एक विस्मृत श्लोक कैसे पाया?

एक खोया श्लोक: आज सबेरे सबेरे यू. डी. चौबे जी का फ़ोन ने मेरी उनसे किये हुए एक श्लोक को सठीक जानने की इच्छा पूरी कर दी और इसके लिये मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ। मेरे दादा जी मेरे किसी ध्येय में असफलता के समय इसके द्वारा मुझे समझाते भी थे, हमको शान्त करने एवं कोशिश को जारी रखने में उत्साहित करने के लिये। उस समय तक तो संस्कृत की कोई जानकारी ही नहीं थी मुझे। कुछ और श्लोक थे जो गीता से थे, उन्हें तो गीता में रूचि आने पर जान लिया और याद भी कर लिया।वे थे…

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥२.४७॥
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल की चिन्ता न कर कर्म में भी पूरी निष्ठा को केन्द्रित करो।

You have the right to work, but never to the fruit of work. You should ever engage in action for the sake of reward, nor should you long for inaction.


या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२.६९॥
सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जब रात्रि होती है, उस समय ज्ञानार्थी जगता हुआ पूर्ण निष्ठा के साथ चेष्टा रत होता है अपने ज्ञान अर्जन के लिये स्वाध्याय, मनन, चिन्तन में; और दिन में जब सभी सांसारिक व्यस्त हो जाते हैं सांसारिक सुख की प्राप्ति में और जागते हैं। तब ज्ञानार्थी के लिये वह रात्रि की तरह रहती है।

In the night of all livings, a sage remains awake. And so-called day of the livings is the night of ignorance to the wise.

पर समय समय पर उस न याद आनेवाले श्लोक की याद आती थी, पर इसके केवल भाव एवं केवल अन्तिम दो शब्द ही ग़लती सही याद थे। पिछले दिनों मैंने चौबे जी से इसके बारे में पूछा था, उस दिन उन्हें याद नहीं आया था, पर कल के समागम वार्ता में जब एक बार फिर अनुरोध किया तो उसको आज वे मुझे क़रीब क़रीब पूरा बता दिये ।मैं फिर इसे गुगल से खोज लिया….सबकी जानकारी के लिये वह श्लोक यहाँ दे रहा हूँ….यह बताता है कि लक्ष्मी देवी उन्हीं के पास आती हैं जो किसी चेष्टा में असफलता के बाद भी उस सफलता के बारे में कारण जानने का सतत प्रयास कर ग़लती को सुधार अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। यह संस्कृत के प्राचीन एवं अति लोकप्रिय पंचतंत्र से है-

उद्योगिनं पुरूषसिंहमुपैति लक्ष्मी ,
दैवं हि दैवम् इति कापुरूषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरू पौरूषम् आत्मशक्त्या,
यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोअत्र दोष: ।।
( पंचतंत्र, मित्रसम्प्राप्ति )
Goddess Lakshmi always stays with the industrious people. Everything depends on the Luck is the thinking of the lazy people. Therefore, we should leave apart the luck and devote ourself to do the hard work. If full efforts are made but desired results are not achieved, there is no harm in that.
उद्यमी पुरूष के पास ही सदैव लक्ष्मी जाती है । सब कुछ भाग्य पर निर्भर है ऐसा कायर पुरूष सोचते हैं । इसलिए भाग्य को छोड़ कर हमें उद्यम करना चाहिए । यथाशक्ति प्रयास करने के बावजूद भी यदि सफलता नहीं मिली तो इसमें कोई दोष नहीं है ।
फिर से चौबे जी की स्मरण शक्ति को दाद देते हुए जो भगवान की कृपा से प्राप्त होती है, जैसा गीता के १५ अध्याय के १५ श्लोक में बताया गया है-
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ॥
मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषों का नाश) होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य (सर्व वेदों का एकमात्र जानने योग्य ‘परमेश्वर’) हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ॥15॥
I am seated in everyone’s heart, and from Me come memory, knowledge and forgetfulness. By all the Vedas, I am to be known. Indeed, I am the compiler of Vedanta, and I am the knower of the Vedas.
हम में हर व्यक्ति में स्मृति शक्ति कम बेशी होती है, यद्यपि अभ्यास से इसे बढ़ाया जा सकता है। पर महापुरूषों में यह अनोखी होती है जैसे स्वामी विवेकानन्द जी की जो मेरठ में एक लाइब्रेरियन को आश्चर्यचकित कर दिया था। जब उन्हें पता चला था कि लाइब्रेरी में इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के सभी नये भ्लयूम उपलब्ध हैं तो अपने स्थानीय एक शिष्य के मार्फ़त दो दो कर मंगाने लगे एवं दूसरे दिन लौटा देते थे। एक दिन लाइब्रेरियन को उत्सुकता हुई और पूछ बैठा कि क्या वे अध्ययन भी करतें है या उलट पुष्ट कर लौटा देते हैं। इस पर विवेकानन्द ने उससे किसी भी पृष्ट के विषय में पूछने को कहा और सब अक्षरश: बता दिये। चौबे जी की भी याददाश्त बहुत अच्छी है। इतने दिनों के साथ से यही निष्कर्ष निकाला हूँ ।

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ईशोपनिषद् और उसका महत्व -२

आत्मा की सर्वव्यापकता की स्थापना एवं इसकी वैश्विक ज़रूरत

ईशोपनिषद के तीन श्लोक पूरे विश्व के मनुष्य जाति को यह संदेश देते है जो ग़लत धारणा के कारण इस विश्व में लोगों को एक दूसरे से अलग बता घृणा, द्वेष, युद्ध, हिंसा, अमानुषिक अन्याय, प्रकृति का विध्वंस, यहाँ तक कि आत्महत्या या तथाकथित आत्मजनों की हत्या करने को मजबूर कर रहा है, उससे बचा जा सकता है, अगर हम इन श्लोकों पूरी तरह आत्मसात् कर ले। हम अपनी शक्ति एवं साधन अपने वैज्ञानिक ज्ञान से सुख शान्ति लाने का ग़लत ढंग से प्रयास करते जा रहे हैं। अगर मानव जाति अपने एवं अगली पीढ़ी को इन श्लोकों के महत्व को सीखा कर, समझा कर, मन में गहरे बैठा कर, एक नई तरह से आगे बढ़ने एवं जीवन जीने का प्रयास करें तो हम सदियों की ग़लतियों को सुधार सकते हैं।

पाँचवाँ श्लोक
उपनिषद का पाँचवें श्लोक में आत्मा का परिचय देते हुए कहते हैं ऋषि,’तत् उ सर्वस्य अस्य वाह्यतः’-वही हम सबके भीतर है और वही हम सबके बाहर भी है। अर्थात् एक ही आत्मा हम सब चर-अचर में व्याप्त है।क्या यह एक चिर नूतन सोच नहीं है उपनिषद् के ऋषि की, जो इस सबसे पुराने उपनिषद् में जो केवल अठारह श्लोकों का है,किया गया है?

अगर हर व्यक्ति इसे समझ अपने आचरण से विभिन्नताएँ की सोच को मिटा देता है तो उसका संसार के लिये के लिये जो लाभ होगा, उस पर ज़रा सोच कर देखिये। पूरे विश्व के मनुष्य,अन्य सभी तरह के जलचर वनस्पति,पेड़,पौधे,जानवर,पक्षी आदि सभी तरह के चर अचर में पूर्ण तालमेल बनने से हमारी यह धरती कितनी सुखमय, एवं शान्तिमय हो जायेगी।

ईशा उपनिषद् वही ज्ञान भरा संदेश श्लोक छठवें, सातवें के द्वारा दे रहा है..यही हमें अनावश्यक आक्रामक हिंसा को भी कम करने में सहायता करेगा, जिसके कारण कितनी प्रजातियाँ ख़त्म हो गई या होने के कगार पर हैं। हम अपने नये आविष्कृत उत्पादों को किसी के नुक़सान के लिये व्यवसायिक नहीं बनायेंगे।प्रदूषण कम होगा। और हम अपनी इच्छित चीजें भी पा सकते हैं।हमें नई आविष्कारों एवं निर्माणों में इस ज़रूरत का ख़्याल रखना ही होगा।

यस्तु सर्वानि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
जो सभी प्राणियों को अपने स्वयं के आत्मा के रूप में देखकर, मानकर सभी अस्तित्व की एकता का एहसास करता है, फिर उसे क्या मोह या दुख हो सकता है?
The man who realises himself as the Atman perceives also that he is one with all beings, that none is separate from him. Then who can hate whom?

जो आदमी खुद को आत्मा समझ लेता है वह यह भी मानता है कि वह सभी प्राणियों में से एक है, कोई भी उससे अलग नहीं है। फिर कौन किससे नफरत कर सकता है?
यह दृष्टिकोण सार्वभौमिक प्रेम और सेवा मुक्त है; प्रेम एक बाध्यकारी शक्ति है, जबकि घृणा अलगाव की भावना से आगे बढ़ती है। यह विचार, भारतीय विचार के अनुसार, आधुनिक और साथ ही प्राचीन, मानव के उच्चतम बिंदु को चिह्नित करता है।

सातवाँ श्लोक
पिछले श्लोक के उपदेश को बल देने के लिये है क़रीब क़रीब दुहराता सा है।
यस्मिन्सर्वानि भूतानन्यात्मैवभुद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
जब ब्यक्ति को पता चलता है कि सभी प्राणियों की आत्मा वास्तव में उसकी अपनी ही तरह की आत्मा हैं, वह पूरी तरह सृष्टि के सब में एक पूर्ण एकत्व (अपनापा) को देख,समझ लेता है। इस तरह के व्यक्ति के लिये न भ्रम के लिए कोई वजह जगह दिखता है और न दु: ख के लिए।

आगे एक इस ज्ञान को अगर कोई अपने व्यवहार में ला सभी में उसी आत्मा को देखने लगे तो उसे अमरत्व प्राप्त हो जायेगा जो हर की एकमात्र इच्छा होती है।
बहुत उपनिषदों में यह कहा गया है। यह केनोपनिषद् में है – तस्मात् धीराः भूतेषु भूतेषु विचित्य अस्मात् लोकात् प्रेत्य अमृताः भवन्ति॥२.५॥

