किसान कैसे करें अपनी सालाना आय दुगनी

कुछ प्रश्न है पहले. किसे किसान कहना चाहिये: १.क्या वह जो ज़मीन का मालिक है और अपनी ज़मीन का अपने खेती करता है अपने/श्रमिक लगा/मशीन- ट्रैक्टर, कमवाइन हार्वेस्टर, धान रोपने की मशीन या पुरानी तरह से हल आदि से? या २.क्या वह जो अपनी ज़मीन को दूसरे को खेती पर देता है सालाना रेंट पर पूरा ख़र्चा रेंट पर लेनेवाले का, और अपने कुछ नहीं करता या अन्य धंधे या नौकरी में लगा है?३.या क्या वे कुछ ज़मीन के मालिक जो दोनों तरीक़ों को ब्यवसायिक दृष्टि से लाभ हानि तौल कर ज़मीन का ब्यवहार करते हैं? ज़मीन रेंट पर ले खेती करनेवाले को ज़मीन की उत्पादकता या चलते भाव के अनुसार पहली ऊपज के मौसम के चालू होने के पहले ही एक बार में तय सालाना रेंट ज़मीन के मालिक को दे देनी पड़ती है. साल भर खेती पर हुये ख़र्चे को ख़ुद बहन करना पड़ता है और साल भर की आमदनी भी उसकी का होता है.उसमें अधिकांश पहली खेती की आमदनी अधिकांश रेंट में दे चुका होता है, पर बाक़ी सब उसकी आमदनी होती है. उसकी आमदनी फ़सलों के चुनाव,उत्तम बीज, खाद, सिंचाई,और मौसम पर निर्भर करता है.सिंचाई का प्राकृत वर्षा, या मनुष्य निर्मित ढंग से हो सकती है,पर तूफ़ान, बहूत ज्यादा सूखा, या अन्य आपदा तो दैव आधारित है, पर उससे निपटने का बहुत उपाय हो रहा है फ़सल वामा योजना द्वारा. मज़दूरी वे अपने परिवार के लोगों द्वारा कर मज़दूरी का ख़र्च बचा सकते हैं। मुझे मालूम नहीं की रेंट पर खेती करने वाले को बैंक क़र्ज़ा देते हैं या नहीं, क्योंकि उसके पास आधार नहीं होता पैसा देने का, जबकि ज़मीन मालिक ज़मीन के दस्तावेज़ का फ़ोटो कॉपी दिखा उसकी कोलैटर्ल पर क़र्ज ले सकता है. ज़मीन अपनी न होने रेंट और अन्य ख़र्चों को कम कर ही कुल आय लिया जाना चाहिये.उदाहरण- हमारे जाने में हमारे इलाक़े में एक बड़े बीघे का सालाना रेंट १२-१६ हज़ार है जो धान के फ़सल के दाम का आधा है, साल की उस ज़मीन से हुये बाक़ी फ़सलों का फ़ायदा रेंट पर लेनेवाले का होता है.नये क़ानूनों के डर से ज़मीन मालिक रेंट लेनेवाले को बदलते रहते हैं, अत: खेत के उत्पादकता को लम्बे अरसे तक बढ़ाने के लिये जरूरी चीज़ें रेंट पर ज़मीन लेनेवाले की प्राथमिकता नहीं होती , दूसरे के ज़मीन पर कोई पैसा क्यों लगाये? २०१८ के बजट में निम्न समर्थन मूल्य को बढ़ाने के साथ दो और बातें हैं जो किसान की आमदनी बढ़ा सकती है- १.बहुत बडी संख्या में लोकल मिनी मंडियों का निर्माण, जिससे किसानों को प्राइवेट ट्रेडरों को निम्न समर्थन मूल्य से कम पर बेंचना न पड़े.२.चूंकि क़रीब ८५% खेत मालिकों के पांच बीघा या एक हेक्टेयर से ज़मीन कम है, आम किसान धान, गेहूँ की फ़सल से सुख की ज़िन्दगी नहीं जी सकते. उन्हें या तो सब्ज़ी फल या अन्य ब्यवसायिक दृष्टि से फ़ायदेमन्द में जाना होगा या इस बार के बजट में सहभागिता कर ज़मीन बढ़ानी की बात कही गई है और इस संगठन को ब्यवसायिक कम्पनी की तरह ब्यवस्थित और संचालित करने की अपेक्षा होगी. आज भी बिहार के ९०% किसान निर्धारित निम्न मूल्य नहीं पाते.करीब हर क्विंटल पर १५०-२०० रूपये का घाटा उठाते हैं.पर बजट में प्रस्तावित किसान संगठन को कारगर बनाने में सफलता उस गाँव के किसानों की आपसी सौहाद्रता और सहयोग के साथ ईमानदार नेतृत्व पर भी निर्भर करता है. आज भी गाँवों में सभी सरकारी योजनाओं का लाभ सठीक ज़रूरतमन्द के पास नहीं पहुचंता.कुछ लोग माहिर हो गये हैं सरकारी सहायता को हड़प जाने में आम किसानों को बेवक़ूफ़ बना. वैसे मेरे इलाक़े के गाँवों की खेती से हर बीघे साधारणत:आज क़रीब ७०हज़ार से एक लाख की उपज होती है, अगर दो फ़सल- धान, गेहूँकी खेती हो तो, जैसा मेरे पैतृक गाँव में हो रहा है, राशि कम होगी. इसमें धान २० क्विंटल और गेहूँ १० क्विण्टल प्रति बीघे का अनुमान लिया गया है. पर अगर तीन फसल- धान, दलहन, पिपरमेंट लिया जाये तो रक़म ज़्यादा होगा, जैसा मेरी ससुराल में करते हैं. इसमें प्रति बीघा उपज धान की २० क्विंटल, गेहूँ की जगह दलहन की ४ क्विंटल, और पिपरमेंट का ४-५ लीटर. उत्पादकता एवं ख़र्च बीज, सिंचाई, फर्टिलाइजर, कीटनासक दवा, और फ़सल के प्रकार पर निर्भर है. हमारे मानदंड से किसान केवल साल में ३०- ४० दिन या इससे भी कम काम कर पाँच बीघे पर पचास हज़ार माह की उपज कर सकता है. और भी बहुत तरीक़ों से लागत कम एवं उत्पादन अधिक किया जा सकता है. खेती के लिये कुछ ट्रेनिंग एवं पढ़ने एवं प्रयोग की ज़रूरत है….पर सबसे ज़्यादा मन में विश्वास ज़्यादा होना मिहनत पर, मुफ़्त की ख़ैरात पर नहीं…..’खेती उत्तम, मध्यम दाम, निकृष्ट चाकरी भीख निदान’ ….किसान अपनी खेती से आमदनी दुगनी, तिगुनी या पांचगुनी कर सकता है अगर खेती में रूचि ले, जानकारी हासिल करे, उसे उपयोग में लाये…….और हुआ भी है पिछले सालों में. अब नई पीढ़ी ज्यादा पढ़ी और समझदार है तो उसका फ़ायदा उठाये, नये तकनीकी ज्ञानों का ब्यवहार करते हुये…….निम्नतम मूल्य में बृद्धि और क़र्ज़ माफ़ी कभी ख़ुशहाली नहीं लायेगी……दुनिया गमलों, मकान के छत एवं फ़ैक्टरियों की तरह बहुमंज़िली कृत्रिम खेतों पर खेती करने चली है, हम अभी भी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकर बग़ावत, तोड़फोड़ …..

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Helplessness of Defence Minister

Defence Minister Nirmala Sitharaman on April 11 said the government cannot compel Indian armed forces to buy indigenous weapons. Interesting, Defence Minister opened a major defence exhibition that projects “India — the biggest global arms importer — as one of the major defence manufacturing hubs in the world.The theme for ”The four-day DefExpo India, is “Emerging Defence Manufacturing Hub. The 10th in the biennial exercise aims at establishing Brand India and highlighting the manufacturing capabilities of the country’s public and private sectors. Asked about the huge export-import gap in the defence sector of a country that does not even figure among the top 25 exporters of arms and reluctance of its forces to buy locally manufactured weapon systems and use, Sitharaman said she could only tell the Indian armed forces to procure from indigenous companies “as much as possible”. She could not cross a “thin line” to impinge on the freedom of the Indian Army, the Indian Air Force or the Indian Navy “to make their own decisions” as per their operational requirements.

