Akbar- The Great and his Greatness?

Akbar- The Great and his Greatness?
Yesterday I was reading the introduction of a book the English translation of an Indian scholar – Madhusudan Sarswati’s commentary of ‘The Bhagavad-Gita with the Annotation ‘Gudhartha Dipika’. It was translated by well-known Swami Gambhirananda. I found an interesting story about Madhusudan Saraswati related to his meeting Akbar, the Great: Prof J. N. Farquhar recorded this historically important event at Benares in Akbar Era in an article, ‘The Organizations of the Sannayasins of Vedanta’ in the Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, July 1925 (pages 479-86):
One of the notorious practices of Muslim priests, as good Muslims, was to frequently attack and kill the Hindus lay and monastic, especially at pilgrim centres such as Benares. Those priests were protected by a faulty law that exempted them from any legal punishment! So the hapless Hindus approached Madhusudan to do something to stop this injustice. Since Madhusudan was well known at the durbar of Emperor Akbar (who ruled between 1556-1605), he met the Emperor though Raja Birbal and narrated to him the religious atrocities at Benares. As a solution, the Emperor suggested that Madhusudan should organise a militant band of sannyasins to defend Hinduism and its followers. At the same time, he promulgated a law that henceforth protected the Hindu sannyasins too, like the Muslim priests, who were outside the purview of legal action. Thus was born at the hands of Madhusudan, the much respected, and feared Naga sect of Vedantic sannayasins. The recruits were mostly from the Kshatriya caste. They lived in monasteries called Akhadas, and were trained in the martial arts.

Now, with that sort of highly discriminatory law, would not have Akbar, called ‘The Great’ would have banned the law rather than giving the same ease for a religious group of Hindus created on his suggestion to be at war with the people of the other major religion freedom for religious killings and tortures instead of taking legal path. Can an Emperor who suggest such criminal acts be called ‘Great’ even by mistake? Will some friends interested in history let me enrich my knowledge why did our historian call him Great to make equal in rank with Ashoka?
अकबर- महान और उसकी महानता
कल मैं अकबर काल के एक भारतीय विद्वान मधुसूदन सरस्वती द्वारा किये भगवद् गीता के भाष्य ‘गूढ़ार्थ दीपिका’ के अंग्रेज़ी अनुवाद में दी गई विस्तृत भूमिका पढ़ रहा था। यह अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रसिद्ध स्वामी गंभीरानन्द द्वारा किया गया है। ये विवेकानन्द परम्परा के हैं। इन्होंने ही आदि शंकराचार्य के ८वीं शताब्दी में किये सबसे पहले भगवद् गीता के संस्कृत भाष्य का भी बहुत ही सुन्दर अंग्रेज़ी में भी अनुवाद किया है। मधुसूदन सरस्वती के भाष्य को शंकराचार्य के बाद का सबसे अच्छा भाष्य माना जाना जाता है।
मधुसूदन सरस्वती का काल १५९०- १६९७ ई. माना जाता है। भूमिका में एक ऐतिहासिक लेख से लिया अंश भी है। इसमें मुझे मधुसूदन सरस्वती के बारे में उनकी अकबर, महान से मुलाकात से संबंधित एक दिलचस्प कहानी मिली: प्रोफेसर जेएन फ़रक्वार ने इस ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण घटना को अकबर काल के बनारस में होते हिन्दू विद्वानों एवं भक्तों की धार्मिक स्थानों में मुसलमानों के धार्मिक तथाकथित मुल्लाओं के सह पर किये अत्याचार का वाक़यों के बारे में अपने एक लेख में बताया गया है। उनका यह लेख,’जर्नल ऑफ़ द बॉम्बे ब्रांच की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’ के जुलाई १९२५ अंक के पृष्ठ ४७९-८६ पेज पर है।
‘अच्छे मुसलमानों के रूप में मुस्लिम पुजारियों की कुख्यात प्रथाओं में से एक था, हिंदु पुजारियों एवं मठवासियों पर हमला करना और उन्हें मार डालना, विशेष रूप से बनारस जैसे तीर्थस्थलों में । उन मुस्लिम मुल्लाओं को एक दोषपूर्ण कानून द्वारा संरक्षित किया गया था जो उन्हें किसी भी कानूनी सजा से छूट देता था! असहाय हिंदुओं ने इस अन्याय को रोकने के लिए कुछ करने के लिए मधुसूदन से संपर्क किया, चूंकि मधुसूदन का सम्राट अकबर (जिन्होंने 1556-1605 के बीच शासन किया था) के दरबार में आना जाना था, वे राजा बीरबल के माध्यम से सम्राट से मिले और उन्हें बनारस में धार्मिक अत्याचारों के बारे में बताया। एक समाधान के रूप में, सम्राट ने सुझाव दिया और अमल किया वह आश्चर्यचकित किया मुझे। अकबर ने मधुसूदन सरस्वती को हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों की रक्षा के लिए अपने संन्यासियों के एक हथियार बन्द दल गठित करने को कहा। साथ ही, उन्होंने एक कानून की व्यवस्था की जो आगे इस हिंदू संन्यासियों को भी वैसी ही रक्षा प्रदान करता था, जैसा क़ानून मुस्लिम पुजारी को कानूनी कार्रवाई के दायरे से बाहर रखता था अपराध के बाद। इस प्रकार मधुसूदन के हाथों संगठित हुआ वेदांती संन्यासियों में हथियारबन्द नागा संप्रदाय। इस उस समय ज्यादातर क्षत्रिय जाति के लोग इसमें लिये गये थे। वे अखाड़ा नामक मठों में रहते थे, और उन्हें मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित किया गया था।
अब, उस तरह के अत्यधिक भेदभावपूर्ण कानून के साथ, अकबर, जिसे ‘द ग्रेट’ कहा जाता है, एक वर्ग के लोगों के साथ दूसरे वर्ग द्वारा हिंसक बर्ताव को बन्द करने के लिये पुराने क़ानून को बदल नहीं सके किस कारण, बल्कि हिन्दुओं को बदला लेने के लिये हिंसा कर मुक्त रहने का रास्ता खोल दिया और दोनों धर्म के लोगों में बैर भाव को आग देने का क़ानून बना दिया। कैसे महान करानेवाला सम्राट ऐसा कर सकता है। पर हमारे वामपंथी इतिहासकार अकबर ही नहीं अन्य मुग़लों की धार्मिक क्रूरता की कभी निन्दा नहीं किये। क्या इस तरह के आपराधिक कृत्यों का सुझाव देने वाले सम्राट को गलती से भी ‘महान’ कहा जा सकता है? क्या इतिहास में रुचि रखने वाले कुछ मित्र मुझे अपने ज्ञान को समृद्ध करने में मदद देंगे, हमारे इतिहासकार ने उन्हें अशोक के साथ बराबरी करने के लिए महान क्यों कहा? वैसे सर यदुनाथ सरकार ने नागा साधुओं के प्रारम्भ के बारे में इन्हीं बातों का उल्लेख किया है।
The article of Prof. J. N. Farquhar ‘ The Organizations of the Sannayasins of Vedanta in the Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, July 1925 (pages 479-86).

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महाभारत के बाहर की दो महत्वपूर्ण

महाभारत के बाहर की दो महत्वपूर्ण गीता
पिछले तीन-चार महीनों में मैंने ‘अष्टावक्र गीता’ एवं ‘अवधूत गीता’ पढ़ी।दोनों अद्वैत दर्शन के महत्वपूर्ण ग्रंथ माने जाते हैं। अष्टावक्र गीता में २० अध्याय हैं, पहले १८ अध्यायों में अष्टावक्र का उपदेश या विचार है वेदान्त पर, और अध्याय १९ और २० में राजा जनक का, जो स्वयं ब्रह्मज्ञानी हैं, वेदान्त के अनुसार ब्रह्म ज्ञानी के चरम अवस्था का वर्णन है, जो पूर्ण ब्रह्म ज्ञान का आख़िरी लक्ष्य या ध्येय हो सकता है। अध्यायों के नाम हैं- साक्षी, आश्चर्यम्, आत्माद्वैत, सर्वमात्म, लय, प्रकृतेः परः, शान्त, मोक्ष,निर्वाण,वैराग्य, चिद्रूप, स्वभाव, यथासुखम्, ईश्वर, तत्त्वम्, स्वास्थ्य, कैवल्य, जीवन्मुक्ति,स्वमहिमा,अकिंचनभाव हैं ।
राजा जनक के ज्ञान के बारे में उपनिषदों में बहुत चर्चा है, भगवद्गीता में भी उन्हें श्रेष्ठों में उदाहरण कहा गया । हमारे ऋषियों ने उनके ज्ञानी होने और ज्ञान को समझने एवं ज्ञानियों को संरक्षण करनेवाला माना और इतना ऊँचा दर्जा दिया। अत: एक सांसारिक गृहस्थ के लिये भी राजा जनक आदर्श बन सकते है। अपने ज़िम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए भी व्यक्ति ब्रह्म ज्ञानी बन सकता है।


१. अष्टावक्र गीता
गीता में श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद है वैसे ही अष्टावक्र गीता में राजा जनक और बालऋषि अष्टावक्र की। भगवद्गीता गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति- तीनों मार्ग का विवरण है जबकि अष्टावक्र गीता में केवल ज्ञान योग का ही विवेचन हुआ है।
अष्टावक्र के नाना ऋषि उद्दालक का छान्दोग्य उपनिषद् में एक ब्रह्मज्ञानी के रूप में उल्लेख किया गया है। वेदांत के सबसे महत्त्वपूर्ण महावाक्य तत्त्वमसि का उपदेश इनके नाना उद्दालक के द्वारा इनके मामा श्वेतकेतु को दिया गया है जो अष्टावक्र के समवयस्क हैं, अतः अष्टावक्र उपनिषद् कालीन ऋषि हैं।
अष्टावक्र गीता’ के बारे में, टिपण्णी करनेवालों में से एक लिखते हैं, ‘उपनिषद निरपेक्ष की पूर्णता को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करने के लिए हकलाते हैं,ब्रह्मसूत्र अपने आप में समाप्त हो जाते हैं और भगवद गीता एक क्षम्य शर्म के साथ झिझकती है, अष्टावक्र गीता शब्दों के माध्यम से संवाद करने में अपनी भव्य सफलता और स्पष्टता के लिए प्रशंसा की पात्र है।’ शायद प्रस्थान त्रय (ब्रह्मसूत्र,उपनिषद्,गीता) की तुलना में सर्वोच्च वास्तविकता(स्वयं आत्मा)की पूर्णता अष्टावक्र गीता में अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है। (स्वामी सर्वप्रियानन्द का एक अष्टावक्र गीता पर प्रवचन, https://youtu.be/d6eKWLM0mHE)

