भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य

आजकल तीन किताबें पढ़ रहा हूँ।

पहली William Dalyrymple की पुस्तक The Golden Road- कैसे प्राचीन भारत दुनिया को बदल दिया था-प्राचीन भारत के ज्ञान – विशेषकर गणित और विज्ञान में और उनपर आधारित विभिन्न इन्जीनियरिंग क्षेत्र को। 

दूसरी किताब एक अद्भुत व्यक्ति पर है जो देश के एक प्रदेश का लगातार तीन बार मुख्य मंत्री बन सबसे विकसित प्रदेशों की श्रेणी में ला दिया।और वही क्रम देश के स्तर ११+ साल से चल रहा है। यह एक अपने क्षेत्रों के बहुत से धुरंधर व्यक्तियों ने लिखा है।

तीसरी किताब विकसित भारत@२०४७ का रोडमैप है देश के एक मुख्य अर्थनीति सलाहकार द्वारा लिखी गई और देश विदेश में सराही जा रही है। (दूसरी पुस्तक हमें श्री शुक्लाजी  के सौजन्य से पढ़ने को मिली, जब मैं अचानक उसको ख़रीदने की उनसे चर्चा कर रहा था।दूसरी दोनों को मैंने अमाजन से मंगाया।यह कविता कल अचानक निकल आई ….

विकसित भारत@२०४७

चारों तरफ़ जब आवाहन है 

विकसित राष्ट्र बनाने की

जाति जाति की बातें करते

कब तक समय गवांओगे?

पढ़ो पढावो हूनर सिखाओ 

सब कुछ हमें बनाना है

नहीं रहेंगे  निर्भर पर पर 

जग  को यह दिखलाना है।

हम्हीं खिलायेंगे सब जग को

हम ही स्वस्थ बनायेंगे।

आपद विपदा में जग की

हम ही सदा तत्पर रहते।

नहीं किसी के झाँसे में आ

हम अब भविष्य गवायेंगे।

आगे आओ हाथ बढ़ाओ 

साथ साथ मिल चलना है।

दूर खडी माँ हाथ उठाये

आश लिये ‘कब?’आँखों में

हमको गोद उठाने को..

आशीष पा रहे निकलो आगे

सब घर स्वर्ग बनाने को।

भारत माँ एक आश लिये है 

जिसे समझना ही होगा-

’राम आ गये अब अपने घर ..

‘राम राज्य‘ लाना होगा।

विकसित भारत ध्येय देश का 

जन जन तक जाना होगा।

और परिश्रम चरमसीमा तक 

हम सबको करना होगा। 

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राहुल गांधी- विकृत सोच

राहुल गांधी- विकृत सोच
अचानक ही एक उम्र जनित गलती के कारण मैं कल फिर राहुल गांधी का नेता विपक्षी की तरह दूसरी बार लोकसभा को सम्बोधित करते सुना। मन में एक बड़ा प्रश्न आया। उन्होंने माता पिता से क्या सीखा है और जिस माहौल में बढ़े हैं वह क्या ऐसा ही व्यक्तित्व गढ़ता है? राहुल गांधी को पिछले कुछ समय से प्रशिक्षित करनेवाले किस तरह के लोग हैं? राजगद्दी पर बैठने के लिये वे ऐसे झूठ और ग़लत रास्ते का सहारा ले रहे है। जिससे यह लगता है कि उन्हें इस देश और उसके लोगों का रत्तीभर भी ख़्याल नहीं है।
आज पचास से ऊपर की उम्र में ऐसी अपरिपक्वता पता नहीं उन्हें गद्दी दिलायेगी या नहीं, पर एक बात तय है कि हिन्दू समाज का सत्यानाश हो जायेगा।
पिछले सालों का जाति प्रथा को हिन्दू समाज से मिटाने का मोदी सरकार एवं आर.एस.एस के भागवत का प्रयास मिट्टी में मिल जायेगा। देश में अराजकता फैल जायेगी। कैसे हज़ारों जातियों में बंटे जनसंख्या से सभी जातियों से सभी पदों पर उनकी संख्या के प्रतिशत के आधार पर हर लेवल पर लोग हो सकते है?
राहुल आजकल हिन्दू धर्म के देवों के ब्रह्म रूपों के बारे में विना किसी सनातन धर्म के ग्रंथों के ज्ञान के बातें कर रहे हैं। कहीं कहाई या सुनी सुनाई बातों को तर्क में देना वैसे ही है जैसे मेरे अपने एक बाबा को मैं समझा नहीं पाया की धरती घुमती है। पर हिन्दू धर्म के ग्रंथों को सभी ध्यान से पढ़ने की ज़रूरत और उसका संदर्भ लें बोलने के वक्त उसका सत्य भाव से रखना जरूरी है नहीं तो अनर्थ हो जायेगा। हिन्दू धर्म और संविधान का विना किसी प्रौढ़ता का हवाला देना बहुत नुक़सान करता रहेगा आज डिजीटल मीडिया के सार्वभौमिक उपलब्धता के कारण। राहुल न शिव के बारे में जानते, न महाभारत के, न कृष्ण, न राम के। अगर नहीं जानते तो ग़लत मनगढ़ंत चीजों को न कहें। बहुत बवाल हो सकता है । हिन्दू धर्म और उनके श्रेष्ठ सगुन नाम को ले, आगे बात न करें।
राहुल गांधी को इस रास्ते हटना चाहिये। यह विजातीय रास्ता है। पता नहीं सुनहरे भारत, विकसित भारत की परिकल्पना ऐसी राजनीतिक स्थिति में संभव हो पायेगी। शायद नहीं, जो सभी विदेशी शक्तियाँ चाहती हैं।

