चुनाव २०२४ सम्बन्धित

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देश के वे कायर सुने शेर की दहाड


सभी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद जिसने देश के महिलाओं के लिये, जवानों के लिये, किसानों के लिये, जवानों के लिये मर मिटने की , ज़िन्दगी जीने की क़सम खाई है। हर भारतवासी यह सोचे कि उसके सपनों में चोरों द्वारा दरार लगाने पर भी उसके मन में भारत को दुनिया का सिरमौर बनाना सर्वोपरि हैं। वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये मरने दम तक प्रयत्नशील रहने के प्रतिबद्ध है। कोई विपदा उसे हिला नहीं सकता, कमजोर नहीं कर सकती। देश के जिन लोगों ने धोखेबाज़ी की वे शर्म करें या न करें, देश उनको माफ़ नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा कर उन्होंने देश को धोखा दिया है और चोरों का साथ दिया है कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ या जाति का होने के कारण । वे अपने को बेंचें हैं कुछ रूपये या कुछ मनपसन्द चीजों के लिये। गीता के अध्याय १६वें केअनुसार वे ही असुर है। अगर पढ़ना आता हो तो देंखे। इन असुरों का राम नाश करेंगे भले ही कुछ समय लग लग जाये।
इन असुरों को समझना ही होगा कि जहां राम गिरी स्त्री को नया जीवन देते, भक्ति शबरी को अमरत्व देते, पच्छीराज जटायु को स्वर्ग देते हैं, केवट या निषादराज, या सभी कोल भील को गले लगाते हैं, बानर, भालू और राक्षस वंश के जीवों को भी अमर कर दिये, उन्हीं के भक्त के साथ जो धोखेबाज़ी करता है उसको भी वे नहीं छोडते।
हमारे हिन्दू धर्म की तरह कोई दूसरा धर्म हो ही नहीं सकता- ‘समं सर्वेषु भुतेषु तिष्ठन्तंपरमेश्वरम् ( १३.१७) – सब चराचर भूतों (प्राणियों) में परमेश्वर समभाव से रहते हैं और हमें सबमें सम रूप से देखने का आदेश भी देते है। फिर जाति कैसी?
और फिर अध्याय ६ में

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६.३२॥ सब लोगों को सभी व्यक्ति के दु:ख सुख में सहर्ष सहायता या उल्लास मनाने ही हमारा धर्म है।
हम क्यों लज्जित हो जो बिके देश विरोधी काम किये उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिये या समाज में मुँह नहीं दिखाना चाहिये।

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मोदी की नई सरकार


एक तरह से चन्द्रबाबु नायडू का मोदी के साथ आना और ओड़िसा में बीजेपी के आने से देश में औद्योगिक प्रगति का एक नया दौर चालू होने का बातावरण बन रहा है। आन्ध्रप्रदेश और ओड़िसा समिल्लित समुद्रीय तट क्षेत्र चीना के सेनजेन प्रदेश की औद्योगिक क्षेत्र के बराबरी का ही एक औद्योगिक क्षेत्र बन जाने की संभावना रहेगी, क्योंकि औद्योगिकरण के क्षेत्र में मोदी की तरह ही नायडू भी रहे हैं। हैदराबाद का बंगलौर के बाद एक दूसरा देश के एक बड़े आई.टी केन्द्र की तरह उभरना केवल नायडू के कारण ही सम्भव हो पाया है। उनका अमरावती को प्रदेश की नई राजधानी की तरह एक विश्वस्तरीय नगर बनाना भी वह सपना है जो मोदी के सपनों से मेल खाता है। मोदीजी को नायडू की मदद करनी बिना किसी हिचक के। आँध्र कृषि क्षेत्र में भी बहुत आगे है और मोदी जी नायडू को आंध्र के कृषि क्षेत्र को पंजाब से बेहतर निर्यात करने वाला सबसे बड़ा प्रदेश बनवाने में मदद कर सकते हैं, वहाँ के किसानों की सभी उपज को पंजाब की तरह FCI से MSP पर ख़रीदवा कर। आंध्र में फ़ूड प्रोसेसिंग का सबसे बड़ा प्रदेश बनने का मादा है। इसी तरीक़े को उन्हें ओड़िसा में समुद्री किनारे को उन्नत बनाने में करना चाहिये और ओड़िसा को इसमें चन्द्रबाबू नायडू की सहायता लेनी चाहिये जो उनकी साख को बढ़ायेगा और भारत की उन्नति का रास्ता खोलेगा। ओड़िसा में एक बडा पोर्ट बनाने और उसे रेल रोड से जोड़ने की ज़रूरत है।
पर समझ में नहीं आता नीतिश जी कैसे बिहार के लोगों को शिक्षित और समृद्ध बनाने में और मोदी के दर्शन को जमीनस्तर लागू करने में मोदी की सहायता करेंगे, जिससे आम जनता खुश हो सकें। कैसे वे बिहार के शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करेंगे और कृषि क्षेत्र में कुछ अनुठी व्यवस्था ला सकेंगे? बिहार की शिक्षा व्यवस्था था पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी है और उसे एक बहुत मज़बूत इच्छाशक्ति का व्यक्ति फिर पटरी पर ला दौड़ा सकता है। बहुत कुछ किया जा सकता है, अगर वहाँ कृषि क्षेत्र में आमूल परिवर्तन किया जाये और एक सफल टेक्नीकल झुकाव वाले व्यक्ति की बात मानी राजनीति कुछ सालों के लिये एकदम छोडकर । जो मेरे विचारों से सहमत हो, बताइये।