क्या है अष्टावक्र गीता में?
पहले अध्याय के पहले श्लोक में राजा जनक अष्टावक्र से पूछते हैं-
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च कथं प्राप्तं एतद् ब्रूहि मम प्रभो ॥१.१॥
Teach me this, O Lord! how can Knowledge be acquired? How can liberation come? How is renunciation achieved?
हे स्वामी! ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है? मुक्ति कैसे मिल सकती है? संन्यास कैसे प्राप्त होता है?
फिर जनक ही इसी अध्याय के ११वें श्लोक में वह कुछ कहते हैं जो एक शिष्य द्वारा साधारणत: पूछे जानेवाले सवालों से कुछ अलग और विस्मित करनेवाला है-
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥१.११॥
He who considers himself free becomes free indeed and he who considers himself bound remains bound. ‘As one thinks, so one becomes’, is a proverbial saying in this world and it is indeed quite true.
जो स्वयं को मुक्त समझता है वह वास्तव में मुक्त हो जाता है और जो स्वयं को बंधा हुआ समझता है वह बंधा रहता है। ‘जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है’ (या मति: सा गति) यह एक प्रचलित कहावत है और यह वास्तव में एक सत्य है जो उपनिषद् भी कहते हैं।
हाँ, अध्याय १९ के तीन या चार एवं २० का एक श्लोक में दिये राजा जनक के अनुभव की गहराई को समझने के लिये मैं नीचे उन्हें उद्धृत कर रहा हूँ-
क्व स्वप्न: क्व सुषुप्तिर्वा क्व जागरणं तथा।
क्व तुरीयम् भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य में॥१९.५॥
Where are dreams? Where is deep sleep? Where is wakefulness? And also where is the fourth state of Consciousness? Where is even fear for me, who abide in my own grandeur?
श्वपनावस्था(सपने दिखनेवाली नींद)कहाँ हैं? सुसुप्तावस्था(गहरी नींद)कहाँ है? जाग्रत अवस्था कहाँ है? और फिर चैतन्य की चौथी अवस्था, तुरीयम् कहाँ है? मेरे लिए भय भी कहाँ है, जो मेरी ही ऐश्वर्य में रहता है?
क्व मृत्युजीर्वितं क्व लोका: क्वास्य लौकिकम्।
क्व लय: क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्यमे॥१९.७॥
Where is life or where is death? Where are the worlds or where are the worldly relations? Where is dissolution of Consciousness? Where is samadhi for me, who in my own grandeur abide?
जीवन कहाँ है या मृत्यु कहाँ है? संसार कहाँ हैं या सांसारिक सम्बन्ध कहाँ हैं? चेतना का विघटन कहाँ है? मेरे लिए समाधि कहाँ है, जो मेरी ही भव्यता में निवास करती है?
अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम्।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि।।19.8।।
For me, who repose in the Self, talks about the three goals of life (dharma, artha, kama) are useless, and even talks about direct knowledge are needless.
मेरे लिए, जो स्वयं में विश्राम करता है, जीवन के तीन लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम) के बारे में बात करना बेकार है, और यहां तक ​​कि प्रत्यक्ष ज्ञान की बात करना भी बेकार है।
और
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम्।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम।।20.14।।
Where is existence or where is ‘non-existence’?Where is the one(unity) and where is duality?What need is there to say more? Nothing indeed emanates from me.
अस्तित्व कहाँ है या ‘अस्तित्व’ कहाँ है? एक (एकता) कहाँ है और द्वैत कहाँ है? अधिक कहने की क्या आवश्यकता है? वास्तव में मुझसे कुछ भी नहीं निकलता है।

अष्टावक्र गीता के २० अध्यायों की विषय सामग्री अद्वैत वेदांत की व्याख्या है। स्वामी नित्यस्वरुपानंद ने अपने 1940 के अपने अंग्रेजी अनुवाद के परिचय में इसके बारे में एक किस्सा लिखा था, जिसके अनुसार रामकृष्ण ने उन्हें नरेंद्रनाथ दत्त (विवेकानन्द का असली नाम)में वेदांत के प्रति उत्सुकता जगाने के लिए अष्टावक्र गीता का बंगाली में अनुवाद करने के लिए कहा था। अब अष्टावक्र गीता पर स्थानीय भाषाओं और अंग्रेजी में भी बहुत अनुवाद और व्याख्यायें उपलब्ध हैं।
मेरे द्वारा पढ़ी पुस्तक स्वामी चिन्मयानन्द की लिखी अंग्रेज़ी में चिन्मय मिशन द्वारा प्रकाशित है। अष्टावक्र गीता, जिसे अष्टावक्र संहिता के रूप में भी जाना जाता है, भगवद गीता के बाद रचित, जनक और अष्टावक्र के बीच एक संवाद है, जो बीस अध्यायों की अष्टावक्र गीता के पहले १८ अध्यायों में चलती है। इसमें पहले अठारह अध्यायों में शिष्य राजा जनक और गुरू अष्टावक्र हैं। अष्टावक्र १८वें अध्याय में अपने पहले १७ अध्यायों में बताये विचारों का निष्कर्ष रखते है। फिर जनक ही शिक्षक के रूप में दिखते हैं। राजा जनक ब्रह्म ज्ञानी हैं। इस गीता के १९वे एवं २० वे अध्याय में जनक अपने विदेह एव अपनी आत्मा के ब्रह्मरूप के अन्तिम अनुभव बता इस गीता की समाप्ति करते हैं।
https://openthemagazine.com/voices/janakas-questions/

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तुलसीदास का रामचरितमानस एवं उपनिषद्, भगवद्गीता


कुछ दिनों से मैंने, अपना एक साहित्यिक दुख, जो अपनी मातृ भाषा हिन्दी या आंचलिक भाषाओं के बारे में है, बहुत हिन्दी के पंडितों, मित्रों से साझा किया है।क्यों हमारे हिन्दू धर्म के मूल ग्रंथों- उपनिषदों, भगवद्गीता या अष्टावक्र गीता आदि का सरल हिन्दी में अनुवाद नहीं हुआ? और आज हिन्दी का शायद पतन काल आ गया है और उम्मीद नहीं है कि हिन्दी इससे उबरे। आज यहाँ अगर और ग्रंथों को छोड़ दिया तब ही यह पीड़ादायक लगता है कि जब रामचरितमानस का सरल अंग्रेज़ी में बहुत ही अच्छा अनुवाद हुआ पिछले कुछ साल में ही, पर सरल हिन्दी में नहीं। ये अनुवाद हैं, पहला इंफ़ोसिस के संस्थापक प्रसिद्ध उद्योगपति श्री नारायनमूर्ति के पुत्र रोहन मूर्ति के ‘मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी फ़ाउन्डेशन’ के प्रयत्न से अमरीकन हिन्दी विद्वान फ़िलिप लूटेनजेनडौफ ( Philip Lutgendorf)द्वारा The Epic of Ram हार्वरड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा, जिसका शायद चा खंडों में अयोध्याकांड तक किया जा चुका है। दूसरा अनुवाद का प्रकाशन पेनग्यून क्लासिक के अंतर्गत रोहिणी चौधुरी द्वारा ‘तुलसीदास रामचरितमानस’ नाम से तीन खंडों में किया गया है।दोनों अच्छे लगे।पर रोहिणी चौधरी ने मूल को साथ साथ नहीं दिया है, जब पहले में मूल भी है, अत: हिन्दी जानने वालों को शायद अच्छा लगेगा।


यह तो अच्छा है कि गीता प्रेस के चलते पहले केवल मूल, फिर भावार्थ सहित,और फिर विशद व्याख्या करते हुए रामचरितमानस पर अलग अलग सस्ते इतनी रामचरितमानस का प्रकाशन हुआ कि यह अब सबके लिये सरल और शायद सब हिन्दू परिवारों में एक या अधिक उपलब्ध है। एक बहुत महत्वपूर्ण प्रकाशन है बहुत भारी भरकम ‘मानस-पीयूष’ सात खंडों में है।


क्या सरल हिन्दी में एक अनुवाद नहीं किया जा सकता था केवल मूल रामचरितमानस के दोहे छन्द, सोरठा, चौपाइयों का या मंगलाचरण का। वैसे भगवद्गीता का अनुवाद प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने ‘नागर गीता’ के नाम से किया था, मैंने ख़रीदा भी पर वह बहुत ही क्लिष्ट था, मैं नहीं समझ सका। भगवद्गीता का तो अंग्रेज़ी में हज़ार के आसपास एवं अन्य क़रीब क़रीब सब विदेशी भाषाओं में बहुत बढ़िया सरल अनुवाद हुआ है उस भाषा के जानकारों के लिये। एक भारतीय दक्षिण भारतीय एकनाथ एश्वरन् ने, जो अमरीका में जा अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध प्रोफ़ेसर हो गये थे,उपनिषदों एवं भगवद्गीता गीता का बहुत ही सरल सहज अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। हमारे यहाँ के हिन्दी के प्रोफ़ेसर लेखकों, कवियों ने इसकी ओर ध्यान क्यों नहीं दिया। एक मृदुल कीर्ति जी की उपनिषदों का अनुवाद देखा हूँ, पर कुछ समझ नहीं आता।


तुलसीदास पर मेरी श्रद्धा है,वे हिन्दी जगत में सबसे लोकप्रिय हैं। हिन्दी को इनकी तरह का रामचरितमानस को महाकाव्य की तरह लिखनेवाला शायद ही कोई भक्त ज्ञानी मिला या मिलेगा।यह मेरा विचार है। तुलसीदास के रामचरितमानस से परिचय पहली बार अपने शिक्षक और साहित्य-प्रेमी दादा जी द्वारा हुआ अपने बचपन में ही। फिर उस समय के मेरे घर में रहनेवाले हमारे प्राइमरी स्कूल के शिक्षक पाण्डे जी ने उसे कविताओं की अंत्याक्षरी के खेल से बढ़ाया पढ़ने के लिये कलकत्ता आने के पहले तक, यद्यपि दादाजी के साथ तो बहुत सालों रहा और इस पर चर्चा भी चलती रही। उन्हें रामचरितमानस का मासापरायण नवरात्र में करते देख बहुत अच्छा लगता था। हिन्दुस्तान मोटर्स में सालों तक मैंने भी मासापरायण और बहुत बार नवरात्र में नवापरायण की। फिर बाद में केवल प्रतिदिन सुन्दरकांड पर सीमित हो गया और देश विदेश सब जगह चलता रहा। वही आज तक चलता आ रहा है। अब स्नान के बाद और दोपहर के खाने के पहले सुन्दर कांड का पाठ करता हूँ। इसके अलावा गीता, उपनिषद् के साथ रामचरितमानस के चुने हुए तीन चार अंशों का सबेरे उठकर ही नित्य सबेरे पाठ करता हूँ। कोविद-१९ काल में घूमते हुए नित्य एक से ज़्यादा बार भी यह क्रम चलता रहता है केवल उनका जो मेरी याददाश्त में आ गया है।

तुलसीदास हिन्दू धर्म के महान ग्रंथों के सर्जक ऋषिओं के परम्परा के शायद आख़िरी व्यक्ति हैं। यह क़रीब क़रीब निश्चित हो चुका है कि उपनिषदों के ज्ञान का अगला सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लोकमान्य महाभारत में समाविष्ट भगवत् गीता है भगवान वेद व्यास का। उसके बाद अगर कोई ग्रंथ इतना लोकप्रिय हुआ तो वह रामचरितमानस मानस ही हुआ। और शायद भगवद्गीता की तरह केवल रामायण ही हाथ में रख सत्यता की शपथ को मान्यता है हिन्दुओं के लिये कचहरियों में।

इन तीनों कृतियों के समय काल में बहुत बड़े समय की खाड़ी रहीं हैं। अत: इन तीनों ग्रंथों में विषय अपने समय के समाज और उसकी सामाजिक समस्याओं की आवश्यकताओं को देखते हुए उसी तरह उठाया गया है। समय के साथ समाज बदला और लोगों के आचरण भी बदले। समाज एवं देश के बदलते समाजिक बदलाव को ऋषियों ने अपने अनुभवों से समाज को सही दिशा देने के लिये प्रयत्नों को अपनी रचनाओं में समाविष्ट किया।


