सोनिया परिवार की यह अवस्था और कारण

आज अपने को पंडित नेहरू का वारिस कहनेवाली सोनिया परिवार की गिरती या गिरी हालत देख बहुत दुख होता है।

सोनिया गांधी का भारतीय बनकर रहना उनकी मजबूरी थी, पर वे वैधानिक रूप से विदेशी मूल की होने के कारण खुद प्रधानमंत्री बन नहीं सकती थीं। उसके बाद भी वे भारत की संस्कृति से कुछ सीख सकतीं थीं, पर वे नहीं सिखी। शायद राजीव गांधी भी नहीं सीख सके, पाइलट की तरह काम करते हुए प्रसन्न थे।
इन्दिरा गांधी भी शायद नहीं सिखी थी, जो राजीव और संजय को कुछ सिखाती। उनकी माँ कमला गांधी तो उनके बचपन में ही मर चुकी थी, शायद वह कारण रहा होगा। या शायद उनकी वैसे बनने का कारण, उनका दूसरे धर्म के व्यक्ति को जीवनसाथी बनाना और उनके प्रभाव के कारण हो।

इन्दिरा गांधी को जो सम्मान बांग्लादेश बनाने का दिया जाता है, वह भी शायद ठीक नहीं है। उनके पहले लाल बहादुर शास्त्री पाकिस्तान को सीख दे चुके थे और उनके बाद के अटल बिहारी बाजपेयी ने भी दिया।

इन्दिरा गांधी की क्षत्र छाया में संजय गांधी ने जो किया और फिर चुनाव हारने बाद आपातकालीन क़ानून लगा कर उन्होंने किया, वह किसी तरह शोभनीय नहीं हो सकता है। फिर इंदिरा गांधी ने जो स्वर्ण मन्दिर में रहते हुए विद्रोही सिखों के लिये स्वर्ण मन्दिर पर गोलाबारी का रास्ता अपनाया, वह भी ठीक नहीं था। उसका फल हुआ उनके सुरक्षा में तैनात लोगों ने ही उनको मार डाला । वहीं से चालू हुआ परिवार वाद का क्रम। संजय गांधी अपने कमज़ोरियाँ के कारण मरे, राजीव गांधी जो वायुयान चालक थे प्रधानमंत्री बना दिये गये और प्रणव मुखर्जी की तरह योग्य आदमी को दर किनार कर दिया गया। पर राजीव गांधी की अपनी अपरिपक्व नीति के कारण जघन्य तरीक़े से हत्या हुई।

फिर अटलबिहारी बाजपेयी को एक वोट से हरा कर हुए चुनाव में काँग्रेस तो जीत गई पर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन पाई और आश्चर्य की बात है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर सरकार की पूरी बागडोर अपने हाथ में ही रखी। मनमोहन सिंह मजबूरी में कठपुतली बने देखते रहे।

उसी समय सोनिया गांधी अगर पांच साल बाद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनवा देती जो शायद संभव था, राहुल गांधी की तमन्ना पूरी हो जाती। पर या तो राहुल गांधी की कामयाबी पर उस समय भी सोनिया गांधी को भरोसा नहीं था या वे अपनी सत्ता छोड़ना नहीं चाहती थी।

आजके दिन राहुल गांधी प्रतिपक्ष के नेता हैं और प्रधानमंत्री बनने की अदम्य ख़्वाहिश रखते हैं। पर देश की उनकी सहयोगी दलों की डगमगाती सहमति के कारण अकेले होते गये हैं। राजनीतिक परिपक्वता का तो शायद पूर्ण अभाव है। लोक सभा में खड़े होते ही लगता है कि वे बड़े ग़ुस्से में हैं और शायद वही भाव उनके शब्दों और भावों में झलकने लगता है।

उधर नरेन्द्र मोदी पंद्रह साल तक गुजरात के देश के सफल मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी योग्यता के बल पर भारतीय जनता पार्टी के लिये सिरमौर बन गये हैं और प्रधानमंत्री की तरह तीव्र गति से बदलते भारत की समृद्धि और शक्ति के प्रभाव के कारण दुनिया भर में सम्मान से देखे जाने लगे हैं। भारत हर क्षेत्र में दिन दुगनी और रात चौगुनी की रफ़्तार आगे बढ़ रहा है।

पर दुख की बात है कि पड़ोसी पाकिस्तान और चीन तो पहले से भारत के दुश्मन रहें हैं, अब अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प के अद्भुत और विकृत समझ में न आनेवाले व्यवहार के कारण भारत की प्रगति को बनाये रखने के लिये एक नई जटिल समस्या आ गई है।

अमरीका के कुछ अजीबोग़रीब मानसिकता वाले अर्द्ध सरकारी संगठनों और कुछ अकूत धनी उद्योगपतियों के इशारे पर गांधी परिवार और कुछ सिरफिरे असफल नेताओं को अपनी तरफ कर, और नई पीठी के राजनीतिक मानसिकता वाले कुछ साधारण धूर्त नवयुवक अपने को नेता घोषित कर ( तिलचट्टे पार्टी) लोगों को गुमराह कर रहे हैं। ये सभी एकजुट हो देश के विदेशी दुश्मनों का साथ दे रहे हैं। लोकप्रिय मोदी सरकार के खिलाफ कभी किसी एक व्यक्ति विशेष फिर दूसरे व्यक्ति को हटवाने के हिंसक आन्दोलन कर रहे हैं।
जबसे मोदी ने ‘विकसित भारत २०४७’ का नारा और उसके लिये नये नये विश्वस्तरीय कार्यों का आरंभ कर रहे हैं, तब से गांधी परिवार के तीनों सदस्य और वौखला गये हैं। उपरोक्त कार्यक्रमों में उनका साथ दे रहे है।इन नये नये घातक कारनामों से आन्दोलन में पूरा अमरीकी सह है, वहां से बड़ी धनराशि आ रही है इस के लिये। इन तरीक़ों से देश के बहुत जगहों पर गड़बड़ी और हिंसात्मक पुरज़ोर प्रयास किया जा रहा है।अमरीका विशेष वहाँ के आज के सिरफिरा नेतृत्व भारत मूल के लोगों के कमजोर वर्ग के लिये अमरीका तरह तरह के बहानों से तकलीफ़ खड़ा कर रहा है और वीसा आदि दर बढ़ा उनको तंग कर रहा है। हो सकता है कि राहुलजी प्रिय सैम पित्रोदा जी आजकल यही कर रहे हैं।

लगता है इन तामसी, आसुरी, राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों के बढ़ते अत्याचारों से प्रभावित हो, उनको नष्ट करने के लिये और सनातन धार्मिकता का रास्ता साफ करने के लिये एक बार फिर पुरुषोत्तम राम या कृष्ण की तरह के अवतार हो, यह उन्होंने आश्वासन दिया था-
“जब जब होई धर्म कै हानी। बाढहि असुर अधम अभिमानी । करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। … तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥”
भगवान कृष्ण गीता में कहे थे-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि भवति भारत।
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तथातमानम् सृजामि अहम्॥ ४- ७.८॥

The Sonia Gandhi Family: Its Present Condition and the Reasons Behind It

It is deeply saddening to see the declining political fortunes of the Sonia Gandhi family, which today claims the legacy of Pandit Jawaharlal Nehru.