How Nirmalaji or all concerned with manufacturing and using justify this sort of reasoning and thereafter expecting other country to buy our equipment? We would have been wasting so much money of public exchequer to organise such expensive exhibition for years, if either the local manufacturers or Institutes fails to convince the armed forces to use them and the chiefs of defences forces can’t participate in developing and leading in using the machines, weapons, or ammunition…Over the years that mindset has kept us as slave to the creations of advanced nations.

It is because the Americans respected our software engineers and their products that made India known as intelligent people in eyes of the world. Left to the bureaucracy and babus, they would also have not GSTN or Aadhar. What a shame!Neither Japanese, nor Chinese have any such problem.

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Defence Manufacturing- Fighters

As reported, ‘American aerospace giant Boeing announced its tie-up with Hindustan Aeronautics Ltd and Mahindra Defence Systems to manufacture F/A-18 Super Hornet fighter jets in India.’ The joint venture will have a dedicated new manufacturing plant (Pratyush Kumar, President, Boeing India; T Suvarna Raju, CMD, Hindustan Aeronautics Ltd; and SP Shukla, Group President, Aerospace and Defence, Mahindra Group, participated in MoU signing ceremony.) Boeing wishes to cash on Indian Air Force immediate requirements of 110 fighters jets worth a $15-billion deal. And the Indian Navy has also asked for sanction to purchase 57 multi-role carrier borne fighters (MRCBF) for around $12 billion. HAL is well in the business with considerable amount of competency to build warplanes with Tejas now in serial production with three production lines. It has a good aircraft design centre too with DRDO as mentor. Mahindra Aerospace and Defence has experience of smaller civil planes and aero components’ export. The expertise of both the Indian companies will facilitate to drastically bring down the cost of each F/A-18. It is expected to make the preference to tilt towards Boeing offer against that of the Russians readying to offer the advanced MiG-35 which is at a lower cost compared to others. As such, Super Hornet is claimed as the most advanced and least expensive aircraft per flight hour of its kind. The F/A-1.8 Super Hornet will deliver on India’s need for a carrier and land based multi-role fighter. The Super Hornet will have not only a low acquisition cost, but it also costs less per flight hour to operate than any other tactical aircraft in U.S. forces inventory. And with a plan for constant innovation, the F/A-i8 Super Hornet, as claimed, outpace threats, bolster defence capabilities and make India stronger for decades to come.https://youtu.be/knWxCcvzn3g On the other hand, Lockheed Martin has also expressed its readiness to shift its F-16 fighter aircraft manufacturing unit to India — and the US government, according to the manufacturer, will allow it to do so. @Lockheed , as bonus, is also prepared to transfer the technology of its third generation anti-armour Javelin guided missile system to India for its future manufacture.

My comments: HAL should not join the venture that Boeing is looking for a long time. HAL perhaps already exports components to Boeing. Instead, HAL must focus fully on design, development and manufacturing of its own fighters and helicopters of all types and requirements for defence as well as civil uses hiving off its other secondary divisions to private companies in coming years. Idea must be to become a global defence manufacturing company. It must also have a separate independent unit to design, develop, manufacture the engines too for all its planes and helicopters and application pulling the best Indian talents working anywhere in the world in next 5-10 years under the mentor ship of DRDO.

Instead of HAL, Indian Government must facilitate Boeing for the tie up with Tata Group for Hornet-18. Boeing has already joint venture with Tata group (TASL) for components which also has collaborated with GE for engine components and assembly. It will be in interest for the country to have at least two fully integrated plants -one in public and another in private sector competing with each other, each aiming at exporting up to 30% to the friendly countries around.

@Lockheed, the Boeing rival from US, has teamed up with Tata Sons offering its F-16s. Lockheed had offered to move its sole F-16 production line, currently in Greenville, South Carolina, to India to make the planes at a joint factory with Tata. It certainly does not serve the purpose of having a joint venture to develop, design,prototype manufacturing and testing of fighters of contemporary with features and performances of top 3-4 best of the world.Both US companies must agree to keep on updating the technologies in collaborations with Indian partners.

//economictimes.indiatimes.com/articleshow/63744171.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst

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लिंगायत का हिन्दूओं से अलगाव, कितने अलगावों की शुरूआत

मुझे बहुत दुख हुआ जान कि एक राजनीतिक पार्टी द्वारा हिन्दू धर्म के लोगों को बाँटने के प्रयास की शुरूआत से-कर्नाटका के लिंगायतों को अन्य धर्म का बता अल्पसंख्यक बना दिया कुछ बहके लोगों के दबाब में चुनाव में फ़ायदे के लिये सोची समझी नीति के अनुसार. यह राजनीतिक दल हिन्दू धर्म की बढ़ती शक्ति के कारण इस हिन्दू के पंथ को अल्पसंख्यक का दर्जा दे मुख्य धारा से अलग करना चाहता है. लिंगायत के प्रवर्तक वासवा ने जाति भेद को मिटाने का काम किया शिव को अपना इष्टदेव बना. शंकराचार्य से विवेकानन्द तक के बहुत संतों एवं महापुरूषों ने जाति प्रथा को मिटाना चाहा,पर सफल नहीं हुये. बहुत संतों के मरने के बाद उनके कुछ स्वार्थी शिष्यों ने अलग ही पंथ बना उसे अलग धर्म का दर्जा देने की कोशिश करते रहे. पर कुछ समन्वयी संतों के कारण हिन्दू एक बने रहे, विदेशी आतताइयों एवं देशी विश्वासघाती ब्यक्तियों के बहूत कोशिश के बावजूद. उनमें एक रहे लोकनायक रामचरित मानस रचयिता तुलसीदास. मैं तुलसीदास के समय में फैले सामाजिक समस्याओं की बात कर रहा हूँ. तत्कालीन समाज में शैवों, वैष्णवों और शाक्तों – तीनों में बहुत गहरा परस्पर विरोध था। इस ऐसी कठिन अवस्था से समाज में एकता लाने के लिये बहुत सारे भक्तिकाल के संतों ने बहुत मिहनत किया. तुलसीदास और उनकी कृतियाँ इसकी द्योतक हैं. तुलसीदास ने वैष्णवों के धर्म में एक ब्यापकता दी.उससे समय के अन्तराल से उक्त तीनों संप्रदायवादियों के बिभिन्नत्व को एक कर दिया। देखिये मानस में तुलसी के इस प्रयत्न की झाँकी, राम कहते हैं-

“शिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहु नहिं भावा॥

संकर विमुख भगति चह मोरि। सो नारकीय मूढ़ मति थोरी॥”

इसी प्रकार उन्होंने वैष्णवों और शाक्त के सामंजस्य को बढ़ाया.

“नहिं तब आदि मध्य अवसाना।अमित प्रभाव बेद नहिं जाना।

भव-भव विभव पराभव कारिनि। विश्व विमोहनि स्दबस बिहारिनि॥”

…श्रुति सेतुपालक राम तुम जगदीश माया जानकी। जो सृजति जग , पालती, हरती रूख पाई कृपानिधान की….

एक और तत्कालीन मुख्य प्रचलित पुष्टिमार्ग(भक्ति के क्षेत्र में महापुभु श्रीवल्‍लभाचार्य जी का साधन मार्ग पुष्टिमार्ग) के माननेवालों को ध्येय कर कहा और इससे बढ़िया ढंग से क्या कहा जा सकता है-

“सोइ जानइ जेहु देहु जनाई। जानत तुमहि होइ जाई॥

तुमरिहि कृपा तुमहिं रघुनंदन। जानहि भगत-भगत उर चंदन॥”

साथ ही उस युग में सगुण और निर्गुण उपासकों में विरोध था। जहाँ सगुण धर्म में आचार-विचारों का महत्त्व तथा भक्ति पर बल दिया जाता था वहीं दूसरी ओर निर्गुण संत साधकों ने धर्म को अत्यंत सस्ता बना दिया था।अद्वैतवाद की चर्चा आम होती जा रही थी; किंतु उनके ज्ञान की कोरी कथनी में भावगुढ़ता एवं चिंतन का अभाव था। तुलसीदास ने ज्ञान और भक्ति के विरोध को मिटाकर वस्तुस्थिति स्पष्ट कर दी- “अगुनहिं सगुनहिं कछु भेदा। कहहिं संत पुरान बुधवेदा॥

अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सी होई॥”

ज्ञान भी मान्य है किंतु भक्ति की अवहेलना करके नहीं। ठीक इसी प्रकार भक्ति का भी ज्ञान से विरोध नहीं है। दोनों में केवल दृष्टिकोण का थोड़ा-सा अंतर है।