मुख्य दस उपनिषदों का समय काल अनुमानतः १०००-५०० बी.सी ,महाभारत एवं भगवद्गीता को शायद तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व और तीसरी शताब्दी सीई के बीच संकलित किया गया माना जाता है,जबकि भक्त तुलसीदास का रामचरितमानस सदियों बाद क़रीब अकबर एवं जहांगीर के समय १७वीं सदी में रचा गया। रामचरितमानस के अनुसार ही तुलसीदास उसके प्रारंभ करने का दिन था विक्रम संवत् १६३१ के चैत्र मास की रामनवमी जो राम का जन्मदिन माना जाता था। यह १५७४ ईस्वी है। बहुत हद तक तुलसीदास ने अपने समय के सामाजिक मान्यताओं की चुनौतियों को ललकार और अपना रास्ता निकाला और दिखाया।
देश की आज़ादी के पहले के दिनों में उपनिषदों, भगवद्गीता एवं रामचरितमानस की महत्ता को समझा जाने लगा। स्वतंत्रता के बाद भी इन ग्रंथों को हर व्यक्ति के जीवन की समस्याओं को सुलझाने में सहायक बनाने की बात कही गई विशेषकर महात्मा गांधी द्वारा जिन्हें देश ने राष्ट्रपिता बनाया।यह तब तक चला, जब तक देश में दूरदर्शन का प्रचार प्रसार आज की तरह नहीं हुआ।गाँवों,शहरों में रामायण गान एवं इस पर प्रवचन चलते रहे।दुनिया में जहां जहां
तुलसीदास ने अपने कृति द्वारा एक अनोखा क्रान्तिकारी बदलाव लाया।संस्कृत के पंडित होते हुए संस्कृत में न लिख अपनी क्षेत्रीय भाषा अवधी में अपने मशहूर रामचरितमानस की रचना की। संस्कृत का भी मंगलाचरण आदि में ही उपयोग किया, शायद अपने विरोधी संस्कृत विद्वानों को यह बताने के लिये कि उनका संस्कृत ज्ञान भी उतना ही प्रगाढ़ था जिसमें वे रचना कर सकते थे उतनी ही सरलता से, पर फिर उससे जन जन में ज्ञान का प्रकाश नहीं पहुँच पाता।


तुलसीदास क़रीब क़रीब अनाथ थे। माँ मर गई जन्म देने के थोड़े दिनों बाद, पर पिताजी ने भी समाज के भविष्य बतानेवालों के लड़के को माता-पिता के मरण योग के साथ पैदा होनेवाला बताने के कारण त्याग दिया। पर दैविक कृपा से कुछ अच्छे ज्ञानी पंडितों की दृष्टि उन पर पड़ी, और उनको वे असाधारण लगे। वे उनको संस्कृत एवं प्राचीन शास्त्रों की शिक्षा दिये और तुलसीदास ने असाधारण गुरू भक्ति और बुद्धि के कारण सभी ग्रंथों को पूर्ण तरह से आत्मसात् किया।उनके पहले तक सभी ब्राह्मण विद्वानों ने अपने ग्रंथों को संस्कृत में ही लिखा था। और वे ग्रंथ केवल तत्कालीन समाज के एक नगण्य लोगों तक ही जा पाता था, क्योंकि सबकी समझ के बाहर था संस्कृत शिक्षा। पर तुलसीदास ने जब अपनी राम कथा रामचरितमानस को लिखने का निर्णय लिया तो उसे क्षेत्रीय भाषा अवधी में लिखा जन जन तक पहुँचाने के लिये और समय ने यह सिद्ध किया वे बहुत दूरदर्शी थे।


एक बहुत ही लोकप्रिय संस्कृत श्लोक हैं भगवान की महत्ता बताते हुए-
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥
तुलसीदास ने उसका अवधी अनुवाद किया और अपने बालकांड में निम्न रूप में रखा है-
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलिमल दहन॥

तुलसीदास ने रामचरितमानस में उपनिषदों एवं भगवद्गीता के संस्कृत के श्लोकों का विचार अपनी अवधी में इतनी सरलता से रखा है कि वह सबकी समझ में आ जाता है बहुत गूढ़ विषय होते हुए भी। मैं थोड़े उदाहरण लोगों तक पहुँचाने की चेष्टा करना चाहता हूँ शायद सबको अच्छा लगे।


ईशोपनिषद के पहले श्लोक की प्रसिद्ध प्रथम पंक्ति,’ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌’
बालकांड के प्रारम्भ के दोहे ७-ग में ही इस तरह कहा है तुलसीदास ने-‘जड़ चेतन जंग जीव जंतु सकल राममय जानि।’ फिर ‘सीय राममय सब जग जानी।करउं प्रनाम जोरि जुग पानी।’ अयोद्ध्या कांड के १२७ दोहा बाल्मिकी का उत्तर:
‘पूछेहु मोहि कि रहौं कहं मैं पूंछत सकुचाउं। जहं न होहु तहं देहि कही तुम्हहि देखावौं ठाउं॥’ फिर नवधा भक्ति बताये हुए, ‘सातंव सम मय जग देखा।…’ अर्थात् ‘मेरे सातवें प्रकार के भक्त मुझे व्यापित पूरे जग को देखते हैं।’


ईशोपनिषद् में सोलहवें श्लोक में अंतिम पंक्ति है- ‘योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥’ तुलसीदास रामचरितमानस ने इसको उत्तरकांड में दोहा ११७ घ के बाद की पहली चौपाई में व्यवहार किया है इस तरह-
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥1॥
फिर कठोपनिषद् के श्लोक —
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृद्स्येह ग्रंथय: अथ मर्त्यों ऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्।॥२.३.१५॥
जब हृदय की सभी ग्रंथियाँ पूरी तरह खुल जातीं है, मनुष्य उस ब्रह्म को पा लेता है।-का विषय रामचरितमानस में इस तरह आया है।
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥
छोरत ग्रंथ जानि खगराया। बिघ्न नेक करइ तब माया॥
राम ब्रह्म है और तुलसीदास ने राम के लिये भी उपनिषद् की ‘नेति नेति’ कहा रामचरितमानस में एक से ज़्यादा जगहों पर और


फिर कैसे मिलते हैं ब्रह्म? मुंडकोपनिषद के ३.२.३ श्लोक के दूसरी पंक्ति में कहा है,
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’॥ यह ब्रह्म जब किसी साधक पर अनुग्रह करता है तब ही वह अपने स्वरूप को दिखाता है।
और बाल्मिकी श्री राम की प्रार्थना में कहते हैं,
“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥’
-वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

मंगलाचरण में ही अपने इष्टदेव राम के बारे में लिखे श्लोक में एक उपनिषद् और अद्वैत विचारधारा में काफ़ी बार व्यवहृत हए। वह श्लोक ५ की पहली दो पंक्ति और उसका हिन्दी अर्थ इस तरह है-
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति ‘सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः’।
जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्ता से ‘रस्सी में सर्प के भ्रम की भाँति’ यह सारा दृश्य जगत्‌ सत्य ही प्रतीत होता है…..
इसे बालकांड के ही दोहा सं.१११ के बाद की चौपाई में व्यवहार किया इस तरह-
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥1॥
जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है और जिसके जान लेने पर जगत का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम जाता रहता है।


इसी तरह उपनिषदों द्वारा परम ब्रह्म के लिये व्यवहृत शब्द ‘सदचिदानन्द-(सत्-चित्-आनन्द) के राम के लिये तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में बार बार किया है।
तुलसीदास के राम सगुन हैं पर तुलसी दास ने सगुन और निर्गुण में कोई अन्तर माना और समझाते हुए बार बार कहा है। उदाहरण के तौर पर बालकांड के ही दोहा ११५ के बाद की चौपाइयों में-
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥1॥
-सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है- मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है॥1॥
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥
-निर्गुण है वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओले में भेद नहीं। (दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं।)
इसी क्रम फिर एक बार सच्चिदानन्द का भी व्यवहार यहीं आगे की चौपाई में किया है- ‘राम सच्चिदानंद दिनेसा।…और आगे फिर-‘राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना।…’


तुलसीदास के ‘सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा’ निर्णय को भी ईशोपनिषद् के ऋषि ने अपने श्लोक १४ में इस तरह कहा था-
सम्भूतिञ्च विनाशञ्च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥१४॥
वैसे इस श्लोक में असम्भूति को अगुन है एवं विनाशम् से सगुन का मतलब है। और दोनों को एक साथ पूर्ण रूप से जानने की हिदायत है पूर्ण ज्ञानी व्यक्ति को। और फिर उसकी मृत्यु को पार कर लेने एवं अमरता (अमृत) को पा लेने की इच्छाओं में क्या अन्तर है?

पर मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तब हुआ जब अरण्य कांड में अत्रि ने सोरठा में गाये श्लोक ९ में राम की प्रार्थना में ‘तुरीयमेव’ शब्द का व्यवहार किया जो निम्न तरह से है-
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं। ‘तुरीयमेव’केवलं॥9॥ उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणों से सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूप में स्थित) हैं।
यह उपनिषदों में सबसे छोटे (कुल केवल १२ श्लोक) मांडूक्योपनिषद्,जिसे जगद्गुरु शंकराचार्य ने सबसे महत्वपूर्ण उपनिषद् माना और जिसका शंकराचार्य के गुरू के गुरू गौडपाद ने २१५ श्लोकों की कारिका लिखी और ७वें श्लोक में कहे चौथी अवस्था का नाम तुरियम् दिया।
ईशोपनिषद के पहले श्लोक की प्रसिद्ध प्रथम पंक्ति,’ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌’
बालकांड के प्रारम्भ के दोहे ७-ग में ही इस तरह कहा है तुलसीदास ने-‘जड़ चेतन जंग जीव जंतु सकल राममय जानि।’ फिर ‘सीय राममय सब जग जानी।करउं प्रनाम जोरि जुग पानी।’ अयोद्ध्या कांड के १२७ दोहा बाल्मिकी का उत्तर:
‘पूछेहु मोहि कि रहौं कहं मैं पूंछत सकुचाउं। जहं न होहु तहं देहि कही तुम्हहि देखावौं ठाउं॥’ फिर नवधा भक्ति बताये हुए, ‘सातंव सम मय जग देखा।…’ अर्थात् ‘मेरे सातवें प्रकार के भक्त मुझे व्यापित पूरे जग को देखते हैं।’
ईशोपनिषद् में सोलहवें श्लोक में अंतिम पंक्ति है- ‘योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥’ तुलसीदास रामचरितमानस ने इसको उत्तरकांड में दोहा ११७ घ के बाद की पहली चौपाई में व्यवहार किया है इस तरह-
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥1॥
फिर कठोपनिषद् के श्लोक —
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृद्स्येह ग्रंथय: अथ मर्त्यों ऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्।॥२.३.१५॥
जब हृदय की सभी ग्रंथियाँ पूरी तरह खुल जातीं है, मनुष्य उस ब्रह्म को पा लेता है-का विषय रामचरितमानस में इस तरह आया है।
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥
छोरत ग्रंथ जानि खगराया। बिघ्न नेक करइ तब माया॥
राम ब्रह्म है और तुलसीदास ने राम के लिये भी उपनिषद् की ‘नेति नेति’ कहा रामचरितमानस में एक से ज़्यादा जगहों पर। और फिर कैसे मिलते हैं ब्रह्म? मुंडकोपनिषद के ३.२.३ श्लोक के दूसरी पंक्ति में कहा है,
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’॥ यह ब्रह्म जब किसी साधक पर अनुग्रह करता है तब ही वह अपने स्वरूप को दिखाता है।
और बाल्मिकी श्री राम की प्रार्थना में कहते हैं,
“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥’
-वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