For Sonia Gandhi, becoming an Indian citizen and making India her home was a matter shaped by her circumstances. However, her foreign origin did not, by itself, constitutionally disqualify her from becoming Prime Minister. Nevertheless, she chose not to occupy that office. Even so, one might have expected her to learn more about Indian culture and traditions, but it appears that she did not make sufficient efforts in this direction. Perhaps Rajiv Gandhi, too, did not develop a deep understanding of Indian culture and politics. He seemed more comfortable and content in his earlier profession as a pilot.

Indira Gandhi, too, perhaps did not develop a sufficiently deep understanding of Indian traditions and culture. She was unable to provide Rajiv and Sanjay Gandhi with adequate guidance in this regard. Her mother, Kamala Nehru, died when Indira was still a child. It is possible that this loss influenced her personality. However, a person’s outlook and behaviour are shaped by many factors, and it would not be appropriate to attribute them to any single cause.

The credit given to Indira Gandhi for the creation of Bangladesh should also be examined in its wider historical context. Before her, Lal Bahadur Shastri had firmly confronted Pakistan during the 1965 war. Later, Atal Bihari Vajpayee also adopted a strong position against Pakistan. The achievements of every Prime Minister should be evaluated in light of the circumstances of the time and the results achieved.

Under Indira Gandhi’s protection and influence, Sanjay Gandhi played a controversial role during the Emergency. His actions raised serious questions when judged against democratic values. The experience of the Emergency, which ended after the 1977 elections, left a deep scar on Indian democracy.

Later, Indira Gandhi’s government chose military action to remove armed extremists who had taken refuge in the Golden Temple complex. This operation had grave religious and political consequences. Eventually, in 1984, two members of her own security detail assassinated her. The event marked a new chapter in the political history of the Gandhi family.

Sanjay Gandhi died in an aircraft accident. After his death, Rajiv Gandhi, who had been a professional pilot, entered politics and eventually became Prime Minister. In this process, the role of experienced and capable leaders such as Pranab Mukherjee became comparatively limited. Rajiv Gandhi’s tenure witnessed several important decisions, but some of his government’s policies and political choices also generated serious controversy. He was assassinated in a suicide bombing in 1991.

In the 2004 general election, the Congress-led alliance won. The government led by Atal Bihari Vajpayee lost power. Sonia Gandhi’s decision not to become Prime Minister attracted considerable public discussion at the time. Dr Manmohan Singh subsequently became Prime Minister. Critics argued that a substantial share of political power remained with Sonia Gandhi and that Manmohan Singh’s freedom to act independently as Prime Minister was limited. On the other hand, his supporters point to economic growth and other achievements during his tenure.

Had Sonia Gandhi chosen to promote Rahul Gandhi for the post of Prime Minister five years later, his political ambition might perhaps have been fulfilled. But it is also possible that she did not have sufficient confidence in his leadership abilities, or that she wished to retain her own influence over the government. These are political interpretations, and it is difficult to establish them with certainty.

Today, Rahul Gandhi is the Leader of the Opposition in the Lok Sabha and aspires to become Prime Minister. However, differences among the parties in the opposition alliance, as well as disagreements over leadership, have made his position challenging. Questions have also been raised about his political maturity and leadership style. At times, his speeches in the Lok Sabha convey an aggressive tone, and his words and body language may reflect frustration. Nevertheless, a leader’s abilities should be assessed not only through speeches but also through policies, organisational skills, and political results.

On the other hand, Narendra Modi served as Chief Minister of Gujarat for approximately twelve and a half years. During this period, he established his political identity at the national level and became one of the leading figures in the Bharatiya Janata Party. Since becoming Prime Minister in 2014, his government has launched important initiatives in infrastructure, digital services, manufacturing, defence production, and international relations. India’s efforts to strengthen its economic and strategic capabilities have also increased its importance on the international stage. At the same time, the country’s progress must continue to be assessed against measurable indicators such as economic growth, employment, and social welfare.

Unfortunately, India has long faced serious strategic challenges involving Pakistan and China. Now, the unpredictable policies and changing positions of US President Donald Trump have created additional complexities in India’s international relations. Under these circumstances, India must pursue a balanced and far-sighted foreign policy while firmly protecting its national interests.

Foreign influence, economic interests, and political competition have also become subjects of debate in India’s domestic politics. Some people allege that foreign organisations, influential industrialists, and political groups attempt to influence Indian politics through their connections and resources. The role of certain opposition leaders and emerging political groups has also been controversial. However, such allegations should be accepted only when supported by evidence. Accusations that an organisation or individual receives foreign funding, participates in activities against the country, or incites violence require concrete proof.

Protests against Prime Minister Modi’s government must also be viewed in this context. In a democracy, criticism of the government and the right to peaceful protest are essential. However, violence, damage to public property, and violations of the law cannot be justified. Both the government and the opposition have a responsibility to respect democratic principles and institutions.

The goal of Viksit Bharat 2047 expresses India’s aspiration to become a developed nation by the centenary of its independence. Achieving this objective will require sustained efforts in manufacturing, scientific research, education, healthcare, employment, defence production, and technological innovation. These efforts must place national interests above political differences.

Visa policies, immigration regulations, and administrative decisions in the United States are also important for people of Indian origin living there. Changes in American policy can affect Indian professionals, students, and families. India must therefore make effective diplomatic efforts to protect the interests of its citizens and overseas community. The role of Sam Pitroda and other individuals may be debated politically, but conclusions about anyone’s intentions should be based on reliable facts.

Ultimately, Indian culture and religious traditions teach us that however powerful unrighteousness, injustice, and arrogance may appear, they must be resisted. The ideals embodied by Lord Rama and Lord Krishna in the Sanatana tradition reinforce the principles of protecting righteousness, helping the virtuous, and opposing injustice.

In the Ramcharitmanas, Goswami Tulsidas expresses the purpose of divine incarnation in the following words:

“Whenever righteousness declines,
And arrogant, wicked forces rise;
When injustice grows beyond description,
The Lord assumes different forms,
And relieves the suffering of the virtuous.”

Similarly, in Chapter Four of the Bhagavad Gita, Lord Krishna declares:

“Whenever there is a decline in righteousness, O Bharata,
And a rise in unrighteousness, I manifest Myself.” (4.7)

“For the protection of the virtuous, the destruction of evildoers,
And the establishment of righteousness, I appear age after age.” (4.😎

The essential message of these verses is that when righteousness declines and unrighteousness increases, the restoration of dharma becomes necessary. This message need not be understood solely as a promise to await a divine incarnation. It can also inspire us to follow the path of truth, justice, morality, and duty.

India’s true strength lies in its democratic institutions, cultural heritage, scientific capabilities, economic progress, and informed citizens. To make the country developed and powerful, its leaders must rise above personal ambitions and political rivalries and give priority to national interests, ethical conduct, and public welfare.