बंगाल के राम कथा लिखने वाले कृतिवास ने राम से शक्ति पूजा करवाई रावण से जीतने के लिये , उसे ही आधुनिक काल में निराला ने ‘राम की शक्ति पूजा’ में लिखा. सदियों के गायन, मंचन, प्रवचन से हिन्दू धर्म एक हो पाया. रामकृष्ण ने कहा ये सब हिन्दू धर्म के अंश है- जतो मत, ततो पंथ……आज राजनीतिक दल को उसे बाँटने का प्रयास जन शक्ति को बरगला धर्म को बाँटने ख़तरनाक खेल है जिसका कोई अन्त नहीं होगा केवल देश के बिघटन को छोड़, लोग समझ नहीं पा रहें हैं, विद्वान भी नहीं. इसका घोर बिरोध होना चाहिये….लोगों को जागना चाहिये, हिन्दूधर्म की समन्वय के दर्शन को अबाध चलते रहने देना चाहिये….कर्नाटका की भूमि जहाँ विज्ञान, तकनीकी क्षेत्र में नेतृत्व दे रहा है, यहाँ भी देना चाहिये।

Xxxxxxx

पुनश्च

देखिये लंकाकांड के प्रारम्भिक तीन श्लोक तुलसीदास जी के राम चरित मानस से-

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं

योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌।

मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं

वंदे कंदावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥ 1॥

कामदेव के शत्रु शिव के सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथी के लिए सिंह के समान, योगियों के स्वामी (योगीश्वर), ज्ञान के द्वारा जानने योग्य, गुणों की निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों के वध में तत्पर, ब्राह्मणवृंद के एकमात्र देवता (रक्षक), जलवाले मेघ के समान सुंदर श्याम, कमल के से नेत्रवाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूप में परमदेव राम की मैं वंदना करता हूँ॥ 1॥

शंखेन्द्वाभमतीवसुंदरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं

कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्‌।

काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं

नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कंदर्पहं शंकरम्‌॥ 2॥

शंख और चंद्रमा की-सी कांति के अत्यंत सुंदर शरीरवाले, व्याघ्रचर्म के वस्त्रवाले, काल के समान (अथवा काले रंग के) भयानक सर्पों का भूषण धारण करनेवाले, गंगा और चंद्रमा के प्रेमी, काशीपति, कलियुग के पाप समूह का नाश करनेवाले, कल्याण के कल्पवृक्ष, गुणों के निधान और कामदेव को भस्म करनेवाले, पार्वती पति वंदनीय शंकर को मैं नमस्कार करता हूँ॥ 2॥

यो ददाति सतां शंभुः कैवल्यमपि दुर्लभम्‌।

खलानां दंडकृद्योऽसौ शंकरः शं तनोतु मे॥ 3॥

जो सत पुरुषों को अत्यंत दुर्लभ कैवल्यमुक्ति तक दे डालते हैं और जो दुष्टों को दंड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी शंभु मेरे कल्याण का विस्तार करें॥ 3॥

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कृषि: आज की समस्या ?समाधान!

गाँव के किसान के परिवार में पैदा होने और बचपन के कुछ वर्ष वहाँ बिताने के कारण आज भी वहाँ के समाचार और लोगों के जीवन स्तर की ख़बरें आकर्षित करतीं हैं.आज राज्यसभा टी.वी. चैनल पर किसान क्या चाहता है बजट से पर परिचर्या सुन रहा था.किसान दिल्ली के आसपास के गाँवों के थे. कृषि विभाग के एक राजस्थान से आते कृषक केन्द्रीय मंत्री भी उपस्थित थे. उनके विचार बड़े सुलझे लगे…..सुनने के बाद कुछ बातें दिमाग़ में आई, उसे कहना चाहता हूँ.

१. किसानों की एक बड़ी शिकायत थी कि वे अपने उत्पादन को दिल्ली के लोगों को सीधे बेंच नहीं सकते, दाम बिचौलियों तय करता है, फ़ायदा भी उसे ही होता है. पूरे अमरीका के हर शहरों में मैंने अच्छी तरह बने किसान बाज़ार (फ़ारमर्स मार्केट)देखे हैं. दिल्ली के सभी नगरों और विहारों में और साथ ही इसके चारों के शहरों में ये किसान बाज़ार क्यों नहीं बनाये जाते जहाँ किसान सीधे उपयोग करनेवाले लोगों को अपने खेतों या घरों में या से तैयार चीज़ें बेंच सके. हर गाँव के लोग सड़क से जुड़े हैं, बिजली उपलब्ध है , स्मार्ट फ़ोन से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं,पर फ़ायदा क्या अगर उनकी आमदनी वृद्धि न हो सके? कम से कम इन गाँव के लोगों का पलायन क्यों हो? इनके घरों में अतिरिक्त मूल्य संवर्धन के लिये छोटी छोटी मशीनें क्यों न लगाईं जायें? दिल्ली के गाँवों में पानी की कमी क्यों हो? पानी का संचयन क्यों न हो?

2. किसानों को उनके खेत के मालिकाना के हिसाब से किन फ़सलों से सबसे ज़्यादा लाभ हो सके और सबसे कम लागत लगे यह क्यों नहीं बताया जा सकता.जैसा मंत्री जी ने ठीक ही कहा भारत एक ऐसा देश है जहाँ दुनिया भर में उपयोग आनेवाली सब सब्ज़ियाँ, फल, और पौधे- फूल के या लकड़ी के लिये, लगाये जा सकते हैं.गांव से आये सभी प्रतिनिधियों के कपड़ों और बातों से वे गँवार नहीं लगे, वे सभी उपरोक्त को अपना, मिहनत कर अच्छी कमाई कर सकते हैं. पर टूटते परिवार और घटती ज़मीन से कमाई करने के लिये दक़ियानूसी धान, गेहूँ की खेती को लेकर तो कुछ नहीं होगा, पशुपालन और कृषि को एक तरह से ब्यवसाय रूप लेना होगा, यही भगवत् गीता के १८वें अध्याय के श्लोक संख्या ४४ में है,’कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं’.और हर सफल ब्यवसाय में, अत: खेती और पशुपालन में भी, हानि को कम करने के लिये और लाभ बढ़ाने के लिये उत्पादकता, गुणवत्ता बढ़ाने के लिये तकनीकी सहायता लेना होगा अच्छी आमदनी के लिये.

3. नये ईमानदार तरीक़े सोचने होंगे और मिहनत करनी होगी. केवल न्यूनत्तम समर्थन मूल्य बढ़ाना या क़र्ज़ा माफ़ करना सहज तरीक़ा तो है , पर देश में केवल यही एक धंधा नहीं है जहाँ लोग क़र्ज़ा लेते हैं, सभी क्षेत्रों में सरकार को देश को बढ़ाने के लिये पूजी लगानी पड़ती है, क़र्ज़े की ब्यवस्था करनी पड़ती है और यह उस अवस्था में जब देश का अधिकांश सम्पन्न वर्ग (करोड़ों की कमाईवाले किसान, डाक्टर,वक़ील, चार्टर्ड एकाउंटेंट, और पता नहीं कौन कौन, जब शिक्षक भी ब्यवसायिक बन करोड़ों कमा रहे हों) कर देना ही न चाहे कैसे सम्भव है.

4. किसान परिवार के कम से कम एक सदस्य खेती अच्छी जानकारी और उसका ब्यवसायिक ढंग सीखना होगा, इसके लिये सरकार को ब्यवस्था करनी होगी…. मोदी हों या राहुल कृषि की उन्नति के लिये किसी ब्यवसाय की तरह अच्छेजानकार प्रशिक्षित लोगों की ज़रूरत है. क़र्ज़ा माफ़ कर या सब्सिडी दे भोट जीतना सहज नहीं होगा, कितनों का क़र्ज़ माफ करेंगे,जब पूरी अर्थनीति क़र्ज़ पर चलती हो..क़र्ज़ को ठीक समय लौटाने की बात हमारे पूर्वजों ने कही है, मिहनत कर. उदाहरण है अपने अभिनेता अभिषेक बच्चन, नहीं तो पाप भोगना होगा…या क़र्ज़ की माफ़ी का मोहताज होना होगा या फिर सबसे कायराना हरकत पर उतरना होगा…अपने सीखना होगा उनको जो कृषि पर आश्रित हैं, इस सबसे अच्छे धंधे में रहना चाहते है.

