भगवत् गीता और लोक सेवा

भगवत् गीता और लोक सेवा

गीता कर्म को मनुष्य जीवन में प्रधानता देती है. कृष्ण कहते हैं कि मैं एक क्षण भी कर्म से विरत नहीं हो सकता, नहीं तो सृष्टि का चक्र ही बन्द हो जायेगा. पर गीता में हर कर्म को बिना फल की इच्छा किये करने पर बल दिया गया है. यही साधना है कैसे इसे व्यवहार में लाया जाये. फल की इच्छा न रखने का उद्देश्य है कि इसके बिना कर्म को पूरी तन्मयता से किया ही नहीं जा सकता है, मन अगर फल की प्राप्ति में सोच में भटका करेगा तो कोई कर्म में अपना शतप्रतिशत ध्यान लगा ही नहीं पायेगा, भटक जायेगा उस सोच में. और उसके कर्म की कुशलता जो चाहिये और जिसे योग कहा गया है वह भी सर्वश्रेष्ठ स्तर पर नहीं पहुँच पायेगी.. योग के स्तर पर… यही नहीं बार बार कृष्ण ने यह भी कहा है, ‘सर्व कर्म फल त्याग’और गीता के भक्ति योग के अध्याय १२ के १२वें श्लोक में तो इसे अभ्यास, ज्ञान, ध्यान के मार्गों से भी श्रेष्ठ बताया है-

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते ।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌ ॥

अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है,ज्ञान से परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है॥12॥

साथ ही कृष्ण ने कर्म में कोई आसक्ति नहीं रखने की भी हिदायत दी गई है, काम अपने स्वार्थ के लिये करने की भी मनाही की गई है. यह भी कहा है कि सब कामों को मुझमें समर्पित कर दो. शायद ऐसा करने से न फल की चिन्ता रहेगी, न असफल होने की चिन्ता. बार बार यह भी कहा गया है परमेश्वर की प्राप्ति के लिये तुम्हें ‘सर्व भूत हिते रता’ (सम्पूर्ण भूतों के हित में रत)होना होगा: ‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः’ (१२ वें अध्याय के हीं श्लोक ४ का आख़िरी अंश).फिर कर्मसन्यासयोग के अध्याय ५ के २५वें श्लोक में भी इसी पर ज़ोर दिया गया, ‘छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः’(जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं.)पूरा श्लोक है:

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥

कितना आसान तरीक़ा है ब्रह्म निर्वाण का…..अगर हमें कोई भी मौक़ा किसी तरह से जीव कल्याण के लिये कुछ भी करने का मिलता है तो उसे हमें परमात्मा का दिया गया एक बहुत बड़ा मौक़ा समझ पूरी निष्ठा से करना चाहिये…सर्व भूतों में सभी आते हैं पेड़ पौधे, जानवर, मनुष्य, चींटियाँ भी …..कितने ही जीव जीवन की न्यूनत्तम आवश्यक चीजों के असीम भूखे, प्यासे, असहाय हैं….अगर हम कुछ भी कर सकेंगे तो आत्मसुख तो मिलेगा ही इसी जन्म में…दूसरे लोक की अगर हम न प्रवाह भी करें तो…

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दुर्गा पूजा-नवरात्र का महत्व

बंगाल की मिट्टी ने यह श्रद्धा जगाया है…
Durga Puja
According to Hindu mythology, Mahisasura had obtained a boon of invincibility from Lord Brahma, which meant no man or God could kill him. Taking advantage of the boon, he started harassing everyone and chased the Gods out of heaven. Thereafter, Goddess Durga was created by all the gods providing their armaments to defeat Mahisasura.Durga slew the demon on the Dashami, and hence the day is celebrated as Vijaya Dashami, symbolising the victory of good over evil.
तीसरा दिन
आज महा सप्तमी है, आज ‘कालरात्रि’ रूप में दुर्गा की पूजा की जाती है(माँ दुर्गा के ९ रूप-शैलपुत्री,ब्रह्मचारिणी,चन्द्रघंटा,कूष्माण्डा, स्कंदमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,महागौरी,
सिद्धिदात्री.)दुर्गा सप्तश्लोकी नवरात्रि दुर्गा पूजा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण पाठ माना गया है.पढने की कोशिश करिये, लाभ होगा, शान्ति मिलेगी.

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥1॥
वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं.
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्रयदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्र चित्ता ॥2॥
‘मां दुर्गे!’ आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्धारा चिंतन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं. दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो.
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥3॥
नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणदायिनी शिवा हैं. आप सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं. आपको नमस्कार है.
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥4॥
शरणागतों, दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी! आपको नमस्कार है.
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोऽस्तु ते ॥5॥
सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से संपन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी! सब भयों से हमारी रक्षा कीजिए, आपको नमस्कार है.
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥6॥
देवी! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं. जो लोग आपकी शरण में हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं, आपकी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं.
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥7॥
सर्वेश्वरि! आप तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करें और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहें.