  • ज्ञानीजन विविध भूत-पदार्थों में ‘उस’ एक आत्मा का विवेचन कर, इस लोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं।
    *
    कठोपनिषद् में भी यही कहा गया है-
    एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥२.२.९/१०॥
    समस्त प्राणियों में विद्यमान ‘अन्तरात्मा’ एक ही है परन्तु रूपरूप के सम्पर्क से वैसा-वैसा प्रतिरूप धारण करता है; इसी प्रकार वह उनसे बाहर भी है।
    *
    एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। २.२.१२
    -समस्त प्राणियों के अन्तर् में स्थित, शान्त एवं सबको वश में रखने वाला एकमेव ‘आत्मा’ एक ही रूप को बहुविध रचता है।
    *
    नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्‌।२.२.१३
    -अनेक अनित्यो में ‘एक नित्य’, अनेक चेतन सत्ताओं में ‘एक तत्त्व’ ‘एकमेव’ होते हुए भी जो बहुतों की कामनाओं का विधान करता है।
    कठोपनिषद में भी विस्तार से ३-४ श्लोकों में यह बताया गया है और अन्य उपनिषदों में भी- अग्नि, वायु, सूर्य के द्वारा दृष्टान्त देते हुए कहा है- ‘एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च’।

जो इसे पूरी समझ और अनुभव कर लेता है, जब में सबमें एक ही आत्मा को, तो किसी तरह का न नफ़रत का भाव रहता है, न कोई मोह होता है न शोक और शाश्वत सुख एवं शान्ति भरा जीवन जी सकता है।
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इस समानता को महसूस करने की क्षमता एक नागरिक के रूप में सामाजिक जागरूकता में अनुशासन द्वारा और एक आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में आवक अनुशासन द्वारा मानव मन में आती है। यह आज की शिक्षा मूल अंग होना चाहिये, एवं बहुत कम उम्र से ही बच्चों के दिल में बैठाना ज़रूरी है। यह अनुशासन धर्म है। वेदांत के अनुसार ब्यक्ति ‘निर्दोषी हिम समं, नादोṣयं हि सामं ब्रह्म’। उपनिषदों के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति अस्तित्व की इस बुनियादी एकता के बारे में जागरूकता में लगातार रहता है, और फलस्वरूप वह अलगाव के भ्रम से मुक्त हो किसी से भी नफरत नहीं कर सकता है।

गीता में फिर इस विषय पर बार बार कृष्ण ने कहा है, इसी दृष्टिकोण की महिमा मानव जीवन को महिमान्वित कर सकती है। जीवन के कर्म के वृक्ष के बेहतरीन फल के रूप में है।
भगवद्गीता
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०.२०॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥१०.३९॥

‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च’- जो मेरा भक्त किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, समस्त प्राणियों के प्रति मित्रता और करुणा का भाव रखता है- भगवद् गीता १२.१३
‘यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः’-जिससे जगत् (जीव वर्ग) क्लेशित नहीं होता और जो जीवों से क्लेश का अनुभव नहीं करता।भगवद्गीता १२.१५

‘अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।…वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियों में विभक्त की तरह स्थित हैं….॥१३.१७॥

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२८॥
जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियों में परमेश्वर को नामरहित और समरूप से स्थित देखता है, वहीं वास्तव में सही देखता है।

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३.२९॥
क्योंकि सब जगह समरूप से स्थित ईश्वर को समरूपरूप से देखनेवाला मनुष्य अपने आप से अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिए वह परम गति को प्राप्त हो जाता है।

गीता में कृष्ण बार बार कहे, ‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि….आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है’, ‘क्षेत्रज्ञं चापि मा विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत…१३.३ ‘सम: सर्वेषु भूतेषु…’ १८.५४ ।
यहाँ तक तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस मानस में भी यह बात बताई नवधा भक्ति के संदर्भ में…’….सातवं सम मोही मय जग देखा।…’

अगर व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने स्वयं से अलग नहीं मानता है, और सभी प्राणियों के आत्मा के रूप में अपने स्वयं के आत्मा के ही रूप में देखता है, फिर इस विचार के अवधारणा के आधार पर,वह हम बनाई विविधता की समझ के कारण किसी से भी नफरत नहीं करेंगे, हिंसा, द्वेष मिट जायेगा, क्योंकि सबमें किसी तरह की विभिन्नताएँ रह ही नहीं जायेगी। एक नया आदर्श समाज और फिर सारी दुनिया भी वैसी ही हो सकती है।

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ईशोपनिषद् और उसका महत्व

ईशोपनिषद् और उसका महत्व
ईशोपनिषद शुक्ल यजुर्वेद का अंश है, जिसे’ईशावास्योपनिषद’भी कहा जाता है। उपनिषदों में इसे प्रथम स्थान प्राप्त है। शंकराचार्य ने भी इस उपनिषद की विशेष प्रशंसा की है अपने भाष्य में। इसे वेदांत का निचोड़ मानने में शायद ही कोई जानकार आपत्ति कर सकता है।गागर में सागर की तरह है यह, शायद सबसे प्राचीनतम उपनिषद् या उनमें एक। लगता है इसके आधार पर सभी अन्य उपनिषदों का विकाश हुआ क्योंकि इसके सभी श्लोकों के मूल विषय बहुत विस्तार के साथ दुहराया गया है। बृहदारण्यकोपमनिषद् ऋषियों ने इनको श्लोकों को उद्धृत भी किया है। बाद में भगवद्गीता, यहाँ तक की लोकप्रिय रामचरितमानस में भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने भी बहुत अच्छी तरह जगह जगह पर इसके निष्कर्षों का व्यवहार किया। इस लिये इसमें सभी उपनिषदों का निचोड़ मिल जाता है। साथ ही एक सज्जन की ज़िन्दगी के कुछ महत्वपूर्ण गुर भी हैं जिसका हर ब्यक्ति फ़ायदा उठा सकता है। अपने अल्पज्ञान से भी मैं इसके कुछ श्लोकों को कंठस्थ कर बराबर पाठ करता हूँ, और मैंने यह लेख केवल अपने अपने बच्चों एवं सुधी मित्रों के लिये लिखा था जिससे इस एक उपनिषद से वे हमारे धर्म का बहुमुखी सार्वभौम उपदेश समझ लें। इनके कुछ श्लोकों में बहुत अच्छी कविता रस भी मिलता है पाठ में। संस्कृत एक ऐसी अद्वितीय भाषा है जो पहले पहले बहुत दुरूह लगने पर भी केवल पाठ करते रहने से बहुत सरल लगने लगती है और अगर आपकी प्रवृति पढ़ी चीजों को समझने की भी है, तो समझ भी आती जाती है और यह अपने पर है। एकनिष्ठ हो इन श्लोकों का मनन एवं चिन्तन से पता नहीं कितने मूल्यवान मोती भी मिल जायें जीवन भर के लिये और शान्तिमय जीवन का सहारा बन जायें।

ईशोपनिषद् का पहला श्लोक महात्मा गांधी को बहुत ही प्रभावित किया था, उन्होंने अपने एक सभा में कहा था: “मैं आपको हिंदू धर्म के संपूर्ण सार के रूप में एक श्लोक सुनाने जा रहा हूं। आप में से कई ईशोपनिषद जानते हैं। मैंने इसे वर्षों पहले अनुवाद और टिप्पणी के साथ पढ़ा। मैंने इसे यरवदा जेल में दिल से सीखा। लेकिन इसने मुझे उतना आकर्षित नहीं किया, जैसा कि पिछले कुछ महीनों के दौरान किया है, और मैं अब अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यदि सभी उपनिषद और अन्य सभी धर्मग्रंथ अचानक से किसी कारण से नष्ट हो गए होते और यदि ईशोपनिषद का केवल पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति में ज़िन्दा रहता, तब भी हिंदू धर्म हमेशा जीवित रहता।”
अमरीका में गीता, उपनिषद् आदि के विद्वान प्रोफ़ेसर भारतीय मूल के एकनाथ एश्वरन गांधी के उपरोक्त विचार के बारे में अपनी पुस्तक ‘Upanishads’ में लिखा है-
“What Gandhi had in mind with his great tribute he made clear in his reply to a journalist who wanted the secret of his life in three words, he said: “Renounce and enjoy!”(tena tyaktena bhunjittah), of the first verse of Isha.”

“गांधी ने अपने पहले श्लोक के विचार को और स्पष्ट किया था एक पत्रकार के अपने पहले के प्रकट किये विचार संम्बन्धी सवाल के जवाब में. पत्रकार को जो उनके जीवन के रहस्य को तीन शब्दों में जानना चाहता था, गांधी ने जवाब दिया- “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” मेरे जीवन का रहस्य है जो ईशोपनिषद् के पहले श्लोक का अंश है।”
उन श्लोक १ एवं २ को यहां कुछ समझने का प्रयत्न है।

पूरा पहला श्लोक इस तरह है
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
श्लोक का संधि-विच्छेद
ईशा वास्यम् इदं सर्वम् यत् किं च जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भूञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्वित् धनं॥१॥
अर्थ- विश्व की सभी वस्तुओं में ईश्वर का आवास है। इसलिये इन सबको अनासक्त भाव से उपभोग करना चाहिये; किसी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर ललचाई दृष्टि नहीं डालनी चाहिये।
पहली पंक्ति में है-
‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ -इस विश्व की सब चीज़ों के भीतर में ईश्वर(आत्मा)ही है और सब कुछ उसी (ईश्वर) का है।
‘यत्किञ्च जगत्यां जगत्’-यह अन्तर में रहनेवाला आत्मा (ईश्वर) जगत के चर एवं अचर सभी में व्याप्त है।
यानी
१. ईश्वर तुम्हारे अन्तर में आत्मा के रूप में है।
२. यही आत्मा विश्व के चर-अचर सबके भीतर में है।
और दूसरी पंक्ति है,
‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’-अनासक्त रह कर सब तरह की कामनाओं का त्याग कर काम करो, और जीवन का आनन्द लो।
‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌’- (अपने परिवार या)किसी अन्य के धन का लोभ न रखो। भावार्थ है ईश्वर का दिया जो है उसमें प्रसन्न रहे।
३. त्याग भाव को प्रमुख रख हर काम करो एवं जीवन का आनन्द लो।
४. किसी धन का लोभ न करो।
‘ईशावस्यम् इदम् सर्वम्’, सभी उपनिषदों का महानतम उपदेश सबके लिये यही है, जिसे समझना हर आदमी के लिये अपनी पवित्रता एवं शक्ति का सही मूल्यांकन के लिये ज़रूरी है।उपनिषदों के आत्मा ही परम-ब्रह्म या ‘ब्राह्मण’ भी है।