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राम चरित मानस: एक मित्र को लिखा पत्र

राम चरित मानस: एक मित्र को लिखा पत्र

राम-सीता (पुरुष-प्रकृति, परमात्मा- माया)
एक दिन आपकों सीता के बारे में कुछ कहा था। आपने मुझे रामायन के उन अंशों को उद्धृत करने को कहा था। मुझे अब याद नहीं रहता। मैं उन अंशों उदृत कर कर भेज रहा हूँ ।

पुरुष और प्रकृति
रामचरितमानस (बालकाण्ड के मंगलाचरण से)
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥5॥

उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥5

२ शिव पार्वती जनकपुर की वाटिका में सीता का उमा का वन्दन-

नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥4॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥4॥

अयोध्या कांड वाल्मिकी की सीता-राम का स्वागत भाषण
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।

गीता में भगवान कृष्ण ने चौथे अध्याय की शुरुआत में श्लोक है-

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥४.६॥

अजः अपि सन् अव्यय-आत्मा भूतानाम् ईश्वरः अपि सन् ।
प्रकृतिम् स्वाम् अधिष्ठाय सम्भवामि आत्म-मायया ॥४.६॥

मैं अजन्मा और अविनाशी रूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके योगमाया से प्रकट हूँ । अपरा प्रकृति और परा प्रकृति का विवरण अध्याय ७ में आया है-

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥७.४॥

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आकाश, मन (पांच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ), बुद्धि और अहंकार यह मेरी आठ रूपों में विभक्त हुई प्रकृति है ।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥७.५॥

 अर्जुन ! यह (आठ प्रकार की प्रकृति) अपरा प्रकृति है; किन्तु इससे भिन्न मेरी परा प्रकृति है जो जीवों का रूप धारण करती है और जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है, उसे तू जान ।

गीता के अध्याय १५ पुरुषोत्तम योग के श्लोक १६, १७, और १८ में क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम को इस तरह अलग अलग बतलाया गया है।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१५.१६॥

-इस संसार में नाशवान् और अविनाशी भी ये दो प्रकार के पुरुष है। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी है।

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१५.१७॥

इन दोनों में उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका भरण पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा कहा गया है।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥१५.१८॥

क्योंकि मैं नाशवान क्षर-शरीर से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।

प्रकृति को गीता और तुलसीदास जी माया भी कहते हैं और सभी कुछ करने में प्रकृति और उसकी माया का ही हाथ होता है।

अपने धर्म ग्रंथों को अच्छे व्याख्यों की सहायता पढ़ कर थोड़ी अच्छी समझ तो आ जाती पर कुछ गहरे में जाने के लिये भगवान की कृपा या योग- कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्ति योग को गहरे समझ कर और अभ्यास कर ही सफलता मिलती है।

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देश के आज की शिक्षा व्यवस्था

आज के दिन मुझे दक्षिण भारत का पता नहीं पर उत्तर के हिन्दी प्रदेशों में सब सरकारी स्कूल और कालेज बन्द होते जा रहे हैं। आज के गरीब- अमीर सभी बच्चे प्राइवेट स्कूलों और ट्यूशन पर ही निर्भर हैं अपनी अपनी अगले पायदान की शिक्षा के लिये। सभी तरह के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिये बच्चे व्यवसायिक स्तर पर चलाये जानेवाले सभी तरह के फ़ीस वाले कोचिंग सेंटरों में दाख़िल हो और पढ़ाई करने के हावी होते जाते हैं। अभिभावक कोचिंग और अंग्रेज़ी माध्यम से ही अपने बच्चों को पढ़ा किसी भी इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या मेडिकल कालेजों में भर्ती के लिये आश्रित हैं। अधिकांश पढ़ानेवाले सरकारी स्कूल के अच्छे अध्यापक ही हैं, जो अपने स्कूल में गैरहाजिर हो, कोचिंग सेन्टर में कुछ घंटे पढ़ा रहे हैं और अच्छी ख़ासी कमाई कर रहें हैं।

बिहार में न स्कूल चलते हैं, न कालेज- विशेषकर सरकारी और यहां तक की बिहार सरकार के भी।यह मेरा अपना अनुभव है बिहार का, क्योंकि मैं बिहार में पैदा हुआ था और चार-पांच कक्षा तक पढ़ा भी।

संजीव बंगाल के प्रसिद्ध परिवार के हैं और विद्वान और भारत सरकार और मोदी सरकार आर्थिक सलाहकारों में हैं।
Sanjeev Sanyal on Education Crisis, Coaching Mafia, Youth Anger, Taxes, AI & Economy https://youtu.be/VVGPauwLVJ4?si=VURpfFaZFxccGMjo

सभी राज्यों में शिक्षा पर किया गया खर्चा अनर्थ है। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के नीचे से ऊपर के सभी कर्मचारी इसमें चोरी छिपे लगे हैं। क्यों नहीं उन सब संस्कारी शिक्षा संस्थानों को बन्द कर दिया जाये। केन्द्र सरकार भी इस राज्य सरकार के दायित्व में आते विभाग के बारे में चाहने पर भी कुछ भी बदलाव करने में अक्षम है।

दूसरे ऐसी स्थिति में तो सबसे निचले आमदनी वाले वर्ग के बच्चे तो शिक्षा प्रणाली के बाहर ही रहेंगे। जब पंचायतें सरकारी स्कूल चलातीं हैं और शिक्षकों की बहाली करतीं हैं और सभी भर्ती एक धनराशि खर्च कर होता हैं, फिर शिक्षकों की गुणवताकैसे रहेगी। स्कूल को चलाने की सब सरकारी व्यवस्थाएँ में धन का भी इसी तरह दुरुपयोग होता कहा जायेगा।

केन्द्र सरकार इसमें हस्तक्षेप कर ही नहीं सकती विशेषकर अगर दूसरे राजनीतिक दल की सरकार उस राज्य में है। बहुत सारे स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब बनवाये गये हैं, हुनर सिखाने के लिये, हाथ का काम सीखने के लिये, पर कितने में अच्छे योग्य सिखानेवाले हैं पता नहीं। अगर शिक्षक अनुभवी अपने विषय का ज्ञानी नहीं हो ऊपर से निष्ठा भी नहीं हो तो कितना और क्या सिखाया पायेगा, बच्चे बच्चियों को?

झोपड़ी से लेकर सम्पन्न परिवारों तक अगर सब विदेशी भाषा, विदेशी आचरण, विदेशी संगीत, विदेशी त्योहारों का बोलबाला होता जा रहा है, तो कैसे बचेगी भारतीयता की पहचान और हम केवल दूसरे की नक़ल करते रहेंगे और उनसे निर्यात। अगर मैं गलत होता तो कैसे बनारसी ओर कांजीवरम साड़ियों की जगह चीन से आती नक़ली सस्ती साड़ियाँ बाजारों में बिकती या हमारे भगवानों की गणेश लक्ष्मी की मूर्तियां।

मेरे विचार से भारतीय एकता को बनाये रखने के अब तक के अनुभवों को देखते हुए हमें केन्द्रीय विद्यालयों के मानदंडों को दुनिया का सर्वोत्तम बनाये रखते हुए सभी प्रदेशों में जनसंख्या के आधार केन्द्रीय विद्यालयों को उपलब्ध करा देने चाहिये आई. आई. टी की तरह और वे सभी इन्जीनियरिंग, मेडिकल, आई.आई, एम के लिये किये गये परीक्षाओं के लिये जरूरी पढ़ाई का भी ख़याल रखें।

मोबाइल फोन पर उपलब्ध प्रिण्ट मीडिया या सोशल मीडिया के दुरुपयोग के रोकना के उपायों को खोजना ज़रूरी है जिसके अभिशापों के बुरे प्रभावों को सरकार के सिवाय कोई नहीं रोक सकता। देश की नई पीढ़ियों को बचाना देश के लिये जरूरी है।अगर हम इसके लिये तैयार नहीं तो भगवान मालिक….