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My Contemporary Thoughts and My Views-1

1

Entrepreneurs! Make in India: As reported, the Indian Army spends ₹400 crore on mules, which are the means of transporting rations and materials in inhospitable terrain. It can easily use drones for moving material. Design and develop indigenous drones that can help change and remove mules. It will be an import substitute as the defence forces are imported it. Why can’t the technocrats at IITs, IISc and other research institutes and manufacturing companies master the development and production of the drones at scale required and make India a leader in different types and sizes of drones and export too? Are the big business houses and even PSUs in manufacturing listening clearly the call of such products and ashaming India as laggard and suffering from the epidemic of ‘Importmania’ in every field.

2

While in Paris, as reported, Defence minister Rajnath Singh made a call for French companies to make India their base for the production of defence equipment, not only for India’s large market but also for export to other countries, while addressing CEOs of leading French defence industries. He also called them to collaborate in modernising India’s shipyards and defence platforms through the infusion of technology. India must do a lot of work with right feedback to attract the manufacturers to set up their second regional R&D and manufacturing base here as it will significantly cut their cost and will improve their global competitiveness. The region including India will be the major users with rapidly changing global economic scenes. Without clear cut advantages, no one is going to come in India. However, it was good time for the defence minister to give the call . The CEO of the French engine manufacturer Safran behind the Rafale fighter jet told Defence Minister Rajnath Singh the same. Rajnath Singh visited the Engine Manufacturing Facility of Safran at Villaroche near Paris. Safran is known for its engine making capabilities. They have also developed the engine for Rafale. Safran could have been allured to collaborate to develop India’s own Kaveri series jet engines for different fighters that are being planned to be manufactured by HAL. https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/france-makes-move-to-revive-kaveri-jet-engine-project/articleshow/71532719.cms

3

A Nobel for Chemistry 2019 has gone for the technology behind the rechargeable lithium-ion batteries that has changed the mobility by Electric Vehicles and– that also power most of the most popular portable devices such as mobile phones. The prize has been given jointly to Stanley Whittingham, now with Binghamton University, State University of New York; John B Goodenough, now with the University of Texas at Austin; and Akira Yoshino of Asahi Kasei Corporation. Whittingham developed the first functional lithium-ion battery in 1976, Goodenough brought in a major improvement in 1980, while Yoshino made the first practical-use lithium-ion battery in 1985. Commercially manufactured lithium-ion batteries, based on what Yoshino had developed, made their first appearance in 1991. Tesla Motors revolutionary success came from it. Tesla was the first so successful an Electric Vehicles manufacturer and the Chinese now are the main leading manufacturers and users of Electric vehicles. And with that I am foreseeing a large number of Chinese EV manufacturers entering in Indian auto OEMs and components market. India again missed the opportunity in becoming a first in a new technology that could make it a lead manufacturing nation. Interestingly, ISRO was in use of Lithium-ions battery for quite sometimes in its satellites launching. India has neither taken any lead in getting tied up with the countries with mines of lithium nor in manufacturing of power packs for EVs. Is it not a shame that India with one of largest users of mobile phones and solar cells( with a target of 175 GW by 2022) will be totally dependent on China for its supply? Where are the killing instincts of our big rich business houses or new entrepreneurs? If India can’t take a lead in innovating a similar cutting stage technology, related product development and its manufacturing, it will always remain a laggard nation. With the history of our governments’ priorities till date, India will remain a buyer of technologies or collaborators for years to come even with so big a pool of researchers in this country.

4

आज सबेरे के ज्ञानपीठ की अड्डानुमा महफ़िल में डा. चौबे ने वायदानुसार एक यह श्लोक सुनाया….काग़ज़ मेरे पास नहीं था पर यह श्लोक दिमाग के किसी कोने में कुलबुला रहा था. याद आया दादाजी बड़े गम्भीर भाव से यह सुनाये थे…और ऐसे ही गीता आदि के श्लोक बताते रहते थे, पहले भी लिखा हूँ …

को हि भारः समर्थानां किं दूर व्यवसायिनाम्।

को विदेश सुविद्यानां को परः प्रियवादिनम्॥

सामर्थ्यवान व्यक्ति को कोई वस्तु भारी (असंम्भव) नहीं होती । व्यपारियों के लिए कोई जगह दूर नहीं होती । विद्वान के लिए कहीं विदेश नहीं होता । मधुर बोलने वाले का कोई पराया नहीं होता ।

