भागवत पुराण, तुलसीकृत रामचरितमानस और कलिकाल

प्राचीन समय से ही कलियुग को सबसे निकृष्ट युग बताया गया.बहुत ग्रंथों में इस का ज़िक्र है. दो जानता हूं- भागवत पुराण एवं रामचरितमानस मानस.भागवत पुराण के अंश की जानकारी डा. यू.डी.चौबे से मिली. किसी जानकार ब्यक्ति ने उनके पास भेजा था, बाद में मैंने उसे एक ब्लाग में इंटरनेट पर भी देखा. भागवत पुराण का लेखन तुलसीदास के पहले हुआ होगा समय काल का पता नहीं.

भागवत पुराण में कलियुग के हालातों का वर्णन बहुत पहले ही कर दिया था। भागवत पुराण की सबसे पहले भविष्यवाणी थी कि इस दौर में व्यक्ति के अच्छे कुल की पहचान सिर्फ धन के आधार पर ही होगी। धन के लिए वे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों का रक्त बहाने में भी हिचक नहीं महसूस करेंगे। कुछ बानगी देखिये-

2.वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।

धर्मन्याय व्यवस्थायां

कारणं बलमेव हि ॥

*कलयुग में वही व्यक्ति गुणी माना जायेगा जिसके पास ज्यादा धन है. न्याय और कानून सिर्फ एक शक्ति के आधार पे होगा !*

3. दाम्पत्येऽभिरुचि र्हेतुः

मायैव व्यावहारिके ।

स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः

विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥

*कलयुग में स्त्री-पुरुष बिना विवाह के केवल रूचि के अनुसार ही रहेंगे.*

*व्यापार की सफलता के लिए मनुष्य छल करेगा और ब्राह्मण सिर्फ नाम के होंगे.*

4. लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।

अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं

पाण्डित्ये चापलं वचः ॥

*घूस देने वाले व्यक्ति ही न्याय पा सकेंगे और जो धन नहीं खर्च पायेगा उसे न्याय के लिए दर-दर की ठोकरे खानी होंगी. स्वार्थी और चालाक लोगों को कलयुग में विद्वान माना जायेगा.

तुलसीदास की रचनाओं से बचपन से परिचय हो गया दादाजी के चलते और बढ़ता गया समय और उम्र के साथ…..अब जीवन के संध्याकाल में उन्हीं के साथ साथ काफ़ी समय व्यतीत होता है, बाक़ी गीता के साथ…..पर कलिकाल की सठीकता पर कुछ प्रश्न उभरते हैं- उत्तर नहीं मिलते , अगर आप सुधीजन को कुछ ज्ञात हो तो बतायें!

१.क्या तुलसीदास भविष्यद्रष्टा थे और भविष्य को अपने दिव्य दृष्टि से देख सकते थे जिसकी उन्होंने चर्चा की है विस्तार के साथ रामचरितमानस के उत्तर कांड में काकभुसुन्डी के शब्दों में की है?

२.क्याआम कवि की तरह तुलसीदास अपने समय के समाज में अर्थात् १५-१६वीं सदी के भारत में घटित हो रहे चीज़ों, आहार व्यवहार का वर्णन किया है?

३. क्या उस समय ही बदलाव आ रहा था समाज में जिसकी झलक देख तुलसीदास कलि के समय उसके विस्तार की सम्भावना समझ लिख डाले?

कृपया इसे महत्व दीजिये. कुछ उदाहरण उनके कुछ कलि काल के कल्पना से….

१.’नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥’

२.’कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥

नहिं तोष बिचार न सीतलता।’

कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है।

३.’सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।।…..

ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥’

पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता।जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए।

५.’नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ।।’

राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं।

६. ‘जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥”

जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥

७. ‘जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।

मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥’

जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं।

८. ‘नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं।।’

सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं।

९ ‘हरइ सिष्य धन सोक न हरई।’गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता ।

१०.’बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥

तपसी धनवंत दरिद्र गृही।’

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र।

पर दो बातें उन भविष्यवाणियों में ग़लत भी लगती हैं. दोनों महापुरूषों के अनुसार १. ब्यक्ति की आयु बहुत कम होजायेगी. आज औसतन आयु सत्तर वर्ष के लगभग है. २. हरदम अकाल पड़ता रहेगा और इससे बहुतों की मृत्यु होगी. अकाल अब तो पड़ते नहीं और वैसी स्थिति से निबटने के लिये सारा संसार सहायक बनने को तैयार है. कुछ भी हो सोचने के लिये बाध्य तो करतीं हैं उन महापुरूषों की भविष्यवाणियां.

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HAL on Testbench

HAL , Hindustan Aeronautical Ltd., is having a huge national responsibility for the defence of the country as well as present world our capability by getting into export business significantly. Here are different tasks:

1. HAL must complete the 123 Tejas multi-role fighters MK-1A already on order as soon as possible. Only 9 of Tejas fighters were delivered by March 31, 2018.How much time will be taken by HAL to complete the rest 114 fighters? If HAL raises its capacity in 2019-20 by 12, and produces thereafter 16 in 2020-21. Even with 24 fighters thereafter per annum, HAL will take 3 years 7 months. It means HAL can complete the task by the middle of 2025.

2. IAF has ordered another 201 fighters too. However, this is contingent on Hindustan Aeronautics Limited (HAL) succeeds in bringing the much improved Tejas Mk2 to fruition. Interestingly, the total time for Tejas MK-2 production to go on the same production line will get almost six years to complete the task.

3. In my opinion, AMCA, the fifth generation fighter that DRDO , ADA and HAL with all other supports are developing and have done a considerable work already, could have been made ready. Interestingly, as per media on May 18, 2018, “ The Aeronautical Development Agency, which had conceived and designed the Light Combat Aircraft (LCA) Tejas, has set the ball rolling for building the next generation defence aircraft, the Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA), by extending an invitation to private players in Coimbatore to build a technology demonstrator. https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/tamil-nadu-to-build-indias-next-generation-defence-aircraft/articleshow/64217410.cms

4. Even though HAL’s existing facilities will continue with production of MK-1 and switch over to MK-2 that has off late has been designated as medium weight fighter (https://defenceupdate.in/post-upgradation-tejas-mark-2-to-become-a-medium-weight-fighter0/ ), it will also have a version to be be used by Navy after necessary modifications.

5. MK-2 will have high thrust engines that will be GE-414 engine. It is expected to have a maximum take off weight of 17.5 tonnes with an improvement of over 85% in weapons and payload carrying capacity to that of Tejas, LCA MK-1 having a max.take off weight of 13.5 tonnes.HAL Kaveri is also under upgradation. It is being done through foreign design companies. HAL, ADA, DRDO, GTRE and other agencies are also trying to upgrade the Kaveri engine to the best specification to suit all applications.

6. India must treat LCA as the smallest smart fighter just like the small and compact cars for which India has become a global manufacturing hub. LCAs have great export potential if HAL can build up the scale fast and provide the best of features such as ‘fly by light’ and globally competing superior quality.

7. HAL also has designed, developed, and integrate military helicopters too. The new LCH and Rudra are pretty good contributions that well-accepted by the IAF and even Army. The good part is HAL has its Engines also ingeniously manufactured. HAL must scale up its R&D and production rates. It must export with confidence for performance to be reliable.

8. HAL must outsource considerable and develop the ecosystem for fighters and helicopters of size and features to meet first the requirements of defence forces.

9. HAL can be the torch-bearer of defence manufacturing in its area so that the dependence on imports of the machines and its spare parts can be minimised.

10. I wish the Importmania of ministry and defence forces gets removed.

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Indigenous Defence Production

1.

How Many Tejas can HAL produce per Annum? Here the highlights based on the media interviews of Chairman, CEO of HAL:

1. Since January 2015, HAL has delivered just eight Tejas aircraft to the Air Force, perhaps nine-eleven by March 31, 2018.

2. As reported, an additional investment of Rs 1,231 crore (US$192 million) was sanctioned for enhancing capacity,

3. The Tejas line is projected to build 10 fighters in 2018-19; it may be more depending on supply speed of the vendors and that many may be additional production and

4. 16 Tejas Mark 1As each year from 2019-20 onwards.

5. Production of Tejas can be increased to 24 aircraft or more per year by 2021. While two production lines are already set up, the third one has been approved.

6. After completing 123 numbers of Mark IA, the line is expected to build the Tejas Mark II fighter, an advanced variant of the Tejas with a more powerful General Electric F-414 engine and upgraded avionics.

7. HAL has created five “Tier-1” suppliers that each builds a part of the Tejas.

8. The front fuselage is supplied by Dynamatic Technologies, Bengaluru.

9. The centre fuselage by VEM Technologies, Hyderabad.

10. The rear fuselage is to be provided by Alpha Tocol, Bengaluru.

11. And finally the wings are to be supplied by Larsen & Toubro, Coimbatore.

12. The tail fin and rudder by National Aerospace Laboratory and Tata Advanced Materials.

13.Some 80 private firms are part of the outsourcing. Each of the above Tier-1 suppliers sources components and sub-assemblies from lower-order Tier-2 and Tier-3 suppliers, creating an aerospace industry around the Tejas.

14.HAL is planning to eventually outsource 69 per cent of the production of Tejas structural modules, with just 31 per cent of the work done in-house – consisting mainly of assembly and equipping work.

It is also in news that MK-II and AMCA, the fifth generation fighter are well on path line of development for prototype test flights.

https://timesofindia.indiatimes.com/india/private-companies-to-carry-out-69-of-production-work-for-tejas/articleshow/61363473.cms

2

There are clearly people in the defence ministry and defence forces who are getting prompted by the famous weapon manufacturing foreign lobby to denounce the performance of Tejas fighter with their statesments on comparative items that suit them. All imports have many attractions. Leave beside the under table gratification or through some safer personal accounts, consider the amount of perks such as the number of persons visiting the importing country and the manufacturing facility or related establishments with foreign living allowances plus the facilitations and gifts by the guest.

