Let Bhagawad Gita Lead us to light

“I find a solace in the Bhagawad Gita….When disappointment stares me in the face and all alone,I see not one ray of light, I go back to the Bhagawad Gita.”- Mahatma Gandhi

“The Gita is a bouquet composed of the beautiful flowers of spiritual truths collected from the Upanishads.” -Swami Vivekananda

After going through Gita many times, I find Bhagawad Gita as the most secular scripture providing solution to all the confusions of a person (represented by Arjuna)through the advices of Krishna(The Supreme Self).It can be accepted whole heatedly by all the countries of world as Yoga has been. My request and appeal to all educated and highly educated professionals and business persons of our country:Particularly,if you are above 50 years of age, please start reading Bhagwad Gita through a book in your mother tongue or English with good commentary. If not whole that has 700 Slokas, please start by reading only Chapter 2 and 18. If that is also too much, please read only chapter 2 that too from 11th Sloka onwards to end, the 73rd sloka.

1.Slokas (11-46) deal with the yoga of knowledge called Gyan-yoga, for example the following sloka,

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥2.22॥

Just as a man cast off his old,wornout clothes and puts on new ones,so also the embodied Self casts off its worn out bodies and enters others which are new.

2.Slokas 47-60 sketch Karma-yoga, the yoga of action,for example,

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥2.47॥

Thy right is to work only, but never to it’s fruits;let the fruit of action be not thy motive, nor let thy attachment be to inaction.

3.Slokas 61-70 deal with Bhakti-yoga, the path of love, example,

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥2.69॥

That which is night to all beings,in that the self-controlled man keeps awake;where all beings are awake, that is the night for the sage(muni)who sees.

4. Slokas 71and72, concern with Sannyasa-yoga, the path of renunciation,example,

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥2.71॥

That man attains peace who,abandoning all desires, moves about without longing,without the sense of ‘I-ness’ and ‘my-ness’.

If you consider the whole of Slokas 11-72 to be too heavy on you, you may attentively just read Slokas 54-72 only that provide the description of a ‘Man of Steady Wisdom’(स्थितप्रज्ञ,sthitaprajna). You can always select the best ones out of these Slokas and read daily till you absorb and may be starting to act on the suggestions. If any one of you are like me in late sixties to eighty and with not much involvement, please focus on Gita for an hour daily preferably early in the morning,with focus for grasping it.I request you all to share my request.It will be a good holy work, punya on your part. Among the commentaries, one by Chinmayananda of Chinmaya Mission or the another one of Eknath Easwaran, are the best ones that I have found.You can yourself research and take the decision.You will not lose anything but get gradually increasing peace of mind and you will enjoy life better, I promise.

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ज्ञान का लक्ष्य -एक सुदृढ़ समाज

हमारे यहाँ राजनेता हिन्दू धर्म को मनुवादी बताते हुये दलितों को धार्मिक ज्ञान से दूर रहने की सलाह देते हैं. आज सबेरे के स्वाध्याय में निम्न श्लोक पढ़ा,जो मनु के अनुसार चारों वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य, शूद्र- का धर्म कहा गया है. ये सभी गुण सभी हिन्दू का स्वधर्म होना चाहिये. हम यहाँ राजनीति क्यों करते हैं? हम हर बच्चे के विकाश काल में घर, स्कूल एवं समाज में उसे यह प्राथमिकता से क्यों नही बताते?सभी हिन्दू इस श्लोक को मूलमंत्र क्यों नहीं बनाते? समाज के अज्ञानी तथाकथित पंडितों के कहने पर हम हर व्यवहार में ऊँच,नीच की भावना ज़ाहिर करते रहते हैं. राजनीतिज्ञ हिन्दू समाज को जिस तरह से तोड़ रहे हैं, जल्द ही न हिन्दू रहेंगे, न देश.

अहिंसा,सत्यम्,अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रिय-निग्रह: ।

एत सामासिकं धर्मम् चातुर्वण्येडबर्वीन् मनु:।।

हिंसा न करना, सत् बोलना, चोरी न करना, पवित्रता का पालन करना, इन्द्रियों पर क़ाबू रखना;- मनु ने चारों वर्णों के लिये थोड़े में यह धर्म कहा है।

इस श्लोक को जीवन में व्यवहार कर हम अपने ,अपने समाज एवं देश को सुखी और सम्पन्न बना सकते हैं. सोचिये…समझिये…..जीवन में उतारिये…