बिहार में कोचिंग के कुछ रूप और फिर ..

  1. Earlier Bihar Model of coaching centre- Super 30,
  1. Sasaram Railway Station version of group coaching
    और फिर आया खान सर का कोचिंग जहां लाखों या करोड़ों में कमाई भी की जाती है और खान सर की भाषा पर क्या कहें जो मैंने यूट्यूब पर सुनी है।

फिर मोदी जी का तरीका
Modi’s action of Universal Coaching- SATHEE (Self-Assessment, Test and Help for Entrance Examination), developed by the Ministry of Education in collaboration with IIT Kanpur. It provides free video lectures, mock tests, and doubt resolution for exams like JEE, NEET, SSC, CUET, and ICAR in multiple regional languages.

आज भारत के गरीब से गरीब के घरों में और विशेषकर हर पुरुषों, महिलाओं बच्चों के हाथ में दिखता है मोबाइल फोन जिससे कोई महान भी बन सकता है, महा बदमाश, पढ़ाई भी कर सकता और हर तरह गलत आचरणों के रीलों से पूरी ज़िन्दगी बिगाड़ सकता है।

क्या होगा ऐसी स्थिति में नई पीढ़ियों का देश के प्रगति में हाथ या उसे रोकने वाले कर्म …भगवान मालिक

पर हम ८७ साल की में क्या कहे। क्या मोदी जी इस बाधा को पार कर यह चरितार्थ कर देंगे कि ‘ मोदी है तो मुमकिन है’ या राहुल गांधी का केवल अपने को प्रधानमंत्री बनाने का या किसी दाम पर बनने का सपना साकार हो जायेगा, चाहे देश फिर ग़ुलाम हो जाये और कभी भी विकसित भारत न बन सकें।
आप सभी अनुरोध है भाषा शुद्ध कर लीजिये, सुनिये कुछ करिये सभी मिलकर क्योंकि ‘ जननी जन्मभूमि तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ यह हमारे महान पूर्वजों की चाहना थी अपनी संतानों से …
क्या कोई मेरे को बड़े प्लैटफ़ॉर्म से जाता लोगों तक पहुँचा सकता है?

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आज की कविता

जीवन का अन्तिम यह कालखंड
कुछ बात पते की कहना है
मैं क्या जाना या क्या समझा?
क्या कहूँ कि जीवन क्या होता
क्या जीवन एक भ्रम मुश्किल सा
या बहुत सरल यह कहानी सा ।
होता है प्रारंभ एक शून्य से जो
हर समय कुछ जुड़ता रहता है
पर साथ भी घटता रहता कुछ
कोई आता है कोई जाता है
कुछ खोता है फिर कुछ मिल जाता।
फिर गुणा भाग भी देखा हूँ
एक में बढ़ना एक में घटना ।
पर अन्त तो आना है निश्चित
इससे कोई न बच पाया।
शून्य शुरू भी अन्त भी है
कुछ शून्य को अनन्त समझते
है अनन्त शुरू अनन्त अन्त ।
क्या सत्य जानना है मुश्किल
आजतक का अनुभव तो यही रहा
गर कुछ बदल गया जाते जाते
तो शायद बतला कर जाऊँ ।

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कुछ आध्यात्मिक विचार

२.८.२०२६
आज सबेरे मेरे पाठ में यह नीचे का श्लोक आ गया,जो दुनिया के सब बाल, युवा, गृहस्थ, वृद्ध के लिये सबके लिये उपयुक्त है। कृपया पढ़े, समझे पढ़ायें।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥५.२९॥
भोक्तारम् यज्ञ-तपसाम् सर्व-लोक-महेश्वरम् ।
सुहृदम् सर्व-भूतानाम् ज्ञात्वा मां शान्तिम् ऋच्छति ॥
मुझे यज्ञ और तपस्याओं का भोक्ता, समस्त लोकों का बलशाली ईश्वर, समस्त प्राणियों का मित्र जानकर मनुष्य शान्ति को प्राप्त होता है ।

स्वामी रामसुखदास के किये गीता की मेरे सबसे अच्छी व्याख्या में उन्होंने यह लिखा है-

भगवान सभी भक्तों के द्वारा होनेवाली सभी क्रियाओं के भोक्ता भी है (९.२७)। भक्तों के प्रेम के भोक्ता भी भगवान ही हैं। कोई किसी को श्रद्धा से नमस्कार करता है तो उसके भोक्ता भी भगवान ही हैं, क्योंकि सबमें में तो वही विराज मान है। कोई किसी अपने देवता की पूजन करता है तो उसके भी भी वही हैं। सम्पूर्ण संसार के कण-कण में वही हैं। अत: सभी के द्वारा किये गये सभी शुभ कर्मों के भोक्ता हैं, संपूर्ण लोकों के ईश्वरों केभी ईश्वर हैं और सबके सुहृद है- ऐसा दृढता पूर्वक स्वीकार से ममता हटकर भगवान में आत्मीयता हो जाती है, जिसके चलते परम शान्ति की प्राप्ति मिल जाती है। यही परम निर्वाण है, यही ब्रह्म-परमात्मा स्वरूप, सत्- चित-आनन्द स्थिति है।

भारत के सभी शास्त्र ग्रंथों- वेदों, उपनिषदों, रामायनों में कहा गया है। केवल एक प्राचीन ईशोपनिषद् (उपनिषद) का एक मंत्र दे रहा है नीचे-

यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥मंत्र ७॥
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य के अन्दर यह परमोच्च चेतना जाग गयी है कि स्वयम्भू आत्मसत्ता ही, परम आत्मा ही स्वयं सभी भूत, सभी सत्ताएं या सम्भूतियां बना है, उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र आत्मा की एकता ही देखता है।


In what I consider the best commentary on the Gita—authored by Swami Ramsukhdas—he writes:
The Lord is the enjoyer of all actions performed by all devotees (9.27). It is the Lord who accepts and enjoys the love offered by devotees. When someone offers salutations to another with reverence, the Lord is the ultimate recipient, for He resides within everyone. When someone worships a particular deity, He is the one being worshipped there as well. He pervades every single particle of the entire universe. Therefore, He is the enjoyer of all auspicious deeds performed by everyone, the Supreme Lord of the lords of all worlds, and the true friend of all. Firmly accepting this truth dissolves worldly attachments and fosters a deep sense of kinship with the Lord, leading to the attainment of supreme peace. This is supreme liberation (Nirvana); this is the state of Sat-Chit-Ananda (Truth, Consciousness, and Bliss)—the very nature of the Supreme Spirit (Brahman).

