कितने श्लोकों में आप समझना चाहते हैं गीता का पूर्ण सार एवं पाना चाहते हैं उसके लाभ?

कितने श्लोकों में आप समझना चाहते हैं गीता का पूर्ण सार एवं पाना चाहते हैं उसके लाभ?
भगवद्गीता भारत की एक अनमोल धरोहर है जिसका दुनिया के सभी मुख्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और वहाँ के विद्वान इसकी देश की नई पीढ़ियों को अच्छे नागरिक जीवन की नींव डालने के लिये ज़रूरी समझने लगे हैं। पर भारत में आम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिये कुछ ख़ास काम नहीं हुआ और बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। कर्मयोग, भक्ति योग, ज्ञान योग तो गीता के विषय हैं ही, पर साथ में गीता में स्थितप्रज्ञ, ज्ञानी, योगी, ज्ञानी, गुणातीत, दैवी सम्पदा युक्त व्यक्तियों के लक्षणों का भी वर्णन भी है जिसमें दिये आचरणों की तालिका को अपने जीवन मूल्य बनाकर भी हम सभी आम लोगों को ब्रह्म तक को प्राप्त कर सकने की चेष्टा की जा सकती है। यह सरल भाव से बताया गया है। पर शायद जीवन में ठीक समय पर इसकी चेष्टा न करने पर यह दुस्तर से दुस्तर होता जाता है। गीता पर हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में बहुत अच्छी व्याख्यायें आ गई हैं। उनमें एक तो ज़रूर हर हिन्दू के घर में होना चाहिये और उसका पाठ और उस पर चर्चा भी होना चाहिये सभी परिवार के लोगों द्वारा साथ बैठ २०-३० मिनट के लिये ही सही नित्य दिन।

मूल भगवद्गीता में कुल ७०० या ७०१* श्लोक १८ अध्यायों में हैं। इतने श्लोक आम व्यक्ति के लिये याद करना बहुत मुश्किल है। अत: समय समय पर इसका समाधान देश के कुछ भगवद्गीता के प्रसिद्ध पंडितों द्वारा सुझाया गया है। रमन महर्षि और स्वामी शिवानन्द ने अलग अलग केवल एक ही उस श्लोक को बताये जिसे उन्होंने समस्त गीता का सार कहा।
रमन महर्षि ने श्लोक १०.२० को वह दर्जा दिया-
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०.२०॥

स्वामी शिवानन्द ने गीता के आख़िरी श्लोक १८.७८ को:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८.७८॥

स्वामी शिवानन्द ने फिर सप्तश्लोकी गीता बता उसे पूरे गीता का सार कहा। यह उन्होंने अपनी गीता की व्याख्या की पुस्तक में दिया है। इन्हें छोड़ गीता प्रेस के श्रोत्र रत्नावली में भी एक सप्तश्लोकी गीता दी गई है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक दस श्लोकीय गीता बनाया है। http://brahmanisone.blogspot.com/search/label/Collections%20of%20Gita%20Verses
महर्षि रमन ने बाद में अपने शिष्यों के कहने पर एक दूसरा चयन किया जिसमें उन्होंने ४२ श्लोकों का संचयन किया जो पूरे गीता के सार की तरह है।यह इंटरनेट पर हैं।http://brahmanisone.blogspot.com/2008/12/selected-verses-from-gita-by-ramana.html


फिर एक ऐसा ही प्रयास कृष्णकृपामूर्ति श्री ए. एसी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के शिष्यों ने उनकी लिखित ‘श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप’के आधार पर पूरे गीता से १०८ श्लोकों का चयन कर किया है। वह भी इंटरनेट पर है-https://prabhupadagita.com/category/108-important-bhagavad-gita-slokas/


पर ये सभी महानुभाव बहुत पहुँचे हुए ज्ञानी थे। मैंने गीता का कोविद के क़रीब तीन वर्षों में पूरा समय अध्ययन किया और यह क्रम अभी भी चल रहा है- नित्य पठन, मनन, चिन्तन द्वारा, अपनी उम्र की कठिनाइयों के बावजूद।


और मैं समझता हूँ कि कुछ ज़रूरी श्लोकों को गीता ज्ञानियों से उतना महत्व नहीं मिला, जितना आज की सामाजिक अवस्था को देखते हुए ज़रूरी हैं और वे उन श्लोकों को लोगों तक ले नहीं गये, क्योंकि कुछ ख़ास वर्गों को उससे नुक़सान होता हुआ दिखा और इसी लिये छोड़ दिये गये। उदाहरण के लिये कृष्ण का अध्याय ९ का २९-३२ श्लोक हैं- श्लोकों को शामिल करने से बहुत सारे प्रचलित दुर्भाव आज समाज से ख़त्म हो जायेगा। जिसे आज की नये पीढ़ी के लोगों को जानना चाहिये और साथ ही अज्ञानी पंडितों की व्याख्याओं को ग़लत कर देगा। उनमें दो श्लोक हैं-कृष्ण कहते हैं-
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥९.३०॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९.३२॥
कितना क्रान्तिकारी संदेश है। हम क्यों वर्ग के कुछ लोगों छोटा समझते हैं, उनसे दुर्व्यवहार करते हैं। यह न करने का उपदेश तो हज़ारों साल पहले उपनिषदों के ऋषियों ने दिया था।
गीता में सभी कर्मों में यज्ञ, दान, तप को कर्त्तव्य कर्म कहा गया है और उनकी सठीक परिभाषा भी बताया है जिसके बारे में शायद ही हिन्दू समाज में कोई सम्यक् समझ है लोगों में और आजतक के आम लोगों के सम्पर्क में आनेवाले तथा कथित पंडितों में।
पंडितों ने सभी धार्मिक पुस्तकों को निहित स्वार्थ के कारण संस्कृत में ही बने रहने दिया और मान्यता दी और मातृभाषा में न लिखे गये और न उन्हें मान्यता मिली। यहाँ तक की कर्मकांड सम्बन्धी पुस्तिकाओं के बारे में भी यही सत्य है और तथाकथित करोड़ों पंडितों के जीविका का आधार कर्मकांड सम्बन्धी पूजा करवाना हो गया है।आज शहरों में इन पंडितों की खासी अच्छी कमाई है, यद्यपि इन पंडितों को संस्कृत का कोई ज्ञान नहीं हो। शायद ही उनमें कुछ उपनिषद् एवं गीता के दो चार श्लोक और सही अर्थ जानते हों। गाँवों की ही हालत तो और ख़राब है। देश में विशेष कर हिन्दी प्रदेशों में इसमें एक बड़ा सुधार बहुत ज़रूरी है, अगर सही हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति बचानी है जिस पर हम गर्व करते हैं, पर जानने समझने कोई कोशिश नहीं करते। हर धार्मिक अनुष्ठान के लिये लिये पंडित खोजे जाते हैं और उनकी फ़ीस आज के डाक्टरों और अध्यापकों की तरह मनमाने भाव से बढ़ते जा रहे है। हिन्दूओं को इस सम्बन्ध में समझ की एवं सुधार की ज़रूरत है। पहले तो जो किये जा रहे हैं वे कितने धर्म की ठीक व्याख्या करते हैं फिर क्या हमारे हिन्दू ज्ञानियों इन्हीं कर्मकांड करने की व्यवस्था बताई थी।


आज मैं भगवद्गीता की चर्चा कर रहा हूँ और मेरे एक संकलन के बारे में बता रहा हूँ। यह संकलन भगवद्गीता के १५० मेरे मनपसन्द श्लोकों का ही है, पर जिसे पढ़ने में केवल बीस मिनट लगते हैं, श्लोक सभी अध्यायों से हैं, और गीता का पूरा सार बता देते हैं। अगर इस सम्बन्ध में किसी का कोई प्रश्न या सुझाव है तो कृपया सम्पर्क करे irsharma@gmail.com हिन्दी या इंग्लिश में।

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Background To My Selection of Favourite Slokas of Hindu Scriptures

Background To My Selection of Favourite Slokas of Hindu Scriptures

My interest in memorising verses from religious books started during my early school days in my native village. My grandfather was a teacher at Birlapur, near Calcutta in Bangal, which is now West Bengal after partition in 1947. He had been living alone there with one of my uncles. Once when he came during some vacation, he invited Shri Gangadyal Pandey, recently appointed government teacher of the village primary school to live with our family and be our tutor. Tulsidas’ Ramcharitmanas and another equally popular book those days, ‘Radheshyam Ramayan’ were available with us at home. We started reading and memorising some popular verses from them for the competition of the Antakshari, that Pandeyji would organise quite often with groups of school students. Interestingly, Radheshyam Ramayan was a handwritten one. My grandfather and some of his students had copied it in their own hand-writing . I wonder even now how difficult it would have been for them to complete such a huge book. My grandfather had told me once on my query that he did it to improve his own handwriting. I have a few pages of it even now with me. It was in very readable simple Hindi unlike the regional dialect Awadhi used by Tulsidas. I do not know if it is today available as printed book.

However, even in those days I got advice through a few Sanskrit slokas too. Our teachers and other elders used to quote them very frequently. I remember two:
1
काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥
‘A student should be alert like a crow, have concentration like that of a crane and sleep like that of a dog that wakes up even at slightest of the noise. The student should eat too much. Also he should stay away from daily household affairs.’
2
As I remember, the other sloka started with ‘विद्यां ददाति विनयं’..विनयाद् याति पात्रताम्।..’ ‘Knowledge gives us humility, with humility comes merit.’ I do not know if the parents these days will vouch for that method for improving the conduct of their school going children.

In 1950, both myself and my uncle moved to Birlapur and got admitted into Birlapur Vidyalaya straight in class six and started regular education. My grandmother this time was with us. In those days, Sanskrit was a subject for the high school final examination. We had to study it for four years from class 7. I could hardly love it enough to pursue it after the school days to appreciate its richness. The ‘pandit-mosay’ teaching was too harsh on us. That might be the reason for my lost love. But I spent most of my student life till I became a qualified engineer with my grandfather. He kept on mending and motivating me with help of the verses of English and Sanskrit. Let me quote one English one first-“Early to bed and early to rise; That makes a man healthy, wealthy and wise.” He would also recite the famous shloka from Bhagwad Gita, “या निशा सर्वभूतानामं, तस्या जागर्ति संयमी”… (2.69) quite often and explain. Early sleeping and getting up got built into my lifestyle and still continues at 82+. All that I have studied or written, some available on my site or published, was done in early morning hours between 3 AM and dawn.

I vividly remember one day of 1957. I was appearing for my final examination of Intermediate Science from Presidency College, Calcutta. It was the day when I was very much confused and morose during the break time between the examination scheduled in two sessions. The first paper of Chemistry in the first half of the day was very tough. Many of my friends in Eden Hostel had decided to drop. In that break time, suddenly I found my grandfather entering my hostel room. He heard quietly my worry and then his advice came promptly this time too in a Gita sloka ,“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा भलेषु कदाचन..(2.47). I appeared and succeeded with pretty good scores. Interestingly in IIT, Kharagpur, the Institute’s logo was ‘योग: कर्मसु कौशलम्’. My grandfather had only explained its source (the famous sloka of Bhagavad Gita, (2.50) in one of his regular visits to Kharagpur. I ponder now why someone out of the Institute’s faculties could not have done that in a pretty elaborate manner in the initial academic programme of orientation talks for the benefits of the fresh students. Perhaps, they did not find that necessary. All those good advice of the early years made me succeed in everything I pursued in my life till date and to overcome many hurdles in life.

I started my career at Hindustan Motors in 1961. I became engrossed in worldly means of enjoyment with friends and got totally distanced from our religious duties. Only the teachings of childhood helped me to dedicate myself to hard work and be successful in a professional career. In 1966, Yamuna, my wife, joined me at Hindustan Motors residential complex. I gradually returned to our religious practices, such as pujas, ‘vratas’, celebrations of festivals etc. at home. Over the years, we got three sons (hoping the third one to be a girl child, however that was not to happen). I had to be an example for my children and cousin brothers too. And one day, after a gala night function on occasion of a new year’s eve at HM club, I vowed to drop drinking and resort to vegetarian foods forever and that I have followed strictly till today.

I don’t remember exactly when I started regular morning puja before going to my work. I started with the reading of some portions of the Ramcharitmanas without fail in Yamuna’s puja room. This interest grew with time. I had seen my grandfather completing Ramcharitamanas every month (Masaparayana) and then even in nine days (Navaparayana) in two Navratri festival times in the year. By 1990, I also started doing that. And this interest grew more intensively over the years. I did carry on with that under all odd conditions. It continued even while travelling in the country or abroad too. Sometimes, I had to get up very early in the morning for that. That practice had become a routine part of my life at that time at Hindustan Motors till I shifted to live in our house in Salt Lake that was built.