बहुत सालों पहले हिन्दमोटर के प्रारम्भिक दिनों में हावड़ा रेलवे स्टेशन के दुकान से गांधी जी के आश्रम में व्यवहृत ‘आश्रम भजनावलि’ की एक प्रति मैंने ख़रीदी थी। उसका पाठ पता ही नहीं चला कब कैसे मेरे जीवन का हिस्सा बन गया। सबेरे उसका पाठ करता रहा बिना कुछ समझे। पिछले साल जब उपनिषदों में रूचि हुई। ईशोपनिषद्, कठोपनिषद्, मंडूकोपनिषद्, केनोपनिषद् पढ़ रहा था एक एक करके। एक दिन माडूक्य उपनिषद् पर वेदान्त सोसाइटि के अति प्रभावशाली सर्वप्रियानन्द को सुना तो पहली बार तुरीयम् की जानकारी हुई और तब इस पुस्तिका के प्रात:स्मरण् के पहले श्लोक को ध्यान से पढ़ा। और समझने की कोशिश करता रहा कि हमारे सबेरे की प्रार्थना में आये ‘तुरीयम्’ शब्द का अर्थ क्या है। हम अपने हृदय में बसे आत्मा को छोड़ इधर उधर ईश्वर की कृपा पाने के लिये क्यों भटकते हैं नासमझ बन जहाँ तहां। कुछ दिनों पहले ही जाना कि यह आदि शंकराचार्य की लिखी है। शंकराचार्य अपने प्रांत: स्मरणीय इस श्लोक में इसी आत्मा को समझाया है और उसकी महिमा बताई है। इस एक श्लोक में आत्म परिचय मिल जाता है। उपनिषदों पर श्रद्धा और बढ़ गई-
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥
Praatah Smaraami Hrdi Samsphurad-Aatma-Tattvam
Sac-Cit-Sukham Parama-Hamsa-Gatim Turiiyam |
Yat-Svapna-Jaagara-Sussuptim-Avaiti Nityam
Tad-Brahma Nisskalam-Aham Na Ca Bhuuta-Sangghah ||1||
अर्थ-
मैं सबेरे अपने हृदय में स्फुरित होनेवाले आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ ।जो आत्मा सच्चिदानंद (सत्, ज्ञान, एवं आनन्द) है, परमहंसों की अन्तिम गति है, जो चतुर्थ अवस्थारूप (जिसे माडूक्योपनिषद् के ऋषि ने ‘तुरीयम्’कहा है) है, जो जाग्रति, स्वप्न,और गहरी निन्द्रा तीनों अवस्थाओं को हमेशा जानता है और जो शुद्ध ब्रह्म है, वही मैं हूँ- पंचमहाभूतों से बनी यह देह मैं नहीं हूँ ।
In early morning, I remember (meditate on) the Pure Essence of the Atman, Self shining within my heart,
which is the Sacchidananda (Existence-Consciousness-Bliss), which is the Paramahans (The Pure White Swan floating in Chidakasha) and takes the mind to the state of Turiya (the fourth state,Superconsciousness),
which knows as a witness beyond the three states of Dream, Waking and Deep Sleep, always- That Brahman which is without any division shines is me and I am not this body which is a collection of Pancha Bhuta (Five Elements).

अब ईशोपनिषद के पहले इस श्लोक के त्याग के बारे में कुछ बताऊँ। त्याग से निर्देश है सभी कामनाओं-केवल संतान, धन, या अपने सुख के लिये किये कर्मों-का त्याग करना है, जो व्यक्ति को इस मायामय संसार से बांधे रहती है और यही विचार अन्य उपनिषदों में भी व्यक्त किया गया है।यह अमरत्व दे सकता है। यही ज्ञानियों के जीवन ध्येय रहता है।उदाहरणार्थ कठोपनिषद में एक श्लोक है-
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥२.३.१४॥

  • जब मनुष्य प्रत्येक कामना से मुक्त हो जाता है तब वह अमर हो जाता है; वह यहीं, इसी मानव शरीर में ‘ब्रह्म’ का रसास्वादन करता है।
    इस त्याग की आवश्यकता को विवेकानन्द अपने गुरू रामकृष्ण के विचारों को एक विदेश में दिये भाषण में इस तरह कहा था- “However we may argue, however much we may hear, but one thing will satisfy us, and that is our own realisation; and such an experience is possible for every one of us if we will only try. The first ideal of this attempt to realise religion is that of renunciation. As far as we can, we must give up. Darkness and light, enjoyment of the world and enjoyment of God will never go together. “Ye cannot serve God and Mammon.” Let people try it if they will, and I have seen millions in every country who have tried; but after all, it comes to nothing. If one word remains true in the saying, it is, give up every thing for the sake of the Lord. This is a hard and long task, but you can begin it here and now. Bit by bit we must go towards it.”
    ब्रह्म एवं त्याग की महिमा से तो भगवत् गीता, रामचरितमानस सभी भरे पड़े हैं। भगवद्गीता के कृष्ण या रामचरितमानस के राम अवतार-रूप में‘ब्रह्म’ ही हैं- ‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना, मत्स्थानि सर्वभूतानि,..’(९/४), ‘सीयराममय सब जग जानी..’
    फिर कभी इस सन्दर्भ में विस्तार से लिखने की इच्छा है।
    पर इसके पहले सभी ऐसी इच्छा रखनेवाले व्यक्ति को यह पूरी दृढ़ निष्ठा रखनी होगी कि हमारे अन्त:करण में ही उस महत ईश्वर का निवास है, जो हमारी आत्मा ही है, जिसे उपनिषद ‘ब्राह्मण’, ‘पुरूष’, आदि कहता है एवं भगवद्गीता पुरुषोत्तम (अध्याय १५)में। अवतार रूप में गीता के कृष्ण और तुलसीदास के रामचरितमानस के राम भी वही हैं। हम अपने आत्म बल को समझे और उसकी शक्ति को इच्छित फल के लिये सभी बताये तरीक़े से पाने की किसी योग के रास्ते उपयोग करें, पर उसके पहले शरीर,मन एवं इन्द्रियों को पूरी तरह मज़बूत बनाने एवं जीतने के लिये सत्त्व गुणी बनने की चेष्टा करें। इसके बाद ही आप, किसी भी बताये तरीक़े से चाहे भक्तियोग हो या ध्यान योग या कर्मयोग- पूर्ण निष्ठा से चेष्टा करें। हमारे महान आध्यात्मिक गुरुओं ने चाहे गुरू नानक हो, या तुलसीदास, या फिर रामकृष्ण हों या विवेकानन्द, या फिर रमन महर्षि, सभीने यही किया। यही आत्मबल एवं एकनिष्ठ चेष्टा ही है कि दिव्यांग होने बाद भी, कृत्रिम पैर होने पर भी, एक साधारण महिला भी एवरेस्ट की चोटी पर पहुँच जाती है, और इसी तरह आज एवं पहले भी हज़ारों ने अपने अपने क्षेत्र में अविश्वसनीय कृतिमान बनाते या बनाये हैं।

प्रथम श्लोक के विषय को ध्यान में रखते हुए जीवन कैसे जिया जाये और उसका फल क्या होगा बताते हैं इस उपनिषद् के रचयिता ऋषि आगे दूसरे श्लोक में-
दूसरा श्लोक-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् सतं समाः
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२
श्लोक सन्धि-विच्छेद
कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेत् शत: समा।
एवं त्वयि न अन्यथा इत:अस्ति न कर्म न लिप्यते नरे॥२॥

  • दुनिया में, एक सौ साल जीने की इच्छा होनी चाहिए। केवल पहले श्लोक के निर्देशानुसार कर्म करने से यह सम्भव है। इस प्रकार, और न कि किसी अन्य तरीके से यह सम्भव होगा, कि उसके कर्म का फल उसके भविष्य के जीवन पर कोई अनिष्ट फल नहीं दे और इस तरह मनुष्य कार्यों के तनाव से मुक्त हो काम कर सकता है।
    (In the world, one should desire to live a hundred years, but only by performing actions. Thus, and in no other way, can man be free from the taint of actions.)

पहले श्लोक के निर्देश को स्मरण रख अगर उसी तरह आसक्त भाव से काम करते हुए आदमी अपनी सांसारिक जीवन भी जीता है- ‘कुर्वन् एव इह कर्माणि’, तब वह ‘जिजीविषेत् शत: समा’, सौ साल तक जीवन रहने की इच्छा रख सकता है।
इसे छोड़ कोई दूसरा रास्ता नहीं है, जीवन के कर्म से नहीं जुड़ने का। इसी विचार को गीता में कृष्ण(आत्मा)ने अर्जुन(ममत्व से जकड़ा शरीर को अलग समझने वाला) को अध्याय २ से ही उपदेश शुरू कर दिया करणीय कर्म के करने के ढंग का ‘योगस्थ कुरू कर्माणि, संग त्यक्त्वा’ से।
क्या हो सकता है किसी व्यक्ति के लिये इससे बेहतर निर्देश एक सत्-चित्त-आनन्द के लक्ष्य-भाव से दीर्घ ज़िन्दगी का? श्लोक कहता इस तरह अनासक्त भाव से से व्यक्ति कर्म से बंधता नहीं, ‘न कर्म लिप्यंते नरे’। यही केवल दूसरा अन्य कोई रास्ता ही नहीं है, ‘एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति’।

  • ईशोपनिषद के बाक़ी कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण श्लोकों के बारे में अगली बार…..किसी एक रविवार को…
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२०१९-२०२०:भगवद्गीता से उपनिषदों की ओर

२०१९-२०२०:भगवद्गीता से उपनिषदों की ओर
पिछले साल में अपने को गीता के विभिन्न व्याख्या पुस्तकों में अधिकांश समय लगाया था। २०२० में विशेषकर कोविद काल की त्रासदी को भोगते कब उपनिषदों की तरफ़ झुकाव हुआ और फिर बढ़ता गया पता ही नहीं चला, पर अच्छा रहा है और अभी चल रहा है।

