Present Crisis of Auto Sector

Will the government be able to pursue GST Council to agree for a cut in the rate of GST for auto sector from 28% to 18% as demanded by the auto manufacturers of the country? If not, what will be extent of cut and will it help auto sector to restrict the falling sales, rejuvenate the market and restore its past growth rate? How much of loss of tax collection can be afforded by the government? But many view thar the rate rate cut may not necessarily boost the sales figure.Even if it happens, it will be short lived. To remind the readers, the GST rates fixed for auto sector for different types of vehicles were significantly lower than the total of different taxes that were being paid by the auto manufacturers then.But strangely,there is hardly any authentic study about the gradual and continuing slow down of the sector during last so many months. SIAM or CII would have done it, but have not. Shri R C Bhargav, the old man of Maruti Suzuki, views the reluctant banks providing loans to the buyers and the mandate to introduce costly safety features such as airbags and ABS on new cars are two main reasons for the increase in the cost of entry cars as the reasons for the increased price by around Rs. 55000 including around Rs. 20,000 through higher road tax imposed by some states.https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/cars-getting-expensive-unaffordable-maruti-chairman-bhargava/articleshow/71057677.cms

Interestingly, Manmohan Singh for the first time beside criticising the government has come out with his five- point remedy plan. And the experts in government must look into the possibility of rational steps, if possible. But unfortunately, the OEMs who know the reasons of slowdown best and some long term solutions too, have not volunteered to announce the steps they must take on their own. I can point to at least one very important reason of increased cost of car manufacturing. That is because of the diminishing interest and zeal of the OEMs in investing for increasing the indigenous content in the vehicles and over the years almost every manufacturer would have increased the import content of components in all new models introduced. I have not heard of any such effort from the auto component sectors. Our OEMs have tasted the ease of importing everything from China that was not the way it was there before liberalisation. OEMs are also not exploring the possibility of exports to its best potentials.

https://www.indiatoday.in/business/story/manmohan-singh-slams-govt-shares-5-point-remedy-plan-for-revival-1598509-2019-09-12

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भगवद्गीता:हिन्दूओं से एक आग्रह:जाति प्रथा को छोड़ें।

हम सब यह स्वीकार करते हैं कि हमारा धर्म हिन्दू है. हमारा धर्म एवं जीवन भारत के अति प्राचीन काल के मनीषियों द्वारा रचित वेद, उपनिषद्,महाभारत, भगवद् गीता, रामायण आदि धर्मग्रथों की शिक्षाओं पर आधारित है. उसी आधार पर मेरा यह समयानुकूल आग्रह है सभी प्रबुद्ध हिन्दू वर्ग से.अपने धर्म ग्रथों के आदेशों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें…पोंगा पंडितों के अज्ञान एवं स्वार्थी समाज-नेताओं के कारण जन्मी एवं फलीफूली जाति प्रथा का ख़ात्मा आज की राष्ट्रीय ज़रूरत है,समयानुकूल है एवं शास्त्र -सम्मत भी है. हमारे मनीषियों द्वारा प्रतिपादित और पूर्णत: वैज्ञानिक व्यक्ति के कर्म एवं स्वभाव पर आधारित चार वर्णों की वर्ण-व्यवस्था में माता पिता के वर्ण का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है गीता में, और साथ ही किसी वर्ण को दूसरे से नीचे या ऊपर का नहीं कहा गया है.

हम सब आज की ज़रूरत के अनुसार एक साथ ब्राह्मण बनें, क्षत्रिय बनें, वैश्य बनें एवं मिहनतकश सेवाप्रदान करने वाले मज़दूर बनें.एक दूसरे का सम्मान करें. आज घर में या बाहर परिवार-पालन के लिये किसी ज़िम्मेदारी को सफलता से निभाने एवं अपने कर्मक्षेत्र में समय के साथ पदोन्नति पाने के लिये हममें चारों वर्णों के गुणों के उचित मिश्रण की जरूरत है.

