Controversy on film on Oppenheimer related to Bhagwad Gita

Oppenheimer is famous for his quoting Bhagwad Gita’s verse 32 of chapter 11. In a newly released film in US based on his biography of the scientist who is the father of Atomic bombs.
It has created hue and cry in the Hindu Community in US. Government of India’s Information Commissioner Uday Mahurkar tweeted, sharing a statement from Save Culture Save India Foundation.
“ We do not know the motivation and logic behind this unnecessary scene on life of a scientist,” the statement read. “A scene in the movie shows a woman makes a man read Bhagwad Geeta aloud while getting over him and doing sexual intercourse.”The scene in question is where the main character Oppenheimer (Cillian Murphy) quotes a line from the Bhagavad Gita while making love to Jean Tatlock (Florence Pugh). Perhaps, this is the new American film is getting made presently…..
PS
In July 1945, two days before the explosion of the first atomic bomb in the New Mexico desert, Robert Oppenheimer recited a stanza from the Bhagavad Gita, or The Lord’s Song.

श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥11.32॥
However, as I remember he spoke of another verse after the bomb exploded over the two Japanese cities, I heard some on u- tube in a talk by a Swamiji and that was

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥

Such is the light of this body of God as if a thousand suns had risen at once in heaven.

यदि आकाश में सहस्रों सूर्यों की ज्योति एक साथ उठी हुई हो तो वह ज्योति उस महापुरुष के देह की ज्योति के सदृश कदाचित् ही हो सके ।
I do not which one is correct. But what American movie maker has shown is totally unacceptable. Bhagwad Gita is one the most respected scriptures all over the world and not only for Hindus. Many American scholars and others have said so.
American Film producers and writers have reached their zenith and they do not have anything but involving sex scene with such a respected scripture to make it saleable. One should feel ashamed for such fimmakers of any country. It is something like ‘Aadi Purush’ released recently on Ramayana epic in India by Bollywood.

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India After 2024: Will Speed of Growth increase further, stall or slow

India After 2024: Will Speed of Growth increase further, stall or slow

India is a democratic country and every general election decides the future and well-being of the country and its people. Before 2024 too, some states’ elections are coming up. Will the people of India in 2024 who are the kingmakers, choose a right government with a party with a very clear majority mandate and not vote region-wise as they do in state elections sometimes? Leave back some Southern states, at least Hindi belt has a long experience of the poor partisan governance with family based parties in governance where corruption at all levels of the ruling parties become the topic of popular conversation and with no progress in the growth oriented policies. Bihar, West Bengal, UP, Rajasthan, MP remained laggard Bimaru states for decades. I remember the condition of Indore, Madhya Pradesh, where I used to go very often for my company’s work. It used to be really horrible with no facilities.Today Indore has own the award of the cleanest city of India for the last few years. However, in this entry, I wished the countrymen to appreciate how a big change has come in every field in India in the last nine years and many economists -both domestic and global are expecting that in the next three India will be the third economy globally by 2027. But at the same time, they also warn that if a new-concuss happens to form the government at the centre, it may not happen as it had been history in the past.

However I give below two filled pictures and two youtube presentations that speak on the subject. For the country, it will be better that the present PM with unparalleled foresights and execution capabilities lead the nation. We hope to have that for getting India in the Big Three league globally.  

Can there be a consensus to accelerate it further in an unique meeting of all political parties and can the overall objective be kept the same? This is a unique expectation. The present government has put a graph that should be the way to do it rather than improve the speed many more times. All Indians must join in this great task.

YOUtube presentations 

1. After China, India will shake the world. India, the next economic superpower to challenge the world. https://youtu.be/RTu3DeWfJ44 

2. Ridham Desai Exclusive Interview: Indian Economy पर सबसे बेबाक बात Morgan Stanley के MD के साथ https://youtu.be/iuvHy536nCE

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पिछली ट्रेन यात्रा की कुछ और यादें- हिन्दू धरम और आज के बाबा

आजकल फिर बाबा लोगों की चर्चा यूट्यूब से लेकर अन्य सोशल मीडिया का ख़ासा विषय बना हुआ है। अपना देश विचित्र है। पता नहीं यह अशिक्षा के कारण है या यह भी आज की फैलती राजनीति नामक रोग के कारण है। एक तरफ़ ‘नीम करोली बाबा’ को भगवान हनुमान का अवतार माना जा रहा है। बाबा नीम करोली का आश्रम उत्तराखंड के कैंची धाम में है।

दूसरे बहुचर्चित बाबा बागेश्‍वर हैं, जो चमत्कार दिखाते हैं। और इनके चमत्कारों के चर्चे देश के हर कोने में है। सुन्दर भी हैं, नौजवान भी, बहुत विशेष सुन्दर पहनावा भी, शादी के लिये तैयार बहुत सुन्दर लड़कियाँ भी ।देश के इन चर्चित बाबाओं का नाम विदेशों तक पहुँच जाता है। वहाँ रहतें भारतीयों में भी कुछ उनके अनजाने भक्त बन जाते हैं और उनसे बातों से अमरीकी लोगों तक चमत्कारी भारतीय बाबाओं की पहुँच हो जाती है। यह बहुत सालों से चल रहा है यह क्रम और बढ़ता ही जा रहा है। कुछ राम-रहीम, आसाराम जैसे और अन्य भी जेल में भी चले जाते हैं सालो के लिये। पर उनके भक्त अभी भी पूजा कर रहे हैं। बहुत पढ़े लिखे लोग और विशेषकर राजनीतिक नेता और व्यवसायी भी होते हैं उनके शिष्यों में। आसाराम के एक शिष्य आई. आई.टी कानपुर के मेरे परिचित भी थे, जिन्हें उन पर अंधविश्वास था, शायद आज भी हो। मेरा सम्पर्क टूट गया है।

पिछली ट्रेन यात्रा में नौ जून के सबेरे आस पास बैठे लोग मुझसे धर्म चर्चा करने लगे। मैं तो केवल उपनिषद, गीता और रामचरितमानस थोड़ा समझने की कोशिश में लगा हूँ और उसकी की ही बातें करता हूँ। करता रहा और वे बहुत दिलचस्पी से सुनते रहे। अचानक उनमें एक नवजवान व्यक्ति ने बडी विनम्रतापूर्वक एक प्रश्न पूछने की आज्ञा मांगी। मैंने हामी भर दी। उसका सवाल था- क्या आप बाबा वागेश्वर के चमत्कारों में विश्वास करते हैं? मैंने कहा मैं बाबाओं के चमत्कार में विश्वास नहीं करता। मैं तो विवेकानन्द, उनके गुरू राम कृष्ण परमहंस, रमन महर्षि आदि को ब्रह्म ज्ञानी मानता हूँ और उनके उपदेशों में विश्वास करता हूँ। बहुत अन्य भी जैसे स्वामी रामसुखदास, तेजोमयानन्द, स्वामी सर्वप्रियानन्द, और भी जिन्हें सुनता हूँ। हर से कुछ नई समझ मिलती है। हर हिन्दू को भी सच्चे धर्म के ज्ञानियों की पहचान होनी चाहिये। दुर्भाग्य वंश आज हिन्दूओं में इन सब ज्ञानोपदेश रूचि कम होती जा रही है और स्पर्धा की दौड़ में आगे बढ़ने की होड़ मची है। ब्रिटेन से हट अब अमरीका का आकर्षण भारत के नौवजवानों को खींच रहा है। पर अंधी नक़ल घातक बन रही है। जैसे शिक्षित स्वास्थ्य में अगर आपके पास पैसे न हों तो आगे बढ़ना मुश्किल है।

हाँ चूँकि सहयात्री झारखंड के थे, और सबेरे के नाश्ते के लिये ठेकुआ, मठरी लाये थे, मुझे भी खिलाये। बहुत बढ़िया स्वाद था, या पता नहीं भूख। पैंटरी का खाना मेरी उम्र के लायक नहीं था।इसके लिये सैंडविच लेना चाहता था, पर नहीं हुआ था। बिहार, झारखंड के लोगों वहाँ की स्पेशल डिसेज को देश में लोकप्रिय बनाने की ज़रूरत है। हमारे सहयात्री भी माने। कौन जाने यह ट्रेन की आख़िरी यात्रा हो… हाँ
सब ठीक ही होगा।