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मैनुफ़ैक्चरिंग- मेरा जीवन, मेरा देश


एलान मस्क (Elon Musk) युगान्तरकारी टेस्ला ईवी गाड़ियों के लिये प्रसिद्ध हो गया, वह स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से है। भारत अगर आई. आई. टी आदि देश के जाने माने इंजीनियरिंग कालेजों से अगर अमरीका के एलान मस्क, स्टीव जॉब्स आदि की तरह का इंटरप्रेनर और इनोभेटर पैदा करना चाहती है तो मेरे विचार हमारे कालेजों के भर्ती से ले पढ़ाने के तरीक़े में आमूल परिवर्तन करना होगा। इसके लिये इन सभी कालेज के डायरेक्टरों को अच्छे फैक्लटी की सलाह से बदलाव लाना होगा। यह सरकार का निर्देश हो सकता है, सरकार आर्थिक सहायता दे सकती है अगर चाहे। पर करना इन इंस्टीट्यूट के शिक्षाविदों को ही होगा।


दो विशेष कमियाँ मेरी नज़र में हैं अपने अनुभव के अनुसार और आधार पर-
१. भर्ती के लिये चिन्हित विद्यार्थियों की स्वाभाविक रूचि को जानना जरूरी है जो आज नहीं होता- मैं १९५७ में खडगपुर आई.आई. टी प्रवेश परीक्षा से होकर गया था। उस समय भी ४०,००० परीक्षा देते थे। पर भर्ती होने के पहले मुझे मेकेनिकल ब्रांच के लिये चार प्रोफ़ेसरों के एक इंटरव्यू में यह बताना पड़ा था कि मुझे मेकेनिकल में क्यों भर्ती चाहिये, मेरी इसकी रूचि का कारण क्या है? मैंने उत्तर दिया कि मैं जहां मैट्रिक तक का शिक्षा पाया, वह देश का जाना माना जूट मिल था, जहां एक कोयले से चलने वाला अच्छा ख़ासा पावर हाउस भी था और जूट उद्योग मशीनें अलग से। मैं वहाँ के चीफ़ इंजीनियर को मिलते सम्मान से प्रभावित था, स्कूल में कक्षा में प्रथम होते रहने के चलते मिला भी था। वहाँ हुगली नदी में एक जेटी थी जहां दो क्रेन भी थे जो बड़े वोटों से सामान उतारते थे।मैं अकेले जेटी पर हर शाम हुगली नदी को निहारता रहता था। इसका हमारे मेकेनिकल इंजीनियर बनने में बहुत हाथ था। मैंने क़रीब पंद्रह बीस मिनट इस विषय पर इंटरव्यू लेनेवालों को बताया और शायद इसी कारण मुझे वह विभाग मिल गया।


२. पर पूरे चार की पढ़ाई में मज़ा हमें चौथे साल में ही आया जब हमारे तीन प्रोफ़ेसर अमरीकन यूनिवर्सिटी के आये और उनसे पढ़ने का सौभाग्य मिला। आश्चर्य कि बात यह हुई कि चौथे साल के जिस सेमेस्टर में वे पढ़ाये मैं क्लास में औवल हो गया। मुझे उनके सिवाय शायद ही किसी प्रोफ़ेसर की कक्षा में पढ़ाये चीजों की पूरी समझ हुई और उनके औद्योगिक उपयोग की कोई जानकारी हुई।
मैं बराबर अपने तीनों बच्चों और अन्य दोस्तों को कहता रहा कि खडगपुर के पूरे चार साल में मैं शायद ही कुछ इंजीनियरिंग सीखा। जो कुछ भी इंजीनियरिंग सिखा वह हिन्दमोटर के कारख़ाने काम करते करते सीखा और इतना सीखा कि पूरे उद्योग में लोग जाने। मैंने आज के टाटा मोटर्स के इंजीनियरों को कुछ विषयों पर बताने के लिये बुलाया गया। इंजीनियरिंग की किताबें भी लिखीं जिन्हें उद्योगों ने मेरे माँगे दाम पर ख़रीदा। आज भी वह एक मेरी रूचि का अंश है।


३. मेरे ख़्याल से सभी इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को अपने रूचि के जाने माने उद्योग में चारों साल ट्रेनिंग अनिवार्य होना चाहिये। उन्हें मन लगा कर उद्योगों की ज़रूरतों को समझना चाहिये, वैसे ही ज्ञान अर्जन भी करना चाहिये। वहाँ के बड़े इंजीनियरों को अपने मिहनत प्रभावित करना चाहिये। नौकरी पहले ही पक्की हो जायेगी। उद्योगों एवं इंजीनियरिंग में बहुत ज़्यादा तालमेल होना चाहिये।