अब भगवद्गीता के रामचरितमानस पर प्रभाव की बात देखी जाये।
सबसे पहले दो लोकप्रिय श्लोक गीता के जो नीचे हैं-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ॥7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥8॥
जिसको रामचरितमानस में निम्न तरीक़े से कहा गया है-
“जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।”
जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते है । और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है॥


अगर कोई पाठक शिव पत्नी सती द्वारा सीता के विरह में दुखित वनवासी राम की परीक्षा लेनेवाले प्रसंग को पढ़ता है, तब एक बार भगवद्गीता के कृष्ण के विश्वरूप वाले अध्याय ११ की याद आ जाती है। आप भी पढ़िये- राम के उस स्वरूप के वर्णन की एक झलक:
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥
दो- सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥54॥
देखे जहँ जहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥


तुलसीदास के विचारों की महत्वपूर्ण चीज है उनकी ब्रह्म के राम, कृष्ण या अन्य किसी नाम की महिमा की बखान जो सामान्य से सामान्य व्यक्ति द्वारा भी अगर पूर्ण रूप से पूरी श्रद्धा के साथ किया जाए तो ब्रह्म को पाया जा सकता है। और शायद यह उपनिषदों में वर्णित ॐ शब्द को ब्रह्म मानने से आया है। और हर व्यक्ति के लिये अपने इष्ट के नाम में लीन हो जाना आसान है और ॐ की तरह उसके सठीक उच्चारण की ज़रूरत नहीं है।


यह मेरी तुलसीदास के प्रति अपनी श्रद्धांजलि है।

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A Real Great News- India Moving in Big Leauge

A Real Great News: Will it materialise with total R&D support to remain the most efficient? Billionaire Mukesh Ambani on Thursday announced in its annual General meeting, ‘a Rs 75,000 crore investment in setting up four ‘Giga’ factories to make solar photovoltaic cells, green hydrogen, batteries and fuel cells over the next three years. Addressing the company’s annual shareholder meeting, he said Reliance will set up 100 GW of solar power generating capacity, mostly through rooftop installations and de-centrali\sed operations in villages. Reliance will build solar manufacturing units, a battery factory for energy storage, a fuel cell-making factory and an electrolyser unit to produce green hydrogen as a part of the business.

A Future Plan of Reliance Industries
have started work on developing the Dhirubhai Ambani Green Energy Giga Complex on 5,000 acres in Jamnagar.
It will be amongst the largest such integrated renewable energy manufacturing facilities in the world. Jamnagar was the CRADLE OF OUR OLD ENERGY BUSINESS. Jamnagar will also be the CRADLE OF OUR NEW ENERGY BUSINESS. Allow me to take you through our 3-part plan.
The first part of our plan is to build Four Giga Factories.
These will manufacture and fully integrate all the critical components of the New Energy ecosystem. One, for the production of solar energy — we will build an integrated solar photovoltaic module factory.
Two, for the storage of intermittent energy — we will build an advanced energy storage battery factory. Three, for the production of green hydrogen — we will build an electrolyser factory.
Four, for converting hydrogen into motive and stationary power – we will build a fuel cell factory.
Over the next 3 years we will invest over 60,000 crore rupees in these initiatives. Reliance will thus create and offer a fully integrated, end-to-end renewables energy ecosystem.
explain each of these facilities in some more detail.
Our first Integrated Solar Photovoltaic Giga Factory will create solar energy. We will start with raw silica and convert this to poly silicon which we will then convert to ingot and wafers. These wafers would be used to make high efficiency solar cells and finally assembled into solar modules of highest quality and durability.
We will target to achieve costs that are lowest in the world to ensure affordability of our solar modules. We are highly inspired by the goal set by our Prime Minister Shri Narendra Modiji for India to achieve 450GW of renewable energy capacity by 2030.
Out of this, I am pleased to announce today, that Reliance will establish and enable at least 100GW of solar energy by 2030. A significant part of this will come from rooftop solar and decentralised solar installations in villages. These will bring enormous benefits and prosperity to rural India.
Solar energy is available only during the day, while power is needed round the clock. Therefore, storage is an important piece of the puzzle to solve. For this, we will launch our second initiative — an Advanced Energy Storage Giga Factory.
We are exploring new and advanced electro chemical technologies that can be used for such large-scale grid batteries to store the energy that we will create.
We will collaborate with global leaders in battery technology to achieve the highest reliability for round-the-clock power availability through a combination of generation, storage, and grid connectivity.
Besides Electricity, Green Hydrogen will be a unique energy vector that can enable deep decarbonization of many sectors such as transportation, industry and power. One of the most common methods of generating Green Hydrogen is by electrolysis of pure water through Electrolysers.
This brings me to our third initiative — an Electrolyser Giga Factory to manufacture modular electrolysers of highest efficiency and lowest capital cost. These can be used for captive production of green hydrogen for domestic use as well as for global sale.
And, finally, our fourth initiative will be the Fuel Cell Giga Factory. A Fuel Cell uses Oxygen from the air and Hydrogen, to generate electricity. The only emission of this process is non-polluting water vapour.
In the new era, Fuel Cells will progressively replace internal combustion engines. Fuel Cell engines can power automobiles, trucks and buses.They can also be used in stationary applications for powering data centres, telecom towers, emergency generators and micro grids and industrial equipment.
Plan for providing infrastructure and materials to support the four Giga factories:
Reliance will put Gujarat and India on world solar and hydrogen map.
JIO became the first operator outside China to cross 400 million mobile subscribers in a single country.
We are truly grateful to all our valued customers. Thanks to them, JIO is today the world’s second largest mobile data carrier handling monthly traffic of over 630 crore GIGABYTES.

https://www.financialexpress.com/auto/industry/reliance-industries-batteries-hydrogen-fuel-cell-plants-coming-up-in-india-with-more-than-rs-75000cr-investment-ev-charging/2277685/
Read the full address: It is worthwhile to know about a company that is globally competitive, and its target is to be the best. I wish some top business houses come out such a big future plan that it executed timely over the years of their existence. Jamnagar of Gujarat must one day may be named after some clan of Ambani’s… https://www.cnbctv18.com/business/companies/reliance-agm-2021-heres-the-full-text-of-chairman-mukesh-ambanis-speech-9768391.htm

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कितनी गीता

कितनी गीता
पिछले लेख (https://drishtikona.com/2021/06/05/हमारे-पुराने-ग्रंथों-में/) को मैंने यह कहते हुए समाप्त किया था, ‘महाभारत की अन्य गीताओं के बारे में अभी और नहीं जानता। पर महाभारत के पात्रों को ले अन्य अध्यात्म के ग्रंथों में ज़रूर और बहुत गीता हैं।अगली किस्त में ‘महाभारत के बाहर की गीता’….’

अभी दो दिन पहले ही https://www.gitasupersite.iitk.ac.in पर देखा जहां अन्य गीता में अटावक्र गीता, एवं अवधूत गीता के अलावा कपिला गीता, विभीषण गीता हैं। श्री राम गीता का ज़िक्र देख उत्सुकता बढ़ी।साइट पर स्रुति गीता, उद्धव गीता भी उपलब्ध हैं मूल में, उनके संस्कृत श्लोकों का कोई अनुवाद नहीं दिया गया है।स्रूति गीता में दो अध्याय हैं-पहले में ३० एवं दूसरे में ९ श्लोक हैं।


आश्चर्य तब हुआ जब पाया कि ‘विभीषण गीता’ में तुलसीदास के रामचरितमानस का एक छोटा अंश दिया गया है लंका कांड से…राम के पास रथ न होने के विभीषण के प्रश्न के उत्तर में जो कहा। मेरे नित्य पाठ में भी है।

अगर साइट के उत्तरदायी व्यक्ति इस तरह के प्रकरण को गीता नाम देना चाहते हैं तो रामचरितमानस के कुछ और अंशों को विभिन्न नाम के गीता से पुकारा जा सकता है और वे उनको अपने साइट पर दे सकते हैं। मैं इन सबका पाठ नित्य करता हूँ। भगवद्गीता की तरह ये अंश हमारे दैनिक आचरण को अध्यात्म, सुख, शान्ति एवं मोक्ष की ओर मोड़ने में, विशेषकर हर प्रबुद्ध हिन्दी जाननेवाले भारतीयों को,आसानी से मदद करेंगे, क्योंकि इसकी भाषा समझ में आनेवाली है।
वे हैं- बल्मिकी के मुख से, राम की प्रार्थना, राम के प्रणाम एवं अपने रहने के स्थान की जानकारी माँगने पर,उनके रहने का सांकेतिक स्थान बताते हुए कहवाया है तुलसीदास ने। यह अंश अयोध्याकांड के छंदसहित १२६वे दोहा से प्रारम्भ हो १३१ दोहा तक जाता। इसमें पहले राम को ‘श्रुति सेतु पालक’ ‘जगदीस’बताया और फिर उनके लिये ‘वचन अगोचर बुद्धिपर, अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह’का व्यवहार किया गया है। जानकी सीता को माया(‘जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान’)।


फिर उपनिषद् की तरह की एक चौपाई है- ‘ सोई जानइ जेहि देहु जनाई’ जो मंडूकोपनिषद् के ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’ की याद दिलाता है। फिर बल्मिकी जब कहते हैं १२७वे दोहे का ‘जहं न होहु तहं देहु कहि तुमहि देखावौं ठाउं’ तो ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’ की याद दिला देता है।भारत के आज के आम व्यक्ति के लिये आचरण का ध्येय का निर्देश १२९वें दोहे के बाद १३० वें दोहे के प्रथम चौपाई तक बहुत संक्षेप में दिया गया है एवं वह सब कह देता है जिससे देश के लोगों में आज भी बदलाव आ सकता है जो आज इतने निम्न स्तर पर आ गया है। मैं उन्हें यहाँ देने का लोभ संवरण नहीं कर सकता-
“काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥1॥
सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥4॥”
बाक़ी अधिकांशतः: विभिन्न प्रकार के भक्तों के लिये है। और यह यह गीता यहाँ ख़त्म की जा सकती है। क्यों न इसे ‘बल्मिकी गीता’ कह दिया जाये?