When a man has known Me as the Enjoyer of sacrifice and tapasya (of all askesis and energisms), the mighty lord of all the worlds, the friend of all creatures, he comes by the peace.

He in whom it is the Self – Being that has become all existences that are Becomings, for he has the perfect knowledge, how shall he be deluded, whence shall he have grief who sees everywhere oneness ? (महर्षि अरविन्द का अनुवाद)

By recognizing Me as the enjoyer of sacrifices and penances, the mighty Lord of all worlds, and the friend of all living beings, man attains peace.

२

राम चरित मानस: एक मित्र को लिखा पत्र

राम-सीता (पुरुष-प्रकृति, परमात्मा- माया)
एक दिन आपकों सीता के बारे में कुछ कहा था। आपने मुझे रामायन के उन अंशों को उद्धृत करने को कहा था। मुझे अब याद नहीं रहता। मैं उन अंशों उदृत कर कर भेज रहा हूँ ।

पुरुष और प्रकृति
रामचरितमानस (बालकाण्ड के मंगलाचरण से)
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥5॥

उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥5

२ शिव पार्वती जनकपुर की वाटिका में सीता का उमा का वन्दन-

नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥4॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥4॥

अयोध्या कांड वाल्मिकी की सीता-राम का स्वागत भाषण
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।

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कुछ याद आया

अपने बरामद से

अपने बरामदे में लगे 

लोहे के सिकंचों के पीछे से

आज जो देखा, क्यों नहीं देख 

पाया था पहले।

होली के दिन प्रात: प्रात: 

लाल लाल सोने की थाली से 

प्यारे लगते सूरज को 

देखा और देखता रहा।

अनजानी ख़ुशी आँखों से 

पूरे शरीर को पुलकित कर गई, 

मैं देखता रहा जबतक संभव न रहा।

उसी दिन रात गये 

अचानक जब  नींद खुली

उसी बरामदे से एक और नजारा 

देखा

अद्भुत सुन्दर चाँद को 

अपनी छटा बिखेरते 

और देखता रहा 

जबतक आँखें झपने न लगी। 

क्यों हो गये आज 

सूरज चाँद दोनों इतने प्रेय

यह घर यह बरामदा तो 

बरसों से मेरा ही रहा 

पर इस सूरज और चाँद को 

पाने में कैसे लगे इतने दशक।

और आज ही एक और दृश्य 

शाम का था

मन को असीम आनन्द देता-

आसमान साफ था और आज नीला नीला 

दूर गगन में पक्षियों की छोटी छोटी पाँतें 

देखा लौटते हुए दूर बसेरे की तरफ ।

लगा था मैं भी दिन का थका हारा 

लौट रहा हूँ फिर 

अपने घर की तरफ 

सबेरे शायद इन्हें जाते देंख पाता नहीं

शायद हमारा समय रहा अलग अलग।

जीवन की शाम में अकेला रहते हुए

ऐसे ही छोटी छोटी बातें 

कुछ क्षण की ख़ुशी दे जातीं 

जीने का कुछ तो बहाना बन जातीं।

जीवन ऐसे ही निकल जाता है

एक पटाक्षेप जब होता है तबतक 

हमें ख़ुशी का बहाना ही

नहीं मिल पाता….

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बंगाल का चुनाव- मेरी प्रतिक्रियाएँ

पश्चिम बंगाल की राजसत्ता- मुख्य मंत्री और उनका सत्ताकाल

यह सब काल मैं देख सका हूँ –
*1. Glorious Period- Durgapur, Salt Lake, Kalyani
Bidhan Chandra Roy: Jan 1950 – July 1962 (First CM of the state)
Prafulla Chandra Sen: July 1962 – Feb 1967

*2 Congress on decline
Ajay Kumar Mukherjee: Mar 1967 – Nov 1967 (First term)
Prafulla Chandra Ghosh: Nov 1967 – Feb 1968

  • Period of uncertainty with slow deterioration
    President Rule: Feb 1968 – Feb 1969
    Ajoy Kumar Mukherjee: Feb 1969 – Mar 1970 (Second term)
    President’s Rule: Mar 1970 – Apr 1971
    Ajay Kumar Mukherjee: Apr 1971 – June 1971
    President’s Rule: June 1971 – Mar 1972
    Siddhartha Shankar Ray: Mar 1972 – Apr 1977
    President’s Rule: Apr 1977 – June 1977Jyoti

*Communist Era- all major industries getting winding up
Jyoti Basu: June 1977 – Nov 2000
Buddhadeb Bhattacharjee: Nov 2000 – May 2011
*
Mamta Era- Hope of revival vanished soon….Decline of communists era got speeded up she continued with cadres of communists converted as TMC member and bad practices like syndicate system flourished..
Mamta Banerjee: May 2011 – Present (as of May 2026)
*
4 May 2026 BJP Era begins with thumping majority. A new Era has begun with hope of Bengal getting its due place in five years (To be continued)
काश! अंग, बंग और कलिंग वैसे ही समृद्ध हो पाते जिसके लिये इतिहास उन्हें जानता है।
उदाहरण
बंगाल के चारों इंजीनियरिंग कालेज खड़गपुर, शिवपुर, यादवपुर और दुर्गापुर सभी आई. आई. टी. बन पाते। और १० नये मेडिकल कालेज होते AIMS भी से १०० नर्सिंग स्कूलों तक…
२०-२० केन्द्रीय और कस्तूरबा विद्यालय, सभी स्कूलों की शिक्षा STEM के विषयों को प्राथमिकता देती और सभी में अटल टिंकरिंग लैब होता। १००० आई.टी. आई सभी हुनर के इच्छुक बच्चे बच्चियों को प्रोत्साहित प्रशिक्षण के लिये।
सभी पुराने मैनुफैक्चरिंग के उद्योगों को फिर से नये रूप चालू किया जा सकता। हलदिया में पानी के जहाज़ बनाने की व्यवस्था…+++
बंगाल की हस्तकला मसलिन और प्रसिद्ध करघा कपड़ा उद्योग ……

सोनार बांग्ला की फिर वापसी- कला, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, नृत्य, नाटक, चित्रकला…

बंगाल चुनाव-कुछ लोगों की, कुछ जगहों की बातें

एक्ज़िट पोल आ चुका है। पर पता नहीं क्यों मेरा आज इस पर विश्वास नहीं रहा। सभी एसी पोल करानेवाली कंपनियाँ व्यवसायिक बन चुकी हैं और उनके विचारों में कहीं न कहीं से राजनीतिक प्रभाव निकल ही आता है।

पर यह पहली बार है कि इस बार यूट्यूब के कारण कुछ अच्छी जानकारियों को पा सका, बंगाल के, विशेषकर कोलकाता के बारे में, अपने आदर्श बंगाली महापुरूषों के जीवन सम्बन्धी और स्थान सम्बन्धी।