उन्होंने उस समय कहा था कुछ ऐसा…”तुम्हारे कोई चाचा पढ़ाई में कोई ज़्यादा आगे नहीं बढ़े,यद्यपि मैंने दोनों को बिरला के पिलानी के शिक्षा संस्थान में व्यवस्था की थी तुम्हारी दादी के चलते. वे अपने बच्चों को दूर नहीं भेजना चाहतीं थी…एक साधारण बहाना बना एक बार जब वे आये तो जाने नहीं दिया…..वहीं देखो तुम्हारी माँ तुम्हें एक संतान होते हुये भी मेरे जिम्में लगा दी दूर कलकत्ता में बिना घर की महिला के बिना मेरे रहते हुये भी…”आज सोचता हूँ असली माँ बाप तो दादाजी थे.उन्हीं के चलते जो मैं बना, वह बन पाया. हमने भी अपने तीनों बच्चों को बहुत दूर अमरीका भेज दिया उनके भविष्य को देखते हुये…भारत के लाखों साधारण घरों के बच्चे बिदेश गये हैं, सब क्षेत्र में नाम कर रहे हैं, कुछ नामी कम्पनियाँ भी बनाये…अमरीका के सबसे अधिक धनियों में कुछ का नाम है…दादाजी ने चाचाओं के बूते पर कुछ ब्यवसाय करने की भी पहल की थी, पर वे कुछ न कर सके….देखें भगवान राकेश को कितना सफल बनाते हैं….एक श्लोक और कितनी यादें उभर आ रही हैं…महानायक विष्णुगुप्त चाणक्य ने आज से शायद २००० साल से पहले ऐसा बिचार ब्यक्त किया था जो कितना सठीक है…..हाँ …उन दिनों भी चन्द्रगुप्त मौर्य को वह बिहार से खोज तक्षशिला ले गया था शिक्षा के लिये….हाँ, दादाजी बराबर तुलसीदास की कहानी बताते थे कि क्या तुलसीदास अपने घर से नहीं निकल गये होते तो इतने बड़े राम भक्त लोकनायक बन पाते…..आदर्श पुरूष राम की महिमा का प्रसार जितना तुलसी के रामायण रामचरितमानस के द्वारा हुआ, उतना बल्मिकी या अन्य किसी रामायण से नहीं हुआ…….

5

Ajai Shukla has an article today detailing Air Force chief’s plan to solve shortage of fighter squadrons of upto 2032.. https://www.business-standard.com/article/defence/air-force-chief-outlines-plan-to-solve-shortage-of-fighter-squadrons-119100401549_1.html. I am of a stronger view that the government of today and the next ones must put its best talents, resources, investment on R&D, production engineering, and marketing for exports as global manufacturers of defence equipment- helicopters, fighters, naval ships, submarines, missiles, tanks, artillery guns, rifles and other small arms.

6

बंगाल की मिट्टी ने यह श्रद्धा जगाया है…

Durga Puja

According to Hindu mythology, Mahisasura had obtained a boon of invincibility from Lord Brahma, which meant no man or God could kill him. Taking advantage of the boon, he started harassing everyone and chased the Gods out of heaven. Thereafter, Goddess Durga was created by all the gods providing their armaments to defeat Mahisasura.Durga slew the demon on the Dashami, and hence the day is celebrated as Vijaya Dashami, symbolising the victory of good over evil.

तीसरा दिन

आज महा सप्तमी है, आज ‘कालरात्रि’ रूप में दुर्गा की पूजा की जाती है(माँ दुर्गा के ९ रूप-शैलपुत्री,ब्रह्मचारिणी,चन्द्रघंटा,कूष्माण्डा, स्कंदमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,महागौरी,

सिद्धिदात्री.)दुर्गा सप्तश्लोकी नवरात्रि दुर्गा पूजा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण पाठ माना गया है.पढने की कोशिश करिये, लाभ होगा, शान्ति मिलेगी.

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा ।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥1॥

वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं.

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्रयदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्र चित्ता ॥2॥

‘मां दुर्गे!’ आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्धारा चिंतन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं. दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो.

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥3॥

नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणदायिनी शिवा हैं. आप सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं. आपको नमस्कार है.

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥4॥

शरणागतों, दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी! आपको नमस्कार है.

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोऽस्तु ते ॥5॥

सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से संपन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी! सब भयों से हमारी रक्षा कीजिए, आपको नमस्कार है.

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥6॥

देवी! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं. जो लोग आपकी शरण में हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं, आपकी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं.

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥7॥

सर्वेश्वरि! आप तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करें और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहें.