3

FICV- Why Wait for Foreign Partners?

The Indian Army’s infantry combat vehicles is using the Russian-designed BMP (‘Sarath’ BMP-II) series which are being made by Ordnance Factory Board (OFB) since its induction in 1980 with approximately, 1900 ICVs BMP-2/2K of them in service at present. With much of building, operating and mentaining happening through OFB, why couldn’t OFB itself manufacture a 21st century FICV incorporating the latest technologies from collaborative effort of Indian vendors of different majo systems? It is certainly not a rocket science with huge engineering and electronics talent in design and developing including AI, 3D printers etc from BEL and other IT companies. Companies in private sector such as Tata Motors, Mahindra, and L&T can certainly design, develop, manufacture even the globally best FICVs. Indian Army can order for manufacturing the 5-10 numbers from each of them with DRDO as controlling agency for the cutting edge technologies and army requirements. After all field tests, if accepted, the final order can go to the two best or depending on the total requirements equally to all the three. Why should the defence ministry and India Army go on waiting and searching for the best foreign partners and in the process annoying these big powers who can’t be satisfied with small gain from the deal.Let the country stop depending on Russia, US and Israel for everything, when our own people can do it. Sometimes I wonder if the government really intends to finish its dependence on import and its all related troubles such as spare parts and servicing.https://defenceupdate.in/future-strike-indias-future-infantry-combat-vehicle/

Note:

”The FICV will be a tracked, lightly armoured, off-road vehicle that can zoom over sand dunes or across a river. Operated by a three-man crew — a commander, a driver and a gunner — it will also carry seven fully equipped infantrymen into battle protecting them while they are aboard from bullets and shrapnel. The FICV’s strike power — an anti-tank missile; a rapid-fire cannon; a 7.62 mm machine gun; and a grenade launcher — will enable it to destroy enemy tanks, ICVs, missile carriers, attack helicopters and infantry.It will transport infantry soldiers into the battlefield behind tanks.The final weight will have be less than 20-25 tons for quick transportation to the critical locations.”

4

Who can get defence production and vendor cos. running three shifts -HAL, BEL, L&T, Cochin Shipyard, Tata, Bharat Forge , Dynamatic, exporting and cutting 50% of imports? Should u not come out of the jungles of files, notes, procedures, rules….Make India proud. Make in In for who pay. Use our talents caged in 1000 plus Foreign Research and development centres in India. Invite , respect best NRIs in the areas.

5

As reported, ‘American aerospace giant Boeing announced its tie-up with Hindustan Aeronautics Ltd and Mahindra Defence Systems to manufacture F/A-18 Super Hornet fighter jets in India.’ The joint venture will have a dedicated new manufacturing plant (Pratyush Kumar, President, Boeing India; T Suvarna Raju, CMD, Hindustan Aeronautics Ltd; and SP Shukla, Group President, Aerospace and Defence, Mahindra Group, participated in MoU signing ceremony.) Boeing wishes to cash on Indian Air Force immediate requirements of 110 fighters jets worth a $15-billion deal. And the Indian Navy has also asked for sanction to purchase 57 multi-role carrier borne fighters (MRCBF) for around $12 billion. HAL is well in the business with considerable amount of competency to build warplanes with Tejas now in serial production with three production lines. It has a good aircraft design centre too with DRDO as mentor. Mahindra Aerospace and Defence has experience of smaller civil planes and aero components’ export. The expertise of both the Indian companies will facilitate to drastically bring down the cost of each F/A-18. It is expected to make the preference to tilt towards Boeing offer against that of the Russians readying to offer the advanced MiG-35 which is at a lower cost compared to others. As such, Super Hornet is claimed as the most advanced and least expensive aircraft per flight hour of its kind. The F/A-1.8 Super Hornet will deliver on India’s need for a carrier and land based multi-role fighter. The Super Hornet will have not only a low acquisition cost, but it also costs less per flight hour to operate than any other tactical aircraft in U.S. forces inventory. And with a plan for constant innovation, the F/A-i8 Super Hornet, as claimed, outpace threats, bolster defence capabilities and make India stronger for decades to come.https://youtu.be/knWxCcvzn3g On the other hand, Lockheed Martin has also expressed its readiness to shift its F-16 fighter aircraft manufacturing unit to India — and the US government, according to the manufacturer, will allow it to do so. Lockheed , as bonus, is also prepared to transfer the technology of its third generation anti-armour Javelin guided missile system to India for its future manufacture.

My comments: HAL should not join the venture that Boeing is looking for a long time. HAL perhaps already exports components to Boeing. Instead, HAL must focus fully on design, development and manufacturing of its own fighters and helicopters of all types and requirements for defence as well as civil uses hiving off its other secondary divisions to private companies in coming years. Idea must be to become a global defence manufacturing company. It must also have a separate independent unit to design, develop, manufacture the engines too for all its planes and helicopters and application pulling the best Indian talents working anywhere in the world in next 5-10 years under the mentor ship of DRDO.

Instead of HAL, Indian Government must facilitate Boeing for the tie up with Tata Group for Hornet-18. Boeing has already joint venture with Tata group (TASL) for components which also has collaborated with GE for engine components and assembly. It will be in interest for the country to have at least two fully integrated plants -one in public and another in private sector competing with each other, each aiming at exporting up to 30% to the friendly countries around.

“.””……………………..

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विचारों के जंगल में-१०

१.४.२०१८ अपने को सवर्ण हिन्दू कहनेवालों को ग्रामीण मानसिकता से निकलना चाहिये और सभ्य बनने की चेष्टा करनी चाहिये. आज की लड़ाई शिक्षा व विभिन्न हुनरों में सर्वोत्तम निकलने की है. वह बाप के पैसे एवं ज़मीन से संम्भव नहीं होगा. यह ओछी हिंसक मानसिकता उनकी शिक्षा एवं हुनर के नये आयामों को पंहुचने में कामयाबी या नये नये ब्यवसायों में सभी वर्ग के लोगों के आ जाने के कारण बढ़ते प्रतिद्वदिंता के कारण हो रही है. कुछ बाहुबलियों की सह पा या बहकाने के कारण इन्हीं श्रेणी के बेकार और निकम्मे लफ़ंगे दलितों एवं अल्पसंख्यकों की कमज़ोरी का फ़ायदा उठा रहें हैं, और उन पर बल प्रयोग कर समाज की शान्ति भंग करते हैं और सरकार को भी नीचा दिखाते हैं. मीडिया इन समाचारों को बढ़ा चढ़ा कर लिख या दिखा अपना बल प्रदर्शन कर सरकारों को गिराने और बनाने का बल दिखा रहा है. आज के हर माँ बाप से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे अपने बच्चों सही रास्ता दिखाये, जो आज पहली बार सम्भव है. आज के दिन पढ़ाई और हुनर में मिहनत कर कीर्तिमान स्थापित करने वाले किसी बच्चे दुनिया का हर द्वार खुला है समृद्ध एवं सम्पन्न होने का. पैसे की कमी के कारण आज कोई बच्चा पढ़ाई से बंचित नहीं रह सकता. सरकार, समाज सभी ईमानदार, परिश्रमी लड़कों को पहले समाचार मिलने से सहायता करने को तैयार है. लफंगई का रास्ता छोड़िये, भविष्य आपकी आगवानी में आरती थाल सजाये खड़ा है, उसी रास्ते चलिये. मैं ७९ साल की सारी अनुभवों को संजो यह कह रहा हूँ……कभी देर नहीं होती, आगे बढ़िये……

२७.३.२०१८

लिंगायत का हिन्दूओं से अलगाव, कितने अलगावों की शुरूआत:

मुझे बहुत दुख हुआ जान कि एक राजनीतिक पार्टी द्वारा हिन्दू धर्म के लोगों को बाँटने के प्रयास की शुरूआत से-कर्नाटका के लिंगायतों को अन्य धर्म का बता अल्पसंख्यक बना दिया कुछ बहके लोगों के दबाब में चुनाव में फ़ायदे के लिये सोची समझी नीति के अनुसार. यह राजनीतिक दल हिन्दू धर्म की बढ़ती शक्ति के कारण इस हिन्दू के पंथ को अल्पसंख्यक का दर्जा दे मुख्य धारा से अलग करना चाहता है. लिंगायत के प्रवर्तक वासवा ने जाति भेद को मिटाने का काम किया शिव को अपना इष्टदेव बना. शंकराचार्य से विवेकानन्द तक के बहुत संतों एवं महापुरूषों ने जाति प्रथा को मिटाना चाहा,पर सफल नहीं हुये. बहुत संतों के मरने के बाद उनके कुछ स्वार्थी शिष्यों ने अलग ही पंथ बना उसे अलग धर्म का दर्जा देने की कोशिश करते रहे. पर कुछ समन्वयी संतों के कारण हिन्दू एक बने रहे, विदेशी आतताइयों एवं देशी विश्वासघाती ब्यक्तियों के बहूत कोशिश के बावजूद. उनमें एक रहे लोकनायक रामचरित मानस रचयिता तुलसीदास. मैं तुलसीदास के समय में फैले सामाजिक समस्याओं की बात कर रहा हूँ. तत्कालीन समाज में शैवों, वैष्णवों और शाक्तों – तीनों में बहुत गहरा परस्पर विरोध था। इस ऐसी कठिन अवस्था से समाज में एकता लाने के लिये बहुत सारे भक्तिकाल के संतों ने बहुत मिहनत किया. तुलसीदास और उनकी कृतियाँ इसकी द्योतक हैं. तुलसीदास ने वैष्णवों के धर्म में एक ब्यापकता दी.उससे समय के अन्तराल से उक्त तीनों संप्रदायवादियों के बिभिन्नत्व को एक कर दिया। देखिये मानस में तुलसी के इस प्रयत्न की झाँकी, राम कहते हैं-

“शिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहिं भावा॥

संकर विमुख भगति चह मोरि। सो नारकीय मूढ़ मति थोरी॥”

इसी प्रकार उन्होंने वैष्णवों और शाक्त के सामंजस्य को बढ़ाया.