हमें अभ्यास,स्वाध्ययन एवं स्वनिर्माण से (ब्राह्मण का)शम, दम, तप, शौचम्, क्षान्ति, आर्जवम्,स्वाध्याय, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य; (क्षत्रिय का)शौर्य,तेज़,धृति, दाक्ष्य, युद्ध से अपलायन,दान, ईश्वरभाव; (वैश्य का)कृषि,गोपालन,वाणिज्य एवं (चतुर्थ वर्ण शूद्र का) परिचर्या गुण यथासम्भव हासिल करने की कोशिश करनी चाहिये.ब्राहम्ण स्वभाव के लोगों में सत्वगुण प्रधान,रजोगुण अल्प,तमोगुण न्यून होता है;क्षत्रिय स्वभाव में रजोगुण प्रधान,सत्त्वगुण अल्प एवं तमोगुण न्यून होता है;वैश्य स्वभाव में रजोगुण प्रधान,तमोगुण अल्प,सत्त्वगुण अल्प होता है;और शूद्र स्वभाव में तमोगुण प्रधान,रजोगुण अल्प,सत्त्वगुण अल्प होता है.अपने कार्यभार को सर्वोत्तम तरीक़े से सम्पादन के लिये आवश्यक गुणों को अभ्यास और तप द्वारा अपने में लाना पड़ता है. वह किसी जाति विशेष में पैदा होने कारण नहीं पाया जाता.सदियों से ऐसा ही होता रहा है. सब जाति के लोगों के लिये स्वाध्याय ज़रूरी है. अपने घर में सभी को परिचर्या एवं सफ़ाई अपने ही करनी पड़ती है जो पहले दूसरे कर देते थे, साथ ही वैश्य की तरह आर्थिक विषयों का ख़्याल रखना पड़ता है, ब्राह्मण बन बच्चों के पढ़ाई लिखाई पर भी ध्यान देना पड़ता है.

गीता दो अन्य गुणों के आधार पर व्यक्ति विशेष में अन्तर की बात विस्तार से करती है.एक व्यक्तियों को तदानुसार सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्रकृति का बताता है (गुणत्रयविभागयोग अध्याय १४,श्रद्धात्रयविभागयोग अध्याय १७,मोक्षसंन्यासयोग अध्याय १८); एवं दूसरा दैविक,आसुरी और राक्षसिक प्रवृति का (देवासुरसंपद्विभागयोग अध्याय १६). हम देश के सभी नागरिक को कम से कम इन अध्यायों की व्याख्याओं को एक बार अपने गृहस्थ जीवन की शुरूआत में ज़रूर पढ़ना चाहिये.

गीता में कृष्ण का आग्रह है कि व्यक्ति इन्द्रिय अनुशासन एवं संयमन द्वारा अपने आचरण एवं स्वभाव को धीरे धीरे अपने को तामसिक से राजसिक एवं फिर सात्त्विक बनाये. राक्षसी प्रवृतियाँ का पूर्ण त्याग एवं आसुरिक प्रवृतियाँ का परित्याग कर दैविक सम्पदा का मालिक बने एवं अच्छे नागरिक का कर्त्तव्य निभाये.यह वर्ण विभाजन सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है. अर्वाचीन भाषा में पुराने नामकरण को इस प्रकार बदलने की ज़रूरत है- १. रचनात्मक विचार करनेवाला चिन्तक, २.राजनीतिज्ञ,३.व्यापारी वर्ग, ४. श्रमिक वर्ग.

हमारे दो महत्वपूर्ण प्राचीन मान्यताएँ हैं-

१. सभी जीवों में एक ही आत्मा विराजमान है.आत्मा न पैदा होती है, न मरती है, वह केवल देह बदलती रहती है.अगर हम इसे मानते हैं तो हम एक दूसरे व्यक्ति को जन्म पर आधारित जाति, धर्म में कैसे बाँट सकते हैं.

सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि….६.२९….आत्मौपम्येन सर्वत्र समय पश्यति…६.३२ ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: अर्थात् जगत् में सारे जीव मेरे शाश्वत अंश हैं……८.७; अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:,मैं समस्तजीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूं १०.२०; यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन,न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्,मैं समस्त सृष्टि का जनक बीज हूँ,१०.३९; सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो, अर्थात् मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ, १५.१५; ईश्वर:सर्वभूतानामं हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति, अर्थात् परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं,१८.६१;