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महात्मा, धर्म, भगवद् गीता और हमारी असहिष्णुता

महात्मा गांधी के जन्मदिन पर एक अर्घ्य यह भी हो सकता है कि हम उनके ‘धर्म’ की मान्यता को समझें, जो निम्न है-

“धर्म से मेरा अर्थ प्रथा-गत धर्म से नहीं है, परन्तु धर्म जो सभी धर्मों का आधार है, जो हमें स्रष्टा के सम्मुख लाता है. वास्तव में धर्म हमारे प्रत्येक कार्य में व्याप्त रहना चाहिये.यहां धर्म का अर्थ साम्प्रदायिकता नहीं है.इसका अर्थ ब्रह्माण्ड के नियमबद्ध नैतिक शासन में विश्वास है.क्योंकि वह दीखता नहीं है,इसलिये कम वास्तविक नहीं है.यह धर्म हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, आदि धर्मों से परे है. यह उनका स्थान नहीं लेता.यह उनमें सांमजस्य स्थापित करता है और उन्हें वास्तविकता देता है.मेरा हिन्दू धर्म साम्प्रदायिक नहीं है. यह उस सर्वश्रेष्ठ को सम्मिलित करता है जिसे मैं इस्लाम, ईसाई, बौद्ध और पारसी धर्म से सबसे अच्छा जानता हूँ.धर्म विभिन्न पथ है जो एक बिन्दु पर मिलते हैं.यदि एक ही लक्ष्य पर पहुँचते हैं तो इसमें क्या अन्तर पड़ता है कि हम भिन्न-भिन्न रास्तों को लेते हैं?

इस समय की आवश्यकता एक धर्म नहीं, अपितु विभिन्न धर्मों के भक्त्तों के बीच आपसी सम्मान और सहिष्णुता की है. हम एक मृत स्तर तक पहुँचना नहीं चाहते, वरन् अनेकता में एकता चाहते हैं. धर्मों की आत्मा एक है, परन्तु यह अनेक रूपों से ढँका है. यह अवरोक्त्त, काल के अन्त तक बना रहेगा.” -महात्मा गांधी

इसी अवधारणा का भगवद् गीता में प्रतिपादित किया गया है बार बार-

अध्याय ४ में भी यही कहा गया है-

ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ ।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं॥11॥

विश्व के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि भगवद्गीता को पढ़कर मुझे ज्ञान हुआ कि इस दुनिया का निर्माण कैसे हुआ. महापुरुष महात्मा गांधी कहते थे कि जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती है तो मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं. महान दार्शनिक श्री अरविंदों ने कहा है कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवन शैली है, जो हर उम्र के लोगों को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है.दु:ख तब होता है जब देश के अज्ञानी लोग राजनीति नेताओं के बहकावे में आ गीता बिरोध करते जो इस देश के आत्मा की आवाज़ है.

कल डी एम के एकक्षत्र बादशाह M.K. Stalin ने अन्ना विश्वविद्यालय द्वारा गीता के एक अंश का किसी कोर्स में शामिल करने पर निन्दा की.मुझे मालूम नहीं की उनकी क्या शिक्षा हुई है, पर उन्हें शायद मालूम नहीं की भगवद् गीता के सबसे प्राचीन से लेकर आधुनिक व्याख्याकार दक्षिण से हैं. आचार्य शंकराचार्य से चलती परम्परा डा. राधाकृष्णन और उसके बाद तक चली आ रही है…अगर देश के नेता कोशिश करें तो भगवद् गीता विश्व भर में मान्य बन सकती है सारकारिक स्तर पर…

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Present Crisis of Auto Sector

Will the government be able to pursue GST Council to agree for a cut in the rate of GST for auto sector from 28% to 18% as demanded by the auto manufacturers of the country? If not, what will be extent of cut and will it help auto sector to restrict the falling sales, rejuvenate the market and restore its past growth rate? How much of loss of tax collection can be afforded by the government? But many view thar the rate rate cut may not necessarily boost the sales figure.Even if it happens, it will be short lived. To remind the readers, the GST rates fixed for auto sector for different types of vehicles were significantly lower than the total of different taxes that were being paid by the auto manufacturers then.But strangely,there is hardly any authentic study about the gradual and continuing slow down of the sector during last so many months. SIAM or CII would have done it, but have not. Shri R C Bhargav, the old man of Maruti Suzuki, views the reluctant banks providing loans to the buyers and the mandate to introduce costly safety features such as airbags and ABS on new cars are two main reasons for the increase in the cost of entry cars as the reasons for the increased price by around Rs. 55000 including around Rs. 20,000 through higher road tax imposed by some states.https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/cars-getting-expensive-unaffordable-maruti-chairman-bhargava/articleshow/71057677.cms

Interestingly, Manmohan Singh for the first time beside criticising the government has come out with his five- point remedy plan. And the experts in government must look into the possibility of rational steps, if possible. But unfortunately, the OEMs who know the reasons of slowdown best and some long term solutions too, have not volunteered to announce the steps they must take on their own. I can point to at least one very important reason of increased cost of car manufacturing. That is because of the diminishing interest and zeal of the OEMs in investing for increasing the indigenous content in the vehicles and over the years almost every manufacturer would have increased the import content of components in all new models introduced. I have not heard of any such effort from the auto component sectors. Our OEMs have tasted the ease of importing everything from China that was not the way it was there before liberalisation. OEMs are also not exploring the possibility of exports to its best potentials.