5. हाँ एक बात और है सोचने की.अधिकांश ऐतिहासिक रूप से खेती करते परिवार अपनी ज़मीन को एक सालाना रेंट पर अन्य ग़रीब लोगों को खेती करने के लिये दे देते हैं, वे ग़रीब इतनी बड़ी रक़म रेंट में दे कैसे समृद्ध हो? किसको क़र्ज़ मिलना चाहिये या सब्सिडी -मालिक को या रेंट पर लेनेवाले को? कौन असली खेती आश्रित किसान कहलायेगा या कहलाना चाहिये. आज की खेती ट्रैक्टर, या हार्वेस्टर कंबाइन से होती बिशेषकर बड़ी पैमानेवाली फ़ैक्टरी तरह, पर दो फ़सली ज़मीनों में क्षेत्रफल के अनुसार बहुत कम काम रहता है पूरे साल, वे लोग कुछ और धंधा क्यों नहीं करते, उदाहरणरूप वीना योजना लोगों की या खेती की, कुछ घर में उत्पादन करवाने और शहरों में बेंचने की क्यों वहीं सोचते? हज़ारों तरीक़े साथ साथ मिल कमाने की, औरतों को सीरियल देखना या खाना बनाने से हटा उन्हें कुछ हुनर सीखा काम क्यों नहीं करवाते?……..

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विचारों के जंगल में-७

२७.१२.२०

आज लोक सभा की कार्रवाई देख रहा था, जी. एस. टी. पर चर्चा हो रही थी . एक के बाद एक सांसद केवल किन किन और बस्तुओं पर यह टैक्स कम कर देना चाहिये या हटा दिया जाये की अपनी राय दिये जा रहे थे. वे ऐसा कर रहे थे अपने वोटरों को बताने के लिये कि वे उनकी माँगों का कितना ख़्याल रखते हैं. पिछले तीन महीनों से बराबर टैक्स की वसूली में कमी हो रही है…..क्यों किसी का कोई सुझाव किसी बस्तु के टैक्स को बढ़ा टैक्स वसूली के बढ़ाने का नहीं आता. क्या सभी सांसद भी यही सोचते हैं कि सरकार के पास सब साधन है बिना टैक्स लगाये, बिना बैंकों से लिये क़र्ज़ की वसूली वापस के सरकार चल सकती है? शायद अधिकांश अर्थनीति का ‘अ’ भी नहीं जानते. हाँ, एक चीज़ वे ज़रूर जानते हैं…..लोकसभा की कार्रवाई मे नारे लगा ’बन्द करो, बन्द करो’, ‘नहीं चलेगा , नहीं चलेगा’, आज भी सुनाई दे रहा था.मोदी मामला कभी, अब हेगड़े को निकालो, या माफ़ी माँगे……टी. वी चैनेल उनकी चेहरे दिखाये, उनके नाम अख़बारों में छापे….उनको वोट देनेवाले समझें तो किसे उन्होंने चुना है….क्या बिरोध का कोई भद्र तरीक़ा नहीं हो सकता कि यह ट्रेड यूनियनवाला तरीक़ा ही अख़्तियार करते हैं……आप कोई उपाय बता सकते हैं? दिल्ली में हज़ारों या लाखों में ट्रेडर है अपनी दूकान के बाहर की ज़मीन दखल किये हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश उनको हटाने का है, पर सभी दिल्ली के राजनीति करनेवाले व्यवसायिओं के पक्ष में है…..हर व्यक्ति केवल वेईमानी या ग़ैरक़ानूनी ढंग से ही ज़िन्दगी की कमाई करना चाहता है, और समाज में उन्हीं का उच्च स्थान है…

१६.१२.२०१७

पता नहीं आप किस रामायण की बात करते हो…..एक को तो मर्यादा पुरोषत्तम रहने दो, यह चर्चा क्या देगा… अध्ययन करिये तुलसीदास दास के राम चरित को….हमें एक के रामायण से दूसरे रामायण को न मिक्स कीजिये…लोगों की आस्थाओं को बहस का मुद्दा मत बनाइये. बहुत सारी अन्य समस्याओं का हल कर आप सभी नाम कमा सकते हैं. मंजरी जी, राम-सीता , राधा- कृष्ण को छोड़िये, कुछ और कर नाम कमाइये, लोकप्रिय बनिये…..बहुत क्षेत्र हैं जहाँ आप अपने सकारात्मक सुझावों से समाज की सेवा , अपने नाम कमा सकते हैं, बहुतों ने किया है…

प्याज़ और टमाटर का दाम आसमान छू लिया है, सभी तकलीफ़ों के लिये मोदी या जो सरकार हो उसको ज़िम्मेवार बता लोग किनारा कस लेते है.ब्यवसायी बेईमानी जमाख़ोरी रोकेंगे नहीं . राज्य सरकारें कुछ करेंगी नहीं और किसानों के पक्ष में बोलती रहेंगी. कोई यह बतलायेगा कि टमाटर और प्याज़ किस राज्य के खेतों की मिट्टी में पैदा नहीं हो सकता. लोग केवल धान, गेहूँ की खेती क्यों करते हैं. जमीन वाले तो वे भी नहीं करते, केवल खेतों को लीज़ पर दे रूपये वसूल लेते हैं, कुछ तो बैंकों से क़र्ज़ ले सूदखोरी करते हैं. खेती कितनी वैज्ञानिक हो गई है, ब्यवसाय की तरह कर लोग लोग लाखों कमा रहे हैं, सब्जी, फल, फूल लगा. एक सज्जन बाँस की पौध लगा लाखों कमाते हैं. खेत के मालिकों के लड़के नौकरियाँ कर खेती की आमदनी को अतिरिक्त आय समझते है, खेती की उत्पादकता बढ़ाने और अच्छी कमाई करने का वे क्यों मिहनत करें. मेरी एक मेड हरदोई की जो घर में सफ़ाई का काम करती है, ने बताया कि पति के पास ३० बीघे ज़मीन है पर वह यहाँ गार्ड का काम करता है, पर बाप के कहने पर भी खेती में रूचि नहीं है. पुरानी सोच एवं कट्टर रूढीयां देश को आगे बढ़ने नहीं देती. आश्चर्य हैं पति पत्नी कोई पढ़े नहीं है, लड़के को भी नोयडा में पढ़ाने की प्राथमिकता नहीं समझते. राज्य सरकारों को इन मूलभूत कमियों और मानशिकता को दूर करने पर ध्यान देना चाहिये, न कि क़र्ज़ माफ़ करने पर. गाँव के स्कूलों में खेती सम्बन्धी बातों को या किसी हस्तकला को क्यों नहीं सिखाया जाये इतिहास , भूगोल पढ़ाने की जगह. हर राज्य अपनी खपत के अनुसार सभी ज़रूरी चीज़ों को पैदा करने पर ज़ोर दें तो महाराष्ट्र का प्याज़ या टमाटर क्यों इतने महँगे हों .

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कल शाम मोदी FICCI के एक समारोह में शिरकत किये और कुछ सवाल उठाये पिछले सरकार के बारे में और वैसे सवाल हर क्षेत्र के बारे में पिछली सरकारों से किया जा सकता है. आज शिक्षा संस्थान और स्वास्थ्य केन्द्र भी ब्यवसायिकता की चरमसीमा पर पहुँच भविष्य को अंधकारमय बना रहे हैं, इनसे नुकशान बैंकों के ग़लत तरीके से क़र्ज़ों को उद्योगपतियों को देने और बड़े उद्योगपतियों को छोटों के शोषण की तरह ही है जिसका मोदी ने ज़िक्र किया अपने भाषण में. कृपया इसे ज़रूर सुनें और सुनायें. बहुत सवाल हैं कोई सरकार या उसका प्रमुख विना सबके निरन्तर सहयोग के देश की दशा को पाँच साल में सुधार नहीं सकता. हर क्षेत्र में आज़ादी के बाद रूपये कमाने की जो एक होड़ लगी है, अमरीकी समाज की नक़ल करने की प्रवृति आई है, और आत्महत्या, घृणित वलात्कार, हत्या, आदि को बढ़ाती जा रही है वह क़ानून से नहीं सुधरेगी . हर पाँच साल बाद सरकार बदल जायेगी, नये नेता पैदा हो जायेंगे, अगर जीत गये ,वे अपनी मनमानी तरह से सरकार चला चले जायेंगे (अरविन्द केजरीवाल) और आज के बिरोधियों की तरह सरकार की हर क़दम का बिरोध करते रहेंगे , पाँच साल में भी जो हो सकताहै उसकी गति भी कम हो जायेगी. दस साल सरकार चलानेवाला तीन साल के सरकार से जबाब तलब करता रहेगा, आम ब्यक्ति तक सरकारी सुधार के लाभ को भी नहीं पहुँचने देगा……समस्या गंभीर है. क्या ऐसे ही चलता रहेगा….