कोलकाता से ट्राम गईं या नहीं पता नहीं, पर यह ज़रूर जान पाया कि आदमी द्वारा खींचा जाने वाला रिक्शा ज़रूर अभी वहाँ हैं। मुझे अभी याद है कलकत्ता में बरसात के दादाजी कभी कभी मजबूर कर मजबूर कर देते उस पर चढ़ने के लिये। मुझे बहुत बुरा लगता था। अंग्रेजों के जमाने में वह चलता था।

कोलकाता में अभी भी हमारी एम्बेसडर पीली टैक्सियां हैं शान से चलती हुईं। हिन्दुस्तान मोटर्स के दिन आ जाते हैं। वैसे दक्षिण भारत में दिखने को मिलतीं हैं।वैसे ओला, उबर की टैक्सियाँ ही आजकल पूरे देश में दिखाई देती हैं।

कल मैंने एक वीडियो सर आशुतोष मुखर्जी (मुखोपाध्याय) के घर का देखा। सर आशुतोष मुखर्जी को बांग्ला बाघ ( Bengal Tiger) कहा जाता था, वे अपने समय के नामी गणितज्ञ और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।उनके प्रसिध्द पुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी और रामा प्रसाद मुखर्जी थे।बाद में श्यामा प्रसाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़े और राजनीतिक दल जन संघ की स्थापना की जिससे भारतीय जनता दल आया बाद में। वे नेहरू के प्रथम सरकार में रहे और काफी कुछ किया। बाद में कश्मीर में उनकी मृत्यु हुई। रामा प्रसाद मुखर्जी कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस थे।शायद इन्हीं के लड़के शिवतोष मुखर्जी, प्रेसीडेंसी कालेज में वायलोजी के मेरे प्रोफेसर भी रहे।

असीम दासगुप्ता जो प्रेसीडेंसी कालेज से अर्थशास्त्र के उनके जीवन सम्बन्धी वार्तालाप को सुना।वे अमरीका में भी पढ़ाने गये थे।

इन्हीं सबमें समय निकल जाता है आजकल

बंगाल प्रेम और मेरा कड़वा अनुभव
मैं बहुत बचपन में सात आठ की उम्र से बिहार के गांव से दादाजी बंगाल में आया था। वहीं पढ़ा, पहले ‘बिरलापुर विद्यालय’, फिर प्रेसीडेंसी कालेज और उसके आई. आई. आई. टी। प्रेसीडेंसी कालेज के हिन्दू हास्टेल में शाकाहारी खानेवाला मैं शायद ही किसी दिन पेट भर पाया। हिन्दी भाषी और बहुत थोड़े ही थे २-३। पर बिरलापुर और प्रेसीडेंसी में बहुत कम दोस्त बन पाये।लगता काफी बंगाली शायद हमें हेय दृष्टि से देखते थे। पर खड़गपुर माहौल बदल गया और भारत के हर कोने के लड़के मिले। हाँ, स्टाफ़ में अधिकतर लोकल थे। उनसे बहुत सावधानी बरतनी पड़ती थी। अम्बैसेडर बनाने वाली उत्तरपारा के नज़दीक की हिन्दुस्तान मोटर्स फिर देश के हर देश के लोग थे। कामगारों और निचले सुपरवाइज़र स्तर तो बंगाली थे पर ग़ैर बंगालियों की काफ़ी संख्या थी। लेबर यूनियन बड़ी तगड़ी थी पहले कांग्रेस की, फिर कम्युनिस्ट की और उनका प्रबंधन बहुत समझदारी से करना पड़ा। मैं वहां करीब ३७ साल तक काम किया।कुछ दिन बिधाननगर साल्टलेक में रहा, क्योंकि मैंने वहाँ मकान बनवाया था। पर माहौल पूरा बंगाली तरीक़े का था और कहीं आना जाना संभव नहीं लग रहा था कभी कभी पड़ोसी सेन बाबू के घर को छोड। अपने निर्णय की ग़लती का धीरे धीरे अहसास होने लगा। और २००५-७ तक राजेश राजेश सेफाली के अमरीका जाने पर बेंच दिया, क्योंकि लगा कि नोयडा में रहते हुए अपनी विधान नगर की CJ ब्लॉक की सम्पत्ति बचानी मुश्किल होगी।
बंगाली भद्र कहानेवाले पुरूष एवं महिला बंगाल के बाहर जा कुछ और बन जाते स्थानुसार। पर बंगाल की माया नहीं छोड़ते। पहले ही जैसे थे आज भी वहां पहुंचते वैसे से ही हो जाते हैं। आज आख़िरी चुनाव का दिन है। चल रहा है। कल मैं एक यूट्यूब इस विषय पर, जिसे मैं आप सबके लिये साझा कर रहा हूँ, जो देखेंगे , वे मान लेंगे कि मैंने ठीक कहा या नहीं।
राष्ट्रीय सेवा संघ बहुत वर्षों से वहां काम कर रही है। पहली संसद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, उनका योगदान बंगाल हर व्यक्ति जानता है और भी लोग भद्र परिवार जो हिंदू परम्परा के साथ हैं। कोलकाता के पुराने लोग १९४७ के अगस्त महीने के स्वतंत्रता दिवस पर महात्मा गांधी कलकत्ता में थे क्योंकि वहां उस समय सबसे बड़ा हिन्दू मुसलमान का दंगा हुआ था। कुछ बंगाली हिन्दू ही मिहनत कर कलकत्ता को भारत में रख पाये।
पर उसके बंगाल के सभी चीफ मिनिस्टर प्रधानमंत्री को वह सम्मानित दर्जा नहीं दिये जो देना चाहिये। बिधानचन्द्र राय न दिल्ली जाते थे पर नेहरू से काम करवा लेतेथे। इसी कारण पहली आई आई टी खड़गपुर में बनी। जो नया काम हुआ, उद्योग फूले फले उन्हीं के समय हुआ। बंगाल पूरे देश की शिरमौर बना रहा।
पर बिधान राय के बाद बंगाल के पतन का वह दौर चला कम्युनिस्ट ज्योति बसु के लम्बे राज्य काल में, जिसके के कारण उनके बाद के कम्युनिस्ट नेता नहीं सँभाल पाये। ममता कांग्रेस में रही, फिर अटल बिहारी की सरकार में भी मंत्री बनीं। वही मौक़ा देख अपनी नई पार्टी बना बंगाल का चुनाव जीत मुख्य मंत्री हैं और अब तो अपने भतीजे को अपना उत्तराधिकारी बना परिवारवादी राजघराना बनाने में सफल हो गई। शायद आजीवन वही या उसका परिवार ही राज्य करे गांधी परिवार की तरह। ममता से बहुत उम्मीदें थीं, पर वह अपनी गद्दी को बचाये रखने के लिये सब कुछ करती रहीं है, करतीं रहेंगी।
इस बार के चुनाव में मोदी, अमित साह और बहुत से भाजपा के लोग पूरा जोर लगा दिये है, पर बंगाल लोगों को मा, माटी, मानुस प्यारा है, भारतवर्ष से भी ज्यादा। आप इस यूट्यूब को जरूर देखें हिन्दी, अंग्रेज़ी दोनों में वार्तालाप है। मैंने कुछ चीज नोट की- १. रास्ते की दुकानों के मालिक अधिकांश ग़ैरबंगाली हैं, उनके लिये यह काम निम्न है। २. कलकत्ता में आदमी के खींचे जानेवाले रिक्शे अभी हैं। ३. एम्बेसडर कार पीली टैक्सी की तरह चलती है।