In 1997, I retired from Hindustan Motors under the newly started rule of the then new young Chairman. I completed 37 years in Hindustan Motors, Uttarpara. Thereafter, I joined Harig Crankshaft as President. In late December 1999, I had a heart attack in the factory and had to undergo open-heart surgery at Escort Hospital, New Delhi in early 2000. Every routine got disturbed. After a month, I started going to work. However in October 2000, I found I was the same person working for 12-16 hours a day in HM. I decided to take full retirement from professional work yielding to my conscience that was welcomely consented by my children. I completed my last technical book, ‘Latest Trends in Machining’ available on http://www.drishtikona.com. I started giving more time for morning puja. After that, I focused more on long and regular morning walk and reading good latest books on current subjects, mainly on ancient Indian history and current topics, and biographies. We visited many places of tourist importance in India. But the puja continued with praying as the first thing after getting up in morning, followed by the reading of full ‘Sundarkand’ of Ramcharitmanas after the morning bath every day without fail.

On 24th April 2000, I came across, ‘The Curative Powers of the Holy Gita’- a book with about 33 Slokas of Bhagawad Gita compiled by one T. R. Seshadri* and bought it. Soon I started reading its all slokas in the early morning puja. The love story of Gita had started. Very soon, I added the whole passage on स्थिप्रज्ञता from chapter 2 of Gita and then some Slokas of Upanishads. All those were in a booklet published by the Gandhi’ ashram in my morning puja that I had for long time. Over a period, I memorised them.

All the three sons had got well-settled in the US. I saw my life is slowly inching towards the ‘van-prastha’ stage unknowingly that our ancient sages suggested.

COVID-Era brought a big change in living style

With the onslaught of the Covid-19 pandemic in early 2000 and its total lock out thereafter, when we got almost imprisoned in our apartment. I switched over to a serious study of Bhagwad Gita and thereafter major Upanishads. Over a period, I procured the commentaries of Gita and Upanishads authored by a number of reputed wisemen. (#)
Every day in the early morning, I spent hours on studying all the commentaries one by one and revisiting them again and again. I kept on noting down some good slokas of my liking in my yellow notebook and memorising them in day time. With my advanced age, isolation and perhaps maturity, I started appreciating the knowledge provided in them more and more. I enjoyed every bit of it as it threw some new light almost every time I picked up one of those slokas again. The culture of deep understanding of the issues imbibed during my hard work in different fields requiring different technical knowledge and it’s experiences helped me here too. The content of these scriptures became easier and I felt sometimes overjoyed when I looked back at my work life issues and even domestic issues. I can say honestly, many times only some divine solutions come in our mind and help in getting our worldly problems solved. It has happened many times with me.

My motivation behind this compilation of Best Slokas of Bhagavad Gita

As I went on studying different books, and commentaries on Gita, I came to know that few such attempts have already been made by some of our great wisemen in modern India.

  1. Bhagavan Ramana Maharshi (Born: 30 December 1879, Died: 14 April 1950.)
    A visiting Pandit (wise man) once requested Bhagavan Ramana Maharshi to select the best slokas of Bhagavad, as the Gita as such contains a total of 700 slokas. That becomes very difficult if not impossible to keep in mind for a normal person. The selected ones must be just enough in number to remember and understand the message of the whole of Bhagavad Gita. Bhagavan Raman thereupon first mentioned only verse 20 of Chapter X verse saying it is one sloka that provides the essence of Bhagavad Gita.
    अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
    अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
    हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥
    ‘I am the Self, Oh Gudakesa (Arjun), dwelling in the Heart of every being; I am the beginning and the middle and also the end of all beings.’
    Later on, Maharshi Ramana also selected forty-two verses that represented the whole of Gita that provides its essence and can easily be remembered by the interested ones. (http://brahmanisone.blogspot.com/2008/12/selected-verses-from-gita-by-ramana.html )
  2. Swami Sivanand (8 September 1887 – 14 July 1963)
    Swami Sivanand of The Divine Society has advocated another one such sloka in his commentary on Bhagavad Gita and called it एकश्लोकीय गीता. That is the last sloka 18.78 of Bhagavad Gita, with which Sanjaya concludes Gita.
    यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
    हे राजन! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है.
    Wherever is Krishna, the Lord of Yoga, wherever is Partha, the archer, there are prosperity, victory, happiness and sound policy; this is my conviction.
    Swami Sivananda has also selected seven Slokas that contain the essence of the whole Gita and called it सप्तश्लोकी गीता with 7 Slokas (8-13,11-36,13-13,8-9,15-1,15-15,9-34).
    There are more सप्तश्लोकी गीता recommended by wise men. Swami Dayanand Saraswati has selected ten most representative best Slokas of Gita. http://brahmanisone.blogspot.com/search/label/Collections%20of%20Gita%20Verses
  3. Swami Vivekanand (12 January 1863— 4 July 1902)
    Vivekananda in ‘The Mission of Vedanta’ writes, “ …Aye, if there is anything in the Gita that I like most, is in these two verses, (XIII 27, 28) coming out strong as the very gist, the very essence, of Krishna’s teaching:
    समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्
    विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥13.27॥
    He who sees the supreme Lord dwelling in all beings, the Imperishable in things that perish, he sees indeed.
    समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
    न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥13.28॥
    For seeing the Lord as the same, everywhere present, he does not destroy the Self by the self, and thus he goes to the highest goal.”
  4. Swami Prabhupada, Founder of ISKON (1 September 1896-14 November 1977) A group of his learned disciples have published a collection of 108 best Slokas of Gita based on his commentary on Bhagavad Gita, published in 1972. One of my contemporary and engineer friend N S Ramakrishnan uses these for online management training tools.
    https://prabhupadagita.com/category/108-important-bhagavad-gita-slokas/

My own attempt to select ‘My Best of Bhagavad Gita’ slokas.

Over the years, I have picked up about 250 Slokas of Bhagavad Gita now judging from my own experiential views. I have identified 150 Slokas of them (in dark italics with font size 16 in the collection) as an appropriate one that one can memorise easily if there is a strong will. I have memorised them and many more from the bigger collection as on today. If now at 82+, I have been able to memorise more than 250 including Upanishads in two years of lock out of COVID- pandemic, it should be possible for the interested persons to do it.

Very soon I lost my madness about the writings on political, social economic issues, reading newspapers, and wasting time on tv with useless serials. I also stopped watching news channels and hearing the fake news and useless debates through howling at each other by so-called representatives of the common people. Earlier I thought my writings on Facebook and blogs bring changes among highly politicised friends and acquaintances for having a society with its clear identity. I was just totally mistaken. Today the world has changed.Even for getting something published, you need a lot of contacts and different skills. I never had it.

The collection on my website should also help in understanding the universal messages of Upanishads and Bhagavad Gita without any price.

Another idea was to improve on my own spiritual strength and to train myself to work without a desire for any fruit, giving up as much as I can.

I still think as the devotee chants a name or a mantra, the repetition of the Slokas of Upanishads and Bhagavad Gita again may correct mine and others’ conduct and help in becoming good human beings.

I repeat the memorised Slokas as many times as I get the opportunity. I keep my mind busy while walking alone through repeating these Slokas. It gives me great personal satisfaction and happiness because of a hope that I shall succeed in the remaining years of my physical existence in this body form to be a better man, if not enlightened in this life.

After Gita I decided to include some slokas from the major four Upanishads- Isha, Kena, Katha, and Manduka in my favourite list of slokas in the yellow notebook.

My inspirations in selecting favourite slokas of Upanishads

Some great persons of the nineteenth and twentieth centuries, whom we all know and highly respect, have often quoted some from Upanishads, as they truly represent the pinnacle of Hindu spiritual philosophy.

Vivekanand’s love for the following verse from Katha Upanishad is well known:
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।१.३.१४॥

Mahatma Gandhi’s view on the first sloka of Ishopanishad was eye-opener for me. I am giving that one for Mahatma Gandhi wrote:
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥1॥
“During the last few months (I have studied the Ishopanishad), and I have now come to the final conclusion that if all the Upanishads and all other scriptures would have been suddenly destroyed for some reason and if only the first verse of the Ishopanishad would have been in the memory of Hindus Even if this first Sloka was in the memories of some Hindus, Hinduism would have lived forever.”(“पिछले कुछ महीनों के दौरान (मैंने ईशोपनिषद् का अध्ययन) किया है, और मैं अब अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यदि सभी उपनिषद और अन्य सभी धर्मग्रंथ अचानक से किसी कारण से नष्ट हो गए होते और यदि ईशोपनिषद का केवल पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति में ज़िन्दा रहता, तब भी हिंदू धर्म हमेशा जीवित रहता।”)
Eknath Easwaran in his book, ‘The Upanishad’ has written, “ What Gandhi had in mind with his great tribute, he made clear in his reply to a journalist who wanted the secret of his life in three words: “Renounce and enjoy!” (tena tyaktena bhunjitah) from the same first verse.
(अमरीका में गीता, उपनिषद् आदि के विद्वान प्रोफ़ेसर भारतीय मूल के एकनाथ एश्वरन गांधी के उपरोक्त विचार के बारे में अपनी पुस्तक ‘Upanishads’ में लिखा है-“गांधी ने अपने पहले श्लोक के विचार को और स्पष्ट किया था एक पत्रकार के अपने पहले के प्रकट किये विचार संम्बन्धी सवाल के जवाब में. पत्रकार को जो उनके जीवन के रहस्य को तीन शब्दों में जानना चाहता था, गांधी ने जवाब दिया- “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” मेरे जीवन का रहस्य है जो ईशोपनिषद् के पहले श्लोक का अंश है।”)

The great creators of the constitution of India included a great phrase from Mandukopanishad:
सत्यमेव जयते नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत्‌ सत्यस्य परमं निधानम्‌ ॥३.१.६॥
My own preference go for one another sloka rom Ishopanishad:
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥7॥
Upanishads though may appear different, but the main goal of the sages of the Upanishads was one. They all tell about how to realise the Self or Brahman, the Ultimate Reality in their own way.

These days I read my yellow note-book that has about 300 Slokas of Bhagavad Gita, Upanishads and some portions of Ramcharitmanas. After bath, I get back to the puja room and read the full Sunderkand before lunch. And in the evening I read with my wife Chapter 15 of Bhagavad Gita before our dinner. She blows a conch-shell at the end.
An essential note for readers
I tried to limit or exclude those slokas specifically giving the nature of persons with lower state of mind such as aasuri or tamasik, rajasik because of the actions in previous lives or because of getting into the bad company of people of lower nature in the early part of life or in the absence of a proper example or guide. The ultimate objective of Gita propounded is that any person though he may have a tamasik nature initially, must try to improve himself to rajsik and then to sattavik. In the same way, in varnas, the objective was to improve upon from the Surda to vaishya, then to kshatriya and then Brahmin.

However, for realising the the Ultimate Reality, Atman, Purushottam or Brahman used as synonyms in Upanishads and Gita as well one must go beyond sattvik level too and to become गुणातीत, ‘gunateeta’. Bhagavad Gita has given in great detail the shortcomings of Rajshik , Tamasik, and Aasuri nature in Chapter 14 , 16 and 18 . Anyone interested in knowing about them, can always go back to the Gita with original Slokas in Sanskrit and varying commentaries in all languages by many wise men. I have also included a few slokas giving Krishna views about the class of persons whom the pundits guiding the society over years had abandoned them totally. Refer to the slokas 9.29- 32 such as:
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌ ॥९.३२॥
These Hindu scriptures were and are for every human being of any caste, faith and country. Any can go through it freely, practise it and get benefitted.

  1. To give a total glimpse of the Hindu Ancient Scriptures I added just a few Slokas from Vedas. With these additions, I hope my collections will be more comprehensive.

I hope this compilation will be useful for my children and their friends in the US, who left this country much before they would have come to know about these scriptures and it’s basic philosophy. Even in India, over the years, the newer generations get educated in English media copying the western system and giving value to their norms. I am sure people will gradually get interested in studying the basics of spiritual knowledge too along with secular knowledge. Particularly after a particular time in life, as we age we start losing our interest in what we had been doing and need guidance or knowledge about something more than the secular knowledge that we keep on gaining over years in life. Life is more than enjoying life in getting wealth required for satisfying our sensual needs or in the preservation of wealth for the future generation. It has happened to me. Today I realise over time that I have wasted energy and money in collecting and their preservation for these worldly things in our life. But the end, though may be a very painful one sometimes, is unavoidable. All your favourite procured and preserved things with so much pain will be sold to kabadi only. When I look at my huge collections of books at different stages of life or the almirahs and boxes full of clothes and other items, mostly of my wife or by her, I feel really shocked and sad to think of its value now. I hope this collection will serve as an initiation in spiritual knowledge for everyone of all ages, and provide help to understand the need of simple life with minimal essential things. Unfortunately, till you are two, the wishes of one may not come true.
However before I end this introduction, I shall like to emphasise that those verses that are not part of this collection, may be equally important for some. I appeal to every serious interested person to do one customised collection like this one for himself and to leave it back as a legacy. Every Indian must keep a Bhagwad Gita and an Ishopanishad or Kathopanishad in their home library with commentaries in the language one is most comfortable with.