१३.१२.२०१७: आज रामायण और गीता का अलख विदेशों में भारतीय मूल के लोगों के लिये चिन्मय मिशन और अन्य जगा रहे है, पर गाँवों जो प्रथा थी हर दरवाज़े पर रामायण को गवनई की तरह गाने की गाने की, ख़त्म हो गई टी वी के चलते, पाठ्यक्रम से भक्त कवियों के दोहे आदि हटा दिये गये सेक्ल्यूरिज्म के चलते, चरित्र निर्माण हो तो कैसे, किसी तरह ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना, अभक्ष्य खाना, आदि सर्व प्रमुख उद्देश्य या लक्ष्य हो गया जीवन का…..कहॉ पहुँचेंगे हम मालूम नहीं…

Centre offers Rs 2.5 lakh for every inter-caste marriage with a Dalit

५.१२.२०१७: मेरे साथ हिन्द मोटर्स में काम किये हुये दुबेजी एवं अन्य खडगपुर के एलमनी को मैंने राजनीतिक विषयों के बारे में बेकार बहस न करने की पहल की कुछ दिन पहले. कारण, इन अति निम्न श्रेणी की राजनीतिक दांवपेचों की बहस में कुछ फ़ायदा नहीं क्योंकि भोट देने वालों की राय को हम बदल नहीं सकते. सत्य यह है कि इस देश में भोट का व्यवसाय पेशा या रोग बहुत ही व्यापक रूप से फैल चुका है. गुजरात के चुनाव ने सब सीमायें तोड़ दी. प्रजातंत्र का यह भविष्य होगा सोच कर मन में तकलीफ़ होती है, सोशल मीडिया एवं समाचार पत्र , टेलिविज़न उसमें ब्यवसायिक लाभ के लिये और हवा दे रहे हैं. पर अगर हम कुछ करना चाहते हैं तो हमें अपने ज्ञान एवं अनुभव को बाँटना चाहिये, यह मेरी राय है. कुछ तकनीकी और सुधारत्मक सुझावों की हम इंजीनियरों से लोगों को अपेक्षा भी होगी. मैं हरदम से विना बहुत देरी निर्णय और नये रास्तों को खोजने का पक्षधर रहा और जो थोड़ा मौक़ा मिला किया…यही कारण है कि मोदी मुझे पसन्द हैं और राहुल नहीं. राहुल कमसेकम दस साल में संसद और सरकार के द्वारा बहुत कुछ कर सकते थे, कम से कम अपने संसदीय क्षेत्रों में, जो मॉडेल बनते दूसरे सांसदों के लिये, माँ से ज्यादा पढ़े लिखे हैं, पर आज भी वे कुछ नयी तरह से करने की पहल नहीं कर रहें हैं, राजनीति में भी. राहुल अगर कम से कम कांग्रेस को एक मज़बूत विपक्षी दल की तरह ला सकें तो बहुतों को, और मुझे भी ख़ुशी होगी. पर हम वंशवादी परम्परा से जनतंत्र को नहीं चला सकते. उदाहरण भी हैं लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, मायावती, बादल, जयललिता, यहाँ तक की ममता भी……यह राजीव गांधी के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिये था, पर नहीं हुआ कांग्रेस के बहुत परिपक्व नेता मन मशोश कर रह गये होंगे, पर किसी को कहने का साहस नहीं हुआ….मान लें अबतक तो चल गया…पर आगे तो बदलना चाहिये….अब बताइये राहुल के बाद कौन गद्दी संभांलेगा….ऐसी कांग्रेस की कल्पना न तिलक ने की होगी, न लाजपत राय, न सुभाष बोस, यहाँ तक नेहरूजी भी नहीं…देश की युवापीढी नये एवं परिपक्व नेतृत्व देने में अब तक अक्षम रही है…..पता नहीं आगे क्या होगा…हम अपने जीवन मूल्यों को सभी क्षेत्रों में इतनी तेज़ी से भूलते जा रहे हैं कि डर लगने लगा है……

किसी देश या संस्था का बिकास यात्रा हर सरकार के साथ चलते रहना चाहिये, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य , उद्योग में विश्वीय स्तर का बना जा सके. किसी पाँच साल के लिये चुनी नई सरकार के सुधार दूरगामी होने चाहिये. दुर्भाग्यवश दसको से जो नीतियाँ बनती बदलती गईं, वे देश या लोक हित नहीं रहीं. देश का एक बहुत ही अल्प संख्यकवरग बहुत आगे निकल गया पर एक बडा तुड़ा बुरी तरह पिछ गया. यही मान्यदंड होना चाहिये हर सरकार के कृतित्व को समझने का. और अगर ऐसा हुआ तो क्यों हुआ, क्यो तत्काल चुनाव जिताने या लुभानेवाले कार्यों पर अधिकत्तम व्यय हुआ.देश का मध्यम वर्ग, आम ग़रीब जनता, किसान, मज़दूर को लूटता ब्यवसायी वर्ग किसकी देन है इस आर्थनीतिक अवस्था, किसने स्वतंत्रता के बाद तीन साल पहले तक राज्य किया, क्यों नहीं इसका कुछ उपाय सोचा? क्यों लोगों को ब्यवसायों में काम करते लोगों को न्यूनतम मज़दूरी नहीं दी जाती, क्यों किसानों को निम्नत्तम मूल्य से भी कम पर अपनी तैयार ऊपज बेचनी पड़ती है, क्यों देश के स्कूल , कालेजों से शिक्षक निकल कोचिंग सेन्टरों में भागे चले जाते हैं और स्कूल , कालेज वीरान हो गये? किन्होंने सरकार से यह ज्ञान केन्द्र क्षेत्र अपने क़ब्ज़े में कर लिये और ब्यवसायिक धंधा बना दिया?

कल तक राहुल गांधी ‘जनेऊधारी हिन्दू’ बने थे, आज अपने और अपने परिवार को ‘शिवभक्त’ बताया और शायद कल अपने को बंशीबट के नाचनचैया भी कह दें राधा के कृष्ण के भक्त होना घोषित कर दें द्वारका में. हिन्दुस्तान की जनता मान भी ले शायद. कहते है हम धर्म की राजनीति नहीं करते, पर पहली बार ग्यारह या एकीस मन्दिरों का आशीर्वाद हित ही दौरा तो शादी के लिये नहीं थी, राहुल को तो ग्यारह, मस्जिदों और गिरजाघरों में भी जाना चाहिये. चुनाव के चक्कर में देश की अर्थनीति को चौपट कर रहे हैं कल किसानों के क़र्ज़ों की माफ़ी की घोषणा की है, अपने साठ साल के वायदों को भूल जाते है और गुजरात की समृद्धि के मॉडल को ग़लत बताते चलते है. अपनी दो चुनाव क्षेत्र में वैसा ही बदलाव क्यों नहीं ला सके जिसे अपने परिवार की बपौती समझते हैं .कल बन्द दरवाज़े के पीछे ब्यवसायियों से भी बात की हैं पता नहीं क्या क्या वायदे किये होंगे, क्या उल्टा सीधा कहा होगा. इन्हीं के कारण यू पी में मोदी को क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा करनी पड़ी. चस्का लगा है २००९ के चुनाव जीतने का जिसके पहले क़र्ज़ों के माफ़ी की घोषणा की गई थी और उस समय के तरीके में जब बैंक खाते में पैसे नहीं जाते थे, आधार नहीं था. किसके खाते में गये रूपये? क्यों ऐसे वायदों को सुप्रीम कोर्ट रोक नहीं लगाती जो देश हित नहीं है? राहुल गांधी नेहरू परिवार की सबसे अपरिपक्व ब्यक्ति हैं, और सोनिया जिसने प्रियंका को पीछे ढकेल दिया. क्या उम्मीद रख सकता है यह देश ऐसे युवराजों से? गुजरातियों का सब आत्मसम्मान मर गया है कि वे अपने प्रधानमंत्री की बात न मान एक ग़ैर की बात मानेंगे. सभी हवा मीडिया की है…..वेईमान ब्यवसायी वर्ग की है….देश के लोगों को असली लड़ाई उस वर्ग से करना होगा.

