की सुरक्षा की सब ज़िम्मेवारी सरकार की है , या लोगों का दायित्व भी है अपनी ..और समुदाय की सुरक्षा के बारे में .. शायद हमारे गाँव के लड़के को भी मुवावजा रेल से मिल जाता अगर वह भीड जुटानेवाली माफ़िया का सदस्य होता ….आकार पटेल का ब्लाग पढ़ थोड़ा संतोष हुआ कि एक जाना माना पत्रकार तो लिखा लोगों की ज़िम्मेवारी के बारे में…..

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आज विजयादसमी है . राम का रावण पर विजय का दिन, बुराई पर अच्छाई की विजय. पर हम सबमें एक रावण पक्ष है एक राम- कुछ बुराइयाँ , कुछ सदगुण. हम अपनी कमियों को देख नहीं पाते, शायद कोशिश भी नहीं करते उससे उबरने की. साथ ही अपने आन्तरिक गुणों या सामर्थ्य को भी नहीं समझ पाते. हम अगर अपनी हर बुराइयों के द्वारा हुये अपने हीं नुकशान को समय रहते समझ पाते और अपनी मानशिक दृढ़ता और संकल्प से उन पर विजय पा लेते, तो वह हमारे राम की हमारे रावण पर विजय होती. मैं आम बातचीत में प्रचलित एक आदत की बात कर रहा हूँ. हम मित्रों के साथ किसी अन्य ब्यक्ति की, जो वहाँ मौजूद नहीं है, निन्दा करते या मज़ाक़ उड़ाते है, सोचते हैं क्या फ़र्क़ पड़ता है, वह कहाँ सुन रहा है. अगर हम आज के दिन केवल एक प्रण करें कि किसी की अनुपस्थिति में उस ब्यक्ति की कोई बुराई न की जाये, तो हम इस तरह से अपने राम से रावण को हराते हुये एक ख़ुशी का बातावरण तैयार कर सकते हैं और अपनी हर विजय पर विजया दशमी मना सकते हैं. कितनी बिषम परिस्थियों से राम को जीवन भर जूझना पड़ा ….पर वे हार नहीं माने तो देवता बन गये और हर ब्यक्ति जीतता रह सकता है….विजया दशमी की शुभकामनाओं के साथ…

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कल नवरात्र का आठवाँ दिन, अष्टमी था. यमुना के लिये नौ कन्याओं को खिलाने का उपक्रम तो अब हो नहीं पाता. अत: बिस्कुट के पॉकेट बाँट देते हैं. बच्चियों को भी यही अच्छा लगता है, हैलोविन की तरह झोले लेकर और बढ़ियाँ से बढ़ियाँ कपड़े पहन आती हैं. यमुना भी पूजा कर बैठ गईं…कार्यक्रम पूरा किया गया….इसबार फ़ेसबुक पर ही देश के गाँव, शहरों की दुर्गापूजा के महँगे और आम सभी पंडाल देख लिये….एफ ब्लाक के बंगाली अभी तक संगठित नहीं हो पाये हैं…..अत: यहाँ कोई पंडाल नहीं है. हमारे आम्रपाली इडेन पार्क कॉप्लेक्स मे दो दल अलग अलग कुछ कर रहे हैं…अापस के इस झगड़े को दुख होता है, पर नई पीढ़ी को समझाने का अब साहस नहीं. विचारों की लड़ाई स्वार्थ निहित हो चुकी है….हम केवल मूक दर्शक बन रह गये हैं. पर उम्र के इस पड़ाव ऐसे दिन काटनें होंगे….

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यशवन्त सिंहा अपने सरकार बिरोधी बिचार समाचार पत्र में न छपाते तो देश और अपनी पार्टी के हित में होता. और भी वेशरमी की बात यह है उस लेख में कि उन्होंने नाम लेकर एक मंत्री पर लांक्षन और दूसरे की प्रशंसा की है. मेरी राय में वे शौरी और राम जेठमलानी की श्रेणी में आ गये. उनके बिरोधी बेचारों से ज्यादा उनकी शिक्षा और अनुभवों पर आधारित ब्योरेवार सलाहों को सराहा जाता हमारे तरह के लोगों द्वारा. अब लगता है शौरी की तरह उनको भी मलाल है कि उन्हे वित्त मंत्री क्यों नहीं बनाया गया और जेटली को इतनी अधिक ज़िम्मेदारी क्यों दी गई. ऐसा साफ लगता है लेख पढ़. आप भी पढ़ लें और विचार दें . अपने बूते २०१४ जीतनेवाले प्रधानमंत्री को यह निर्णय लेने दें और पार्टी के हित का ध्यान रखें. गड़करी या गोयल का नाम न लें उन्हें भी अभिभावक की तरह और अच्छे मंत्री बनने में मदद करें, थोड़ा कुछ बोलने के पहले कुछ अच्छे जानकार सलाहकारों से मदद लेने को कहें. गड़करी और गोयल का एक अब्यवहारिक समय सीमा में सभी आॉटोमोबाइल और रेलवे का विद्युतीकरण या मरहौरा के जेनेरल एलेक्टरीक के डिजेल लोको प्रोजेक्ट के बयानों का देश विदेश के उद्योग के लोगों पर कितना ग़लत प्रभाव पड़ा है और पड़ेगा. नोटबन्दी एवं जी एस टी का ऐतिहासिक , बिशालकाय साहसिक निर्णय यशवन्त सिन्हा या आजतक की कोई सरकार नहीं ले सकती थीं. दोनों ही काम बहुत बडा था, मोदी या जेटली को भी मालूम था. पर उन्होंने यह निर्णय लिया सभी मुसीबतों को जानते हुये भी दूरगामी लाभ के लिये. नोटबन्दी के समय और आज भी यही लगता है कि लड़ाई सरकार और देश के ग़लत ढंग से धन बटोरनेवालों में है जो काले धन के बिना सो नहीं सकते, जी नहीं सकते, और उसके लिये देश को बेंच भी देने में नहीं हिचकिचायेंगें. सांसदों , मंत्रियों और बाबुओं को ख़रीद कर कुछ भी अपने हित में करवा सकते हैं, जिनके लिये चुनाव जीतना सबकुछ है….उद्योग के हर सेक्टर पहले की सरकारों के ठीक निश्चय न लेने के कारण पिछड़ गये, कुछ लोगों को करोड़पति बना गये. देश का गृह निर्माण सेक्टर आज कितने लोगों को परेशानी में डाले हुये है…..आज भी टमाटर और प्याज़ का जब चाहे तब दाम बढ़ा कौन कमाता है….उपजानेवाले किसान को क्या मिलता है….और फिर उनको सड़कों पर कौन उतारता है….राम रहीम बनने ही क्यों दिये जाते हैं….आज शिक्षा क्यों कोचिंग की मोहताज बन गई…..राजनेता वह है जो ऐसी ग़लत चीज़ों को पनपने न दे…सत्तर साल से राजनेता और उनके नज़दीकी मलाई खाते रहे, देश बरगलाया जाता रहा, पीढ़ियाँ बदलती गयीं सपने देखते देखते….पता नहीं देश के बुद्धिजीवी अपने बेचारों के स्वान्तर्तय के लिये देश हित पर कुछ नई सोच , सलाह क्यों नहीं देते? 

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२७.९.२०१७

इस साल नवरात्र में वह कुछ न कर सका जो पहले सालों करता था, न तुलसीदास के राम चरित मानस का नवापरायण, न दुर्गासप्तशती का नवों दिन पाठ पूजा. यमुना का पूजा तो उनके गिरते स्वास्थ्य के कारण बन्द हो गया है. ईश्वर कृपा से मैं नित्य मानस के सुन्दर कांड का पाठ कर लेता हूँ …..यमुना कहतीं हैं ‘जाहि बिधि राखे राम, ताहि बिधि रहियों’…..,. हाँ, इस नवरात्र में मैं बार बार सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला ‘ की महान कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ पढ़ा, यू-ट्यूब के ज़रिये सुना , समझने की कोशिश की. जितनी पढ़ता हूँ और अच्छा लगता है- निराला जी बंगाल में पैदा हुये, बंग्ला में शिक्षा पाई. कविता में बर्णित कथा बंग्ला में लिखे कृतिवास रामायण से है. आख़िरी दिन का युद्ध समाप्त हुआ है….राम ने अपनी दिब्य शक्ति से एक अजीब घटना देखी. काली जो रावण को अपने क्षत्रछाया में रखे है, राम के सभी बाणों को आत्मसात करती जाती हैं……राम डगमगा गये, कैसे जीतेंगे रावण को, …’विच्छुरित वह्नि – राजीवनयन – हतलक्ष्य – बाण,…अनिमेष – राम-विश्वजिद्दिव्य – शर – भंग – भाव,’. ..’.स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर – फिर संशय’… कैसे मिलेंगे प्राण प्रिय सीता से, ग्लानि से भर गये इस घटना से….. लौटे शिविर, ख़ुद सोचमग्न, खिन्न,…चुप हैं, उनकी चुप्पी सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, जामवान को खिन्न किये हुये है….कारण बताते हैं राम, .’यह नहीं रहा नर बानी का राक्षस से रण, उतरी पा महाशक्ति रावण से आमंत्रण , अन्याय जिधर, है उधर शक्ति….’ फिर वयोवृद्ध जामवान सलाह देते हैं, ‘…….शक्ति कि करो मौलिक कल्पना, करो पूजन……..’ राम करेंगे शक्ति पूजा, हनुमान ले आये दूर नीलदह से १०८ इन्दीवर (नील कमल). राम की शक्तिपूर्वक आरम्भ हुई, …… और फिर.’…गहन से गहनतर होने लगा समराधन ।..चक्र से चक्र मन बढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस….आँठवा दिवस मन ध्यान्युक्त चढ़ता ऊपर, कर गया अतिक्रम ब्रह्मा हरि शंकर का स्तर, हो गया विजित ब्रह्माण्ड पूर्ण, देवता स्तब्ध,…….और इसी समय देवी आयीं आख़िरी बचा एक फूल को ध्यानमग्न राम के सामने से उठा ले गईं. जब ध्यान भंग होने पर फूल नहीं दिखा, क्षण में राम मन स्थिर कर निश्चय कर लिये- “कहती थीं माता मुझको सदा राजीव नयन। दो नील कमल हैं शेष अभी…पूरा करता हूँ देकर मात एक नयन. ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन, ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन……. काँपा ब्रह्माण्ड , हुआ देवी का त्वरित उदय, ” साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम”, कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम। ” होगी जय , होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन”, कह महाशक्ति राम के वदन में हुईं लीन. 

शायद आगे से अब इसी ‘राम की शक्ति पूजा’ के पाठ से मैं अपना नवरात्र मनाऊँ. बहुत तथ्यों से भरी है यह रचना…..और हम बेकार की बातों जीवन खपा रहे हैं ..

१७.९.२०१७

सितम्बर १७, मेरी पत्नी यमुना का जन्म दिन है सरकारी दस्तावेज़ों में. यह कम लोगों को मालूम है. यमुना की जन्म पत्री नहीं खोज पाया था, शायद उन दिनों लड़कियों और वह भी गाँव में बनाया ही न जाता था. हाँ, यह याद था यमुना की माताजी को उस दिन वहाँ तीज थी . फिर यमुना बहुत भाई बहन थे , इनसे बड़े और छोटे कुल आठ- पाँच बहनें एवं तीन भाई , पाँच बड़े और तीन छोटे. अत: मुझे जब इनके जन्म दिन को किसी ज़रूरी दस्तावेज़ में देने की ज़रूरत पड़ी तो मैंने उस साल के तीज के अासपास का सहज याद रखने लायक विश्वकर्मा पूजा का दिन चुना जो हरदम सितम्बर १७ ही रहता है सूर्य के आधार पर होने के कारण. मैंने इनके बड़े भाई जो अध्यापक थे और सबसे छोटे भाई जो हिन्दमोटर में हीं काम करते थे, जिनके जन्म दिन सरकारी दस्तावेज़ों के आधार पर था, पता किया और मिला कर देखा यमुना का जन्म दिन करीब करीब ठीक ही लगता है. मुझसे तीन साल के करीब छोटी हैं. बडी बहू केक भिजवा दी थी. काफ़ी लोगों का मुँह मीठा हुआ. मैं शायद पहली बार दो गुलाब के फूल के साथ यमुना की पसन्द राजस्थान का लड्डू और रस्सगुल्ला सेक्टर ५० के मुख्य बाज़ार से ले आया. कोई आनेवाला नहीं, कोई फ़ोन नहीं , हम अपनी शाम हँसते हुये पुर्ज़े दिनों को याद करते करते समय से सो गये…..शुभ जन्मदिन , यमुना! मैंने तो निमंत्रण दिये बहुत पहले , पर कोई नहीं आया तो मेरा क्या दोष। , मैं तो आख़िरी समय तक इंतज़ार करता रहा. यह हीरक जयन्ती थी. हम तो अपना कर्तव्य निभाते जायेंगे….हम माँ बाप जो ठहरे !