One understands, gets benefited, and enjoys Bhagwad Gita more if he treats himself as Arjuna and Shri Krishna as Self. I have tried and found its benefits. It will certainly help us in attaining integration of our personality- of the body, intellect, and soul or Self, and be a good person certainly by getting over some of our weaknesses such as greed, anger, desire, etc. and start respecting fellow beings over the years of the beginning of the reading and understanding it maturely. I wish I could have started seriously to go through the scriptures much earlier in my life.

I intend to keep some blank pages at the end of each main section of this collection so that the readers can replace and add some other verses too. I shall always like to get a comment on my email: irsharma@gmail.com . Please do send.

*I came to know only February 2022 from a letter from Shri T S R Murthy, my close friend at Hindustan Motors and neighbour to Dr.T. R. Seshadri was his brother, had graduated from IIT, Kharagpur in 1958, and held many top positions in government organisations, and also wrote two books on engineering and beside the book I referred to, he also authored ‘Hinduism Revisited’ and passed away in January 2022.

Reference books

Books that I studied to understand Bhagavad Gita after we got imprisoned in our apartment and I had to cook also for our survival. This was something that I had never done ever.

These books were all bought online. The names of the books are in order I laid my hand first and selected to go through and went through them one by one and then a number of time, to understand the content that was totally new to me but perhaps that existed there dormant because of the Here are the lists of books on Bhagavad Gita first, followed thereafter with those on Upanishads:

Bhagwad Gita
I started with ‘Bhagwad Gita as it is’ by A. C. Bhaktivedanta swami Prabhupada both Hindi and English versions
• Swami B. G. Narsingha
• Swami Chinmayananda The Holy Gita and Hindi translation by Swami Tejomayananda
• Bhagwad Gita for Daily Living by Eknath Easwaran
• Swami Sivananda, The Divine Society
• ‘God with Arjuna- Bhagavad Gita by Paramhans Yogananda and its Hindi translation.
• श्रीमद्भगवद्गीता गीता (साधक- संजीवनी) by Swami Ramsukhdas in Hindi, Gita Press
• Bhagavad Gita of Madhusudan Sarasvati With the Annotation ‘ Gudharthak Dipika, translated by Swami Gambhirananda, Advaita Ashrama
• Bhagavad Gita with the commentary of Sankracharya, translated by Swami Gambhiranand
• Swami Chidbhavananda Kindle edition
• Universal Message of the Bhagavad Gita by Swami Ranganathananda
(3 volumes)
Internet site 1. Aravinda: http://bhagavadgita.org.in/Chapters
Internet site of IIT, Kanpur: https://www.gitasupersite.iitk.ac.in

Ver recently I found a book in Hindi where all Gita slokas are translated in poem form in Hindi. (संस्कृति-संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (मूल और पद्यानुवाद), पृष्ट १९१-२४७). हिन्दी प्रेमियों को देखना चाहिये।

Upanishads
I got introduced to Upanishads through Eknath Easwaran’s ‘The Upanishad’, JAICO Publishing House. That made me look into गीता प्रेस प्रकाशन के कल्याण पत्रिका के तेईसवें वर्ष के विशेषांक, ‘उपनिषद् अंक’ and I find interesting as well easy for me to understand in Hindi almost all major Upanishads. It was there in my personal library for many years.

Other books that I bought and went through were-

‘Eight Upanishads’ in two volumes with commentary of Sankracharya by Swami Gambhiranand.

‘The Brihadaranyaka Upanishad’ by Swami Sivananda with his wonderful commentary in English

‘The Upanishads’ (6 Upanishads- Ishavasya, Kena, Mandukya, Katha, Prashna, and Mundaka) in two volumes Sri M- with lucidly explained commentaries of Slokas.

‘The Upanishads’ in two volumes by Nikhilanada published Advaita Ashrama
‘The Mandukya Upanishads with Gaudapada’s Karika and Sankara’s commentary
‘ईशादि नौ उपनिषद्’– व्याख्याकार हरिकृष्णदास गोयन्दका, गीता प्रेस

‘The Message of the Upanishads by Swami Ranganathananda, Advaita Ashram

Kathopanishad- A Dialogue with Death; Isavasya Upanishad- God in and as everything; Mundakopanishad- Tale of Two Birds: Jiva and Isvara: commentary by Swami Chinmayanand and translated in Hindi by Swami Tejomayananda.

Two important Internet sites for Upanishads and Gita:

Paramahansa Yogananda – http://yogananda.com.au/upa/Upanishads01.html
Arvinda https://upanishads.org.in/upanishads


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उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष-

उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष- जो दुनिया को बचा सकते थे,हैं अगर धर्म के सदस्य कम से कम यह मान लें जो बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष दर्शन है।

भारत के ब्रह्मज्ञानी ऋषियों का दुनिया के सभी व्यक्ति-विशेष एवं अपने समाज,देश,पूरे विश्व की व्यक्तिगत एवं सामूहिक समृद्धि शान्ति के लिये अति आवश्यक संदेश है। साथ ही यह सब भूतों को श्रद्धा की दृष्टि से देखने एवं उनके अच्छे जीवन यापन पर ध्यान रखने की इस धरती की आबोहवा एवं वातावरण को हमारे जीवनयापन के अनुकूल करने का सर्वाधिक ज़रूरी आवश्यक संदेश
भी देता है। इसके अभाव का फल हमें भुगतना पड़ता है जैसे आज हमारे चारों ओर हो रहा हर समय हर जगह, क़रीब क़रीब हम सभी देश एवं मनुष्य जाति के सदस्यों के द्वारा।
उपनिषदों का पहला संदेश इसके एक अति प्राचीनों में एक ईशोपनिषद में है:
१. ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’- ‘ब्रह्म जगत के सबमें ब्रह्म का वास है।’ ‘īśā vāsyamidaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat |‘ All in the world is enveloped by the Lord.’ आप शरीर में अशरीरी ‘आत्मा’ का वास है। एक इतने प्रसिद्ध केनोपनिषद् में इस शक्ति के बारे में कहा है-‘आत्मना विन्दते वीर्यं’,व्यक्ति को आत्मा से वीर्य (शक्ति) प्राप्त होता है; ’ātmanā vindate vīryaṁ’-by the self one finds the force to attain;(2.4)।उसकी महिमा एवं शक्ति को समझ एवं वह हर विधा में सर्व शक्तिशाली है। उसके की पूजा श्रद्धा कर अपने इस शरीर से अपनी इच्छित इच्छाओं को प्राप्त कर सकते हैं इसी जीवन है, जिसके उदाहरण इतिहास एवं आज भी भी आपके चारों ओर तरफ़ देख सकते हैं।उस आत्मा के बल से ही कहा गया है, ‘पङ्गुं लङ्घयते गिरीम्’, ‘पंगु चढ़ गिरिवर गहन’,It causes the lame to scale mountain tops’. आपके सामने है एक पैर कट जाने के बाद भी अरूनिमा सिन्हा एवरेस्ट पर चढ़ गईं।https://economictimes.indiatimes.com/magazines/panache/arunima-sinha-worlds-first-woman-amputee-to-scale-everest-now-has-a-doctorate/articleshow/66541484.cms?from=mdr.
प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफ़ेन हॉकिंग की Stephen Hawking की कहानी दुनिया हर बच्चा बच्चा जानता है-https://en.wikipedia.org/wiki/Stephen_Hawking.
दूसरा संदेश सबमें एकत्व है।
२. सभी जीवों में ब्रह्म है और मैं भी वही ब्रह्म हूँ । यह दिन चार वाक्यों में में तीन ब्रह्मवाक्य कहते हैं- १.
‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि।’- ‘मैं ब्रह्म हूँ’ -बृहदारण्यको उपनिषद् १.४.१० यजुर्वेद से।

‘ॐ तत्त्वमसि।’- ‘वह ब्रह्म तू है’ – छान्दोग्योपनिषद् ६.८.७ सामवेद से।
‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म।’- ‘यह आत्मा ब्रह्म है’- माण्डूक्योपनिषद् १-२ अथर्ववेद से।

सभी भूतों में एक ही आत्मा है जो ही ‘ब्रह्म’है- सभी मनुष्य, जीव, पेड़,पौधे, जलाशय, पर्वत, आदि…में बिना किसी देश,प्रदेश, जाति, धर्म, रंग, लिंग,गरीब, अमीर, मोटे पतले, बच्चा, युवा,वृद्ध आदि के अन्तर से। फिर क्यों आपसी द्वेष, कलह, युद्ध, घृणा, आदि नकारात्मक एवं हिंसा के भाव, क्यों इस बराबरी की, एकत्व की पहचान कराना सभी को हम हर एक का प्रथम धर्म हो। सबसे पहले हिन्दू समाज या अपने को हिन्दू कहने वाले नहीं समझते और समझाते। सबसे आश्चर्य की बात है कि जिनको इसे समझाने का अधिकार है वे ही इसे नहीं समझते।सदियों की ग़ुलामी एवं व्यापक ग़लत अशिक्षा का प्रसार और तथा कथित अज्ञानी पंडितों का स्वार्थ इसी शिक्षा पोषण इतना गहरे जा चुका है कि वह हमें केवल अंधकार अंधकार ही चारों ओर दिखता है। खैर, देश का विभिन्न क्षेत्रों का नेतृत्व जिनके हाथ में है उन्हें ही यह करना होगा।
यहाँ हम इसके सम्बन्ध में प्राचीनतम ग्रंथों से हाल तक के उन दिव्य ग्रंथों से लिये श्लोकों एवं अन्य रूप में इस विषय पर ज़िक्र करूँगा ।
ईशोपनिषद् का हज़ारों साल पहले ही एकत्व भाव दो श्लोकों में साफ़ साफ़ यही निर्देश देता है-
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
ऐसा ही भाव क़रीब क़रीब सारे उपनिषदों में कहा गया है।

फिर महाभारत काल या उससे भी पहले की रचना भगवद्गीता में इस विषय ‘सबमें एक ही आत्मा की बात को बार बार विभिन्न रूपों क़रीब क़रीब सभी अध्यायों में कहा गया है। विशेषकर अध्याय ६ एवं अध्याय १३ में-
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६.२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६.३१॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६.३२॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९.६॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌ ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२७॥
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ॥१३.२८॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१३.३०॥
और उपरोक्त धर्मग्रंथों को बाद में अष्टावक्र रचित
अष्टावक्र गीता
सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥६॥
sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |
vijñāya nirahaṃkāro nirmamastvaṃ sukhī bhava || 6 ||
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥

All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

अष्टावक्र गीता

सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥१५.६॥
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥
इसके पहले अध्याय ६ के चौथे श्लोक में कहा है-‘अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि’ I am, indeed, in all beings and all beings are in Me, this the true knowledge.
Unity in Diversity: All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

https://www.narayanseva.org/blog/15-inspirational-people-with-disabilities
https://wecapable.com/famous-disabled-people-world/
https://www.sunrisemedical.co.uk/blog/famous-people-with-disabilities

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उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष- जो दुनिया को बचा सकते थे,हैं

उपनिषदों के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष- जो दुनिया को बचा सकते थे,हैं अगर धर्म के सदस्य कम से कम यह मान लें जो बिल्कुल धर्मनिरपेक्ष दर्शन है।