“नहिं तब आदि मध्य अवसाना।अमित प्रभाव बेद नहिं जाना।

भव-भव विभव पराभव कारिनि। विश्व विमोहनि स्दबस बिहारिनि॥”

…श्रुति सेतुपालक राम तुम जगदीश माया जानकी। जो सृजति जग , पालती, हरती रूख पाई कृपानिधान की….

एक और तत्कालीन मुख्य प्रचलित पुष्टिमार्ग(भक्ति के क्षेत्र में महापुभु श्रीवल्‍लभाचार्य जी का साधन मार्ग पुष्टिमार्ग) के माननेवालों को ध्येय कर कहा और इससे बढ़िया ढंग से क्या कहा जा सकता है-

“सोइ जानइ जेहु देहु जनाई। जानत तुमहि होइ जाई॥

तुमरिहि कृपा तुमहिं रघुनंदन। जानहि भगत-भगत उर चंदन॥”

साथ ही उस युग में सगुण और निर्गुण उपासकों में विरोध था। जहाँ सगुण धर्म में आचार-विचारों का महत्त्व तथा भक्ति पर बल दिया जाता था वहीं दूसरी ओर निर्गुण संत साधकों ने धर्म को अत्यंत सस्ता बना दिया था।अद्वैतवाद की चर्चा आम होती जा रही थी; किंतु उनके ज्ञान की कोरी कथनी में भावगुढ़ता एवं चिंतन का अभाव था। तुलसीदास ने ज्ञान और भक्ति के विरोध को मिटाकर वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी- “अगुनहिं सगुनहिं कछु भेदा। कहहिं संत पुरान बुधवेदा॥

अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सी होई॥”

ज्ञान भी मान्य है किंतु भक्ति की अवहेलना करके नहीं। ठीक इसी प्रकार भक्ति का भी ज्ञान से विरोध नहीं है। दोनों में केवल दृष्टिकोण का थोड़ा-सा अंतर है।

बंगाल के राम कथा लिखने वाले कृतिवास ने राम से शक्ति पूजा करवाई रावण से जीतने के लिये , उसे ही आधुनिक काल में निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ में लिखा. सदियों के गायन, मंचन, प्रवचन से हिन्दू धर्म एक हो पाया. रामकृष्ण ने कहा ये सब हिन्दू धर्म के अंश है- जतो मत, ततो पंथ……आज राजनीतिक दल को उसे बाँटने का प्रयास जन शक्ति को बरगला धर्म को बाँटने ख़तरनाक खेल है जिसका कोई अन्त नहीं होगा केवल देश के बिघटन को छोड़, लोग समझ नहीं पा रहें हैं, विद्वान भी नहीं. इसका घोर बिरोध होना चाहिये….लोगों को जागना चाहिये, हिन्दूधर्म की समन्वय के दर्शन को अबाध चलते रहने देना चाहिये….कर्नाटका की भूमि जहाँ विज्ञान, तकनीकी क्षेत्र में नेतृत्व दे रहा है, यहाँ भी देना चाहिये।

Xxxxxxx

देखिये लंकाकांड के प्रारम्भिक तीन श्लोक तुलसीदास जी के राम चरित मानस से-

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं

योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌।

मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं

वंदे कंदावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥ 1॥

कामदेव के शत्रु शिव के सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथी के लिए सिंह के समान, योगियों के स्वामी (योगीश्वर), ज्ञान के द्वारा जानने योग्य, गुणों की निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों के वध में तत्पर, ब्राह्मणवृंद के एकमात्र देवता (रक्षक), जलवाले मेघ के समान सुंदर श्याम, कमल के से नेत्रवाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूप में परमदेव राम की मैं वंदना करता हूँ॥ 1॥

शंखेन्द्वाभमतीवसुंदरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं

कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्‌।

काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं

नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कंदर्पहं शंकरम्‌॥ 2॥

शंख और चंद्रमा की-सी कांति के अत्यंत सुंदर शरीरवाले, व्याघ्रचर्म के वस्त्रवाले, काल के समान (अथवा काले रंग के) भयानक सर्पों का भूषण धारण करनेवाले, गंगा और चंद्रमा के प्रेमी, काशीपति, कलियुग के पाप समूह का नाश करनेवाले, कल्याण के कल्पवृक्ष, गुणों के निधान और कामदेव को भस्म करनेवाले, पार्वती पति वंदनीय शंकर को मैं नमस्कार करता हूँ॥ 2॥

यो ददाति सतां शंभुः कैवल्यमपि दुर्लभम्‌।

खलानां दंडकृद्योऽसौ शंकरः शं तनोतु मे॥ 3॥

जो सत पुरुषों को अत्यंत दुर्लभ कैवल्यमुक्ति तक दे डालते हैं और जो दुष्टों को दंड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी शंभु मेरे कल्याण का विस्तार करें॥ 3॥

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विचारों के जंगल में-९

पता नहीं कुछ पढ़े लिखे लोगों केो पकौड़ेवाले या पानवाले इतने हीन क्यों लगते हैं. इसको एक काम या पेशेवर तरीके से करने में छोटा काम क्यों मानते हैं. मैं ज़िन्दगीभर आई. आई. टी खडगपुर से पास कर लोहे लकडवाला कहलाया जब तक जेनेरल मैनेजर नहीं बन गया. अब एक कलकत्ता के पार्क स्ट्रीट के पार्क हॉटेल के नीचे पान की दूकान की बात बताता हूँ. पार्क हॉटेल के मालिक लड़के के दिमाग़ में आया कि वह पान की दूकान ख़रीद ले जो उसे मुख्य दरवाज़े के पास आँख की किरकिरी लगती थी. बाप के मना करने के बावजूद वह पानवाले के पास जा उसकी दूकान ख़रीदने की बात कही. पहले तो पानवाला चुप एवं शान्त रहा , पर मालिक के बेटे के बार बार ख़रीदने की किसी दाम पर ज़िद करते रहने पर, वह बडी शान्त भाव से कहा, ‘ बेटा, मैं तो यह दूकान नहीं बेचूँगा, पर अगर आप हॉटेल बेंचना चाहो तो बताओ, मैं अभी कैस दे देता हूँ, तुम हॉटेल छोड़ दो.’ लडका हक्काबक्का रह गया और बाप के पास लौट आया और बाप को कहानी बताई. उसने शान्त भाव से ही कहा, ‘ किसी के भेषभूषा एवं पेशे से उसकी औक़ात मत मापो’. बहुत पानवाले, रब्बडीवाले, चायवालों की छोटी दूकान के आगे गाड़ियों की क़तार लगी रहती है. वैसे गाँव से भाग एक लड़का एक इंट जोड़नेवाले के साथ काम सीख मैसन बन गया, फिर ठीक्केदार और बिल्डर और एक दिन देश का सबसे धनी कम्पनी का मालिक. स्वब्यवसाय की दुनिया बहुत अजीब होती है और आदमी अगर काम कर सच्ची कमाई करना चाहता है तो कोई काम बडा छोटा नहीं है.आज की पढ़ाई जो कोचिंग सेंटर तक सिमटकर रह गई है, परीक्षा की सफलता तो दे सकती है पर कोई जरूरी नहीं कि ज़िन्दगी में भी सफल बनाये.हुनर सीखाने से तो पढ़ाई का मतलब ही नहीं रह गया है. यहाँ तक कि उस पढ़ाई का क्या मतलब जब एक स्नातक एक साधारण निवेदन पत्र नहीं लिख सकता, न कोई किसी विषय की किताब पढ़ कुछ समझ सकता है. एक बार सोचिये तो कि ग़लती क्या केवल स्कूल की है? आज ही एक ख़बर आई है कि यू. पी. वोर्ड में १५० स्कूलों के एक भी बच्चे पास नहीं हुये. कारण है इस बार परीक्षा में कोई नक़ल नहीं सम्भव हो पाया. क्या राजनीतिज्ञ भी कुछ सोचने को मजबूर होंगे. क्या अपने दौरों में स्कूलों में नियमित: जाकर विद्यार्थियों एवं अध्यापकों से बात करते रहने का प्रण लेंगे?क्या गाँवों के स्कूलों में विशेषकर खेती बारी की ७-८वीं कक्षा वैकल्पिक पढ़ाई की ब्यवस्था की जायेगी या कोई और हुनर सीखाने का काम करना जरूरी है.