फिर अरण्यकांड के सबरी का प्रकरण ३४वें दोहे से प्रारंभ होता है। राम उसकी भेंट के जुठे बेर से तृप्त हो प्रशंसा करते हुए सबरी को बताते है नवधा भक्ति का प्रकरण जो ३४ दोहे के बाद के आख़िरी चौपाइयों से चल कर ३६ वे के बाद के दोहों में पहले ही आया है। इसके बाद सबरी राम के पद पकड़ योग अग्नि से उनमें लीन हो जाती है। नवधा भक्ति में नौ प्रकार में किसी एक को ज़िन्दगी में उतार व्यक्ति ब्रह्म लोक पा सकता है। और सब बड़े सरल लगते हैं जो सब जानते हैं। पहला है संतों का संग, दूसरा भगवान की कथा के प्रसंगों में मन को लगाना, तीसरा गुरू सेवा है, ६वें से नौवें तक में कुछ औपनिषदिक एवं गीता की तरह का निर्देश है, जिन्हें सबको बताना उचित समझता हूँ क्योंकि पता नहीं पाठक रामचरितमानस खोल इन प्रकरणों को खोजने एवं पढ़ने का प्रयास करेंगे या नहीं-
“छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥1॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥2॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥3॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥”मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है।
इस प्रकरण को ‘सबरी गीता’ का नाम दिया जा सकता है।
विभीषण गीता तो लंका कांड के ७९-८० वें दोहे ख़त्म हो जाता है।
और पर एक आख़िरी गीता भी बन सकती है उत्तरकांड के पक्षीराज गरूड द्वारा पूछे सात सात प्रश्न एवं काकभुसुंडि का उनके सप्त प्रश्नों का उत्तर। सातवें प्रश्न का उत्तर नीचे है-
प्रश्न
मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥
उत्तर
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥14॥
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥15॥
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥16॥
ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥
पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥17॥
अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी॥18॥
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका॥19॥

हाँ इसे आप ‘काकभुसुंडि गीता’कहेंगे या गरूड़ गीता वह आप पर है।

हाँ, दूसरी इच्छा है कि कोई विद्वान एक ‘तुलसी गीता’ पूरे रामचरितमानस से लिये छन्द, दोहे,एवं चौपाइयों पर आधारित हो । एक उचित नाम ‘राम गीता’भी हो सकता है। मैं अपने सुधी पाठकों की राय की अपेक्षा करूंगा। मेरा इ-मेल irsharma@gmail.com……

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हमारे पुराने ग्रंथों में कितनी गीता

हमारे पुराने ग्रंथों में कितनी गीता हैं?
क. महाभारत की गीता
गीता आदि नाम ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ तीन शब्दों को मिला कर बना है- श्रीमत् + भगवत् + गीता. हम में अधिकांश को केवल एक लाख श्लोकों से पूर्ण महाभारत के एक ही भगवद्गीता की जानकारी है। महर्षि व्यास की लिखी महाभारत के ‘भीष्म पर्व’ का तीसरा उप-पर्व ‘श्रीमद्भगवद्गीता पर्व’ है। मुझे पता नहीं हमारे वेदान्त के प्रस्थानत्रयी की भगवद्गीता का नाम महर्षि व्यास ने दिया या यह बाद में और किसी ने। श्री बिवेक देवरॉय ने अन्य प्राचीन ग्रंथों में महाभारत का भी अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। वे वैसे अर्थशास्त्री हैं, पर महान विद्वान हैं और वे बराबर हमारे धार्मिक ग्रंथों के विषय पर लेखों से नई जानकारी देते रहते हैं। उनके अनुसार भंडारकर प्राच्य शोध संस्थान, पुणे द्वारा संशोधित महाभारत का ६३वें भाग भागवत् गीता से जुड़ा है। ‘भीष्म पर्व’ के इस उप पर्व को ‘भागवत् गीता’ कहा गया है। इसमें ९९४ श्लोक हैं और २७ अध्याय। पहले नौ अध्याय युद्ध की तैयारियों आदि के बारे में है। इसका दसवां अध्याय प्रचलित गीता के प्रसिद्ध पहले श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:..’से प्रारम्भ होता है। उप-पर्व के पहले के नौ अध्यायों के श्लोक मुख्य ग्रंथ की निरंतरता को बड़ी सरलता से बनाये रख 10वें अध्याय की ओर ले जाते हैं, जो हमारी प्रचलित ‘भगवत गीता’ का पहला अध्याय है। अगर कोई ‘भागवत गीता’ को महाभारत के हिस्से के रूप में पढ़ता है,तो इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि भगवत गीता महाभारत का एक अभिन्न अंग है। वास्तव में, भगवत गीता में ७०० श्लोक और १८ अध्याय हैं, लेकिन भगवत गीता के नाम पर महाभारत के उप-पर्व में श्लोकों की संख्या प्रचलित भगवत गीता, से अधिक है। https://openthemagazine.com/columns/a-dirge-for-desire/

इसके बाद से मैं देवरॉय के ‘Open’ नामक साप्ताहिक पत्रिका में प्रकाशित होते लेखों को बराबर पढ़ता रहा हूँ और उनके पुराने लेखों को भी।पर यह जानकारी मुझे आश्चर्यचकित की, जब पूर्ण महाभारत के अनुवादक श्री बिबेक देबरॉय के लेखों से जाना कि महाभारत में क़रीब २० ऐसी गीता उसके १८ पर्वों में बिखरी मिलती हैं।
१. पहली ‘उतथ्य गीता’ शान्ति पर्व के पर्वांशं ‘राज धर्म पर्व’में है और राजा के धर्म का विवेचन दो अध्याय के ९४ श्लोकों में किया गया है। उतथ्य बृहस्पति के बड़े भाई और महर्षि अंगिरा के पुत्र थे और युवानस्व पुत्र मांधाता एक प्रसिद्ध राजा थे। भीष्म ने इस ‘उतथ्य गीता’ में युद्धिठिर को ऋषि उतथ्य द्वारा राजा मंधाता को बताये क्षत्रिय राजाओं के राजधर्म को ही बताया है।मांधाता इक्ष्वाकु वंश के नरेश युवनाश्व और गौरी के पुत्र थे।इस लिंक (http://hinduonline.co/Scriptures/Gita/UtathyaGita.html) में आपको यह पूरी गीता संस्कृत में मिल जायेगी। श्री बिबेक देबरॉय ने अपने लेख में उसके वर्णित राजधर्म का संक्षिप्त विवरण अपने एक अंग्रेज़ी लेख में दिया है। उदाहरणार्थ:”हे पुरूष सिंह! धर्म सबसे अच्छा है। अपनी प्रजा पर सदाचारी शासन करने वाला ही सच्चा राजा होता है। व्यक्ति को काम और क्रोध से बचना चाहिए और धर्म का पालन करना चाहिए। राजा द्वारा पालन किया जाने वाला धर्म ही सबसे अच्छा कर्म है।”…”जब राजा धर्म का पालन करता है, तो वर्षा सही समय पर होती है। समृद्धि होती है और प्रजा सुखी एवं प्रसन्न होती है।”https://openthemagazine.com/columns/the-sovereign-condition/


२. एक और पाँच श्लोक की गीता है जिसको ‘काम गीता’ कहते हैं, जो ‘अश्वमेध यज्ञ’ के तेरहवें अंश के श्लोक १२-१७ को कहते हैं । यह गीता कामना (इच्छा) के दमन के महत्व के बारे में है। यह बताती है कि कैसे उपयुक्त साधनों के बिना कामना (इच्छा) को दबाने की हर क्रिया बेकार हो जाती है।उदाहरण के लिये इस गीता का एक प्रारम्भिक श्लोक है नीचे-
“अत्र गाथाः कामगीताः कीर्तयन्ति पुरा विदः
शृणु संकीर्त्यमानास ता निखिलेन युधिष्ठिर।”
https://www.sacred-texts.com/hin/mbs/mbs14013.htm


३.बिवेक देवरॉय ने एक अन्य गीता को जिसका नाम ‘अणु गीता’ है, भगवद्गीता के बाद महाभारत की गीताओं में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध कहा है। यह महाभारत के १४ वें मुख्य पर्व ‘अश्वमेध पर्व’ का दूसरा उपपर्व है। इसका एक अंग्रेज़ी में अनुवाद शायद सबसे पहले १८८२ में काशीनाथ तेलंग ने किया। अणु गीता महाभारत में उस समय आया है जब अश्वमेध यज्ञ के बाद कृष्ण के द्वारिका जाने की बात आई है। ३५ अध्यायों की यह गीता तीन भागों में है- एक सिद्ध ब्राह्मण और कश्यप का संवाद, ब्राह्मण और उसकी पत्नी का संवाद एवं फिर ब्रह्म और ऋषियों का संवाद। ये संवाद कृष्ण और अर्जुन के द्वारा महाभारत में दिखाया गया है। पहला संवाद ही असल में अणु गीता माना जाता है।https://openthemagazine.com/columns/whos-a-free-man/


४.पिंगल गीता महाभारत के शान्ति पर्व के उपपर्व ‘मोक्ष धर्म पर्व’में आती है।युद्धिष्ठिर के एक प्रश्न का जबाब पितामह भीष्म ने ‘पिंगल गीता’ के पिंगल एवं सेनजित के संवाद द्वारा दिया है।पिंगल राजा सेनजित के दरबार के ज्ञानी पंडित थे। इसी संभाषण का विवरण है इस गीता में। https://openthemagazine.com/columns/hope-and-happiness/


५.पराशर गीता : महाभारत के लेखक वेद व्यास के पिता ऋषि पराशर हैं। महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म और युधिष्ठिर के संवाद में युधिष्ठिर को भीष्म राजा जनक और पराशर के बीच हुए वार्तालाप को सुनाते हैं। इस वर्तालाप को पराशर गीता नाम से जाना जाता है। इसमें धर्म-कर्म संबंधी ज्ञान की बाते हैं।


६.वामदेव गीता राजधर्म पर्व की दूसरी गीता है। यह राजाओं के धर्म के बारे में है और उनको उनके राजकीय दायित्व को शास्त्रीय विधान का ध्यान रखते हुए निभाने का निर्देश देता है।वामदेव गीता में, भीष्म ने युधिष्ठिर को वही बताया जो वामदेव ने राजा वसुमान को बताया था। बातचीत मूल रूप से उत्थ्य गीता से ही प्रारम्भ होती है जो वामदेव गीता तक चलती है। https://openthemagazine.com/columns/a-road-map-for-the-ruler/


७.सदजा गीता शान्ति पर्व के ‘आपद धर्म’ उपपर्व के आख़िर में आती है और इसमें केवल एक अध्याय है।इसमें पाँच पांडवों एवं विदुर का धर्म के बारे में विचारों को रखा गया है। https://openthemagazine.com/columns/the-force-of-destiny/


८. ब्याध गीता -महाभारत का ‘व्याध गीता’में एक व्याध द्वारा एक ब्राह्मण संन्यासी को दी गई शिक्षाएं शामिल हैं। यह महाभारत के वानपर्व खंड में है और ऋषि मार्कंडेय द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया जाता है। कहानी में, एक अभिमानी संन्यासी को एक व्याध (शिकारी) धर्म के बारे में सीखाता है,”कोई कर्तव्य कार्य पापमय नहीं है, कोई कर्तव्य अशुद्ध नहीं है” और यह केवल जिस तरह से कार्य किया जाता है, उससे निर्धारित होता है।

महाभारत की अन्य गीताओं के बारे में अभी और नहीं जानता। पर महाभारत के पात्रों को ले अन्य अध्यात्म के ग्रंथों में ज़रूर और बहुत गीता हैं।अगली किस्त में ‘महाभारत के बाहर की गीता’….

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प्रधान मंत्री मोदी जी से एक ज़रूरी प्रार्थना आम गाँववालों के लिये

प्रधान मंत्री मोदी जी से एक ज़रूरी प्रार्थना आम गाँव वालों के लिये
बिहार, बंगाल, यहाँ तक कि अन्य प्रदेशों में गाँवों में स्वास्थ्य सम्बंधी बहुत काम नहीं हुआ। बिहार में मेरे गाँव, ननिहाल, ससुराल में ८० साल की तरह किसी तरह की व्यवस्था होते नहीं देखा है मैंने।यहाँ तक कि हर पंचायतों में भी अस्पताल नदारद हैं, सामान्य केन्द्र भी नहीं हैं। न कोई प्राइवेट या सरकारी डाक्टर या कोई दवाई की दुकान। फिर कहाँ वे कोविद जैसे बीमारी की जाँच करायें या अन्य कोई जाँच । किसी गाँव में एक रक्त चाप जानने की कोई सम्भावना नहीं है। कौन वैक्सीन देगा और दवाई या कहाँ होगा ज़रूरी देख भाल। न आक्सीजन, न वैन्टिलेटर, फिर कैसे बचेंगे गाँववाले, बहुत सारे छोटे क़स्बों के लोग?