४. आज बदले परिवेश में प्रोजेक्ट के जरूरी धनराशि का प्रबंध इतना आसान है तो फिर स्टार्ट अप न बना नौकरी क्यों? सभी आई आई टी के लड़कों की तरह मिहनत करनेवाले भी नारायनमूर्ति, धीरूभाई अम्बानी, या गौतम आदानी बन सकते हैं। सोचिये क्यों नहीं आयेंगी और बढ़ेगी मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग और हम क्यों नहीं चीन को मात दे सकते हैं बिना युद्ध किये।


मुझे दुख होता है कि मेरे तीनों मेकेनिकल इंजीनियर बेटे अपने को आई. टी उद्योग के बन गये अमरीका जा, जब सबको इसी देश के मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग मे। मुझसे अच्छा जॉब मिला था। वे अमरीका में एम.एस किये और फिर वही नौकरी करने लगे।बाद एक ने एक ने आई.टी का छोटा कम्पनी स्थापित किया और वह और उसकी पत्नी कुछ भारत के लोगों भारत में नौकरी दे काम करवाते हैं।


इससे उनके मैनुफ़ैक्चरिंग पढ़ने का कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ। यही कारण है कि हमारा देश मैनुफ़ैक्चरिंग में फिसड्डी बनता गया १९९० के बाद से और देश चीन के दबाब में है।


उद्योगपति इस बात को समझते नहीं, उन्हें तो सस्ते सस्ते लोग चाहिये जो देश में बहुतायत से हैं। बहुत निम्न से अतिश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कालेज हैं। हमारे देश के इंजीनियरों ने आई. टी उद्योग में देश के लिये नाम तो कमाया, पर दूसरी तरफ़ करोड़ों को काम देनेवाला उद्योग नहीं स्थापित कर सके।चीन की तरह का सोच रख कर ही हम उनकी बराबरी कर सकते हैं और हो सकता है कि आगे भी जा पहुँचे। क्या सरकार और प्राइवेट सेक्टर मिल कर यह सुविधा प्रदान कर सकते हैं कि देश का ९५% व्यक्ति – पुरूष और स्त्री दोनों किसी न किसी या एक से हुनर में प्रशिक्षित हो
यह विषय बहुत विशद है । और विना समझे बनाये गये व्यापारिक धंधों से लाभ को प्राथमिकता दे, एक छोटा वर्ग तो ज़रूरत से ज़्यादा सम्पन्न हो सकता है, पर अधिकांश जन वर्ग नहीं…यह समझना और मेरे बताये रास्ते पर चल ही देश का कल्याण होगा। दुख है कि जो यह कर सकते हैं उनके मन में यह विचार नहीं और मुझमें ८५ साल की उम्र वह ताक़त नहीं मैं उन लोगों से मिलने का प्रयास करूँ और अपने मत को समझाऊँ । क्या कोई मेरा मदद कर सकता है? मेरे पोस्ट कोई भी किसी तरह से उपयोग कर सकता है, अगर इससे देश का लाभ हो।
मेरी पूरी कहानी उपलब्ध है http://www.drishtikona.com पर …

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प्रशान्त किशोर बचा, बढ़ा सकते हैं पर रास्ता बदल


(गलती माफ़ करें, उसे ठीक ले, इस उम्र में अब इस में ज़्यादा का इजाज़त नहीं देता)
प्रशान्त किशोर चुनाव जिताने के धंधे से आगे बढ़ अब बिहार की राजनीति में आने का उपक्रम कर रहें हैं। गांव गांव घूम आम वोटरो के सोच की ग़लतियों को बता रहे हैं। वह यह मान कर चल रहे हैं कि बिहार के लोगों की बदहाली में वहाँ के लोगों का कोई दायित्व नहीं है और सब कुछ सरकारों की गलती है। अगर गुजरात में बिहार का बैंक में जमा धन जा रहा है, इस दुरवस्था से उबरने का उन्हें और शायद सभी बिहारियों को दुख है, उसके लिये बिहार में रहनेवाले या बिहार के बाहर रहनेवाले लोग ही ज़्यादा बड़ा कारण हैं।

उदाहरण के लिये अब गाँव गाँव में स्कूल बने हैं, शायद उनमें अन्य ज़रूरी व्यवस्था जैसे पुस्तकालय, मैदान के साथ खेलकूद का सामान, अब तो कुछ स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब आदि भी हो सकता है। पर बिहार के लोगों में शिक्षित होने की अरूचि और गलत या सही ढंग से परीक्षा पास की प्राथमिकता को कौन हटा सकता है। ऐसी स्थिति में वहाँ की शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाना और हुनर प्रशिक्षण पर बल देना, अभिभावकों की, गांव में रहनेवाले पढ़े लिखे लोगों का शिक्षकों से मिलना और उनकी सहायता माँगना जरूरी तरीक़ा है। इसके बिना बिहार किसी तरह से सम्पन्न नहीं हो सकता। प्रशान्त किसोर जी को इन सबके बारे में आम लोगों में जागृति लानी होगी। आज सरकार से सब तरह की सुविधाएँ दी जा रहीं है, उनका सब तक पहुँचाने की सफलता को संभव बनाने के लिये गांव के ही जागरूक युवकों को बिना किसी लाभ की सोचे, काम करना होगा। गांव गाँव में ऐसे लोगों का पाँच दस लोगों का एक दल भी यह कर सकता है थोड़े प्रशिक्षण के बाद।