पहले कठोपनिषद् को चिन्मयानन्द की व्याख्या सहित पढ़ा, समझने की कोशिश की, पर असमर्थ हूँ जान पड़ा। बहुत वर्षों से सहेज कर रखी गीता प्रेस के कल्याण के विशेष उपनिषद् अंक से बात कुछ समझ आई। शंकराचार्य द्वारा सभी भाष्य उपनिषदों को, जिन्हें प्रमुख उपनिषद् कहा जाता है, पढ़ गया नियमित रूप से थोड़ा थोड़ा समझते हुए। फिर राकेश जी एकनाथ एश्वरन की अंग्रेज़ी की पुस्तक Upanishads को पी.डी.एफ द्वारा मेल कर दिये। पुस्तक अमरीकन अंग्रेज़ी में काव्य रूप में बहुत सरल भाव से लिखा गया है। उपनिषदों को प्रस्तुत करने के पहले की ‘उपनिषद्’ पर भूमिका बहुत अच्छी है और फिर हर उपनिषदों के पहले उन पर भी उनके मुख्य विषय पर लेख है। बड़े उपनिषदों, जैसे बृहदारण्यकोपनिषद के कुछ विशेष अंश ही दिये है। पर अधिकांश का पूरा काव्यमय अनुवाद बहुत अच्छा एवं सरल है समझने लायक़। अब तो किताब भी है मेरे पास बहुत बार के आमेजन से पर्यास के बाद। फिर अचानक यू-ट्यूब पर वेदान्त सोसाइटी के स्वामी सर्वप्रियानन्द के प्रवचन दिख गये गये और उनके हर प्रवचन बहुत प्रभावशाली लगता रहा, पढ़ने की रुचि को बढ़ाता गया। लोग उन्हें विवेकानन्द की तरह अमरीका में लोकप्रिय मानते हैं। अमरीका के सभी आध्यात्मिक विषयों के गुरुओं में वे प्रतिष्ठित हैं। एक दिन अचानक ‘Hindu Wisdom’ के साइट पर एक रामकृष्ण मिशन के स्वामी निर्विकारानन्द की तीन उपनिषदों-ईशोपनिषद्, कठोपनिषद् एवं केनोपनिषद् पर अति सुन्दर रूप से व्याख्यायित पुस्तकें दिख गई। इन तीनों को मैं बार बार पढ़ता रहा। अब थोड़ी समझ बढ़ रही थी उपनिषदों के अन्त:निहित आध्यात्मिक अद्वैत दर्शन का और फिर रामकृष्ण परमहंस_ विवेकानन्द की कथाएँ एवं कथनों के अंश उन्हें बहुत सुगम बनाते गये। दुर्भाग्यवश ये सब किताबें अंग्रेज़ी में ही हैं। फिर एक इससे भी दो सुगम पुस्तकों से परिचय हुआ, मंगाया, लेखक हैं श्री. M। अंग्रेज़ी में सभी लोकप्रिय उपनिषदों-ईश,कठ, केन, मुंडक, माडूक्य,प्रश्न-की व्याख्या उनकी दोनों पुस्तकें में सबसे सरल एवं सुगम लगी जो हर व्यक्ति समझ सकता है। गीता प्रेस को छोड़ मुझे अन्य किसी की हिन्दी में उपनिषदों के श्लोकों को देते हुए व्याख्या की कोई सरल रूप में प्रस्तुत पुस्तक नहीं मिली है अब तक। अगर कोई पाठक जानते हों तो मुझे ज़रूर सूचित करें, आभारी हूँगा।
उपनिषदों के अलावा मैं दो और मन की पसन्द पुस्तकों को मंगाया बहुत प्रसिद्ध व्यक्तियों का लिखा। पहली पुस्तक थी श्री पवन कुमार वर्मा की ‘आदि शंकराचार्य’ के बाद की लिखी ,’The Greatest Ode to Lord Rama’ जो तुलसीदास के रामचरितमानस के कुछ उनके पसन्द अंशों पर उनके विचारों के साथ है।पवन कुमार वर्मा श्री नीतीश कुमार के साथ राजनीति में लग गये थे पर काफ़ी बड़े विचारक है और उसकी प्रशंसा तो की जानी ही चाहिये। दूसरी पुस्तक मारुति सुज़ुकी के चेयरमैन श्री R. C. Bhargava की अपने वर्षों के उद्योग के साथ जुड़े अनुभव के आधार पर ‘ Getting Competitive- A practitioner’s Guide for India’.मेरी धारणा के विरूद्ध यह किताब एक आई.ए.एस. की ज़्यादा और एक एक प्राविधिक या बल्कि सामान्य प्रबंधन के अनुभव पर आधारित है और जिसमें केवल सरकारी तंत्रों के कमियों की बात ज़्यादा है। मारुति सुजुकी के जापानी चेयरमैन ओ.सुज़ुकी ने भारत में पैसेंजर ऑटोमोबाइल के मैनुफ़ैक्चरिंग में बड़ा योगदान दिया बहुत सारे ऑटो पार्टों के भारतीय उद्योग को बढ़ावा देने के लिये। बहुत फ़ैक्टरियों को प्रारम्भ करने एवं उनमें जापानी मैनेजेमेंट पद्धतियों का व्यवहार कर सफल बनाने में उनका बहुत बड़ा हाथ था। श्री. भार्गव से मैं आशा करता था कि वे भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर को विस्तारित करने, आयात को ख़त्म करने, निर्यात बढ़ाने आदि विषयों में एक रोडमैप सुझाते ऑटोमोबाइल एवं मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर के लिये।
ख़ैर,आजकल स्वामी शिवानन्द की बृहदारण्यक उपनिषद् की व्याख्या पढ़ रहा हूँ और तीसरे अध्याय तक पहुँचा हूँ। याज्ञवल्क्य ऋषि के प्राचीन वैदिक युग के अपने समय के सबसे बड़े ज्ञानी ऋषि थे इस उपनिषद् में ब्राह्मण को समझाना मुख्य विषय है।इसी में उनकी विदुषी पत्नी मैत्रेयी एवं गार्गी का विवरण है।
पिछले साल के मेरे वायदा के तीनों संग्रहों पर काफ़ी काम किया हूँ पिछले साल, पर संतोष नहीं है और उस पर और काम बाक़ी है…चल रहा है धीरे धीरे, जो अपने अमरीका एवं यहाँ के इष्ट मित्रों के लिये है अत: अंग्रेज़ी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं को जाननेवाले लोगों के लिये है। अमरीका के हिन्दी भाषी लोगों के अधिकांश बच्चे हिन्दी शायद ही जाने, इसीलिये यह प्रयास है। देखें क्या कर पाता हूँ नये साल में।

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Ishopanishad and Mahatma Gandhi

I may have different views about many things about Mahatma Gandhi over the years of my life though I came in this world when Mahatma Gandhi was almost taken up as the saviour of India freeing it from 200 years of British rules and then was made The Father of Nation, that Indian who got this honour in the whole written history of India. But now I believe Gandhi grew in his life itself as one of the great Mahtma India has produced. I have written briefly about his statement on the first Sloka of Ishopanishad:

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
**
ईशा वास्यम् इदं सर्वम् यत् किं च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भूञ्जीथाः मा कस्यस्वित् धनं ।।सं
**
īśā vāsyam idaṃ sarvaṃ yat kiñca jagatyāṃ jagat |
tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasya sviddhanam ||T
**
जगत के सब चल अचल जीवों में ईश्वर हैं और यह जगत उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
**
The Lord is enshrined in the hearts of all.
The Lord is the supreme Reality.
Rejoice in him through renunciation.
Cover nothing. All belongs to the Lord.


I have found the source of that material and the story that I am giving below to which I fully agree..

For the first time at the public meeting in Quilon Gandhiji summed up the credal belief of Hinduism in an Upanishadic mantra, and thereafter at every meeting gave lucid and simple commentaries on the numerous implications of that all-comprehensive mantra. The pure exposition without much of a commentary was given on the previous day at Quilon and is reproduced below :

I have fixed upon one mantra that I am going to recite to you, as containing the whole essence of Hinduism. Many of you, I think, know the Ishopanishad. I read it years ago with translation and commentary. I learnt it by heart in Yeravda Jail. But it did not then captivate me, as it has done during the past few months, and I have now come to the final conclusion that if all the Upanishads and all the other scriptures happened all of a sudden to be reduced to ashes, and if only the first verse in the Ishopanishad were left in tact in the memory of Hindus, Hinduism would live forever.

Now this mantra divides itself in four parts. The first part is ईशावास्यमिदं सर्वं | यत्किं च जगत्यां जगत | It means, as I would translate, all I this that we see in this great Universe is pervaded by God. Then come the second and third parts which read together, as I read them : तेन त्यक्तेन भुंजीथा | I divide these into two and translate them thus: Renounce it and enjoy it. There is another rendering which means the same thing : Enjoy what He gives you. Even so you can divide it into two parts. Then follows the final and most important part, मा गृध कस्यस्विद् धनम् | which means: Do not covet anybody’s wealth or possession. All the other mantras of that ancient Upanishad are a commentary or an attempt to give us the full meaning of the first mantra.

It seems to me to satisfy the craving of the socialist and the communist, of the philosopher and the economist. I venture to suggest to all who do not belong to the Hindu faith that it satisfies their cravings also. And if it is true— and I hold it to be true—you need not take anything in Hinduism which is inconsistent with or contrary to the meaning of this mantra. What more can a man in the street want to learn than this, that the one God and Greator and Master of all that lives pervades the Universe? The three other parts of the mantra follow directly from the first. If you believe that God pervades everything that He has created, you must believe that you cannot enjoy anything that is not given by Him. And seeing that He is the Greator of His numberless-children, it follows that you cannot covet anybody’s possession. If you think that you are one of His numerous creatures, it behoves you to renounce everything and lay it at His feet. That means that the act of renunciation of everything is not a mere physical renunciation but represents a second or new birth. It is deliberate act, not done in ignorance. It is there­fore a regeneration. And then since he who holds the body must eat and drink and clothe himself, he must naturally seek all that he needs from Him. And he gets it as a natural reward of that renunciation. As if this was not enough the mantra closes with this magnificent thought: Do not covet anybody’s possession. The moment you carry out these precepts you become a wise citizen of the world living at peace with all that lives. It satisfies one’s highest aspirations on this earth and hereafter.