फिर हर व्यक्ति से अपेक्षा भी करते हैं, ‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’.समस्त जीवों के प्रति दयालु, ५.७;…..छिन्न द्वैधा यतात्मान:सवभूतहिते रता: ५.२५ सुहृद सर्वभूतानां….५.२९ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति, अर्थात् जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है,६.३०;सम: सर्वेषु भूतेषू अर्थात् वह प्रत्येक जीव पर सम भाव रखता है,१८.५४;

२. हिन्दू धर्म पुनर्जन्म पर विश्वास करता है एवं उनका यह जन्म और अगला जन्म उनके अच्छे या बुरे कर्म पर आधारित है. फिर किसी के माता पिता पिछले जन्म में किस जाति के थे कैसे जानते हैं. कोई भी अच्छे या बुरे कर्मों के आधार पर श्रेष्ठतर या नीचे के जाति में पैदा हो सकता है.

अगर हम उपरोक्त मान्यता में विश्वास करते हैं तो फिर जाति के नाम पर वैमनस्य क्यों क्यों, हिंसक झगड़ा क्यों। जब सभी जीवों में आत्मा एक ही है तो हिंसा क्यों, जब हमें यह नहीं पता कि हम ख़ुद और हमारे पूर्वज किस जाति, धर्म के थे या अगले जन्मों मे किस जाति, धर्म के होंगे, तो फिर जातियों में वैमनस्य क्यों?

भगवद् गीता की वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी मान्य होनी चाहिये क्योंकि वह व्यक्ति के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा किए गए हैं. शास्त्रों के वर्णाश्रम की अवधारणा में प्रत्येक व्यक्ति शूद्र पैदा होता है और प्रयत्न और विकास से अन्य वर्ण अवस्थाओं में पहुंचता है। प्रत्येक व्यक्ति में चारों वर्ण के स्वाभाविक तीनों गुण-सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक- अलग अलग अनुपात में रहते हैं। इस व्यवस्था को ही ‘वर्णाश्रम धर्म’ कहते हैं।अर्थ है- वर्ण + आश्रम अर्थात, वह वर्ण (रंग, व्यक्तित्व) जो स्वभाव द्वारा अपने आप (आश्रम या बिना श्रम के) बन जाये।

सबसे पहले वेदों में प्रतीकात्मक रूप से पुरूष या परम सत्ता के शरीर से चारों प्राकृतिक वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है:”उनके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ था, उनकी दो भुजाओं से राजन्य(क्षत्रिय), उनकी दोनों जाँघों से वैश्य; उनके पैरों से शूद्र ।”

बृहदारण्यकोपनिषद के पहले अध्याय के चौथे ब्राह्मण में वर्णों के चार नामों एवं उनकी ब्रह्म से उत्पत्ति की बात कही गई है. पर भगवद् गीता में बहुत सरल तरीक़े से इनके अन्तर को बताया गया है -पहले ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:…..’४.१३ फिर १८वें अध्याय में अपने चारों वर्णों का नाम भी दे देते हैं-“ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥”वे चार वर्ण हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के तथा शूद्र और यह विभाजन कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा किए गए हैं ( माता पिता के वर्ण के अनुसार किसी व्यक्ति का वर्ण निर्धारित करने की व्यवस्था नहीं की है) १८.४१-४४.और अगले तीन श्लोकों में चारों के लक्षणों को अलग अलग बताया है।

श्री श्री परमहंस योगानन्द ने अपनी श्री मद्भगवद्गीता के अध्याय २ के ३१ श्लोक की व्याख्या करते हुये कहते हैं, “….प्रत्येक देश के पास उसके बौद्धिक और आध्यात्मिक लोग या ब्राह्मण , उसके योद्धा और शासक अथवा क्षत्रिय,उसके व्यवसायी या वैश्य और उसके श्रमिक या शूद्र होते हैं….सर्वप्रथम भारत के ऋषियों ने ही शरीर की शासन प्रणाली के तर्ज़ पर मनुष्य की प्राकृतिक योग्यता और कार्यों के अनुसार चार प्राकृतिक वर्णों की व्यवस्था पर बल दिया ….भारत में चार वर्ण मूल रूप से लोगों के जन्मजात गुणों और बाहरी कार्यों पर आधारित थे.समाज में सभी का समान सम्मान और आवश्यक स्थान था…..” बाद में, समाज के नेतृबृन्द ने स्वार्थ एवं अज्ञानता के कारण चार वर्ण असंख्य जातियों में परिवर्तित हो गये. “ ब्राह्मणों के अयोग्य बच्चे ज़रूरी आध्यात्मिक ज्ञान एवं शिक्षा के बिना ही मात्र जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने का दावा करने लगे.और इन्होंने अन्य वर्णों को नीचा बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा.शूद्रों को उनकी श्रेष्ठतर योग्यता होने पर भी, हीन कार्यों एवं दासता तक ही सीमित रखा गया.” जातियाँ की संख्याएँ बढ़ती गईं..एक दूसरे में विद्वेष का सिलसिला आरक्षण के बाद और बढ़ गया.