https://www.indiatoday.in/business/story/manmohan-singh-slams-govt-shares-5-point-remedy-plan-for-revival-1598509-2019-09-12

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भगवद्गीता:हिन्दूओं से एक आग्रह:जाति प्रथा को छोड़ें।

हम सब यह स्वीकार करते हैं कि हमारा धर्म हिन्दू है. हमारा धर्म एवं जीवन भारत के अति प्राचीन काल के मनीषियों द्वारा रचित वेद, उपनिषद्,महाभारत, भगवद् गीता, रामायण आदि धर्मग्रथों की शिक्षाओं पर आधारित है. उसी आधार पर मेरा यह समयानुकूल आग्रह है सभी प्रबुद्ध हिन्दू वर्ग से.अपने धर्म ग्रथों के आदेशों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें…पोंगा पंडितों के अज्ञान एवं स्वार्थी समाज-नेताओं के कारण जन्मी एवं फलीफूली जाति प्रथा का ख़ात्मा आज की राष्ट्रीय ज़रूरत है,समयानुकूल है एवं शास्त्र -सम्मत भी है. हमारे मनीषियों द्वारा प्रतिपादित और पूर्णत: वैज्ञानिक व्यक्ति के कर्म एवं स्वभाव पर आधारित चार वर्णों की वर्ण-व्यवस्था में माता पिता के वर्ण का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है गीता में, और साथ ही किसी वर्ण को दूसरे से नीचे या ऊपर का नहीं कहा गया है.

हम सब आज की ज़रूरत के अनुसार एक साथ ब्राह्मण बनें, क्षत्रिय बनें, वैश्य बनें एवं मिहनतकश सेवाप्रदान करने वाले मज़दूर बनें.एक दूसरे का सम्मान करें. आज घर में या बाहर परिवार-पालन के लिये किसी ज़िम्मेदारी को सफलता से निभाने एवं अपने कर्मक्षेत्र में समय के साथ पदोन्नति पाने के लिये हममें चारों वर्णों के गुणों के उचित मिश्रण की जरूरत है.

हमें अभ्यास,स्वाध्ययन एवं स्वनिर्माण से (ब्राह्मण का)शम, दम, तप, शौचम्, क्षान्ति, आर्जवम्,स्वाध्याय, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य; (क्षत्रिय का)शौर्य,तेज़,धृति, दाक्ष्य, युद्ध से अपलायन,दान, ईश्वरभाव; (वैश्य का)कृषि,गोपालन,वाणिज्य एवं (चतुर्थ वर्ण शूद्र का) परिचर्या गुण यथासम्भव हासिल करने की कोशिश करनी चाहिये.ब्राहम्ण स्वभाव के लोगों में सत्वगुण प्रधान,रजोगुण अल्प,तमोगुण न्यून होता है;क्षत्रिय स्वभाव में रजोगुण प्रधान,सत्त्वगुण अल्प एवं तमोगुण न्यून होता है;वैश्य स्वभाव में रजोगुण प्रधान,तमोगुण अल्प,सत्त्वगुण अल्प होता है;और शूद्र स्वभाव में तमोगुण प्रधान,रजोगुण अल्प,सत्त्वगुण अल्प होता है.अपने कार्यभार को सर्वोत्तम तरीक़े से सम्पादन के लिये आवश्यक गुणों को अभ्यास और तप द्वारा अपने में लाना पड़ता है. वह किसी जाति विशेष में पैदा होने कारण नहीं पाया जाता.सदियों से ऐसा ही होता रहा है. सब जाति के लोगों के लिये स्वाध्याय ज़रूरी है. अपने घर में सभी को परिचर्या एवं सफ़ाई अपने ही करनी पड़ती है जो पहले दूसरे कर देते थे, साथ ही वैश्य की तरह आर्थिक विषयों का ख़्याल रखना पड़ता है, ब्राह्मण बन बच्चों के पढ़ाई लिखाई पर भी ध्यान देना पड़ता है.

गीता दो अन्य गुणों के आधार पर व्यक्ति विशेष में अन्तर की बात विस्तार से करती है.एक व्यक्तियों को तदानुसार सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्रकृति का बताता है (गुणत्रयविभागयोग अध्याय १४,श्रद्धात्रयविभागयोग अध्याय १७,मोक्षसंन्यासयोग अध्याय १८); एवं दूसरा दैविक,आसुरी और राक्षसिक प्रवृति का (देवासुरसंपद्विभागयोग अध्याय १६). हम देश के सभी नागरिक को कम से कम इन अध्यायों की व्याख्याओं को एक बार अपने गृहस्थ जीवन की शुरूआत में ज़रूर पढ़ना चाहिये.