Gandhiji described at another meeting spoke about this mantra as the golden key for the solution of all the difficulties and doubts that may assail one’s heart. Remember that one verse of the Ishopanishad and forget all about the other scriptures. You can of course drown yourselves and be suffocated in the ocean of scrip­tures. They are good for the learned if they will be humble and wise, but for the ordinary man in the street nothing but this

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वेदान्त, उपनिषद् एक परिचय

वेदान्त, उपनिषद् एक परिचय
हमारे चार वेद-ऋक्, साम, अथर्व, एवं यूज़र् आदि है। वेदान्त वेदों के ही भाग हैं। वेदान्त’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘वेदों का अंत’ (अथवा सार)। वेदान्त को तीन मुख्य ग्रंथों के द्वारा जाना जाता हैं: वे हैं उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता एवं ब्रह्मसूत्र। इन तीनों को प्रस्थानत्रयी कहा जाता है। इसमें उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्र को न्याय प्रस्थान कहते हैं। उपनिषद् चारों वेदों में किसी न किसी से हैं और उनके निचोड़ हैं। भारत की समग्र दार्शनिक चिन्तनधारा का स्रोत वेद से निकले उपनिषद पर ही आधारित रही है।
उपनिषद् शब्द का साधारण अर्थ है – ‘समीप उपवेशन’ या ‘समीप बैठना (विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना)। यह शब्द ‘उप’, ‘नि’ (उपसर्ग) तथा, ‘सद्’ (धातु) से मिलकर बनता है।’उप’ का का अर्थ है ‘समीप जाना’, शायद दार्शनिक अर्थ होगा ‘सत्य के समीप बढ़ना’,पर ‘गुरू के नज़दीक जाना’ ज़्यादा प्रासंगिक है,’सद्’ धातु के अर्थ है ‘बैठना’,’उप’ एवं ‘सद्’ को जोड़नेवाले ‘नि’ का अर्थ है ‘गुरू के आसन से शिष्य का आसन का ‘थोड़ा नीचे’, शिष्य को अपने को ज्ञान देनेवाले गुरू को सम्पूर्ण श्रेष्ठता देने के विश्वास एवं भावना से है। यह एक शान्ति मंत्र में भी कहा गया है-
श्लोक: ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।19।। (कठोपनिषद -कृष्ण यजुर्वेद),
अर्थ है- ॐ सह नाववतु – ईश्वर हमारी साथ-साथ रक्षा करें; सह नौ भुनक्तु – हमारा साथ-साथ पालन करें; सह वीर्यं करवावहै – हम दोनों को साथ-साथ पराक्रमी बनाएं; तेजस्विनावधीतमस्तु – हम दोनों तेजस्वी हो;मा विद्‌विषावहै – हम गुरु और शिष्य एक दूसरे से द्वेष न करें।
कुछ उपनिषदों में शिष्य नहीं दिखते, ऋषियों के असीम तपस्या, ध्यान आदि से अर्जित एवं प्रशिक्षित सत्य ज्ञान के निष्कर्ष दिये गये हैं एवं मार्ग भी बताया गया अध्यात्मिक चरम ज्ञान का जैसे ईसोपनिषद्, माडूक्योपनिषद्। पर अधिकांश उपनिषदों में शिष्यों के जिज्ञासाओं का एवं शिक्षा के दौर में उठे शंकाओं का गुरू द्वारा निराकरण किया गया है अपने सिद्ध प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर परस्पर शिष्य गुरू के प्रश्नोत्तर संवाद द्वारा। शिष्य बालक ऋृषिपुत्र नचिकेता है, समाज के प्रबुद्ध गृहस्थ शौनक हैं,राजा जनक भी हैं, राजपुत्र, असुर राजा विरोचन भी है एवं देवराज इन्द्र भी, एक विदुषी पत्नी मैत्रेयी भी
है, साधारण परिवार दासीपुत्र सत्यकाम बालक है- तत्कालीन समाज के सब तरह के लोग हैं विभिन्न उपनिषदों में।
उपनिषदों की संख्या कहीं १०८ मानी जाती हैं, कहीं २०० से भी ऊपर…। पर शंकराचार्य ने पहली बार जिन ११ उपनिषदों का भाष्य लिखा उन्हें की प्रमुख माना गया । वे हैं ईशोपनिषद्, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद्, माडुक्योपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, तैत्तरीयोपनिषद्, ऐतरेपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद्, बृहदारण्यकोपनिषद्। कुछ उपनिषद् केवल श्लोकों में हैं, कुछ गद्य में, कुछ मिले जुले हैं दोनों तरह की प्रस्तुति में। केवल एक ही उपनिषद् है जिसमें प्रणेता ऋषि ने अपना नाम भी दिया है,श्वेताश्वतरोपनिषद्- प्रणेता ऋषि श्वेताश्वतर हैं जो उपनिषद् में ही आता है। १०८ उपनिषदों में ऋग्वेदीय १० उपनिषद्, यजुर्वेदीय(शुक्ल-कृष्ण) ५१ उपनिषद्, सामवेदीय १६ उपनिषद्, तथा अथर्ववेदीय ३१ उपनिषद् हैं। इनमें प्राचीनतम हैं ईश, ऐतरेय, छान्दोग्य, प्रश्न,तैत्तिरीय,बृहदारण्यक, माण्डूक्य और मुण्डक। इनके बाद के प्राचीन हैं कठ,केन । श्वेताश्वतर सबसे बाद का माना जाता है।पर शंकराचार्य के भाष्य क्रम में इसे ले लेने से यह भी मुख्य उपनिषदों की श्रेणी में माना जाता है। उपनिषदों के चार महावाक्यों का बहुत महत्व है…सभी उपनिषदों में इन्हीं तथ्य को प्रधानता दी गई है।
उपनिषदों के ‘चार महा-वाक्य’ उन के विचारों के मुख्य निष्कर्ष हैं, अत: महत्वपूर्ण हैं। कृष्णयजुर्वेदीय उपनिषद्- शुक्रोरहस्यपनिषद् में उपनिषदों के इन चार महावाक्यों का उल्लेख है-
“ अथ महावाक्यानि चत्वारि। यथा।….
१. ‘ॐ प्रज्ञानम् ब्रह्म।’-‘ यह प्रज्ञान ब्रह्म है’ -ऐतेस्योपनिषद् १.३.३ ऋग्वेद से।
२. ‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि।’- ‘मैं ब्रह्म हूँ’ -बृहदारण्यको उपनिषद् १.४.१० यजुर्वेद से।
३. ‘ॐ तत्त्वमसि।’- ‘ वह ब्रह्म तू है’ – छान्दोग्योपनिषद् ६.८.७ सामवेद से।
४. ‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म।’- ‘यह आत्मा ब्रह्म है’- माण्डूक्योपनिषद् १-२ अथर्ववेद से।
*
पहला निष्कर्ष महावाक्यों पर आधारित है
वह ब्रह्म तू है…मैं ब्रह्म हूँ…यह प्रज्ञान ब्रह्म है…यह आत्मा ही ब्रह्म है… सरल अर्थ हर भूत- चर एवं चराचर, के अन्तर में एक ही आत्मा जो नित्य है, जिसकी का कभी नाश नहीं होता, विराजमान हैं और पूरी निस्पृहता से कार्य करती है…इसको हर व्यक्ति अनुभव कर सकता है, साक्षात्कार कर सकता है, अमरत्व पा सकता है। यही आत्मा अद्वैतवादी ब्राह्मण, पुरूष, परमात्मा भी है । सभी उपनिषद् इन निष्कर्ष तक पहुँचने के मार्ग का विवेचन करते हैं अपनी अपनी तरह से, शिष्य भी आत्म साक्षात्कार का अनुभव प्राप्त कर सकता है अगर निष्ठा आवश्यकता के अनुरूप हो। आत्मा ही को अद्वैतवादी वेदान्त ब्रह्म, ब्राह्मण, पुरूष ।भगवद्गीता में उन्हें प्रमात्मा, पुरूषोत्तम भी कहा गया है। मडुकोपनिषद् में शिष्य रूप में आये महाशालाधिपति शौनक को गुरू अंगिरस या अङ्गिरसं ने एक श्लोक में कहा है…उपाय की तरह बताया है नीचे का श्लोक:
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्‌ तन्मयो भवेत्‌ ॥२.२.४॥
-ॐ (प्रणव) है धनुष तथा आत्मा है बाण, और ‘वह’, अर्थात् ‘ब्रह्म’ को लक्ष्य के रूप में कहा गया है। ‘उसका’ प्रमाद रहित होकर वेधन करना चाहिये; जिस प्रकार बाण अपने लक्ष्य में विलुप्त हो जाता है उसी प्रकार मनुष्य को ‘उस’ में (ब्रह्म में) तन्मय हो जाना चाहिये।
**
दूसरा औपनिषदिक निष्कर्ष है कि सभी जीवों में एक ही आत्मा है, सभी एक ही है अलग अलग रूप, नाम होने पर भी और इसी एकत्व के ज्ञान को आत्मसात् कर कोई अमरत्व पा सकता है….एक दूसरे के बीच के ईर्ष्या, द्वेष का कोई कारण ही नहीं है।उपनिषद् में वर्णित आत्मा को तत्वत्त: समझ पूरी दुनिया को सुखी एवं शान्तिमय बनाने का यही सरल रास्ता है। यही शिक्षा का मूल मंत्र होना चाहिये एक प्रदूषित रहित, आपसी विद्वेषरहित, सुखमय, शान्तिपूर्ण संसार बनाने का। देखिये उपनिषदों का इसके लिये क्या प्रयत्न है कुछ हज़ारों साल प्राचीन सच्चे ज्ञानी ऋषियों के श्लोकों में उनके अपने अनुभव के आधार पर।
ईशोपनिषद् कहता है पाँचवें एवं छठे श्लोक में:

एतत् अस्य सर्वस्य अन्तः। तत् उ सर्वस्य अस्य वाह्यतः ॥ वह इस सबके भीतर है और वह इस सबके बाहर भी है

यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति च सर्वभूतेषु आत्मानम्। ततः न विजुगुप्सते।।
जो सभी भूतों को परम आत्मा में ही देखता है और सभी भूतों में परम आत्मा को, वह फिर सर्वत्र एक ही आत्मा के प्रत्यक्ष दर्शन करता है एवं फिर किसी से कतराता नहीं, घृणा नहीं करता।