“Bengal Elections | Who’s On Track To Victory? Bengal’s Most Iconic Ride | NDTV Chai Stop” on YouTube-

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हिन्दमोटर कॉलोनी को खंडहर होने की तस्वीरों को देख 

कल उन फ़ोटों को Whatsapp पर देखा। कुछ यादें आ गईं। शाम को बिरलापुर में रहते अपने चचेरे भाई से बात किया। बिरलापुर की फैक्ट्री लोढा चला रहे हैं ठीक ठाक। और पूरा बिरलापुर करीब करीब  वैसे ही है। 

मेरी ज़िन्दगी का दो बड़ा हिस्सा दो बिरला परिवार के औद्योगिक संस्थानों में बीता है। पहला बचपन से स्कूली शिक्षा तक बिरलापुर में जो माधव प्रसाद बिरला के एक मात्र भारतीय स्थापित बिरला जूट मिल्स के अहाते में था। मुझे वहां के शीर्ष मैनेजरों- स्व. राम लाल थिरानी एवं महावीर प्रसादजी का असीम प्यार मिला अच्छे विद्यार्थी होने के कारण। करीब ६ साल बाद प्रेसीडेंसी कालेज एवं चार साल आई.आई.टी, खड़गपुर के १९६१ में हिन्दुस्तान मोटर्स में आ गया और अन्त तक रहा। जया इंजीनियरिंग से आये मशीन शॉप के पहले प्रबंधक शिवप्रसाद, बी.एमशारदा, एन.के बिरला, और फिर श्री एस.एल. भट्टर जी अपनी न हारने की प्रवृत्ति के के बहुतों का प्यार शायद आदर भी पाया। पहले तीनों का मैं प्रिय था, पर भट्टरजी में शायद मेरी हिन्दुस्तान मोटर्स में अर्जित इंजीनियरिंग की जानकारियों के कारण कुछ शंकाओं के बारे में मुझ पर ही विश्वास करते थे। मैंने अपनी फ़ोटो ऑटोबायोग्राफ़ी में कुछ व्यक्तिगत विवरण हैं। https://drishtikona.com/wp-content/uploads/2012/08/over-the-years1.pdf ( इस वेबसाइट पर आप मेरे संकलित चार उपनिषदों, गीता, और रामचरितमानस के चुने हुए अंश मेरी भूमिका के साथ पढ़ सकते हैं और एक भारत के प्राचीन काल से लेकर १९-२० सदी के प्रमुख वैज्ञानिकों बारे में हैं।मेरी कुछ कविताएँ एवं लेख भी हैं जो आप अपनी रूचि के अनुसार पढ़ सकते हैं।

विभिन्न विभागों में काम करते हुए बहुत बदलाव किया जो उस समय के मैनुफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी के मान दंड बन गये और देश के अन्य बड़ी बड़ी कम्पनियों में भी मुझे जाना गया। यूरोप और जापान के साथ दक्षिण एशिया- तैवान, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि एसिया  के देशों के दौरों में बहुत सीखा और सिखाया भी, इज्जत भी मिला। 

पर अन्त में एक ऐसा पीढ़ी गत बदलाव लाया जो निजी कम्पनियों में स्वाभाविक होता है मालिकों की पीढ़ी बदलने पर। बिरला परिवार और देश की सबसे बड़ी जानीमानी हिन्दुस्तान मोटर्स में भी वही हुआ। और २०१५ में एक दिन अपनी शताब्दी पूरा करनेके पहले ही हिन्दुस्तान मोटर्स बन्द हो गई।आज हज़ारों लोगों की जीवन के हजारों लाखों सबसे यादगार यादों के घर खंडहर बनते जा रहे हैं। 

क्या बिरला कहानेवाले वे युवा से वृद्ध हुए मालिक अपने बाप दादा के इज्जत को ताक पर रख हिन्दमोटर का आशियानों का यह हाल कर दिये? क्या हिन्दुस्तान की वस्ती को बचा कर अमर नहीं हो सकने का ख्याल नहीं आया होगा? 

आज एक सड़क के पच्छिम की पूरे के पूरे की बस्ती वैसी की वैसी एक हिन्दमोटर रेसीडेंट एसोसिएशन बना उसके हवाले नहीं कि जा सकती थी? 

बहुत बहुत पहले मैंने के डी रूंगटाजी को कहा था कि नौकरी करने लायक न रहने पर बिरला जी को कहूंगा कि हमें तालाब किनारे का एक टी एच का घर दे देंगे और मैं वहीं रहना चाहूँगा। 

आज भी अगर औरंगज़ेब रोड या जहां कहीं भी चन्द्रकान्त जी हैं, उनसे मेरा यही अनुरोध रहेगा। 

हाँ, अपने आख़िरी सालों में एक दिन चन्द कान्त बिरला फैक्ट्री में आये थे और राउडं पर। मैं भट्टरजी के साथ थोड़ा पीछे था। भट्टरजी अचानक मुझसे पूछ बैठे-‘ क्या इस फैक्ट्री को बचाने का कोई उपाय नहीं हैं।’ मेरे मुँह से निकल गया था, हाँ है, इस फैक्ट्री को ४-५ स्वतंत्र इकाइओं में बांट दीजिये और उन्हें व्यवसायिक रूप से अलग कर दीजिये योग्य लोगों के मातहत।’ कुछ मिनट चुप रहे…’ फिर बात करेंगे।’

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सनातन धर्म की विडंबना

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति । ऋ. 1.164.46
-एक ही सत्य को विद्वान अलग अलग रूपों में व्यक्त करते हैं।
ये विद्वान कौन ऋषि से जिन्हें वेद ने अलग अलग रूपों में व्यक्त करने का अधिकार दिया था। उनमें बहुतों ने अपना नाम भी नहीं बताया, न अपनी जाति या वर्ण के बारे में कहीं कुछ लिखा। वे किसी से पूजे जाने की इच्छा नहीं रखें।वे साक्षात् परमात्म त्तत्व का स्वयं में अनुभव किये और बहुत बाद में आज तक अपने ज्ञान के कारण सभी वर्ग और श्रेणी के लोगों से पूजे गये। वे ब्रह्मज्ञानी बने और ब्रह्म विद्या की शिक्षा दी कुछ योग्य शिष्यों को ब्रह्मविद बनाया।
और शंकराचार्य आदि ब्रह्मज्ञानी सदियों बाद उन ग्रंथों का भाष्य लिखा, जो हमें अपने अलग अलग भाषाओं में उपलब्ध हैं। वे सनातन धर्म के प्रचार प्रसार में जीवन खपा दिया।

हजार साल के करीब तुलसीदास हुए, उन्होंने महर्षि बल्मिकी के रामायण पर आधारित राम की कथा लिखी।