भारत के ब्रह्मज्ञानी ऋषियों का दुनिया के सभी व्यक्ति-विशेष एवं अपने समाज,देश,पूरे विश्व की व्यक्तिगत एवं सामूहिक समृद्धि शान्ति के लिये अति आवश्यक संदेश है। साथ ही यह सब भूतों को श्रद्धा की दृष्टि से देखने एवं उनके अच्छे जीवन यापन पर ध्यान रखने की इस धरती की आबोहवा एवं वातावरण को हमारे जीवनयापन के अनुकूल करने का सर्वाधिक ज़रूरी आवश्यक संदेश
भी देता है। इसके अभाव का फल हमें भुगतना पड़ता है जैसे आज हमारे चारों ओर हो रहा हर समय हर जगह, क़रीब क़रीब हम सभी देश एवं मनुष्य जाति के सदस्यों के द्वारा।
उपनिषदों का पहला संदेश इसके एक अति प्राचीनों में एक ईशोपनिषद में है:
१. ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’- ‘ब्रह्म जगत के सबमें ब्रह्म का वास है।’ ‘īśā vāsyamidaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat |‘ All in the world is enveloped by the Lord.’ आप शरीर में अशरीरी ‘आत्मा’ का वास है। एक इतने प्रसिद्ध केनोपनिषद् में इस शक्ति के बारे में कहा है-‘आत्मना विन्दते वीर्यं’,व्यक्ति को आत्मा से वीर्य (शक्ति) प्राप्त होता है; ’ātmanā vindate vīryaṁ’-by the self one finds the force to attain;(2.4)।उसकी महिमा एवं शक्ति को समझ एवं वह हर विधा में सर्व शक्तिशाली है। उसके की पूजा श्रद्धा कर अपने इस शरीर से अपनी इच्छित इच्छाओं को प्राप्त कर सकते हैं इसी जीवन है, जिसके उदाहरण इतिहास एवं आज भी भी आपके चारों ओर तरफ़ देख सकते हैं।उस आत्मा के बल से ही कहा गया है, ‘पङ्गुं लङ्घयते गिरीम्’, ‘पंगु चढ़ गिरिवर गहन’,It causes the lame to scale mountain tops’. आपके सामने है एक पैर कट जाने के बाद भी अरूनिमा सिन्हा एवरेस्ट पर चढ़ गईं।https://economictimes.indiatimes.com/magazines/panache/arunima-sinha-worlds-first-woman-amputee-to-scale-everest-now-has-a-doctorate/articleshow/66541484.cms?from=mdr.
प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफ़ेन हॉकिंग की Stephen Hawking की कहानी दुनिया हर बच्चा बच्चा जानता है-https://en.wikipedia.org/wiki/Stephen_Hawking.
दूसरा संदेश सबमें एकत्व है।
२. सभी जीवों में ब्रह्म है और मैं भी वही ब्रह्म हूँ । यह दिन चार वाक्यों में में तीन ब्रह्मवाक्य कहते हैं- १.
‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि।’- ‘मैं ब्रह्म हूँ’ -बृहदारण्यको उपनिषद् १.४.१० यजुर्वेद से।

‘ॐ तत्त्वमसि।’- ‘वह ब्रह्म तू है’ – छान्दोग्योपनिषद् ६.८.७ सामवेद से।
‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म।’- ‘यह आत्मा ब्रह्म है’- माण्डूक्योपनिषद् १-२ अथर्ववेद से।

सभी भूतों में एक ही आत्मा है जो ही ‘ब्रह्म’है- सभी मनुष्य, जीव, पेड़,पौधे, जलाशय, पर्वत, आदि…में बिना किसी देश,प्रदेश, जाति, धर्म, रंग, लिंग,गरीब, अमीर, मोटे पतले, बच्चा, युवा,वृद्ध आदि के अन्तर से। फिर क्यों आपसी द्वेष, कलह, युद्ध, घृणा, आदि नकारात्मक एवं हिंसा के भाव, क्यों इस बराबरी की, एकत्व की पहचान कराना सभी को हम हर एक का प्रथम धर्म हो। सबसे पहले हिन्दू समाज या अपने को हिन्दू कहने वाले नहीं समझते और समझाते। सबसे आश्चर्य की बात है कि जिनको इसे समझाने का अधिकार है वे ही इसे नहीं समझते।सदियों की ग़ुलामी एवं व्यापक ग़लत अशिक्षा का प्रसार और तथा कथित अज्ञानी पंडितों का स्वार्थ इसी शिक्षा पोषण इतना गहरे जा चुका है कि वह हमें केवल अंधकार अंधकार ही चारों ओर दिखता है। खैर, देश का विभिन्न क्षेत्रों का नेतृत्व जिनके हाथ में है उन्हें ही यह करना होगा।
यहाँ हम इसके सम्बन्ध में प्राचीनतम ग्रंथों से हाल तक के उन दिव्य ग्रंथों से लिये श्लोकों एवं अन्य रूप में इस विषय पर ज़िक्र करूँगा ।
ईशोपनिषद् का हज़ारों साल पहले ही एकत्व भाव दो श्लोकों में साफ़ साफ़ यही निर्देश देता है-
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
ऐसा ही भाव क़रीब क़रीब सारे उपनिषदों में कहा गया है।

फिर महाभारत काल या उससे भी पहले की रचना भगवद्गीता में इस विषय ‘सबमें एक ही आत्मा की बात को बार बार विभिन्न रूपों क़रीब क़रीब सभी अध्यायों में कहा गया है। विशेषकर अध्याय ६ एवं अध्याय १३ में-
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६.२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६.३१॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६.३२॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥९.६॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌ ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२७॥
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ॥१३.२८॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१३.३०॥
और उपरोक्त धर्मग्रंथों को बाद में अष्टावक्र रचित
अष्टावक्र गीता
सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥६॥
sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani |
vijñāya nirahaṃkāro nirmamastvaṃ sukhī bhava || 6 ||
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥

All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

अष्टावक्र गीता

सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥१५.६॥
Recognising oneself in all beings, and all beings in oneself, be happy, free from the sense of responsibility and free from preoccupation with ‘me’.
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ॥६॥
इसके पहले अध्याय ६ के चौथे श्लोक में कहा है-‘अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि’ I am, indeed, in all beings and all beings are in Me, this the true knowledge.
Unity in Diversity: All in the Self, the Self in All
Swami Sarvapriyananda https://youtu.be/qd-yq-j4VLw

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कैसा हो कैसे एक सच्चे भारतीय नागरिक का चरित्र


मेरा सरकार के प्रधान मंत्री एवं शिक्षा मंत्री से एक ज़रूरी जिज्ञासा है। क्या हम एक पुरानी एवं प्रसिद्ध सभ्यता की संतान, उपनिषदों के शिष्यों के लिये बतायें इन में नीचे दिये गये आवश्यक गुणों को, जो आज की शिक्षा प्रणाली में किसी भी विषय में पारंगत होने के लिये ज़रूरी है, कुछ संशोधन के साथ स्थान दे सकते हैं? अगर वे इसे मानते हैं तो स्कूल स्तर पर जातक कथाओं या हितोपदेश की कथाओं की तरह सरल भाषा में कहानी या कविता या लेख के ज़रिये ही विद्यार्थियों को आचरण या चरित्र के लिये ज़रूरी उन गुणों को बताने का काम शुरू करना चाहिये।बिना अच्छे चरित्र या आचरण के हम अच्छे या एकनिष्ठ दुनिया के स्तर के वैज्ञानिक, इंजीनियर, या लेखक या यहाँ तक कि प्रजातंत्र की सुरक्षा के लिये अच्छे नागरिक भी नहीं बना सकते। पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे चरित्र एवं सदाचरण का स्तर नीचे जा रहा है।
कुछ उपनिषद् के बच्चों नचिकेता, सत्यकाम आदि की कहानियाँ पाठ का हिस्सा बन सकती है। उच्च या उच्चतर कक्षाओं के लिये उपनिषदों एवं गीता के पाँच से बीस श्लोकों हर साल जानकार लोगों से सही अर्थ एवं व्यक्त विचार के साथ सिखाया जा सकता है।
दुख की बात है कि गाँवों एवं शहरों के ग़रीबों को केवल सदियों से वे पंडित ही मिलते जा रहे हैं जिन्हें न उपनिषद् या गीता का एक भी श्लोक पढ़ाया गया हो। उनको शायद केवल साधारण कर्मकांड पढ़ाया जाता है जो उनकी रोज़ी रोटी का साधन है और इसके बारे में भी संदेह है। अधिकांश पंडितों एवं पुजारियों का उनका ज्ञान न के बराबर है एवं वह समाज में धर्म के बारे में ग़लत भ्रान्तियाँ फैलाता रहा है सदियों से। यही हाल गाँव एवं शहरों के करोड़ों मन्दिरों एवं धर्मस्थलों का भी जहां के पुजारी साल में अरबों की तादाद में तादाद में हिन्दू जाते हैं, वहाँ के पुजारी पंडित शायद ही उपनिषद्, गीता आदि को जानते हैं। कर्मकांड भी शायद पूरी तरह से नहीं जानते।
आज के समाज के बढ़ते विवाद, स्वार्थ, झगड़े, मिहनत न करने की आदतों, बेईमानी द्वारा कार्य सिद्धि करने का हर कोशिश आदि से बुरे आचरणों से कैसे उबरा जा सकता है? कौन उसे सीखाता है। गीता के कर्म योग को सरल तरीक़े से भी समझाया जा सकता है हमारी शिक्षा में या पुजारियों द्वारा प्रवचनों में।गीता से अन्य बताने की चीजें हैं वर्ण एवं आश्रम पद्धति, यज्ञ, दान, तप, व्यक्ति के तीन गुण, दैवी या असुरी स्वभाव – आज के संदर्भ में सही ढंग से समझाये जा सकते हैं। इसे वेदान्त के शंकराचार्य, विवेकानन्द या रामकृष्ण के विचारों के अनुसार अगर किया जाये तो अच्छा असर पड़ेगा।

यह अदभुद् लगता है कि प्रारम्भ के जिन सब धार्मिक संस्थाओं ने हिन्दू धर्म फैलाने का काम किया है विशेषकर पिछली तीन ३-४ शताब्दियों में या इससे पहले भी वे राजा, विद्वान, धनी नागरिक तक ही सीमित रह गये। कोई गाँवों एवं ग़रीबों तक तक गये ही नहीं। भक्तिकाल के लोगों ने ज़रूर यह किया। तुलसीदास तो गाँव गाँव तक पहुँच गये अपने रामचरितमानस से। पर आम शिक्षा के अभाव में इसे शान्ति एवं मोक्ष के लिये ही पढ़ा गया। पर असर बच्चों बच्चों तक गया। रामचरितमानस की जानकारी उत्तर भारत के बच्चों तक पहुँचा। और विदेश भेजे जा रहे मज़दूर भी इसे अपने साथ ले गये। यह गाया जाना लगा, अंताक्षरी में व्यवहार होने लगा। मेरे जमाने में भी यह था। हम पढ़ते थे, याद करते थे। बाद में बड़े होने पर भी मैं जब गाँव जाता कलकत्ता से गाँव के लोग हमसे रामायण पर शंका समाधान या शायद मेरे ज्ञानी परीक्षा के लिये मुझसे प्रश्न करते थे, उनमें मेरे पिताजी भी थे। स्वभावत इसका प्रभाव पड़ा पूरे जीवन पर।विवेकानन्द ने इस पर बहुत कहा है। वे चाहते थे कि उपनिषदों के सार गाँव तक पहुँचाया जाये। कुछ धार्मिक संस्थाएँ इस पर काम कर रहीं हैं। पर यह उनकी चाह के हिसाब से ज़रूरी आम आदमी, या स्कूलों तक पहुँच नहीं पा रहा है। उन्होंने कहा था-
Swamiji has said about the idea of potential divinity to enter all the strata of the society, “ These conception of the Vedanta must come out, must remain not only in the forest, not only in the cave, but they must come out to work at the bar and the bench, the pulpit, and in the cottage of the poor, with the fishermen that are catching fish, and with the students that are studying. They call call to every man, woman,and child, whatever be their occupation, wherever they may be. The way has been shown….If the fisherman thinks that he is the Spirit, he will be a better fisherman; if the student that he is the Spirit, he will be a better student. If a lawyer thinks that he is the Spirit, he will be a better lawyer, and so on.(3.2.45)
**
उपनिषद्, गीता एकदम धर्म निरपेक्ष हैं एवं इनके सार को आम जनता तक पहुँचाना ज़रूरी है देश में।
काश! अब इस तरह का काम प्रारंभ किया जाता, और बिरला, अम्बानी, अदानी आदि अन्य अतिसमृद्ध उद्योगपति इसमें सहायता करते। यही कारण है कि अमरीका के पढ़े लिखे लोग उपनिषद्, गीता को भारत के हिन्दूओं से ज़्यादा जानते हैं।समय के साथ हमारी शिक्षा देश की भाषा से पूर्ण रूप से अंग्रेज़ी पर निर्भर हो गई, और उन देशों के नक़ल पर ही चलती रही।

किसी व्यक्ति के चरित्र एवं आचरण की नींव डालनें माँ-बाप,एवं घर परिवार,दोस्त, मेलजोल में रहने वाले लोग ही कारण होते हैं।नींव तो बचपन में स्कूलों में ही पड़ती है,अधिकांश शिक्षक आम नागरिक से तो अच्छे ही होते हैं। उन्हें इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिये, और आम जनता को इसमें मदद करनी चाहिये। वैसे शिक्षकों के चयन में आचरण सम्बन्धी जानकारी को भी महत्व मिलना चाहिये। आज बच्चे तीन साल या पहले भी किसी न किसी तरह के स्कूलों में चले जाते हैं। इनके आचरणों की ज़िम्मेवारी उन्हीं स्कूलों पर पड़ती है। क्या वे इसका ध्यान रखते हैं ओर माँ- बाप के बात करते हैं। साथ ही माता भी बच्चों के आचरणों के लिये सबसे बड़ी ज़िम्मेवार होती हैं।क्या गरीब से गरीब अशिक्षित महिलाओं को शिक्षा प्रणाली लीची कुछ मदद मिल सकती है? शायद एक अच्छे माँ बाप बच्चों को अच्छे आचरण सीखा कर उनके भविष्य को बेहतर बना सकते है। यह विषय बहुत महत्व रखता है, अगर समय रहते कदम उठाने का काम नहीं किया, हम एक मज़बूत राष्ट्र की कल्पना नहीं कर सकते।
The requirements for the students was prescribed in the Vedic times, particularly for studying Vedanta or more so specifically the Upanishads:
“As demanded by the Vedanta, for student approaching a teacher for the knowledge of Brahman, the four must are-