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चुनाव २०२४-एक रोचक वाक़या

रास्ते में २०-२२ साल का नौजवान उबर ड्रॉइवर अचानक बात करने लगा उत्तरप्रदेश के वोटरों के मोदी के साथ विश्वासघात करने के लिये जिसने उत्तरप्रदेश के निचले वर्ग के लिये इतना किया और पर उसकी उत्तेजना मेरे समझ में नहीं आई। मैंने समझाने की कोशिश की। पर वह बार बार कहता रहा कि ये मतलबी अपने वर्ग को दिये सब सुविधाओं का लाभ उठाये, जो किसी ने इतने सालों में नहीं दिया। मैं जानना चाहा क्या दिया मोदी ने। उसका जबाब था, “सर, क्या वे ज़िन्दगी में कभी शौचालय बना पाते? क्या कभी उनको घर मुअस्सर होता? क्या घर में पानी के नल का सोच भी सकते थे सपने में या गैस के चूल्हे खाना बनाने का?…वह बोलता जा रहा था बिना मेरी तरफ़ से देखे बिना मेरी प्रतिक्रिया जाने या किसी प्रश्न किये….”ज़िन्दगी के क्या कभी सोचे भी होंगे बिजली के प्रकाश का घर में? कौन उन्हें आजतक मुफ्त प्रति व्यक्ति पाँच किलो अनाज देता सालों? कौन उसी घर के लोगों को सब्ज़ी या फल या, मछली आदि का ठेले पर या रास्ते में दुकान लगाने के लिये सस्ता बैंक से क़र्ज़ा दिलाता? क्या यह पैसा नहीं है? तब भी क्यों उनका सबसे बड़ा ख़र्चा ढर्रे पर है? और एक बोतल शराब पर गाँव के ठेकेदार उनका वोट ख़रीद लेता है और वोट देने के बाद सौ-दो सौ रूपया और देने का वायदा कर बूथ तक जाना पक्का कर लेता है? मैं उसे रोक रहा था, क्योंकि मुझे लगता था कि वह मेरा घर भूल जायेगा और मुझे देरी हो जायेगी। एकदम मेरे टावर के नीचे तक गाड़ी लाया, श्रद्धा से प्रणाम किया बार बार, फिर पता नहीं किस चीज़ के लिये ‘सारी’ भी कहा। उसे धन्यवाद कर और खुश रहने की नसीहत दे मैं निकल आया सीढ़ियाँ चढ़ने के लिये….
मैं अभी तक भी नहीं समझ पाया कि उसका मोदी या उनकी पार्टी के प्रति इतनी सहानुभूति क्यों है? हाँ, एक बात की याद आती है गाँव के पंचायत के चुनाव में ऐसा ही होता था-प्रति वोट कुछ ख़ास रक़म और…..दु:ख की बात है कि आज हर क्षेत्रों में काम पाने का ज़रिया ठीक्केदार ही हैं यहाँ फ़ैक्टरियों में, घर पर नर्स रखने केलिये, रसोइया, सुरक्षाकर्मी ..ये ठिक्केदार बहुत पैसेवाले होते जा रहें हैं। पर यह सिस्टम ग़लत है। यह उद्योगपतियों का लेबर कोस्ट कम करने का तरीक़ा है…
पुन्श्च: हाँ, एक बात और मैं उबर ड्राइवर के दुख का कारण के पक्ष में बता रहा हूँ। FE में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार एक रिपोर्ट के अनुसार, “भाजपा की हार अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों तक फैल गई। हारी हुई 92 सीटों में से 29 एससी और एसटी के लिए आरक्षित थीं, जिससे इन समुदायों के समर्थन में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई।”