बलात्कार का अभिशाप

पिछले दिनों कुछ समय से मीडिया रिपोर्टस् एवं समाचार के टी वी चैनलों को खोलते ही लगता है, देश में बलात्कारों की बाढ़ आ गई है. यह दयनीय और शर्मनाक सामयिक समाजिक समस्या है. मोदी शायद ठीक हीं कहते हैं लड़कियों पर हर माँ बाप कड़ी निगाह रखें हैं और ‘यह न करो , वह न करो से’ का अंकुश चलाते रहे हैं, पर लड़कों को कोई शायद ही ऐसी निगरानी में रखता है या नसीहत देता है. वह कहाँ जाता है, क्या करता है- के बारे में शायद ही कोई माँ बाप पूछताछ करते हैं. आख़िर यह बलात्कार की घटनायें क्यों यह रूप ले रही है, क्या यह पुलिस की लापरवाही या ढिलाई का नतीजा है? क्या पुलिस चाहने पर भी रोक सकती है बलात्कारों को, अगर उनकी संख्या दुगनी या तीनगुनी कर दी जाये? देश की केन्द्रीय सरकार के अनुरोध पर राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश को मान्यता दे दी जिसमें बारह साल से कम उम्र के बच्च्चों के यौन शोषण के अपराधी को मृत्युदंड की ब्यवस्था की गई है.बलात्कार के केशों में ज़मानत ख़त्म कर दी गई है.और दंडों को भी बढ़ा दिया गया है या सख़्त कर दिया गया है.इस कड़ाई की माँग जन साधारण से थी. क्या सब पार्टियाँ यह निश्चित आश्वासन देंगीं कि बलात्कार या स्त्री संत्रास के किसी मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगीं और पुलिस को सख़्ती से काम करने देंगी, उनके ज़रूरतों को पूरा करेंगी.बलात्कार के सभी घिनौना वारदात एक समाजिक समस्या है जो हर व्यक्ति के पारिवारिक संस्कार, जीवन शैली, अच्छे चरित्र और सामाजिक मर्यादा पर निर्भर है. बढ़ते बच्चों की सठीक देखरेख,चारित्रिक शिक्षा का भार परिवार, शिक्षक एवं समाज पर है. अगर सभी अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ लें एवं सरकार और पुलिस पर सब ज़िम्मेदारी थोप दे तो इससे बड़ी ग़लती कोई न होगी. पुलिस इन लाखों व्रतों को रोकने में कभी सक्षम नहीं होगी. यह सामाजिक रोग पुराना है और कुछ इसे ही कलियुग की निशानी मानते हैं. लड़कियों को भी अपने को सशक्त बनाने में गौरव महसूस करना चाहिये, अबला बन कुछ नहीं हो सकता. कहां गया वह समाज जहाँ हम सभी लड़कियों, महिलाओं को बहन, दीदी, भाभी, चाची, माम, फुआ कहते थे मुँह से नहीं मन से. १५वीं सदी में लोकनायक भक्तकवि तुलसीदास जी ने कलिकाल के बारे में लिखे हैं मानस के उत्तर कांड में उसके पहले उन्होंने रामराज्य की बात कही है- “…..कलिकाल बिहाल किए मनुजा।नहीं मानत क्वौ अनुजा तनुजा”…. . हम क्या चाहते हैं कलि को चरितार्थ करना या रामराज्य को…”सब नर करहिं परस्पर परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।”.

९.४.२०१८ पता नहीं राहुल गांधी को कौन दिशानिर्देश देता है हर चीज़ का बिरोध १४ साल से वे यही कर रहे हैं. मनमोहन का सरकारी ऑर्डनैन्स फाड़ना, जातिवाद करने का सँभल प्रयोग गुजरात चुनाव में किये हार्दिक पटेल, नेमानी, राठौर के तीन जातियों का, मुस्लिम की टोपी छोड़ अब जनेऊधारी बन गये मठ , मन्दिर घूमते हैं पैसेवालों के पीछे पीछे अग़ल बग़ल पुजारियों के साथ फोटों छपवाते हैं, हिन्दूओं की एकता तोड़ते हैं लिंगायत को अल्पसंख्यक बता कर , यह कभी वरदास्त नहीं किया जाना चाहिये. दलितों को पीड़ित करनेवाले उन्हीं के दल के हैं देखिये दोगलागिरी फ़ोटो में अपने सेनापतियों के साथ, हाँ एक काम तो उन्हें ज़रूर करना चाहिये एक उत्तर द्वारा पिछले ७० सालों में जब वे पैदा भी नहीं तब से और विशेषकर पिछले१३-१४ साल में अपने दोनों सांसद क्षेत्रों में वहाँ के शतप्रतिशत दलितों को वे शिक्षित क्यों न कर सके, कोई सम्मानित जीवनयापन का हुनर क्यों नहीं सिखवा सके, पूरे देश के दलितों की बात वे क्यों करते हैं, ३+ साल में वे मोदी से क्यों उम्मीद करते हैं कि वे सदियों की रूढ़ियों को तोड़ सकने में समर्थ हों, एक पागल को भी यह बात समझ में आना चाहिये, पर कांग्रेस के उनके चमच्चों कैसे आ सकती है? अभी वे सबके प्रति मुँह का दुख दिखलाता हैं, वे कुछ न कर पाये हैं , न कर पायेंगे…केवल माहौल को और बिगाड़ रहे हैं, देश के लफ़ंगों को सह दे रहे हैं, बन्द करें प्रजातंत्र के नाम पर यह बकवास और कहीं भी कुछ काम तो करें…..एक ग़लत बात को सैकड़ों बार बोल कर भोट लिया जा सकता है पर लोगों को स्थायी लाभ नहीं दिया जा सकता, क़र्ज़ माफ़ कर के देश की अर्थनीति को तो बिगाड़ा जा सकता है, पर रोज़गार नहीं बढ़ाया सकता, उन्हीं की राह पर चल यह सरकार आज संकट में पड़ीं है, बड़े छोटे ब्यवसायिओं को उन्होंने उनके साथी अखिलेश मायावती ने सब छूट दीं मोदी ने नहीं, चिट फंडस् , मकान निर्माताओं ने उन्हीं के काल में मध्य वर्ग को लूटना चालू किया और करते रहे, जॉब देने के नाम पर जौहरीरियों ने एक लाख के ऊपर पैन न. देने के नियम का बिरोध किया, नोट बन्दी, जी. एस. टी को लागू करने का काम सब तकलीफ़ों को जानते हुये मोदी कर सकते थे, तीन तलाक़, वहुविवाह , या भ्रूण हत्या पर निर्णय लेने की शक्ति भी मोदी में ही थी. राहुल को किसान किस पेशे को कहते हैं मालूम नहीं, मोदी ही किसानों की आमदनी दूगना करवा सकते हैं, खेती की उत्पादकता बढ़ा कर, लागत कम करके, राहुल उन सबको न जानते हैं, न जानने की कोशिश कर सकते हैं, अपनी जवानी से एक ख़ास वर्ग के महिलाओं में ज़रूर लोकप्रिय हो सकते हैं….मैं अगर ग़लत हो तो आइये और बहस करिये आमने सामने…पर उसके लिये बुद्धि और प्रतिभा चाहिये……लगातार २० घंटे काम करने की ताक़त चाहिये…..

२.४.२०१८ कल मुझे लगा सारा देश जल रहा है. गन्दी स्वार्थी राजनीति देश के प्रजातंत्र को जला कर ही दम लेगी? क्या चर्चिल की भविष्यवाणी सच कर देंगे ग़ुलामी की आदत पाले भारतीय. जिस जाति के विषय को मैं और सभी समाज के सत्पुरुष मिटा देना चाहते हैं, पर हर जगह एक विकृत विकार के कुछ ब्यक्ति हैं जिन्हें जनता नेता कहती हैवे सब फ़िल्मों में दिखाये हथकंडों का प्रयोग कर रहे हैं और वैमनस्य फैला रहे हैं उद्देश्य केवल एक है चुनाव जीतना या जीतवाना. आज फिर कुछ ऐसे लोग समाज और देश को देश बिरोधी तत्वों, लोगों की अशिक्षा, ग़लत वयानी का सहारा ले अफ़वाहें फैला अशान्ति फैला रहे हैं. न वे ख़ुद देश के संविंधान, क़ानून और नियमों का पालन करते हैं, न आम जनता को करने देना चाहते हैं. देश के ऐतिहासिक सफलता इनका दिल दुखाती है, केवल इसलिये कि दस्तों के शासन के बाद वे कुछ न पाये थे. तकलीफ़ तब होता है जब संविधान के स्तंभों में दीमक लग गया है. न्यायपालिका की बात मानी नहीं जाती, सरकार को हर क़दम पर ग़लत ठहराया जाता है, स्वच्छता और बेटी पढ़ाओ की तरह की चीज़ों का भी बिरोध होता है, न शराब बन्दी की जा सकती है, न अव्यस्क बच्चों की शादियाँ, न तिलक, न तल्लाक , न बहु बिबाह, न जनसंख्या नियंत्रण. पढ़ना नहीं है , नक़ल की आज़ादी चाहिये, कुछ जानते नहीं न पढ़ना, न लिखना, न कोई हुनर पर सरकार काम दे. कुछ काम न करके परोमोसन चाहिये, सबको संरक्षण चाहिये चाहे जितनी कमाई हो खेत हो या पोज़ीशन हो. पैदावार का दाम चाहिये पर कैसे पैदावार की उत्पादकता बढ़ाई जाये, उस बारे में सीखेंगे, जानना चाहेंगे. सरकारी बैंक से क़र्ज़ा लिये हैं यह क्यों लौटाना ज़रूरी है, टैक्स आजतक नहीं दिये अब क्यों, बिजली पानी आजतक चुराया उसका रेंटल क्यों दें, परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हो गये तो रास्ते पर बिरोध, तैयारी में नहीं लगेंगे….माँ बाप भी बिरोध में साथ, उनके बच्चों की क्या ग़लती, जैसे लीक कभी हुआ ही न हो और लोग लीक करनेवालों को जानते नहीं…..एक नया तरीक़ा शायद पहली बार एक महिला मुख्य मंत्री उठाई है…..१५ वें फिनांन्स कमीशन का बिरोध सारे देश में करेंगी. संसद नहीं चलने देंगी. एक दिन में भी संसद में उपस्थित हो बिना कोई काम किये , न औरों को करने देने के बावजूद लाखों में कमाना ठीक है……कबतक चलेगा…..एक बनाम सब की लड़ाई तकलीफ़ देती है….और ये पार्टियाँ कौन हैं अधिकांश पारिवारिक फ़ायदे के लिये बनीं, चलीं, साधारण लोगों को बेवक़ूफ़ बनाती रहीं ……

समझ में नहीं आता कि सरकारी या ग़ैर सरकारी संस्था किसी फ़ार्म में जाति/ धर्म , विशेषकर जाति के विवरण को देने को अनिवार्य क्यों रखती है. यह हमारी इच्छा पर हो नी चाहिये कि हम धर्म या जाति लिखें या नहीं. मैं अपनी चाहे तो लिखूँ या नहीं. वैसे भी हममें शायद धर्म के नाम पर खरे उतरे. जातियों का नाम तो पिता / माँ की जाति पर चलता आ रहा है जो जीवनयापन के पेशे से ताल्लुक़ रखता था. आज २१वीं सदी के प्रथम चरण में बहुत सी जातियाँ तो मर गईं है, फिर आने वाले दिनों में वे और भी बदल जायेगा

मुझे कोई तो बतायेगा संरक्षण कितने साल चलेगा ७० साल हुये या ७००. या जब तक सभी बाक़ी निम्न तम १% आय में न आ जायें..वैसे यह बहुत शीघ्र हो जायेगा, अगर कबतक देश बचा रह गया..एक सीमा तो होनी चाहिये….