II

आज सबेरे घूमने के लिये घर से निकलते ही अपने ही तल्ले के श्री चटर्जी से भेंट हो गई. उनकी पत्नी को आँख की बड़ी तकलीफ़ है, दिल्ली के जाने माने चक्षु विशेषज्ञ डा. सर्राफ़ की चिकित्सा कर रहे हैं, उम्मीद है. मैंने ढाढ़स दिया और भगवान पर भरोसा रखने को कहा. मैं तो केवल भगवान से प्रार्थना ही कर सकता हूं.और अगर हर जीव में वही अात्मा जो सर्वोपरि है, बिराजमान है तो एक दूसरे के लिये किये प्रार्थना का प्रभाव ज़रूर पड़ना चाहिये. हम इन दो प्राचीन एवं प्रसिद्ध श्लोकों को अपनी प्रात: प्रार्थना में शामिल कर रखे हैं, आप भी शामिल कर सकते हैं-

ना त्वहम् कामये राज्यम्

ना स्वर्ग ना पुनर्भवम् !!!

कामये दुख तप्तानाम्

प्राणिनाम् अार्ति-नाशनम् !!!

अपने लिये न मैं राज्य चाहता हूँ,न स्वर्ग की इच्छा करता हूँ ।मोक्ष भी मैं नहीं चाहता।मैं तो यही चाहता हूँ कि दु:ख से तपे हुये प्राणियों की पीड़ा का नाश हो।

स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्याय्येन मार्गेण महीं महीशाः।

गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ।।

प्रजा का कल्याण हो, राज्यकर्त्ता लोग न्याय के मार्ग से पृथ्वी का पालन करें, खेती और ज्ञान-प्रसार के लिये गाय और ब्राह्मणों का सदा भला हो और सब लोग सुखी बने।

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अबोध बच्चे एवं हमारी ज़िम्मेदारी

भगवद् गीता में कृष्ण ने ‘सर्वकर्मफलत्याग’(समस्त कर्मों के फल का त्याग) को ही उपासना,अभ्यास,ज्ञान,ध्यान से भी उत्तम रास्ता बताया है भगवत् प्राप्ति का.इस ८० के नज़दीक के उम्र में हम क्या कुछ अच्छा कर्म करें-जो हम कर सकें एवं मन को शान्ति भी दे, किसी फल की आकांक्षा भी न हो. शिक्षा हरदम से मेरा प्रिय विषय रहा है. देश के ६०-७० प्रतिशत बच्चे जो शिक्षा पाते हैं अपने स्कूलों में; वे बारह साल या ज़्यादा हिन्दी (या अपनी भाषा)और इंग्लिश पढ़ने के बाद भी इन भाषाओं में लिखी पुस्तकों को न सठीक साफ़ साफ उच्चारण के साथ बढ़िया से पढ सकते हैं,न उसका अर्थ समझते है. कितनी दयनीय स्थिति है शिक्षा की, पर फिर भी वे परीक्षाओं में अच्छे अंकों से उतीर्ण हो जाते हैं. इस पढ़ाई का क्या फ़ायदा? अगर स्कूल के अध्यापक इस एक योग्यता को बच्चों में ला दें, तो शिक्षा सार्थक हो जायेगी.दुनिया बहुत बड़े सफल लोग स्कूली शिक्षा न होने के बावजूद भी केवल पढ़ना समझना जानने के कारण स्वाध्यन कर सब कुछ कर पाये- जैसे विल गेस्ट्स,जुकरवर्ग, स्टीव जॉब और बहुत सारे. पिछले दिनों में मैंने मेडसरवेंटस् के पाँच लड़के लड़कियों से लम्बी बातचीत की, समस्या को समझने और उसका कुछ हल निकालने के लिये. अपने घर में काम करनेवाली सुनीता के बच्चों-लक्ष्मी एवं गोलु- को खाने पर बुलाया जिससे वे खुलकर बात कर सकें.खाने के बाद हमने उन्हें एक स्कूल स्तर का इंग्लिश हिन्दी शब्द कोष दिया और उसका ब्यवहार करना सिखाया. हिदायत दी कि वे अगर पाँच शब्द रोज़ सीखें तो वे बहुत जल्द इसके फ़ायदे समझ जायेंगे.दो बातें तय है कि इन बच्चों के माता पिता स्कूल में भर्ती कराने के अलावा बच्चों की पढ़ाई में कोई सार्थक मदद नहीं करते,न कर सकने लायक हैं.यहां तक की घर में भी माता पिता का कोई ध्यान इन बच्चों की पढ़ाई की प्रगति पर नहीं होता. स्कूल से आ ये बच्चे शायद ही किताब खोलते हैं.शायद बच्चों से ज़्यादा उनके मांबाप को शिक्षा एवं उचित सलाह की ज़रूरत है कि वे कैसे बच्चों की शिक्षा की रूचि को बनायें रखें एवं इस जानकारी के महत्व को समझें.अधिकांश बच्चे माँ बाप के काम को ही देखते एवं करने की इच्छा बना लेते हैं. न माँ बाप न स्कूल के अध्यापक उन्हें समय रहते बताते हैं कि वे मिहनत कर कैसे अपना भविष्य ख़ुशहाल और समृद्ध बना सकते हैं. हम सभी शिक्षित एवं सम्पन्न अगर अपने घर में काम करनेवाली के बच्चों को कुछ अच्छा बनने में थोड़ी सी सहायता कर दें पैसे से नहीं, इन बच्चों को उत्साहित कर, कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर कर तो बहुत बड़ा सकारात्मक अन्तर आ सकता है. केवल महीने में एक घंटा अधिक से अधिक समय का दान देना है इस पवित्र यज्ञ के लिये, पीढ़ियाँ सुधर जायेंगीं इन पिछड़ों की, देश आगे बढ़ जायेगा देखते देखते.हमारे आम्रपाली इडेन पार्क में १५५ औरतें घरों में काम करतीं है, पूरे एफ ब्लॉक में तो शायद हज़ार से ऊपर की संख्या होगी. काश, हम समाज के पिछड़े वर्गों की सहायता कर सकते इस तरह….