पिछली सासाराम की यात्रा ब्यक्तिगत थी, कुछ बाक़ी काम निपटाने की ज़रूरत थी, क्योंकि बच्चे यह नहीं कर सकते थे। पर सासाराम और अपने पितातुल्य चन्द्रमणि मामा की यादें बहुत पुरानी है। ख़ुशी हुई, सासाराम को पूरी तरह बदला पाया और यह ख़ुशी ह आन्तरिक थी बहुत गहरी। वह सोया अन्धेरा पिछड़ा सासाराम अब अन्य जिलापीठों से ज़्यादा प्रकाशित और आधुनिक लगा। न स्टेशन पहचान पाया, न जी. टी रोड के दोनों ओर एक दम बदले बहुत सुन्दर मकानों एवं दुकानों की श्रृंखला। दोपहर और रात में लिया चित्र बतायेगा। कभी सोच भी नहीं सकता था कि सासाराम इतना सुन्दर लगेगा। स्टेशन के प्रकाशित रैंप और सीढ़ियाँ इतना मनभावन लग रहीं थीं। शहर में एक उत्सव सा चलता लग रहा था। बहुत नामी सुसज्जित दुकानें हैं। एक डिजनीलैंड का प्रतिरूप भी देखा, और शिव की विशाल मूर्ति किसी बाबा और उनके धनी शिष्यों की कृपा का बखान कर रहा था। ताराचंडी भी बहुत प्रभावित किया। कैसे लोग हैं जो अब भी कहते चलते हैं देश और विदेश में भी कि भारत पिछड़ा है, गन्दा है, गरीब है। खोजने पर वैसी जगहें तो अमरीका में भी मिल जायेंगी। एक होटल का कुछ घंटों का अनुभव अच्छा रहा। अब कोई अमरीका वाला भी रह सकता है। कुछ कमियाँ हैं, समय से ठीक हो जायेंगीं । शेरसाह का मक़बरा भी साफ़ लगा। अब इसके चारों के तालाब में मछलियां पाल कर सरकार कमा रही है। भीतर जाने पर भी टिकट ख़रीदना पड़ता है। पर हमें तो केवल फ़ोटो लेना था, द्वारपाल मान गये।
वाह सासाराम …बढ़ते रहिये रोहिताश्व गढ़ जाने की मनसा शायद कभी पूरा न हो, पर कौन जानता है…बहुत जगह जा नहीं सका। पत्नी जो अब माँ बन चुकी हैं उनकी देख रेख को केवल कुछ घंटे ही छोड़ा जा सकता है दूसरों पर।अलविदा सासाराम …,

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यों ‘आदि पुरूष’ में जन प्रिय ‘सीता राम’ बने वैदेही राघव बने?

क्यों ‘आदि पुरूष’ में जन प्रिय ‘सीता राम’ बने वैदेही राघव बने?
मनोज शुक्ला, जिन्हें मनोज मुंतशिर के नाम से ज्यादा जाना जाता है । एक भारतीय राष्ट्रवादी गीतकार थे। Sony टेलीविजन के Indian Idol गानों की प्रतियोगिता में कुछ ख़ास प्रोग्रामों (जैसे नव रात्रि का राम कथा पर आधारित था) में संचालन भी करते देखा था। उन्हें शब्दों का ताना बाना अच्छा बुनते देखा सुना था, अच्छी बुलन्द आवाज़ के भी धनी हैं। लेखक भी हैं। पर आदि पुरूष के बाद लगा रहा है कि मनोज शुक्ला पैसे कमाने की धुन में कुछ भी लिखने के लिये तैयार लेखक हैं। हिन्दी के फ़िल्म निर्माता ‘आदिपुरुष’ चलचित्र को बनाने में पूरा दक्षिण भारतीय फ़िल्मों की शैली को अपनाये को अपनाये हैं। इस चलचित्र के नायक और नायिका और अन्य पात्रों के नाम एवं संवाद भी उन्हीं के मस्तिष्क की उपज है। यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है। क्यों असली ब्राह्मण बता हिन्दू धर्म की व्याख्या करनेवाला मनोज शुक्ला कैसे राज़ी हो गया प्रोड्यूसर के दबाव में ? मोदी के भक्त लगते मनोज लगता है तुलसीदास को भी भूल गये और उनके बाल कांड की प्रसिद्ध ‘ राम नाम की महिमा’पर लिखे दोहों और चौपाइयों को भी।
‘सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।’

बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
अर्थ- रघुनाथजी के नाम ‘राम’ की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात्‌ ‘र’ ‘आ’ और ‘म’ रूप से बीज है। वह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है।

आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
ससुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥
अर्थ:-दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देने वाले हैं और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं।

एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥
अर्थ-श्री रघुनाथजी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमें से एक (रकार) छत्ररूप (रेफ र्) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार) रूप से सब अक्षरों के ऊपर है।

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥21॥

  • यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि-दीपक को रख।
    फिर है- ‘ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।’

फिर सीता कौन हैं?
आदि कवि वाल्मीकि जी कहते हैं-
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
-हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।
राम और सीता का नाम बहुत सोच समझ कर हमारे संतों, आदि कवि, और अन्य ऋषियों ने रखा था। कैसे चलचित्र के निर्माता या पट लेखक उस को बदल सकते हैं? यह मज़ाक़ है कि हमारे सगुन अवतारों के नाम और चरित्र के साथ ऐसी मनमानी की जाये। निराला जी की एक सर्व प्रसिद्ध कविता है ‘ राम की शक्ति- पूजा’। क्यों नहीं कोई उस पर आधारित चलचित्र बनाता- राम एक दम नया रूप और अद्वितीय कहानी सब रस लिये बन सकती है ?
आज नमस्कार में किये जाते ‘राम, राम’ या ‘जय सिया राम’ में व्यवहृत राम यों ही नहीं आया है। और फिर इस देह के अन्त होने पर अन्तिम यात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ बोलते जाना का ख़ास महत्व है। राम ब्रह्म है, अन्तिम सत्य है। क्या निर्माता या मनोज जी ‘राघव’ में वह पाते हैं?

हनुमान, विभीषण आदि युगपुरुष हुए। दोनों को हमारे ग्रंथों ने अमर कहा है और हर युगों में रहनेवालों में स्थान दिया है। हनुमान भक्ति की मिसाल है। फिर मनोज जी कैसे संवाद में उन चरित्रों से गलत सड़क छाप भाषा बुलवा सकते हैं। हिन्दी फ़िल्म जगत आज दक्षिणी भारतीय चलचित्रों की सफलता से प्रभावित हो कुछ भी करना चाहता पैसा कमाने के लिये। मनोज शुक्ला भी उसी के शिकार हो गये हैं। उन्हें अगर शिक्षित हिन्दी भाषी हर हिन्दू से श्रद्धा या इज़्ज़त पाना है तो उन्हें अपनी गलती के लिये माफ़ी माँगता चाहिये सभी मीडिया पर। हिन्दी फ़िल्म जगत दक्षिण भारत की नक़ल कर कभी नहीं अपना खोया स्थान पा सकता है। शरत चन्द्र चटर्जी के उपन्यास ‘देवदास’ पर कितनी फ़िल्में बनीं और हिट हुईं। रामकथा हर रूप में मर्यादा रखते हुए बनाई जा सकती है और हिट भी होंगी। दुर्भाग्य है हिन्दी और इसके आंचलिक भाषाओं के फ़िल्म जगत के लोग यह करने सक्षम नहीं हुए। आज भी अगर मानवीय संवेदना को ध्यान रख समाज के तत्कालीन स्थिति से उबरने के विषय पर अच्छी फ़िल्म बनाई जा सकती है। एक बार कोई दिनकर के ‘रश्मि रथी ‘ के कर्ण की कथा क्यों नहीं लेता। इतनी बडा हिन्दी समुदाय साहित्य, कला, नृत्य, नाट्य आदि आगे बढ़ने की जगह पिछड़ता ही जा रहा है। दुर्भाग्य है पर कोई बताये की हल क्या है।
राम के नाम का महत्व देखिये इस यूट्यूब में- https://youtu.be/zXZvZ-XG2rg

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Snakes in The Ganga

Snakes in The Ganga- A book ‘Snakes in The Ganga’ is in the media, particularly youtube. It takes the names of US Ivy League universities in the US, some highly ranked private universities as well as the names of a few topmost billionaires who have got involved in this vicious task. The Snake Groups are making IITs and IIMs also their target and denounce meritocracy. I, at 83 only wish and request all those in IITs and IIMs and other friends to read or at least watch these videos.Those have Kindle downloaded on laptop or other means, can get the synopsis of these books the kindle app free.

All enlightened and right minded Indians must think about the damaging works of few Americans. All Indians who have decided to settle there must think about this aspect too. Finally, most of them will settle in the US. They must foresee the future of the USA in the next 20-30 years when they will be old like me and their children and grandchildren will have to face the consequences of what America will remain. I can predict, if things alright India by then may be a much more livable place than many countries that are the attractions of our younger generations. 

Snakes in the Ganga unveils uncomfortable truths concerning India’s vulnerabilities: • Intense warfare against India’s integrity is the work of a well-orchestrated global machinery driven by a new ideology. • Marxism has been reincarnated as Critical Race Theory in US academia and serves as the framework to address America’s racism. This has been recklessly mapped on to India:Caste is equated with Race. Marginalized communities of India are considered as Blacks and Brahmins as the Whites of India. Groups claiming grievances (like Muslims and LGBTQ+) are artificially clubbed together. • Popularly called the Woke movement, the mission is to dismantle Indian civilization and heritage by waging an uncompromising war against India’s government, educational institutions, culture, industry, and society. • Harvard University is Ground Zero of these social theories developed in collaboration with Indian scholars, activists, journalists and artists. This represents a clear and present danger to India’s sovereignty and national security.