संरक्षण एक संक्रामक रोग है , हम समय रहते चुक गये, किसी को इसके हानिकारक पक्ष का ख़्याल न था, हरिजन एवं बनजन के बाद आये अन्य पिछड़े वर्ग जो सुरसा के मुँह की तरह बढ़ते गये झूठे प्रमाण पत्र द्वारा, १५ साल के लिये बना क़ानून आज सत्तर साल तक चलता रहा है और ७०० साल बाद भी इस धरती पर कोई लाल पैदा न होगा जो उसे समाप्त करने में सक्षम हो, और देश को गर्त में जाने से रोक सके…अब तो टरम्फ ने भी रोक लगा दी , कहाँ जायें भागकर …

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विचारों के जंगल में-८

२५.३.२०१८

त्रिभुवन जी, बहुत अच्छा लिखते हैं, लिखते रहिये . मुझे लगता है यही कारण है कि अलग अलग क्षेत्रों के जिसमें दक्षिण पूर्व एसिया के देश भी है, बहुत संतों ने रामायण की कथा को अपनी क्षैत्रिक बातों का ख्याल कर लिखा. संयुक्त परिवार जो उस समय भारतीय समाज की विशेषता थी सदियों चलती रही, समाज उपयोगी बनी रही, उन्हीं त्यागों या आदर्शों के कारण. आज भी यह परकरिया चालू है कुछ युवक लेखकों द्वारा. दुर्भाग्यवश शायद अगली पीढ़ियों को धीरे धीरे यह सौभाग्य नहीं मिलेगा.. या हो सकता है कुछ प्रभावी संस्थाओं के चलते मिलता रहे- उनमें एक है चिन्मयानन्द के लोग. शहरों की बात तो समझ आती है, पर ग्रामीण समाज समाज में चारों ओर देखने बड़ी निराशा है रामायण की गवनइयों की रिवाज को मरते हुये विदेशी नकल में रूचि के चलते. पर अच्छा होता,लोग पश्चिमी समाज के सद्गुणों को ग्रहण करते, आज सीता का कष् टउठाने के लिये कोई तैयार नहीं, सब दुर्योधन बनना चाहते हैं, न कोई राम, न कोई , न लक्ष्मण, न भरत…न दसरथ ..ऐसे में संस्कारी बच्चों को बनाने की प्रक्रिया कैसे चलती रहने के लिये सभी प्रतिकूल अवस्था में

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एकदम ठीक बात हैं. मुझे मालूम नहीं मैथिल क्या कर रहे हैं, पर भूमिहार के कुछ भटके तो संरक्षण माँगते हैं, आज देखा भूमिहारों का एक हाउसिंग कॉलोनी बन रहा है, आम्रपाली वालों की तरह कोई उन्हें बरगला रहा है. आज पहली बार सभी जाति के लोग सभी पेशे में आगे आ रहे हैं और बिहार के लोग लालू यहाँ तक की तेजस्वी, और माँझी के झाँसे में आ रहे हैं.

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19.3.(कल राहुल गांधी ने महाभारत की घोषणा कर दी. वैसे गांधी परिवार कभी मोदी को किसी तरह छोड़ा नहीं. अपने दस साल २००४-२०१४) के राज्य में गांडी परिवार मोदी को बहुत कुछ किया ख़त्म करने के लिये. शायद यह किसी अन्य के साथ होता तो गुजरात बिखर जाता, मोदी टूट जाते. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. गुजरात सबसे अच्छा प्रान्त बन गया, मोदी दिल्ली आ गये और हर काम के कुछ नयापन लाने की कोशिश की, देश का डंका पूरे विश्व में बजता गया. पर राहुल उन्हें जानी दुश्मन मानते रहे, सूट बूट की सरकार से ड्रामेबाज़ तक की उपाधि दी. उम्मीद थी कि इतनी विरासत वाली कांग्रेस कुछ उन्हें अपने मन का करने देगी जब वे २८२ थे, और ये केवल ४४. पंजातंतर में तो ऐसा होना चाहिये. पाँच साल तक सरकार चलाने का अपने सिद्धान्तो से . पर राहुल कांग्रेस विदेश नीति से ले सबका बिरोध किया खुलकर. सोनिया चाहती थी उनसे बराबर बात करते रहते, बात मानते रहते. ऐसा कैसे हो सकता था. सोनिया लालू के साथ नीतिस के सा थ मिल बिहार में सरकार बनाये, मोदी हार गये. पर पहला काम किया कि चालीस हज़ार करोड़ के दो लोकों प्लांट बिहार में लगाने का आदेश दिया, हारने की कोई ग्लानि न रखते हुये. नीतिश जब समझे तो फिर मोदी के साथ हो लिये. सरकार में कांग्रेस का अस्तित्व न रहा. ऐसा ही पूरे देश में होता रहा. राहुल पूरी ताक़त लगाई तीन तीन जातियों के नेताओं को तोड़ा, ग़लत समृद्ध जाति को संरक्षण का वायदा किया, किसानों को क़र्ज़माफ़ी का आश्वासन दिया. मोदी को मिहनत करना पड़ा. पर सरकार उनकी ही बनी. ख़ैर छोड़िये उन बातों को- प्रश्न है आपने पांडव बनना क्यों पसन्द किया? मुझे समझ नहीं आया कि उनकी कमियों को गिनाया जाये तो पारावार नहीं…..वे तो कृष्ण की राह हर क़दम पर चल जीते-मुझे मालूम है अधिक से अधिक आप राजाजी के लिखे महाराज को छोड़ असली या पूरे महा भारत को पढ़े न होंगे, आपको विवेक देवराज की राय लेनी चाहिये थी दस खंडों में अंग्रेज़ी में लिखि है, लिखा तो शायद मौली जी भी है…..ख़ैर महाभारत में जीतने के लिये नीचे दिया गीता का श्लोक समझना ज़रूरी है,….

येत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

भावार्थ : हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है ॥78॥

आप अपने को पांडव तो कह दिये, पर यह भी तो बताइये इस महाभारत में कृष्ण और अर्जुन कौन है…इसके बिना आप अपने महाभारत की जीत को गीता के अनुसार निश्चित नहीं.कह सकते…..भारतीय हिन्दू जनता कम से कम जानना चाहती है….कम से कम शिव भक्त , जनेऊधारी , मन्दिरों में जानेवाले को यह तो मालूम होना चाहिये ….प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उत्तर की प्रतीक्षा में एक जाति बिहीन हिन्दू…..कृपया अच्छा लगे तो शेयर कियेर, कुछ प्रश्न हो तो पूछिये…..)

मुम्बई में जुटाई गई भीड जिसकी संख्या अनुमान अलग अलग था रिपोर्टर की धारणा के अनुसार २०,००० से ५०,०००. फ़ोटो जो छपे वे बताते नहीं कि वे किसान थे क्यों चारों तरफ़ लाल लाल टोपियाँ और हँसिया- हथौड़े के झंडे भी.

१५.३. २०१८ : क्यों हारी बी.जे.पी बिहार एवं उत्तरपदेश में, यही चर्चा है पूरे फ़ेसबुक पर. अलग अलग लोग अलग अलग सिद्धान्त…