२३.९.२०१७

टी.वी. के सभी मंनोरंजनहित दिखायेजाने वाले सभी सीरियल के हास्यप्रद कहानियों और समाचार चैनलों पर होते बकवास के बहस को बर्दास्त नहीं करने के कारण आजकल हम अमिताभ बच्चन का रात ९ बजे से सोमवार से शुक्रवार तक ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखने का आनन्द लेते हैं. बहुत जानकारियाँ मिलती हैं . हम कितना कुछ नहीं जानते जो हमें मालूम होना चाहिये था बिभिन्न विषयों के बारे में. पर मेरा मुख्य ध्यान उन हिस्सा लेते लोगों पर होती है, उनके पृष्ठभूमि, उनकी पारिवारिक अवस्था, उनके कुछ ज्ञान के अर्जन द्वारा कुछ अच्छी धनराशि कमा लेने की लगन पर और उनके दृढ़ मनोबल पर रहता है , अत्यन्त ख़ुशी होती है कुछ लोगों के अद्भुत ध्येय पर. इनमें कोई बिरला या अम्बानी परिवार के नहीं होते, किसी ख़ास जाति या धर्म के नहीं होते, वे पुरूष और महिलाऐं सभी होतें हैं, पिछले दिनों एक हरियाना के गाँव की साधारण महिला थी हॉट सीट पर जो घर पर सिलाई कढ़ाई सिखाती है. कल एक महिला थीं मुहम्मद मसलम बेगम, बहुत समझदार साधारण परिवार की, मियाँ बीबी दोनों पढ़ने के शौक़ीन ..तीन लाख बीस हज़ार जीतीं और इतना ही हार गईं ठीक निर्णय ठीक समय पर न लेने के कारण….हम पता नहीं क्यों महान पुरूषों की लगातार उम्र के अन्त तक पढ़ने की आदत राय को क्यों नहीं डालते. मुझे युवा पीढ़ी से शिकायत है कि वे पढ़ने की आदत छोड़ते जा रहे हैं, जिसकी जानकारी की ज़रूरत है गुग्गल सहायता कर देता है, और यही सीख बच्चों को भी मिलती है. यहाँ वे अमरीका की नक़ल नहीं करते वहाँ की तरह किताबों की दुकानों पर ले नहीं जाते, न लाईब्रेरी हीं…..मैं केवल दो उदाहरण देता हूँ एक हिन्दी के महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी की, दूसरा अमरीका के राइट बर्दास् की . पहले केवल दसवीं तक और दूसरे तो वह भी नहीं…. पर दोनों में अपने विषय की हर किताबों को छोटी उम्र में ही जुनून था….क्या हम यह रास्ता नहीं अपना सकते बच्चों में यह जुनून जगा कर….आरम्भ अपने से करना होगा……

१९.९.२०१७

भारत रोहंगियों को किसी हालत में नहीं रख सकता, जब अपनी ही जनसंख्या १.३५ अरब पहुँच चुकी हो और अभी भी लोग इसे रोकने की बात करने पर धर्म का हवाला देते हैं. ममता कहतीं हैं इनमें आतंकवादी है तो सरकार पता करे, पर उनकी और ज्योति बसु की सरकार ने दो करोड़ बांग्लादेशियों को रॉशन कार्ड , यहाँ तक की आधार कार्ड बनवा सारे देश में फैला दिया, क्या बंगाल की बृन्दाबन एवं बनारस में रहती बंगाली बिधवाओं की समस्यायें ही कम थी. और ये रोहंगिये वर्मा से हवाई जहाज़ से जम्मू और उत्तर के सब शहरों में तो पहुँचे नहीं, बंगाल हो कर ही आये , फिर ममता की सरकार इन्हें क्यों नहीं रोकी? मुसलमानों को यह भी समझना चाहिये कि रोज़ रोज़ के झगड़े से बचने के लिये तो उन्हें पाकिस्तान में होना चाहिये था, यही समझौता था विभाजन का. कोई पूरे देश की राय तो माँगी नहीं गई थी इन्हें भारत में रहने देने के लिये, कुछ दबंग नेताओं का बिचार था. अगर वे अाम नागरिक की नहीं रह सकते , मदरसा छोड़ आधुनिक शिक्षा के विद्यालयों में पढ़ नहीं सकतेऔर अपने दक़ियानूसी तरीक़ों से देश के माहौल को भोट की राजनीति के चलते छोड़ना नहीं चाहते , सभी आतंकबादी घटनाओं में उन्ही का नाम आता है, तो यहाँ के बहुसंख्यक लोग कब यह सहे? इन्हें तो पाकिस्तान के नेताओं ने लेने से अस्वीकार कर  दिया था…..

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१३.९.२०१७

आज अहमदाबाद का रोड शो देख रहा था एअर पोर्ट से साबरमती आश्रम तक का-जापान के सिंजो ऐबे एवं उनकी पत्नी मोदी के साथ खुली जीप में. मुझे १९५५-५७ के कभी की एक याद आ गई …..मैं प्रेसीडेंसी कालेज कलकत्ता में पढ़ता था और इडेन हिन्दू हास्टेल में रहता ….एक दिन हम चितरंजन ऐवेन्यू पर इंतज़ार कर रहे थे ऐसे ही एक क़ाफ़िले का सोभियट यूनियन के करूस्चेभ एवं बुल्गानिन को देखे थे उम्रानुसार उत्सुकता से….शायद वे कलकत्ता में इसी तरह की भीड देखे होंगे और भारत की जनशक्ति का अंदाज लगाये होंगे….पर कलकत्ता उन दिनों बहुत साफ हुआ करता था…और उस देश के साथ भी दोस्ती इसी तरह कामयाब है….हाँ, बिरोधी आवाज़ भी होगी आज की घटना का गुजरात के चुनाव से जोड़ कर….,

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Make in India with Japan

Today, India must be very careful in importing engineering capital goods from China, particularly in heavy engineering sector such as power equipment, which some power projects have resorted to. It may be very costly to the country ultimately. This is the best time when Indian business houses negotiates with the Japanese or South Korean manufacturers. One O. Suzuki has made India an automobile nation. I would love if the Government of India appreciates his contributions and award him with a honour. In high tech manufacturing such as helicopters, UAVs etc. the same model of the manufacturing will be rational.

Modi-Shinzo Summit -A Boost for Indian Manufacturing : 

1. Bullet Train Project which is coming almost at no interest burden, will boost India’s manufacturing sector greatly. As the joint statement says, “The two prime ministers committed to advancing ‘Make in India’ and transfer of technology in HSR (high-speed rail) projects, and expressed optimism in this direction.” One specific move is the signing of a joint venture (JV) between BHEL, Bharat Heavy Electricals Limited and Japan’s Kawasaki Heavy Industries (KHI) for the manufacture rolling stock for the bullet train project. KHI also manufactures the Shinkansen high-speed bullet trains. A bullet train requires specialized aluminium coaches which the state-run firm plans to manufacture at its Jhansi (Uttar Pradesh) or Bhopal facility (Madhya Pradesh). BHEL has also a technology collaboration agreement with KHI for the manufacture of stainless steel coaches and bogies for metros.Bhel’s manufacturing capacity of 20,000MW per annum was already getting affected with a limited order inflow. http://www.livemint.com/Companies/SGEB2pZSoZDL3CPwvYI9JJ/Bullet-train-project-may-help-revive-Bhels-fortunes.html 
It is also an opportunity for many small and big manufacturing companies of India with facilities and capability to get business from this project. For example, I am sure that the companies like Bharat Forge that already exports many manufactured parts, would be on such look out .

2. But one of the landmark announcement on the sides of the Summit was from the Japanese automaker Suzuki Motor Corp. was that its joint venture partnership with Toshiba Corp. and Denso Corp. will start making lithium ion batteries for India and international markets from 2020. The lithium battery plant of Suzuki in Gujarat would see an investment of Rs1,151 crore ($180 million) and will come up at the Suzuki Motor Gujarat (SMG) campus in Hansalpur, where land has been allocated to the project inside the vendor park. It is real start of so much talked about e-Vehicles in India. Further, SMG will invest an additional $600 million for setting up its third car manufacturing unit in Gujarat’s Hansalpur area, taking its overall investment in the factory to $2.1 billion. With the third unit in place, the company’s overall production capacity in the Gujarat would go up to 750,000 vehicles. The Hansalpur facility will create employment for 10,000 people.
http://www.livemint.com/Industry/kZfccKBlXFX2PIo83fZkIN/Maruti-gets-electric-boost-as-Suzuki-vows-to-produce-lithium.html 

3. For me the most important part of the joint statement was that Japan agreed to start the first four Japan-India Institutes for Manufacturing (JIMs) in the states of Gujarat, Karnataka, Rajasthan and Tamil Nadu- the four manufacturing states, in 2017. These institutes will boost up the quality of education and skill in manufacturing that India badly need to push it as manufacturing nation as with Germany, Japan is still the strongest manufacturing country with manufacturing culture. India has learnt a lot. And the number of Deming Prizes that have come to India is an indicators.

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Make in India: Can New Defence Minister Make It Happen

I sent this mail to rmo.mod.nic.inI request and wish Defence Minister visits key production units such as HAL that manufactures Tejas and Helicopters and key ordnance factories producing guns such Dhanush , Avadi manufacturing Arjuna Tank and Shipyards building Air Carrier and submarines with secretary, related defence chief and DRDO heads of the related products and have meeting emphasing concurrent team management to sort out bottlenecks and to scale up production to respectable world class level in numbers per year, quality with cost reduction and other innovations and express the need to export more and more up to even 30% after supplying domestic requirements. Exports ensure global competitiveness. It should be repeated every six months and must not only be for launch. The meeting must discuss the capacity expansion and investment for debottlenecking.

Indra Roy Sharma, B.Tech(Hons.)IIT, Kharagpur 1961

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Through Twitters, I requested Nirmala Sitaraman to call the CEO of HAL , understand what is holding him to produce 24 of Tejas fighters and LCH helicopters per month in next 12 months and assist. They India attain it there will be no Doklam or fire across borders. I also requested her to send all but few technical experts babus to the production units of defence forces Army, Navy, Airforce. Ministry must be very lean to have sufficient productive work.Not much has happened in last three years on Make in India front.

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India with consistent focus can easily become a Defence Manufacturing Power
Nirmala Sitaraman’s Make in India : Can Nirmala Speed up Strategic Partnership Policy? Under the SPP, there are four segments — fighter aircraft, helicopters, submarines, and Futuristic Infantry Combat Vehicles (FICV) / armoured fighting vehicles (AFV) and main battle tanks. As per media report, new Defence Minister, Nirmala Sitharaman firmed up a $12-billion project to procure over 2,300 Futuristic Infantry Combat Vehicles (FICV) for the Indian Army. I would have wished that DPSUs such as the Ordnance Factory Board (OFB) would not have been in SPP, as it will be deterrent to enthuse private sector to invest huge amount in these four SPP major sectors. Five Indian private companies are in race for becoming the major Indian partner in the four sectors where a globally reputed manufacturer in the sector will participate in the joint venture: L&T, Tata Motors, Reliance, Mahindra, and Tata Power SED-Titagarh Wagons. Will the foreign partners be agreeable also for providing the product design and technology and help in setting up the manufacturing facilities, and if yes, will it be for a particular well proven platform ? Will the foreign manufacturers use the joint venture including R&D facilities to keep on adding the latest new platforms in the manufacturing as its regional plant to export beside meeting the requirements of Indian defence forces? Can four research and design centres be created for the four sectors assisted by DRDO to be one day the good enough companies to meet the requirements for new platforms with contemporary technologies? 

At least some of the firms over the years can become global products providers. In my view, Tata group that has already started integrating all its defence related units to meet the requirements as per the new chairman. Tata Group can be the Indian partners in at least three sectors- fighters, helicopters, and FICV. L&T will be the best with the submarines, tanks and FICV. Mahindra can also take at least one Sector, may be helicopters.All these companies have components manufacturing and product development facilities and experiences in those areas. All these companies have invested heavily for manufacturing for the defence sector already. Other companies named will have start afresh.

Defence Minister will have to work for few hours every week, to have finally the best PPP partners- both domestic and foreign are decided and the projects start moving. Even with her best intention and hard work, a brand-new platform of a sector will take one-two years to come up with a a detailed project report, following which a prototype has to be developed. All these will require initial investments worth about $25 million. The first platform can with best attention and resources be ready in 5-6 years. Can Nirmala Sitaraman or for that matter, Modi government make it happen? Will the minister show her mettle in overcoming the hurdles of bureaucratic procedures, corporate infighting and failure to appoint an effective and credible implementation group ? They can if they can meet the time target of Bullet Train or building the solar energy capacity.

Indian Navy -Aircrafts Carriers

1.India has just one air carrier, INS Vikramaditya , renamed, rebuilt and refurbished by Russia in operation, which carries just 26 unreliable MiG-29 fighters and 10 helicopters. However, India wants two combat ready aircraft carriers available, on its east and west coasts, at any given time. Whereas many experts feel that it must have 3-4 air carriers in operation all the time and one in building in shipyard or overhauling. Government may explore possibility of export too if we can build world class quality and price.

2. INS Vikrant: The Cabinet Committee on Security approved the construction of the Indigenous Aircraft Carrier (IAC) in May 1999, but the INS Vikrant, is not expected to be fully ready before 2023 or even later, almost 25 years.

INS Vikrant is the first indigenous Indian aircraft carrier built for the first time by Cochin Shipyard (CSL) for the Indian Navy. The Directorate of Naval Design with full support from Russians have designed it. And the most of materials and components used have been developed and manufactured by PSUs and reputed private companies in India. As reported, ‘Russia’s primary role is in supplying equipment for the construction of the Aviation Facilities Complex.’ As per media report, the building of INS Vikrant is going far behind the schedule and does seem to be ready only by 2019 for launch , perhaps for battle only by 2022-23. A large number of design changes demanded very frequently by navy is cited as the major reason of delay. As reported, ‘Russia is doing all it can to keep up with the Indian Navy’s changing designs.’ Should INS Vikrant, a medium-sized aircraft carrier,40,000 ton that would be expected to carry an air group of up to thirty aircrafts, have taken 25 years to construct ? https://en.m.wikipedia.org/wiki/INS_Vikrant_(2013) After all, it takes the US only seven years to authorise, construct and deliver a 100,000 ton carrier with nuclear-propulsion. Bureaucrats , naval officers in operation , manufacturing dockyard, DND and consultants must sit together to think over the ideas to cut down the time to attain Right First Time through latest tools of project management. https://www.rbth.com/blogs/stranger_than_fiction/2016/08/01/shifting-timelines-of-indias-indigenous-aircraft-carrier_617091

3. INS Vishal , the second indigenous aircraft carrier is facing the same fate of INS Vikrant and has not yet got all clearances of defence ministry, as per media report. The navy’s long-term maritime capability perspective plan, which specifies three-five aircraft carriers and a fleet of 24 submarines. India must build them meeting the global standard at all steps as all overrun means increase in cost for the nation. Is there an invisible pressure for import through lobby? One can’t estimate the year of launch or battle ready of INS Vishal under such circumstances with procedural delays of bureaucrats in ministry and responsible naval officers. Shipyard must have much more autonomy and the project team constituting the experts from all stake holders must be in constant touch to quickly sort out the constraints. Unless the design expectations keep on changing due late awakenings, INS Vishal when gets battle ready will be a nuclear powered aircraft carrier of at least 65,000 tonnes, embarking at least 50-55 aircraft and a high-tech electromagnetic catapult to launch aircraft quicker and with greater payloads than the ski-jump that currently equips Indian carriers. Every carrier battle group includes multirole destroyers and frigates, for which India navy can keep on improving its design to remain contemporary with its strong design wing , DND. The dockyards and components vendors (manufacturers) in public and private sector must keep on investing in its contemporary capital goods. It will be absolutely essential that persons concerned with Make in India are technically the best in their fields. DND and production engineering group must be manned with the best available talents in India. And if necessary the government must build such defence specialised institutes drawing inputs of the best talents. Will the new minister change this dismal way of working of ministry and naval officers?http://ajaishukla.blogspot.in/search/label/Private%20Sector

Submarines

Mazagon Dock Ltd, Mumbai (MDL) will hand over INS Kalvari to the Indian Navy — the first of six Scorpene submarines being built in India in collaboration with French shipbuilder, Naval Group.The 1,565-tonne Scorpene will be the navy’s smallest submarines, but reputedly its deadliest. Hereafter, the second of the Scorpenes under construction at MDL, Khanderi, is currently undergoing the rigorous phase of sea trials. http://economictimes.indiatimes.com/news/defence/indian-navy-gets-its-first-scorpene-class-submarine-kalvari/other-submarines-under-trial/slideshow/60790418.cms Next submarines will be built with DRDO-developed Air Independent Propulsion for enhanced underwater endurance, and the capability to carry Indo-Russian BrahMos supersonic cruise missiles. According to the navy’s 30-year submarine building programme, it is building 24 submarines by 2029. http://ajaishukla.blogspot.in/2017/09/first-scorpene-ready-modi-to-commission.html

The Arihant class (Sanskrit, for Slayer of Enemies) is the first nuclear-powered ballistic missile submarine that has been developed under the US$2.9 billion Advanced Technology Vessel (ATV) project to design and build nuclear-powered submarines.The miniaturized version of the reactor was designed and built by the Bhabha Atomic Research Centre (BARC). The detailed engineering design was implemented at Larsen & Toubro’s submarine design center at their Hazira shipbuilding facility. Tata Power SED built the control systems for the submarine.The steam turbines and associated systems integrated with the reactor were supplied by Walchandnagar Industries.Arihant is the first ballistic missile submarine to have been built by a country other than one of the five permanent members of the United Nations Security Council. The second nuclear submarine , INS Aridhaman is still a work in progress, sailing perhaps between the ministry and naval head office .