Launch ‘0f Snakes in Ganga’ Event with Swapan Dasgupta, Sudhanshu Trivedi, Prakash Singh & Anand Narasimhan” https://youtu.be/zV23Arqdmw0 

Tejasvi Surya (MP), R Jaggi(Journalist) & R. Vaidyanathan(Prof of Management) on Snakes in the Ganga” https://youtu.be/J0n6UXxW9CI 

I have come across two other books too which have become the top selling books in the USA and present India in bad shape. These books are 

1. The Caste of Merit : Engineering Education in India. by Ajantha Subramanian

2. Caste: The Lies That Divide Us: The International Bestseller by Isabel Wilkerson  (Author)

I pray you can pass on this to all your friends. Any more query, please write to me 

Irsharma@Gmail.com

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प्राचीन भारतीय ऋषियों का देश और विश्व के सम्पूर्ण शान्ति-सौहार्द हित अद्वितीय योगदान

प्राचीन भारत के उपनिषदों के ज्ञानी ऋषियों ने ज्ञान के प्रति एकनिष्ठा द्वारा और सूक्ष्मदर्शी बुद्धि से अपने उस सत्यतत्त्व गूढात्मा का दर्शन या अनुभव किया (‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:- केवल सूक्ष्मतत्त्वों को समझनेवाले व्यक्तियों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष और केन्द्रित बुद्धि से देखा जाता है’ (कठोपनिषद् 1.3.12)’। और उन्होंने आत्मा को सच्चिदानन्द (सत्- चित्- आनन्द) ब्राह्मण, ब्रहम, पुरूष, परमात्मा, पुरुषोत्तम, ईश्वर, परमेश्वर आदि नाम दे वर्णन किया।

ईशोपनिषद् सबसे प्राचीनतम उपनिषदों में एक है और अपने आप में अनूठा है। दुनिया के बहुत महापुरूष इससे प्रभावित हुए और उसकी प्रशंसा किये। उसके मंत्रों का प्रभाव कुछ अन्य उपनिषदों मे, और बाद में भगवद्गीता एवं अन्य धर्म ग्रंथों में भी साफ़ दिखता है। यह कुल 18 मंत्रों (श्लोकों) उपनिषद् सबसे छोटे उपनिषदों में दूसरा है। इसके रचनाकार ऋषि ने इसके मंत्रों में दुनिया को एकत्व-दृष्टि से देखने और मोक्ष का मार्ग बताया है। और यही मार्ग दुनिया का पहला और एकमात्र सम्पूर्ण संसार के प्राणियों एवं प्राकृतिक संसाधनों को बचाये रखने के साथ ही सुख एवं शान्ति के साथ आपसी सौहार्दपूर्ण जीवन यापन का मार्ग भी है।

अब देखिये ईशोपनिषद् ने कैसे अपने मंत्र 1, 4, 6-7 से विश्व शान्ति और सौहार्द लाने का दर्शन दिया। यह प्रकृति के सभी भूतों में (प्राणियों, वस्तुओं- चल-अचल, घरेलू-जंगली छोटे बड़े जानवरों और अन्य जीव, वृक्ष, जंगल, जलाशय, सागर, नदी-नाले, पहाड़, ज़मीन आदि) एक ही आत्मा का अनुभव करने की शिक्षा देता है और जीवन में एक दूसरे का कोई नुक़सान न करते हुए जीने और आदर करने की ज़रूरत भी बताता है।

  1. पहला मंत्र– विश्व के कण में ईश्वर, भगवान

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥1॥

पहले मंत्र के पहली पंक्ति में ‘ईशा वास्यमिदं सर्व’ यत्किञ्च जगत्यां जगत्’ से किया। अर्थ है- ‘इस जगत मे जो कुछ भी हम चारों ओर देखते उसमे हर एक में एक ही ईश्वर (आत्मा, ब्रह्म) का वास है, या सबमें वही व्याप्त है।’ यही ‘एकमात्र नित्य और सत्य’ है। ईशोपनिषद् ने इसे ईश्वर और कठोपनिषद् के ऋषि ने श्लोक 2.3.2 में ‘आत्मा’ का व्यवहार किया है- ‘एको वशी सर्वभूत्मान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य: करोति- ‘ और एक ही बात का प्रतिपादन किया- ‘निसृतम् यदिदं किं चजगत्सर्वं– (परब्रह्म परमेश्वर से) निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् हैं’।

इसी भाव को बाद में भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता के 7.7 में ‘मयि सर्वमिदं प्रोतम्– यह सम्पूर्ण जगत् मेरे में ही ओतप्रोत है’, और फिर 7.29 में ‘वासुदेव:सर्वमिति– सब कुछ परमात्मा का है’ द्वारा अर्जुन को समझाया।विष्णुपुराण (3.7.32) में तो साधक को भी भगवत्स्वरूप कहा गया- ‘सकलमिदमहं च वासुदेव:– वास्तव में दीखनेवाला संसार ही भगवत्स्वरूप नहीं है, वल्कि देखनेवाला भी भगवत्स्वरूप है।’ और यही सत्य ज्ञान है जिसे मद्भागवत में इस तरह कहा गया है- ‘सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्याऽऽत्मनीषया ।परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशय:॥ (11.29.18) जब ‘सब कुछ भगवान ही हैं’- ऐसा निश्चय हो जाय, तब साधक इस अध्यात्मविद्या- (ब्रह्मविद्या)- के द्वारा सब प्रकार से संशयरहित होकर सब जगह भगवान को भलीभाँति देखता हुआ, इस चिन्तन से भी ऊपर उठ साक्षात् भगवान ही दीखने लगें।’

ईशोपनिषद् के हज़ारों साल बाद फिर जनता की भाषा में संत तुलसीदास ने लिखा- ‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध’ (रामचरितमानस मानस 7.112 ख)। सबमें परमात्मा को देखने से सम्पूर्ण भूतों में समानआदरभाव अपने आप आ जाता है; क्योंकि अपने आराध्य परमात्मा से विरोध सम्भव ही नहीं है।

पहले मंत्र में दो और महत्वपूर्ण उपदेश हैं सभी मनुष्य जाति के लिये महत्वपूर्ण हैं- पहली सलाह ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा– इन सभी वस्तुओं का उपभोग करो पर हरदम त्याग भावना के साथ’, और फिर दूसरी सलाह- ‘माँ गृध: कस्विद् धनम्– किसी अन्य के धन का लालच न करो।’

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस पहले श्लोक को हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण मंत्र की संज्ञा दी और अपने जीवन को उसी के अनुसार ढाल दिया। और भी बहुत महान पुरूष हुये जो इसी विचार के साथ जीवन यापन किये। एक उनमें राजा जनक का नाम आता है। यही कर्मयोग भी है।

 

फिर ईशोपनिषद् के मंत्र 1 के ‘ईशा’ को मंत्र 4 में समझने के लिये कहा- ‘तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः-वही ‘इस सबके भीतर है और इस सबके बाहर भी है।’इसी बात को भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में अनेकों श्लोकों में कहा है- ‘अहम् आत्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः-अर्जुन, मैं समस्त प्राणियों और पदार्थों की हृदयगुहा में निवास करने वाला आत्मा हूँ।’

 

2. सबमें में एकत्वता का प्रतिपादन और उसका फल

  

 

और फिर ईशोपनिषद् के ऋषि ने मंत्र 6 और 7 में फिर सभी भूतों (जीव,चल-अचल) में एक ही परमात्मा को देखने से कैसे यह संसार एकत्व भावना से आपस में जुड़ जायेगा और संसारिक द्वेष, शोक, मोह नष्ट हो जायेगा बताया।

मंत्र हैं-

यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥6॥

जो मनुष्य सभी भूतों (प्राणिमात्र) को आत्मा (परमात्मा) में ही निरन्तर देखता है, और सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मा (परमात्मा) को देखता है, उसके बाद वह (कभी भी) किसी से घृणा या द्वेष नहीं करता।

 

मंत्र 6 के भाव को ही दूसरी तरह से कहा गया है मंत्र 7 में-

यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥7॥

‘जिस स्थिति में आत्मा को भलीभाँति जाननेवालेके (अनुभव में) सभी प्राणी एकमात्र आत्मस्वरूप ही हो चुकते हैं; उस अवस्था में उस एकता का- (सभी एकमात्र परमात्मा का निरन्तर) साक्षात् करनेवाले मनुष्य के लिये कौन सा मोह, कौन सा शोक हो सकता है।’

 

मंत्र 16 में, जो भगवान के दर्शन के लिये प्रार्थनारूप है, आख़िरी में ऋषि कहते है- ‘योऽसावसौ पुरूष: सोऽहमस्मि– जो वह है, वह परम पुरूष (आपका ही स्वरूप है) मैं (भी) वहीहूँ।’    

 