राज्य सरकारों ने अबतक कुछ नहीं किया है। अगर पंचायत घरों या स्कूलों के साथ एक छोटे अस्पताल की व्यवस्था होती तो स्कूल और पंचायत घर जिसमें शायद ही कोई पिछले सालों में गया होगा, कम से आज व्यवहृत हो जाते। केन्द्र ने भी कोई पहल नहीं किया केन्द्रीय विद्यालयों की तरह गाँवों के लिये स्वास्थ्य सम्बंधी व्यवस्था की। कृपया सभी डी. एम और कलक्टरों को और राज्य सरकार को ज़िम्मेदार बनाइये। हर गाँव में स्वास्थ्य सम्बंधी कुछ व्यवस्था तो होनी ही चाहिये ही। हर पंचायतों में अच्छे क़िस्म की।

आज तो सब ज़िला अस्पताल भी बहुत निम्न कोटि के हैं। बहुत ज़्यादा प्राइवेट अच्छी व्यवस्था भी नहीं आई है बड़े क़स्बों एवं शहरों में भी।कृपया अब तो सड़क और बिजली की तरह इसकी भी ब्यवस्था तो करवाइये, राज्यों से मिल कर।


राजनेता हों या धर्म के ठेकेदार क्यों कोई गाँवों का बहिष्कार कर दिये? राजनेता तो चुनाव के लिये रखे अपने दलालों से मिलने आते हैं।पंचायत प्रधान, सरपंच करोड़ों बना शहर में जा बसे। पढ़े लिखे लोग जहां गये बही बस गये। गुरूओं को शहरों के चेलों से धन मिलता है, वे गाँव गाँव क्यों घूमें। यह लोगों को धर्म की बात बतानेवाले लोगों की। कृपया आप तो कुछ कीजिये । भारत को बचाने की। गांधी ने यही चाहा था पर नेहरू दिल दिमाग़ एवं शरीर से अंग्रेज बने रह भी महान हो गये। आप तो कीजिये। आप कुछ कीजिये गाँवों को बचाने के लिये। बहुत ग़लत हो रहा है वहाँ के लोगों के भविष्य के लिये बदलिये।

भगवान आपको दीर्घ आयु दें….

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गाँव क्या करे- रोयें या शहर भागे

आज रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता दिखी जो बहुत सामयिक है। पर मुझे इसके रचनाकार के विवाद में नहीं पड़ना, जिसकी भी हो बहुत सठीक एवं साम्य की दशा को दर्शा रही है।

प्रभु रथ रोको!
क्या महाप्रलय की तैयारी है।
बिना शस्त्र का युद्ध है जो,
महाभारत से भी भारी है
कितने परिचित कितने अपने
आखिर यूं चले गए
जिन हाथों में धन-संबल
सब काल से छले गये
हे राघव-माधव-मृत्युंजय
पिघलो, ये विनती हमारी है
ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो
महाभारत से भी भारी है।

१. धर्म नेता एवं राजनेता ने गाँवों पिछड़ापन दिया। इस पूरे भयंकर महामारी के बाद भी हमारे धर्म गुरू कुम्भ की तरह के घातक धार्मिक जमघटों का आयोजन करने से आम धर्मांध लोगों को नहीं समझाते। अपने अपने मठों में बैठे धनवान अंधे उनको और उनके शिष्यों का भरण पोषण कर रहे हैं। अगर उनमें थोड़ी मानवीय संबेदना रहती तो गाँव गाँव जाते और उनको समझाते उपनिषदों के अद्वैत ज्ञान को,उनके साथ रहते। राजनीतिक नेताओं की तरह इन्होंने भी गाँवों का वहिष्कार कर दिया है, क्योंकि गाँवों में उस धन की प्राप्ति नहीं होती जो उनके उन आयोजनों को करती अपना महत्व बनाये रखने के लिये झूठे स्वर्ग या नर्क का भय दिखा । पर भगवान तो बार बार कहते हैं लोक संग्रह के लिये ‘सर्वभूते रता’ काम करने के लिये है यह मनुष्य रूप में जन्म और वे उन्हें ही मिलते हैं…..यही राजा से लेकर साधारण परिवार के लोगों यही सिखाया जाता है। यह सभी धर्मों में कहा गया है; अतिथि देवों भव । मैं अपने बचपन में गाँव पर की जमीन्दारी संभालने वाले छोटे दादाजी को करते देखा था जब तक वे ज़िन्दा रहे।सभी सांसदों की, गुरू रामदेव, श्री श्री रविशंकर महाराज के लाखों शिष्य हैं, वे एवं चारों शंकराचार्य के लाखों शिष्य हैं जो गाँवों की सेवा में मदद कर सकते हैं। हर गाँव में अस्पताल बनवा सकते हैं वहीं के लोगों की मदद से। राम कृष्ण मिशन, चिन्मयानन्द की देश विदेश फैली संस्था और ऐसी बहुत से ग्रुप गाँवों को स्वर्ग बना सकते हैं दस साल के भीतर। पूरानी पीढ़ी के उद्योगपतियों को जैसे बिरला, टाटा, डालमिया आदि थे, वे बहुत सारा ऐसा काम करते थे। अब सभी पैसा कमाने की लिये शहरों में इस काम में बहुत धन निवेश कर रहे हैं। गाँव के भी बहुत लोग ऐसे काम जो शिक्षा एवं स्वास्थ्य के लिये होती थी, में रूचि रखते थे, अब भी नहीं दिखते। सब एक दूसरे से ज़्यादा धनी बनना चाहता है।
२. राज्य सरकारों द्वारा गाँवों स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। आज तक हर बड़े गाँव या हर पंचायत में भी अस्पताल नहीं है। मैं बिहार, बंगाल को तो नज़दीक से वर्षों से जानता हूँ। इसके लिये सभी राज्य सरकारें और राजनीतिज्ञ दोषी हैं। कहाँ टेस्टिंग होगी, कहाँ चिकित्सा दिया जायेगा। कौन वैक्सीन लगायेगा, इतने बड़ी संख्या में पीड़ित लोगों के लिये। चुननेवाले लोग भी ज़िम्मेदार और पंचायत चलानेवाले। सभी लोग पैसा कमाते रहे एक दूसरे के नाम ज़िम्मेदारी डालकर। कैसा दुर्भाग्य है। अब तो चेते केन्द्र, राज्य सरकार, सरकारी अफ़सर, और नेता पंचायत से ले संसद तक के। गाँव के लोग भी , तिलक, यज्ञ आदि में लाखों में खर्च कर सकते हैं पर हास्पिटल बनाने में नहीं। वे सब शहर भाग गये और गाँव के बचे खिंचे गरीब निबटे इससे।
क्या आज भी देश, समाज, लोग जागेगे?
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कोविद-१९ का भयंकर आक्रमण जो गाँवों बर्बाद कर देगा और देश को भी
अशोक गुलाटी का आज का लेख जिसे हर गाँव के व्यक्ति को समझने की ज़रूरत है। क़रीब क़रीब भारत के सभी गाँवों ऐसी स्थिति है। लोगों में सभी अंध विश्वास वैसे ही हैं जैसे आज से १०० साल पहले। नारी शिक्षा अभाव, ग़रीबी, जनसंख्या की वृद्धि को रोकने की कोई मानसिकता नहीं। न किसी के बताये ज़रूरी अनुशासनात्मक कदमों को उठाने, बताये निर्देशों को मानने की, न ठीक तरह सही मास्क का उपयोग न दो गज से ज़्यादा की दूरी बनाये रखना, न हाथों का ठीक साबुन से सफ़ाई; न अपना टेस्ट कराने की इच्छा, वैक्सीन लेने में उत्साह, या दर्द का भय या कोई और ग़लतफ़हमी, फिर कैसे बचेंगे इस काल देवता से। शादी, तिलक, दाह संस्कार,त्योहार,अन्य घरेलू परम्परागत कार्यक्रम, आदि को पता नहीं क्यों ४ या पाँच आदमी से निपटाया नहीं जा सकता। सभी गाँव की औरतों और लोगों को बुलाना, न आनेवाले के प्रति दुश्मनी चालू कर देना, यह कैसी बुद्धिमानी है। सभी सच्चे धर्मग्रंथ कहते हैं मरने बाद देह का कोई महत्व नहीं। यहाँ हम अन्य जीवों से भी बेकार हैं, क्योंकि मरने के बाद भी वे काम के होते हैं। फिर कैसे भी कोई इसको निपटा दे क्या फ़र्क़ पड़ता है जब श्मशानों में भीड़ लगी हो एवं अस्पताल पहले से शरीर दान किये के स्वीकृति के बावजूद भी शरीरों को न ले रहे हों। https://indianexpress.com/article/opinion/columns/what-we-need-to-save-lives-and-livelihoods-as-covid-reaches-rural-india-7327210/

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कोविद-१९ काल की दो विचार

पहला दुख

प्रवासी मज़दूर समस्या, समाधान: आज इंडियन एक्सप्रेस में एक जाने माने कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी एवं बी. बी. सिंह का लेख पढ़ा प्रवासी मज़दूरों का। ये वे लोग हैं जिनका न अपना रहने की जगह होती है, न वे उस राज्य के वोटर होते हैं, न उनको राज्य के नागरिकों की अन्य सुविधा मिलती है, न उनके बच्चों को स्कूल मिलता है वास स्थान के पास, न उन्हें सरकारी राशन सुविधा, न केन्द्र सरकार की मुफ्त सुविधाएँ, क्योंकि न उनमें अधिकांश के पास आज भी जन धन एकाउंट है, न किसी अन्य बैंक में कोई एकाउंट,न चिकित्सा की सुविधा, न कोई, जहां वे काम करते हैं वहाँ, उनके बारे में सोचनेवाला मानवीय अधिकारी, न सरकारी, न कम्पनी या ठेकेदार का। जो हैं उन्हें चुननेवाले हैं।कुछ अपना कुछ करते हैं सड़कों किनारे, या ठेलियों में घुम घुम कर। ऐसे नाई भी हैं, दर्ज़ी भी, कपड़े प्रेस करनेवाले, फल बेंचने वाले, कितना गिनाया जाये। स्थानीय पुलिस एवं अधिकारियों के अत्याचार के शिकार से बचने के लिये इन्हें ऊपर से हफ़्ता भी देना पड़ता है। आश्चर्य है कि ऐसे लोगों का न स्थानीय नगरपालिकाओं, न अन्य किसी जगह- न उनके जन्म के, न काम करने की जगह के प्रदेश में उनके बारे में कोई रिकॉर्ड होता,न केन्द्रीय व्यवस्था में। क्या करोड़ों में गिनती के इन भारतीयों के प्रति देश की सरकारें पिछले पचास सालों से पूरी उदासीनता नहीं दिखाई? क्या यही इस देश को आज़ाद करानेवाले लोगों का गुणगान वाले राजनीतिज्ञों का विचार है? क्या इनकी समस्याओं का समाधान हो ही नहीं सकता? क्या इनके परिश्रम से कमाई करनेवाले व्यवसायियों, मिल मालिकों, या अन्य सरकार तंत्र चलानेवालों का कोई दायित्व नहीं बनता?
दुर्भाग्य है कहिये या सौभाग्य, करीब ६०-७० प्रतिशत ऐसे लोग केवल कुछ उत्तरी एवं मध्य प्रदेशों से आते हैं- वे हैं बिहार, झारखंड, बंगाल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िसा।