चिन्मय मिशन के स्वामी चिन्मयानन्द ने गीता के अध्याय १८ के ४०-४४ श्लोकों में वर्ण सम्वन्धी व्याख्या में ऐसा बिचार ब्सक्त किया है, जो सभी सुधी पाठकों को पढ़ना,समझना एवं मनन कर समाज की भ्रान्तियाँ को दूर करने में मदद करनी चाहिये और एक शान्तिमय प्यार, एक दूसरे के कार्यों के प्रति श्रद्धा के आधार पर समाज को आगे ले जाना चाहिये.

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शंकराचार्य का जाति भेद का ज्ञान अर्जन

किस ज़माने में रह रहें है हम…हम सब क्या शंकराचार्य से भी ऊपर हैं या उन्हीं द्वारा प्रतिपादित हिन्दू होते हुये भी उनकी सीख से सीख नहीं लेना चाहते….पढ़िये

शंकराचार्य का जाति भेद का ज्ञान अर्जन

अपने वराणसी के प्रवासकाल में एक दिन शंकराचार्य अपने शिष्यों के संग गंगा स्नान कर वापस लौट रहे थे. उन्हें एक चाण्डाल चार कुत्तों को साथ सामने से उसी रास्ते पर आता दिखाई दिया । शंकराचार्य रुक कर एक किनारे खड़े हो गये ताकि कहीं उनसे चाण्डाल छू न जाय और उससे छू जाने से वे अपवित्र न हो जायें.उसे पास आने पर उच्च स्वर में बोले, ” दूर हटो, दूर हटो ।” सुनकर पास आते चण्डाल ने कहा, ” ब्राह्मण देवता, आप तो वेदान्त के अद्वैतवादी मत का प्रचार करते हुए भ्रमण कर रहे हैं । फिर आपके लिये यह अस्पृश्यता-बोध (छुआ-छूत), भेद-भाव दिखाना कैसे संभव होता है ? मेरे शरीर के छू जाने से आप कैसे अपवित्र हो जायेंगे, क्या हमदोनों का शरीर एक ही पंचतत्व के उपादानों से निर्मित नहीं है ? आपके भीतर जो आत्मा हैं और मेरे भीतर जो आत्मा हैं, वे क्या एक ही नहीं हैं? हम दोनों के भीतर, और सभी प्राणियों के भीतर क्या एक ही शुद्ध आत्मा विद्यमान नहीं हैं? कहते हैं यह सुनते ही आचार्य शंकर समझ गए कि यह कोई साधारण चांडाल नहीं है और ये तो चांडाल के वेश में स्वयं भगवान् विश्वनाथ है । आचार्य ने चांडाल के वेश में आये शिव का तत्क्षण दंडवत प्रणाम किया और उनकी स्तुति पाँच श्लोकों से की। वे श्लोक “मनीषा पंचकं” के नाम से प्रसिद्द हैं । इस स्त्रोत्र के प्रत्येक स्तुति के अन्त में कहा गया है- ” इस सृष्टि को जिस किसी ने भी अद्वैत-दृष्टि से देखना सीख लिया है, वह चाहे कोई ब्राह्मण हो चण्डाल हो; वही मेरा सच्चा गुरु है.देखिये , प्रत्येक श्लोक के अंत में ‘मनीषा’ शब्द आता है.