India is capable of manufacturing everything, but Indians are hesitant and lethargic to drop the old easy way of buying everything ‘imported’.

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Make in India -Potential of India as Defence Manufacturing Power

India with consistent focus can easily become a Defence Manufacturing Power: (Part1)
Make-in-India could have pushed the country on the track by now. However, the built-in delaying features of bureaucratic rules along with the status-quo mindsets of the people who matter to make Make-in-India effectively implemented on ground fast enough, didn’t let it happen . Let us see how it is so, at least in case of single engine fighters , combat helicopters, artillery guns, missiles of almost world class level of performance.

1. Light Combat Helicopters: Hindustan Aeronautics Ltd (HAL) has inaugurated the production of the indigenously designed, developed and tested twin-engine Light Combat Helicopter (LCH ) of 5,8 ton class. It can meet the Indian defence forces’ requirements. As claimed by CEO, “Each component of our helicopters demonstrates the skill sets of HAL designers, of their capabilities and innovation efforts. Look at the carbon composite blades and the transmission system, composite body structure, glass cockpit and many more…” As reported, HAL will be manufacturing 15 choppers in Limited Series Production mode at its Bengaluru helicopter complex. With an order book of about 200 LCHs , HAL must expedite the new helicopter production facility in Tumkur, and must fast move for scaling up production to 12-20 per month with Serial Production Lines for different types of helicopters for all major applications. HAL’s Rotary Wing R&D facility must be strengthened with equipment and talent to upgrade all its helicopters to be the best in all performance parameters to meet the Indian defense forces’ and export requirements. It must aim to export gradually 30% of the production. Export gives the confidence on competitively better quality and cost .

2. Tejas fighter finally has been accepted to be an excellent single engine fighter but it must achieve a production target of a full squadron or two every year in serial production facilities. As reported HAL may reach a production of just Eight Tejas this year. Since December 2013 after getting operationally cleared to join the Indian Air Force (IAF), Hindustan Aeronautics Limited (HAL) has struggled to establish an assembly line for serial production. It speaks of the poor production management team of HAL assuming no constraints about fund availability. Is it then lack of component supply because it has not gone for outsourcing of components to well established private sector companies that are already supplying to all reputed OEMs such Boeing, Airbus, Lockheed…..or delay in toolings such as main jigs etc. supply to set up the assembly line for line production ? However, both would have been planned in advance. India does not lack talents in manufacturing engineering and management. And HAL must be having its own education centre for its specialised technologies and skills. I don’t know if HAL is having its own separate R&D or entirely dependent on DRDO for new product on different platform and continuous improvement and upgradation of its own products already in manufacturing. HAL fighter units must have an independent R&D and design centre leaving only major technology breakthroughs to DRDO.. Here also HAL must target to be globally competitive on all parameters of performance in its class and cost and must be acceptable to importing countries on regular basis. Indian Air Force personnels and the bureaucrats in defence ministry must help in making all these happen instead creating constraints for silly reasons. (To be continued)….. https://thedefenstar.com/2017/08/24/made-in-india-lch-to-enter-full-scale-production-this-saturday/ http://ajaishukla.blogspot.in/2017/08/tejas-fighter-finally-achieves.html)

DPSUs such as HAL must invest in independent R&D with well manned design, prototype manufacturing and testing facilities. Fund should not be a problem as ” Sitharaman is theoretically responsible for spending the annual defence budget – Rs 3,59,854 crore this year. Of this, the capital allocation for new equipment is Rs 86,488 crore, a ridiculously low proportion that Parliament’s defence committee has slammed as inadequate. Yet, year after year, the defence ministry surrenders large chunks of this allocation (it returned Rs 7,000 crore last year) because the finance ministry, which must endorse large procurements, deliberately delays clearances until the money lapses. Sitharaman must try to remedy this situation.”
India with consistent focus can easily become a Defence Manufacturing Power:Part 2

4. Advance Towed Artillery Gun System (ATAGS) indigenously developed for the Indian Army : DRDO developed the ATGS and got two prototypes of the ATAGS built from two sources – one prototype in partnership with Tata Power (Strategic Engineering Division) and another with Bharat Forge. The prototype of the Tata Power (SED) gun broke the world record. The 155-millimetre, 52-calibre gun-howitzer fired three shells out to a world-record distance of 47.2 kilometres from the gun position. In comparison, the similar size guns in service worldwide fire this ammunition to maximum ranges of 40-45 kilometres. This was achieved using special, long-range ammunition called “high explosive – base bleed” (HE – BB). It has other significant first global first features too: 1. its all-electric drive, which supersedes the more unreliable hydraulic drives in other towed guns.2.World’s only gun with a six-round “automated magazine” that fires a six-round burst in just 30 seconds.(against three- round). http://ajaishukla.blogspot.in/search/label/Private%20Sector) The second prototype for DRDO was from Bharat Forge that was tested but was inferior in performance compared to that ofTata Power. 

However, Bharat Forge aims to become among the top-three artillery gun manufacturers in the world : “Bharat Forge is currently working on five artillery gun platforms.” The company has defence joint ventures with three companies — two from Israel and one with Swedish defence major SAAB. 

http://economictimes.indiatimes.com/news/defence/make-in-india-baba-kalyani-led-bharat-forge-guns-for-top-spot-in-artillery/articleshow/51002871.cms http://www.thehindubusinessline.com/companies/15000cr-gun-deal-in-lt-kalyani-crosshairs/article7302404.ece 
Kalyani Group company Kalyani Strategic Systems Ltd (KSSL) and L&T are the only two Indian companies currently in contention for the towed artillery gun . L&T won the bid. KSSL has set up a facility that can make 150 guns at Pune. At Jejuri in Maharashtra, a new BF-Elbit facility will be established, At Mundhwa near Pune, Bharat Forge has now a facility for making barrels, breeches and muzzles, making it the only private sector company, and only the second one in the country, apart from Ordnance Factory Board in Kanpur, to have this capability.The machines imported from RUAG, Switzerland, can produce barrels up to 9 m in length, while the rifling and autofrettage machines can make bores ranging from 105-155 mm. The raw material for the barrel — a highly specialised steel alloy — is sourced from the neighbouring facility Kalyani Carpenter Special Steels.

However, L&T that won in May and is executing a $700 million order for 100 self-propelled howitzers artillery guns , unprecedented in size for a local contractor . L&T has so far invested as much as Rs 8,000 crore building nine defence plants across the country. It will partner with South Korea’s Hanwah Techwin Co to make the artillery guns.http://www.business-standard.com/article/companies/l-t-sees-28-billion-golden-goose-in-defence-orders-117083100031_1.html

PERHAPS, IT WOULD HAVE BEEN RIGHT FOR DEFENCE MINISTRY AND ARMY TO ORDER TATA POWER, AND BHARAT FORGE A TRIAL BATCH OF 24 And 12 respectively too to keep them improving its guns to world class performance level, as it did order18 Dhanush artillery guns, the indigenously upgraded variant of the Swedish Bofors guns, manufactured by Jabalpur-based Gun Carriage Factory (GCF) for its first regiment. As reported, the Army has placed an initial order for 114 guns. “The first regiment of 18 guns will be inducted in 2017, another 36 guns in 2018 and 60 guns in 2019. However, as per source, “It is a medium gun with a maximum range of 40 km, and has a high angle of attack. So it can be deployed in both deserts and mountains.” With so much of bias, how can private sector , and the best of them participate and invest in Defence sector, the innovation by private sector companies are not given appreciation by Armed force ordering it .
4. Futuristic Infantry Combat Vehicles

The Indian Army had issued a request for information (RFI) in June 2015 to design and develop a new-generation combat vehicle platform called the Future Ready Combat Vehicle (FRCV). Under the project, 2,610 FICVs are expected to be built. 

L&T ranked No. 1 in pre-qualification tests for futuristic infantry combat vehicles, an $8 billion contract . However, Tata Motors will be equal , if not better candidate for manufacturing FICV.. Tata Motors is also contemplating to export FICV as there are at least 50,000 combat vehicles in the world that are facing huge quantity of it for replacement. …“Tata Motors can bring synergies of leading Tata Group companies such as Tata Advanced Systems Ltd, Tata Advanced Materials Ltd, Titan Industries Ltd, Tata Technologies Ltd and TAL as FICV needs to marry 32 critical technologies.. Tata Motors can bring synergies of leading Tata Group companies such as Tata Advanced Systems Ltd, Tata Advanced Materials Ltd, Titan Industries Ltd, Tata Technologies Ltd and TAL as FICV needs to marry the 32 critical technologies. The ICV Kestrel that was jointly developed by Tata Motors with DRDO, in a competitive tender process, in a record period of 18 months. The wheeled ICV Kestrel platform was also completed and offered by the DRDO to the mechanized forces of the Indian army, In combat vehicles, apart from the Kestrel and FICV, Tata Motors has also developed a light armoured multi-role vehicle (LAMV), a reconnaissance vehicle, combining vital operational prerequisites of mobility, protection and firepower. (http://www.livemint.com/Companies/xLgIEVAu4hrymwHmJntsqN/Tata-Motors-defence-business-bets-its-future-on-FICV.html)

So L&T or Tata Motors can easily execute the task and would have been given trial orders. 

BMEL that builds Tetra trucks for army, Ashok Leyland or Mahindra can also join the race of manufacturing FICVs for army. Why should India go for strategic partnership for FICV, if its own manufacturers can build this giving opportunity for heavy employment in country with lesser royalty to be paid to foreign collaborators? It’s only the indecision of Army and defence ministry that are holding back the decision because of the reasons known to every Indian-the mindsets of technical superiority of everything imported plus a big plus of some vested interest . 

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बिचारों के जंगल में-४

25.8.2017
कैसे ये गुरू देश के करोड़ों पुरूषों महिलाओं को बेवक़ूफ़ बना अपने राजसुख का उपभोग करते हैं? जीवन के चार लक्ष्यों -धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में दो – काम और अर्थ का ख़ुद सम्पूर्ण फ़ायदा उठाते हैं और बेवक़ूफ़, अनजान चेलों को अपने को धर्म और मोक्ष का रास्ता बतलाने वाले बाबा या यहाँ तक कि भगवान बताते हैं. और बीच में एक पढ़ा चालाक सौदा करने वाले बिचौलियों का दल तैयार करते हैं जो सहज सीधे धर्म -बिश्वासी अपार लोगों को बरगला कर गुरू के लिये अर्थ एकत्रित करता है और शिष्यों में कुछ गुरू के काम वासना के शिकार हो जाते है. ऐसे ही बापू आसाराम की तरह के गुरू हैं डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमित राम रहीम हैं जिनके पंथ के अनुआई करोड़ों में हैं और सालाना आमदनी ६० करोड़ रूपये के करीब है – रोज़ करीब साढ़े सोलह लाख से ज्यादा पैसा आता है. कुछ साल पहले एक महिला शिष्या ने उन पर बलात्कार का इल्ज़ाम लगा मुकदमा की थी, उसका आज निर्णय आना है. लाखों में अनुयायी आ जमा हुये हैं और ये राम रहीम को किसी तरह भी जेल नहीं जाने देंगे. यह ठान लिये हैं, ख़बर है बहुत मात्रा में अस्त्र शस्त्र भी जमा है. पिछले कुछ दिनों से पंजाब, हरियाना का सब काम ठप्प है, दोनों राज्यों की पुलिस तैनात है, सड़क और रेल परिवहन बन्द है, सेना का भी इंतज़ाम कर लिया गया है. स्कूल कालेज बंद हैं. कब तक देश को ऐसे बाबा छलते रहेंगे. नुकशान निम्न वर्ग का ही होता है सभी तरह से. पर यह भी तो प्रजातंत्र का अधिकार है, कैसे कोई कड़ा क़दम उड़ायेगा कोई, भोट के माध्यम भी यही गुरू हैं…. http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/here-are-some-unknown-facts-about-dera-chief-ram-rahim-singh/living-in-style/slideshow/60208019.cms

रविवार , अगस्त २०
पिछले दिनों में मीडिया में आया वह समाचार दिल को कहीं भीतर से हिला गया. “तीन महीने बाद बेटा विदेश से लौटता है , अपने माँ का मुम्बई के पॉश एपार्टमेंट का दरवाज़ा खटखटाता है, फिर तोडवाता है , भीतर सोफ़े पर माँ का कंकाल दिखता है….,यह कविता उसी घटना से लिया संदेश एवं सुझाव रूप है ऐसी परिस्थितियों में रहनेवाले लोगों के लिये……….आप अपनी राय ज़रूर दें…..
अपने की क्या परिभाषा हो
जीवन की आपाधापी में 

जाने कैसे यह साँझ हुई

जब बचे अकेले हम दोनों

और समय काटने के प्रयास 

विफल होते

तो एक प्रश्न करता शंकित 
‘अपने की क्या परिभाषा हो?’