गांव के पंचायत के प्रबुद्ध लोग स्कूल परिसर और वहाँ के साधनों का व्यवहार कर गांव के हर उम्र के लोगों को साल भर छुटूटी के दिन या महीनों में अनेक तरह के शिविर लगवा सकते हैं और अपने गांव को शिक्षित और प्रशिक्षित सकते हैं। वहाँ के फैलते हुए नशाखोरी और अन्य गलत आचरणों पर लगाम लगेगा। मैं केवल चीन के प्रगति के एक घटने की कहानी बताना चाहता हूँ । एक गांव की महिला शिक्षक का काउंसिल के स्कूल की तनख़्वाह से घर का खर्चा नहीं चलता था, वह सोचती रही , कुछ हल नहीं निकल रहा था। अचानक उसके मन में आया कि मैं एक मोज़ा बनाने की मशीन ख़रीद कर मोज़ा बनाना क्यों न चालू करूँ जिसमें वह प्रशिक्षित थी। उसने वही किया, फिर नौकरी छोड़ दी। उसका व्यवसाय बढ़ता गया और अन्य औरतें अपने घरों में उससे प्रशिक्षित हो मोज़ा की मशीन ख़रीद मोज़ा बनाने लगी। एक दिन सब मिल एक कम्पनी बना दी और स्वचालित मशीनें ख़रीद ली।वह गाँव पूरे देश के कोने कोने में मोज़ा भेजने लगा। धीरे धीरे वह गांव एक छोटे शहर में परिगणित हो गया। सभी जरूरी सुविधाएँ आ गईं और पूरी दुनिया के मोज़े सप्लाई का केन्द्र बन गया। स्वाभाविकत: शहर के सभी लोग सम्पन्न हो गये। हमारे यहाँ यह क्यों नहीं हो सकता है?

पर हम एक सरकारी शिक्षक बन बिना कुछ किये खुश है।उन्हींमें से एक गलत तरह से पैसा कमा धनी बन जाता है और सभी केवल उसके चमचे बन रह जाते है।
गांव में मेरे बचपन में सब परिवारों में १५-२० विघा से अधिक ज़मीन हुआ करता था। गेहूं, धान मुख्य फसल थे। सब्ज़ी की खेती नहीं के बराबर होती थी। बरसात परदादी कुछ सब्ज़ियाँ लगा देती थी जैसे लौकी, कुम्हड़ा, तोरी आदि। साल भर आलू भी नहीं मिलता था, सुखवता आलू की सब्ज़ी ही बनती थी। परिवार बंटते गये हैं, ज़मीनें कम होती गई हैं। अब शायद औसतन ४-५ विघे ज़्यादा खेत नहीं। धान, गेहूं छोड़ सब्ज़ी, फल आदि की खेती कोई करना नहीं चाहता, फिर कहां से तो सम्पन्नता आये। लड़के पढ़ते नहीं। रामायण का गाना नहीं होता सब टीवी और अपने फ़ोन पर समय काटते हैं। अधिकांश लोग वीए, एम. ए करते हैं। विज्ञान, कॉमर्स आदि पढ़ता नहीं, क्योंकि उसमें अच्छा करने में मिहनत लगती है। आज से ३० साल पहले गांव के स्कूल से दो लड़के इंजीनियर बने, उसके बाद शायद कोई नहीं। लोग घर छोड़ छोड़ दूसरे प्रदेशों में निकल जाते हैं मज़दूरी से कमाने के लिये। हाँ, गाँव में मज़दूर मिलते नहीं, जो हैं वे भी काम करना नहीं चाहते। हमारे गाँव के पास डेहरी ऑन सोन में डालमिया के क़रीब छोटे बड़े २०कारख़ाने थे, वे यूनियन के कारण बन्द हो गये। नये कारख़ाने खुले नहीं। इंजीनियरिंग कालेज खुले नहीं, स्कूल, कालेज बन्द हो गये, लड़के लड़कियाँ केवल परीक्षा का फार्म भरते हैं और इंतहान देते हैं।

अब समाज की कुछ कुप्रथाएं के बारे में बताना चाहता हूँ। गाँवों में आम गरीब लोगों को अमीरों या बड़ी जातियों के ग़लत स्वभावों से ऊपर उठने की बात करनी चाहिये थी। दुर्भाग्यवश आज भी सभी बड़ों के गलत स्वभावों का नक़ल करते हैं, चाहे तिलक माँगने में या बेटे की शादी करने में। अबतक लोग जन्मोत्सव में शक्ति के बाहर क़र्ज़ लेकर भी खर्च करते जा रहे हैं।