मनीषा पञ्चकं

जाग्रत्स्वप्न सुषुत्पिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते

या ब्रह्मादि पिपीलिकान्त तनुषु प्रोता जगत्साक्षिणी।

सैवाहं न च दृश्य वस्त्विति दृढ प्रज्ञापि यस्यास्तिचेत

चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ १ ॥

जो चेतना जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि तीनों अवस्थाओं के ज्ञान को प्रकट करती है जो चैतन्य विष्णु, शिव आदि देवताओं में स्फुरित हो रहा है वही चैतन्य चींटी आदि क्षुद्र जन्तुओ तक में स्फुरित है । जिस दृढबुद्धि पुरुष कि दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व आत्मरूप से प्रकाशित हो रहा है वह चाहे ब्राह्मण हो अथवा चांडाल हो, वह वन्दनीय है यह मेरी दृढ निष्ठा है । जिसकी ऐसी बुद्धि और निष्ठा है कि “मैं चैतन्य हूँ यह दृश्य जगत नहीं”‘ वह चांडाल भले ही हो, पर वह मेरा गुरु है॥१॥

ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं

सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणयाशेषं मया कल्पितम् ।

इत्थं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले

चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ २ ॥

मैं ब्रह्म ही हूँ चेतन मात्र से व्याप्त यह समस्त जगत भी ब्रह्मरूप ही है । समस्त दृष्यजाल मेरे द्वारा ही त्रिगुणमय अविद्या से कल्पित है । मैं सुखी, सत्य, निर्मल, नित्य, पर ब्रह्म रूप में हूँ जिसकी ऐसी दृढ बुद्धि है वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है॥२॥

शश्वन्नश्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरोः

नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याज शान्तात्मना ।

भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके

प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुरित्येषा मनीषा मम ॥ ३ ॥

जिसने अपने गुरु के वचनों से यह निश्चित कर लिया है कि परिवर्तनशील यह जगत अनित्य है । जो अपने मन को वश में करके शांत आत्मना है । जो निरंतर ब्रह्म चिंतन में स्थित है । जिसने परमात्म रुपी अग्नि में अपनी सभी भूत और भविष्य की वासनाओं का दहन कर लिया है और जिसने अपने प्रारब्ध का क्षय करके देह को समर्पित कर दिया है । वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है॥३॥

या तिर्यङ्नरदेवताभिरहमित्यन्तः स्फुटा गृह्यते

यद्भासा हृदयाक्षदेहविषया भान्ति स्वतो चेतनाः ।

ताम् भास्यैः पिहितार्कमण्डलनिभां स्फूर्तिं सदा भावय

न्योगी निर्वृतमानसो हि गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ ४ ॥

सर्प आदि तिर्यक, मनुष्य देवादि द्वारा “अहम्” मैं ऐसा गृहीत होता है । उसी के प्रकाश से स्वत: जड़, हृदय, देह और विषय भाषित होते हैं । मेघ से आवृत सूर्य मंडल के समान विषयों से आच्छादित उस ज्योतिरूप आत्मा की सदा भावना करने वाला आनंदनिमग्न योगी मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है॥४॥

यत्सौख्याम्बुधि लेशलेशत इमे शक्रादयो निर्वृता

यच्चित्ते नितरां प्रशान्तकलने लब्ध्वा मुनिर्निर्वृतः।

यस्मिन्नित्य सुखाम्बुधौ गलितधीर्ब्रह्मैव न ब्रह्मविद्

यः कश्चित्स सुरेन्द्रवन्दितपदो नूनं मनीषा मम ॥ ५ ॥

प्रशांत काल में एक योगी का अंत:करण जिस परमानंद कि अनुभूति करता है जिसकी एक बूँद मात्र इन्द्र आदि को तृप्त और संतुष्ट कर देती है । जिसने अपनी बुद्धि को ऐसा परमानंद सागर में विलीन कर लिया है वह मात्र ब्रह्मविद ही नहीं स्वयं ब्रह्म है । वह अति दुर्लभ है जिसके चरणों की वन्दना देवराज भी करते हैं वह मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है॥५॥

क्या अब भी आप जाति भेद के पक्षधर बने रहेंगे?