जो अपने थे वे दूर गये

कुछ पास रहे फिर दूर हुये

अपनी अपनी मजबूरी है

तब

जो पास रहे वे अपने है

जो दूर गये वे सपने है

फिर आज कौन जो अपने हैं-
जब शंका से मन घबराया 

कोई आया , मिटा शंका,  

फिर बता गया 

वह सही राह .
जब गिरे कभी, एक हाथ बढ़ा ,

हमको थांभा, और खड़ा किया;
चिन्तित चेहरे को भाँप अगर 

आगे आया, मन बहलाया

वह क्यों न हमारा अपना है
क्या केवल अपने को लेकर
बाक़ी जीवन रो सकते हैं

जो मिले समय के आने पर

स्वेच्छा से आगे बढ़ आये

बिन झिझके उसको अपनाये

अपना वह ही हो सकता है .
सोमवार ,जुलाई ३१ 

नागेन्द्र जी का गृह प्रवेश. हमें चिम्पु ले गया पानी पड़ रहा था सबेरे से. शुभ माना जाता है किसी पवित्र समारोह के पहले. बहुत दिनों के बाद काफ़ी लोगों से मिलने का अवसर और बिधि को समझने का मौक़ा मिला. आधुनिक रहन सहन के माहौल एवं मजबूरियों के अनुसार कर्मकांडों में काफ़ी बदलाव आया है . निकट भविष्य में और आयेगा. श्रद्धा बनी रही तो अनुष्ठान पुराने पर्व, त्योहार मनाये जाते रहेंगे. कुछ कारण या मजबूरी वस मैं कोई गृह प्रवेश समारोह नहीं कर पाया, जब कि बहुत मौक़े थे. नागेन्द्र जी के घर ब्यवस्थित ढंग से हवन करवाया पंडितजी ने ..इन्द्र, अग्नि एवं स्वाहा की बातें समझाई. एक साथ आज का भारत एक साथ पूर्व वैदिक काल के साथ आधुनिकत्तम समय में रहता है. मुझे यह सब देख सुन बहुत कुछ प्रश्न भी उठते है पर बहुत अच्छा लगता है. अल्पना, अन्विता ग्रेटर नोयडा से आईं. अगस्त १ को भी जाते जाते मिलने आईं….. बृहस्पतिवार, जुलाई २०, २०१७ 

शाम को बहू अल्पना एवं पोती अन्विता आ गये और शनिवार तक रहे. हर क्षण लगा था ज़िन्दगी का मधुरतम, अन्विता की हर बातें इतनी प्यारी लगी कि लगता सुनता रहूँ . काफ़ी सालों बाद आये हैं, अब तो दो साल में कालेज चली जायेगी और ब्यस्त हो जायेगी, बडी हो जायेगी, आज की मासूमियत, निश्छलता पता नहीं किस तरह बदलेगी, अच्छा होता ऐसे ही रहती, हम जबतक होगा कम से कम फ़ेसटाइम पर देख पायेगें कुछ साल कम से कम. अन्विता को कटे आम के साथ मीठी दही पसन्द आ रही थी. अल्पना को मिष्टी दई के साथ चिउरा नाश्ते में पसन्द था. समय उड़ गया…बीच में दोनों आती जाती रहीं, पर महशूश होता रहा क़ि वे यहीं पास हीं हैं….निर्मल जी की पत्नी, बेटी और पोती से भी मिल ली….

8.8.2017
क्या बदलेगा नोयडा? हमारे नोयडा के सबसे पुराने मित्र हैं अरोरा जी, अधिकांश वे कभी कभी फ़ोन पर ही बात कर बाँट लेते हैं अपना ख़ुशी ग़म. कभी मैं अपना अनुभव सुना देता हूँ कभी वे , पर वे हरदम सरकार सरकार पक्ष में बातें करते हैं, मैं बिरोध में. कुछ दिन पहले उन्होंने इस घटना की कहानी सुनाई, जो नोयडा के पुलिस विभाग में किसी सुधार को नई सरकार आने की बात को नकारते हैं: कल सबेरे सबेरे उनके मकान के पास का कपड़ों पर आयरन करनेवाला (धोबी)उनकी घंटी बजाया. वे बाहर आये तो बताया , स्थानीय थाने से एक पुलिस कांस्टेबल आया और कहा अपना स्मार्ट फ़ोन दिखा. मैंने उसे दो दिन पहले किसी से ख़रीदा था. पुलिस स्टेशन ले गया और फिर धमका कर पूछा, किसके पास से ख़रीदा है, चल दिखा उसे. वह उस आदमी के यहाँ ले गया, पर फ़ोन रख लिया. कांस्टेबल ने, कहा अब तू जा, कल थाने आ ले जाना. आज जब उसके पास जा कहा मेरा फ़ोन तो दे दीजिये. वह पुलिस कांस्टेबल कहता है मैं इतना कुछ किया हूँ २००० रूपये ला ,फ़ोन ले जा….धोबी उसके पास वापस जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है…आप क्या कहेंगे इस घटना के बारे में…..अब याद आया मेघदूतम् पार्क के कोने के पुलिस मैन, हर के पास एक स्मार्ट फ़ोन देखा हूँ, मेरे पूछने पर बताये वह सब उनका ब्यक्तिगत है, सरकार नहीं देती…..मैंने फ़ेसबुक पर भी इसका ज़िक्र किया था…..पर अरोरा जी की कहानी सुन संदेह हो गया है उनकी बातों पर…शायद पुलिसवालों के अधिकांश स्मार्ट फ़ोन कहीं न कहीं से ऐसे ही आये होंगे……..अच्छा होता कि मैं शत प्रतिशत ग़लत होता …..क्या फ़र्क़ पड़ता है आम आदमी को सरकार के बदलने से…कैसे सुधरेगी क़ानून और ब्यवस्था ……

७.८.२०१७ 
इस बार भी केशव की तरह ही अल्पना एवं अन्विता के आने के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं थी. अपर्ना और रवि जी के साथ मिल यह साज़िश की गई थी, क्योंकि डा. सिन्हा को भी मेरी तरह ही छकाया गया था. यह उसकी अनोखी योजना होती है और हम हर बार आश्चर्यचकित हो जाते हैं. हमें वे अपने असली हालत में देख लेते हैं. पर इस बार पहले दिन जब वे हमारे यहाँ आये , घंटी बजाते रहे, हम दोपहर की नींद में बातानूकुलन यंत्र के कारण बन्द अपने कमरे में सोते रहे . उन्हें आख़िरकार वापस लौटना पड़ा यह सोचते हुये कि हम शायद हरिद्वार में हैं . तीसरे दिन जुलाई १८, श्री सिरोही जी सबेरे ही फ़ोन करके बताये वे सपत्नीक शाम को आयेंगे, आये भी पाँच बजे बहुत महीनों बाद …….थोड़ी देर बाद अरोरा दम्पति भी आ गये….मैं उनकी ख़ातिरदारी में ब्यस्त हो गया……..और फिर घंटी बजी दरवाज़ा खोला और आश्चकित हो गया ख़ुशी में झूम उठा….अल्पना, अन्विता, अपर्ना, डा. सिन्हा सामने खडे थे , भीतर लाये, आये, एक अनोखे ख़ुशी का माहौल छा गया, जिसकी हरदम प्रतीक्षा रहती है…..पर ख़ुशी थोड़ी रही, वे बृहस्पतिवार को हमारे यहाँ आयेंगे साथ रहने….

…,….

सबेरे आम्रपाली इडेन पार्क एपार्टमेंट के एक्ज़िट गेट से निकलते ही दो कुत्ते हमारी तरफ़ बढ़े , गार्ड के डाँटने पर पीछे चले गये, मैं निकल गया, फिर क्या सोच खड़ा हो गया , कुत्ते फिर गेट पर थे किसी के इंतज़ार में. कोई उन्हें सबेरे सबेरे भोजन खिला पुण्य अर्जन करते हैं. आज सबेरे घूमते समय जिन लोगों ने कुतिया के काटने की ख़बर सुनी थी मुझसे अफ़सोस जाहिर किये. दोनों मेरे जानकार सज्जन जो कुत्तों को रोज़ पार्क में भोजन देते हैं वे भी आये और मुझे ऑथरिटी में किसी से कहकर इन पार्क के कुत्तों को किसी तरह हटवाने की ब्यवस्था कराने का आग्रह किया , आश्चर्य हुआ. दोनों मुझसे जवान हैं और नोयडा के काफ़ी प्रभावशाली लोगों में नोयडा ऑथरिटी के सर्व्वोच्च अफ़सरों और यहाँ के सांसद आदि से जान पहचान रखते हैं. मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा. पार्क से बाहर आते मेन गेट पर ही दो कुत्तों को लड़ते देखा, गार्ड से पूछने पर उसका कहना था, ‘जब आप लोग खाना खिलाता है तो मैं कैसे रोक सकता हूँ’. आगे बढ़ा तो पुलिस की भैन खड़ी थी, कुछ को उनमें मैं जानता था, अत: पूछा, “क्या इन रोड पर घूमते देशी कुत्तों को आप या मैं गोली मार सकते हैं?’ जवाब मिला, “सर नहीं, आप लात से भी नहीं मार सकते.” क़ानून यह है क्यों? क्या हमारा जीव प्रेम इतना दृढ़ है कि नागरिकों के तकलीफ़ों का भी ख़्याल नहीं रखता. बात कुछ आगे बढ़ी क्योंकि मैं अन्तर्निहित रूप से दुखी था, शहर के बहुमंज़िली इमारतों के एपार्टमेंट में रहनेवालों को इन देशी कुत्तों का क्या काम? पर पाप करनेवालों को कुछ सस्ता सहज पुण्य कर्म तो करने पड़ते हीं हैं पाप से मुक्ति के लिये. कुछ और जानकारी यह मिली की केरल के कुछ शहरों में दो साल पहले कुत्तों का आतंक फैला, कुछ युवक संगठित हो उनका सफ़ाया करने लगे, पीड़ितों ने उनका समर्थन किया, पर फिर सेवा केन्द्र मीडिया की सहायता से सामने आ गये, भोट की ज़रूरतमंद सरकार को राहत मिली. सुप्रीम कोर्ट कुत्तों पर नागरिकों के उत्पीड़न को ग़ैरक़ानूनी क़रार दी. अब तो शायद वैसा करने पर श्वान रक्षक दल उठ खडे हों. एक पुराने अनुमान के अनुसार भारत में ३ करोड़ सड़क छाप कुत्ते हैं . २०१२ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार हर साल २०,००० कुत्ते काटने की बारदातें भारत के हास्पिटलों में आतीं हैं. २००५ में करीब १२,७०० मृत्यु का कारण कुत्ते का काटना था. सरकार के सामने दो –तीन सुझाव है और उपाय है नागरिकों को विशेषकर हमारी तरह के बुद्धों को बचाने का. १. कुत्तों को बुचडखाने लेजाने और उनके लज़ीज़ माँस का निर्यात करने का ठेका दे. २. सभी कुत्तों का परिवार बढ़ाने की क्षमता ख़त्म कर दे या फिर हर कुत्ते के बच्चे का क़ानूनीतौर पर इम्यूनाइजेसन किया जाये जैसे पालतू कुत्तों के मालिक करते हैं. (मोदी जी या अमिताभ बच्चन की तरह का कोई पक्षधर हर चैनलों पर लोगों से उनके टीकाकरण का अपील करे) ३. सरकार हर कुत्ते के काटनेवालों को उनके मानशिक संताप के एवज़ में दस लाख भरपाई करे. मृत्यु होने पर यह राशि एक करोड़ होनी चाहिये. इति कुत्ता प्रकरण ….अच्छा होगा आप में से जिसकी नोयडा ऑथरिटी में कुछ पैठ हो तो नागरिकों की मदद करें और मेरी तरह किसी कुत्ते से कटवाने की प्रतीक्षा न करें…..खैर, विदेश में रहते बच्चों के सुझाव पर मैं तो अब एक मज़बूत छड़ी ले कर चलने लगा हूँ…..

1.8.2017 
आपको कभी कुत्ता काटा है…..मुझे भी नहीं काटा था जुलाई ३० के पहले….बहुत पहले सुना था क्यों यह ख़तरनाक है….इलाज के लिये बड़े बड़े अत्यन्त कष्टदायक इंजेक्शन लेने पड़ते हैं बहुत दिनों तक ……और नहीं लेने पर ब्यक्ति की मृत्यु होती है भयानक तरीके से कुत्ते की तरह भूंकते भूंकते……

अल्पना , अन्विता शाम को चली गईं थी…काफ़ी दिनों से घूमना बन्द प्राय: था.इच्छा हुई घूम आया जाये मन बहल जायेगा, यमुना ने भी हांमी भर दी….मैं मेघदूतम् पार्क के लिये निकल लिया. अभी नये बनते सामुदायिक केन्द्र के पास पहुँचा था कि पीछे से एक कुतिया चुपचाप आई , मुझे पता भी नहीं चला और मेरे दांये पैर को मुँह से पकड़ ली ज़ोर से, सोचा पैंट मोटे कपड़े का है कुछ नहीं हुआ होगा. दस क़दम आगे जा पैंट उठा देखा, कुतिया के दाँत के गड़ने से ख़ून निकल गया है. चिन्ता हुई, पास ही खड़े गार्ड ने बताया, ‘लाल मिर्ची पिस कर लगा दीजिये…’मुझे उस पर ग़ुस्सा था, वह कुतिया को मेरे पीछे आते देखा तो बताया क्यों नहीं. पार्क गया दोस्तों की सलाह लेने. दो भुक्तभोगियों ने बताया डाक्टर की सलाह लेने के लिये. एक, दो या तीन इन्जेक्शन लेने होंगे. दो मित्र डाक्टरों को फ़ोन किया. डा. गोयल ने बताया – पाँच इंजेक्शन लगेंगे, पहले तो सरकारी हास्पिटल में ही लगते थे, अब किसी हास्पिटल में लग जाते हैं. मैं Neon यहीं सेक्टर ५० चला गया एमरजेंसी में , डाक्टर ने देख टेटनस और ‘रेबीपुर’ की एक एक इंजेक्शन लगा दी बाक़ी चार का सेडेयूल बना दिया. रजत भी आ गया था , मैं निश्चिंत हो घर वापस आ गया.देशी कुत्तों की संख्या साल में पता नहीं कितनी बढ़ जाती है हमारी जनसंख्या के अनुपात में. हमारे सेक्टर ५० के F ब्लॉक में मेघदूतम् पार्क मे पचास के करीब तो ज़रूर होंगे और साल में कई गुना बढ़ जाते हैं, पर नियंत्रण को लोग तैयार नहीं, न निर्मूलन के लिये नोयडा ऑथरिटी. करोड़ों के एपार्टमेंट में रहनेवाले लोग इन देशी कुत्तों को जिलाये रोज़ सबेरे अामरपाली इडेन पार्क और मेघदूतम् पार्क के किनारे रोटियों को तोड़ तोड़ किनारे फैला देते हैं, पार्क के भीतर भी दस कुत्ते होंगे, कुछ बड़े ओहदों से रिटायर हुये लोग, एक पति-पत्नी उन्हें हर रोज़ खिलाते हैं . शायद वह जीव सेवा का कार्य जो स्वर्ग देगा या पापों से निवृत्ति . मैंने मना करने की जब कोशिश की तो दबावों से हैरान हो गया. गाँव की तरह ये कुत्ते न तो चोरों से रखवाली करने वाले हैं घर की , न कोई और भलाई. नोयडा की तरह जगह में तो बहुत सेवाकार्य है. एक उसमें हैं गाँवों के या ग़रीब तबके के बच्चों की शिक्षा. पर इन्हीं कुत्ता पोषकों में किसी को वे काट दें, तो उसे जान से मार देने से भी बाज़ नहीं आयेंगे. मेरा नोयडा ऑथरिटी के सर्वोच्च अधिकारियों से निवेदन है कि वे नोयडा को वे देशी कुत्तों से यथा शीघ्र मुक्त कराये जैसे, केरल सरकार ने कराया. आज सबेरे मैंने जितने दोस्तों से बात किया वे यह ब्यथा भोग चुके हैं. हर दूकान पर इसके उपचार वाले इंजेक्शन का मिल जाना दूसरा प्रमाण है कुत्ते के काटने की घटना का आम बात होना. किसी निर्यात एजेंसी को इसका चीन या उत्तर पूरब के अंचल में भेजने का ठेका भी अच्छा रहेगा…..आकिरकार जीव जीवस्य भोजनम्…..क्या इन देशी कुत्तों के ज़हरीले दाँतों से मुक्त करने का उपाय हो सकता है. यह मैं मेनका गांधी का ध्यान रख कह रहा हूँ……….