दुख है कि प्रशांत जी कोई व्यवसाय नहीं हैं चलाये हैं और न वैसे उनकी सोच है। उन्हें व्यवस्था चलाने का कोई अनुभव नहीं है और पिछले चुनाव के उनकी टीवी पर के व्यस्तता से यही लगा कि अभी भी वे पुराने धंधे में ही रूचि रखते हैं, नहीं तो इतनी गहरी रूचि क्यों? और इसीलिये वे अपने भविष्यवाणियों में वे ग़लत सिद्ध हुए। एक साथ दो नाव पर पैर नहीं रखा जा सकता।

मेरी सलाह है प्रशांत जी किसी एक ज़िले के हर कोने के दस गाँवों को ले वहीं नवजवानों से उन्हेंसुधारने की कोशिश करते और उस सफलता को मॉडल बना अन्य ज़िले के अपने दोस्तों के सहायता में उनमें भी उसे चालू करते जाते।

मेरे बिचार से उनका आंदोलन लोगों के मन से दो चीजों निकाल देने का होना चाहिये था कि सरकार नौकरी दे सकती है सबको और वे घूस ले पैसा कमा सकते है।
उन्हें उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। उन्हें लोगों को अपने बच्चों को पढ़ने और हुनर सिखाने पर उतना ही मन लगाना चाहिये था जितना दक्षिण भारत के लोग कर रहे हैं। उनको आम लोगों के मन से स्थानीय राजनीति से नाता तोड़ नियमसंगत रास्ते पर चलने के लिये बताना चाहिये।

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मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग में कैसे चीन का वर्चस्व

मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग में कैसे चीन का वर्चस्व
मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्री बनने के बाद से भारत का मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर सिकुड़ता गया और इस सेक्टर में आयात बढ़ता गया। हमारे यहाँ के व्यवसायिक और ओ इ एम भी अपने यहाँ पुर्ज़ों को न बनाने का प्यास कर सस्ते पुर्ज़े आयात करने लगे चीन से और उसके बाद से भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर में केवल असेम्बली प्लांटों की तेज़ी से बृद्धि होने लगी। बहुत बड़े बड़े मशीनों के बनानेवाले प्लांट और मैनुफ़ैक्चरिंग के मंझले प्लान्ट बन्द हो गये, पूरे टर्नकी बेसिस पर पूरे के पूरे प्लांट बाहर से आने लगे।
पंजाब मशीनटूल्स एवं कृषि क्षेत्रों उपयोगी मशीनों का दुनिया सबसे बडा केन्द्र हो सकता था, पर वहाँ की राजनीति केवल सरकार से सब कुछ मुफ्त ले पूरे देश के कृषि क्षेत्र को कमजोर कर अपना उल्लू सीधा करती रही।
बंगाल का उन्नत मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर देखते देखते खत्म हो गया वहाँ की राजनीतिक बदलती कमजोरी से।
गुजरात एक उदाहरण है कि कैसे राजनीति एक पिछड़े प्रदेश को उद्योग और कृषि क्षेत्रों देश का सिरमौर बना सकती है।
महाराष्ट्र की राजनीति का विघटन समय रहते नहीं रोका गया तो वह भी बंगाल की अवस्था में पहुँच जायेगा।
मैंने भी देश के १९७०-८० का सबसे बड़े एक आटोमोवाइल के प्लांट में एक मुख्य भूमिका निभाया है और देखा है कि कैसे बेईमान निवेशक मालिकों की पीढ़ी आने पर वह कैसे मटियामेट हो गया, नहीं तो वह आज भारत का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल कहलाता।
वहीं बजाज ऑटो भी वैसा ही होता अगर वहाँ के भी परिवारवादी मैनेजमेंट में अच्छे उत्तराधिकारी नहीं आये रहते। आज के मैनुफ़ैक्चरिंग क्षेत्रों के मालिक और सी इ ओ पता नहीं क्यों भारत को चीन के रास्ते चल खुद दुनिया बड़ा मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग नहीं बनना चाहते। उनके मैनेजमेंट का ध्येय चीन को जहां तक जबतक नहीं छोड़ने की है जब तक समर्थ सरकार इसके लिये उन्हें थोड़ी दृढ़ता से समझाने की कोशिश न करे। चीन भारत के प्रगति पर हर तरह का रोड़ा लगाने के लिये तुला हुआ। उनके चंगुल से मुक्त भारती य उद्योगों के लिये जरूरी है। अगर ISRO चीन रशिया के सहायता से मुक्त हो सकता है, तो प्राइवेट क्षेत्र की कम्पनियाँ क्यों नहीं? क्यों नहीं अनुसंधान पर खर्च बढ़ाया जा सकता?
अख़बारों के अनभिज्ञ या पैसे के लालची पत्रकारों के लेख इसी बात का संकेत देते हैं, जो नीचे बताया है। अगर टाटा और महिन्द्रा बिजली की कार में अपनी कैपेसिटी यथा शीघ्र न बढ़ायेंगीं तो चीन के उद्योगपति ही पिछले द्वार से भारत पर छा जायेंगे। अगर इस सरकार के रहते यह न रूका तो फिर किसी दूसरे में भारत को मैनुफ़ैक्चरिंग में आत्मनिर्भर या शिरमौर बनाने का ताक़त नहीं होगा। देखिये दो प्रेस रिपोर्ट
https://economictimes.indiatimes.com/news/india/let-the-chinese-come-for-aatmanirbhar-bharats-sake/articleshow/111051275.cms यह लेख सिफ़ारिश करता है कि चीन की बैसाखी के सहारे भारत को आत्मनिर्भर बनना चाहिये।
https://economictimes.indiatimes.com/industry/cons-products/electronics/pcb-dumping-duty-hits-it-hardware-making-under-pli/articleshow/111093438.cms यह लेख बताते चीन के आयात को रोकने के सरकारी प्रयत्न में भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग का नुक़सान हो रहा है।
बहुत कुछ लिखने को है पर अब शक्ति नहीं। अगर आज से ४० साल पहले हम १०० % आयातरहित मोटर कार बना सकते थे तो आज क्यो नहीं, जब मारुति सुज़ुकी के चलते सैकड़ों उद्योग गुरुग्राम के चारों ओर उस समय लग सकते थे तो आज क्यो नहीं? हम उद्योगों को उन सब चीज़ों को भारत में बनाने की कोशिश क्यों नहीं कर सकते। फिर हमारे भारतीय इंजिनियर्स ही कैसे दुनिया के बड़ी कम्पनियों अनुसंधान केन्द्रों को चला रहे हैं?