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Lessons from ISRO

ISRO could develop the high tech cryogenic engines for its launches such as Chandrayaan-2 against the international blocking of transfer of technology because of its nuclear test in 1974. Over 25-30 years ago, Isro was desperate to develop the cryogenic technology for its GSLV rocket.In early 1990s, India had approached the US, Soviet Union, Japan and France for cryo technology. Only Soviet Union came forward. But Moscow too stepped back when the US cited a violation of the international Missile Technology Control Regime.But ISRO pursued the task of the development of the sophisticated engine and has finally succeeded.The recent glitch causing the suspension of the launch in its first attempt was minor and got detected and corrected in no time. https://economictimes.indiatimes.com/news/science/how-isro-toiled-for-years-to-develop-cryo-engine-to-power-bahubali/articleshow/70339729.cms?utm_source=ETTopNews&utm_medium=HPTN&utm_campaign=AL1&utm_content=23)

ISRO quite early in its run started to avoid the dependence on import.It led to low costs by designing most of the parts for its programme and by outsourcing to the domestic private sector.In Chandrayaan-2 mission,Larsen & Toubro (L&T) and Godrej group contributed with hardware and testing solutions. The GSLV MkIII launch vehicle was powered at lift-off by twin S200 solid boosters comprising head end, middle and nozzle end segments manufactured at L&T’s Powai Aerospace Workshop. L&T also carried out Proof Pressure Testing to ascertain the integrity and impeccable fabrication quality of the entire S200 solid boosters. The company also supplied hardware like Umbilical and Honey Comb Deck Panels that were used in this launch. L&T has played a significant role in the Indian space programme and has been associated with all generations of launch vehicles including the latest GSLV Mk-III, which is being used for the Chandrayaan-2.Critical equipment such as L110 engine and CE20 engine for the launcher Geosynchronous Satellite Launch Vehicle Mk III (GSLV Mk III), thrusters for the Orbiter and Lander, and components for the DSN antenna, were all provided by Godrej Aerospace, a business of Godrej & Boyce.SAIL developed the critical steels for components desired by ISRO.Apart from these large corporates, companies like Ananth Technologies, MTAR Technologies, Inox Technologies, Lakshmi Machine Works, Centum Avasarala and Karnataka Hybrid Microdevices, are reported to have contributed to the successful launch of the mission. https://www.business-standard.com/article/current-affairs/chandrayaan-2-mission-from-godrej-to-l-t-private-sector-plays-a-key-role-119072201362_1.html

But look at DRDO and HAL way of working that has failed to master the design of Kaveri turbine engine and develop in in-house that were to power Tejas fighters and its subsequent upgradation. Similar exercises by the companies such as Tata Motors and Mahindra have made them a globally competitive automobile companies. The Government of India, the earlier ones and even the one at present have failed to overcome the hurdles in making the manufacturing sector a lucrative sector to become a world leader in manufacturing of the hardware and software in every sector. For example, look at the real estate, cell phone and solar sectors, most of the requirements of huge quantity required for competitive manufacturing are being imported from China and other countries including SE. countries.It is because of the political leaders with very little knowledge of engineering, management or missionary national approach that India will never become a great manufacturing country even with half-hearted Make in India campaign, particularly when big business houses are gradually closing down their manufacturing units and have interest in fast money making sectors such as retails, finance and not manufacturing.India will have to have persons such as Steve Jobs of Apple and Elon Musk of USA even if it wishes to copy US model of capitalism.

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भगवद् गीता- जीवन की शान्ति एवं सुख कैसे मिले?

गीता कामनाहीन बनने की सीख देती है, पर साथ ही हर आम व्यक्ति एक शान्तिपूर्ण सुखमय जीवन की कामना भी रखता है. भगवद् गीता के अध्याय २ में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हुये यह प्रकरण आता है और शान्ति एवं सुख कैसे मिलेगा बताया गया है.कामनाओं के नियत्रंण के साथ साथ मन को राग-द्वेष, मम-भाव, अहंकार,स्पृहा से रहित बनाने के प्रयत्न से हम जीवन को शान्तिपूर्ण बनाने में सफल हो सकते हैं.

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥2.64॥

व्यक्ति अपने वश में की हुई राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करते हुये भी अन्तःकरण की प्रसन्नता प्राप्त करता है.

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥2.65॥

अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर सभी दुःखों का नाश हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर भलीभाँति स्थिर हो जाती है.