गौरक्षकों से मेरा नम्र निवेदन है कि गौ रक्षा के साथ हम वृद्धों का लावारिस सड़क एवं गली के कुत्तों से भी रक्षा करने की सोचो. एक नया संघटन बनाओ….और इन सबको निर्यात कर चीन या जहाँ ये भक्ष्य है , कुछ देश का आर्थिक लाभ भी करो…..अगर ग़लत लगे तो माफ़ करना . आजकल ७८ की उम्र में पाँच सुइयाँ ले रहा हूँ..,
३१.७.२०१७: बिरोध औंर प्रश्न न कर हम पॉज़िटिव सुझाव से भी बदलाव ला सकते हैं. यह क्यों हैं कि कुछ लोग केवल नेगिटिव बातें ही करतें रहते है. उसी शक्ति को अद्भुत प्रिय सुझावों में बदल कर पहल की जा सकती है….प्रभात पाण्डे जी प्रश्न तो प्रश्न होता है ….. यह अगले की सोच पर निर्भर करता है कि प्रश्न सकारात्मक है या नहीं. दोनों पक्ष जब मानसिक रूप से सुनने-सुनाने के समान स्तर पर हों तभी सुझाव सुझाव का रूप लेते हैं वरना उन्हें आलोचना का चोंगा पहनाकर दरकिनार कर दिया जाता है या मार दिया जाता है….कोशिश तो किया जाये..देखा तो जाये सुझाव, जनता तक तो पहुँचें। निस्पृह काम तो किया जाये…

सभी बिहार के उन लोगों से जो बिहार के बाहर रहते हैं , सक्षम हैं और गाँव के हैं उनसे एक अनुरोध है : वे अपने परिवार, और गाँव के लोगों मे जाति प्रथा के अवगुणों को समझाने का प्रयत्न करें. हाँ उस गाँव की आत्म कथा लिखें और गाँव में एक पुस्तकालय बनाने और चलाने का इंतज़ाम ज़रूर करें.. खेतिहरों से आधुनिक खेती ब्यवसायिक ढंग से करने में सहायक बनें.. जब भी अमरीका गया हूँ यही बात मैं वहाँ के हर भारतीय को कहता हूँ. अगर देश का क़र्ज़ उतारना है या दूर रहते इससे प्यार होने का इज़हार करते हैं तो मेरे ख़्याल से इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. बाक़ी अपने आप हो जायेगा. 

1.8.2018

जय किसान: भारत के किसानों, किसानों के नेताओं और राजनेताओं से कुछ सवाल ह और उनके लिये कुछ सुझाव है. क़र्ज़ की मुआफी, या किसानों की आत्महत्यायें देश के सम्मान्न की बात नहीं है, न समस्या का मूल समाधान. किसी वर्ग का अपनी क़र्ज़ की मुआफ़ी या न्यूनतम समर्थन मूल्य की तर्कहीन बृद्धि या इसी तरह की अन्य टैक्स कम करने के लिये माँग को मनवाने का तरीक़ा हड़ताल, रास्ता रोको, या सरकारी सम्पति को जलाने की तरह का बिरोध देश के हित में नहीं है. इन हिंसात्मक और नकारात्मक तरीके को छोड़ क्या कोई सकारात्मक सुझाव और उसके क्रियान्वयन का रास्ता ज्यादा स्थायी हल नहीं होगा समस्या के उचित समाधान का. यहाँ मैं केवल किसानों के हाल में हुए बिरोध के बारे में अपना मत दूँगा जो क़र्ज़ माफ़ी को लेकर हुआ. 

पहले हमें यह तय करना है कि किसान कौन है ज़मीन का पुश्तैनी मालिक जो खेती ख़ुद करता है सब ख़र्च कर या वह जो ज़मीन को एक भाड़े के समझौता के तहत ले उसपर खेती करता है. कौन खेती पर ख़र्च करता है और कौन केवल पूर्व निश्चित धनराशि पहले ही ले लेता है या अपना तय हिस्सा फ़सल तैयार हो जाने के बाद जैसे फ़सल का १/२-२/३ पूरा ख़र्च बहन करते हुये. अधिकांशत: क़र्ज़ कम जमीनवाले छोटे किसान लेते हैं या वे किसान जो बैंक से क़र्ज़ ले जो बहुत कम सूद पर मिलता है उसका अन्य लाभदायक मदों में ख़र्च करते हैं , 

क्या राज्य सरकारें पूरी ज़मीनों के मालिकाने को डिजिटाइज कर किसी वेब साइट पर डाल चुकी हैं? क्या बिना मालिकाने के कोई बैंक असल में खेती करनेवाले को क़र्ज़ देते हैं? अब समय आ चुका है यह सब प्रक्रिया लिखित रूप में हो? फ़ायदा उसी को मिले क़र्ज़ मुआफ़ी जो इसका हक़दार है,अन्यथा किसी दिन यह समस्या भयंकर न्यायपूर्ण संघर्ष का रूप ले सकती है. 

दूसरा अहसास यह होना चाहिये ज़मीन पर खेती करनेवाले को कि कृषि भी एक वैज्ञानिक ब्यवसाय है. इसमें फ़सल का चुनाव, मज़दूरी, बीज, खाद, सिंचाई, मशीन या उसके भाड़े पर जो ख़र्च होता है, वह अनुमानित आय से हरदम कम होना चाहिये. खेती के ब्यवसाय में लागत कम करने और उपज बृद्धि करने के हर उपाय खोजना और ब्यवहार करना चाहिये. अभी भी अपने देश के हर फ़सल की गुणवत्ता और उत्पादन अन्य खेतिहर देशों की तुलना में बहुत कम है. 

हर अच्छे किसान खेती और उसमें ब्यवहार किये जाने वाले विज्ञान की आवश्यक जानकारी होनी चाहिये और उसे उपलब्ध कराई जानी चाहिये , उसी तरह से उसके ब्यवसायिक पक्ष का भी. अभी अधिकांश खेती देखी-दिखाई या सुनी-सुनाई ज्ञान से हो रही है. मोदी ने खेत की मीट्टी के जाँच और कार्ड बनाने की बात कही है, जागरूक किसानों ने नई पद्धतियाँ ब्यवहार कर उत्पादकता बढ़ाई है, पर उनकी संख्या नगण्य है. गाँव के स्कूल के बच्चों को कृषि की प्राइमरी शिक्षा का प्रावधान ज़रूरी है. बहुत राज्यों में ज़मीन के सठीक ब्यवहार से खेतिहरों में समृद्धि भी आई है, पर अधिकांश राज्यों में, विशेषकर पूर्व के राज्यों में, खेती का मतलब केवल धान और गेहूँ ही समझा जाता है. दलहन, तेलहन, सब्जी, फल, फूल, दूध का ब्यवसायिक स्तर पर उत्पादन बहुत कम या केवल कुछ सीमित क्षेत्रों में ही होता है . यहाँ तक की गन्ने की खेती भी मिलों के बन्द होने से ख़त्म हो गई है.  

बचपन में देखा करता था धान कटते ही बेंचा नहीं जाता था, चावल बना कर बेंचा जाता था, घरों की महिलाऐं और बाहर से मज़दूरी पर औरतें करती थीं यह काम, दाम अच्छा मिलता था. बची हुई चीज़ों का भी अन्य कामों में इस्तेमाल हो जाता था. गन्ने की खेती करने वाले गुड , भूर्रा या राब बना रखते थे और जब अच्छा दाम मिलता था बेंचते थे, दालों के साथ या तेलहन में भी वही किया जाता था. किसान या उनके नेता ब्यवसायियों के हाथों से मुनाफ़ा छीन अपने क्यों दूकानदार नहीं बन सकते हैं और मुनाफ़ा का ज्यादा हिस्सा ले सकते हैं. सरकारी या ग़ैर सरकारी कम्पनियाँ गाँव के किसानों के घर में कम लागत की फ़ूड प्रोसेसिंग के यंत्र लगवा किसानों के परिवार की आमदनी बढ़ाने में सहायता कर सकतीं हैं. किसानों को ख़ुद अपनी आमदनी बढ़ाने की सोच पैदा करनी होगी. सरकार को भी इन विषयों पर सोचना होगा जो ज़रूरी है किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिये. पिछले दो मानसून अच्छे रहे. पर मौसम का क्या भरोसा . सिंचाई ब्यवस्था तो बराबर तेज़ी से बढती रहनी चाहिये. पता नहीं सरकार द्वारा घोषित उन लाखों की संख्या में तालाबों के निर्माण का काम कहाँ तक आगे बढ़ा? अच्छी मानसून के पानी को इकट्ठा करने के सभी पुराने संसाधन- तालाब, पोखर, अहरा किसानों ने भर खेती की ज़मीन बना दी. अब नये सिरे से ज़मीन के १/१० वें हिस्से में तालाब बनाने की पानी संग्रह की नई योजना है यह. कृषि ब्यवसाय चुननेवाले किसानवर्ग और उनके नेताओं को शिक्षित और समझदार होने की ज़रूरत है. सरकार को भी बहुत कुछ करना है जिससे सप्लाई चेन के बीच वाले ब्यवसायी और दलाल किसानों को ठेंगा दिखा उनके परिश्रम का बडा हिस्सा ख़ुद न हड़पते रहें. कोल्ड स्टोरेज, भंडारण, हर पंचायत में एक बाज़ार , शहरों में किसान बाज़ार, आदि बहुत ब्यवस्थाओं को बढ़ावा देना होगा. उदाहरणत: राजनीतिक पार्टियाँ सबको लैपटॉप न बाँट सब छोटे किसानों के खेतों में सोलर पम्प लगवा देतीं तो किसान ख़ुद ही अपने बच्चों को लैपटॉप ख़रीद देता. किसान नेताओं और राजनीतिज्ञों को इनको बख़्श देना चाहिये स्वार्थ भरे चालों से. 

पर गाँव के समाजिक जीवन और सोच में भी बदलाव की ज़रूरत है……मर्द औरत सबको काम करना होगा परिवार को सम्पन्न बनाने के लिये, ग़लत आदतों को छोड़ना होगा….बच्चों की अच्छी शिक्षा एक मात्र वैसी चीज़ है जिसकी माँग में हर तरह के आन्दोलन ज़रूरी है…नहीं तो नेता गाँवों को पीछे रख कर बरबाद कर देंगे…..हाँ एक बात और – देश के हर परिवार में खेती की ज़मीनें पीढ़ी दरपीढी कम होती जा रही है, अब तो यह बन्द होनी चाहिये.घर के जो सदस्य बाहर चले जातें हैं और बस जाते हैं उन्हें अपनी ज़मीन को उस सदस्य को जो खेती में रहता, सहर्ष दे देना सहज शर्तों पर. इस या किसी अन्य उपायों से हर कृषक के पास ज्यादा ज़मीन एक जगह हो की ब्यवस्था करनी चाहिये, बहुत उपाय हो सकते हैं कृषि को लाभदायक, सम्माजनक पेशा बनाने के लिये. ..जो सरकारी अनुदान पर आश्रित न हो…..कृषक आगे बढ़ो, पूरी दुनिया की भूख को तुम्हें ही मिटाना है……भारत के किसान कर सकते हैं…,,

२६.७.२०१७
कल कॉफ़ी टेबल आ गया था अमाजॉन से पर एसेम्बल अपने करना होगा पैकेट का वज़न और साइज़ देख ही समझ आ गया. पर जो आगे हुआ वह मेरी हीं ग़लती कारण मुझे बुरी तरह ज़ख़्मी कर गया…..ज़रा सी ग़लती और इतना कष्ट…..ग़लती ग़लती होती है छोटी बडी नहीं…..