गीता में कृष्ण का आग्रह है कि व्यक्ति इन्द्रिय अनुशासन एवं संयमन द्वारा अपने आचरण एवं स्वभाव को धीरे धीरे अपने को तामसिक से राजसिक एवं फिर सात्त्विक बनाये. राक्षसी प्रवृतियाँ का पूर्ण त्याग एवं आसुरिक प्रवृतियाँ का परित्याग कर दैविक सम्पदा का मालिक बने एवं अच्छे नागरिक का कर्त्तव्य निभाये.यह वर्ण विभाजन सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है. अर्वाचीन भाषा में पुराने नामकरण को इस प्रकार बदलने की ज़रूरत है- १. रचनात्मक विचार करनेवाला चिन्तक, २.राजनीतिज्ञ,३.व्यापारी वर्ग, ४. श्रमिक वर्ग.

हमारे दो महत्वपूर्ण प्राचीन मान्यताएँ हैं-

१. सभी जीवों में एक ही आत्मा विराजमान है.आत्मा न पैदा होती है, न मरती है, वह केवल देह बदलती रहती है.अगर हम इसे मानते हैं तो हम एक दूसरे व्यक्ति को जन्म पर आधारित जाति, धर्म में कैसे बाँट सकते हैं.

सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि….६.२९….आत्मौपम्येन सर्वत्र समय पश्यति…६.३२ ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: अर्थात् जगत् में सारे जीव मेरे शाश्वत अंश हैं……८.७; अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:,मैं समस्तजीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूं १०.२०; यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन,न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्,मैं समस्त सृष्टि का जनक बीज हूँ,१०.३९; सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो, अर्थात् मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ, १५.१५; ईश्वर:सर्वभूतानामं हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति, अर्थात् परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं,१८.६१;

फिर हर व्यक्ति से अपेक्षा भी करते हैं, ‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’.समस्त जीवों के प्रति दयालु, ५.७;…..छिन्न द्वैधा यतात्मान:सवभूतहिते रता: ५.२५ सुहृद सर्वभूतानां….५.२९ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति, अर्थात् जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है,६.३०;सम: सर्वेषु भूतेषू अर्थात् वह प्रत्येक जीव पर सम भाव रखता है,१८.५४;

२. हिन्दू धर्म पुनर्जन्म पर विश्वास करता है एवं उनका यह जन्म और अगला जन्म उनके अच्छे या बुरे कर्म पर आधारित है. फिर किसी के माता पिता पिछले जन्म में किस जाति के थे कैसे जानते हैं. कोई भी अच्छे या बुरे कर्मों के आधार पर श्रेष्ठतर या नीचे के जाति में पैदा हो सकता है.

अगर हम उपरोक्त मान्यता में विश्वास करते हैं तो फिर जाति के नाम पर वैमनस्य क्यों क्यों, हिंसक झगड़ा क्यों। जब सभी जीवों में आत्मा एक ही है तो हिंसा क्यों, जब हमें यह नहीं पता कि हम ख़ुद और हमारे पूर्वज किस जाति, धर्म के थे या अगले जन्मों मे किस जाति, धर्म के होंगे, तो फिर जातियों में वैमनस्य क्यों?

भगवद् गीता की वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी मान्य होनी चाहिये क्योंकि वह व्यक्ति के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा किए गए हैं. शास्त्रों के वर्णाश्रम की अवधारणा में प्रत्येक व्यक्ति शूद्र पैदा होता है और प्रयत्न और विकास से अन्य वर्ण अवस्थाओं में पहुंचता है। प्रत्येक व्यक्ति में चारों वर्ण के स्वाभाविक तीनों गुण-सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक- अलग अलग अनुपात में रहते हैं। इस व्यवस्था को ही ‘वर्णाश्रम धर्म’ कहते हैं।अर्थ है- वर्ण + आश्रम अर्थात, वह वर्ण (रंग, व्यक्तित्व) जो स्वभाव द्वारा अपने आप (आश्रम या बिना श्रम के) बन जाये।

सबसे पहले वेदों में प्रतीकात्मक रूप से पुरूष या परम सत्ता के शरीर से चारों प्राकृतिक वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है:”उनके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ था, उनकी दो भुजाओं से राजन्य(क्षत्रिय), उनकी दोनों जाँघों से वैश्य; उनके पैरों से शूद्र ।”

बृहदारण्यकोपनिषद के पहले अध्याय के चौथे ब्राह्मण में वर्णों के चार नामों एवं उनकी ब्रह्म से उत्पत्ति की बात कही गई है. पर भगवद् गीता में बहुत सरल तरीक़े से इनके अन्तर को बताया गया है -पहले ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:…..’४.१३ फिर १८वें अध्याय में अपने चारों वर्णों का नाम भी दे देते हैं-“ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥”वे चार वर्ण हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के तथा शूद्र और यह विभाजन कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा किए गए हैं ( माता पिता के वर्ण के अनुसार किसी व्यक्ति का वर्ण निर्धारित करने की व्यवस्था नहीं की है) १८.४१-४४.और अगले तीन श्लोकों में चारों के लक्षणों को अलग अलग बताया है।