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चुनाव २०२४- कुछ प्रतिक्रिया

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मोहन भागवत का भाजपा नेतृत्व के विरूद्ध रणभेरी- हिन्दूओं की कमजोरी का द्योतक
श्रद्धेय मोहन भागवत जी का इस समय इस तरह का प्रेस के ज़रिये बयान देना हिन्दूओं के अनादि कमजोरी का एक उदाहरण है जिससे हिन्दुओं का लाभ कम और नुक़सान ज़्यादा होगा। भागवत् जी राजनीतिक दल बीजेपी का बदलता चाल पहले से ही देख रहे होंगे। उन्हें इसको ठीक समय पर ही बात कर लेनी चाहिये एक मीटिंग कर। आज मुसलमानों ने चाहे बहकावे ही हो आकर एक मुश्त भाजपा के प्रत्याशी के विरूद्ध वोट देते हैं, यह एक बड़ी समस्या ऐतिहासिकरूप से चली आ रही है।मोदी इसे शायद समझते हुए भी उन्हें मौक़ा देना चाहते थे। पिछड़े वर्ग पर मानवीय नाते से अप्रत्याशित रूप सभी किया खर्चा भी उस वर्ग के मानसिकता के कारण काम नहीं आया, जो सदियों की ग़ुलामी से अपना सद्य लाभ से प्रलोभित हो जाने के कारण बीजेपी के विरूद्ध हो गये। प्रधान मंत्री के इतनी प्रतिकूल अवस्था में भी जीत को अपने पक्ष में बदल देने के प्रयास भी जो छोटी बात नहीं थी, भागवत जी को इसके लिये बधाई देना चाहिये था।
संघ और चुनाव लड़नेवाले राजनीतिक दल को समय की नाजुकता समझनी चाहिये। अगर यह पहले तय नहीं हो पाया था तो कुछ समय और प्रतीक्षा कर संघ को बीजेपी नेतृत्व से बातचीत कर भविष्य के लिये रास्ता निकालना चाहिये था। साधारण हिन्दू वोटरों को तो यही समझ थी कि दोनों हिन्दू इकाइयों में तालमेल बना हुआ है। हम हिन्दू देश में हिन्दूओं की सरकार चाहते हैं जो हिन्दूओं की प्रतिष्ठा बढ़ाये। परिवारवादी पार्टियों को रोकना और देश को परिवारों के राज्यों से बचाने में सब हिन्दूओं की सहायता चाहिये। चाहे पिछड़ा वर्ग हो या हमारे मुसलमान भाई सबको समान मौक़ा मिला है अपने को सम्पन्न बनाने का। यह अलग की सुविधा चिरस्थायी व्यवस्था तो नहीं बन सकती।
हिन्दू समाज के हित में यह जरूरी है कि इतिहास की गलती न दुहराई क्योंकि देश हित में भी यही ठीक है। संघ और दल के हर सेवक पूरी ईमानदारी से देश पूरी तरह समर्पित हों। किसका वर्चस्व हो की भावना ही नहीं चाहिये। हमारा धर्म जब संसार हर भूत (प्राणी) में एकत्व पर ही टिका है, तो फिर हमारे धर्म के नेता ही यह न समझें तो कैसे चलेगा।
हाँ, एक बहुत बड़ी संख्या में हिन्दुओं के संत और महात्मा केवल पूरे देश में फैले अपने आश्रमों, मठों, मन्दिरों में ही रहने लगे है। अधिक से अधिक उनका शहरों से सम्पर्क होता है। वहाँ के धनी लोगों काफ़ी अर्थार्जन भी होता है। पर अभी भी भारत की एक बड़ी जनसंख्या गाँवों में रहती है , जिन्हें स्कूली शिक्षा भी नहीं मिली है। उन्हें कौन अपने सनातन धर्म को सरल सहज भाषा में समझायेगा। धार्मिक संस्थानों और उनके प्रमुखों को इस खाई को भरने का प्रयास करना चाहिये। सहज स्थानीय भाषा में उपनिषदों, गीता, मानस आदि का हिन्दू धर्म के आख़िरी छोर पर रहनेवाले हर व्यक्तितक पहुँचाने का भार तो किसी न किसी को लेना होगा।