ईशोपनिषद् के मंत्र 1 के बाद इन दो मंत्र- 6 और 7 में धर्म, पंथ, देश, जाति, रूप रंग आदि से विभक्त हुए मनुष्य जाति और बाक़ी जीवों में ही नहीं वल्कि ‘सभी भूतों में एक ही आत्मा होने का’ सत्य बता एक अद्वितीय दर्शन का सूत्र प्रतिपादन करते हैं जिससे सभी दुनिया के सब भूतों में बराबर का श्रद्धा और आत्मीयता बनी रहे। जब हम सब समझ जायें कि हम सभी में एक ही आत्मा उपस्थित है तो दुनिया में सुख शान्ति बनी रहेगी। फिर आपसी ईर्ष्या, द्वेष, झगड़ा, हिंसा क्यों होगी। दुख और अशान्ति कहाँ से पैदा होगी और रहेगी।

प्रसिद्ध केनोपनिषद् के श्लोक 5 में ईशोपनिषद् के मंत्र 6-7 के इस भाव को प्राप्त एवं व्यवहार से साधकों को अमरत्व प्राप्त करने की बात कही गई है-‘भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति– बुद्धिमान व्यक्ति प्राणी-प्राणी में (परब्रह्म को) समझकर इस लोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं’।अन्य उपनिषदों ने भी इसकी पुष्टि की।

इन मंत्रों के एक ही ‘आत्मा’ का दायरा मनुष्यों तक सीमित न रख, चर, अचर प्राणियों- थल, जल और हवा में स्थित सभी जीवों जैसे पशु, पक्षी की सभी जातियों; पेड़, पौधों, जंगल; जलाशयों से भी है। और सर्वोत्तम मनुष्य जाति के लोगों को सबको बराबर आदर के अपनी प्राकृतिक रूप में बनाये रखने में ध्यान रखने को कहता है। मनुष्य को उनको नुक़सान न पहुँचाने का भी आग्रह किया जिससे प्रकृति में जगत हित आवश्यक संतुलित बातावरण बनाये रखा जा सके और मनुष्य जाति को उसके अनादर से उत्पन्न प्रकोप को न सहना पड़े। आज के बढ़ते तापमान, असमय असंतुलित बरसात, तूफ़ान, वर्फवारी आदि के प्रकोपों के कारणों में हम मनुष्य की गलती देख सकते हैं। हम वायु, पानी, आकाश, नदी, पर्वत को साफ़, शुद्ध, रखने पर ध्यान दें, उनको गन्दा न करें। आज मनुष्य जाति के स्वार्थ, सुख सुबिधा के लिये उठाये कदम, प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं और उससे हम दुखी हो रहे हैं और प्रकृति को दोष देतें हैं।  ऋषियों ने ‘भूत’ शब्द का व्यवहार किया है। उसमें सब देश, काल, चल-अचल वस्तु, व्यक्ति, जलचर-थलचर-नभचर जीव पशु, पक्षी,पदार्थ, परिस्थिति, घटना, आदि सब दृश्य, अदृश्य, संज्ञाएँ आकाश, जलाशय, पर्वत, समुद्र, नदी, जंगल, पेड़, पौधे आदि आ जाते हैं।

 

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इन दोनों मंत्रों- 6-7 के भाव को उपनिषदों के बाद के भगवद्गीता गीता, श्री मद्भागवत, मनुस्मृति और बाद के अनेक ग्रंथों- अष्टावक्र गीता, रामचरितमानस आदि में भी इसी महत्व के साथ दुहराया गया है। बहुतों ने उपनिषद् के इन दोनों श्लोकों को क़रीब क़रीब इन्हीं शब्दों में रख दिया है।

 

यहाँ नीचे भगवद्गीता के कुछ श्लोकों में कैसे ईशोपनिषद् के मंत्रों का प्रभाव झलकता है-   

ईशोपनिषद् की तरह ही भगवद्गीता में पहले ‘सबमें एक ही आत्मा’ की बात कही गई। ब्रह्म कृष्ण ने कहा- ‘येन सर्वम् इदम् ततम्’ (2.17, 8.22, 18.46) या थोड़े अन्तर के साथ ‘न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्– 10.39। इसे बार बार दुहराया पूरी गीता में।

 

ईशोपनिषद् के मंत्र 6 और7 को ही गीता में भगवान कृष्ण ध्यान-योग के अध्याय 6 में कहते हैं-

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥6.29॥

-सब जगह अपनी आत्मा) को देखनेवाला अपने स्वरूप (आत्मा) को सभी प्राणियों में स्थित देखता है और सभी प्राणियों को अपने स्वरूप (आत्मा) में देखता है।

 

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥6.30॥

जो सबमें मुझे (ब्रह्म) देखता है और मुझमें (ब्रह्म) सबको देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।

 

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६.३१॥

(मुझमें) एकीभाव से स्थित हुआ जो योगी सभी प्राणियों में मुझे स्थित देखता हुआ मेरा भजन करता है, वह सब कुछ करते हुए भी मुझमें ही नित्य स्थित है।

 

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥6.32॥

अर्जुन, जो अपने शरीर की आत्मा की तरह सब जगह मुझे समान देखता है और सुख वा दु:ख को भी समान देखता है, वह महान योगी है।

 

(श्लोक 9.29 मे ‘समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः, मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान हूँ, उनमें न कोई मेरा द्वेषी है और कोई प्रिय है।’  

 

श्लोक 10.20 की पहली पंक्ति में कहते है- ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः– अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।’)

 

 

‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग’ अध्याय 13  के दूसरे श्लोक में कहते हैं, ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत, क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम’-अर्जुन, तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ (आत्मा) भी मुझे ही जान और मेरे मत में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ (शरीर-शरीरी, देह, देही, क्षर, अक्षर) को तत्व से जानना ही ज्ञान है।’

 

फिर

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌ ।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥23.27॥

जो नष्ट होते हुए सभी प्राणियों में परमेश्वर को नामरहित और समरूप से स्थित देखता है, वही वास्तव में देखता है।

 

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ॥१३.२८॥

क्योंकि सब जगह समरूप से स्थित ईश्वर को समरूप से देखनेवाला मनुष्य अपने-आप से अपनी हिंसा नहीं करता, इसीलिये परम गति के प्राप्त हो जाता है।

 

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥13.30॥

जब योगी प्राणियों के अलग अलग भावों को एक प्रकृति में ही स्थित देखता है और उस प्रकृति से ही उन सबका विस्तार देखता है, उस काल में वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

 

 

मनुस्मृति में इसी तरह का एक इसी भाव का श्लोक है-

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।

समं पश्यन्नात्मयाजी स्वराज्यमधिगच्छति॥

 

और उपरोक्त धर्मग्रंथों के बाद के ‘अष्टावक्र गीता’ में भी यही बात इस तरह कही गई है-

सर्वभूतेषू चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥15.6॥

समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ।

 

भगवान कृष्ण ने  भगवद्गीता के अन्तिम 18वें अध्याय में 18 अध्यायों की विषय वस्तु को संक्षेप में रखा है। भगवान कृष्ण ने सभी भूतों में एकत्व के ज्ञान को ही सात्त्विक ज्ञान कहा है-

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥18.20॥

 

भगवान ने समदर्शिता का उपदेश दिया है कि वे सभी भूतों में स्थित हैं और वे मनुष्य के सब वर्गों में कोई भेद नहीं करते और सभी को एक तरह की ही परम गति देते हैं।

 

भगवान कृष्ण ने समदर्शिता को समाज में फैले भ्रान्तियों को हटाने के लिये बार बार समता को वरण करने का उपदेश दिया, जो आज के भारत में भी उतना ही ज़रूरी है जितना तब होगा।

 

सम्पूर्ण जीवों में एकता स्वीकार करने पर सर्वत्र आत्मभाव यानि ब्रह्मभाव हो जायेगा- ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्योपनिषद् 3.14.1)। अनेकरूप से जो जीव है, वही एक रूप से ब्रह्म है अर्थात् जीव और ब्रह्म एक ही है-‘अयमात्मा ब्रह्म’। यह माडूक्योपनिषद् के पहले मंत्र में है और उपनिषदों के चार महा वाक्यों में एक है।विभिन्नता का भाव मनुष्य ने अपने राग-द्वेष से पैदा किया है।जगत्, जीव, और परमात्मा – तीनों में अनेक भेद पैदा कर लिये हैं जो इसके सभी दुखों और कलह और यहाँ तक की मृत्यु का कारण बन जाता है। और आपस में परायापन लाता है, मानता है, किसी का बुरा चाहता, देखता तथा करता है और प्रकृति का नुक़सान भी पहुँचाता है।जीव परमात्मा का ही अंश है- ‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता 15.7)। इसीलिये भगवान कृष्ण ने पूरी गीता में बार बार ‘समत्वं योग उच्यते– समता ही मुक्ति है’ को विभिन्नता में एकत्व या समता को हमें समझने की ज़रूरत बताया और समदर्शी, समबुद्धि बनने को कहा। द्वन्दरूप मोह से रहित होने को कहा और सबमें उनकी (ब्रह्म) उपस्थिति का संदेश दिया , ‘वासुदेव: सर्वम्’ कहकर।