श्री श्री परमहंस योगानन्द ने अपनी श्री मद्भगवद्गीता के अध्याय २ के ३१ श्लोक की व्याख्या करते हुये कहते हैं, “….प्रत्येक देश के पास उसके बौद्धिक और आध्यात्मिक लोग या ब्राह्मण , उसके योद्धा और शासक अथवा क्षत्रिय,उसके व्यवसायी या वैश्य और उसके श्रमिक या शूद्र होते हैं….सर्वप्रथम भारत के ऋषियों ने ही शरीर की शासन प्रणाली के तर्ज़ पर मनुष्य की प्राकृतिक योग्यता और कार्यों के अनुसार चार प्राकृतिक वर्णों की व्यवस्था पर बल दिया ….भारत में चार वर्ण मूल रूप से लोगों के जन्मजात गुणों और बाहरी कार्यों पर आधारित थे.समाज में सभी का समान सम्मान और आवश्यक स्थान था…..” बाद में, समाज के नेतृबृन्द ने स्वार्थ एवं अज्ञानता के कारण चार वर्ण असंख्य जातियों में परिवर्तित हो गये. “ ब्राह्मणों के अयोग्य बच्चे ज़रूरी आध्यात्मिक ज्ञान एवं शिक्षा के बिना ही मात्र जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने का दावा करने लगे.और इन्होंने अन्य वर्णों को नीचा बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा.शूद्रों को उनकी श्रेष्ठतर योग्यता होने पर भी, हीन कार्यों एवं दासता तक ही सीमित रखा गया.” जातियाँ की संख्याएँ बढ़ती गईं..एक दूसरे में विद्वेष का सिलसिला आरक्षण के बाद और बढ़ गया.

चिन्मय मिशन के स्वामी चिन्मयानन्द ने गीता के अध्याय १८ के ४०-४४ श्लोकों में वर्ण सम्वन्धी व्याख्या में ऐसा बिचार ब्सक्त किया है, जो सभी सुधी पाठकों को पढ़ना,समझना एवं मनन कर समाज की भ्रान्तियाँ को दूर करने में मदद करनी चाहिये और एक शान्तिमय प्यार, एक दूसरे के कार्यों के प्रति श्रद्धा के आधार पर समाज को आगे ले जाना चाहिये.

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शंकराचार्य का जाति भेद का ज्ञान अर्जन

किस ज़माने में रह रहें है हम…हम सब क्या शंकराचार्य से भी ऊपर हैं या उन्हीं द्वारा प्रतिपादित हिन्दू होते हुये भी उनकी सीख से सीख नहीं लेना चाहते….पढ़िये

शंकराचार्य का जाति भेद का ज्ञान अर्जन

अपने वराणसी के प्रवासकाल में एक दिन शंकराचार्य अपने शिष्यों के संग गंगा स्नान कर वापस लौट रहे थे. उन्हें एक चाण्डाल चार कुत्तों को साथ सामने से उसी रास्ते पर आता दिखाई दिया । शंकराचार्य रुक कर एक किनारे खड़े हो गये ताकि कहीं उनसे चाण्डाल छू न जाय और उससे छू जाने से वे अपवित्र न हो जायें.उसे पास आने पर उच्च स्वर में बोले, ” दूर हटो, दूर हटो ।” सुनकर पास आते चण्डाल ने कहा, ” ब्राह्मण देवता, आप तो वेदान्त के अद्वैतवादी मत का प्रचार करते हुए भ्रमण कर रहे हैं । फिर आपके लिये यह अस्पृश्यता-बोध (छुआ-छूत), भेद-भाव दिखाना कैसे संभव होता है ? मेरे शरीर के छू जाने से आप कैसे अपवित्र हो जायेंगे, क्या हमदोनों का शरीर एक ही पंचतत्व के उपादानों से निर्मित नहीं है ? आपके भीतर जो आत्मा हैं और मेरे भीतर जो आत्मा हैं, वे क्या एक ही नहीं हैं? हम दोनों के भीतर, और सभी प्राणियों के भीतर क्या एक ही शुद्ध आत्मा विद्यमान नहीं हैं? कहते हैं यह सुनते ही आचार्य शंकर समझ गए कि यह कोई साधारण चांडाल नहीं है और ये तो चांडाल के वेश में स्वयं भगवान् विश्वनाथ है । आचार्य ने चांडाल के वेश में आये शिव का तत्क्षण दंडवत प्रणाम किया और उनकी स्तुति पाँच श्लोकों से की। वे श्लोक “मनीषा पंचकं” के नाम से प्रसिद्द हैं । इस स्त्रोत्र के प्रत्येक स्तुति के अन्त में कहा गया है- ” इस सृष्टि को जिस किसी ने भी अद्वैत-दृष्टि से देखना सीख लिया है, वह चाहे कोई ब्राह्मण हो चण्डाल हो; वही मेरा सच्चा गुरु है.देखिये , प्रत्येक श्लोक के अंत में ‘मनीषा’ शब्द आता है.