यस्मिन् विजानतः आत्मा एव सर्वाणि भूतानि अभूत्। तत्र एकत्वम् अनुपश्यतः कः मोहः कः शोकः ॥
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न मनुष्य यह जान जाता है कि परम आत्मा ही स्वयं सभी भूत में वर्तमान है ।उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र आत्मा की एकता ही देखता है।
कठोपनिषद् में भी यही कहा गया है-
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥२.२.९/१०॥
समस्त प्राणियों में विद्यमान ‘अन्तरात्मा’ एक ही है परन्तु रूपरूप के सम्पर्क से वैसा-वैसा प्रतिरूप धारण करता है; इसी प्रकार वह उनसे बाहर भी है।
*
तथा एकः सर्वभूतान्तरात्मा लोकदुःखेन न लिप्यते। २.२.११॥
समस्त प्राणियों में विद्यमान् ‘अन्तरात्मा’ एक ही है, परन्तु सांसारिक दुːख उसे लिप्त नहीं करते इस कारण, वह दुःख तथा उसके भय से परे है।
*
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। २.२.१२
-समस्त प्राणियों के अन्तर् में स्थित, शान्त एवं सबको वश में रखने वाला एकमेव ‘आत्मा’ एक ही रूप को बहुविध रचता है।
*
नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्‌।२.२.१३
-अनेक अनित्यो में ‘एक नित्य’, अनेक चेतन सत्ताओं में ‘एक तत्त्व’ ‘एकमेव’ होते हुए भी जो बहुतों की कामनाओं का विधान करता है।
**
यह ज़रूरी है कि व्यक्ति पूरी एकनिष्ठा एवं विश्वास के साथ अपनी आत्मा को जानने समझने के लिये पूरी कोशिश करें क्योंकि वह उसके इसी शरीर में रहती है एवं बिना लगाव के जीवन पर्यन्त उसे संचालित करती है । ज्ञानी अगर आत्मांन्वेषन करना चाहता है तो वह आत्मा के साक्षात्कार इसे जीवन में कर पाने में समक्ष है। और वही आत्मा सभी चराचर जगत् के हर भूत (जीव)को संचालित करती है। यही आत्मा ही परमात्मा भी है जो हम बताए ही हैं। यही सभी उपनिषदों की मुख्य सीख है: गुरू का काम है अपने शिष्यों को, दुनिया के सब लोगों को इस सत्य को सीखना, समझना, जीवन मूल्य बनाना,जीवन के हर क्षण को ब्रह्म का सानिध्य पा अमरता प्राप्त करने का सामर्थ्य पाने के लिये सामर्थ्य देना।
हम में अधिकांश अपने आत्मा की शक्ति को समझने की कोशिश न कर अपनी ही कमियों से अपने इच्छा द्वेष के कारण जीवन यापन करता रहता है, साधारण जीवन जीता रहता है। जो ऐसा न कर एक निष्ठा से अपने कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों को एकनिष्ठा से अपने जीवन लक्ष्य पर बढ़ते तो उन्हें इसी जीवन में हम सफल होते देखते हैं हर क्षेत्र में, हर विधा में, बहुत शारीरिक कमियों के बावजूद।
-पुनश्च अगली बार

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उपनिषद् , विद्या, आधुनिक धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का बहाना


भारत के क्रमबद्ध ज्ञान सृजन की कहानी वेदों से शुरू हुई….अर्जन में उसके पहले के लोगों से चली आती ज्ञान परम्परा का भी ख़्याल रखा ही होगा ऋषियों ने और शायद इसीलिये स्रजनकर्ताओं ने अपने नाम का कहीं ज़िक्र नहीं किया। आज के उपलब्ध चारों वेद को रूप देने के बाद भी नई पीढ़ी के ऋषियों ने उस ज्ञान को अपने अनुसंधानों से पोषित किया….उन ज्ञानी ऋषियों ने अपने बारे न कुछ लिखा, न अपने शिष्यों को बताया और यही क्रम शतियों तक चलता रहा….
कल राकेश से बातचीत के सिलसिले में जब विषय आया किस तरह की शिक्षा की बात हमारे ऋषियों ने की. हाँ, वेदों के समय से कुछ ऋषि जहां जीवन सत्य की खोज में लगे जो आज विश्व द्वारा प्रशंसित है, वहीं कुछ अन्य खगोल एवं गणित विज्ञानों भी हज़ारों साल पहले पहुँचे जैसे सुलभशास्त्र, शून्य एवं अनन्त आदि से पता चलता है।पर लगता है उन्हें पराविद्या होने के कारण इतनी प्रसिद्धि नहीं मिली।

मंडूकोपनिषद् में बहुत साफ़ साफ़ दो तरह की विद्या का ज़िक्र है- परा विद्या एवं अपरा विद्या, जो यह भी बताता है कि उस समय में विद्या का क्षेत्र कितना बड़ा होता जा रहा था.
मंडूकोपनिषद् का श्लोक है: तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्शा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥१.५॥ मंडूकोपनिषद्
उसमें अपरा है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष। और परा विद्या वह है जिससे ‘अक्षर तत्त्व’ का ज्ञान होता है। ‘अक्षर तत्त्व’ अध्यात्म ज्ञान है, महत् ज्ञान को वह कहा गया है जिससे अमृतत्व पाया जा सकता है और सब दुखों से मुक्ति…।
सोचने की बात है कि वेदों की विद्या को भी अपरा कहा गया जिसे आज सेक्यूलर शिक्षा या आधुनिक शिक्षा कहा जाता है।

पर सबसे पुराने उपनिषदों में एक ईशोपनिषद् में प्रणेता ऋषि ने इसका खुलासा किया है कि दोनों विद्या एक दूसरे की पूरक हैं। और दोनों एकसाथ ज़रूरी किसी व्यक्ति के लिये।यहाँ परा-विद्या ‘विद्या’ हैं एवं अपरा-विद्या ‘अविद्या’।
श्लोक है:
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्य सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वाऽमृतमश्नुते ॥११
जो तत् को इस रूप में जानता है कि वह एक साथ विद्या और अविद्या दोनों है, वह अविद्या से मृत्यु को पार कर विद्या से अमरता का आस्वादन करता है।


आज भी सफल सुखमय, शान्तिमय सांसारिक जीवन के लिये आध्यात्मिक विद्या की नींव पर आधुनिक विद्या पाना ज़रूरी है। इसीलिये ऐसी ही शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत है और होनी चाहिये। हमने आध्यात्मिक शिक्षा से जीवन में नैतिकता के मूल्यों को भूला दिया संविधान के ‘सेक्यूलर’ शब्द की परिभाषा ठीक से नहीं देने एवं समझने के कारण । ‘भारत माता’, या ‘वन्देमातरम्’ सेक्यूलर नहीं रहा, फिर रामायण रचयिता तुलसीदास, कबीर, रैदास,रसखान को कैसे रखा जाये हमारे स्कूल की शिक्षा में । उपनिषदों को कौन सेक्यूलर (धर्म-निरपेक्ष)कहने देगा आज के राजनीतिक माहौल में जहां सभी जीवन मूल्य वोट की तराज़ू पर तौला जाता हो…। जब ब्राह्मण असुरों के कार्यों को श्रेष्ठ मानने लगे हैं एवं उसके लिये वे शूद्र बनने पर तैयार हैं एवं शूद्र और अन्य पिछड़ी जातियाँ रैदास या अन्य संतों को नहीं, शवरी, निषाद्, या केवट को नहीं आज के स्वार्थी नेताओं को न समझ उन्हें ही भगवान माँगने लगी हैं। अल्प संख्यक न कबीर रसखान, रहीम या साँई बाबा को नहीं मानते अपने धर्म के ठेकेदारों की बात मानते हैं….पर जो इसके बारे में कोई राय जानना चाहते हैं वे श्री. M के नाम से प्रसिद्ध श्रध्येय मुमताज़ अली खान के उपनिषदों की किताबों एवं व्याख्यानों से क्यों नहीं कुछ सीखते…


विवेकानन्द ने बराबर यही प्रतिपादित किया। देश कब तक यह धर्म निरपेक्षता का पासा खेलते हुए देश के महाभारत युद्ध को ख़त्म ही नहीं होने देता…धर्म, जाति, रंग, प्रदेश, भाषा के नाम से जोड…..क्यों नहीं हम देशवासी भारतीय उपनिषद् के इन श्लोकों से सीख ले सकते….
यस्तु सर्वानि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
जो सभी जीवों में अवस्थित आत्मा को अपनी आत्मा से अलग नहीं मानता, जो अपनी आत्मा को सभी में देख सकता है वह कैसे एक दूसरे से घृणा या दुश्मनी कर सकता है…..
The Wise man, who realizes all beings as not distinct from his own Self, and his own Self as the Self of all beings, does not, by virtue of that perception, hate anyone.
यस्मिन्सर्वानि भूतानन्यात्मैवभुद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
जो सभी में स्थित आत्मा को अपनी ही आत्मा की तरह जानता समझता है, कैसे अंधकार या शोक में रह सकता है।
What delusion, what sorrow can there be for that wise man who realizes the unity of all existence by perceiving all beings as his own Self?’


सभी उपनिषदों ने इसे बार बार दुहराया और भगवद्गीता भी…अगर दुनिया के लोग समझ जाते यह उपनिषद्ज्ञान, यह पूरे विश्व का कल्याण कर देता केवल भारत ही क्यों?
कहीं कोई भूल दिखती है तो कृपया बताने की कृपा करें, पर पहले समझने की कोशिश करें….
….

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Totapuri and Sri Ramakrishna- Two Great Enlightened Sadhaks

By about the end of 1865, Sri Ramakrishna was twenty-nine years old. He had finished his ten years-long sādhanās based on the path of bhakti (devotion) in which the devotee looks upon God as a Person. He had been blessed with innumerable visions and other spiritual experiences. With the highest purity and renunciation, his mind had attained an extraordinary moral and spiritual sensitivity which made it plunge into a divine mood (समाधि) at the slightest spiritual suggestion. Absorbed in one of these moods, Sri Ramakrishna was one day sitting in a corner of the open portico at the bathing ghat of the Dakshineswar temple on the bank of Gangā. Just then a wandering monk, by name Totapuri, suddenly alighted from a boat at the steps of the ghat, and walked up to him. As soon as his eyes fell on Sri Ramakrishna, he felt an instant attraction for this young man and felt a conviction in his heart of hearts that he was not an ordinary. Let us first know about Totapari a little more.
Totapuri himself hailed from Punjab and entered the monastic life in his boyhood. He was endowed with a robust physique and an iron will.Because of his fascination for the impersonal God, the non-dual Brahman, he undertook forty years of unremitting spiritual practice, performed on the banks of sacred Narmada river in Central India, and obtained the fruit of this path of the Advaita, the experience of Nirvikalpa Samādhi.
Having achieved the blessed experience, Totapuri wandered from place to place without any aim or purpose of his own, but fulfilling inscrutable divine purposes. The incomparable strength and freedom behind that wandering gave a glimpse of that in Buddha’s inspiring charge to the enlightened soul.