 

समझिये नीचे दिये गीता के तीन श्लोक, जो इस बात को साफ़ कह रहे हैं-

 

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥5.18॥

ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखनेवाले होते हैं।

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥6.9॥

सुहृद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियों में तथा साधु-आचरण करनेवालों में और पाप-आचरण करनेवालों में भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है।

‘समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:-(9.29) मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समान हूँ। उनमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है।’

 

और फिर इसीलिये

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥9.32॥

हे पृथापुत्र अर्जुन! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर नि:सन्देह परम गति को प्राप्त करते हैं।

 

फिर कोई हिन्दू या किसी वर्ग के भी कुछ अज्ञानी, कुछ स्वार्थ के कारण सदियों से किये जाते इन विभेदों को क्यों तूल देते जा रहे हैं, जब भगवान खुद इनमें कोई अन्तर मानते? आज हमारी रक्षा वाहिनी के हर अंग के लोग क्षत्रिय नहीं है? क्या भारतीय की खेलों में भाग लेने वालों को जाति के आधार पर बाँटा और उनसे बड़े छोटे का वर्षावन किया जा सकता है?  अगर आज का हिन्दू समाज जाति प्रथा को तूल देते रहेगा तो हम वहीं के वहीं रह जायेंगें? आज हर वर्ण के लोग शिक्षा और आचरण से ब्राह्मण बन सकते हैं और अपने को पतित कर शूद्र? अगर अपने ऋषियों की बात नहीं मानेंगे क्या हिन्दू कहलाने के योग्य रहेंगे?

 

हमारा धर्म और दर्शन पूरे संसार का एक मात्र धर्म वह दर्शन है जो सबको जोड़ता है, श्रद्धा करता है, और यहाँ उपनिषद् काल से केवल ज्ञानी को ही महत्व दिया जाता रहा है। काश! हम भारतीय वह परम्परा निभा पाने में समर्थ होते।

 

जहाँ तक दूसरे धर्मों की बात है। केवल बौद्ध, जैन, सिख का हिन्दूओं के ही इस एकता के दर्शन में समान भाव नहीं है वल्कि इस्लाम और ईसाई धर्म में भी ऐसा ही कहा गया है- अनुयायियों को समझने की ज़रूरत है। फिर सनातन सत्य तो सबके लिये लागू होता है। हमें यह समझना चाहिये कि उपनिषदों में भी असुरों, असंतों, असाधु की संख्या देवों, संतों, साधुओं असंख्य बड़ी थी।अब तो हज़ारों साल के पतन के बाद और भी ज़्यादा होती जा रही है।

 

दुर्भाग्य से सदियों से कुछ ज्ञानियों, पैगम्बरों के लोकप्रिय हुये कुछ अनुआइयों में केवल उनके योग्यता का ह्रास ही नही हुआ, वल्कि वे अपने स्वार्थ के लिये अपने कुछ अपने गुरुओं के सत्य विचारों को न समझने की चेष्टा की वल्कि अपने बेचारों के क्रियान्वयन से दुनिया के विभिन्न समाजों, देशों में अलग धर्म, पंथ, जाति आदि के नाम पर विभिन्नता लाये और मनुष्य जाति का जीवन दुख, शोक, अशान्ति, क्रोध, हिंसा, द्वेष आदि के मनोभावों से भरता गया। और वैसे लोग आज भी हर देश और समाज में हैं और बड़ी संख्या में अज्ञानी पंडित अभी भी उसी तरह समाज में ज़हरीला भाव फैलाने का काम करते जा रहे हैं।

 

 

आज भारत के आम हिन्दू को इस महान दर्शन को न अपने जानते हैं, न जानने की कोशिश करते हैं। अपने बच्चों को कैसे उसे बतायेंगे। इस नई पीढ़ी को हमारे सदाचार, सच्चरित्र की ज़रूरत को न घर में बताया जाता है, न विद्यालयों में पढ़ाया जाता है, न कोई स्वाध्याय से इसे जानने और समझने की कोशिश करता है। हाँ, आश्चर्य तब होता है जब हम पाते हैं कि सदियों पहले हमारे देश से विदेशों में जहां भी भारतीय गये या भेजे गये, वे वहाँ रामचरितमानस ले गये और सामूहिक गान द्वारा उसे ज़िन्दा रखे।

 

हमारे गाँवों में या गाँवों से आये शहरी परिवारों के कुछ अनुष्ठानों में हम आज भी उस प्राचीन एकत्व की भावना देख सकते हैं। भक्तिकाल कवियों जन जन में इसे जगाये रखा। रामचरितमानस के ब्रह्म राम ने  केवट, निषाद, कोल, भील, गिद्ध जटायु, बानर, भालू, राक्षस, नीच जाति की भक्त स्त्री सबरी, गिलहरी आदि सभी से सहायता ले उनको को अपनाया और मान दिया। गंगा, समुद्र आदि सब जलाशयों की पूजा की। आज भी हम देखते हैं लोगों कों चींटियों के मांदों में उनके खाने के लिये आटा डालते हुए और कबूतर आदि पक्षियों के उचित जगह पर उनको आहार के अनाज फैलाते हुए।जब ब्रह्म जाति लिंग भेद नहीं करता तो हम क्यों करते हैं? फिर आज देश के हिन्दूओं में चार वर्णों के बदले विभिन्न जातियों की संख्या हज़ारों में पहुँच चुकी है? और देश के राजनीतिक पार्टियों के नेता चुनाव जीतने के अपनी जातियों का वोट बैंक बना बना और आरक्षण की व्यवस्था जातियों में आपसी बैमनस्य भी बढ़ाते जा रहे है। अगर ब्राह्मण परशुराम को अपनी जाति का बनाए और राजा होने के कारण राजपूत राम को क्षत्रिय कहें या लोग कृष्ण को ग्वाला, तो क्या वे उनकी मर्यादा बढ़ाते या छोटा करते हैं?

 

आज सारी दुनिया हर हालत में केवल धन कमाने एवं जमा करने में लगी है और फिर अपने धन का उपयोग अचल पर पूर्णतः अनित्य सम्पति खड़ा करने में लगाती है। फिर दुनिया के सबसे दामी मकान, सभी दामी गाड़ी, सबसे महँगे कपड़े और भोजन आदि में। पता नहीं दो या अन्त में बचे केवल एक आदमी के लिये इतना क्यों? उन्हें पता नहीं नहीं देश में कितने लोग जिन्हें रहने का आश्रय नहीं, खाने के लाले हैं, असाध्य बीमारी से ठीक होने के लिये धन नहीं…।

 

ज़रूरत है भारत के इन प्राचीनतम से प्रारम्भ कर मध्यकाल के भक्त कवियों, ऋषियों और ज्ञानी पंडितों ने जो कहा उसे देश विदेश में बच्चों से लेकर बूढ़ों में सभी धर्म, पंथ, रंग, रूप आदि के भेद का त्याग कर फैलाया जाये और समत्व-एकत्व का भाव दृढ़ रूप से हर व्यक्ति के मानस में बैठा दिया जाये। यही एकमात्र विश्व की स्थायी  शान्ति का मार्ग है।

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पराली का प्रलय: हत्यारे बनते किसान

 