  1. discrimination( Viveka) between the real and the unreal.
  2. Renunciation ( vairaagyam) of the unreal
  3. Six Virtues- calmness of mind(sama), withdrawal of sense organs from their objects (dama), keeping the mind undisturbed by external objects (uparati), patient bearing of all afflictions(titiksha),faith in the words of the teacher( Shraddha), and unceasing concentration of the mind on Brahman(samadhaana), and longing for Freedom(mumukshutaa)
    वैदिक काल में छात्रों के लिए आवश्यकता निर्धारित की गई थी, वेदांत या विशेष रूप से उपनिषदों के अध्ययन एवं ब्रह्म का अनुभव करने के लिए:
    “वैदिक साहित्य के अनुसार, ब्राह्मण के ज्ञान के लिए एक शिक्षक के पास जाने वाले छात्र के लिए, चार गुण होना चाहिए-
  4. वास्तविक सत्य और असत्य के बीच भेद (विवेक)।
  5. असत्य का त्याग (वैराग्यम्)
  6. और छह अन्य गुण- मन की शांति (सम), इंद्रियों को अपने विषयों से दूर करना (दम), बाहरी वस्तुओं से मन को विचलित नहीं करना(उपरति), सभी कष्टों को सहन करना(तितिक्षा), शिक्षक के उपदेश में विश्वास करना (श्रद्धा), और आत्म-निपटान, या ब्रह्म (समाधान) प्राप्ति के लिये निरंतर एकाग्रता, और स्वतंत्रता की लालसा (मुमुक्षुता)
    प्राचीन कठोपनिषद् कहता है-
    नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
    नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्‌ ॥१.२.२॥
    जो दुष्कर्मों से विरत नहीं हुआ है, जो शान्त नहीं है, जो अपने में एकाग्र नहीं है अथवा जिसका मन शान्त नहीं है ऐसे किसी को भी यह ‘आत्मा’ प्रज्ञा द्वारा प्राप्त नहीं हो सकता।
    One who is indulged always in vicious actions, and desirous of various sensual enjoyments, and who has got no concentrated mind, can’t attain Atman through the knowledge by hearing the discourse not by just one’s intelligence.
    Request all parents to read it and comment on it or talk to me for any clarification.
    उपनिषदों में जितने शिष्यों को ज्ञान देने के लिये तैयार होते थे विशेषकर ब्रह्मज्ञान उन्हें इन गुणों को अपने में लाने के लिये एक नियत समय के लिये इन गुणों के जीवन का आश्रम में रह अभ्यास करने के लिये गुरू निर्देश देते थे। प्रश्नोपनिषद् में पाँच अपने पास आये शिष्यों को कहते हैं, ‘ ”आप लोग पुनः एक वर्ष ब्रह्मचर्य, श्रद्धा एवं तपस्यापूर्वक व्यतीत करिये फिर जो चाहें प्रश्न पूछिये, और मैं यदि उस विषय में जानता होऊँगा तो निःसंदेह बिना कुछ गुप्त रखे आप लोगों को सब बताऊँगा।’ फिर गुरू की परीक्षा में सफल होने पर ही ज्ञान का पाठ प्रारंभ किया जाता था।देवराज इन्द्र एवं असुर राज विरोचन को भी यह करना पड़ा। नचिकेता की तो यमराज बराबर परीक्षा करते जाते थे विभिन्न प्रलोभनों से। आज के विद्यार्थियों की एसी शिक्षा में क्या हो इस पर एक प्रबुद्धों की कमिटी निर्णय ले सकती है।

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कैसा हो एक सच्चे भारतीय नागरिक का चरित्र और कैसे


मेरा सरकार के प्रधान मंत्री एवं शिक्षा मंत्री से एक ज़रूरी जिज्ञासा है। क्या हम एक पुरानी एवं प्रसिद्ध सभ्यता की संतान, उपनिषदों के शिष्यों के लिये बतायें इन में नीचे दिये गये आवश्यक गुणों को, जो आज की शिक्षा प्रणाली में किसी भी विषय में पारंगत होने के लिये ज़रूरी है, कुछ संशोधन के साथ स्थान दे सकते हैं? अगर वे इसे मानते हैं तो स्कूल स्तर पर जातक कथाओं या हितोपदेश की कथाओं की तरह सरल भाषा में कहानी या कविता या लेख के ज़रिये ही विद्यार्थियों को आचरण या चरित्र के लिये ज़रूरी उन गुणों को बताने का काम शुरू करना चाहिये।बिना अच्छे चरित्र या आचरण के हम अच्छे या एकनिष्ठ दुनिया के स्तर के वैज्ञानिक, इंजीनियर, या लेखक या यहाँ तक कि प्रजातंत्र की सुरक्षा के लिये अच्छे नागरिक भी नहीं बना सकते। पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे चरित्र एवं सदाचरण का स्तर नीचे जा रहा है।


कुछ उपनिषद् के बच्चों नचिकेता, सत्यकाम आदि की कहानियाँ पाठ का हिस्सा बन सकती है। उच्च या उच्चतर कक्षाओं के लिये उपनिषदों एवं गीता के पाँच से बीस श्लोकों हर साल जानकार लोगों से सही अर्थ एवं व्यक्त विचार के साथ सिखाया जा सकता है।


दुख की बात है कि गाँवों एवं शहरों के ग़रीबों को केवल सदियों से वे पंडित ही मिलते जा रहे हैं जिन्हें न उपनिषद् या गीता का एक भी श्लोक पढ़ाया गया हो। उनको शायद केवल साधारण कर्मकांड पढ़ाया जाता है जो उनकी रोज़ी रोटी का साधन है और इसके बारे में भी संदेह है। अधिकांश पंडितों एवं पुजारियों का उनका ज्ञान न के बराबर है एवं वह समाज में धर्म के बारे में ग़लत भ्रान्तियाँ फैलाता रहा है सदियों से। यही हाल गाँव एवं शहरों के करोड़ों मन्दिरों एवं धर्मस्थलों का भी जहां के पुजारी साल में अरबों की तादाद में तादाद में हिन्दू जाते हैं, वहाँ के पुजारी पंडित शायद ही उपनिषद्, गीता आदि को जानते हैं। कर्मकांड भी शायद पूरी तरह से नहीं जानते।


आज के समाज के बढ़ते विवाद, स्वार्थ, झगड़े, मिहनत न करने की आदतों, बेईमानी द्वारा कार्य सिद्धि करने का हर कोशिश आदि से बुरे आचरणों से कैसे उबरा जा सकता है? कौन उसे सीखाता है। गीता के कर्म योग को सरल तरीक़े से भी समझाया जा सकता है हमारी शिक्षा में या पुजारियों द्वारा प्रवचनों में।गीता से अन्य बताने की चीजें हैं वर्ण एवं आश्रम पद्धति, यज्ञ, दान, तप, व्यक्ति के तीन गुण, दैवी या असुरी स्वभाव – आज के संदर्भ में सही ढंग से समझाये जा सकते हैं। इसे वेदान्त के शंकराचार्य, विवेकानन्द या रामकृष्ण के विचारों के अनुसार अगर किया जाये तो अच्छा असर पड़ेगा।

यह अदभुद् लगता है कि प्रारम्भ के जिन सब धार्मिक संस्थाओं ने हिन्दू धर्म फैलाने का काम किया है विशेषकर पिछली तीन ३-४ शताब्दियों में या इससे पहले भी वे राजा, विद्वान, धनी नागरिक तक ही सीमित रह गये। कोई गाँवों एवं ग़रीबों तक तक गये ही नहीं। भक्तिकाल के लोगों ने ज़रूर यह किया। तुलसीदास तो गाँव गाँव तक पहुँच गये अपने रामचरितमानस से। पर आम शिक्षा के अभाव में इसे शान्ति एवं मोक्ष के लिये ही पढ़ा गया। पर असर बच्चों बच्चों तक गया। रामचरितमानस की जानकारी उत्तर भारत के बच्चों तक पहुँचा। और विदेश भेजे जा रहे मज़दूर भी इसे अपने साथ ले गये। यह गाया जाना लगा, अंताक्षरी में व्यवहार होने लगा। मेरे जमाने में भी यह था। हम पढ़ते थे, याद करते थे। बाद में बड़े होने पर भी मैं जब गाँव जाता कलकत्ता से गाँव के लोग हमसे रामायण पर शंका समाधान या शायद मेरे ज्ञानी परीक्षा के लिये मुझसे प्रश्न करते थे, उनमें मेरे पिताजी भी थे। स्वभावत इसका प्रभाव पड़ा पूरे जीवन पर।विवेकानन्द ने इस पर बहुत कहा है। वे चाहते थे कि उपनिषदों के सार गाँव तक पहुँचाया जाये। कुछ धार्मिक संस्थाएँ इस पर काम कर रहीं हैं। पर यह उनकी चाह के हिसाब से ज़रूरी आम आदमी, या स्कूलों तक पहुँच नहीं पा रहा है। उन्होंने कहा था-
Swamiji has said about the idea of potential divinity to enter all the strata of the society, “ These conception of the Vedanta must come out, must remain not only in the forest, not only in the cave, but they must come out to work at the bar and the bench, the pulpit, and in the cottage of the poor, with the fishermen that are catching fish, and with the students that are studying. They call call to every man, woman,and child, whatever be their occupation, wherever they may be. The way has been shown….If the fisherman thinks that he is the Spirit, he will be a better fisherman; if the student that he is the Spirit, he will be a better student. If a lawyer thinks that he is the Spirit, he will be a better lawyer, and so on.(3.2.45)
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उपनिषद्, गीता एकदम धर्म निरपेक्ष हैं एवं इनके सार को आम जनता तक पहुँचाना ज़रूरी है देश में।
काश! अब इस तरह का काम प्रारंभ किया जाता, और बिरला, अम्बानी, अदानी आदि अन्य अतिसमृद्ध उद्योगपति इसमें सहायता करते। यही कारण है कि अमरीका के पढ़े लिखे लोग उपनिषद्, गीता को भारत के हिन्दूओं से ज़्यादा जानते हैं।समय के साथ हमारी शिक्षा देश की भाषा से पूर्ण रूप से अंग्रेज़ी पर निर्भर हो गई, और उन देशों के नक़ल पर ही चलती रही।

किसी व्यक्ति के चरित्र एवं आचरण की नींव डालनें माँ-बाप,एवं घर परिवार,दोस्त, मेलजोल में रहने वाले लोग ही कारण होते हैं।नींव तो बचपन में स्कूलों में ही पड़ती है,अधिकांश शिक्षक आम नागरिक से तो अच्छे ही होते हैं। उन्हें इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिये, और आम जनता को इसमें मदद करनी चाहिये। वैसे शिक्षकों के चयन में आचरण सम्बन्धी जानकारी को भी महत्व मिलना चाहिये। आज बच्चे तीन साल या पहले भी किसी न किसी तरह के स्कूलों में चले जाते हैं। इनके आचरणों की ज़िम्मेवारी उन्हीं स्कूलों पर पड़ती है। क्या वे इसका ध्यान रखते हैं ओर माँ- बाप के बात करते हैं। साथ ही माता भी बच्चों के आचरणों के लिये सबसे बड़ी ज़िम्मेवार होती हैं।क्या गरीब से गरीब अशिक्षित महिलाओं को शिक्षा प्रणाली लीची कुछ मदद मिल सकती है? शायद एक अच्छे माँ बाप बच्चों को अच्छे आचरण सीखा कर उनके भविष्य को बेहतर बना सकते है। यह विषय बहुत महत्व रखता है, अगर समय रहते कदम उठाने का काम नहीं किया, हम एक मज़बूत राष्ट्र की कल्पना नहीं कर सकते।
The requirements for the students was prescribed in the Vedic times, particularly for studying Vedanta or more so specifically the Upanishads:
“As demanded by the Vedanta, for student approaching a teacher for the knowledge of Brahman, the four must are-