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भगवद् गीता एवं जातिवाद

जातिवाद हिन्दुस्तान एवं हिन्दू धर्मियों के लिये अभिशाप है और भारत की सम्भावित उन्नति का सबसे बड़ा बाधक है. यह एक ख़ास वर्ण की इतिहासिक साज़िश द्वारा बनाया संक्रामक जानलेवा ब्याधि है, हिन्दूओं के कुरीतियों में सबसे ख़तरनाक है, और धर्म संरचना करनेवालों के बिचारों की बिकृति है.आज भारत की चुनाव की राजनीति इसे बढ़ावा दे रही है संरक्षण के माध्यम से और तथाकथित धर्म के ठेकेदारों का उल्लू सीधा करने के लिये.महात्मा गांधी ने इसका बिरोध किया था अपनी पूर्ण शक्ति के साथ.पर नेहरू या पटेल ने कोई प्रयत्न नहीं किया. जातिप्रथा का आधार प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रन्थों में वर्णित वर्णाश्रम है, पर हम हिन्दूओं या विश्व के लिये भगवद् गीता से ऊँचा कोई ग्रंथ नहीं समझा जाता. इसी पर हाथ रख हम अपने न्यायालयों में साक्षी देते हैं.

गीता में हर ब्यक्ति का अपने कर्म एवं स्वभाव के अनुसार वर्ण विभाग किया गया था समाज संगठन के लिये.यह विभाजन प्रत्येक व्यक्ति के अपने विशिष्ट गुणों एवं कर्म के अनुसार था केवल ब्यक्ति के माता पिता के वर्ण के आधार पर नहीं. इन चारों के स्वभाविक कर्म (भगवद् गीता अध्याय १८, श्लोक ४२,४३, ४४):

१.ब्राह्मण- शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य

२.क्षत्रिय-शौर्य, तेज़, धृति, दाक्ष्य( दक्षता), युद्ध से अपलायन,दान और ईश्वर भाव( स्वामी भाव)

३.वैश्य- कृषि, गोपालन, वाणिज्य

४.शूद्र-परिचर्यात्मक कर्म

चारों वर्णों के स्वभाविक कर्म भिन्न भिन्न है, पर सबका लक्ष्य समाज धारणा एवं सबकी आध्यात्मिक प्रगति ही है.प्रत्येक वर्ण के लिये शास्त्रों में विधान किये हुए कर्त्तव्यों का पालन, यदि उस उस वर्ण का व्यक्ति करता है तो वह व्यक्ति क्रमश: तमस एवं रजस से ऊपर उठकर सत्त्वगुणी हो सकता है-“स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।…. “अर्थात अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।”

धर्म के ठेकेदारों ने केवल हज़ारों जातियों को ही नहीं बनाया वरन चारों वर्णों के लोगों में विभिन्न तरीक़े से तरह तरह अलगाव दिखा हर वर्ण में विभिन्न जातियां बनाई.ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अनेक तरह के -जिनमें न रोटी का रिश्ता है, न बेटी ब्याही जा सकती, हर अपने को कुलीन और दूसरे को नीच कहता है, और सभी के सामने दूसरे की निन्दा करता है.