Rahul Gandhi today said he and his family members were ‘Shiv Bhakts’ (devotees of Lord ShivaBSE 0.00 %) but asserted that he did not want to use his religion for political gains

30.11.2017: (गुजरात में महाभारत छिड़ा हुआ है. लगता है देश केवल चुनाव के लिये ही स्वतंत्र हुआ. केन्द्र की सरकार पाँच साल के लिये चुनी गई. पर नयी सुधारों का बिरोध जन मानस को विकृत करने के लिये, एक के बाद एक चुनाव जिनमें महीनों मीडिया और नेता ब्यस्त रह, कहीं न कहीं जनहित कार्यों की गति पर तो असर पड़ा ही, बच्चों की पढ़ाई पर भी क्योंकि सभी शिक्षक और बहुत सारे जनसेवा के अधिकारी लगे रहे चुनावों के काम में.प्रधानमंत्री ने पुरज़ोर सिफ़ारिश की सभी चुनावों को हर पांचसाल में एक साथ करने की, कुछ बुद्धिजीवियों ने भी सुझाव दिया इसके लिये, बिरोधी दल एक साथ बैठ विचार विमर्श के लिये भी तैयार नहीं, देश राजनीतिक रंग में ऐसे रंगता जा रहा है कि कुछ दिनों में हम इसे छोड़ कुछ करेंगे ही नहीं, चुनाव सब आन्दोलनों से जुड़ते जा रहे हैं या तक कि देश हित के जी एस टी और आधार की तरह की चीज़ भी. धर्म उनसे जुड़ी संस्थाएँ, मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर भी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं. कल का समाचार तो और हास्यप्रद था. एक दल के शीर्ष नेता को किसी ने अपने को ग़ैर हिन्दू की श्रेणी में डाल सोम नाथ मन्दिर में प्रवेश करने का समाचार दिया, फिर उसी दल के प्रवक्ता ने उन्हें जनेऊधारी हिन्दू बताया, जब देश जानता है कि उनके पिता पारसी थे एवं उनकी माँ ईसाई हैं. कौन बताये कि वे हिन्दू हुये कि नहीं. अब हमारी तरह के बहुत लोग जनेऊ नहीं पहनते उन्हें जनेऊधारी हिन्दू बताने की क्या ज़रूरत आ पड़ी. क्या गुजराती जनता इतनी बेवक़ूफ़ है कि उन नेता की ११ या १११ मन्दिरों में जाने से प्रभावित हो उनके दल को भोट देगी और अपने प्रान्त में केन्द्र की बिरोधी सरकार बनायेगी. यह तो गुजरातियों का स्वर्णिम समय है. गुजरातियों को काम भी नहीं करना वे ब्यवसाय करना चाहते हैं, मोटी रक़म कमाना….देश देशान्तर तक यही उनका काम है…अमरीका के सभी मोटल पटेलों के, सभी डाक्टर पटेल, सभी भारतीय दुकानें पटेलों की…… http://indiatoday.intoday.in/story/rahul-gandhi-somnath-temple-row-congress-reaction/1/1099757.html Not only is Rahul Gandhi ji a Hindu, he is a ‘janeu dhari’ Hindu. Said, Surjewala, Congress spokesman )

१६ नवम्बर को रात गये राकेश आये . उनके अनुरोध के कारण मैंने यमुना को भी इस बात की सूचना नहीं दी थी. अब उम्र के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ सब की सब इच्छा बिना तर्क मान अपने को पाक साफ रखना चाहता हूँ. शायद यमुना को राकेश का सामने आ खड़ा होना आश्चर्यपूर्ण लगा होगा, और आकस्मिकता का आनन्द दिया होगा. सब कुछ तैयारियाँ बडी सावधानी से की गई, खाना भी ढीक ढाक ही मिल गया राकेश को. जितने समय साथ रहे, बहुत विषयों पर बातें की गीता से ले हिन्दी कविता की जो दोनों आज मेरा प्रिय विषय है समय के सदुपयोग का, मेघदूतम् पार्क में में मेरे साथ घूमने गये और मेरे दोस्तों से भी मिले अच्छा लगा. यह अच्छा है कि सभी अमरीका में रहनेवाले लड़के यहाँ आने अपना विशेष ख़्याल रखते हैं माँ की प्रेमपूर्ण आग्रह को विनमरता के साथ न मान कर . फिर भी राकेश बीमार पड़े पेट की ख़राबी से. यहाँ के डाक्टरों की बदनामी के क़िस्से अमरीका तक पहुँच चुके हैं और वे वहीं से तैयार हो आते हैं. पर हर मांबाप को कम से कम यहाँ के आम ब्यवहार में लाये जाने पानी से बचाना चाहिये और उन्हें अच्छे मिनरल बॉटल का पानी ही देना चाहिये. राकेश की सबसे अच्छी बात उनका अनुशासित जीवन पद्धति है, अल्पना के आदेशों का अनुकरण कर दो दिन में ढीक हो कार्य ब्यस्त हो गये. हम लोगों बच्चों की छोटी बीमारी से अब भी तनाव हो जाता है- बुढ़ापे की कमज़ोरी है , क्या किया जाये, स्वभाव बदलता नहीं, .आजभर हैं , कल के बाद अमरीका की ओर…..

२३.११.२०१७

१ देश के हर माँ बाप को यह शिक्षा लेना चाहिये कि बेटियों को उतनी ही सुबिधा और बढ़ावा मिलना चाहिये जितना लड़कों को…..और आज अगर बच्चों के दिमाग़ में यह बात बैठा दी जाये कि आज उनका भविष्य उनकी मिहनत है….वे सब कुछ कर सकते हैं जो धनी परिवार के लोग कर सकते हैं….पैसे की कमी के कारण कोई IIT, या IIM में नहीं पढ़ सके , अब नहीं हो सकता……मेरे घर दो महिला सहायक हैं यमुना की हरदोई से, एक अपने बेटी और बेटे पर तीन हज़ार प्लस ख़र्चा करती है हर माह….दूसरी जो साल से ऊपर काम कर रही है समझती ही नहीं पढ़ाई की ज़रूरत लाख समझाने पर भी, न बैंक में खाता खोलने की..बहुत कहने पर छोटी लड़की पढ़ाना शुरू किया ५०० रूपये महीना ख़र्चा कर, पर यहाँ भी तथा कथित शिक्षक कुछ पढ़ाते नहीं…. शिक्षकों की रूचि पढ़ाने में ख़त्म हो चुकी है… राज्य सरकारों का शिक्षा पर न्यूनतम ध्यान है क्योंकि इसकी कमियों पर आन्दोलन नहीं होते…. जितना संरक्षण के लिये या क़र्ज़ माफ़ करने के लिये होते हैं…हम यह कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ग़रीब अपढ़ माँ बाप बच्चों को वह कुछ वातावरण नहीं दे सकते जो धनी मॉबाप करा सकते है… पर अच्छे शिक्षक और अपढ़ मां बाप का थोड़ा सामान्य ध्यान यह स्थिति बदल सकता है…

(आज स्वाधीनता के करीब ७० साल बाद भी राष्ट्रीयता से ज्यादा धर्म एवं विशेषकर जाति प्रथा ज़हर घोल रही है विश्वीय शक्ति बनने के प्रयास में एक बहुत बडी बाधा, आज गुजरात में दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दल या अन्य दल जातियों समीकरण से चुनाव जीतने की गन्दी लड़ाई में लगे है. मन्दिर, मस्जिद, संरक्षण चुनाव का मुख्य मुद्दा बना हुआ है. जब राजस्थान के राजपूतों को एक हो विदेशियों के भारत पर हुये आक्रमण का बिरोध कर बचाना था तब वे एक नहीं हुये, एक काल्पनिक चरित्र के अफ़वाहों पर पूरे देश के राजपूत एक हैं. सोचने की बात है, गीता के समय से राजपूतों को ही स्वभाव व कर्म से लडाकू जाति मानी जाती थी, पर वे आपस में रोटी, बेटी की बातों को ले एक दूसरे के जान के दुश्मन बनते रहे और देखते देखते देश ग़ुलाम हो गया.जाट, पट्टीदार पटेल जो सम्पन्न जाति के है, अमरीका के सारे मोटल पटेलों के हैं और सभी ब्यवसायों में वे आगे हैं, अन्य पिछड़ी जाति की तरह संरक्षण माँग रहे है, उन्हीं सब की देखा देखी भूमिहार जो अपने को अयाचक बराहम्ण कहते हैं, ज़मीनों के मालिक हैं, सम्पन्न है वे भी संरक्षण का आन्दोलन कर अपने को पिछड़ा बताने में ब्यस्त हैं. क्या सरदार पटेल या सहजानन्द सरस्वती ज़िन्दा होते तो संरक्षण मांगते? क्या देश के बुद्धिजीवियों को एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुला, बिचार विमर्श कर, संरज्ञण कैसे ख़त्म किया जाये, की पहल नहीं करनी चाहिये? यह अदभुद् बात है कि देश की सर्वमान्य जीवन दर्शन देने वाली गीता के अनुसार सभी जातियों को आज मौक़ा है अपने स्वभाव और कर्म के अनुसार शिक्षा एवं हुनर सीख गीता में वर्णित चार वर्णों में किसी वर्ण का बनने का और राष्ट्रीय एकता की तरफ़ बढ़ने का. वैसे स्वभाविक तर हम अपने शरीर से सभी वर्णों का काम रोज़ करते हैं, ज़िन्दगी के कार्यकारी समय में सभी वर्णों का काम करते हैं. एक व्यक्ति जब काम प्रारम्भ करता है तो शायद सेवक रहता है पर हर पदोन्नति के साथ वह सर्वश्रेष्ठ वर्ण की ओर बढ़ते जाता है आज के औद्योगिक समाज में. भूलें जातियाँ, बने राष्ट्र सेवक….आज की पीढ़ी करेगी तो केवल देरी होगी, पर जाति प्रथा का ख़ात्मा तो होना ही है. ’जाति, धर्म है नहीं श्रेष्ठ अब, एक श्रेष्ठ राष्ट्र अभिमान’.