  1. discrimination( Viveka) between the real and the unreal.
  2. Renunciation ( vairaagyam) of the unreal
  3. Six Virtues- calmness of mind(sama), withdrawal of sense organs from their objects (dama), keeping the mind undisturbed by external objects (uparati), patient bearing of all afflictions(titiksha),faith in the words of the teacher( Shraddha), and unceasing concentration of the mind on Brahman(samadhaana), and longing for Freedom(mumukshutaa)
    वैदिक काल में छात्रों के लिए आवश्यकता निर्धारित की गई थी, वेदांत या विशेष रूप से उपनिषदों के अध्ययन एवं ब्रह्म का अनुभव करने के लिए:
    “वैदिक साहित्य के अनुसार, ब्राह्मण के ज्ञान के लिए एक शिक्षक के पास जाने वाले छात्र के लिए, चार गुण होना चाहिए-
  4. वास्तविक सत्य और असत्य के बीच भेद (विवेक)।
  5. असत्य का त्याग (वैराग्यम्)
  6. और छह अन्य गुण- मन की शांति (सम), इंद्रियों को अपने विषयों से दूर करना (दम), बाहरी वस्तुओं से मन को विचलित नहीं करना(उपरति), सभी कष्टों को सहन करना(तितिक्षा), शिक्षक के उपदेश में विश्वास करना (श्रद्धा), और आत्म-निपटान, या ब्रह्म (समाधान) प्राप्ति के लिये निरंतर एकाग्रता, और स्वतंत्रता की लालसा (मुमुक्षुता)
    प्राचीन कठोपनिषद् कहता है-
    नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
    नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्‌ ॥१.२.२॥
    जो दुष्कर्मों से विरत नहीं हुआ है, जो शान्त नहीं है, जो अपने में एकाग्र नहीं है अथवा जिसका मन शान्त नहीं है ऐसे किसी को भी यह ‘आत्मा’ प्रज्ञा द्वारा प्राप्त नहीं हो सकता।
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    उपनिषदों में जितने शिष्यों को ज्ञान देने के लिये तैयार होते थे विशेषकर ब्रह्मज्ञान उन्हें इन गुणों को अपने में लाने के लिये एक नियत समय के लिये इन गुणों के जीवन का आश्रम में रह अभ्यास करने के लिये गुरू निर्देश देते थे। प्रश्नोपनिषद् में पाँच अपने पास आये शिष्यों को कहते हैं, ‘ ”आप लोग पुनः एक वर्ष ब्रह्मचर्य, श्रद्धा एवं तपस्यापूर्वक व्यतीत करिये फिर जो चाहें प्रश्न पूछिये, और मैं यदि उस विषय में जानता होऊँगा तो निःसंदेह बिना कुछ गुप्त रखे आप लोगों को सब बताऊँगा।’ फिर गुरू की परीक्षा में सफल होने पर ही ज्ञान का पाठ प्रारंभ किया जाता था।देवराज इन्द्र एवं असुर राज विरोचन को भी यह करना पड़ा। नचिकेता की तो यमराज बराबर परीक्षा करते जाते थे विभिन्न प्रलोभनों से। आज के विद्यार्थियों की एसी शिक्षा में क्या हो इस पर एक प्रबुद्धों की कमिटी निर्णय ले सकती है।
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प्रकृति की एक पुकार

मेरे कुछ घंटे से बरसने से,
अस्त व्यस्त हो जाता
तुम्हारा जीवन
तुम मुझको कभी,
कभी सरकार को कोसते हो
पर उसमें तुम्हारी तरह ही हैं
जानते केवल चुनाव शब्द
यही है काम उनका,
कुछ भी कर सकते
हैं उसके तो लिये।
न नालियाँ बनायेंगे,
न उनकी मरम्मत होगी
न कुछ तुम्हें जगायेंगे
जब मेरा चैन हर जाता
मेरा यह रूप होता
तुम न तो कोई रावण हो,
न राम ही बन पाये
बीच में लटकते हुए
असहाय बने रहते हो
तुम सोचो मेरे हित कुछ
मैं मैली होती जाती हूँ
तुमने ज़हरीले गैसों से
भर दिया सारा आसमान
क्या मैं क्रोध हीन बनूँ
देख तुम्हें करते सब,
सब समय नालायक हरकत
तब मुझे इसी तरह बरसना
पड़ता है।
मत करो मुझे तंग अब ज़्यादा
न तो जल प्लावन बन आऊँगा
तुममें नहीं कोई नूह या मनु
जो तुम्हें बचायेगा।
जब हर तुम बन सकते ब्रह्म
क्यों असुर बनते जाते हो
सोचों अपने ऋषियों को
जो सब तुम्हें बतायें हैं।
सब में है एक ब्रह्म
पेड़ पशु जल जीव
छोटे से छोटे में
बड़े की तो बात छोड़ो।
समय रहते चेत जाओ
न बनो मेरा शिकार
बचा लो प्यारी धरती को।
होगा बड़ा वह आत्मघात
कर्म समझो या की पाप।
उठो, जागो, सुनो बात
अब तो बदल जाओ
समय रहते स्वार्थ त्याग।

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My Project and Resolution to complete in 2022

I got a taste for the Ramcharitamanas and some of the popular Slokas of Bhagavad Gita in my early school days, when my grandfather would reinforce his advice by quoting some Sanskrit Slokas. He often used the following well-known shloka from the Gita
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, ..’ and

‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’, when offering his sage advice.

In my high-school days, Sanskrit used to be offered as a subject for the school final examinations (a major exam you had to take at the end of Class 10 or 10th grade). I took Sanskrit as a subject for a full four years. However, years later when I tried to recall my Sanskrit, I realized I had forgotten everything. The only things I could recall easily were my own work-related technologies and management techniques in which I had specialised in on my own during my 40-year professional career.

Interestingly, at IIT, Kharagpur, where I got my Bachelor’s degree, the Institute’s motto was ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (yogah karmasu kausalam). This, my grandfather had explained to me, was one of the famous Slokas from Chapter 2 of the Bhagavad Gita.

Later on, after my wife joined me in Hindustan Motors residential colony, and because of her, I gradually started becoming more and more spiritually inclined.

I don’t recall exactly when I started doing morning puja (prayers) and reading some portions of the Ramcharitamanas on a daily basis. In later years, I tried to read some passages of the Bhagavad Gita too, particularly regarding the स्थिप्रज्ञता in chapter 2. This interest grew with time.

I had seen my grandfather finish a complete reading of the Ramcharitamanas every month (Masaparayana) and then even in nine days (Navaparayana) during the two Navratri festival times in a year.

By 1990, I too started down that path, and my spiritual interest grew deeper over the years. I carried on with the daily practice of reading the Ramcharitamanas without fail, no matter what the conditions were like. This continued even while travelling within the country, or abroad, which at one point of my work-life at Hindustan Motors had become a regular part of my assignments. This spiritual fervour grew till my heart attack in 1999 December end in Noida.

At that time I was working, after my retirement from Hindustan Motors, as the President of a factory. It was sudden, and came as a big shock. This changed my life in a big way.

One day, the 27th of April 2000, I came across and bought a little book – ‘The Curative Powers of the Holy Gita’ – with about 33 Slokas compiled by one T. R. Seshadri. This was a time when I was still recovering from my open-heart surgery which was done by Dr. Naresh Trehan of the Escorts Heart Hospital.

I started reading the slokas from this little book every morning during my puja. In October, the same year, we went to our house in Salt Lake City in Kolkata that I had built while still working at Hindustan Motors. There, we decided collectively – with our children – that I must resign from my job and live a carefree retired life, enjoying the years left.

We decided to live in Noida, close to Delhi. Upon the insistence of my wife, we bought a house in Sector 41, Noida, in 1998, and moved in . We preferred Noida over Salt Lake as I found it more cosmopolitan, with better amenities like hospitals and proximity to New Delhi International Airport, which was much better connected, something we missed while we were in Kolkata. With my three sons living in the US, this was another big plus.

After my retirement, I completed writing – ‘Latest Trends in Machining’- my last book on technical topics. Thereafter, I had to decide my daily schedule of activities in order to stay busy during the day, which, for a work-oriented person like me, appeared quite daunting at that time.

To my daily Puja, in addition to reading Slokas from the book I mentioned earlier, I added Ashram Bhajanavali of Mahatma Gandhi and Sundar Kand from the Ramcharitamanas. Later on, I started a deeper study of the spiritual texts that I already had in abundance in my personal library by then.

It was only in 2019-20 and more so with the onslaught of the Covid-19 pandemic and the total lockout that followed, that I switched gears – getting on with serious study of the Bhagwad Gita and thereafter the major Upanishads. I procured the commentaries by a number of reputed writers for both the texts – in English and Hindi. Starting early in the morning, every day, I spent hours studying these commentaries one by one, often reading them again and again. I kept jotting down, in my yellow notebook some of the Slokas that struck a chord and also started memorising them. Perhaps, due to my advancing age, I started appreciating these more and more, often seeing some new light shine through every time I picked up and read or re-read the slokas.

Having built a culture of diving deep to understand the engineering issues, and pouring my sweat and toil in breaking any technical challenges, during my work years, I now found new meaning in those experiences with these texts as my guide. Trying to plumb the depths of what the sages were trying to relay, I found that what we are seeking in “real life” (as in, during our frantic/hard-working professional years), has many parallels with the ultimate search – the search for true ‘divinity’.

Shrimad Bhagwad Gita is a part of the great epic of the world, the Mahabharata, known to have been penned down by Ved Vyasa, thousands of years ago. The Mahabharata has a total of one hundred thousand Slokas in its eighteen parvas (chapters). In Mahabharata, the Bhagavad Gita with its 700 Slokas, was in Bhishma Parva of the Shri Bhagavad Gita Parva’ (designated ‘up-parva’), and starts from chapter 23 and ends in chapter 40.

Perhaps Shankaracharya was the first one to have taken the Bhagavad Gita “out” of the Mahabharata epic, sometime in the eighth century AD, and accorded to it its own identity – freeing it in some ways from the Mahabharata.

He also wrote its first ‘bhasya’ – a commentary – in simpler Sanskrit prose, for its 700 verses with a profound introduction. He considered the Bhagavad Gita as the collected essence of the messages of all Vedas- ‘समस्तवेदार्थसारसंग्रहभूतम्’ (samast vedarth saar sangrahabutam). Some consider Gita as an Upanishad too. The Bhagwad Gita itself at the end of each chapter says, ‘श्रीमद्भगवगदगीसूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायो योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवाद……’ ( ..shrimadbhadvad Gita Su upanishadsu bhramavidyayo yogashastre Shri Krishnarjun samvad..). Also, at the end of the name of all the chapters (as suffix) it uses the word ‘योग’ (Yog), कर्मयोग (Karmayoga), ज्ञानयोग (Jnanyoga), etc.

Bhagavad Gita got designated as one of the three Hindu scriptures of प्रस्थानत्रयी, prashthantrayi- which includes the Upanishads, the Brahma Sutra, and the Bhagavad Gita.

The Bhagwad Gita is universally considered as a unique treatise, providing a detail handbook of the essence of all the 108 or more of the Upanishads, perhaps, of all the Vedas and other earlier scriptures for the use of all people – no matter which country or culture they come from. Swami Vivekananda, the Hindu monk who opened the eyes of the West and his beloved India to this great spiritual heritage, says in his ‘Complete Works’,

“no better commentary on the Vedas than Gita has been written or can be written. The essence of the Shrutis, or the Upanishads, is hard to understand. There were so many commentators, each one trying to interpret in his own way. Then the Lord (Krishna) Himself comes, He who is the inspirer of the Shrutis, to show us the meaning of them, as the preacher of the Gita, and today India wants nothing better than that type of interpretation.”

Some commentators give credit to Anand Giri, who first declared that the Bhagavad Gita illustrates the detailed message of one of the four mahavakyas of the Upanishads- ‘Tat Tvam Asi’ –‘That Thou Art’. The Gita provides a deep understanding of the profound truth of the Upanishads. Each word of the mahavakya has been explained in the Bhagavad Gita.

The first six chapters, from the first to sixth, talk of ‘tvam’-‘Thou’, the Atman, and deal with the nature of the real eternal Self in every being. The next six chapters, from the seventh to the twelfth, dwell on ‘Tat’ – ‘That’: Brahman, the Supreme Reality underlying all creation. The last six chapters from the thirteenth to the eighteenth focuses on ‘Asi’, ‘is’ – the relationship between ‘Tvam’ and ‘Tat’- the relation of the the eternal Self in every beings with the Supreme Reality, which unites all existence into one whole- ‘Ekstavam’. Gita provides the guidelines for discovering one’s real Self and then, if one wishes, can progress further to realise the indivisible unity of life and get united with the Supreme Reality, the Brahman.

Madhusudan Saraswati (1590-1607AD), credited by many as the best commentator of the Bhagavad Gita after Adi Shankaracharya, divides the eighteen chapters in the same three sections with each dealing successively with Karma Yoga or the yoga of action (Chapters 1-6), Bhakti Yoga or the yoga of love of the Supreme (Chapters 7-12), and finally Gyan Yoga (Chapters 13-18) or the yoga of knowledge. However, Adi Shankaracharya did not mention the above categories in his commentary of the Bhagavad Gita.