आज सबेरे धूंआ की एक तीव्र गंध के कारण नींद खुल गई। थोड़ा सोचने पर लगा कि यह आम प्रदूषण नहीं है। फिर नोयडा का API index भी देखा। वह तो 183 ही था। फिर लगा कल रात एक शीशे का दरवाज़ा बन्द नहीं किया था, बाहर की थोड़ी ठन्ढी हवा के लिये। शीशे का दरवाज़ा बन्द किया । नित्य प्रात: का स्नान, पाठ, गीता स्वाध्याय और थोड़ा सामान्य शारीरिक व्यायाम को 6 बजे ख़त्म कर तैयार हो गया नीचे जा भ्रमण के लिये। पर बाहर निकलते ही वही तीव्र धूंये की गंध के कारण मास्क पहना। नीचे पहुँच घूमने की कोशिश की थोड़ी देर। मेनगेट के गार्डों से पूछा तो एक ने कहा पराली जल रही है चारों ओर नोयडा, हवा के कारण धुआँ यहाँ तक छा गया है। फिर याद आया कि अमरीका से आईबड़ी बहू ने कुछ दिन पहले बताया था कि जब वह पास के हापुड़ में रहते अपने मौसी जी घर गई थी तो देखी थी पराली जलते हुये। मीडिया ने क़रीब एक महीने पहले बताया था कि इस बार यह पराली का जलाना कम हुआ है।एक समाचार में बताया कि एक कम्पनी किसानों के खेतों से पराली उठा लेती है। इस पर मैंने पहले भी फ़ेसबुक में लिखा था। गड़करी के अनुसार एक बड़ी तेल कम्पनी ने पराली से एथानॉनल बनाने के लिये एक लाख लिटर के सालाना क्षमता की एक कम्पनी बनाई है। 10% तक पेट्रोल गाड़ियों एथानल मिलाने का क़ानून भी गया है। आयात कम करने  की बड़ी संभावना भी है। अभी भी किसान समझते नहीं या समझना चाहते नहीं कुछ लोगों के बहकाने से।* हमारे किसान अपनी जड़ मानसिकता को छोड़ने को तैयार नहीं और अन्नदाता से मृत्युदाता बन गया है पिछले सालों में। आज ज़मीन के मालिक अपने खेती की ज़मीनों को गाँव के कमजोर बेबस खेती से कमाने वाले लोगों को अच्छे सालाना रेट का रूपया ले पर साल भर के लिये दे देतें हैं, जो उसमें खेती कर अपने परिवार का पोषण करते हैं। हाँ, किसानों का सरकारी अनुदान ज़मीन के उन्हीं निक्कमें मालिकों को मिलता है जिनके नाम ज़मीन है सरकारी रिकॉर्ड में। जमीन्दारी प्रथा क़ानूनी ढंग से ख़त्म होने पर भी एक नये रूप में आ गई। ये खेतों से उत्पादन की कमाई पर आश्रित असली खेती करते लोग सभी तरह से खेतों से जितनी ज़्यादा कमाई जितनी कम खर्च पर कर सकते हैं, करते हैं चाहे ज़मीन का नुक़सान हो, या पर्यावरण का। वे नयी तकनीक क्यों सीखें।  सभी राजनीतिक नेता इस नई व्यवस्था में शामिल हैं। पराली के जलाने की शुरूआत उसी के कारण हुआ है और चल रहा है। सरकार निर्विकार भाव से टैक्स देनेवालों के पैसे किसानों पर खर्च कर वोट जीतने के प्रयास में लगी है।दुर्भाग्य है कि सरकार के प्रमुख  नीतिनिर्माताओं को यह पता ही नहीं या पता होने पर भी वह ज़ाहिर नहीं करना चाहते हैं। कौन अपना नुक़सान करे-  चाहे ज़मीन अपनी उपजाऊ क्षमता खोती जाये, पराली जले, या प्रदूषण फैले, और लोग बीमार हों या मरे।

पिछले साल मेरी पत्नी को जब न्यूरोलाजिस्ट ने कहा कि उन्हें डिमेंसिया हो गया है जिसे Clouded Dimentia कहते हैं। और उसका कारण है  प्रदूषण के कारण सुर्य की रोशनी का न हो अंधियारा छाया रहना जो हर साल पराली जलाने के समयकाल में दिल्ली के चारों ओर के इलाक़े में हो जाती है।इन्हीं दिनों ऐसे मरीज़ों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।  जिसका कोई इलाज ही नहीं है और यमुना की तरह के मरिज अपनी याददाश्त खोते जाते हैं। डाक्टर से कुछ दिनों पहले फिर पूछा था कि आनेवाली इस समस्या से कैसे लड़े।  वे दवाई चलाते रहने के लिये कहें और सूरज की रोशनी होने पर सबेरे धूप में थोड़ी देर बैठाने के लिये जब प्रदूषण कम हो।मैं नोयडा में 1997 में आया,  पर उस समय ऐसा नहीं होता था।पिछले दशकों में पंजाब से पराली का जलाना चालू हुआ, अब तो हरियाना, उत्तरप्रदेश आदि सभी प्रदेशों में फैलता जा रहा है। पंजाब को लोग अभी भी खेती करने के तरीक़ों में अगुआ मानते हैं। पर पंजाब कृषि में अपना वर्चस्व खो चुका है।

 

दिल्ली के मुख्य मंत्री जो दुर्भाग्य से हमारे आई. आई. टी-खडगपुर के विद्यार्थी थे और लोकप्रिय भी है। तभी तो बार बार चुने गये हैं। पर बिहार के इंजीनियर  मुख्य मंत्री नीतिश कुमार जैसे बिहार को निराश किये, वैसे ही केजरीवाल से हमें बड़ी उम्मीद थी दिल्ली के कायापलट सम्बंधी मुझे, पर ग़लत निकली। केजरीवाल  इंजीनियर का दिमाग़ खो दिये, केवल लोगों की  वोट जीतनेवाली कला में माहिर हो गये। दिल्ली का कुछ बदलाव नहीं कर पाये।यह तो अच्छा है कि दिल्ली देश की राजधानी भी है और अन्य स्वतंत्र एजेन्सियाँ भी है दिल्ली को आगे ले जा संसार में एक नया स्थान बनाने में मदद के लिये।

 

और अब जब पंजाब में जहां काँग्रेस पार्टी की सरकार थी, पिछले चुनाव में केजरीवाल का आप पार्टी आ चुकी है।पर केजरीवाल न पंजाब के किसानों को समझा पाये न पाये इस साल भी और  दिल्ली और आसपास के क्षेत्रीय शहरों में पराली जनित क़हर से बचाने का कोई प्रयास नहीं किये। क्या दिल्ली और इनके पास के इलाक़े में बढते प्रदूषण को रोकने का प्रयत्न किये, हाँ देश के प्रधान मंत्री बनने का सपना देख सकते हैं? क्या दिल्ली शहर संसार की नज़रों में एक अच्छा शहर बन पायेगा? क्या दिल्ली या उसके पास के क्षेत्रों में कोई विदेशी आ रहना पसंद करेगा या यहाँ विदेशी प्रर्यटक यहाँ आना चाहेंगे? क्या प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री और राजनीतिक दलों के नेतृत्व को हर दलगतऔर व्यक्तिगत विरोध या कठिनाई के बावजूद भी इस देश की प्रतिष्ठा को बचाने के लिये इस काम पर एक व्यापक प्रयास नहीं करना चाहिये था?

 

क्या इस क्षेत्रों के प्रबुद्ध नागरिकों को मिल इसलिये एक स्वार्थरहित आन्दोलन करने के लिये आगे नहीं बढ़ना चाहिये? क्या सभी स्कूलों के हेडमास्टरों और बच्चों स्कूलों को बन्द कर इसका बिरोध नहीं करना चाहिये जिससे बहरे अंधों को इस समस्या का समाधान ज़रूरी है समझ में आये? IT वालों को गाड़ी न चला घर से क्यों काम नहीं करना चाहिये प्रदूषण को कम करने के लिये? क्या धूँआ उगलते सब जेनेरेटरों, ट्रकों, ट्रैक्टरों को क्यों इस क्षेत्र में प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिये? क्यों बिजली के वाहनों  को और सूर्य शक्ति से बिजली उत्पादन को उन सभी को बढ़ावा नहीं देना चाहिये जिनके पास जगह है। क्या शहरी संस्थानों  के ख़ाली ज़मीन में या भवनों पर शौर्य उर्जा का उत्पादन करना ज़रूरी नहीं कर देना चाहिये? कब सभी काम सरकार पर हम छोड़ते रहेंगे? आज का दो मीडिया रिपोर्ट देखिये और कुछ सोचने और कुछ प्रयास के कदम उठाने की चर्चा करिये और सोचिये और इस अंचल को कालकोठरी बनने से बचाइये।  यह ८३ साल का बूढ़ा इसके लिये जो पहल करेगा उसके साथ होगा।

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आदिपुरुष के पटकथा लेखक और गीतकार के नाम यह निवेदन

आजकल मनोज मुंतशिर जो ‘आदिपुरुष’ फ़िल्म के पटकथा लेखक हैं और जिनका मैं अबतक प्रशंसक था, बड़ी चर्चा में हैं। मुझे समझ में नहीं आता तुलसीदास के रामायण में जब राम के लिये शायद यह नाम कहीं नहीं आता फिर आदि पुरूष राम कैसे बने जब वे त्रेता में हुए। वैसे ‘आदि पुरूष’ में ‘पुरूष’ मुख्य है जिसके ऊपर कुछ नहीं। कठोपनिषद् के श्लोक 1.3. 10 और 1.3.11 में ‘पुरूष’ को इस तरह कहा गया है-

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥1.3.10॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।

पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥1.3.11॥

-‘पुरुष’ से उच्चतर कुछ भी नहीं। वही सत्ता की पराकाष्ठा है, वही यात्रा का परम लक्ष्य (परा गति) है। पुरूष का न कोई आदि न अन्त।

सभी उपनिषदों में क़रीब क़रीब उन सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने जब वे सूक्ष्मतम पुरूष या ब्रह्म को जैसा अनुभव किया वैसा बताया है- जैसे ईशोपनिषद् के श्लोक 8 में, कठोपनिषद् के श्लोक १.३.१५ में। इन्हीं में सबसे छोटे उपनिषद माडूक्य में वह महावाक्य भी है ‘अयम् आत्मा ब्रह्म’ ‘This Atma is Brahman- यही आत्मा ब्रह्म है’।