कैसे इन प्रदेशों की सरकारें और वहाँ के राजनीतिक व्यवस्था के ठेकेदार आज़ादी से ले आजतक कभी शर्मसार नहीं हुए और आम लोगों को बेवकूफ बनाते हुए सरकार चलाते रहे और चला रहे हैं। आज कि इस भीषण अवस्था को देखते हुए कोई हल न निकाल कर एक दूसरे को समय समय ख़राब बता अपना उल्लू सीधा किये जा रहे हैं। मोटी मोटी रक़मों को हर माह लेनेवाले सरकारी आफ़िसर,कम्पनियों, या व्यवसायों के मालिक और उनके चम्मच न केवल इनको यें सुविधाएँ देने की सम्भावना या तरीक़े के बारे सोचते या करते हैं, बल्कि इनको चूसने वालों की मदद में कोई कसर नहीं छोड़ते, क्योंकि वे मोटी रक़म से इनकी जेब भरते रहते हैं। बिचौलिये दलालों के चलते इनके रोज़ाना कमाई भी कम होती जाती है। आप प्राइवेट सिक्योरिटी गार्डों से पूछिये, घरों में काम करनेवाली महिलाओं या लड़कों से पूछिये, जो दलालों द्वारा आते हैं, यह साफ़ हो जायेगा और हम सब जानते हैं। न पहले कुछ हुआ, न आज भी कोई बदलाव दिखने की कोई संभावना लगती है। क्योंकि समय समय पर सब्ज बाग दिखाने की तरह के इन सभी के लिये दिये जानेवाले सुविधाओं हड़प जाने वाले रास्ता निकाल ही लेते हैं।सभी पॉलिसियाँ बेकार ग़लत साबित हुए हैं। न ‘मनरेगा’ में कुछ देखने लायक़ बना, न इन लोगों की आमदनी बढ़ा या बदल पाया। न सरकारी कैस सहायता भी अधिकांश इन ज़रूरतमंदों की समस्याओं को नहीं सुलझा पाई क्योंकि वे सभी आधे मन से किये गये उपाय थे, अस्थायी थे।जितनी धन राशि किसानों के नाम दी जाती है, वे सब या अधिकांश केवल ज़मीन के मालिक हैं, खेती को लिज़ पर दे रखे हैं।


क्या यह संघीय ढाँचे के चलते है? क्या केवल केन्द्र सरकार की ज़िम्मेदारी है या राज्य सरकारों की? आश्चर्य है कि दक्षिण भारत के राज्यों में भी उत्तर भारत के राज्यों के राजनीतिज्ञों की तरह के बेईमान, लूटनेवाले राजनीतिज्ञों ने कैसे वहाँ की अर्थ व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य- को उत्तर के राज्यों बहुत बेहतर बना दिया? वहाँ के जन्मे लोग भी प्रवासी हैं पर बहुत बहुत अच्छी जगहों पर और सम्पन्न।

मेरे ख़्याल से उत्तर भारत के लोगों की सदियों की पतन के राह पर जाती मानसिकता इसका कारण है। अपनी पूरानी ग़लत भ्रान्ति पूर्ण मान्यताएँ समय से दृढ़ से दृढ़ होती गई हैं। सामान्य व्यक्तियों का आचरण सम्बंधी बढ़ती हीनता कारण है। आत्मिक कमज़ोरियाँ कारण हैं। गहरी बैठी हज़ारों प्रकार की जातियों का मतभेद कारण है। धर्म और धार्मिक आचरण के प्रति गिरती आस्था कारण है। केवल अपने स्वार्थ पर पूरी निष्ठा, कारण है। ब्राह्मण सब तरह से अशिक्षित दुश्चरित्र होते गये हैं और अन्य लोग, ब्राह्मणों के आचरण संहिता को अपनाये बिना, उनकी गद्दी पर बैठ गये।
कुछ सुझाव माइग्रेंट मज़दूरों की कोविद-१९ के समय के आने-जाने-फिर आने और जाने की प्रक्रिया को बन्द करने के लिये-
१. दोनों राज्य सरकारों- जहां से प्रवासी आते हैं, और जहां काम करते हैं- को इनकी समस्याओं को सुलझाने के सक्रिय और तत्काल कदम उठाने होंगे।
२. एक देश, एक राशन कार्ड की तौर पर इनको आधार कार्ड के आधार पर जहां काम कर रोज़ी कमाते हैं वहाँ वोट देने का अधिकार देना होगा, नहीं पार्टियाँ इन की समस्याओं क्यों सुलझायेंगीं।
३. काम पाने में एक आदमी की चलाई जा रही बिचौलियों की कम्पनियों को हटाना होगा और रजिस्टर्ड कम्पनियों को ज़िम्मेदार बनाना होगा।
४. सभी औद्योगिक इकाइयों को इनको एक अच्छी स्थानीय रहने की सब निम्नतम सुविधाओं का इंतज़ाम करना होगा, चाहे उन्हें रेंट पर डॉरमेटरी या एक कमरे के आवास, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का सवाल हो।
५. हर नगरपालिका आदि को अपना स्वयं का रोज़गार करनेवाले लोगों के लिये एक कालोनी बनानी होगी उस शहर में।
६. हर राज्य सरकार ज़िला के सर्व प्रमुख को अपने ज़िला के हर पंचायत में वहाँ के लायक स्थायी रोज़गार देनेवाले गृह या लघु उद्योगों की ज़िम्मेवारी देनी होगी और इस काम को सबसे महत्वपूर्ण बनाना होगा।
-उस अधिकारी का मुख्य अपने ज़िले के हर परिवार के आय को बढ़ाने का दायित्व और उसे सभी ज़रूरी सुविधा के साथ अधिकार भी देना होगा।
-ज़िला स्तर पर इन प्रवासियों दोनों तरह के राज्यों में रिकार्ड रखा जाये। और शायद बाहर जानेवालों को उनको हुनर सीखने के लिये प्रेरित करने एवं सिखाने के काम को भी इसी ज़िलाध्यक्ष का ही काम होना चाहिये।
७. सभी इन्फ़्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्टों- बिल्डिंग या रोड आदि के कंस्ट्रक्शन में भी अस्थायी शीघ्रातिशीघ्र जोड़कर तैयार करने एवं इसी तरह खोलकर अन्य स्थान पर ले जा लगानेवाली सभी व्यवस्थाओं को करने को सोचना होगा।
८. केन्द्रीय सरकार को यथाशीघ्र अपनी पॉलिसियों की कमियों को सुधारने के लिये कदम उठाना चाहिये एवं साथ ही जनसंख्या पर नियत्रंण का क़ानून भी उतना ज़रूरी है। देश को निकट भविष्य में लॉकडाउन मुक्त बनाने का राष्ट्रीय मुहिम चलाना ज़रूरी है, उसके बिना देश का क्या होगा हम सोच ही नहीं सकते। https://indianexpress.com/article/opinion/columns/second-wave-covid-19-lockdown-migrant-workers-mgnrega-informal-sector-7288881/
पुनश्च: अगर किसी जानकार मित्रों को कोई सुझाव हो तो ज़रूर लिखें या मुझसे सम्पर्क करें। जिनकी सरकारों में जान पहचान हैं उन्हें बताएँ इस समस्या, अगर वे इसके भयानक रूप से परिचित हों। irsharma@gmail.com 9560186661

दूसरी बात

मेरे दुख का कारण: मैंने दो दिन पहले बिहार के गाँवों की हालत जानने के लिये अपने गाँव और ससुराल बात की थी। आता समय बहुत ही भयानक दिख रहा है। कोविद का कोई अनुशासन नहीं माना जा रहा है। अभी तिलक, शादी, यहां तक की श्राद्ध आदि में या दैनिक कार्य कलाप में कोई परिवर्तन नहीं आ रहा है। बिहार में तो स्वास्थ्य पर कोई ध्यान हीं नहीं दिया गया पिछले ७० सालों में। कुछ मूल सुविधाएँ दूर दूर तक मयस्सर नहीं। हाँ, रोड, बिजली एवं फ़ोन ज़रूर है सबके लिये शायद । मेरे गांव की आबादी १-२ हज़ार से तीस हज़ार के क़रीब हो गई, पर आज तक कोई अस्पताल नहीं, कोई डाक्टर नहीं है कहीं। आश्चर्य बावन गाँवों का मिलकर आयोजित यज्ञ में कई लाख खर्च हो जाता है सभी के योगदान से, पर उस हित जमा किये पैसे में से अगर आयोजन के गाँवों में अगर एक अस्पताल बन गया रहता, तो आज बहुत सारे गाँवों में अस्पताल होते। जैसी प्रजा, वैसा राजा। किसी तरफ़ से कोई चेष्टा नहीं की गई। यहाँ तक भी ज़िला की आफ़िस एवं कचहरियों वाले शहर में भी कोई आधुनिक सुविधा युक्त अस्पताल नहीं है। अगर जहां हैं, वहाँ की सुविधा डाक्टरों के लापरवाही एवं अनुपस्थिति के कारण बेकार हो गई। आज गाँवों में कोविद की बीमारी के लक्षण होने पर भी उसकी जाँच की कोई व्यवस्था नहीं। वैक्सीन देने की शायद मोबाइल अस्पताल की कुछ व्यवस्था हुई है। एक बार ४५ से ऊपर के लोगों को वैक्सीन लगा भी है। पर प्रतिशतता बहुत कम ही होगी। कुछ की बारी नहीं आई वैक्सीन लगवाने से अभी भी डरते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह कोविद की दूसरी लहर भयानक रूप लेती नज़र आ रही है ग्रामीण इलाक़ों में। शायद अन्य प्रदेशों का भी यही हाल होगा। उत्तर एवं मध्य भारत के प्रदेशों में यही हालत होगी। कौन इन आने दिनों में सब व्यवस्था करेगा, कर पाया जायेगा या नहीं , मालूम भी नहीं? और अभी तो मंत्री भी कह रहे हैं कि तीसरी चौथी लहर भी आ सकती है और हर अगली लहर पहलेवाली से भयंकर होगी। बिहार के गाँवों रहने वाले शिक्षित युवा वर्ग एवं सम्पन्न इसमें आगे आते तो अच्छा होता, पर गाँव तो शहरों से बेकार होते जा रहे हैं आपसी सौहार्द दिखाने में, अपने को बड़ा दिखाने में। पता नहीं यह घमंड एवं कटुता क्यों बढ़ती ही जा रही है।संयुक्त परिवार ख़त्म ही हो गये हैं, जो बचे हैं केवल नाम के है। गाँव से, यहाँ तक की शहरों से भी पढ़ाई करने या व्यवसाय की सोचना नवयुवकों में ग़ायब हो गई है। जब मैंने बचपन में अपने दादाजी को विभिन्न कोशिश करते हुये पाया था अपने बेटों के लिये, पर कोई उसमें रूचि नहीं लिया, न पढ़ाई की। जो हुआ वह भगवान भरोसे। पर खैर आज की परिस्थिति पहले अपनी ज़िन्दगी में मैंने कभी देखी नहीं। काश, कोई ईमानदार प्रयत्न करता राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त के सपने की ‘ अगर गाँव शिक्षित हो जाते, वह स्वर्ग यहीं बन जाता’। उनके कल्पना की शिक्षा तो पूरे बिहार से ग़ायब है। केवल राजनीतिज्ञों ने विभिन्न रूप से आम लोगों को बेवकूफ बना अपना उल्लू सीधा किया है। नक़ली पढ़ाई, नक़ली सर्टिफिकेट, नक़ली चरित्र, नक़ली जीवन …..भगवान ग़ायब, भक्त ग़ायब, देव ग़ायब, गायें ग़ायब, भैंसे ग़ायब, रह गयी हैं केवल मशीनें, मिक्सी, फ्रिज, ऑवेन, टी.वी, वातानूकुलन की व्यवस्था……जागो, उठो, भगवान के बताये रास्ते पर चलो, कर्म करो, श्रेष्ठों के बताये रास्तों पर चलो……केवल आप सब मिल कर ही निःस्वार्थ भाव से समाज के लिये काम कर ही अपना और समाज का भला कर सकते हो जितनी तुम्हारी शक्ति हो और विश्वास मानों वह तुम्हारी शक्ति असीम है, समझो अपने को, अपनों को…..
अगर मेरी बात अच्छी न लगे तो एक वृद्ध अशक्त की बात जान माफ़ कर देना……

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आत्मा- ब्रह्म कैसे दिखते हैं?