My Need for This Collection

Interestingly, Swami Vivekananda in ‘The Mission of Vedanta’ writes –
“ …Aye, if there is anything in the Gita that I like it is these two verses, (XIII 27,28) coming out strong as the very gist, the very essence, of Krishna’s teaching” :

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥13.27॥
samaṁ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṁ parameśvaram
vinaśyatsvavinaśyantaṁ yaḥ paśyati sa paśyati.
He who sees the supreme Lord dwelling in all beings, the Imperishable in things that perish, he sees indeed.

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥13.28॥
samaṁ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram,
na hinastyātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim.
For seeing the Lord as the same, present everywhere, he does not destroy the Self by the self, and thus he goes to the highest goal.”

The presence of Self in every being is one of the main topics of Upanishads. However, the Slokas of Bhagavad Gita above remind of the similar Slokas 6 and 7 in Isopanisad, the one of the oldest Upanishads:

यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥6॥
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥7॥

Swami Sivanand of The Divine Society has brought to our attention another Sloka, in his commentary on the Bhagavad Gita, and called it एकश्लोकीय गीता (ek slokiya gita). This is the last Sloka 78 of Bhagavad Gita – Chapter 18, by which Sanjaya concludes his narration of the Bhagavad Gita in Kurukshetra to the blind King Dhritrashtra in his capital city of Hastinapur:

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
हे राजन! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है.

Wherever is Krishna, the Lord of Yoga, wherever is Partha, the archer, there is prosperity, victory, happiness and sound policy; this is my conviction.

Swami Sivanand has also selected seven Slokas that contain the essence of the whole Gita and called it सप्तश्लोकी गीता with 7 Slokas (8-13, 11-36,13-13,8-9,15-1,15-15,9-34).

A visiting Pandit (wise man) once requested Bhagavan Ramana Maharshi to select a few key Slokas out of the total of 700 Slokas of Bhagavad Gita, which will be enough to remember and understand the core message of the Bhagavad Gita. For an average person it is difficult to remember and retain all the seven hundred verses in memory, the Pandit explained. The Pandit then continued, ‘Is there one verse that could be remembered as the quintessence of the Gita?’ Bhagavan Raman thereupon mentioned the verse 20 of Chapter X as that verse:

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥

हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा
संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥

‘I am the Self, Oh Gudakesa (Arjun), dwelling in the Heart of every being; I am the beginning, and the middle, and also the end of all beings.’

Later, after a few years, Maharshi Ramana, who had named the above Sloka as the essence of the Bhagavad Gita, also selected forty-two verses that represent the essence of the whole message of the Gita, and can also be easily remembered by those interested. I found that those forty two Slokas did not meet my specific needs, as audacious as this may sound.

I, therefore, while going through various commentaries of the Bhagavad Gita by five to six well-known spiritual gurus, thought of preparing a selection of the Slokas from the Hindu scriptures for my own practise, and for my family members wherever they resided – in the US, and their friends.

I started my process of selecting and preparing a comprehensive collection of Slokas from the Bhagavad Gita and the Upanishads that covered all its chapters, in my own way. I intended to limit myself to some 150-200 Slokas. I wanted to memorise them. These selected slokas collectively would help in understanding the universal messages of the Upanishads and Bhagavad Gita – such was my thought process. Another idea was to build my own spiritual strength, and train myself to work without desire for any fruit, giving up as much as I can.

By repeating the Slokas of the Upanishads, the Bhagavad Gita and the Ramcharitamanas, as is done in bhakti yoga by chanting the name of the Supreme or a mantra, I thought I maybe able to develop the means to attain goodness and true spirituality in my conduct indirectly and help me in becoming a better human being. This compilation is the result of that attempt. I have tried to memorise most of them.

I have started repeating the memorised Slokas as many times as I have the opportunity to, once every morning in front of the statue of Mother Saraswati, the goddess of knowledge. Because of the pandemic, I have been walking alone in the morning and evening. This helps me keep my mind preoccupied with goodness I think, and I repeat these slokas while walking inside or outside the apartment, or in the walkway downstairs.

Sometimes, I have discovered a newer, inspiring insight into my weaknesses, and the way to overcome them, to become a better person, a good citizen. It gives me great satisfaction and happiness, because of a hope that maybe I will succeed in the remaining years of my physical existence in this bodily form, to become better, if not enlightened, in this very lifetime.

Perhaps, The Slokas that I have excluded will not affect me much. I tried to limit or exclude those slokas that dwell on negative aspects, such as those that detail the shortcomings of Rajshik , Tamasik, and Aasuri nature. Anyone interested in knowing about them, can always go back to the original Slokas of the Gita in Sanskrit, and the wise commentaries in many languages by respected spiritual people. Every Indian, from any walk of life, of any caste, region, or faith can go through it.

To give a broader glimpse of the ancient Hindu Scriptures, I also added a few Slokas from the Vedas, and more from a few of the major Upanishads. Then, I thought that by including some portions from the Ramcharitamanas, the most popular religious, literary creation of the Hindi belt of India, I would enrich it further. With these additions, I hope my collection is more complete.

The Vedas are the root books of all Hindu religious scriptures. The 108 Upanishads were basically integrated into the four Vedas. The Ramcharitamanas of Goswami Tulsidas, has taken the story from the earliest Sanskrit epic of Valmiki Ramayana.

The Rishis who created the Upanishads and then the Bhagavad Gita, and much later in history, Tulsidas with Ramcharitamanas, have each added their own perspectives on the spiritual path propounded in the four Vedas, about the Ultimate Reality. Through their own spiritual realisation, research and experiences they prepared these works to correct many perversions in social values that had come about in their own times in the name of the Vedas and other spiritual texts, largely because of the unlearned teachers and their undue, large influence in their contemporary societies, that eventually resulted in superstitions and other wrong practises in the name of religion due to incorrect interpretations by these social leaders.

Some of the Upanishads are in verse and some in prose. The entire Bhagavad Gita, in verse, is an evolution, I think. The scriptures evolved on the essence of the basic ideas of the key answers to the spiritual questions raised by brilliant seekers and answered by the ancient, wisest of saints and Rishis from the time of the Vedas and more importantly during the times of the Upanishads.

Many Slokas in the Gita are the same or similar, with only very small variations from the Upanishads. In Ramcharitamanas, some Dohas and chaupais are almost verbatim translations of the same core messages, with a small variation, of the essence of the Vedas, Upanishads, and then Bhagavad Gita. But the uniqueness of Ramcharitamanas is that it was written in the language of the common people from the part of the Indian subcontinent where Tulsidas was from – the Gangetic northern region. However, it has now spread all across the world through its many beautiful translations.

I hope it will be useful for my children and their friends in the US or elsewhere, who live far away from India where people of Indian origin, at large, are more and more getting educated in the English medium only. I am confident people will gradually get interested in spiritual knowledge too.alParticularly after reaching a stage in life, as we age, we start losing our interest in what we had been focused on during our ‘working years’, and yearn for some knowledge about something more than scientific/ professionally geared ‘knowledge’ that we work hard to gain over years.

I hope this collection will generate curiosity to gain more spiritual knowledge for everyone, of all ages, especially those that trace a part of their family tree to India, or are just interested in learning more about the great spiritual quest that the accomplished spiritual seekers and practitioners from the ancient times set off on.

Before I end this long introduction, I would like to emphasise that those verses that are not a part of this collection from the three most important scriptures, and the Ramcharitmanas, the story of Rama by Tulsidas, are of no lesser importance . I therefore appeal to those seriously interested, to go through such a journey on their own, and build a collection customized to their own selves, and to leave back a spiritual legacy.

For this collection, I intend to keep some blank pages at the end of the main sections, so that the readers that want to, can add some of their own selected slokas. I would love to get comments at my email regarding this and other thoughts, as you go through this : irsharma@gmail.com.

Note- This would have been finished last year itself. On request of adding meaning of words in English and Hindi, I could not. As I keeping on reading more and more on the subjects covering very wide horizon, I feel like editing and minor adding and subtracting all the time. I could not win over this temptation.

To your quest for knowledge.

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आइये कुछ नई तरह से इतिहास एवं आज को समझे- कुछ सोच, कुछ विचार

आइये कुछ नई तरह से इतिहास एवं आज को समझे- कुछ सोच, कुछ विचार

मेरे ब्रह्म मुहूर्त के अध्ययन मनन से कुछ नई सोच निकलती रहती है। ऋषि परशुराम को भी दशावतारों में एक माना जाता है। शायद वे सतयुग के थे पर त्रेता में भी दिखे। तभी तो राम से सीता के परिणय के लिये आयोजित धनुष भंग की प्रतियोगिता के आयोजन सभा में वे राम-लक्ष्मण से मिले। और धनुष तोड़ने वाले राम या लक्ष्मण पर अपनी क्रोधाग्नि बरसाईं और फिर समय की नाजुकता को समझ राम के अवतरित होने को मान देते हुए अपना धनुष दे विदा हो गये। पर शायद परशुराम को उनकी अन्दरूनी क्रोध और क्षमा भाव की हीनता एवं पिता की अनुचित आज्ञापालन कर अपनी जननी का बध करने के कारण उन्हें दूरदर्शी कवियों ने कोई स्थान नहीं दिया, न जनता ने उनको पूजा योग्य समझा, न उनका मन्दिर बना। परशुराम ब्रह्म नहीं माने जा सकते, क्योंकि ब्रह्म जातिवाद को नहीं मानता। उसकी लड़ाई किसी महान कार्य एवं एक न्याय संगत व्यवस्था बनाने के लिये होती है। अपनी ब्राह्मण शक्ति को दिखाने के लिये बना किसी अन्य उपायों को अपनाये ही क्षत्रिय राजाओं का परशुराम ने नरसंहार किया और उनके राज्यों को ब्राह्मणों को दे दिया। शायद वे पहले जातिवाद का प्रारंभ करनेवाले बने।और जिनको उन्होंने वे राज्य दिये, वे पहले लोगों से भी बुरे बन गये।अगर वे सबमें एक सबसे योग्य की तलाश करते और भारतवर्ष का राज्य दिये रहते चाणक्य की तरह, अखंड भारत की नींव डालने की कोशिश एवं सशक्त उत्तराधिकार की पद्धति छोड़ जाते तो शायद भारत ग़ुलाम नहीं बनता कभी। पर चाणक्य भी यह नहीं कर सके।चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ भी ऐसा हुआ अशोक के बाद।चाणक्य का अर्थशास्त्र भी कुछ समाधान नहीं कर सका।

द्वापर में भी परशुराम कर्ण के गुरू बने, यहाँ भी उनका वही क्रोध दिखता है, ब्राह्मण वाली दया, क्षमा उनमें थी ही नहीं; न वह ब्रह्मज्ञान था जिससे वे विद्यार्थी की चारित्रिक कमजोरी को शिष्य बनाने के पहले ही समझ सकने की शक्ति थी।ज्ञान देकर फिर श्राप देना तो समझ नहीं आता वह भी एक अवतार पुरूष ब्राह्मण का।

शायद परशुराम उन पाँचों महानों में हैं जिन्हें कुछ ग्रंथों ने अमर बताया है। पता नहीं तब क्यों नहीं वे कलियुग में आये, जब अपने देश में सबसे शक्तिशाली समझने वाले राजस्थान के राजपूत राजा एवं पंजाब की समर्थ सिख सम्प्रदाय केवल एकत्व के अभाव,अहंकार एवं आपसी द्वेष के चलते देश को विदेशी, इस्लामी, एक अंग्रेज कम्पनी को देश का मालिकाना थम्हा दिया। आक्रमणों और उसके परिणाम में देश को सदियों के लिये ग़ुलाम कर दिया। वहीं एक छोटे हिस्से के राणा प्रताप ने अकबर एवं शिवाजी ने आततायी औरंगजेब को कभी अपने पर हावी होने नहीं दिये। यहाँ भी शिवाजी के समर्थ गुरू थे उनकी शक्ति के पीछे, पर राणा प्रताप के साथ कोई चाणक्य नहीं मिला, हाँ भामासाह तो मिल गया। सदियों की ग़ुलामी के लिये सबसे ज़्यादा ब्राह्मण एवं क्षत्रिय ही ज़िम्मेदार रहे।