राम एक सगुन ब्रह्म के रूप में अवतार हैं, उनका चित्रण केवल ज्ञानी ऋषियों की कथानक पर होना चाहिये। सदियों से इनकी मूर्तियाँ बनती रहीं हैं और उनके पहनावे का वर्णन दिया भी गया है। फिर आधुनिक काल में गीता प्रेस से प्रकाशित वाल्मीकीय रामायण, रामचरितमानस आदि में सभी पात्रों के चित्र आदि भी देखे गये हैं। क़रीब क़रीब सभी हिन्दूओं या अन्य धर्म के पाठकों या आम लोगों में वह छवि वसी हुई। उसको पूरी तरह से व्यक्ति इच्छानुसार बदलना शायद गलती है या बचपना।

मनोज के अपने बचाव में कही बातें बड़ी हास्यप्रद हैं। राम खड़ाऊँ पहन युद्ध नहीं किये थे, वे बिना कुछ पहने रहे अपने पूरे वनवास में, चित्रकूट में काफ़ी समय रहने के समय अपनी कुटिया में वे खड़ाऊँ पहनते थे, जैसा फ़िलहाल तक हमने गाँवों में देखा होगा।

युद्ध में विभीषण कहते हैं-

‘नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥’ क्या मनोज जी इसको पढ़े नहीं है? फिर युद्ध में चमड़े या कैनवास के चप्पल दिखाने की बात कहाँ आती है? हनुमान जी जैकेट पहनाने की क्या ज़रूरत है।

अब मैं रामचरितमानस के अयोध्या कांड में सीता,राम,लक्ष्मण के अपने आश्रम में आने पर बाल्मिकी ने जो उनके स्वागत में कहा-

संत तुलसीदास जिन्हें भगवान राम बार बार दर्शन दिये, फिर जिन्होंने राम और सीता के बारे लिखा अयोध्याकांड में वाल्मीकि के आश्रम में ऋषि ने कैसे राम का स्वागत किया लिखा-

‘श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।

जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ।।’

(यह साफ़ है राम सगुन ब्रह्म है जो राम एवं फिर कृष्ण की तरह अवतार लेते हैं।गीता में अर्जुन को दिखाये अपने विश्वरूप के वारे में कहा गया देश विदेश में प्रसिद्ध श्लोक है-

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥11.12॥

-यदि आकाश में सहस्रों सूर्यों की ज्योति एक साथ उठी हुई हो तो वह ज्योति उस महापुरुष के देह की ज्योति के सदृश कदाचित् ही हो सके ।

जो उपनिषदों के श्लोक में एक अन्य सुन्दर और लोकप्रिय रूप में कहा गया है-

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥

-वहाँ सूर्य प्रकाशमान नहीं हो सकता तथा चन्द्रमा आभाहीन हो जाता है, समस्त तारागण ज्योतिहीन हो जाते हैं; वहाँ विद्युत् भी नहीं चमकती, न ही कोई पार्थिव अग्नि प्रकाशित होती है। कारण, जो कुछ भी प्रकाशमान् है, वह ‘उस’ की ज्योति की प्रतिच्छाया है, ‘उस’ की आभा से ही यह सब प्रतिभासित होता है।)

और फिर तुलसीदास के बाल्मिकी आगे कहते हैं-

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।

जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥127॥

फिर वह जगह बताते हैं जहाँ उनका निवास हो-

‘काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया।…

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥

जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥

तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥..

अगर मनोज की राम कथा इन मूल्यों पर ध्यान देती तो अच्छा होता।

आश्चर्य है राम की कथा और राम के रूप में तुलसीदास के सगुन राम के आदर्श चरित्र को क्यों नहीं दिखाने की कोशिश की गई| तुलसीदास से ज्ञानी और वास्तव के कवि तो आजतक कम से कम हिन्दी में नहीं हुए। मनोज राम के बारे में अलग अलग रामयणों को उद्धृत करते हैं। वाल्मीकीय रामायण के समय का काल और कल्पना अलग थी, तुलसीदास की अलग। जानकी जी जो स्वंय ब्रह्म राम की माया हैं वे रावण के कुटिया में उनका हरण करते ही माया रूप ले लीं। अग्नि परीक्षणों माया जली और पवित्र सीता प्रगट हुईं।वे जब चाहती रावण को भस्म कर सकती थी।

अब मैं उनके पुष्पक विमान सम्बन्धी ग़लतफ़हमी को दूर कर रहा हूँ। वह विमान कुबेर से जीत कर रावण लाया क्योंकि कोई असुर चरित्र का व्यक्ति विमान बना ही नहीं सकता।

अब मैं मनोज जी के कुछ व्यक्तिगत बातों पर कुछ कहना चाहूँगा-

१. कुछ समय से वे बार बार अपने को ब्राह्मण बताते रहते हैं और सनातनी। https://youtu.be/KzcVxyk_t90 कभी कभी इसमें राहुल गांधी के कुछ कथनों की याद आने लगती है।वह बचकानी लगती है। ब्राह्मण पैदा नहीं होते बनते हैं और प्रमाणित करते अपनी करनी द्वारा।

गीता की परिभाषा में ब्राह्मण के कर्म हैं-

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥18.42॥

-शान्त भाव, आत्मसंयम, तपस्या, मन और शरीर की पवित्रता, तितिक्षा, क्षमा, सरल व्यवहार, ज्ञान, विज्ञान, आध्यात्मिक सत्य को स्वीकार करना (उसमें श्रद्धा विश्वास)—ये ब्राह्मण के कर्म हैं जो उसके स्वभाव से उत्पन्न होते हैं ।

या

वे किस सम्पदा के धनी हैं गीता अध्याय 16 के 1-3 श्लोकों में दैवी सम्पदा या बाक़ी अध्याय में दिये आसुरी सम्पदा। अपने हृदय से पूछें और फिर जबाब दें या आम लोगों के सामने कहें। मैंने कल उन्हें कल Tweet किया था।

ब्राह्मण की एक परिभाषा दी गई है जिसे साथ के एक चित्र में देख सकते हैं।

मनोज मुंतशिर में लगता है अब थोड़ा अहंकार भाव आने लगा बढ़ती लोकप्रियता के साथ । अच्छा होता कि कवि, गीतकार या लेखक को केवल सम्पदा अर्जन और संग्रह का मशीन न बना अपने क्षेत्रों देश विदेश में नाम कमाते आम व्यक्ति को उच्च स्तर का बनने की प्रेरणा अपनी कृतियों से। तुलसी के राम के आदर्श पर अगर भरत चला होता तो न हम ग़ुलाम बने रहते सदियों तक, न आज के समाज की वह दशा होती जो तुलसीदास ने कलिकाल का वर्णन करते लिखा था और कागभुसुडी से पक्षीराज गरूड को कहलावाया था कुछ चौपाइयों के द्वारा-

नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥

गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥

हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥

मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥

नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥

कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनहिं चेरि निबेरि गती॥

सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥

कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥

नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥

क्या उस महान संत की अद्भुत दूरदर्शिता नहीं बताती।

हाँ, अगर वह उनका लक्ष्य होता।

२. वे अपने बारह वर्षीय लड़के पर दोष लगाते हैं कि भारतीय या हिन्दू मूल्यों को नहीं समझना और अभी ही अमरीकन बच्चों की तरह की फ़िल्म देखना चाहते हैं अतः: वही सोचकर यह फ़िल्म कुछ अमरीका पैटर्न पर बनी है और उसके पात्रों के पहनावे भी। इसका दोष केवल उनकी और उनकी पत्नी द्वारा बच्चों को पालने के एवं उसके सामने आदर्श रखने रखने के ज्ञान या चाहत पर है। मैं खुद अब 83 साल का IIT खडगपुर का 1957 का मेकेनिकल इंजीनियर। मेरे तीनों बेटे अमरीका में हैं, पाँच पोते भी। पर जब मैंने एक को एकनाथ ईश्वरन की अंग्रेज़ी में काव्य रूप में लिखी The Upanishads भेजा, वह एक बार में ख़त्म कर ही उठा। अपने दायित्व एक नागरिक, पिता, पति, पुत्र, भाई, बहन रूप में समझिये फिर आप एक युगान्तरकारी फ़िल्म की कथा लेखक या गीतकार बनिये या फ़िल्म बनाइये।हम फ़िल्म निर्माता से कुछ ज़्यादा उम्मीद नहीं करते, पर आपसे ज़रूर- पैसा साथ में नहीं जाता, पर देवदास की तरह सफल कहानी लिखना या फिर उसका फ़िल्म।

तुलसीदास आज के हिन्दूओं के लिये राम चरित्र का वर्णन किया है- आदर्श बीर एवं महान व्यक्ति- बालकांड में जनकपुर जाते वक्त यज्ञों के बाधक असुरों का संहार, समाज त्यक्त अहिल्या देवी का सम्मान दिला समाजिक सम्मान दिलाना, मज़बूत संयुक्त परिवार के आदर्श पुत्र, भाई; पूरे देश भर से आये आयु में बहुत बड़े बलवान द्वारा न टूटनेवाले धनुष को तोड़ना, माता के कारण पिता की आज्ञा पर १४ साल का वनवास पूरी मर्यादा बनाते हुए, ऋषियों से ज्ञान प्राप्त किया, रक्षा की, निम्न जाति कहे जानेवाले केवट, निषाद, कोल, भील को गले लगाया, निम्न जाति की ही शबरी को जीवन्मुक्त बनाया, पक्षीराज जटायु को सम्मान दिया, फिर बालि के अन्याय रूप से वनवासित भाई वानरराज सुग्रीव को दोस्त बना उनकी सहायता ली, और तब हुआ समुद्र पर पुल बांध लंकापति से युद्ध और विजय का गुर बताना विभीषण को-