Realising Brahman as the one Reality, Totapuri spent his life under the canopy of the heaven, alike in storm and sunshine, maintaining himself on alms. His wanderings took him to many a holy place in India, including Gangāsagar in Bengal, where holy Gangā meets the sea. It was on his return journey from there that he went to the Dakshineswar temple had been built because of the piety, generosity, and broad-mindedness of its founder, Rani Rasmani. It was then drawing holy men, ordinary and extraordinary, from all creeds and sects. Sri Ramakrishna was it’s priest then. Some of these enlightened ones, like Jatādhārī and Bhairavī Brāhmanī, had already met Sri Ramakrishna and guided him to realisation through their respective spiritual paths of the bhakti school. Totapuri represented an altogether different path of the impersonal God, the path blazoned by the sages of the Upanishads and the great Buddha.
As soon as Totapuri’s eyes fell on Sri Ramakrishna he recognised in him a fit aspirant for the path of the unconditioned and impersonal Brahman. He asked Sri Ramakrishna whether he would like to learn Vedānta. He told him ‘You seem to be an advanced seeker after truth. Would you like to be initiated in the path of Advaita realisation?’ Sri Ramakrishna felt a divine urge within to agree. Under Totapuri’s directions, Sri Ramakrishna performed the various ceremonies preliminary to the grand ceremony of sanyāsa — total renunciation of the world. One day, about two hours before dawn, both moved to a small hut in a sequestered spot, not far from Sri Ramakrishna’s room. Totapuri administered to Sri Ramakrishna the traditional monastic vows of complete renunciation of all the pleasures of life, both earthly and heavenly, and the holy vow to dedicate all one’s mind and heart to the highest truth of non-dual Brahman, and to be a source of fearlessness to all beings. And in the stillness of that early dawn, the teacher and the disciple re-enacted the momentous drama of tangible spiritual communication which has so often been enacted in India before. Prostrating himself before his teacher, Sri Ramakrishna then took his seat to receive instruction from Totapuri in the philosophy of Brahman.
In the words of Swami Saradananda one of the direct disciples of Sri Ramakrishna.
‘He (Totapuri) said to the Master: “The Brahman, the one substance which alone is eternally pure, eternally awakened, unlimited by time, space and causation, is absolutely real. Through Māyā, which makes the impossible possible, It causes, by virtue of its influence, to seem (sic) that It is divided into names and forms. Brahman is never really so. For at the time of samādhi, not even a drop, so to speak, of time and space, and name and form, produced by Māyā is perceived. Whatever, therefore, within the bounds of name and form can never be absolutely real. Shun it at a good distance. Break the firm cage of name and form with the overpowering strength of a lion and come out of it. Dive deep into the reality of the Self existing in yourself. Be one with It with the help of samādhi. You will then see universe, consisting of name and form, vanish as it were into the void; you will see the consciousness of the little “I” merge in that of the immense “I”, where it ceases to function; and you will have the immediate knowledge of the indivisible Existence-Knowledge-Bliss as yourself. The Brhadāranyaka Upanishad (II. iv. 14) says: ‘The consciousness, with the help of which a person sees another, knows another, or hears another, is little or limited; whatever is limited is worthless; for the supreme bliss is not there; but the knowledge established in which a person becomes devoid of the consciousness of seeing another, knowing another, and hearing another, is the immense or the unlimited one. With the help of that knowledge, one gets identified with the supreme bliss. What mind or intellect is able to know that which exists as Knower in the hearts of all?” ’
After instructing his disciple thus in the central ideas of the jnāna path of Vedānta, Totapuri exhorted Sri Ramakrishna to fix his mind on the unconditioned Brahman. This part of the momentous story is best told in the words of Sri Ramakrishna himself in his ‘Life of Sri Ramakrishna’:
‘After the initiation, Nangta, “the naked one” (this was the appellation which Sri Ramakrishna, out of respect, invariably used for his guru, who being a monk of the Nāgā Order, generally went about naked) began to teach me the various conclusions of the Advaita Vedānta and asked me to withdraw the mind completely from all objects and dive into the Ātman. But in spite of my all attempts I could not cross the realm of name and form and bring my mind to the unconditioned state. I had no difficulty in withdrawing the mind from all other objects except one, the all too familiar form of the blissful Mother—radiant and of the essence of pure Consciousness—which appeared before me as a living form. Again and again I tried to concentrate my mind on the Advaita teachings, but every time the Mother’s form stood in my way. In despair I said to the “the naked one”, “It is hopeless”. I cannot raise my mind to the unconditioned state and come face to face with the Ātman.” He grew exited and sharply said “What?” You can’t do it. But you have to.” He cast his eyes around and finding a piece of glass he took it up and pressing the point between my eyebrows said, “Concentrate the mind on this point.” Then with a stern determination I again sat to meditate, and as soon as the gracious form of the Divine Mother appeared before me. I used my discrimination as a sword and with it severed it in two. There remained no more obstruction to my mind, which at once soared beyond the relative plane, and I lost myself in samādhi.’
Sri Ramakrishna passed into the unconditioned state of the nirvikalpa samādhi; the body became motionless. He had realised Brahman, become one with Brahman, beyond all speech and thought.
Totapuri sat for a long time silently watching his disciple. Finding him still motionless, he left the hut, locking the door from outside lest anyone should intrude without his knowledge; he remained outside awaiting the disciple’s call from within to open the door. The day passed, night came, a second and a third day and a night also passed, and still there was no call. Totapuri was astonished. He opened the door and entered the room. He was speechless with wonder to see Sri Ramakrishna in the very same position in which he had left him. The face was calm, serene, and radiant. In breathless amazement he examined the disciples heart and respiration and touched again and again the disciples almost corpse like body. There was no sign of consciousness. He(Totapari) cried in bewilderment at the miracle of this young man achieving in a single day this highest realisation of nirvikalpa samādhi which had taken him forty years of hard practice to realise.
Totapuri immediately took steps to bring the mind of his disciple down to the world of phenomena. The little room rang with the holy mantra — Hari Om — uttered in a solemn tone by the teacher. Little by little Sri Ramakrishna’s mind came to an awareness of the outer world; and as he opened his eyes, he saw his teacher looking at him with tenderness and admiration. The disciple reverently prostrated himself before the teacher who in turn locked him in warm embrace.
I came across the story in a book of commentary on Kenopanishad by Nirvirakanand.
I read an extension of that today while reading the commentary of the famous Sadhak, famous as Shri. M:
“ Totapuri belonged to that order of sanyasins who do not stay for more than three days in one place because they do not want to get caught up with anything. But Totapuri lived for three months with Sri Ramakrishna because he found that Ramakrishna could achieve the state of nirvikalpa samadhi in three days, something which took Totapuri forty years to achieve! So he stayed, watching him in wonder.
At the end of his stay, he had such a severe stomach ache that he could not concentrate to get into his meditation or samadhi. Being a great Paramahansa who did not care for his body, he said to himself, “If I cannot fix my mind, this body is useless! Let me give it up!’ He walked into Ganga. It is said that however deep into water he went, he could not reach deep enough to drown himself. So he came back, and Ramakrishna said, ‘ If only you could accept the ‘Mother’ as an agent, you might get rid of your problem. You need not accept her as the Supreme Being, but as the link to the Supreme Being’. Finally, Totapuri is believed to have accepted Shakti, and left. Perhaps it was ordained that he should go to Dakshineswar to understand from Sri Ramakrishna that Shakti and Shivam, Prakriti and PURUSHA, are two sides of the same coin, like fire and its power to burn. They are not two things; one cannot separate them.. “

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आज के परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास और उनके राम

आज के परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास उनके राम
नानापुराणनिगमागम के ज्ञानी तुलसीदास(१४९७-१६२३) ने अपने इष्टदेव की तरह श्री राम को ही क्यों चुना? उनके समय में एवं पहले से ही भक्त कवियों में कृष्ण छा चुके थे जयदेव (१२०० ई.), सूरदास(१६४८-१५८४), मीरा(१४९८–१५४६) सभी कृष्ण में रमें….बाल्मिकी रचित संस्कृत के पहले महाकाव्य के व्यक्तित्व में तुलसीदास ज़रूर वह सब पाये जो एक देश निर्माता कवि को चाहिये था. पूर्ण रूप से राम में समर्पित एवं अपनी विभिन्न तीर्थ यात्राओं के अनुभवी भक्त तुलसीदास देश के लोगों में व्याप्त कुरितियों एवं आम लोगों के तकलीफ़ों से भी वाक़िफ़ थे, और उनके ऐतिहासिक कारणों से भी.साथ ही दूरदर्शी भी थे संस्कृत के ‘कवि’शब्द के अर्थानुकूल..ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन्हें देश के सैकड़ों सालों से विदेशियों द्वारा पहले किये विध्वंसक आक्रमण एवं लूट,मन्दिरों एवं उनकी मूर्तियों के विनाश, देश के लोगों को दास बना ले जाने एवं बाद में हिन्दू राजाओं में एकताहीनता के कारण देश पर विजय प्राप्त कर शासक बन जाने एवं फिर उनका हिन्दू धर्म एवं भावना के प्रतिकूल आचरण करने आदि का इतिहास उनको मालूम न हो और उनको दुख नहीं देता हो.उन्हें इतिहास की जानकारी थी…कैसे सिकन्दर के आक्रमण के समय अम्भीक ने सिकन्दर का साथ पोल्स को हरवाया…कैसे पृथ्वीराज को जयेन्द्र ने धोखा दिया…कैसे न पंजाब, न गुजरात के अपने को महायोद्धा कहने वाले राजा एक होकर विदेशी आक्रमणों का सामना नहीं किये अपने ऐयाशी जीवन के लिये स्वार्थी बने रहे, आपस में लड़ते रहे, और फिर कैसे न हेमू का हिन्दू राजाओं ने साथ नहीं दिया, न महाराणा प्रताप का…यहाँ तक कि अपना भाई शक्ति सिंह ही धोखा दे गया और अपने राजा, महाराजा कहने वाले राजपूताना के अन्य वीर पर स्वार्थी लोग मुग़ल दरबार की शरण में आ गये बेटी बहन की शादी कर…एक राणा प्रताप अन्त तक भीलों को अपने साथ जोड़ लड़ते रहे अपनी कमजोर सेना के बावजूद भी ….कैसे तुलसीदास की तरह का विद्वान देश के पतन के इन कारणों से अपरिचित हो सकते हैं और उन पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा होगा…उनका समय काल अकबर एवं महाराणा प्रताप का था. अकबर के नौ रत्नों में एक राजा टोडरमल भी थे, जिनसे से वे सम्पर्क में थे. तत्कालीन संस्कृत के पंडितों से अवधी में लिखे अपने रामचरितमानस के विरोध और उसे नष्ट करने की धमकी के कारण वे एक प्रति सुरक्षित रखने के लिये टोडरमल के पास भिजवाये थे। तुलसीदास ने भारत का राज्य करने के लिये राम के चरित्र द्वारा भारत के लिये एक आदर्श पुरूष एवं राजा की कल्पना की.समाज के आम गृहस्थ परिवार के लिये भी एक अनुकरणीय आचरण की मर्यादा बनाई.अपने अलग अलग माँ के चार भाई थे…चार भाइयों की पत्नियाँ भी दो भाइयों की बेटी थी….पर उनके आचरण को देखिये कैसे चित्रित किया तुलसीदास ने आदर्श रूप में, सौतेली माँ के अनुचित हठ के कारण पिता के आदेश को सहर्ष स्वीकार किया. वन गये चौदह साल के लिये वनवासी की तरह….रास्ते के ऋषियों से ज्ञान अर्जित किया, साधारण से साधारण लोगों से पूर्ण श्रद्धा मिली अपने स्वभाव के कारण, चाहे वे केवट हो या निषाद राज, बानर हनुमान हों या सुग्रीव, तत्तकालीन दुष्ट तपस्वियों को सतानेवाले राक्षसों को पराजित किये, शबरी के जूठे बेर भी खाये प्रेम से, सबकी सहायता ली सीता हरण के बाद पहले खोजने में, जटायु से विभीषण तक की, फिर समुद्र पर पुल बनाते हुए ज्ञान का रास्ता छोड़े अहंकारी ब्राह्मण राजा रावण को भी हराया, …एकपत्नी व्रत का पालन किया, और फिर ‘हम दो हमारे दो’ का भी आदर्श दिया…
रामचरितमानस के दो प्रकरण- अपने समय के कलियुग काल का वर्णन
“भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।..द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन..”
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
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सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥
……
एवं रामराज्य के रूप का चित्र
“सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥…
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥…
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥…..
उनकी तत्कालीन सामाजिक पतन एवं उद्धार दोनों के सम्बंध में उनके विचारों की गहरी पैठ की कहानी कहता है।
तीस चालिस साल पहले तक रामायण उत्तर भारत के हिन्दी प्रदेश गाँव गाँव तक गाया, जाना, समझा जाता था…नई शिक्षा पद्धति, नई विदेशी आचरणों का नक़ल पूरी तरह से हमारी संस्कृति को नष्ट कर दिया और यह प्रभाव फैलता ही जा रहा है और उसका निराकरण भी नहीं दिखता…होइहे वही जो राम रूचि राखा कह हम संतोष कर रहे हैं…
हाँ, एक और बात
इसी कारण से वे कृष्ण की मूर्ति को देख कह पाये:
“काह कहौं छबि आजुकि भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै धरो धनुष शर हाथ ॥
क्योंकि उनके आदर्श थे:
नीलाम्बुजश्यामलकोमलांग सीतासमारोपितवामभागम्‌।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्‌॥
भारत की आज़ादी में रामचरितमानस का बहुत बड़ा हाथ रहा है…क्योंकि महात्मा गांधी गीता एवं रामचरितमानस के भक्त थे….