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चुनाव २०२४ सम्बन्धित

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देश के वे कायर सुने शेर की दहाड


सभी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद जिसने देश के महिलाओं के लिये, जवानों के लिये, किसानों के लिये, जवानों के लिये मर मिटने की , ज़िन्दगी जीने की क़सम खाई है। हर भारतवासी यह सोचे कि उसके सपनों में चोरों द्वारा दरार लगाने पर भी उसके मन में भारत को दुनिया का सिरमौर बनाना सर्वोपरि हैं। वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये मरने दम तक प्रयत्नशील रहने के प्रतिबद्ध है। कोई विपदा उसे हिला नहीं सकता, कमजोर नहीं कर सकती। देश के जिन लोगों ने धोखेबाज़ी की वे शर्म करें या न करें, देश उनको माफ़ नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा कर उन्होंने देश को धोखा दिया है और चोरों का साथ दिया है कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ या जाति का होने के कारण । वे अपने को बेंचें हैं कुछ रूपये या कुछ मनपसन्द चीजों के लिये। गीता के अध्याय १६वें केअनुसार वे ही असुर है। अगर पढ़ना आता हो तो देंखे। इन असुरों का राम नाश करेंगे भले ही कुछ समय लग लग जाये।
इन असुरों को समझना ही होगा कि जहां राम गिरी स्त्री को नया जीवन देते, भक्ति शबरी को अमरत्व देते, पच्छीराज जटायु को स्वर्ग देते हैं, केवट या निषादराज, या सभी कोल भील को गले लगाते हैं, बानर, भालू और राक्षस वंश के जीवों को भी अमर कर दिये, उन्हीं के भक्त के साथ जो धोखेबाज़ी करता है उसको भी वे नहीं छोडते।
हमारे हिन्दू धर्म की तरह कोई दूसरा धर्म हो ही नहीं सकता- ‘समं सर्वेषु भुतेषु तिष्ठन्तंपरमेश्वरम् ( १३.१७) – सब चराचर भूतों (प्राणियों) में परमेश्वर समभाव से रहते हैं और हमें सबमें सम रूप से देखने का आदेश भी देते है। फिर जाति कैसी?
और फिर अध्याय ६ में

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६.३२॥ सब लोगों को सभी व्यक्ति के दु:ख सुख में सहर्ष सहायता या उल्लास मनाने ही हमारा धर्म है।
हम क्यों लज्जित हो जो बिके देश विरोधी काम किये उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिये या समाज में मुँह नहीं दिखाना चाहिये।