जयदेव के ‘गीत गोबिन्द’ का एक श्लोक जिसके पाठ से विष्णु के सभी अवतारों की बन्दना की जा सकती है….गुग्गल की कृपा से चौबेजी की प्रेरणा और मेरे अल्पभिज्ञ के प्रयास से यहाँ है, जिसका जो चाहे उपयोग कर सकता है: 

वेदानुद्धरते जगन्निवहते भूगोलमुद्बिभ्रते

दैत्यम् दारयते बलिम् छलयते क्षत्रक्षयम् कुर्‌वते।

पौलस्त्यम् जयते हलम् कलयते कारुण्यमातन्वते

म्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यम् नमः॥ १-५

As a reviver of Veda s as a fish, bearer of this earth as tortoise, uplifter and supporter of earth as wild boar, slasher of Hiranyakashyapa as lion man, deluder of Bali as dwarf boy, annihilator of Kshatriya s as Parashu Rama, conqueror of Ravana, the legatee of Paulastya, as Rama, wielder of plough as bala raama, fosterer of non violence as Buddha, mangler of fractious races as Kalki, you alone can put on ten semblances, thus oh, Krishna, my reverences are unto you… [1-5]

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बिचारों के जंगल में-३

27.7.2017
नीतिश फिर से राजा बन गये उन्हीं का साथ ले जिन्हें वे अकारण छोड़ गये थे क्योंकि राजनीति में कोई लड़ाई ब्यक्ति बिशेष से तो होनी ही नहीं चाहिये अगर वह परिवार या जाति राज न चलाता हो. उस समय में भी मैंने उन्हे ग़लत कहा था, आज भी मैं वही सोचता हूँ . यह कैसे सम्भव है कि लालू के रेल मंत्री काल की हेरा फिरी , लेनदेन नीतिश को पहले से मालूम न हो, कैसे वे लालू के दोनों लड़कों को मंत्री परिषद में ले लिये जो दोनों बिहार के लिये मज़ाक़ बन गये सारे भारत में और इसका दर्द दूरदेश में रहनेवाले बिहारियों को झेलना पड़ा. कैसे उन्होंने वित्त मंत्री चुनाव किये और रखे, क्या बिहार का कुछ भी भला हो सकता है. बिहार के गाँवों और छोटे शहरों की शिक्षा की दुर्गति पर वे कुछ न कर पाये….वे गद्दी बच जाने ख़ुश होंगे, पर जाते जाते लालू ने उन पर राष्ट्रीय टी वी न्यूज़ चैनलों पर उन पर लांक्षन लगाया उससे कैसे उबरेंगे लाख कोशिश कर. सुशील मोदी ने एक दोस्त की अच्छी भूमिका निभाई. क्या अब वे अपने नये साथियों से अनुगरहित रहेंगे, उससे क्या बिहार शिरमौर बन पायेगा. इस उम्र में मेरे लिये तो देश या प्रान्त का दुनिया, और देश में सबसे समृद्ध और सबसे ज्ञानपरक शिक्षा में सर्व श्रेष्ठ होने की एक मात्र कामना है. नीतिश जी अब मत बदलना….नहीं तो लोग तुम्हें कहीं का न छोड़ेंगे ……शुभेच्छा…

26.7.2017
भूमिहारों का गौरव गान करनेवालों से एक बात पूछनी है? आज से चार साल पहले मैं अपनी पत्नी और कुछ अन्य जातिय रिश्तेदारों के कहने पर आम्रपाली इडेन पार्क में एपारटमेंट लिया. मेरे जैसे बहुत बिहारियों का अपनत्व का कारण था, किसी विशेष सुबिधा की नहीं. आज मालिक अनिल शर्मा को केवल इस प्रोजेक्ट का २३ करोड़ बक़ाया रूपया नोयडा अॉथरिटी को देना है. लोग गालियाँ दे रहे हैं, रजिस्टरी नहीं हो सकती. कोई भूमिहार नेता बतायेगा क्या करना चाहिये. लोग कहते हैं ऐसे इसके २० प्रोजेक्ट हैं, सभी पैसा चुका कर अपने भाग्य को कोश रहे हैं. कैसे जाति के लिये आदर हो जब धूर्तता करना जाति धर्म बन जाये…

25.7.2017
देश के दो राजनीतिज्ञ दिग्गजों के निवास बदल जायेंगे आज से- एक बड़े से छोटे और दूसरा छोटे से बड़े घर में सोयेंगे. क्या आज रात उन्हें नींद आयेगी इतनी उम्र में (मैं अनुभव पर कह रहा हूँ) ? प्रजातंत्र में यही बडी बात है…..पूरा देश यह ज़रूर सोचता होगा .बच्चों को बताना चाहिये..मैं बहुत दिनों पहले मज़ाक़ में कहा करता था.. मैं देश का राष्ट्रपति तो बन सकता हू पर हिन्दुस्तान मोटर्स का प्रेसीडेंट नहीं …..यहाँ सबकुछ सम्भव है कर्म और धर्म से…, क्या इसे भाग्य कहा जाये या …पर शायद एक को ज़रूर अपने बचपन के दिन आये होंगे जो दूसरे को पाँच साल पहले एक ऐसे ही दिन याद आया होगा गाँव का… परिवार का.. गाँव के घर का .. उसकी दयनीय हालत का… और फिर लम्बे जीवन के कटु और मधुर यादें…

24.7.2017

ब्यापारियों की हठधर्मी: यह कैसा भारत ! जहाँ टैक्स न देना या चुराना बड़प्पन समझा जाने लगा है आज़ादी के सत्तर साल बाद भी. गुजरात के सूरत में पिछले सप्ताह हजारों कपड़ा व्यापारियों ने जीएसटी के तहत टेक्सटाइल पर पांच प्रतिशत टैक्स लगाने के विरोध में प्रदर्शन किया। जानकारी के मुताबिक गुजरात के हीरा व्यापारी भी जीएसटी का विरोध कर रहे हैं। ये वही ब्यापारी हैं जो देश के मजबूर ग़रीबों को कम से कम माहवारी पर रख और हर तरह का शोषण कर अपने बच्चों की शादियों में सैकड़ों करोड़ रूपया ख़र्च करते हैं काले धन को बढ़ाने में मदद करते हैं . फिर मन्दिरों में जा हांडी में करोड़ों नक़दी डाल स्वर्ग में स्थान बनाने के भ्रम में सब ग़ैरक़ानूनी काम करते रहते हैं और यह सब बिना टैक्स दिये. जी. एस. टी की तरह युगान्तरकारी कर ब्यवस्था में सहर्ष भाग ले देश की समृद्धि के रास्ते बढ़ने में रोड़ा अटकाते हैं….,काश, जल्दी समझ जायेंगे अपनी नासमझी. एक तरफ़ गुजरात का एक बेटा इतिहास रच रहा है, दूसरी तरफ़ वहीं के ब्यापारी रास्ते और हार्दिक पटेल ख़ुद सोचें वे क्या कर रहे हैं, ठीक या ग़लत.

21.7.2017

गोरक्षकों की हिंसक ज़्यादती और बीफ फ़ेस्टिवल का भड़काऊ भावनात्मक समारोह: देश के युवकों का नया तरीक़ा अलग अलग तरह के तर्क और बहाने से देश को तोड़ने का ग़ैर ज़िम्मेदाराना प्रयास है, दोनों ग़लत ह मेरे बिचार में, मुझे पता नहीं ऐसे लोग आज के क़ानून के अपराधी हैं या नहीं? देश के कोने कोने से आते हर उम्र की लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार के जघन्य समाचार किसी भी ब्यक्ति को अन्दर तक हिला देने के लिये काफ़ी है बिशेषकर उनके लिये जिनकी बहूबेटियां आज काम के लिये निकलती हैं. क्या पुलिस या क़ानून इसे रोक सकती है, क्या दंड बिधान बलात्कार के लिये फाँसी की सज़ा दे कर यह बन्द करा सकता है? क्या हर महिला के बाहर निकलने पर उसकी रक्षा केलिये एक पुलिस इसका उतर हो सकता है? क्या यह ब्यवहारिक सुझाव है? कोई माँग किसी को देश या जनसाधारण में किसी के घर या गाड़ी या कोई आग लगाने की इजाज़त नहीं देती. देश के रखवालों के बिरूद्ध हिंसा कर बाहवाही पाने की तो एकदम नहीं. समाज अपने दायित्व को सरकार पर डाले जा रहा है. हम समझे और समझायें कि तोड़ फोड़ और हिंसक आंदोलन किसी ज़िम्मेदार प्रजातंत्र का तरीक़ा नहीं हो सकता . जो देश पूर्व पस्थर काल से आघुनिकतम परम्पराओं को ले एक साथ रहता है और जिस देश की अच्छी शिक्षा की नींव ही बहुत कमज़ोर हैं, वहाँ उदारवादी पर उत्तरदायी समाज और देश को ठीक रास्ते पर लाने के लिये वैसे ही उचित ब्यवहार करने के लिये मज़बूत और ईमानदार क़ानून और ब्यवस्था की ज्यादा ज़रूरी है. देश के प्रबुद्ध लोगों सब मिल कर इसका हल खोजना ही बाक़ी है, क्योंकि राजनीतिज्ञों को आग लगाना आता है, न बुझाना, न आग किसी हालत में नहीं लगे , उसका कारगर उपाय खोजना …..

20.7.2017

नरेश अग्रवाल ने कल राज्य सभा में जो बातें कही, वह बताती है कि अधिकांश विरोधी हिन्दू नेताओं की मानसिकता क्या है धर्म में पूजित देवता के प्रति , फिर चरित्र कहाँ से आयेगा और अगर नेता ही ऐसे हैं जो अपने धर्म की मर्यादा नहीं समझते हैं न राष्ट्र की तो उनके साधारण पिछलग्गू तो क्या कहेंगे और करेंगे मालूम नहीं. मैं अगर राहुल, सोनिया या ओवासी कहते तो मान लेता क्योंकि वे हिन्दू हैं ही नहीं, पर नरेश अग्रवाल को अपना धर्म बता देना चाहिये. सोचने की बात है यह राज्य सभा में कही गई. दुर्भाग्यवश देश की सरकार और मंत्री पिछले ७० सालों में अच्छी शिक्षा पर कोई ज़ोर नहीं दिया, नहीं तो आज ऐसे नेता कभी सांसद नहीं बनते. मैं दुर्भाग्यवश यह सब ख़ुद सुन रहा था…आश्चर्य यह कि बिपक्षी नेता या अन्य कई सांसद इस दुरावस्था की ज़िम्मेदारी मोदी पर थोपी, पर किसी ने कोई सुझाव नहीं दिया समाज के ब्यक्तिगत मानशिकता या हिंसा को रोकने का. वे सर्वसम्मति से यह सुझाव दे सकते थे अपने भाषणों में-क्यों न हर सासंद अपने क्षेत्र में जाये और चुनावों की तरह रैलियाँ करे कि हर धर्म के लोग समाज में फैलते इन विषैले दुर्भावना को ख़त्म करें. जाति और धर्म को लेकर आपसी वैमनस्य के लिये आज केवल राजनीतिज्ञ ज़िम्मेदार है नासमझों की भावना को हवा देकर. समाज का वह वर्ग जो अपनी रोज़ी रोटी के लिये ईमानदारी से काम करता है उसके पास इन ग़लत पाप कर्मों के लिये समय नहीं….चीन और पाकिस्तान जब भारत को मौक़ा ही नहीं देना चाहते कि वह आगे बढ़ जाये या दुनिया में सिरमौर बन जाये, सभी नेता देश को तोड़ने में लगे हैं, क्योंकि ये इसी की रोटी खाते है, अपने लिये और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये ग़लत रास्ते से चाहे वह काला ही क्यों न हों, किसी ग़रीब की थाली का चुराया ही क्यों नहो….

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भारत और विचित्र भारतीय: राजस्थान के नागौर जिसे के एक गाँव की एक भीड ने पुलिस पर आक्रमण कर १६ पुलिसवालों को बुरी तरह ज़ख़्मी कर दिया एक ख़तरनाक बदमाश के मारे जाने के बिरूद्ध, क्योंकि वह उन्हीं के जाति का था. भीड सी बी आई द्वारा जाँच की माँग कर रही थी. जिसे सारे राजपूतों ने इसे अपने शान की बात बना लिया है, पूरा ज़िला जल रहा है, बसें और सरकारी सम्पति जलाई जा रहीं है, यही है जाति की राजनीति, महाराणा प्रताप अपने बंशजों की करतूत पर रो रहे होते. राजपूतों दिखाने के अवसर तो सीमा पर है, सेना में भर्ती होओ या पढ़ाई लिखाई करो, समृद्ध बनो…. बाहुबलियों को राणा प्रताप न बनाओ. उनका तो तुमने साथ नहीं दिया, और देश को ग़ुलाम बनने से रोकने के लिये तो एक नहीं हो पाये…राजपूतों के गुणों से हज़ारों मील दूर रह कर भी अपने को राजपूत कहते शरम क्यों नहीं आती?

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नोयडा में एक डंडे पत्थर लिये भीड ने २००० परिवारों के एक हाते बन्द बहुमंज़िला आवास कॉम्पलेक्स को पथराव किया और भीतर प्रवेश कर एक फ़्लैट को बहुत नुकशान पहुँचाया इस ग़लतफ़हमीमें कि मालिक ने महिला नौकर को घर में बन्द कर रखा है. सत्य यह था कि महिला अपने रिश्तेदार के यहाँ ठहर गई थी उस रात.

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सबेरे शाम पुलिसवालों को मेघदूतम् एपार्टमेंट और पार्क कोने पर देखता हूँ तो अच्छा लगता है. एक बात और अच्छी है वे सभी नौजवान और चुस्त लगते हैं. एक बार और भी ध्यान में आता है – सबके पास स्मार्ट फ़ोन हैं. आज मैं रूका और पूछा कि क्या स्मार्ट फ़ोन उनका है या पुलिस विभाग ने दिया है. ‘ नहीं अंकल, यह हमलोगों का अपना है’. वे फ़ोन को ब्यक्तिगत परिवार या दोस्तों से सम्पर्क के लिये रखते है या अपने लिये मनोरंजन के लिये, गाने, फ़िल्म, समाचार. मेरा अगला सुझाव था कि आप में कोई इस पर किसी ‘ऐप’ का इजाद क्यों नहीं जो क्षेत्र के सभी क़ानून ब्यवस्था से आपको हरदम जोड़े रह सके और क़ानून तोड़नेवाले लोगों के साथ रियल टाइम में जोड़े रह सके.’यह सम्भव है और बहुत काम का बन सकता है. पर हम तो इतना टेक्निकल जानते नहीं है. बिभाग को कुछ पहल करना चाहिये . मैं आगे बढ़ गया पर सोचता रहा, भोट के लिये गैजेटों को न बाँट हर योग्य पुलिसवालों को यह क्यों नहीं दिया जा सकता……हम पुलिसवालों के काम का ऐप क्यों ईजाद कर सकते..,,,

9.7.2017

कल शाम मेघदूतम् पार्क जा रहा था…..कोने पर रोज़ की तरह दो पुलिसवाले खड़े थे, तीन चार छोटी उम्र के लड़के उनसे बात कर रहे थे, उनमें एक लड़की भी थी……और एक दुबला पतला अबोध सा गाँव का लड़का ज़मीन पर पसरा हुआ था…..मुझसे रोका नहीं गया मन की बात, चलते चलते कह दिया, ‘अरे भैया, पसरे क्यों हो इस तरह’, और आगे बढ़ गया…..कुछ देर में देखा वह लड़का पीछे दौड़ा आ रहा है, हमारे साथ दौड़ो ….मुझे भी कुछ क्षण दौड़ने का स्वाँग कर अच्छा लगा….फिर ‘तुम जीत गये’ कह कर जान छुड़ाना चाहा, पर इतने में एक आवाज़ आई, ‘यह यादव है’….फिर दूसरी, ‘और वह , अंकल मोहमडन…. ‘, मैं हतप्रभ हो खड़ा हो गया, , ‘अरे तुम स्कूल जाते हो ,पढ़ते हो …तुम सभी बिद्यार्थी हो’.., उनकी समझ में नहीं आई शायद यह बात, हम अभी सौ वर्ष पीछे हैं….हों भी क्यों नहीं ,जब राष्ट्रपति के उम्मीदवार अभी भी अपने को बिना ज़रूरत दलित कहने के पहले सोचते नहीं, अपने साथ हुये भेदभाव की कहानियाँ सुना कॉलेज के लड़कों के बीच सहानूभुति पाना चाहते हैं या पता नहीं क्या सुख आज उस बात को कह…,जब देश केवल आपकी योग्यता, आपका कृतित्व, आपके आका का बिचार कर आपके बारे में राय बनाता है…