ज़िन्दगी आराम से कट जाती है

जब से हमने दर्द से दोस्ती कर ली…

१३.३.२०१८: पता नहीं मुझे इसका पहले अनुभव क्यों नहीं हुआ.पर अब लगता है राजनीति का बदला रूप जिसमें देश के स्वतंत्रता संग्राम का सम्पूर्ण यश लेनेवाली कांग्रेस पार्टी ध्वस्त हो चुकी है, पर उसके संचालक यह मानने को तैयार नहीं कि सत्ता में आई पार्टी संबैधानिक रूप से चुनी पार्टी है और उसे देश के हित में अपनी बिचारधारा के अनुकूल निर्णय लेने का अधिकार है, पर कांग्रेस बिरोधी दलों का साथ ले हर क़दम पर रोड़े अटका देती रही है, चारों तरफ़ हर चीज़ में राजनीति छोड़ कुछ अच्छा सुनने को ही नहीं मिलता, नही दिखता. अत: बड़ी घुटन महसूस हो रही है. कांग्रेस पार्टी वैसे भी वह नहीं रह गई है जिसे हमने देखा था स्वतंत्रता के पहले या बाद.सबसे बड़ी वजह है इसका नेतृत्व है, जो पूर्ण रूप से एक परिवार का मालिकाना हक़ हो गया है. ऐसी स्थिति अयोग्य नेतृत्व प्राकृतिक है. दूसरी तकलीफ़देय बात देश का हरदम चुनाव की प्रक्रिया में लगी रहना है. पहली बार हर चुनाव चाहे प्रान्त का हो, नगर निकाय या पंचायत का हो या उप चुनाव हो सुर्खियों में टी वी पर छाया रहता है. प्रान्तों के चुनाव में प्रधान मंत्री और उप चुनावों में मुख्य मंत्री ब्यस्त हो जाते है, चुनाव संहिता लग जाती है. बहुत सारे प्रोजेक्ट ठप्प हो जाते हैं. हर तरह के चुनाव की जीत और हार को वर्चस्व या पतन बताया जाने लगता है. एक सुझाव आया भी सभी चुनावों को एक साथ करने का, पर लोग एकमत हो संवैधानिक अड़चन का हल ढूँढने को तैयार नहीं. कांग्रेस और भा ज पा के नेताओं का संसद में बहस कर देश की समस्याओं का हल ढूँढने की कोशिश नहीं दिखती. दोनों एक दूसरे को केवल संसद रोकने का ज़िम्मेदार बताने में चुकते नहीं. इतने बड़े बहुमत के बाद अगर सत्र प्रभावी ढंग से नहीं चल सकता. लगता है यह सम्भव नहीं तो शायद ही कभी भी. अभी चलता बजट सत्र के दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से में अभी तक कुछ काम नहीं हुआ बिरोधी दलों के हंगामे के कारण, जबकि पंजाब नेशनल बैंक की बड़ी गड़बड़ी में देश का बहुत नुक़सान किया दो हीरों के ब्यपारियों ने बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत द्वारा और विदेश भाग गये. यह क्यों एवं कैसे हुआ, क्या ग़लती हुई, कैसे यह भविष्य में न हो. इस राष्ट्रीय हित के विषय पर सकारात्मक विवाद दोनों सभाओं में बड़ी संजीदगी से होना चाहिये था. पर लगता है सभी दल २०१९ के चुनाव को महत्व देते हुये एक दूसरे को ज़िम्मेदार बताने के झगड़े में ही लगे हुये हैं, सत्र के सुनहरे मौक़े को बरबाद किया जा रहा है. समस्या के सुलझने का सही रास्ता खोजने की आशा ख़त्म होती जा रही है बिना कोई कड़े क़ानून एवं दंड विधान की व्यवस्था किये बग़ैर. क्या २०१९ के चुनाव से हालत बदतर होगी या ऐसी ही चलती रहेगी?शायद भारत कभी महान नहीं हो पायेगा. …..

भूमिहार : मुझे बार बार अपने लोगों को पूछने पर कहता हूँ, “मैं शुद्र वर्ण का ज्यादा हूँ ज़िन्दगी में , नौकरी में तो हम किसी न किसी की सेवा ही करते हैं, अब भी जितना सफ़ाई का काम है जैसे टायलेट साफ करना, मैं ख़ुद करता हूँ, किसी दूसरे को करने नहीं देता.” दूसरे को कैसे कह सकता हूँ, बच्चों और पिताजी की भी सेवा में सभी तरह की सफ़ाई, सेवा की. …बड़े गर्व से की. कुछ समय मैं सर्वश्रेष्ठ मानेजाने वाले वर्ण का काम भी किया जो लोगों को शिक्षा देने का था- काफ़ी लोग जो बड़े बड़े ओहदे पर काम कर रहे थे. उस समय मै ब्राह्मण बन जाता था.

शूद्र कौन: मुझे केवल यह कहना कि गीता के १८वें अध्याय में तीन चार श्लोकों में चार वर्णों की बात कही है वह जन्मजात नहीं कहता, पर स्वभाव एवं कर्म के अनुसार था. अम्बेडकर जाति प्रथा में उलझ गये अशोक के बाद बढ़ी और बढ़ती गई. हर समाज असंख्य धर्म पुस्तकों में सर्वोत्तम ब्यवस्था को चुनता है, हमें इसी में बिश्वास करना चाहिये, वह तर्क संगत भी है. अम्बेडकर कीतरह के प्रतिभाशाली ब्यक्ति को शूद्र का अर्थ ब्यापक भाव से लेना चाहिये था. उन्हें अपने को अपनी मेधा शक्ति के बल पर ब्राह्मण कहना चाहिये था , पर दलितों का नेतृत्व लेने के लिये उन्होंने अपने को शूद्र बता सहानुभूति और प्रभाव बढ़ाया…..सोचिये….अगर सहमत हैं..

२५.२.२०१८: बहुत अच्छा लिखा है आपने पटना के अशोक क़ालीन अवशेषों के बारे में….१९६५ से नालन्दा के चारों ओर घूमा, पटना के कुम्हरार में उन दिनों ऊचें ऊचें पस्थर स्तम्भ खडे थे एक काफ़ी गहरे समतल पर . शायद खुदाई के बाद निकले थे. बाद में फिर गया पर वे दिखे नहीं…सभी नेता अपना इतिहास गढ़ने में लगें है…अशोक , चन्द्रगुप्त मौर्य और बाद को गुप्ता काल के प्रारम्भिक काल के बारे में पटना के जाने माने इतिहासज्ञों ने भी कोई काम नहीं किया…..कहाँ थे वे महल जिसके बारे में फाहियान ने देवताओं बनाया हुआ कहता था….

उत्तम खेती मध्यम बान।

निषिद चाकरी भीख निदान।।

भावार्थ- घाघ का कहना है कि खेती सबसे अच्छा कार्य है। व्यापार मध्यम है, नौकरी निषिद्ध है और भीख माँगना सबसे बुरा कार्य है।

१८.२.२०१८

हम सभी जानते या सुनें होंगे कि रामायण सैकड़ों अलग अलग कवियों एवं लेखकों द्वारा लिखा गया, मुख्य पात्र वही रहे, कुछ बदले, हर कवि या लेखक ने उसमें कुछ नई बात कहनी चाही अपने ढंग से.फिर गद्य में भी यह कहानी लिखी गई…हिन्दी में नरेन्द्र कोहली, अंग्रेज़ी में असीम त्रिवेदी ……पर इसका जैसा प्रचार दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में हुआ वह अद्भुद् लगता है. इस गणतंत्र दिवस पर उन देशों ने अपने यहाँ प्रचलित कहानी पर आधारित रामलीला का मंचन भी किया दिल्ली में. बचपन में क़रीब रोज़ शाम गाँव में लोग इसे एक जगह जमा हो गवनई करते थे मनोरंजन के लिये. तुलसीदास का रामचरितमानस दुनिया की सबसे ज़्यादा बिक्री होने वाली किताबों में आज भी है….वे समाज को सिखाने की चेष्टा किये और बहुत हद तक सफल भी हुये……पर मेरा प्रश्न एक और है, क्यों रामायण का इतना प्रसार हुआ….ए के रामानुजन का प्रसिद्ध लेख ‘तीन सौ रामायण’ कुछ साल पहले बहु चर्चित रहा. महाभारत उतने बिभिन्न रूपों में नहीं आया….यहांतक कि कुछ घरों में इसे लोग अशुभ मानने लगे और इसे घर में रखने से भी कतराते रहे http://www.sacw.net/IMG/pdf/AKRamanujan_ThreeHundredRamayanas.pdf

९.२.२०१८ यूपी, बिहार में रोज़गार नहीं, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात में रोज़गार बढ़ता जाता है. क्या है उनके पास जो उत्तरी प्रान्तों में नहीं है. यही कारण है बिहार में हम गाँव तक पहुँचे रोड, बिजली, स्मार्ट फ़ोन होने का कोई फ़ायदा नहीं ले पा रहे हैं, कौशलेन्द्र के सब्जी के काम को फल , दूध आदि में नहीं ले जा पा रहे हैं. जितना मैं जानता हूँ बिहार में यह काम भी ज़मीन के मालिक बडी जाति वाले करना तौहीनी समझते हैं, वह कु एक दो जातिओं का ही काम है, कब जाति प्रथा टूटेगी? हमें बडा सोचने वाले लड़के चाहिये IAS बन करोड़ों के तिलक की कमाईवाले नहीं. मधुबनी कलाकृतिओं मे उत्पादन बृद्धि करना, नये फ़ैन्स में प्रिय बनाना होगा , पूरे दुनिया में पहुँचाने की सोच सानी होगी. डालमियानगर ऐसी जगहों पर वह सब आसान चीज़ें जो चीन आयात करते हैं बनाना होगा, उसके लिये रॉकेट विज्ञान की जानकारी नहीं चाहिये. बिहार के कुछ उपलब्धियों की चर्चा कुछ साल पहले हुई थी-धान एवं आलू में प्रति हेक्टेयर चीन से ज्यादा उत्पादन की. कितने प्रतिशत किसान उसी मात्रा तक उत्पादन ले जा पाये? क्यों नहीं? यूपी, महाराष्ट्र में गन्ने की सभी मिलें आज भी चल रही हैं, बिहार के लोगों ने वहाँ की मिलों को क्यों नहीं चलने दिये..अंग्रेजों के जमाने से चंपारण में चला आ रहा गुड़-खंडसारी उद्योग अब मरणासन्न स्थिति में आकर बंद होने के कगार पर क्यों है. ..मैं तो यह कहता हूँ कि ग़ैरक़ानूनी ढंग से बढ़िया हथियार बना सकते हैं अगर बिहारी लोहार और वहीं के बढ़ई दिल्ली के सभी घरों का फ़र्नीचर बना सकते हैं फिर कोई आनन्द कुमार का छात्र अर्बन लैडर या उनकी दक्षता को ब्यवहार कर कोई कम्पनी क्यों नहीं खड़ा कर सकता? बिहार सरकार और अपने को बिहारी कहनेवाले क्या सोचेंगे?