परशुराम से एक दम अलग थे राम …बचपन में वशिष्ठ से पूर्ण शास्त्र ज्ञान पाये उनके आश्रम में, और युवक होते ही विश्वामित्र से शस्त्र ज्ञान। करुण भाव कूट कूट भरा था बचपन से, सबके प्यारे बने। पर फिर आततायी मायावी ताड़का को मारने से भी नहीं झिझके ऋषियों के शान्ति के साथ ज्ञान की खोज में बाधक होने के कारण। आगे एक वर्षों की अज्ञानता के अंधकार में पड़ी अहिल्या को अपने सूक्ष्म ज्ञान से नया जीवन दिया। राजर्षि जनक और जनकपुर को सशक्त दामाद दे इज़्ज़त दी। पिता के धर्म विरूद्ध आदेश का भी सम्मान एवं श्रद्धा से पालन किया। तीनों माताओं को, चारों भाइयों को आदर्श इज्जत एवं प्यार दिया….सभी ज्ञानियों से ज्ञान लिया। अति पिछड़े वर्ग केवट, निसाद,कोल-भील, जटायु गिद्ध, बानर, भालू, और फिर रावण के ही भाई की सहायता ली, उन्हें भाइयों से भी बड़ा कहा, सभी संकटों के बावजूद कभी बनवास के शर्तों को नहीं तोड़ा.. और चौदह साल का लम्बा बनवास काट अयोध्या लौटने के पहले पूरा सात्विक साधुओं का जीवन जिया।युद्ध में तत्कालीन युद्ध धर्म के विरूद्ध में कुछ नहीं कहा। गृहस्थ जीवन में एक आदर्श भाई, पति, पुत्र, राजा का वैदिक धर्म के अनुसार व्यवहार किया और फिर एक पत्नी, एवं दो पुत्रों के पिता बन आदर्श स्थापित किया।
एक आश्चर्य की बात ज़रूर नज़र आती कि किसी स्वजातीय शक्तिशाली राजा ने उनके रावण के विरूद्ध धर्मयुद्ध में मदद नहीं की। शायद इसीलिये स्वयंवर में राजा जनक ने पूरे वीरों में किसी से जब वह शिव धनुष नहीं टूटा, यहां तक की हिला भी नहीं तो सबको सुना ‘बीर विहीन धरा मैं जानी’ कह दिया। और क्षत्रिय राजाओं का यही समाज एवं देश के दुश्मनों के विरूद्ध एक न हो पूरे देश को सदियों ग़ुलाम बना रखा।

मेरी राय में मौर्य साम्राज्य के चंद्रगुप्त,अशोक और बाद गुप्त काल के प्रसिद्ध राजा, फिर हर्षवर्धन, राजा कृष्णदेव राय ने राजा राम को ही आदर्श मान कर राज्य का विस्तार किया और प्रसिद्धि पाई। और हाँ चाणक्य की तरह भारत को एक अखंड साम्राज्य का पथ दिखानेवाले भी नहीं मिले। ब्राह्मणों से ब्राह्मण ज्ञान एवं शक्ति जाती रही थी एवं आज की तरह वे सभी दैवी सम्पदा को छोड़ असुरी सम्पदा में आनन्द लेने लगे और यह आकर्षण बढ़ता गया समय के साथ आजतक।

समय के साथ राज्य बंटते गये, छोटे होते गये, अनगिनत रानियाँ, जायज़ एवं नाजायज बच्चे, राज धर्म के रास्ते से हट अशिक्षित पंडितों के बताये अवैज्ञानिक शास्त्रों एवं कर्मकांडों को बढ़ावा, घड़ी लग्न के पचड़े में पड़ ये सभी राजा नपुंसक एवं स्वार्थी एवं देशद्रोही बनते गये। बहुत जयचन्द, शक्ति सिंह बन गये, मिल कर युद्ध न कर आततायियों से मिल गये, अपनी बेटी बहनों को उनको दे राज दरबार में बड़े बड़े ओहदे लेने में लगे रहे और विधर्मी बादशाहों के मंदिरों, मूर्तियों को तोड़ने में सह देते गये।
आज भी स्वतंत्रता के बाद देश में हज़ारों राजनीतिक दल बन गये हैं। इनमें एक दो को छोड़ सभी पर किसी न किसी परिवार का मालिकाना है। कैसे बचेगा यह प्रजातंत्र जहां ५०० रूपये पर वोट बिकते हैं,जब शिक्षक, डाक्टर केवल पैसे कमाने की सोच में अपने धर्म एवं कर्म को छोड़ कुछ भी करने को तैयार हैं। कहीं कोई असहायों, वृद्धों के प्रति दया भाव नहीं दिखता, न सहायता में लोग आगे आते हैं। परिवार तो टूट ही गया पूरी तरह से। हम मनुष्य का रास्ता छोड़ पशु, पक्षियों के रास्ते पर बढ़ते जाते हैं। बन, जंगल, पेड़, पौधों को नष्ट धन इकट्ठा करने में लग गये। पशुओं की सैकड़ों प्रजातियाँ को अपनी लिप्सा का शिकार बनाते गये और और उसका दंड पूरे देश को मिल रहा प्राकृतिक विपदाओं के रूप में।


कौन कब नई पीढ़ी के लिये कोई राम पैदा करेगा यह देश असुरों की बढ़ती संख्या का विनाश के लिये इस पवित्र धरती पर सत्य पर आधारित प्रजातंत्र को स्थापित करने के लिये। कब कोई शंकराचार्य आयेंगे फिर से ऋषियों के प्रतिपादित वेदान्त को जन जन तक फैलाने के लिये और लोगों को अविद्या एवं विद्या एक साथ अध्ययन करने किये। समाज के सभी वर्गों के विभेद को नष्ट कर ब्राह्मण ज्ञान दे एकत्व का पाठ पढ़ाने के लिये और सत् आचरण की ज़रूरत और उसमें श्रद्धा जगाने के लिये हिन्दू वर्ग में फैले ग़लत मूल्यों का विनाश करने के लिये। बतायें कोई आशा है? क्या दीपावली के दिये राष्ट्र को प्रकाश में ला सकते हैं आज की बढ़ती राजनीतिक कुप्रभावों से?
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥४.७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४.८॥

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Akbar- The Great and his Greatness?

Akbar- The Great and his Greatness?
Yesterday I was reading the introduction of a book the English translation of an Indian scholar – Madhusudan Sarswati’s commentary of ‘The Bhagavad-Gita with the Annotation ‘Gudhartha Dipika’. It was translated by well-known Swami Gambhirananda. I found an interesting story about Madhusudan Saraswati related to his meeting Akbar, the Great: Prof J. N. Farquhar recorded this historically important event at Benares in Akbar Era in an article, ‘The Organizations of the Sannayasins of Vedanta’ in the Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, July 1925 (pages 479-86):
One of the notorious practices of Muslim priests, as good Muslims, was to frequently attack and kill the Hindus lay and monastic, especially at pilgrim centres such as Benares. Those priests were protected by a faulty law that exempted them from any legal punishment! So the hapless Hindus approached Madhusudan to do something to stop this injustice. Since Madhusudan was well known at the durbar of Emperor Akbar (who ruled between 1556-1605), he met the Emperor though Raja Birbal and narrated to him the religious atrocities at Benares. As a solution, the Emperor suggested that Madhusudan should organise a militant band of sannyasins to defend Hinduism and its followers. At the same time, he promulgated a law that henceforth protected the Hindu sannyasins too, like the Muslim priests, who were outside the purview of legal action. Thus was born at the hands of Madhusudan, the much respected, and feared Naga sect of Vedantic sannayasins. The recruits were mostly from the Kshatriya caste. They lived in monasteries called Akhadas, and were trained in the martial arts.

Now, with that sort of highly discriminatory law, would not have Akbar, called ‘The Great’ would have banned the law rather than giving the same ease for a religious group of Hindus created on his suggestion to be at war with the people of the other major religion freedom for religious killings and tortures instead of taking legal path. Can an Emperor who suggest such criminal acts be called ‘Great’ even by mistake? Will some friends interested in history let me enrich my knowledge why did our historian call him Great to make equal in rank with Ashoka?
अकबर- महान और उसकी महानता
कल मैं अकबर काल के एक भारतीय विद्वान मधुसूदन सरस्वती द्वारा किये भगवद् गीता के भाष्य ‘गूढ़ार्थ दीपिका’ के अंग्रेज़ी अनुवाद में दी गई विस्तृत भूमिका पढ़ रहा था। यह अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रसिद्ध स्वामी गंभीरानन्द द्वारा किया गया है। ये विवेकानन्द परम्परा के हैं। इन्होंने ही आदि शंकराचार्य के ८वीं शताब्दी में किये सबसे पहले भगवद् गीता के संस्कृत भाष्य का भी बहुत ही सुन्दर अंग्रेज़ी में भी अनुवाद किया है। मधुसूदन सरस्वती के भाष्य को शंकराचार्य के बाद का सबसे अच्छा भाष्य माना जाना जाता है।
मधुसूदन सरस्वती का काल १५९०- १६९७ ई. माना जाता है। भूमिका में एक ऐतिहासिक लेख से लिया अंश भी है। इसमें मुझे मधुसूदन सरस्वती के बारे में उनकी अकबर, महान से मुलाकात से संबंधित एक दिलचस्प कहानी मिली: प्रोफेसर जेएन फ़रक्वार ने इस ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण घटना को अकबर काल के बनारस में होते हिन्दू विद्वानों एवं भक्तों की धार्मिक स्थानों में मुसलमानों के धार्मिक तथाकथित मुल्लाओं के सह पर किये अत्याचार का वाक़यों के बारे में अपने एक लेख में बताया गया है। उनका यह लेख,’जर्नल ऑफ़ द बॉम्बे ब्रांच की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’ के जुलाई १९२५ अंक के पृष्ठ ४७९-८६ पेज पर है।
‘अच्छे मुसलमानों के रूप में मुस्लिम पुजारियों की कुख्यात प्रथाओं में से एक था, हिंदु पुजारियों एवं मठवासियों पर हमला करना और उन्हें मार डालना, विशेष रूप से बनारस जैसे तीर्थस्थलों में । उन मुस्लिम मुल्लाओं को एक दोषपूर्ण कानून द्वारा संरक्षित किया गया था जो उन्हें किसी भी कानूनी सजा से छूट देता था! असहाय हिंदुओं ने इस अन्याय को रोकने के लिए कुछ करने के लिए मधुसूदन से संपर्क किया, चूंकि मधुसूदन का सम्राट अकबर (जिन्होंने 1556-1605 के बीच शासन किया था) के दरबार में आना जाना था, वे राजा बीरबल के माध्यम से सम्राट से मिले और उन्हें बनारस में धार्मिक अत्याचारों के बारे में बताया। एक समाधान के रूप में, सम्राट ने सुझाव दिया और अमल किया वह आश्चर्यचकित किया मुझे। अकबर ने मधुसूदन सरस्वती को हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों की रक्षा के लिए अपने संन्यासियों के एक हथियार बन्द दल गठित करने को कहा। साथ ही, उन्होंने एक कानून की व्यवस्था की जो आगे इस हिंदू संन्यासियों को भी वैसी ही रक्षा प्रदान करता था, जैसा क़ानून मुस्लिम पुजारी को कानूनी कार्रवाई के दायरे से बाहर रखता था अपराध के बाद। इस प्रकार मधुसूदन के हाथों संगठित हुआ वेदांती संन्यासियों में हथियारबन्द नागा संप्रदाय। इस उस समय ज्यादातर क्षत्रिय जाति के लोग इसमें लिये गये थे। वे अखाड़ा नामक मठों में रहते थे, और उन्हें मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित किया गया था।
अब, उस तरह के अत्यधिक भेदभावपूर्ण कानून के साथ, अकबर, जिसे ‘द ग्रेट’ कहा जाता है, एक वर्ग के लोगों के साथ दूसरे वर्ग द्वारा हिंसक बर्ताव को बन्द करने के लिये पुराने क़ानून को बदल नहीं सके किस कारण, बल्कि हिन्दुओं को बदला लेने के लिये हिंसा कर मुक्त रहने का रास्ता खोल दिया और दोनों धर्म के लोगों में बैर भाव को आग देने का क़ानून बना दिया। कैसे महान करानेवाला सम्राट ऐसा कर सकता है। पर हमारे वामपंथी इतिहासकार अकबर ही नहीं अन्य मुग़लों की धार्मिक क्रूरता की कभी निन्दा नहीं किये। क्या इस तरह के आपराधिक कृत्यों का सुझाव देने वाले सम्राट को गलती से भी ‘महान’ कहा जा सकता है? क्या इतिहास में रुचि रखने वाले कुछ मित्र मुझे अपने ज्ञान को समृद्ध करने में मदद देंगे, हमारे इतिहासकार ने उन्हें अशोक के साथ बराबरी करने के लिए महान क्यों कहा? वैसे सर यदुनाथ सरकार ने नागा साधुओं के प्रारम्भ के बारे में इन्हीं बातों का उल्लेख किया है।
The article of Prof. J. N. Farquhar ‘ The Organizations of the Sannayasins of Vedanta in the Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, July 1925 (pages 479-86).

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