8.7.2017
ब्यवसायी, किसान, प्याज़ और टमाटर -कौन हँसा, कौन रोया: कल मुझे टमाटर ख़रीदना था. मैं गोल टमाटरों को पसन्द करता हूँ , पर आज तो लम्बे वाले मिले, लगता है कोल्ड स्टोरेज का हो. पता नहीं यह भी चीन से आता हो, हमारे ब्यपारी चला रहें हैं यह देश या फिर चीन , अमरीका. हमारा सरकारी तंत्र तो मूक दर्शक हैं चाहे जो भी सरकार हो राज्य में ,दलो के बड़े नेता मलाई खाने में ब्यस्त रहते हैं. प्रश्न है कि टमाटर की कमी है या फिर जमाख़ोरी के कारण मुझे या देश के अन्य लोगों को ८० रूपये किलो टमाटर के देने पड़े. यही टमाटर महीने पहले किसानों को २-३₹/ किलो के हिसाब से ब्यवसायियों को बेंचना पड़ा नहीं तो ख़राब हो जाता. आज का समाचार है कि किसानों को प्याज़ २-३₹/किलो बेंचना पड़ रहा है ब्यवसायियों के दबाव में. सरकारी कर्मचारियों को दिखता है न सुनता है , न कुछ रास्ता ढूँढने की कोशिश करते हैं , न किसी जानकार की राय लेते हैं. पिछले सालों में हम देखें थे दालों की बढती क़ीमत और राज्यों में केन्द्र के दबाव से छापेमारियों से निकले थे लाखों टन दालें. क्या उनके बिरूद्ध कोई कारवायी हुई, या उनका यही काम रोज़ी रोटी है . बेईमान सरकारी तंत्र उन पर सख़्त कार्रवाई कैसे करे. देश की कमजोरी या यह दयनीय हालत, पैदा करनेवाले और ख़रीदने वाले मजबूर लोगों के बीच पाँच-छ: बिचौलियों की है , जो अपने में सब पैसा बाँट लेते हैं, न पैदा करनेवाले किसान को उसकी लागत और लाभ मिलता है, न उन की खपत करने वाले परिवारों को महँगाई से छुटकारा मिलता है. और इन बिचौलियों में देश के बहुत अरबपति, हज़ारों करोड़पति से ले लाखों लखपति भी हैं और अधिकांश ब्यवसाय नक़दी में करते हैं और बहाना रहता है -हम कम्प्यूटर नहीं जानते, हम ख़रीद नहीं सकते, हम कम्प्यूटर जानने वाले को रख नहीं सकते, और फिर कुछ पढ़े लिखे इंटरनेट के स्पीड और अभाव का भी बहाना करते हैं मीडिया पर हाथ में बड़े बड़े स्मार्ट फ़ोन लिये हुये इंटभिउ देते हमें मीडिया को या जबकि उनमें काफ़ी इन सभी गैजेटों को रखते हैं , बहुत थोड़े भजन सुनते हैं या फ़िल्म देखते हैं कुछ ब्लू फ़िल्म और पोर्नोग्राफ़ी के साइटों का मज़ा लेते हैं. सरकार जब तक बिचौलियों को कम करने एवं किसान बाज़ार के माध्यम से ग्राहकों तक किसान की पैदा बस्तुओं को पहुँचाने का सरल उपाय नहीं निकालेगी, देश के वैज्ञानिक एवं टेक्नोकराट इसका सठीक अध्ययन कर उपाय नहीं खोजेंगे, हर पंचायत या ब्लॉक में संरक्षण की ब्यवस्था नहीं होगी , सस्ते फ़ूड परोसेसिंग के संसाधान की ब्यवस्था नहीं होगी, किसान की आमदनी नहीं बढ़ेगी, उनके नेताजी किसान आन्दोलन के रास्ते नाम और दाम कमाते रहेंगे.

29.6.2017
मेरे मित्र चतुर्वेदी जी ने कल ज़िक्र किया था देश के लोगों के नकारात्मक राजनीतिक प्रेरित बिध्वसक घटनाओं का . कुछ बातों से मैं सहमत नहीं हूँ . कारण समाजिक उतना ही है जितना राजनीतिक. मीडिया अपने टी आर पी पर आधारित ख़बरों को तुल देती है. कहीं कोई अच्छे समाचार का ज़िक्र ही नहीं होता. पूरे सत्तर साल में हमने बेसिक चीज़ों पर ध्यान नहीं दिया…ख़ुद बताइये जब देश के फल, सब्जी, दूध की उपदवार अनाज से ज्यादा हो गई, टमाटर किसानों ने दो रूपये में बेंचें , यही हाल अन्य जल्दी नष्ट होनेवाली चीज़ों के साथ भी हुआ. पर पैसा बनाये बिचौलियॉ एवं ब्यवसायी.कल तक वे भारतीय जनता पार्टी के साथ थे , पर वही आज देश बिरोधी हो गये. कहीं हड़ताल, कहीं बिरोध . ग़लत तरह से कमाये रूपयों से ख़रीद कर आधुनिकतम गाड़ियाँ चलाना सीख लेते हैं, पर जी. एस. टी नहीं सीखना, अपनाना चाहते, जब देश और विदेशों के सभी सर्वश्रेष्ठ जानकार लोग इसकी बड़ाई कर रहे हैं, पूरे देश के लोगों को लाभ पहुँचेगा…लोग खेती के लिये क़र्ज़ का भुगतान माफ़ कराना चाहते हैं, सभी कुछ मुफ़्त चाहिये…..कभी सफल किसानों से सीख नहीं लेते….सबसे ग़रीब पिछड़े बिहार में किसान आत्महत्या नहीं करते सरकारी क़र्ज़ वापस न देने के कारण ….देश के हर क्षेत्र में बहुत किसान खेती को पुराने ढंग का त्याग कर पानी संचयन, फ़सलों के परिवर्तन, उत्पादकता बढ़ा ब्यवसायी ढंग से कर काफ़ी लाभ कमा समृद्ध एवं सुखी हो रहे हैं, बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे रहें हैं, जो लोग सरकारी सुविधाओं का उचित उपभोग कर रहे हैं. समस्यायें अधिक दरिद्र परिवार के लिये, पर वहाँ ब्यक्ति या परिवार पर निर्भर कर रहा उसके परिवार की ख़ुशहाली. मेरी पत्नी की दो सहनायिका हैं जो कुछ घंटें मेरे यहाँ भी काम करतीं हैं .दोनों के परिवार की करीब बराबर ही आमदनी है, पर एक का बैंक खाता है, दो बच्चों को अच्छी तरह पढ़ाने का इंतज़ाम किया है. मैं उसके बैंक में उनका पैसा एक मिनट में भेज देता हूँ. पर दूसरी कितने ज़ोर देने पर भी बैंक खाता नहीं खुलवाई. उसके कोई बच्चे नहीं पढ़ते और न पढ़ाना चाहती है. सरकार कैसे इसके लिये दोषी होगी. हर चीज़ के लिये सरकार पर निर्भर रहना बिना अपने कर्त्बयों के निबाहे…कहाँ तक समझदारी है….और इसका अधिकांश दोष देश के राजनीतिज्ञों का हैं लोगों को बरगला कर ग़लत रास्ता दिखा ग़लती किये हैं पिछले सालों में. मीडिया के कई चैनलें ग़लतफ़हमियाँ फैला रहीं हैं. जहाँ भी लोग बिना कोई टैक्स दिये करोड़ों कमा रहे थे, वे नाराज़ हैं और इनकी संख्या दुर्भाग्यपूर्ण बहुत बडी है. कांग्रेस या तृणमूल की सोनिया और ममता लोगों के इस मानसिकता क ध्यान रख, जिसका प्रश्रय और तेज़ गति से हुआ है आज़ादी के सत्तर साल में, आज की आधी रात की सरकारी आयोजन का बहिष्कार कर , लोगों का सहानभुति बटोर , चुनाव जीतना चाहती है.

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बिचारों के जंगल में-२

२७.६.२०१७ मेरे बिचार से श्रीमती मीरा कुमार को राम नाथ कोविन्द के बिरूद्ध राष्ट्रपति पद के चुनाव से हट जाना चाहिये, जब कि बिहार के मुख्य मंत्री तक उनके साथ नहीं हैं. केवल सोनिया गांधी के दबाव में उनकी प्रतिद्वंदिता और निश्चित परिणाम को जानते हुये कुछ अक़्लमंदी नहीं मानी जायेगी. दोनों कुमार एवं कोविन्द करीब करीब बराबरी के उम्मीदवार हैं, पर साफ बहुसंख्यक पक्ष का आदर मधुर रिश्तों पर आधारित प्रजातंत्र की परिचायक होती और बिदेश में भी भारतीय राजनीति के परिपक्वता की साख जमती. पर शायद यह ज़रूरत से ज्यादा भारतीय राजनीतिज्ञों से अपेक्षा होगी हमारी. मीरा कुमारी जी को कांग्रेस का बाबू जनजीवन राम के साथ किये ब्यवहार का भी ख़्याल रखना चाहिये था. अगर कांग्रेस दलितों का आदर करती तो लालबहादूर शास्त्री के अकाल मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनाती. मीरा जी को राष्ट्रपति बनाने का प्रयत्न न कर २०१९ का प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बना परिवारवादी बिल्ले से बच जाती.
२६.६.२०१७ दो रूपये या मुफ़्त बटोरे किसानों के टमाटर आज ब्यपारी अपना भाग्य और काला धन बना रहे हैं. कल नीचे के सब्जी वाले ने मुझपर मेहरबानी कर ६० रूपये प्रति किलो पर हमें दिया… जब तक इन बिचौलियों पर कोई नियम क़ानून द्वारा प्रतिबंध नहीं लगाया जायेगा, किसान आत्महत्या करते रहेंगे और क़र्ज़ माफ़ी की माँग होती रही है. अब यही बिचौलियों जी. एस. टी को सफल होने बाधा डालेंगे. आदत जो पड़ी है टैक्स न देने की. फिर यही वर्ग या इनके कर्मचारी GST को न देने या कम देने का क़ानूनी उपाय निकालेंगे. इसी तरह यह ब्यपारी वर्ग बनता है करोड़पति और देश के सिस्टम को अपने पॉकेट में रखते हैं.

२४.६.२०१७: आज के समय में और नई पीढ़ी के आँखों में हम फीके पड़ गये. पर कभी यह इमारत भी बुलन्द थी, देश के गाड़ियों और मशीन टूल्स वाले सर झुकाते थे अपनी जानकारी और सहायता, सुझाव के कारण. पर समय सिखाता है कि हम कितने भी नायाब सुझाव क्यों न दें, देश चलायेंगे संजय निरूपम, राहुल गांधी, और उमा भारती, ..अरविन्द केजरीवाल, ..सिद्धू जैसे लोग ही और देश की जनता को बेवक़ूफ़ बनाते रहेंगे , वैसे ही लोगों को भोट भी देंगे लोग, और सब कुछ पता नहीं कब तक ऐसे ही चलता रहेगा….हमारे तरह के लोग भी हार न मान अपने राह चलते रहेंगे, बिचार प्रकट करते रहेंगे

२२.६.२०१७: भारतीय मुसलमान, बिशेषकर कश्मीर के, जिनमें अंधिकाश हिन्दूओं के बंशज हैं, उन्हें उस पुरानी भारतीय संस्कृति को अपनाने में , मिल जुल कर रहने कोई असुविधा नहीं होनी चाहिये थी. यहाँ तक कि कश्मीर के नवयुवक क्या यह समझ नहीं सकते कि भट्ट, बक्सी, पंडित आदि जो उनके नामों में है उनके हिन्दूओं के ही बंशज होने के प्रमाण है. धर्म से हरदम बडा देश है. केवल हमारी अंदरूनी कमज़ोरियों के कारण बाह्य शक्तियाँ हमें हराती गई, हम बँटते गये एवं एक दूसरे के जान के दुश्मन हो गये. स्वतंत्र भाव से सोचिये, सब अन्तर मिट जायेगा. सब भाई भाई दिखेंगे…..एक बार सोचिये तो पाकिस्तान या यहाँ तक की बांग्ला देश में हिन्दूओं के साथ जो ब्यवहार किया गया वही अगर भारत में होता तो १८ -२० करोड़ों का क्या हाल होता…आप इंटरनेट देखते हो तो पढ़ो, समझो कश्मीर का इतिहास क्या है? अशोक के कश्मीर एक मुसलमान शासक ने करीब करीब सभी पंडितों को धर्म परिवर्तन करा दिया प्राण के बदले……सोचो, हम आज २१ वीं शताब्दी में झूठे धर्म के नाम के बदले क्या कर रहें हैं. ७० साल से जो भारत का अन्न का और पैसा लूट जो नेता तुम्हारे अरबपति बने उनसे तो कभी कोई सवाल नहीं किया………

२१.६.२०१७: कांग्रेस अब गद्दी के लिये देश बिरोधी हो चुकी है, संजय निरूपम की तरह का गुंडा अमिताभ बच्चन को जी एस टी के विज्ञापन से रोक रहा है. सोनिया, राहुल और उनके चमचे देश , किसानों , ब्यपारियों को भड़का रहे हैं, साफ है. देश के ख़ुराफ़ाती तत्व हैं ये. अब कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता जो ख़ुद देश को लुटे और अपने को महान अर्थबिज्ञ कहते न अपने साठ साल में कुछ किये न करने देंगे. देश की जनता को इन्हें देश निकाला दे देना चाहिये. हर जगह मुंहकी खा रहे हैं, पर आदत से बाज़ नहीं आते….