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मोदी की नई सरकार


एक तरह से चन्द्रबाबु नायडू का मोदी के साथ आना और ओड़िसा में बीजेपी के आने से देश में औद्योगिक प्रगति का एक नया दौर चालू होने का बातावरण बन रहा है। आन्ध्रप्रदेश और ओड़िसा समिल्लित समुद्रीय तट क्षेत्र चीना के सेनजेन प्रदेश की औद्योगिक क्षेत्र के बराबरी का ही एक औद्योगिक क्षेत्र बन जाने की संभावना रहेगी, क्योंकि औद्योगिकरण के क्षेत्र में मोदी की तरह ही नायडू भी रहे हैं। हैदराबाद का बंगलौर के बाद एक दूसरा देश के एक बड़े आई.टी केन्द्र की तरह उभरना केवल नायडू के कारण ही सम्भव हो पाया है। उनका अमरावती को प्रदेश की नई राजधानी की तरह एक विश्वस्तरीय नगर बनाना भी वह सपना है जो मोदी के सपनों से मेल खाता है। मोदीजी को नायडू की मदद करनी बिना किसी हिचक के। आँध्र कृषि क्षेत्र में भी बहुत आगे है और मोदी जी नायडू को आंध्र के कृषि क्षेत्र को पंजाब से बेहतर निर्यात करने वाला सबसे बड़ा प्रदेश बनवाने में मदद कर सकते हैं, वहाँ के किसानों की सभी उपज को पंजाब की तरह FCI से MSP पर ख़रीदवा कर। आंध्र में फ़ूड प्रोसेसिंग का सबसे बड़ा प्रदेश बनने का मादा है। इसी तरीक़े को उन्हें ओड़िसा में समुद्री किनारे को उन्नत बनाने में करना चाहिये और ओड़िसा को इसमें चन्द्रबाबू नायडू की सहायता लेनी चाहिये जो उनकी साख को बढ़ायेगा और भारत की उन्नति का रास्ता खोलेगा। ओड़िसा में एक बडा पोर्ट बनाने और उसे रेल रोड से जोड़ने की ज़रूरत है।
पर समझ में नहीं आता नीतिश जी कैसे बिहार के लोगों को शिक्षित और समृद्ध बनाने में और मोदी के दर्शन को जमीनस्तर लागू करने में मोदी की सहायता करेंगे, जिससे आम जनता खुश हो सकें। कैसे वे बिहार के शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करेंगे और कृषि क्षेत्र में कुछ अनुठी व्यवस्था ला सकेंगे? बिहार की शिक्षा व्यवस्था था पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी है और उसे एक बहुत मज़बूत इच्छाशक्ति का व्यक्ति फिर पटरी पर ला दौड़ा सकता है। बहुत कुछ किया जा सकता है, अगर वहाँ कृषि क्षेत्र में आमूल परिवर्तन किया जाये और एक सफल टेक्नीकल झुकाव वाले व्यक्ति की बात मानी राजनीति कुछ सालों के लिये एकदम छोडकर । जो मेरे विचारों से सहमत हो, बताइये।

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चुनाव २०२४-एक रोचक वाक़या

रास्ते में २०-२२ साल का नौजवान उबर ड्रॉइवर अचानक बात करने लगा उत्तरप्रदेश के वोटरों के मोदी के साथ विश्वासघात करने के लिये जिसने उत्तरप्रदेश के निचले वर्ग के लिये इतना किया और पर उसकी उत्तेजना मेरे समझ में नहीं आई। मैंने समझाने की कोशिश की। पर वह बार बार कहता रहा कि ये मतलबी अपने वर्ग को दिये सब सुविधाओं का लाभ उठाये, जो किसी ने इतने सालों में नहीं दिया। मैं जानना चाहा क्या दिया मोदी ने। उसका जबाब था, “सर, क्या वे ज़िन्दगी में कभी शौचालय बना पाते? क्या कभी उनको घर मुअस्सर होता? क्या घर में पानी के नल का सोच भी सकते थे सपने में या गैस के चूल्हे खाना बनाने का?…वह बोलता जा रहा था बिना मेरी तरफ़ से देखे बिना मेरी प्रतिक्रिया जाने या किसी प्रश्न किये….”ज़िन्दगी के क्या कभी सोचे भी होंगे बिजली के प्रकाश का घर में? कौन उन्हें आजतक मुफ्त प्रति व्यक्ति पाँच किलो अनाज देता सालों? कौन उसी घर के लोगों को सब्ज़ी या फल या, मछली आदि का ठेले पर या रास्ते में दुकान लगाने के लिये सस्ता बैंक से क़र्ज़ा दिलाता? क्या यह पैसा नहीं है? तब भी क्यों उनका सबसे बड़ा ख़र्चा ढर्रे पर है? और एक बोतल शराब पर गाँव के ठेकेदार उनका वोट ख़रीद लेता है और वोट देने के बाद सौ-दो सौ रूपया और देने का वायदा कर बूथ तक जाना पक्का कर लेता है? मैं उसे रोक रहा था, क्योंकि मुझे लगता था कि वह मेरा घर भूल जायेगा और मुझे देरी हो जायेगी। एकदम मेरे टावर के नीचे तक गाड़ी लाया, श्रद्धा से प्रणाम किया बार बार, फिर पता नहीं किस चीज़ के लिये ‘सारी’ भी कहा। उसे धन्यवाद कर और खुश रहने की नसीहत दे मैं निकल आया सीढ़ियाँ चढ़ने के लिये….
मैं अभी तक भी नहीं समझ पाया कि उसका मोदी या उनकी पार्टी के प्रति इतनी सहानुभूति क्यों है? हाँ, एक बात की याद आती है गाँव के पंचायत के चुनाव में ऐसा ही होता था-प्रति वोट कुछ ख़ास रक़म और…..दु:ख की बात है कि आज हर क्षेत्रों में काम पाने का ज़रिया ठीक्केदार ही हैं यहाँ फ़ैक्टरियों में, घर पर नर्स रखने केलिये, रसोइया, सुरक्षाकर्मी ..ये ठिक्केदार बहुत पैसेवाले होते जा रहें हैं। पर यह सिस्टम ग़लत है। यह उद्योगपतियों का लेबर कोस्ट कम करने का तरीक़ा है…
पुन्श्च: हाँ, एक बात और मैं उबर ड्राइवर के दुख का कारण के पक्ष में बता रहा हूँ। FE में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार एक रिपोर्ट के अनुसार, “भाजपा की हार अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों तक फैल गई। हारी हुई 92 सीटों में से 29 एससी और एसटी के लिए आरक्षित थीं, जिससे इन समुदायों के समर्थन में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई।”