आज भी तुलसीदास का रामचरितमानस उतना ही सामयिक सामाजिक सांस्कृतिक अध्यात्मिक है जितना अपने समय था….गीता और रामचरितमानस के जीवन दर्शन का अभाव समाज में एवं देश के लिये विपर्यय ला रहा है….
हम भूल जाते हैं तुलसीदास का महत्व जिनके बारे में दो विदेशी विद्वान— प्रसिद्ध इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने उन्हें अपने समय का सबसे बड़ा व्यक्ति कहा है, यहाँ तक की अकबर से भी बड़ा एवं भाषाविद् सर जार्ज ग्रिफ़िथ ने उन्हें बताया, ‘ the greatest leader of the people after the Buddha’. यह अभी हाल में प्रकाशित पवन कुमार वर्मा की किताब ‘The greatest ode to Lord Ram’ में निम्नलिखित रूप में है-
The historian Vincent Smith has called him the greatest man of his age in India, greater than even Akbar himself. The linguist Sir George Griffith has described him as ‘ the greatest leader of the people after the Buddha’.
Let the Hindi knowing people of India not shun Tulsidas…..and it is only Ramcharitamanas that can keep the society together particularly in rural North India.

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सामयिक अध्यात्म

भारत हर दिन 11.72 लाख COVID-19 टेस्ट कर रहा है…..यह अपने आप में एक मिसाल है कि चाह होने पर भारत के लिये सब संभव है….इस लिये देश के हर व्यक्ति को समस्याओं से लड़ने की इच्छाशक्ति होनी ज़रूरी है….इसे हर माँ बाप के अपने बच्चों संस्कार और आचरण सीखाने पर निर्भर करता है…..शिक्षक का अपने छात्र के प्रति, मालिक का अपने मज़दूर के प्रति यही भावना रखनी चाहिये….हमारे देश के ऋषियों ने हज़ारों साल पहले कहा था यही सब पूरी निष्ठा से ज्ञानी खोज के बाद ….. तैत्तिरीय उपनिषद् कहता है….
“युवा स्यात्साधुयुवाऽध्यायकः। आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्।
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yuvā syātsādhuyuvā’dhyāyakaḥ| āśiṣṭho dṛḍhiṣṭho baliṣṭhaḥ | tasyeyaṁ pṛthivī sarvā vittasya pūrṇā syāt|
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युवाओं को चाहिये कि वह साधुचरित, बहुत अभ्यासी, आशावान, दृढनिश्चयी, और बलसम्पन्न बने। ऐसे युवकों के लिये यह सारी पृथ्वी द्रव्यमय बन जाती है।
……
दुर्भाग्यवश ग़ुलामी के दिनों में विदेशियों ने उन ऋषियों के अनुमोदित जीवन आचरणों और जीवन ध्येय को भूला अपनी सभ्यता के रंग में रंगने की शुरूआत की जिसे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे राजनेताओं ने फलने फूलने दिया…..और यह रंग हर रोज़ गहराता जा रहा है….जो देश जंगली थे वे हमें क्या सीखा सकते हैं…..उन्हीं की देखा देखी हम उनके ग़लत तरीक़ों एवं आचरणों को अपनाते जा रहे हैं और अपने को दूसरों से आगे समझते हैं…..आम ज़िन्दगी कुत्सित होती जा रही है….धन की लालसा में दादा दादी, माँ बाप का भी ख़्याल न कर उन्हें मार डालने की कहानियाँ भी पढ़ने सुनने को मिलती है ……देश की युवा पीढ़ी से बहुत कुछ उम्मीद थी…पर निराशा गहराता जा रहा है….
हम इसको ख़्याल क्यों नहीं करते कि यह ज़िन्दगी केवल त्याग करते हुए चलने पर ही चल सकती है…फिर गांधी का भी सबसे प्रिय ईशोपनिषद् का श्लोक जो उनके नित्य पाठ में था यही कहता है…

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
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जगत के सब चल अचल जीवों में ईश्वर हैं और यह जगत उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
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The Lord is enshrined in the hearts of all.
The Lord is the supreme Reality.
Rejoice in him through renunciation.
Cover nothing. All belongs to the Lord.

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आज के दिन २९.८.२०२०, एक और जन्मदिन

आज के दिन मैं अपने जीवन के कुछ सत्य सभी को बताने की कोशिश करने की धृष्टता कर रहा हूँ…
पूरे जीवन की उपलब्धियों केवल दैव कृपा से मिली…और कठिन परिश्रम से …घर से न ख़ास धनी थे, न शरीर से बहुत मज़बूत और न कोई ख़ास मेधा…गाँव में मैंने अनुभव किया कि सब जो साथ थे वे मुझसे बहुत अच्छे थे अंकगणित में भी और भाषा में भी.स्कूल में बंगाली माध्यम में मैं केवल एक ही हिन्दी माध्यम का छात्र छात्र था तो शिक्षकों की बातें बहुत अच्छी तरह समझ भी नहीं आती थी….पर फिर भी प्रथम होता रहा…उसके बाद प्रेसीडेन्सी कालेज में दाख़िला मिल गया १९५५ में, जहां मेरे सभी दोस्त बहुत तेज थे मुझसे….वहीं से आई.आई.टी, खडगपुर के लिये कोशिश की तो १९५७ में दाख़िला भी मिल गया मेकेनिकल इंजीनियरिंग में….पर सच बताऊँ इन दोनों कालेजों में अंग्रेज़ी माध्यम होने के कारण पूरे चार सालों में पढ़ाये गये विषयों में कोई ख़ास पैठ नहीं हुई….हिन्दुस्तान मोटर्स, उन दिनों के सबसे बड़े कारख़ानों में एक में एक था, काम भी मिल गया १९६१ में ४०० रू. महीने पर…हिन्दुस्तान मोटर्स में तो मेरे नीचे ऊपर बहुत तेज लोग थे पर वहाँ से भी एक सम्माननीय पद से १९९७ में रिटायर हो गया, सभी सदा मेरे तकनीकी ज्ञान और अथक मिहनत का आदर किये…यहाँ मेरा मंत्र था शुरू से ही काम सीखना अपने हाथों काम कर, बड़ों से, एवं सभी तत्तसंबधी प्राप्त लिखित चीजों को हर जगहों से पढ़ कर…अब पिछले एक डेढ़ साल से अध्यात्म का भूत सवार हो गया है….और उसी में अधिकांश समय जाता है….पर एक कठिन प्रयास और उन शिक्षाओं को ज़िन्दगी का हिस्सा बनाने का चल रहा है , यहाँ भी ईश्वर का ही आशा है. विश्वास है यहाँ भी दैव कृपा मिलेगी ही, क्योंकि मैं तो एक नौसिखियां हूँ, अपनी गलती या उनकी इच्छा के कारण बहुत देर से इसमें आया हूँ, पर परिश्रम कर रहा हूँ सब मानवीय कमज़ोरियों के साथ.. सहारा उपनिषद् के इस श्लोक की दूसरी पंक्ति…
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’।।
-कठोपनिषद् १.२.२३
आत्मा जिसे चाहती है उसी को यह’ लभ्य है, अपना दर्शन देती है.

और फिर तुलसीबाबा जब अयोद्ध्या कांड में बाल्मिकी के मुख से राम को उनके मुख से राम को कहलाती है..
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
शायद मैं भी उनकी कृपा पा जाऊँ. और यह इस बाक़ी जीवन में नहीं दिये तो अगले किसी जन्म में देंगे….
मैं तो बस उपनिषदों के इन श्लोकों का जाप करता रहूँगा…क्योंकि जप भी एक मार्ग बताया गया है….
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
जगत का सब कुछ ईश्वर का है, उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् सतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥
उत्तम कर्मों को करते हुए इस जगत् में सौ वर्षों तक जीने की इच्छा रखो। ऐसे कर्म तुम वमें लिप्त न होंगे, उत्तम कर्म से अन्य कोई मार्ग नहीं है।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्, विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो, भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥१८॥
हे अग्नि देव! हमें परमेश्वर की सेवा में पहुँचाने के लिये शुभ मार्ग से ले चलिये; आप सम्पूर्ण कर्मों को जाननेवाले हैं, हमारे इस मार्ग से सभी पाप दूर कर दीजिये, आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।

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