http://www.bbc.com/hindi/india-42080687

पुनश्चः गीता से उद्धृत-

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥

भावार्थ : हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ॥41॥ (कहीं जन्म आधारित वर्ण का ज़िक्र नहीं है)

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥

भावार्थ : अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ॥42॥

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥

भावार्थ : शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ॥43॥

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥

भावार्थ : खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम ‘सत्य व्यवहार’ है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ॥44॥(यह भी जाति पर नहीं आधारित हैं, अगर शिक्षा एवं हुनर के अभाव में वैश्य, क्षत्रिय, या वराहम्ण का काम हासिल नहीं कर सकते तो सेवा के कार्य से ही जीवन यापन प्रारम्भ करना होगा…….)

१५.११.२०१७: राजपूत करनी सेना का पद्मावती का बिरोध सुन पढ़ हँसने का मन करता है. कुछ लोग अपनी जातिय निष्ठा के बीमार सब तरह के हथकंडे अपना रहे हैं इस देश में अपना उल्लू सीधा करने के लिये. दुर्भाग्यवश , देश का प्रजातांत्रिक संविधान ऐसे सामूहिक बिरोध से हुये देश की एकता, सम्पति आदि के किसी सीमा तक की हानि पर कोई दंडबिधान नहीं किया है. साथ ही जब शान की लड़ाई के समय धनराशि अर्जन करने का समाचार आता है, जातीय श्रेष्ठता पर भी सवालिया निशान लग जाता है. पैसा कमाने के लिये ऐसे हथकंडें? कभी वे करनी सेना के सदस्य यह क्यों नहीं सोचते कि केवल राजपूताना के सभी राजपूत एक हो बिदेशी आक्रमणकारियों का सामना करते तो देश ग़ुलाम नहीं होता.कैसे यह सुदूर बिहार के चन्द्रगुप्त और अशोक सारे देश को अफ़ग़ानिस्तान तक एक कर सके, जब मौक़ा आया तो राजपूताना फिसड्डी निकल गया. आज किस बात पर यह अपने को श्रेष्ठ दिखाने की लड़ाई? मुहम्मद जायसी की एक क़लम से लिखी एक पंक्ति कुछ भी कर सकती थी उनकी इज़्ज़त का. जब इतनी बडी शहादत हुई उसके बारे में कोई राजस्थानी कुछ न लिखा…..बन्द करो यह बकवास टी.वी और मीडिया पर इन देशद्रोहियों को दिखा, आज तो कुछ करो राजस्थान की शान बढ़ाने के लिये….बंसाली, दीपिका को नुकशान पहुचांनेवाली संस्था या ब्यक्ति केवल नामर्द हो सकता है या रावण के बंश का…..

…भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के अभियान से हासिल हुईं उपलब्धियां क्रांतिकारी हैं, लेकिन देश के अंदर मौजूद भ्रष्ट तत्वों की सफाई अभी बाकी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई काफी गंभीर और जटिल है। इसमें वापसी का कोई रास्ता नहीं है, सिर्फ आक्रामकता के साथ आगे बढ़ना होगा। जाहिर है कि इसे कुछ देर के लिए भी रोका नहीं जा सकता। …..

१५.११.२०१७: कल से प्रदूषण बहुत कम हो रहा ह, विशेष कर सबेरे. मीठी मीठी ठंढ भी है हूड्डी लायक. पर मेघदूतम् पार्क में घूमनेवाले लोगों की संख्या एकदम गिर गई है. हमारी उमरवाले तो एकदम ग़ायब है. घूमने के रास्ते सुनसान हैं. यह मीडिया का कमाल है. बडी बडी चेतावनियाँ दे लेख छपे, डाक्टरों के साक्षात्कार और टी.वी. तो केवल यह समाचार ही देती है. शायद यह भी टी आर पी का धंधा हो. हमारी तरह के लोगों को सबेरे न निकलने पर बहुत कोफ़्त होती होगी. मुझे तो होती है क्योंकि पढ़ पढ़ कर थक जाता हूँ, क्योंकि पढ़ने भी मन माफ़िक़ चुनाव करना पड़ता है. मुझे पार्क आ एक बात की ख़ुशी होतों है कि सैफाबाद एवं होशियारपुर गाँव के बहुत बच्चे आते है अलग अलग दल में , दौड़ते हैं , वर्जिस करते है. कुछ बृद्ध भी गाँवों से बराबर आते हैं, उनसे कभी कभी बात कर अच्छा लगता है. वे तो पैदल आते हैं पर उनके बड़े बच्चे बडी बडी गाड़ियों में, सभी करोड़पति हो गये हैं नोयडा के बिस्तरा से. सभी ने बडी बडी चालों की लाइन के लाइन घर बना लिये बाहर आये मज़दूरों के लिये. लाखों में केवल भाड़े से कमाते हैं. हमारी एक महरी २५०० रू देती है, दूसरी ४००० रू हर माह. कोई टैक्स नहीं, पूर्व जन्म की कमाई लगती है….हाँ, मेघदूतम् पार्क इतना अच्छा होते हुये भी एफ ब्लॉक के शायद ही स्कूली बच्चे यहाँ आते हैं, अब तो खुले में जिमनाजियम का नया आकर्षण भी हो गया है….नई पीढ़ी ज़रूर अपने को नई तरह से स्वस्थ रहने और आगे बढ़ने के महँगे रास्ते ढूँढ ली होगी….

१४.११.२०१७: मैं बार बार सभी से कहता हूँ , लिखता हूँ कि कृषि को ब्यवसाय की तरह करना चाहिये. यही रास्ता है खेती से धन उपार्जित कर सम्पन्न, समृद्ध होने का. जिस तरह से खेतों की उत्पादकता बढ़ाई जा सके, नये तरीके, अच्छे बीज, सठीक ज़मीन के आवश्यकता के अनुसार खाद. सभी लागत में लाभ का भी हरदम ख़्याल रखना. आश्चर्य है कृषि, पशुपालन, ब्यवसाय को गीता में एक स्वभाविक गुण के ब्यक्तियों का पेशा बताया गया है, बैश्यों की. मुझे केवल यह कहना है यह स्वभाविक जाति से परे किसी भी ब्यक्ति में हो सकता है. पर मजबूरी से अगर पैतृक ज़मीन की खेती ही जीवन यापन के लिये करना है, तो उसे पूरी निष्ठा से करनी चाहिये. उसकी सभी बारिकियाँ को जानना समझना चाहिये, सबसे अच्छे तरीके से करना चाहिये, जिससे घाटा न हो, अधिक से अधिक लाभ हो. अच्छी खेती करने के लिये खेती आधुनिक ब्यवहृत तरीके का ज्ञान जरूरी है, अच्छे सफल खेतिहरों से , कृषि में पारंगत लोगों से सीखना होगा उन्हें गुरू मान, गुरू दक्षिणा दे अगर ज़रूरी हो.यह सदा ध्यान रखना होगा, और खेती को साइड बिज़नेस की तरह नहीं किया जा सकता. गीता की तरह सर्बमान्य ज्ञान की पुस्तक में यह है, यह है कर्म योग, अपने नियत या स्वाभाविक काम को पूजा की तरह करना और यही सहज रास्ता परमात्मा को सरल रूप में पाने का. मोदी किसानों की आमदनी दुगनी नहीं कर सकते, यह किसानों को ख़ुद करना पड़ेगा अपने अध्यव्यवसाय से. दो बातें कह सकता हूँ आज के बाज़ार मूल्य को देख जिसका मैं भी भुक्ति भोगी हूँ, हर साल में एक दो बार या ज्यादा टमाटर , प्याज़ का दाम आसमान चूमने लगता है, और उसका फ़ायदा कौन खाता? ब्यवसायिक समाज. क्या इसे किसानों के पास लाने का तरीक़ा नहीं निकल सकता? सरकार द्वारा नहीं, हमारे देश के आम किसानों द्वारा..