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चुनाव २०२४- कुछ प्रतिक्रिया

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मोहन भागवत का भाजपा नेतृत्व के विरूद्ध रणभेरी- हिन्दूओं की कमजोरी का द्योतक
श्रद्धेय मोहन भागवत जी का इस समय इस तरह का प्रेस के ज़रिये बयान देना हिन्दूओं के अनादि कमजोरी का एक उदाहरण है जिससे हिन्दुओं का लाभ कम और नुक़सान ज़्यादा होगा। भागवत् जी राजनीतिक दल बीजेपी का बदलता चाल पहले से ही देख रहे होंगे। उन्हें इसको ठीक समय पर ही बात कर लेनी चाहिये एक मीटिंग कर। आज मुसलमानों ने चाहे बहकावे ही हो आकर एक मुश्त भाजपा के प्रत्याशी के विरूद्ध वोट देते हैं, यह एक बड़ी समस्या ऐतिहासिकरूप से चली आ रही है।मोदी इसे शायद समझते हुए भी उन्हें मौक़ा देना चाहते थे। पिछड़े वर्ग पर मानवीय नाते से अप्रत्याशित रूप सभी किया खर्चा भी उस वर्ग के मानसिकता के कारण काम नहीं आया, जो सदियों की ग़ुलामी से अपना सद्य लाभ से प्रलोभित हो जाने के कारण बीजेपी के विरूद्ध हो गये। प्रधान मंत्री के इतनी प्रतिकूल अवस्था में भी जीत को अपने पक्ष में बदल देने के प्रयास भी जो छोटी बात नहीं थी, भागवत जी को इसके लिये बधाई देना चाहिये था।
संघ और चुनाव लड़नेवाले राजनीतिक दल को समय की नाजुकता समझनी चाहिये। अगर यह पहले तय नहीं हो पाया था तो कुछ समय और प्रतीक्षा कर संघ को बीजेपी नेतृत्व से बातचीत कर भविष्य के लिये रास्ता निकालना चाहिये था। साधारण हिन्दू वोटरों को तो यही समझ थी कि दोनों हिन्दू इकाइयों में तालमेल बना हुआ है। हम हिन्दू देश में हिन्दूओं की सरकार चाहते हैं जो हिन्दूओं की प्रतिष्ठा बढ़ाये। परिवारवादी पार्टियों को रोकना और देश को परिवारों के राज्यों से बचाने में सब हिन्दूओं की सहायता चाहिये। चाहे पिछड़ा वर्ग हो या हमारे मुसलमान भाई सबको समान मौक़ा मिला है अपने को सम्पन्न बनाने का। यह अलग की सुविधा चिरस्थायी व्यवस्था तो नहीं बन सकती।
हिन्दू समाज के हित में यह जरूरी है कि इतिहास की गलती न दुहराई क्योंकि देश हित में भी यही ठीक है। संघ और दल के हर सेवक पूरी ईमानदारी से देश पूरी तरह समर्पित हों। किसका वर्चस्व हो की भावना ही नहीं चाहिये। हमारा धर्म जब संसार हर भूत (प्राणी) में एकत्व पर ही टिका है, तो फिर हमारे धर्म के नेता ही यह न समझें तो कैसे चलेगा।
हाँ, एक बहुत बड़ी संख्या में हिन्दुओं के संत और महात्मा केवल पूरे देश में फैले अपने आश्रमों, मठों, मन्दिरों में ही रहने लगे है। अधिक से अधिक उनका शहरों से सम्पर्क होता है। वहाँ के धनी लोगों काफ़ी अर्थार्जन भी होता है। पर अभी भी भारत की एक बड़ी जनसंख्या गाँवों में रहती है , जिन्हें स्कूली शिक्षा भी नहीं मिली है। उन्हें कौन अपने सनातन धर्म को सरल सहज भाषा में समझायेगा। धार्मिक संस्थानों और उनके प्रमुखों को इस खाई को भरने का प्रयास करना चाहिये। सहज स्थानीय भाषा में उपनिषदों, गीता, मानस आदि का हिन्दू धर्म के आख़िरी छोर पर रहनेवाले हर व्यक्तितक पहुँचाने का भार तो किसी न किसी को लेना होगा।

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