आत्मा- ब्रह्म कैसे दिखते हैं
हमारे उपनिषदों के ऋषियों ने अपने जिस ब्रह्म को देखा उसका वर्णन किया है। हममें अधिकांश इसको मानने को तैयार न होंगे। पर अगर हम परमहंस रामकृष्ण, विवेकानन्द के निकटस्थ लोगों की अपने अनुभवों पर लिखी किताबों में उनकी समाधि के अन्तिम लक्ष्य को पाने के विवरण को पढ़े, या उनके बाद के बहुचर्चित परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित‘An Autobiography of Yogi’ को पढ़े तो यह विश्वास करना पड़ता है कि ब्रह्म को लोगों ने अपनी एकनिष्ठ भक्ति एवं योग साधना के द्वारा देखा है। ऐसे अद्भुत ऋषि हर काल में, हर देश में, हर धर्मों में हुए। अत: कैसे इस को हम नकारें।

अलग अलग उपनिषदों में जिन्हें मैं अब तक देख चुका हूँ इस यात्रा में, वहाँ से निम्नलिखित जानकारी मिली-

श्वेताश्वतरोपनिषद् के रचयिता ऋषि ने पहले ही अध्याय में लिखा है कैसे महान सिद्ध ऋषियों ने ब्रह्म को देखा एवं पाया अपनी पूर्ण आत्मशक्ति युक्त एकनिष्ठ साधना के द्वारा-
‘ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्ह्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्‌।
यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः॥१.३॥

तब ऋषियों ने एकाग्रचित्त होकर ध्यान योग में स्वयं भगवान की सृजन-शक्ति को देखा जो अपने गुणों में छिपी हुई थी। ये वही एकमेवाद्वितीयं हैं जो काल, आत्मा तथा सभी कारणों के अधिपति हैं। The sages, absorbed in meditation through one-pointedness of mind, discovered the creative power, belonging to the Lord Himself and hidden in its own gunas. This is that Lord who is one without second and who rules over all those causes – time, the self and the rest.

ईशोपनिषद् में ब्रह्म या ईश्वर का स्वरूप ऋषि बताते है,‘स्वयम्भुः पर्यगात् अकायम् अस्नाविरम् अपापविद्धं शुक्रम् अव्रणं शुद्धं कविः मनीषी परिभुः। सः याथातथ्यतः शाश्वतीभ्यः समाभ्यः अर्थान् व्यदधात्’- ‘वह पुरुष ही सर्वत्र व्याप्त, वह तत् ज्योतिर्मय, शरीर-रहित, अपूर्णता के चिह्न या दाग से शून्य, स्नायु एवं नस-नाड़ी से रहित और शुद्ध है एवं पाप से बिधा नहीं है। सर्वदर्शी, मनीषवान् वह एकमेव जो सर्वत्र सब कुछ हो जाता या बन जाता है, उस स्वयंसत् पुरुष ने ही सनातन वर्षों से, अनादि काल से सभी पदार्थों को उनके स्वभाव के अनुरूप पूर्णतया ठीक-ठीक, यथातथ रूप में व्यवस्थित कर रखा है।’

कठोपनिषद् में यमराज ब्रह्म ज्ञान ही के एकमात्र अभिलाषा लिए सभी आसक्त करनेवाले प्रलोभनों को ठुकराने पर नचिकेता को बताते है ब्रह्म स्वरूप,’..अशव्दम् अस्पर्शम् अरुपम् अव्ययं तथा अरसं नित्यम् अगन्धवत् च भवति अनाद्यनन्तम् महतः परं ध्रुवं…’(१.३.१५)- जिसमें न शब्द है, न स्पर्श और न रूप है, जो अव्यय है जिसमें न कोई रस है और न कोई गन्ध है, जो नित्य है, अनादि तथा अनन्त है, ‘महान् आत्मतत्त्व’ से भी उच्चतर (परे) है, ध्रुव (स्थिर) है।

मंडूकोपनिषद् में ऋषि कहते हैं, ‘यत् तत् अद्रैश्यम् अग्राह्यम् अगोत्रम् अवर्णम् अचक्षुः श्रोत्रम्। तत् अपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तत् अव्ययं’- वह’ जो अदृश्य है, अग्राह्य है, सम्बन्धहीन (अगोत्र) है। अवर्ण है, चक्षु तथा श्रोत्र रहित है, जो अपाणिपाद (हाथ-पाँव रहित) है, नित्य है, विभु है, सर्वगत है, सब में ओतप्रोत है, अतिसूक्ष्म है, अव्यय है, जो समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का उद्गम-स्थल (योनि) है….

प्रश्नोपनिषद में भी आता है-
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरम्लोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वो भवति;
‘जो उस छायाहीन, वर्णहीन, अशरीरी शुभ्रे एवं अक्षर ‘चैतन्य’, ‘जिवात्मा’ को जानता है, वह उस ‘परम अक्षर’, ‘सर्वोच्च तत्त्व’ को प्राप्त करता है।
हे सौम्य वत्स, वह सर्वज्ञ मनुष्य स्वयं ही ‘सर्वम्’ बन जाता है।

तैत्तरीयोपनिषद से
भूः भुवः सुवः इति एताः तिस्रः वै व्याहृतयः उ…तत् ब्रह्म सः आत्मा ..शिक्षावल्ली .५.१
‘भू’ ‘भुवः’ ‘तथा’ ‘स्वः’ ये तीन ‘विशेष शब्द’ (व्याहृतियाँ) हैं ‘उसके’ नाम के। …..वह ‘ब्रह्म’ है, वह ‘आत्मा’ है।
ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्वम्‌।…८.१.॥’ओम्’ ही ब्रह्म है, ‘ओम्’ ही यह समस्त विश्व है।
..
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भुतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र।
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥१.४.११॥
सौम्य वत्स! जो उस ‘अक्षर’ तत्त्व को जानता है जिसमें विज्ञानात्मा, अर्थात् बोधात्मक चैतन्य, समस्त देवगण, प्राणवायु एवं सभी महाभूत समाविष्ट हो जाते हैं, वह सर्वज्ञ है, वह सम्पूर्ण ‘विश्व’ को जानता है।
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ताः अनविप्रयुक्ताः।
क्रियासु बाह्यान्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥१.५.६॥
ये मात्राएँ, परस्पर संलग्न एवं अविच्छेद्य, जब तीन मात्राओं के रूप में प्रयोग की जाती हैं तब वे मृत्युमती, मृत्यु की सन्तान-रूप होती हैं; किन्तु ज्ञानी पुरुष इससे विकम्पित नहीं होता; कारण, त्रिविध कर्म होते हैं, बाह्यकर्म, आभ्यन्तर कर्म तथा दोनों के मिश्ररूप कर्म, और वह निर्भय होकर अकम्पित, अविचलित भाव से इन तीनों कर्मों को उचित रूप से करता है।
यत् शान्तम् अजरम् अमृतम् अभयं परं तं विद्वान् ओङ्कारेण आयतनेन एव अन्वेति। च इति ॥१.५.७॥ विद्वान् पुरुष ‘ओंकार’ में स्थित होकर ही उस लोक को प्राप्त करते हैं, वे उस ‘परमा शान्ति’ को भी प्राप्त करते हैं जहाँ जरा का प्रभाव है तथा ‘अमृतत्व’ के द्वारा भय से मुक्ति मिल जाती है।
स यथेमा नध्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते तासां नामरुपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते।
एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते चासां नामरुपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति १.६.५॥
जिस प्रकार प्रवाहित होती हुई नदियाँ सागर की ओर अग्रसर होती हैं, किन्तु सागर में पहुँचकर वे उसी में विलीन हो जाती हैं तथा उनके नाम और रूप समाप्त हो जाते हैं और सब कुछ केवल सागर ही कहलाता है, इसी प्रकार इस द्रष्टारूप ‘चैतन्य’ की षोडश कलाएँ ‘पुरुष’ की ओर अग्रसर होती हैं एवं जब वे उस ‘पुरुष’ को प्राप्त कर लेती हैं तब वे ‘उसी’ में विलीन हो जाती हैं तथा उनके अपने नाम-रूप समाप्त हो जाते हैं और इस समस्त को एकमात्र ‘पुरुष’ कहा जाता है; तब ‘वह’ कला (अंश) रहित एवं अमृत-रूप हो जाता है।
अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः।
तं वेध्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥१.६.७॥
जिस प्रकार रथ के चक्र की नाभि में समस्त अरे अवस्थित होते हैं, उसी प्रकार ‘वह’ है जिसमें ये कलाएँ अवस्थित हैं ‘उसी’ को ‘पुरुष’ समझो जो कि ज्ञान का चरम लक्ष्य है, इसी के द्वारा तुम मृत्यु एवं उसकी व्यथा से मुक्त होओगे।

उसी ब्रह्म शक्ति के रूप का विशद वर्णन हम भगवद्गीता के पूरे एकादशोऽध्याय -‘विश्वरूपदर्शनयोग’ में देखतें हैं, जिसको देखने एवं सुनने का सौभाग्य अर्जुन और साथ ही सारथी संजय को मिलता है-

संजय कहते हैं उनके कृष्ण के द्वारा दिखाये विश्वरूप के बारे में-
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥११.१२॥
यदि आकाश में सहस्रों सूर्यों की ज्योति एक साथ उठी हुई हो तो वह ज्योति उस महापुरुष के देह की ज्योति के सदृश कदाचित् ही हो सके ।
Such is the light of this body of God as if a thousand suns had risen at once in heaven.
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फिर अर्जुन बताते हैं अपना अनुभव-
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥
आपकी देह में समस्त देवों को और विभिन्न जातीय जीवों के समूहों को, कमल रूप आसन पर बैठे हुए सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, शिव, एवं विष्णु को और समस्त ऋषियों को और दिव्य सर्पों को देखता हूँ ।
I see all the gods in Thy body, O God, and different companies of beings, Brahma, Shiva, and Vishnu seated in the Lotus, and the Rishis and the race of the divine Serpents.


जब कृष्ण सब तरह से समझा चुके तो पहले अपनी विभूति की विस्तृत जानकारी दी १० वें अध्याय में , पर उसके बाद भी अर्जुन ने साक्षात् देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो पूरे ११वें अध्याय में अपना विश्वरूप ही दिखा दिया, और तब तक दिखाते रहे विभिन्न तरह से, जब तक अर्जुन उनसे अपने को सामान्य सखा सारथी के रूप में लौट आने की प्रार्थना न की।

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