१९.६.२०१७: क्या निर्णय आया मोदी जी या बी जे पी का- बिहार के राज्यपाल देश के राष्ट्रपति होंगे अगले पाँच साल के लिये . क्या अंतर है कांग्रेस के ज़ैल सिंह और प्रतिभा जी से? बहुत थोड़ी. क्यों ज़रूरी है की राजनेता ही सभी पदों पर बैठायें जाये, टेक्नोक्रैट नहीं? क्यों सभी कुछ राजनीतिज्ञों के झोले में? देश के लिये क्या फ़ायदा होगा? कितने नौजवान पीढ़ी जो कमा कर टैक्स भी देती है, देश के सपने संझोती है, भोट भी देती है. पर कुछ भी उनकी सोच से मिलता नहीं होता. क्यों नहीं श्रीधरन, नारायनमूर्ति या फिर नन्दन निलेकनी जैसे लोग राष्ट्रपति बन सकते। क्यों घिसी पीटी कांग्रेसी तरीके से ही चलना चाहती हैं सभी पार्टियाँ? घूसख़ोरी रोकने का केवल बहाना है, आज भी बदस्तूर चल रही है नक़दी, काला. केवल कुछ या ज्यादा सीधे साधे लोग बेवक़ूफ़ बनते रहते हैं. तभी यह पता चल गया था जब मोदीजी क़र्ज़ माफ़ी की बात की थी चुनावी सभा में. क्या सब चुनावी खेल है? और साधारण लोगों को बरगलाने की महारियत की जीत है? अब किसान अपनी मर्ज़ी का कर रहे हैं, कल छोटे ब्यवसायी करेंगे. सरकारी ख़ज़ाना क़र्ज़ माफ़ी में ख़त्म होगा और फिर नोट छापेगी या बिदेशी क़र्ज़ लेगी. किसको यह सोचने की पड़ी है….सब माफ़िया बन जितना वसूल सकें में लगे हैं…देश जाये भांड में…

कल फादर्स डे था. अब यह अपने देश में भी प्रचलित होता जा रहा है. हम नक़ल करने में माहिर हैं. शायद यही हमारी शक्ति है. मैं केशव को समझा रहा था . माँ पिता हर देश में बहुत मिहनत और लगन से अपने बेटे बेटियों को समृद्ध, स्वस्थ, सुखी, और ख़ुश देखने के लिये वह वह सब करते हैं जो किसी के लिये सम्भव है. हर बच्चे को अपने काम और दोस्तों के साथ उनका सदा ख़्याल रखना चाहिये जहाँ तक सम्भव हो. यह भी शिक्षा का एक अंग है. मुझे आज भी इस बात का दुख होता है कभी कभी सोचते हुये- मैंने क्यों नहीं अपने दादा-दादी, पिताजी एवं माँ से एकान्त में पूछ पाया वे मुझसे क्या चाहते हैं, जब मैं अपने नौकरी में ब्यस्त था…..शायद वे कुछ न कहते …पिताजी और माँ तो आख़िरी के साल हमारे साथ रहे ………पर दादा- दादी तब मेरे पास न रह पाये जब उन्हें मेरे साथ ही रहना चाहिये था, क्योंकि मैं जो बना या कर पाया वह उनके कारण था…आज राकेश को केशव से फ़ेस टाइम पर बात करते देख बहुत अच्छा लगा और बहुत सारी यादें दिमाग़ में मँडराती रहीं…….काश, हर पिता माता और बच्चे सहअस्तित्व के इस मंतर को समझ पाते….

१७.६.२०१७: योगी अादित्यनाथ के ताजमहल के रेपलिका का उपहार स्वरूप भेंट का बिरोध बहुतों को अच्छा नहीं लगता होगा . पर है तो वह मक़बरा जंहा शाहजहाँ के परिवार के लोग दफ़्न हैं. मेरे ख़्याल से अशोक के सिंहों वाली मूर्ति जो खम्भों पर थी ज्यादा उपयुक्त है, या फिर नालन्दा या कोनार्क के मन्दिरों की रेपलिका. यह भारतीय ज्यादा है. श्री मोदी अपने उपहारों का चयन बढ़ियाँ करते हैं और उसे भारतीय रखते हैं…ताजमहल देख मेरी एक बहन ने कहा था, मुझे यहाँ क्यों लाये, नहाना पड़ेगा. 

१६.६.२०१७: 

वे आते हैं 

फिर जाते हैं 

अहसास तो पर 

दे जाते हैं

अपनापन का

कुछ हम कहते 

कुछ सुनते हैं

कुछ सीख नई

पा जाते है

जा कहाँ रहा

विज्ञान आज

सुन्दर भविष्य की

बडी आश

दुनिया कितनी 

सुन्दर होगी

जाने पर फिर 
ख़ालीपन फिर 

जीवन का सत्य 

बता देता 

है सभी तो

क्षणभंगुर 

फिर खोज 
शुरू होजाती है

बस एक शब्द में

कहूँ अगर……

क्या कभी ‘निस्पृह’
बन पाउँगा?

१४.६.२०१७: मैं चिदम्बरम की बिद्वता की इस लिये सराहना नहीं कर सका कि २००४ के बजट में किया गया देश के सब जलाशयों को मरम्मत कर जीर्णोद्धार का काम वायदा कर पूरा नहीं कर पाये. ये जलाशय पूरे देश में हमारे पूर्वजों ने बनवाये थे सिंचाई और सूखे से निपटने के लिये. आज की सरकार भी बडी मात्रा में तालाबों को बनाने का वायदा की है पर बताती नहीं उनमें कितने बने. देश के किसान केवल क़र्ज़ उतारने की बात करते हैं अपने कर्तव्यों की बात नहीं करते. सभी सिंचाई के नायाब तरीके जो सदियों में बने उन्हे भर कर अपना और देश का कितना नुकशान किये की बात नहीं करते. बैंकों के कर्मचारियों को घूस दे अनाप सनाप क़र्ज़ लेते हैं और कभी उसे लौटाने का इरादा ही नहीं रखते, क्योंकि एक बार सोनिया की सरकार ने रास्ता दिखा दिया है. अभी जब महाराष्ट्र में पाँच एकड़ से कम एवं एक लाख तक के क़र्ज़ माफ़ की बात हुई तो उसका भी बिरोध हो रहा है. इन्हीं किसानों के बच्चे जब सरकारी नौकरी में घूस ले लेकर घर भरते हैं तो उनके माँ बाप उसकी ऊपरी आपकी के बल पर लाखों और अब तो करोड़ों में तिलक माँगते हैं. फिर सरकार के लिये ज़रूरी ज़मीन दे ज्यादा से ज्यादा भरपाई वसूल करते हैं. देश एक लगातार चरित्र ह्रास की ओर बढ़ रहा है. क्या इलाज सोचेंगे लोग?सरकार या आज दी जाने वाली शिक्षा यह नहीं सुधार सकती.

६२ साल पहले….१९५५…..पालकी….मधुकरपुर …..बारात की गहमागहमी……माँड़ो ….शामियाने में होता छोटका बब्बनवा का नाच…..बिबाह बिधि…..कैसे उड़ गये वर्ष .पैरों में पंख बाँध …पता ही नहीं चला . सोने के दिन और चाँदी की रातें….सब हितैषियों की शुभकामना…..बड़ों का आशीर्वाद …..पूर्वजों के पुण्य फल का ख़्याल . यही रहा जीवन….

११.६.२०१७ एक सुखद आश्चर्य . दोपहर के विश्राम के बाद उठ चुका था , घंटी बजी तो सोचा लौंजी के लिये कच्चे आम ले रमा आई होगी. दरवाज़ा खुला तो समधिनी जयश्री जी, अपर्ना का चेहरा दिखा. पर फिर रबिजी एवं अपर्ना मुझे गेस्ट रूम में चलने का आग्रह किये. कहे अमरीका से कुछ गिफ़्ट आपके लिये. यमुना तबतक उठी नहीं थी. मैं वहाँ जा केशव को पाया और आश्चर्य से चिल्ला उठा…..फिर तो केवल केशव ही हम पर छा गये….केशव की स्कूली पढ़ाई ख़त्म हो गई है, कालेज शायद अगस्त में प्रारम्भ होगा….कुछ दिन अपनी ननिहाल और हमारे यहाँ रहेंगे….बहुत अच्छा लगा….
जी एस टी में निर्धारित टैक्स कम होना चाहिये यह उद्योग चाहता है जो लाखों, करोड़ों में हैं, किसान अपना समर्थन मूल्य चाहता है लागत के ऊपर ५० प्रतिशत , अपनी ज़मीन का सरकारी या ग़ैरसरकारी कामों के लिये मूल्य पाँच गुना, उद्योगों के मज़दूर चाहते हैं टॉप क्लास की सुबिधाऐं एवं सेलरी मैनेजरों के बराबर, दूकानदार अपनी प्रोफ़िट चाहता है अधिकत्तम, ख़रीदार हर चीज़ को सस्ता से सस्ता ख़रीदना चाहता है और सब चाहते है सरकार दे यह सब, यहाँ तक की दुर्घटना या आन्दोलनों में मरनेवाले के परिवारवाले चाहते कम से कम एक करोड़ सरकार से, …..सरकार कहॉ से लाये यह पैसा….अगर गेहूँ या किसी अनाज का दाम अगर बढ़ा दिया जाये ५००० रूपये क्विण्टल तो आटा भी तो सौ रूपये किलो होगा, वह नहीं होने देंगे, उत्पादकता बढ़ायेंगे नहीं या बढ़ने नहीं देंगे, काम ज्यादा करेंगे नहीं, ….क्या हल है इन समस्याओं का….वह सरकार सोचे और कौन सरकार, जिन्हें हम बिना सोचे चन्द रूपये के बदले चुने हैं….देश की समस्या से हमारा मतलब नहीं….क्या कोई कुछ करनेवालों की भी सुनेगा….

९.६.२०१७: इस बार आरोग्यम् , हरिद्वार का समय कुछ अलग रहा .हम करीब हफ़्ते भर ठहरे या रहे. यमुना के दबाव पर टी. वी भी लग गया. खाना बनाने के लिये बबीता मिल गई. शिव कुमार सिंह, और उनके बनारस यूनिवर्सिटी के अध्ययन काल के दोस्त विजय प्रताप से मुलाक़ात हुई. पर मुख्य बात थी कि यमुना और प्रतिभा की मुलाक़ात. हिन्दमोटर के दिनों का रिस्ता. प्रतिभा शिवकुमार की पत्नी हैं. विजय प्रताप जी की पत्नी अब नहीं रहीं है. लड़का अपने काम में लगा हैं, लखनऊ में रहते हैं. और मुझे लगा ज़िन्दगी के इस मोड़ पर हम सभी प्रसन्न रहने की कोशिश कर रहे हैं. शिवकुमार जी अभी भी कार्यरत हैं. ये दोनों मुझ से पाँच छ: वर्ष छोटे होंगे उम्र में. …….पर ऐंडी का दर्द तकलीफ़ देता रहा जिसकी चिन्ता होने लगी है. मैंने शायद कुछ अधिक ही घूमना चालूकर दिया था. कल ही हम भी नोयडा लौट जायेंगे. इलाज की बात सोचनी होगी, नहीं तो घूमना ही रूक जायेगा जो एकमात्र ब्यस्त, प्रसन्न , एवं स्वस्थ रखने का तरीक़ा है मेरा.

७.६.२०१७: हम ख़ुद गाँव के किसान परिवार से आते हैं, अत: इस बिषय पर लिखना ज़रूरी समझते हैं. सरकारी बैंकों से क़र्ज़ ले अगर किसान संगठित हो यह तय करें कि वह क़र्ज़ नहीं देना है, वह अपनी हक़ का इस तरह दुरूपयोग कर क़र्ज़ मांफी का माँग करें और हिंसक रास्ते अपनाये , तो देश के भविष्य के भयंकर आर्थिक संकट को कोई रोक नहीं सकता. कांग्रेस और सोनिया ने वह रास्ता अपनाया था चुनाव जीतने के लिये और जीत भी गईं सरकार की सब कमज़ोरियों के बावजूद. मोदी ने भी दुहराया उत्तरप्रदेश का चुनाव जीतने में किसानों का समर्थन पाने के लिये. पिछले तीन सालों में वापसी का कोई रास्ता न ढूँढ पाने के बाद कुछ नासमझ किसानों को बरगला कर फिर से उनका बिश्वास जीतने का प्रयास कर रहीं हैं सोनिया की कांग्रेस और कुछ बेईमान पार्टियाँ, शरद पवार की, उद्धव थाकरे की. देश के हर समझदार नागरिक को जिनमें किसान भी हैं यह राजनीति दाँव की हानि को समझना चाहिये. जो रास्ता आज सरकार इस दबाव में अपना रही है वह देश बिरोधी है. हर किसान ज्यादा से ज्यादा क़र्ज़ लेगा और आज की तरह का या इससे भी हिंसक रास्ता अपनायेगा. वह खेती की उन्नत पद्धति या उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास पर मिहनत क्यों करेगा? आज कृषि वैज्ञानिक पद्धति से करना ज़रूरी है एक ब्यवसायिक पेशे की तरह. अच्छा बीज, उचित गुणवत्ता का उर्वरक, ठीक सिंचाई , फ़सल बीमा आदि की ब्यवस्था और उसपर ज्यादा से ज्यादा निवेश सरकार की ज़िम्मेदारी है . पर यह किसानों की भी प्राथमिकता होनी चाहिये. अन्यथा किसानों की तरह का ही रास्ता छोटे , मंझोले और फिर बड़े ब्यवसायिक भी अपनायेंगे टैक्स और फिर क़र्ज़ मांफी के लिये. प्रजातंत्र क्या राजनीतिकों की मनमानी करने की खुली छूट देता है या देशहित का ख़्याल रखना ज़रूरी है? यह गद्दी पाने का हर मसले पर प्रयास देश के भविष्य को अन्धकारमय बना रहा है. हर पेशे में माफ़िया या बाहुबलियों का प्रयास चल रहा है देश को तोड़ने का. एक करोड़ तक की माफ़ी का ऐलान किन लोगों के लिये किया जा रहा है-किसानों के लिये या कृषि क्षेत्र के ब्यवसायियों के लिये? http://indianexpress.com/article/india/after-maharashtra-farmer-unrest-rocks-mp-6-killed-in-firing-govt-ready-for-talks-4692424/

२४.५.२०१७: देश की तथाकथित उच्च जाति में पैदा हुये सभी बाहुबली लोगों से करबद्ध प्रार्थना है कि शारीरिक शक्ति, धनबल एवं सम्बंध का दुरूपयोग अपने से कमज़ोरों को , दलितों को सताने में न करें..उन्हें सम्मानित बनाने में योगदान दें…. आप को उच्चॉ बनाने में उनका योगदान है…..आपके माता पिता के जन्म (प्रसव) को उन्ही जातियों ने सहज बनाया जब कोई अस्पताल नहीं थे. उनकी इज़्ज़त करना हर हिन्दू का कर्तव्य है..हर हिन्दू का यही राज है स्वर्ग पाने का……उनको नीचा समझना या कष्ट देना धर्म बिरूद्ध है और इसी जन्म में नर्क का दंड देता है. आज शिक्षा पा वे आप से आगे निकल रहें हैं, यह ईर्ष्या की चीज़ नहीं है, हमें हिदायत देता है उनको बराबर का दर्जा देने के लिये. कृपया सहारनपुर न दुहराइये…दुश्मन इसका फ़ायदा लेंगे…देश की इज़्ज़त, सरकार की इज़्ज़त दुनिया में ख़राब होगी……हर समझदार ब्यक्ति को नासमझों को समझाना चाहिये, न समझने पर दंड दिलाना चाहिये…जाति के आधार पर किसी का किसी तरह पक्षपात करना पाप है….राम ने शबरी को अपनाया, और उच्च जाति के रावण का बंध किया…कांस्य, समय रहते ये मनशोख लोग समझ पाते….हर हिन्दू जाति से ऊपर उठ केवल योग्य भारतीय बन जाता……कृपया यथा सम्भव अधिक से अधिक शेयर करें…..और महा शिक्षा अभियान में योगदान दें ….http://indianexpress.com/article/india/saharanpur-clashes-disquiet-in-congress-over-rahul-gandhis-silence-4672538/

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