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥4॥

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥5॥

और आख़िरी में

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥80 क॥

काश! आज भी हम तुलसीदास की रामचरितमानस को अपने समझते और अपने बच्चों को समझाते। राम भारत के आदर्श पुरूष हैं और सीता आदर्श नारी और उसी तरह उनका सम्मान होते रहना चाहिये पीढ़ी दर पीढ़ी….अगर हम भारतीय या हिन्दू बने रहना चाहते हैं।

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निरर्थक है बिना समझे नित्य पाठ 

हम धर्मग्रंथ का नित्य पाठ कर अपने कर्तव्य का अन्त क्यों कर देते हैं? उसके सर्जनकर्ता की इच्छा को क्यों नहीं समझते हैं? वह तो इन ग्रंथों को समाज के पढ़े लिखे या अपढ समझदार व्यक्तियों में अपने जीवन के स्वभाव एवं आचरण में बदलाव लाने के लिये लिखा गया था- चाहे वह उपनिषद् हो या गीता हो या फिर रामचरितमानस या सिख धर्म का ‘सुखमनी साहब’।  

कुछ दिनों पहले आम्रपाली के नीचे के छोटे मैदान में हम दो-तीन सबेरे बात करते करते घूम रहे थे। हम में एक सरदार जी थे जो अभी कार्य रत हैं। बात सिख धर्म की एक रोज़ाना पाठ्य पुस्तिका ‘सुखमनी साहिब’ की हो रही थी। एक मेरी पहिचान की महिला यह सुन रही थी। देखा वे ऊपर गई एक नई प्रति ले आईं और बहुत प्रेम से भेंट दिया जो हिन्दी में थी और वे समझीं मैं सब पढ़ कर समझ जाऊँगा। मैंने सादर भेंट स्वीकार की।पर घर आकर पाया कि उस पुस्तक में केवल गुरूमुखी में लिखी बानियों को हिन्दी में लिख दिया गया है। कुछ समझ नहीं सका और अपनी कमजोरी बता दाता को क्षमा मांगते हुए लौटा दिया। पर जब यह बात अपने सेक्टर ४१ के पुराने दोस्त अरोड़ा जी को बताया, तो मुझे विना बताए हुए एक और किताब अर्थ के साथ वाला मंगा दिये अपना पैसा लगा। पढ़ रहा हूँ और कुछ समझ आने लगा है-

‘काम क्रोध अरू लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव।

नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरुदेव॥६.१॥

हे नानक!(विनती कर और कह) हे गुरदेव!हे प्रभु!मैं (आपकी)शर्ण में आ गया हूँ, ( मेरे ऊपर) कृपा कर, (मेरा) काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार दू हो जाये।’

गीता के ॐअक्षर ब्रह्म की तरह संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में बालकांड में ‘राम नाम की महिमा’ का विस्तार से  वर्णन किया है। सुखमनी भी गुरुनाम की महिमा और आज के लोगों के संसारिक सुखों में सब भूल सत् की तरफ़ से मुँह मोड़ असत् में लगे हुए लोगों के लिये है। अधिकांश सांसारिक लोग किसी मूल्य पर धन अर्जित करने और संग्रह करने, शारीरिक सुख की सब सुविधाओं को जुटाने में लगे हैं। भगवान को समझने के लिये और साथ ही समाज को सद् रास्ते पर चलने के लिये आम लोगों में अच्छे चरित्र और स्वभाव में सदाचार ज़रूरी है। इसकी कमी दिनों दिन  होती जा रही है। भगवद् गीता भी यही कहता है- 

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥16.21॥

काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार (सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को ‘नरक के द्वार’ कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

अब देखिये रामचरितमानस के लोकप्रिय कांड (सुन्दर कांड) में यही कहा है- 

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥38॥

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ- ये सब नरक के रास्ते हैं, इन सबको छोड़कर श्री रामचंद्रजी को भजिए, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं।

हनुमान चालीसा और सुन्दर कांड बहुत हिन्दी भाषी पढ़ते हैं एक नित्य उपासना के कर्म की तरह, पर कुछ कामना मन में लिये। हनुमान चालीसा से सरल भाषा में कुछ लिखा ही नहीं सकता। उसमें भी एवं फिर रामचरितमानस के लोकप्रिय सुन्दर कांड में बहुत शिक्षाएँ  दे रखी है। कृपया ध्यान दीजिये- 

पहले हनुमान चालीसा से 

१. ‘बल, बुद्धि विद्या देहु मोही, हरहु कलेश विकार॥’

२.‘ महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी॥’

३.‘ सब सुख लहें तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥’

सुखमनी में राम का ज़िक्र भी है श्रद्धा से नित्य जपे जानेवाले में सुखमनी में। पर आश्चर्य तब हुआ जब आज श्री अरोड़ा ने कहा कि वे नित्य पाठ तो करते हैं, पर समझना क्यों ज़रूरी है। सभी धर्म ग्रंथों को पढ़ अगर हम समझें नहीं फिर बदलेंगे कैसे अपना आचरण? धर्म मार्ग पर चलेंगे कैसे हम सब तो उलझें ही रहेंगे सांसारिक समस्यायों या कुछ कामना की पूर्ति के काम में या अनित्य चीजों के संग्रह में बुढ़ाती तक?

हम बहुत हिन्दू एक भजन ‘ श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन….’ को गाते होंगे, पर विना समझे। देखिये उसकी आख़िरी पंक्ति है- 

‘ मम हृदयकंज निवास करू कामादिखलदल गंजनम्।’ काम इत्यादि दुष्ट समूह से हम अपने को बचा पायेंगे।

जबतक हम अपने से इन सब कमियों को दूर करने का प्रयत्न न करेंगे तो तब तक केवल पाठ करते रहने से क्या फ़ायदा होगा। केवल मन की संतुष्टि के सिवाय कि हम भी पूजा तो करते हीं हैं।

मैंने अपने बचपन में गाँव के किसी न किसी के परिवार के बाहरी बैठक रात में रामचरितमानस ढोलक झाल पर  झूम झूम गाया जाते देखा था। पर बहुत कम ही इसके अर्थ समझते थे, कहानी वाले भाग को छोड़। दो-तीन साल पहले हमारे मेघदूत के समउम्र दोस्त और विद्वान श्री महेन्द्र सिंह जी ने भी एक दिन सुन्दरकांड का विशेष घर में आयोजन किया था। मैं भी था पर शायद ही जुटे समाज में सुन्दरकांड की सीखों से कुछ ख़ास मतलब था। पाठ के व्यवसायिक ढंग-बाजा आदि के संग के रागमय पाठ को सबने सराहा। पर कभी कुछ विषय वस्तु को समझाने का न पंडित महाशय ने प्रयत्न किया, न किसी ने अनुरोध किया। क्या इस तरह के पाठ करने या सुनने से कुछ हमें कुछ  मिलेगा, या जब बुढ़ौती में भी सब विकारपूर्ण काम में लगे रहेंगे। 

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Today’s Requirement for be world class company

Today every country including the USA and Germany, Japan must take lessons from Elon Musk and Management expert Porter who told the companies to remember the principle of making, growing and then destroying from ancient Hindu philosophy. The companies must get a small pool of technocrats but so many MBAs but engineers with appreciation of designing a cutting edge product, each bit of manufacturing processes and equipment with built-in top quality and about all inputs that go into the product, and keep on destroying the old at all levels. The two individuals from the USA have shown that one is Elon Musk of Tesla and the other is Steeve Jobs and Tim Cook of Apple. They kept the products,processes following the Hindu philosophy or for some who do not like Porter’s input.

Both kept a sharp eye on product design improvement and manufacturing processes of each step in mind. Musk adopted Giga Press and developed special aluminium alloy for integrating body building processes cutting cost at all levels of manufacturing. Everything input in the car is special and unique, adding to engineering marvels. Their 4860 battery and its mass production process are just exemplary. So was done at Apple too.Long back I had gone through their manufacturing mobile phone aluminium cell with high speed machining…


Here are a few u-tubes videos showing the change in the auto sector with Tesla that can’t be bettered or even copied by other competitors of the world.. China May do it but they must have someone like Elon Musk or Steeve Jobs to become one.

I give a challenging task to all global technocrats to develop air conditioners that will not transfer heat from outside to the atmosphere increasing day by day the summer temperature unless something all around development gets executed by all countries with mutual cooperation in sharing technologies rather than making money out of it for a class of population.

Giga Castings with Sandy | Evolution of Tesla Bodies In White” https://youtu.be/WNWYk4DdT_
Model Y teardown https://youtu.be/wLafQaE2zLo
4860 Battery pack https://youtu.be/ozesI3OZEG0

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