१३.११.२०१७ न इनका न इनके माताजी का धर्म हिन्दू है, राजीव गांधी केवल पारसी हो सकते हैं क्योंकि उनके पिता धर्म परिवर्तन कर हिन्दू धर्म अपनाये थे कि ख़बर मुझे नहीं, सोनिया गांधी के धर्म परिवर्तन की बात कहीं पढ़ी नहीं. फिर राहुल तो पारसी या ईसाई होंगे, अगर ये अपना धर्म परिवर्तन नहीं किये हैं हिन्दू में. यह शायद हिन्दू धर्म की उदारता है कि वे सभी धर्मवालों को पूजा करने का प्रबंध कर देते है . पता नहीं धर्म में यह मान्य है या राजनीतिक फ़ायदे के लिये पुजारी ऐसा करते है.

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Make in India : Issues of Defence Sector

29.11.2017

Strategic Partnership Policy and Make in India: Both policies have been initiated in India by Modi government for local production of high-tech defence machines such as artillery guns, FRCVs, helicopters, fighters, submarines, etc. In SPP, a foreign OEM(Original Equipment Manufacturer) will collaborate with one or two Indian manufacturers taking the responsibility of design and development. However, both foreign as well as local company will be selected by the defence ministry and defence forces, and SPP will be limited for delivery of a specific number of the defence machines, a small number to be delivered in ready to use condition and the rest of the contract to be assembled in India by Indian partner with assistance including the sourcing of critical parts from the foreign partner and the rest outsourced in India. Value addition and job creation will be naturally very limited. But most important aspect of SSP is that it is limited to just one model that would be designed and developed by the foreign partner. What happens after the completion of the first contract. What happens to the investment made by the local partner in the setting up the plant thereafter? It is next to impossible to absorb, assimilate the technologies involved for keeping the model upgraded and developed at contemporary level in one project period. Similarly, the local partner will have to keep the critical components imported. I wish the negotiation to be changed for the OEM to set up a full fledged plant with an Indian partner to set up a plant in India that serves as the regional plant of the OEM with an access and possibility to manufacture the newest models too with contemporary technologies where the local partners participate in R&D of new machines and the local partner keep on developing critical parts too locally if it can be done cost competitively. Alternatively, let the OEM set up its local plant independently and serve India as well as export market from India, if it finds that it will be more cost competitive to manufacture in India in long run. With the typical delays in decision making, SPP will be a long enough time taking exercise to meet the country’s requirements. With a number of big companies such as Tata, Mahindra, L&T, Bharat Forge, getting into defence production with manufacture of critical components, if incentivised they can also grow easily as aggregators of the machines too.

Recently, the defence cleared a mega project to acquire 111 helicopters worth Rs 21,738 crore for Navy, the first proposal under the strategic partnership model to get approval. As part of the proposal, 16 naval utility helicopters (NUHs) will be procured in a “fly away” state from the selected foreign original equipment manufacturer (OEM) and the remaining 95 will be made by the Indian strategic partner in India. Who can be the Indian partners. https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/government-clears-mega-project-to-acquire-111-helicopters-for-navy/articleshow/61365369.cms

Tata Advanced Systems Limited (TASL) and Bell Helicopter, a Textron Inc. company have an agreement to work together to develop both commercial and military rotary wing markets in India.

Mahindra Defence Systems Ltd have also signed a statement of intent with Airbus Helicopters of Europe to make military helicopters. The two firms had signed agreements to make helicopters in India, seeking to tap a military hardware market estimated to grow to $41 billion in seven years.As part of the plan, the two companies plan to set up a final assembly line in India, develop tier-1 and tier-2 suppliers and undertake extensive transfer of technology to achieve 50% indigenous content. Both the firms are already in business of supply of major critical parts of helicopters and fighters and are exporting to the world class quality level. Tata Group and Mahindra as on today appears to be one day the world class aggregators of helicopters and fighters, if the government wishes so. But who knows if the ministry and the defence forces will select them or prefer other new players such as Adani and Anil Ambani who have recently gone into agreements with the foreign OEMs.

21.11.2017

Tejas Story: The indigenously developed Light Combat Aircraft (LCA) Tejas has been inducted into the IAF in 2016. HAL has delivered only 5 of them by now. According to T Suvarna Raju, chairman and managing director of HAL, HAL has 20 IOC for Tejas, of which it will provide 11 to IAF by the end of this financial year. However, the FOC order will is expected to come by mid-2018. HAL has requested IAF to allow it to cut the material. It is necessary, as if HAL start now, the aircraft will come after three years i.e by 2020 . By 2020, the AON of 83 LCA is expected to be converted into a contract between the IAF and HAL. HAL has 20 IOC for Tejas, of which HAL will provide 11 to IAF by the end of this financial year. HAL will finish the supply of the 20 FOC by 2022. And only then it can go for the next 83. “We have kept things in place to produce eight and we are investing Rs 1,331 crore to increase the capacity to 16 deliverable a year,”said Chairman HAL Between the authorised number of Indian Air Force squadrons of fighters of 42, the available numbers of IAF squadrons are 31 at this time (gap of 11 squadrons that will increase only over time) to face the possibility of a war simultaneously at two fronts-Pakistan and China. Each squadron of the IAF has about18 aircrafts.

If Tejas is world class in performance and IAF agrees, why should it take so much time for IAF to order at least 6-10 squadrons at a time with continuously incremental addition of improvements integrating additional latest weaponry in fast moving era of technology upgradation. Why can’t an independent unit for Engines for fighters with full-fledged R&D come in HAL, as its engine constitutes a major percentage of the total cost. If India can develop its own cryogenic engines, why can’t it take up the task of developing engines, without which it will be difficult to attain the targeted production rates. I don’t agree with the Chairman HAL, when he added, “This is not like an automobile that today you give me a number and automatically I will give you the aircraft immediately. There is a lag, we require all the material to be procured and we need to make 10,000 odd components and put them together, and some components need to be bought from outside.” An Automobile of world class is not that easy to produce. But if there is an efficient managerial and technical talent, it is possible. Examples are Tata Motors, M&M, Eicher Enfield that could not happen with HM and PAL. Interestingly, last year 36 multirole combat aircraft (MMRCA)Rafale fighters from French company, Dassault were purchased at Rs 58,000 crore. If IAF is fine with order of 2 squadrons with Dassault, why can’t it order a quantity reasonable enough for manufacturing ease? I strongly believe that just like Chief Economic Advisor in Finance Ministry, the government must appoint Chief Defence Advisor who can advise the defence minister or PM with the best alternatives.

http://indianexpress.com/article/business/interview-with-hal-cmd-no-frozen-standard-of-preparation-of-lca-thats-where-delays-are-coming-4944113/ )

Tejas and beyond: How short the IAF is of fighters, what options it has now

Comment -“Govt. has not helped private company to get into manufacturing that it claims- Mahindra can already build small plain for short routes. Tata-Airbus collaborated to replace Army Avros. But Govt did not decision till now. However, if HAL would have a private company and wished to be become globally competitive, it would invested on manufacturing technologies, latest machine tools, jigs and fixtures to attain commercial viable aircrafts. India does not lack talent. It requires its right deployment. How would have all major manufacturing companies of the world and those of other sectors would set up their R&D and development centres in India. Moreover, the war that we are talking about will be fought differently with other than traditional strategies and methods. Those in decision making must have on the job.”

India Express has a report in November 21 issue: “The five LCA Tejas supplied to the IAF by Hindustan Aeronautics Ltd (HAL), Bengaluru, are part of a contract for 40 aircraft, 20 in Initial Operational Clearance (IOC) configuration, and 20 in the Final Operational Clearance (FOC) configuration. But the FOC for LCA Tejas is yet to be attained; production is a long way away. The Air Force is also committed to buying another 83 LCA Tejas, for which a Rs 50,000 crore contract is likely to be signed soon. These fighters will be the improved Mark-1A version, which is still in the design stage….

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