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।

न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ॥2.66॥

मन और इन्द्रियों को न जीत सकनेवाले वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और ऐसे व्यक्ति के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?॥66॥

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-

समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥2.70॥

जैसे नाना नदियों से आता जल समुद्र को विचलित न करते हुए ही उसमें समा जाता हैं, वैसे ही अगर सब प्रकार की कामनाएँ अगर व्यक्ति के मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं करती वह परम शान्ति को प्राप्त करता है, भोगों को चाहने वाला और उसके बशीभूत होनेवाला कभी शान्ति नहीं पा सकता.

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥2.71॥

जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त है.

भक्तियोग के अध्याय १४ में भगवान की प्राप्ति के तरीक़े का वर्णन करते हुये कृष्ण ने सर्व कर्मों के फल का त्याग करने से परम शान्ति की प्राप्ति होती है, की बात कही है.हम अपने कर्मों के फलों पर ज़्यादा ध्यान देने के कारण अशान्त रहते हैं. अपने हर काम को पूरी दक्षता, कुशलता से करने पर ही अपना पूरा ध्यान लगाना चाहिये. क्या किसी परीक्षा के बाद उसकी चिन्ता कर हम परिणाम को बदल सकते हैं? यह चिन्ता की आदत एक कमजोरी है जिससे उबरना चाहिये. हमें शान्ति मिलेगी.

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते ।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌ ॥14.12॥

अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है.

अध्याय १८ में सात्विक, राजस, एवं तामसिक सुखों का ज़िक्र है.

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।

अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।

तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥18.36-37॥

अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास में लगा रहता है और जिससे उसके दुःखों का अंत हो जाता है.जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के समान प्रतीत होता है, परन्तु अन्तिम परिणाम अमृत के तुल्य होता है, वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है.

फिर इसी अध्याय में कृष्ण कहते हैं-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥18.62॥

तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को प्राप्त होगा.

कामनाएँ कभी नित्य सुख, शान्ति नहीं दे सकती..क्योंकि हर तरह का भोग एक बहुत ही अस्थायी क्षणिक सुख देती है..और हमारी अशान्ति बढ़ती जाती है…कामनाओं का संयमन कर हम नित्य शान्ति पा सकते हैं….आश्चर्य है हम आज वाणप्रस्थ एवं सन्यास के उम्र में भी कामनाओं से छुटकारा लेने का कोई प्रयास नहीं करते और सदा अशान्त रहते हैं…

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Let Bhagawad Gita Lead us to light

“I find a solace in the Bhagawad Gita….When disappointment stares me in the face and all alone,I see not one ray of light, I go back to the Bhagawad Gita.”- Mahatma Gandhi

“The Gita is a bouquet composed of the beautiful flowers of spiritual truths collected from the Upanishads.” -Swami Vivekananda

After going through Gita many times, I find Bhagawad Gita as the most secular scripture providing solution to all the confusions of a person (represented by Arjuna)through the advices of Krishna(The Supreme Self).It can be accepted whole heatedly by all the countries of world as Yoga has been. My request and appeal to all educated and highly educated professionals and business persons of our country:Particularly,if you are above 50 years of age, please start reading Bhagwad Gita through a book in your mother tongue or English with good commentary. If not whole that has 700 Slokas, please start by reading only Chapter 2 and 18. If that is also too much, please read only chapter 2 that too from 11th Sloka onwards to end, the 73rd sloka.

1.Slokas (11-46) deal with the yoga of knowledge called Gyan-yoga, for example the following sloka,

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥2.22॥

Just as a man cast off his old,wornout clothes and puts on new ones,so also the embodied Self casts off its worn out bodies and enters others which are new.

2.Slokas 47-60 sketch Karma-yoga, the yoga of action,for example,

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥2.47॥

Thy right is to work only, but never to it’s fruits;let the fruit of action be not thy motive, nor let thy attachment be to inaction.

3.Slokas 61-70 deal with Bhakti-yoga, the path of love, example,

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥2.69॥

That which is night to all beings,in that the self-controlled man keeps awake;where all beings are awake, that is the night for the sage(muni)who sees.

4. Slokas 71and72, concern with Sannyasa-yoga, the path of renunciation,example,

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥2.71॥

That man attains peace who,abandoning all desires, moves about without longing,without the sense of ‘I-ness’ and ‘my-ness’.