फिर आज के तकनीकी एवं वैज्ञानिक व्यवस्था के चलते हर व्यक्ति को अपने ब्यक्तिगत जीवन में चारों वर्णों के कर्मों को कम अधिक मात्रा में करने की ज़रूरत पड़ती है. जव वह अपना टायलेट साफ़ करता है तो शूद्र का काम करता है, जब ख़र्चे का नियंत्रण करता है तो वैश्य बनता है, जब घर की रखवाली या संचालन करता है तो क्षत्रिय और ब्राह्मण बनते रहता है. देखिये सेना के अध्यक्षों को, न्यायालयों के जजों को, बड़े बड़े अध्यापकों और वैज्ञानिकों को. क्या वहाँ आप सभी अलग अलग जाति को लोगों को नहीं पाती हैं. है कि नहीं जाति बेमायने. ख़त्म किया जाये. ….इसे.

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गीता एवं आत्मोत्थान

भगवद् गीता के बिभिन्न अध्यायों में अलग अलग प्रकार के ब्यक्तियों के गुणों को एक एक कर बताया गया है: स्थितप्रज्ञ, योगयुक्त भक्त,आत्मचेता,गुणातीत साधक, दैवी सम्पदा युक्त ब्यक्ति,सात्त्विक कर्त्ता.पर हर ब्यक्ति के स्वभाव, आचरण एवं कर्म का बिभाजन भी बहुत बिस्तार से तीन अध्यायों में समझाया गया है. हर जीव, विशेषकर मनुष्य में प्रकृति के तीन गुण- सात्त्विक, राजसिक, तामसिक- कम अधिक मात्रा में होते है जो आचरण एवं स्वभाव को निर्धारित करते हैं.हर ब्यक्ति अपने ध्यान, श्रद्धा,चेष्टा एवं अभ्यास से अपने इन तीनों गुणों की मात्रा में बृद्धि या ह्रास कर सकता है. ध्येय तो हरदम तामसिक, राजसिक स्वभाव या कर्म से सात्त्विकता की ओर बढ़ने का होना चाहिये, और फिर तीनों गुणों से ऊपर उठ गुणातीत बनने का.भगवद् गीता का अध्याय १४ ‘गुणत्रयविभाग योग’ इन तीन गुणों के बिभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालते हैं.

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ॥

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥5॥

लक्ष्यप्राप्ति के लिये श्रद्धा एवं ज्ञान दोनों महत्वपूर्ण हैं.किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने के पहले उस लक्ष्य के अस्तित्व एवं उसकी प्राप्ति के साधन का ज्ञान ज़रूरी है और वैसे ही उसमें विश्वास ज़रूरी है जो श्रद्धा द्वारा ही सम्भव है.अध्याय १७ ‘श्रद्धात्रयविभाग योग’ में पहले श्रद्धा के और फिर हर ब्यक्ति के कर्त्तव्य कर्म-यज्ञ, तप, एवं दान के सात्विक, राजसिक, तामसिक प्रकारों का निर्देश है. साथ ही ब्यक्ति के सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहार का भी बिवरण तीन श्लोकों में किया गया है. वहीं अध्याय १८ ‘मोक्षसन्यासयोग’में ज्ञान,कर्त्ता,कर्म,बुद्धि,धृति,सुख के भी सात्त्विक, राजसिक, तामसिक लक्षणों को बताया गया है.फिर वर्ण ब्यवस्था में निर्धारित चार वर्णों- ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र- के कर्म एवं स्वभाव पर आधारित बिभिन्न कर्मों का उल्लेख है, जो जन्म आधारित नहीं है.हर ब्यक्ति जैसे अपने स्वभाव और आचरण में सात्तविकता को बढ़ा आत्मोन्नति कर सकता है, वैसे शूद्र,वैश्य, क्षत्रिय,ब्राहम्ण अपनी शिक्षा,दक्षता,आचरण में परिवर्तन ला उसके अनुसार वर्ण का दावेदार हो सकता है.हां,अध्याय १६ ‘दैवासुरसंपद्विभागयोग’में सार्वकालिक मानवजाति का तीन विभागों में बर्गीकरण स्वभाविक आचारनुसार किया गया है- दैवी,अासुरी(पापी)एवं राक्षसी(सुधार के सर्वथा अयोग्य अधम),पर दैवी एवं अासुरी गुणों का ही वर्णन है.