७.२.२०१८: पता नहीं कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में। कल के लोकसभा में प्रधान मंत्री मोदी के राष्ट्रपति के भाषण के धन्यवाद ज्ञापन पर बोलते समय किया (विडियो)यही रास्ता अपना २०१९ का चुनाव जीतना चाहती है….अगर देश की जनता, मीडिया एवं बिरोधी पार्टियाँ इस तरह आँख बन्द कर राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बनाना चाहते हैं तो देश का दुर्भाग्य होगा. दो प्रश्न का उत्तर सभी से चाहूँगा. क्या जातिवाद का उपयोग इतने खुली तरह से होना चाहिये जैसे राहुल गांधी ने एक दलित, एक ठाकुर, एक पटेल को साथ ले गुजरात में किया? क्या देश हर सम्पन्न जातियों को जिनमें जाट, मीना, पटेल, आदि हैं, को संरक्षण देता रहेगा, यही देश में चुनाव जीतने का तरीक़ा होगा और एक दिन देश बँट जाये प्रान्त, जाति, या भाषा के आधार पर.अगर क़र्ज़ माफ़ी की तरह का केवल तुष्टीकरण का तरीक़ा जो बार बार राहुल गांधी हर चुनाव के पहले वायदा दे देते है अन्य क्षेत्र के सरकारी क़र्ज़ लेनेवाले की तरफ़ से यही माँग नहीं होगी? क्या कोई अर्थनीति यह कर सम्पन्न बन सकती है.सम्पन्न बनने के लिये नई तकनीकि तरीके जरूरी हैं, कृषि या ब्यवसाय लाभदायक पर ईमानदार तरीके और मिहनत से ही बन सकते हैं, ग़ैर क़ानूनी तरीके से अपना धन बटोर नहीं.क्या कुछ प्रान्त के मुख्यमंत्रियों के कुछ कुछ क़दम देश से ज़्यादा प्रान्त को प्राथमिकता देने की ओर नहीं बढ़ रहे हैं? आज राहुल हों या अरविन्द केजरीवाल की पार्टियाँ बामपंथी पार्टियों का रास्ता का रास्ता बड़ी कम्पनियों के प्रति अपना रहीं हैं, क्या वही रास्ता देश हित में है या इससे कोई बेहतर समझदारी का रास्ता हो सकता है? मैं बिहार के कम से कम तीन गाँवों को नज़दीक से जानता हूँ, आप भी अपने प्रान्त के गाँवों को जानते होंगे, क्या वहॉ के स्कूल जाते गाँवों बच्चों की हालत ACER 2018 के रिपोर्ट से बेहतर है? मैं तो किसी गाँव को नहीं जानता जहाँ कोई स्वास्थ्य केन्द्र की ब्यवस्था हो, आप के यहाँ क्या है? क्या इतने सालों के स्वराज के बाद यही स्थिति होनी चाहिये शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र की? हर क्षेत्र की करीब करीब सालों की तुष्टीकरण की नीति के कारण यही हाल है. कौन इसके लिये सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है? आज मोदी को किन परिस्थिति में किस तरह जवाब देना पड़ा कांग्रेस दल के ज़ोर दार नारों के बीच जो मुझे बंगाल के हिन्दमोटर के यूनियनवालों के विरोधी नारों की याद दिलाते रहे, आप भी सुनो और ख़ुद तय करो कि क्या भविष्य है इस देश का?

२४.१.२०१८ देश में सिनेमा देखने में काफ़ी पैसा लगता है अत: देश के लफ़ंगे कोई मौक़ा सड़कों पर कुछ टीवी वालों को बुलाने के लिये पुलिस और पार्टियों की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठा अपने हिरो विलियन बनने से नहीं चुकते. देश में अराजकता बढ़ती जा रही है, कौन कड़ा क़दम उठा चुनाव हारने की ज़िम्मेवारी ले? चिन्ता कौन करे….एक पार्टी या एक नेता के नाम सब ज़िम्मेवारी डालते जाओ.यह कौन है करनी सेना का नेता जिसके नाम पर गुंडों ने छोटे बच्चों के स्कूल पर आक्रमण किया और ……..

सरकार टैक्स चोरी रोकने के लिए लगातार कड़े कदम उठा रही है, तो बिजनसमेन भी इन सरकारी प्रयासों को पलीता लगाने का एक-से-बढ़कर एक तोड़ निकाल रहे हैं। नई टैक्स व्यवस्था गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। इस सिस्टम में अलग-अलग टैक्स रेट्स ने व्यापारियों को जैसे टैक्स चोरी का हथियार थमा दिया है। टैक्स अधिकारी मानते हैं कि कपड़ों के मामले में कई छोटे बिजनसमेन 1000 रुपये से ऊपर की कीमत वाले शर्ट्स के 500-600 रुपये के दो बिल बना रहे हैं ताकि उन्हें 12 प्रतिशत की जगह 5 प्रतिशत टैक्स देना पड़े। इतना ही नहीं, बिजनसमेन ने जीएसटी लागू होने से पहले 1,000 रुपये से थोड़ी ज्यादा प्राइस वाले गारमेंट्स के दाम घटाकर 1,000 रुपये से कम कर दिए ताकि उसे कम टैक्स देना पड़े। कपड़ों और बर्तनों के कुछ व्यापारी टैक्स से बचने के लिए रेलवे का इस्तेमाल कर रहे हैं। दरअसल, ट्रकों से सामान लाने पर रास्ते में उसकी चेकिंग हो जाती है, लेकिन रेल से माल ढुलाई पर चेकिंग की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है और बिजनसमेन टैक्स देने से बच जाते हैं। जीएसटी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि पहले रेलवे स्टेशनों पर चेकिंग के लिए जुटे अधिकारियों को खदेड़ने के लिए व्यापारी झुंड बनाकर पहुंचते थे। इससे अधिकारियों को छापेमारी में बहुत परेशानी होती थी। ट्रकों से माल लाने के मामले में भी सूरत के कुछ व्यापारी टैक्स बचाने की कला में माहिर हो गए हैं। इंडस्ट्री के कुछ लोगों का कहना है कि कुछ व्यापारी एक ही इनवॉइस पर तीन बार सामान दिल्ली पहुंचा देते हैं। टैक्स चोरी के इतर टैक्स क्रेडिट्स का दुरुपयोग भी टैक्स कलेक्शन में बट्टा लगा रहा है। इस काम में दिल्ली सबसे आगे है। इसके लिए फर्जी इनवॉइस तैयार करनेवाला एक रैकेट काम कर रहा है जो वैसे व्यापारियों के लिए इनवॉइस बना देता है जो योग्य नहीं होने के बाद भी इनपुट टैक्स क्रेडिट चाहते हैं।

http://hindi.economictimes.indiatimes.com/business/business-news/traders-come-up-with-new-ways-to-evade-gst/articleshow/62538984.cms

http://hindi.economictimes.indiatimes.com/business/business-news/tax-evaders-using-private-vaults-for-tax-evasion/articleshow/62537848.cms

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हैरान हुआ या दुखी समझ नहीं पा रहा हूँ गाँवों के स्कूलों के शिक्षा के स्तर के सद्य ज्ञात रिपोर्ट से…..आप भी पढ़िये और सोचिये….इस नींव पर क्या दीवार खड़ी होगी…..मुझे बिश्वास है अगर इन बच्चों के शिक्षकों से भी वही कुछ पूछा जाता तो उसका फल भी कुछ चौंकाने वाला ही होता….पढ़ने की आदत का पूर्णरूपेण ह्रास होता जा रहा है……बिना पढ़ने की दृढ़ इच्छा शक्ति कोई ज्ञान अर्जित ही नहीं किया जा सकता….न काम में , न धंधे में….बेईमानी से मिली डिग्री या बेईमानी की आय पर बढ़ता ब्यवसाय कभी आन्तरिक सुख तो दे ही नहीं सकता …… लोग कब इस सोच से जियेंगे…पिछले सत्तर सालों में शिक्षा की जो पद्धति अपनाई गई वह पूरी तरह ग़लत साबित हो रही है…. https://navbharattimes.indiatimes.com/india/36-of-teenagers-aged-14-to-18-do-not-know-the-name-of-indias-capital/articleshow/62529308.cms

– 14 से 18 साल के आधे से ज्यादा किशोरों को सैकड़े की संख्या में एक अंक से भाग देने में परेशानी हुई। 43 प्रतिशत किशोर ही इस सवाल को ठीक से हल कर सके।

– 14 साल के 53 प्रतिशत किशोर ही अंग्रेजी के वाक्य पढ़ पाए। 18 साल के यूथ में ऐसे लोगों की तादाद करीब 60 पर्सेंट रही।

– उम्र के साथ इंग्लिश पढ़ने में सुधार दिखा लेकिन गुणा-भाग में यह तेजी नहीं दिखी। 76 पर्सेंट लोग ही पैसों को सही से गिन सके। 56 पर्सेंट ही किलोग्राम में वजन जोड़ पाए।

– घंटे और मिनट के साथ 40 पर्सेंट लोग सही टाइम नहीं बता पाए। भारत का नक्शा दिखाने पर भी 14 पर्सेंट ने गलत जवाब दिया।

– भारत की राजधानी का नाम 64 पर्सेंट ने सही बताया, वहीं अपने राज्य का नाम बताने में 79 पर्सेंट लोग सही निकले।

– भारत के नक्शे पर 42 पर्सेंट ही अपने राज्य को सही पहचान पाए।

– 75 पर्सेंट यूथ ने एक हफ्ते के अंदर ही मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया। हालांकि इसमें भी जेंडर गैप दिखा। 12 पर्सेंट लड़कों ने कभी मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं किया, वहीं ऐसी लड़कियों की संख्या 22 पर्सेंट रही।