If you consider the whole of Slokas 11-72 to be too heavy on you, you may attentively just read Slokas 54-72 only that provide the description of a ‘Man of Steady Wisdom’(स्थितप्रज्ञ,sthitaprajna). You can always select the best ones out of these Slokas and read daily till you absorb and may be starting to act on the suggestions. If any one of you are like me in late sixties to eighty and with not much involvement, please focus on Gita for an hour daily preferably early in the morning,with focus for grasping it.I request you all to share my request.It will be a good holy work, punya on your part. Among the commentaries, one by Chinmayananda of Chinmaya Mission or the another one of Eknath Easwaran, are the best ones that I have found.You can yourself research and take the decision.You will not lose anything but get gradually increasing peace of mind and you will enjoy life better, I promise.

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ज्ञान का लक्ष्य -एक सुदृढ़ समाज

हमारे यहाँ राजनेता हिन्दू धर्म को मनुवादी बताते हुये दलितों को धार्मिक ज्ञान से दूर रहने की सलाह देते हैं. आज सबेरे के स्वाध्याय में निम्न श्लोक पढ़ा,जो मनु के अनुसार चारों वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य, शूद्र- का धर्म कहा गया है. ये सभी गुण सभी हिन्दू का स्वधर्म होना चाहिये. हम यहाँ राजनीति क्यों करते हैं? हम हर बच्चे के विकाश काल में घर, स्कूल एवं समाज में उसे यह प्राथमिकता से क्यों नही बताते?सभी हिन्दू इस श्लोक को मूलमंत्र क्यों नहीं बनाते? समाज के अज्ञानी तथाकथित पंडितों के कहने पर हम हर व्यवहार में ऊँच,नीच की भावना ज़ाहिर करते रहते हैं. राजनीतिज्ञ हिन्दू समाज को जिस तरह से तोड़ रहे हैं, जल्द ही न हिन्दू रहेंगे, न देश.

अहिंसा,सत्यम्,अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रिय-निग्रह: ।

एत सामासिकं धर्मम् चातुर्वण्येडबर्वीन् मनु:।।

हिंसा न करना, सत् बोलना, चोरी न करना, पवित्रता का पालन करना, इन्द्रियों पर क़ाबू रखना;- मनु ने चारों वर्णों के लिये थोड़े में यह धर्म कहा है।

इस श्लोक को जीवन में व्यवहार कर हम अपने ,अपने समाज एवं देश को सुखी और सम्पन्न बना सकते हैं. सोचिये…समझिये…..जीवन में उतारिये…

II

आज सबेरे घूमने के लिये घर से निकलते ही अपने ही तल्ले के श्री चटर्जी से भेंट हो गई. उनकी पत्नी को आँख की बड़ी तकलीफ़ है, दिल्ली के जाने माने चक्षु विशेषज्ञ डा. सर्राफ़ की चिकित्सा कर रहे हैं, उम्मीद है. मैंने ढाढ़स दिया और भगवान पर भरोसा रखने को कहा. मैं तो केवल भगवान से प्रार्थना ही कर सकता हूं.और अगर हर जीव में वही अात्मा जो सर्वोपरि है, बिराजमान है तो एक दूसरे के लिये किये प्रार्थना का प्रभाव ज़रूर पड़ना चाहिये. हम इन दो प्राचीन एवं प्रसिद्ध श्लोकों को अपनी प्रात: प्रार्थना में शामिल कर रखे हैं, आप भी शामिल कर सकते हैं-

ना त्वहम् कामये राज्यम्

ना स्वर्ग ना पुनर्भवम् !!!

कामये दुख तप्तानाम्

प्राणिनाम् अार्ति-नाशनम् !!!

अपने लिये न मैं राज्य चाहता हूँ,न स्वर्ग की इच्छा करता हूँ ।मोक्ष भी मैं नहीं चाहता।मैं तो यही चाहता हूँ कि दु:ख से तपे हुये प्राणियों की पीड़ा का नाश हो।

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्याय्येन मार्गेण महीं महीशाः।

गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ।।

प्रजा का कल्याण हो, राज्यकर्त्ता लोग न्याय के मार्ग से पृथ्वी का पालन करें, खेती और ज्ञान-प्रसार के लिये गाय और ब्राह्मणों का सदा भला हो और सब लोग सुखी बने।

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