द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।….इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला।

केवल तीन श्लोकों में दैवी गुणों को बताया गया है, जब शेष पूरा अध्याय असुरी गुणों और उन गुणों से सम्पन्न अासुरी प्रवृति वाले लोगों के अचारण, उसके परिणाम एवं उनके उद्धार के तरीक़े का वर्णन है.राक्षसी प्रवृति के लोगों के आचरणों को अज्ञात कारणों से छोड़ दिया गया है.आज से ३००० साल पहले भी समाज में आसुरी प्रवृति वाले लोगों की वैसी बहुतायत थी जैसा आज है.इन तीनों अध्याय का अध्ययन, मनन, एवं अात्मोन्नति के प्रयत्न आज भी हम सभी के लिये ज़रूरी है.कृपया हम अपने को समझें, और सुधारने की कोशिश करे स्वयंहित एवं समाज के कल्याणहित.आगे के लेखों में इन सब पर जानकारी देते रहने का प्रयास रहेगा.

प्रश्न हो तो सम्पर्क करें irsharma@gmail.com

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Gita through one Sloka

Swami Sivananda in his commentary has prescribed the one Sloka 78 of Chapter 18 of Bhagawad Gita as एकश्लोकी गीता. He has also compiled a सप्तश्लोकी गीता with seven Slokas from Gita. One can read, understand and ponder over.

I shall like to provide the first one here:

एकश्लोकी गीता

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

Wherever is Krishna, the Lord of Yoga, wherever is Partha, the archer, there are prosperity (श्री), victory or success(विजय),happiness and sound policy(भूति);this is my conviction.

It is Sanjaya, the charioteer of Dhritarashtra, the blind king of Kuru with special power of seeing the Mahabharata battle in every audio and visual detail bestowed by Vyasa, who is giving his last opinion after the completion of the conversation between Arjuna and Krishna expecting from the old king to make stop the devastating forthcoming battle of Mahabharata at last. But it didn’t happen.

However, Vyasa wishes to give expression of a deeper significance through this verse- expounding an unquestionable truth.

Krishna in Gita everywhere represented the Self, the Atman.He can be invoked within heart of each one of us, if we try for the Atman through the prescribed exercises for Self-realisation. We all are like Arjun-Partha Dhanurdharah who represents “the confused, mortal human being , with all innumerable emotional weaknesses and fears”. Just after seeing the huge army of his own close relatives, Arjuna hesitated to use his talent to destroy and defeat them, though the whole lot of them are on wrong side of dharma, and laid down his arms and decided for not taking the right route to fight the wrong ones, reclined to impotent idleness. But then Krishna by answering all his queries and convincingly explaining the need to fight made him take up arms.

We all can win the battle that we face in life every time by invoking the Ataman, the Krishna in us.Once reinforced with spiritual understanding ,we can exert and put the required endeavours, to tame life and master prosperity.No power on the earth can stop us from success.

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Bhagawad Gita is as secular as Yoga

I wish one day the minorities in India accept it. Every educated Indian or for that matter every educated person world over must try to read, understand and practise the clear prescriptions for self improvement provided in plenty in Bhagawad Gita. For integrating the country, every educated Indian must keep a book in their home and go through whenever, they find it fit. However, I suggest the younger generation to accept it as a guide for better peaceful life. With the availability of the book in every language and for all in different fields of activities such as a manager or a student, it is so much easy.

Gandhi wrote,”When doubts haunt me, when disappointments stare me in the face, and I see not one ray of hope on the horizon, I turn to Bhagavad-Gita and find a verse to comfort me; and I immediately begin to smile in the midst of overwhelming sorrow. Those who meditate on the Gita will derive fresh joy and new meanings from it every day”.

Interestingly, Bhagawad Gita starts with the first word ‘dharma’ in the first Sloka of chapter 1 and ends with the word ‘mum’ as the last word in the last sloka of the last chapter 18, making together ‘mum dharma’(my dharma).Gita has 700 (701) Slokas. For the benefits of those who intend to read, understand and practise Gita, I may suggest that they should not be afraid of the total number of Slokas.They can focus on Chapter 2 and Chapter 18 that provide very simple summary of the whole of Bhagawad Gita.I have tried to select some Slokas from different chapters for myself that provide me with all the qualities that as a good human being I must try to imbibe in me and practise in living. I keep on writing about that. A collection of the same will certainly be helpful in building a rational personality for successful life.

Anyone going through my write up can ask me questions on my mail irsharma@gmail.com.)

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