– उम्र के साथ मोबाइल फोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। 14 साल के किशोरों में 64 पर्सेंट ने पिछले एक हफ्ते में मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया था, जबकि 18 साल के युवाओं में ऐसे लोगों की तादाद 82 पर्सेंट रही।

– इन युवाओं में कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल बेहद कम होता दिखा। पिछले हफ्ते में 28 पर्सेंट ने इंटरनेट और 26 पर्सेंट ने कंप्यूटर का इस्तेमाल किया। 59 पर्सेंट ने कभी कंप्यूटर, तो 64 पर्सेंट ने कभी इंटरनेट इस्तेमाल नहीं किया।

– लड़कियों की इंटरनेट और मोबाइल तक पहुंच लड़कों के मुकाबले काफी कम है। जहां 49 पर्सेंट लड़कों ने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया, वहीं ऐसी लड़कियों की तादाद 76 पर्सेंट है।

– 85 पर्सेंट ने पिछले हफ्ते टीवी देखा। 58 पर्सेंट ने अखबार पढ़ा और 46 पर्सेंट ने पिछले हफ्ते रेडियो सुना।

– 75 पर्सेंट युवाओं के पास बैंक अकाउंट है। इसमें लड़कियों की संख्या लड़कों से कुछ ज्यादा है।

– 24 राज्यों के 26 ग्रामीण जिलों में यह सर्वे किया गया।

– – 14 से 18 साल के 86 पर्सेंट युवा औपचारिक शिक्षा ले रहे हैं। वे या तो कॉलेज में हैं या स्कूल में। इनमें से 54 पर्सेंट यूथ 10वीं या इससे नीचे की क्लास में हैं। 25 पर्सेंट 11वीं या 12वीं में हैं। 6 पर्सेंट डिग्री कोर्स में हैं। 5 पर्सेंट यूथ किसी न किसी तरह की वोकेशनल ट्रेनिंग ले रहे हैं। इन युवाओं में 42 पर्सेंट काम भी कर रहे हैं। भले ही उन्होंने स्कूल में ऐडमिशन लिया है। जो काम कर रहे हैं उनमें से 79 पर्सेंट खेती के काम में हैं।

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किसान कैसे करें अपनी सालाना आय दुगनी

कुछ प्रश्न है पहले. किसे किसान कहना चाहिये: १.क्या वह जो ज़मीन का मालिक है और अपनी ज़मीन का अपने खेती करता है अपने/श्रमिक लगा/मशीन- ट्रैक्टर, कमवाइन हार्वेस्टर, धान रोपने की मशीन या पुरानी तरह से हल आदि से? या २.क्या वह जो अपनी ज़मीन को दूसरे को खेती पर देता है सालाना रेंट पर पूरा ख़र्चा रेंट पर लेनेवाले का, और अपने कुछ नहीं करता या अन्य धंधे या नौकरी में लगा है?३.या क्या वे कुछ ज़मीन के मालिक जो दोनों तरीक़ों को ब्यवसायिक दृष्टि से लाभ हानि तौल कर ज़मीन का ब्यवहार करते हैं? ज़मीन रेंट पर ले खेती करनेवाले को ज़मीन की उत्पादकता या चलते भाव के अनुसार पहली ऊपज के मौसम के चालू होने के पहले ही एक बार में तय सालाना रेंट ज़मीन के मालिक को दे देनी पड़ती है. साल भर खेती पर हुये ख़र्चे को ख़ुद बहन करना पड़ता है और साल भर की आमदनी भी उसकी का होता है.उसमें अधिकांश पहली खेती की आमदनी अधिकांश रेंट में दे चुका होता है, पर बाक़ी सब उसकी आमदनी होती है. उसकी आमदनी फ़सलों के चुनाव,उत्तम बीज, खाद, सिंचाई,और मौसम पर निर्भर करता है.सिंचाई का प्राकृत वर्षा, या मनुष्य निर्मित ढंग से हो सकती है,पर तूफ़ान, बहूत ज्यादा सूखा, या अन्य आपदा तो दैव आधारित है, पर उससे निपटने का बहुत उपाय हो रहा है फ़सल वामा योजना द्वारा. मज़दूरी वे अपने परिवार के लोगों द्वारा कर मज़दूरी का ख़र्च बचा सकते हैं। मुझे मालूम नहीं की रेंट पर खेती करने वाले को बैंक क़र्ज़ा देते हैं या नहीं, क्योंकि उसके पास आधार नहीं होता पैसा देने का, जबकि ज़मीन मालिक ज़मीन के दस्तावेज़ का फ़ोटो कॉपी दिखा उसकी कोलैटर्ल पर क़र्ज ले सकता है. ज़मीन अपनी न होने रेंट और अन्य ख़र्चों को कम कर ही कुल आय लिया जाना चाहिये.उदाहरण- हमारे जाने में हमारे इलाक़े में एक बड़े बीघे का सालाना रेंट १२-१६ हज़ार है जो धान के फ़सल के दाम का आधा है, साल की उस ज़मीन से हुये बाक़ी फ़सलों का फ़ायदा रेंट पर लेनेवाले का होता है.नये क़ानूनों के डर से ज़मीन मालिक रेंट लेनेवाले को बदलते रहते हैं, अत: खेत के उत्पादकता को लम्बे अरसे तक बढ़ाने के लिये जरूरी चीज़ें रेंट पर ज़मीन लेनेवाले की प्राथमिकता नहीं होती , दूसरे के ज़मीन पर कोई पैसा क्यों लगाये? २०१८ के बजट में निम्न समर्थन मूल्य को बढ़ाने के साथ दो और बातें हैं जो किसान की आमदनी बढ़ा सकती है- १.बहुत बडी संख्या में लोकल मिनी मंडियों का निर्माण, जिससे किसानों को प्राइवेट ट्रेडरों को निम्न समर्थन मूल्य से कम पर बेंचना न पड़े.२.चूंकि क़रीब ८५% खेत मालिकों के पांच बीघा या एक हेक्टेयर से ज़मीन कम है, आम किसान धान, गेहूँ की फ़सल से सुख की ज़िन्दगी नहीं जी सकते. उन्हें या तो सब्ज़ी फल या अन्य ब्यवसायिक दृष्टि से फ़ायदेमन्द में जाना होगा या इस बार के बजट में सहभागिता कर ज़मीन बढ़ानी की बात कही गई है और इस संगठन को ब्यवसायिक कम्पनी की तरह ब्यवस्थित और संचालित करने की अपेक्षा होगी. आज भी बिहार के ९०% किसान निर्धारित निम्न मूल्य नहीं पाते.करीब हर क्विंटल पर १५०-२०० रूपये का घाटा उठाते हैं.पर बजट में प्रस्तावित किसान संगठन को कारगर बनाने में सफलता उस गाँव के किसानों की आपसी सौहाद्रता और सहयोग के साथ ईमानदार नेतृत्व पर भी निर्भर करता है. आज भी गाँवों में सभी सरकारी योजनाओं का लाभ सठीक ज़रूरतमन्द के पास नहीं पहुचंता.कुछ लोग माहिर हो गये हैं सरकारी सहायता को हड़प जाने में आम किसानों को बेवक़ूफ़ बना. वैसे मेरे इलाक़े के गाँवों की खेती से हर बीघे साधारणत:आज क़रीब ७०हज़ार से एक लाख की उपज होती है, अगर दो फ़सल- धान, गेहूँकी खेती हो तो, जैसा मेरे पैतृक गाँव में हो रहा है, राशि कम होगी. इसमें धान २० क्विंटल और गेहूँ १० क्विण्टल प्रति बीघे का अनुमान लिया गया है. पर अगर तीन फसल- धान, दलहन, पिपरमेंट लिया जाये तो रक़म ज़्यादा होगा, जैसा मेरी ससुराल में करते हैं. इसमें प्रति बीघा उपज धान की २० क्विंटल, गेहूँ की जगह दलहन की ४ क्विंटल, और पिपरमेंट का ४-५ लीटर. उत्पादकता एवं ख़र्च बीज, सिंचाई, फर्टिलाइजर, कीटनासक दवा, और फ़सल के प्रकार पर निर्भर है. हमारे मानदंड से किसान केवल साल में ३०- ४० दिन या इससे भी कम काम कर पाँच बीघे पर पचास हज़ार माह की उपज कर सकता है. और भी बहुत तरीक़ों से लागत कम एवं उत्पादन अधिक किया जा सकता है. खेती के लिये कुछ ट्रेनिंग एवं पढ़ने एवं प्रयोग की ज़रूरत है….पर सबसे ज़्यादा मन में विश्वास ज़्यादा होना मिहनत पर, मुफ़्त की ख़ैरात पर नहीं…..’खेती उत्तम, मध्यम दाम, निकृष्ट चाकरी भीख निदान’ ….किसान अपनी खेती से आमदनी दुगनी, तिगुनी या पांचगुनी कर सकता है अगर खेती में रूचि ले, जानकारी हासिल करे, उसे उपयोग में लाये…….और हुआ भी है पिछले सालों में. अब नई पीढ़ी ज्यादा पढ़ी और समझदार है तो उसका फ़ायदा उठाये, नये तकनीकी ज्ञानों का ब्यवहार करते हुये…….निम्नतम मूल्य में बृद्धि और क़र्ज़ माफ़ी कभी ख़ुशहाली नहीं लायेगी……दुनिया गमलों, मकान के छत एवं फ़ैक्टरियों की तरह बहुमंज़िली कृत्रिम खेतों पर खेती करने चली है, हम अभी भी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकर बग़ावत, तोड़फोड़ …..

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