तुलसीदास जी ने भी मानस में लिखा-
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता

  • हरि अनंत हैं यानि उनका कोई पार नहीं पा सकता और इसी तरह उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से कहते-सुनते हैं।

पर वे संत कौन कहे जायेंगे और असंत कौन तुलसीदास के रामचरितमानस में बहुत जगह, बहुत प्रसंग में वर्णित किया है। वालकाण्ड, अरण्यकाण्ड में, उत्तर काण्ड में और भी जगह।
यह समस्या तुलसीदास के समय भी आई होगी, अत: कलिकाल के लोगों के आचरण का उत्तरकाण्ड में बहुत बेवाक रूप से वर्णन किया है।

उपनिषदों भी इस विषय पर एकाध श्लोक हैं- पर महाभारत काल में परमात्मा के सगुण अवतार कृष्ण ने युद्ध के मैदान में भगवदगीता का उपदेश दिया, जिस गीता को सनातन धर्म सबसे श्रेष्ठ ग्रंथ माना गया। कृष्ण ने इसकी जरूरत को अच्छी तरह समझी। जब एक तरफ परमात्म तत्त्व को एकमात्र सत् बताया, दैवी सम्पदा, आसुरी सम्पदा, नरक आदि का विस्तार से वर्णन किया। अध्याय सोलह में दैवी सम्पदा पर केवल ढाई श्लोक दिये जब बाद बाक़ी पूरा अध्याय केवल आसुरी सम्पदा की विस्तृत चर्चा की, यमराज वाले भीषण यातना मिलने वाले नरक का कारण बताया, सभी के समझ में आनेवाले आचरणों को बता कर।आज ज़रूरत है उस एक अध्याय के उपदेश को सब भाषाओं के संतों को पूरे देश के हर नागरिक तक सरल भाषा में पहुँचाने की ज़रूरत है। इससे ही देश जगेगा। दुःख यह कि आज के संत जो ख़ासी धन राशि कमाना सीखे हैं, श्रोता से कमाई कर, वे इसे नहीं करेंगे।
फिर कौन करेगा यह?

अगर सनातन हिन्दू केवल तुलसी के विचार से जो संत हैं उन्हीं को संत माने तो कोई दिक्कत नहीं। धीरे धीर असंत भी केवल भेषभूषा से अपने को असंत घोषित कर दें या कोई भी अपने को आत्मश्लद्धा के विभिन्न तरीक़े से संत बना लेता है, शिष्यमंडली बना लेता है जो उस संत का गुणगान कर, विभिन्न प्रकार के प्रचार के तरीक़े से महान संत बना दे, तो साधारण बुद्धि का विना संसारिक हथकंडों को न जानता उस असंत को अस्वीकार कैसे कर दे। कैसे तो पहचान हो। आजकल तो भीषण रूप से घातक सोशल मीडिया के भरोसे शायद यह संभव ही नहीं है।

इस बात को हमारे देशभक्तों को सोचना है…आप पढ़िये, समझिये, और सनातन को अपनाइये।एक श्लोक में सनातन सिद्धांत है..आप ईशोपनिषद का पहला श्लोक ले सकते हैं –
या भगवद्गीता का एक और आत्मसात् कर।
पूछ सकते हैं….my email- irsharma@gmail.com

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यह बदलता बिहार क्या सच में बदल जायेगा?


महीनों पहले ग़ाज़ीपुर के चमड़े के एक उद्योग के बारे में पढ़ा और सुना था। वे रशिया के थल सेना के जवानों को और अन्य नागरिक ज़रूरतों को पूरा करते थे। वैसी फ़ैक्टरियाँ हर ज़िलों में जहाँ कच्चे माल चमड़े के लिये बहुतायत में पशु अभी भी हैं, लग सकती थीं। यह आम जनता के व्यवहार का उद्योग है, पूरे विश्व के लिये बनाया जा सकता है।
कल ‘प्रिन्ट’ में एक लम्बा लेख देख देखा। बिहार के बहुत जरूरी पुराने रोज़गारी का काम देने वाले बहुत सारे खुलते उद्योगों के बारे पढ़ अच्छा लगा। बिहार में पहले इंजीनियरिंग कालेज और आई.टी.आई बहुत ही कम थे। लड़के लड़कियां विशेषकर गाँवों की, सब किसी तरह किसी विषय में स्नातक बन जातीं थी। वही बहुत समझा जाता था। मुझे अन्य प्रदेश के लड़कियों को हर क्षेत्र में हर विज्ञान और तकनीकी विषयों पढ़ने नौकरी की संख्या लड़कों के बराबर हो रही थी। जानकर दुख होता था। पर शायद यह बदल रहा है, पर विशेषकर गाँवों के बच्चों में यह जोश नहीं आया है। आशा है जल्दी अन्य प्रदेशों से बिहार की लड़कियां, खेल-कूद, नृत्य-संगीत आदि में भी प्रदेश का नाम बढ़ायेंगी। ये समाचार सुन, पढ़ अच्छा लगता है। लड़कियों में केन्द्र सरकार से मिलती अभूतपूर्व प्राथमिकता को देखते हुए, जल्दी बिहार की लड़कियां भी देश हर शहरों में स्वतंत्र रूप से काम करतीं दिखेंगीं। कल ही प्रधानमंत्री ने बहुत सारे केंद्रीय विद्यालयों एवं परिवर्द्धित आई.टी. आई बनवाने की घोषणा किये हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण रूप से पंचायतें और ब्लॉकों में काम करते आफ़िसर इतने भ्रष्ट हो चुके हैं कि मनरेगा से लेकर किसी भी केंद्रीय प्रोजेक्टों का पूरा लाभ सहीं योग्य लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता।
बिहार की लोगों की इन घटिया मनःस्थिति के लिये कौन ज़िम्मेदार है, केवल वहाँ के अब बुजुर्ग बनते लोग। उन्हें इसकी आत्मग्लानि नहीं, पर अगर कोई अपने धर्म सठीक पालन न करने पर राज्य, या केन्द्र सरकार तो ज़िम्मेदार नहीं हो सकती।
लोगों को इस बात का कोई असर ही नहीं पड़ता।
मेरे ख्याल से दुर्भाग्य वश बिहार राजनीति के जातिवाद को लेकर पिछड़ेपन में पड़ा हुआ रह गया। नेता ही नहीं बिहार में काम करते सैकड़ों आई.ए.एस आफ़िसर ही बिहार का बेड़ा पार अपनी दृढनिष्टा से कर सकने में सक्षम हो सकते हैं।
लेख तो अंग्रेज़ी में था, पर भाषा सरल है, नहीं कोई समझदार इसका गुग्ल ट्रांसलेशन की मदद से हिन्दी अनुवाद भी कर सकता है अगर पढ़ने की इच्छा है।
बिहार के लोगों को मानसिकता तो बदलनी ही होगी।
अगर आम लोगों में थोड़ी भी देशभक्ति है तो केवल देश करनेवालों को ही वोट दें, जो बिहार को सम्पन्न समृद्ध बना सकता है। कुछ नोटों के लिये ईमान न बेंचें।

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