मनीषा पञ्चकं

जाग्रत्स्वप्न सुषुत्पिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते

या ब्रह्मादि पिपीलिकान्त तनुषु प्रोता जगत्साक्षिणी।

सैवाहं न च दृश्य वस्त्विति दृढ प्रज्ञापि यस्यास्तिचेत

चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ १ ॥

जो चेतना जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि तीनों अवस्थाओं के ज्ञान को प्रकट करती है जो चैतन्य विष्णु, शिव आदि देवताओं में स्फुरित हो रहा है वही चैतन्य चींटी आदि क्षुद्र जन्तुओ तक में स्फुरित है । जिस दृढबुद्धि पुरुष कि दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व आत्मरूप से प्रकाशित हो रहा है वह चाहे ब्राह्मण हो अथवा चांडाल हो, वह वन्दनीय है यह मेरी दृढ निष्ठा है । जिसकी ऐसी बुद्धि और निष्ठा है कि “मैं चैतन्य हूँ यह दृश्य जगत नहीं”‘ वह चांडाल भले ही हो, पर वह मेरा गुरु है॥१॥

ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं

सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणयाशेषं मया कल्पितम् ।

इत्थं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले

चण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ २ ॥

मैं ब्रह्म ही हूँ चेतन मात्र से व्याप्त यह समस्त जगत भी ब्रह्मरूप ही है । समस्त दृष्यजाल मेरे द्वारा ही त्रिगुणमय अविद्या से कल्पित है । मैं सुखी, सत्य, निर्मल, नित्य, पर ब्रह्म रूप में हूँ जिसकी ऐसी दृढ बुद्धि है वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है॥२॥

शश्वन्नश्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरोः

नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याज शान्तात्मना ।

भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके

प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुरित्येषा मनीषा मम ॥ ३ ॥

जिसने अपने गुरु के वचनों से यह निश्चित कर लिया है कि परिवर्तनशील यह जगत अनित्य है । जो अपने मन को वश में करके शांत आत्मना है । जो निरंतर ब्रह्म चिंतन में स्थित है । जिसने परमात्म रुपी अग्नि में अपनी सभी भूत और भविष्य की वासनाओं का दहन कर लिया है और जिसने अपने प्रारब्ध का क्षय करके देह को समर्पित कर दिया है । वह चांडाल हो अथवा द्विज हो, वह मेरा गुरु है॥३॥

या तिर्यङ्नरदेवताभिरहमित्यन्तः स्फुटा गृह्यते

यद्भासा हृदयाक्षदेहविषया भान्ति स्वतो चेतनाः ।

ताम् भास्यैः पिहितार्कमण्डलनिभां स्फूर्तिं सदा भावय

न्योगी निर्वृतमानसो हि गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ ४ ॥

सर्प आदि तिर्यक, मनुष्य देवादि द्वारा “अहम्” मैं ऐसा गृहीत होता है । उसी के प्रकाश से स्वत: जड़, हृदय, देह और विषय भाषित होते हैं । मेघ से आवृत सूर्य मंडल के समान विषयों से आच्छादित उस ज्योतिरूप आत्मा की सदा भावना करने वाला आनंदनिमग्न योगी मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है॥४॥

यत्सौख्याम्बुधि लेशलेशत इमे शक्रादयो निर्वृता

यच्चित्ते नितरां प्रशान्तकलने लब्ध्वा मुनिर्निर्वृतः।

यस्मिन्नित्य सुखाम्बुधौ गलितधीर्ब्रह्मैव न ब्रह्मविद्

यः कश्चित्स सुरेन्द्रवन्दितपदो नूनं मनीषा मम ॥ ५ ॥

प्रशांत काल में एक योगी का अंत:करण जिस परमानंद कि अनुभूति करता है जिसकी एक बूँद मात्र इन्द्र आदि को तृप्त और संतुष्ट कर देती है । जिसने अपनी बुद्धि को ऐसा परमानंद सागर में विलीन कर लिया है वह मात्र ब्रह्मविद ही नहीं स्वयं ब्रह्म है । वह अति दुर्लभ है जिसके चरणों की वन्दना देवराज भी करते हैं वह मेरा गुरु है । ऐसी मेरी मनीषा है॥५॥

क्या अब भी आप जाति भेद के पक्षधर बने रहेंगे?

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