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चुनाव २०२४ – कुछ विचार

चन्द्रबाबु नायडू ने वायदा किया है कि वे २०४७तक आंन्ध्रप्रदेश के लोगों को दुनिया का सर्व्वोच स्थान दिला देंगे और अपने प्रदेश को भारत के प्रदेशों में प्रथम स्थान पर पहुँचा देंगे।और उनके पिछले दौर के मुख्य मंत्री काल के उपलब्धियों का इतिहास हमें उनकी बात पर भरोसा करने का विश्वास दिलाता है। इस विषय पर मोदीजी साथ देंगे उनका, क्योंकि वे सब प्रदेशों को ही उन्नत बनाना चाहते हैं। मोदी और नायडू मिल आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों को दुनिया के सबसे बड़े मैनुफ़ैक्चरिंग केन्द्र में परिणत कर देंगे जैसे चीन का जियांग्सू , गुआंग्डोंग , शेडोंग , शंघाई और झेजियांग प्रांतों के तटीय क्षेत्र हैं ।मोदी यह भी कोशिश करेंगे के ओड़िसा के तटीय क्षेत्रों में भी वैसी ही प्रगति हो। सभी तरह के बड़े और छोटे कारख़ानों को लगाया और निर्यात किया जा सकता है वहाँ के बन्दरगाहों से। औद्योगीकरण से आंध्र प्रदेश तमिलनाडु को पछाड़ सकता है। बिशाखापट्टनम के बन्दरगाह के भीतर इलाक़ों में औद्योगिक क्षेत्र बना और अमरावती में एक नया ए. आई. आदि के अनुसंधान केन्द्र और उद्योग बना आँध्र बहुत आगे आ सकता है। साथ ही मुझे मालूम है अपने पुराने सम्पर्कों सें कि आंध्र का कृषि क्षेत्र भी बहुत पैदावार और बडा भी है।

पर मोदी के दूसरे महत्वाकांक्षी सहयोगी बिहार के मुख्य मंत्री नीतिश जी क्या बदलेंगे? मोदी ने तो पहले बार दिल्ली की गद्दी सँभालते ही बिहार में दो रेलवे उद्योग के विश्वस्तरीय कारख़ाने लगवाया और सिद्ध कर दिया समुद्र तट का न होना पिछड़ेपन का कारण नहीं बन सकता। बिहार बहुत उद्योगिक केन्द्र अभी भी हैं जहां के पुराने कारख़ानों को किसी योग्य व्यक्ति के नेतृत्व में चालू करा बिहार के विकाश को गति दी जा सकती है।बिहार एथानल का सबसे बडा उत्पादन केन्द्र बन सकता है पूर्वांचल के गन्ना, मक्के, बाजरे की खेती करके और पूराने, नये चीनी मिलों कोअच्छे कर्मठ औद्योगिक मालिकों से चलवाकर। बिहार फ़ूड प्रोसेसिंग का भी देश का सबसे बड़ा क्षेत्र हो सकता है और निर्यातक भी, क्योंकि धान, गेहूं और गन्ने के अलावा बिहार साफ़ पानी की मछलियों, आलू और अन्य सब्ज़ियों का देश का सबसे बड़ा उत्पादन करने वाला प्रदेश बन सकता है। गंगा के कारण बिहार की मिट्टी इसके अनुकूल है और पानी की कमी भी नहीं हो सकती। साथ ही ब्रिटिश काल में ही नहरों का जाल बिछ गया था इस प्रदेश में। दूसरे दो संभावित उद्योग चमड़े और दूध का हो सकता है। एक रोचक खबर पिछले सुना और आज उसका विडियो भी उपलब्ध है- https://youtu.be/_juYRUvorZ0?si=BFzR19uV_2AYRpCg
प्रदेश को सोने की चिड़िया बनने की भगवानदत्त असीम संभावना है । पर प्रदेश की सबसे बड़ी कमजोरी वहाँ के लोगों का समय के साथ बिगड़ा आचरण और स्वभाव हो गया है जिसे पिछले चालिस पचास दसकों से बढ़ावा मिला है। बिहार आज देश का हर तरह से सबसे पिछड़ा प्रदेश बन गया है। वहाँ के राजनीतिक लोगों को शर्म भी नहीं आती चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, चाणक्य, आर्यभट्ट या नालन्दा का नाम लेने में जिनके वे वारिस हैं। हर व्यक्ति वहाँ जाति की बात करता है और अपनी जाति को छोड़ सब जातियों को नीचा दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। इसे बदलना होगा समाज के अगुवाओं को या नई पीढ़ी को।
नीतिश जी अगर कम से कम शिक्षा के लिये स्कूलों, कालेजों, और इंजीनियरिंग, मेडिकल के शिक्षा का प्रबंधन तो सुधार देते, तो यह जो उनका अमर बनने का आख़िरी मौक़ा है, सफल मुख्य मंत्री या नायक कहलाते। और अब यह एक भूल भी उनको बिहार के इतिहास का सबसे मतलबी नालायक बना देगी।

बिहार और आंध्र दोनों को चाहिये कि सभी राष्ट्रीय एक्सप्रेस वे पर कुछ प्राइवेट क्षेत्र के बड़ी और अच्छी कम्पनियों द्वारा सब सुबिधा एवं साधन सम्पन्न स्मार्ट नगर बसाये जो गाँवों के सम्पन्न लोगों को वहाँ बसने को प्रेरित करे और पुराने शहरों का पुन: निर्माण या बदलाव करने का मौक़ा दे।

दोनों ही राज्यों के मुख्य मंत्रियों को सभी उद्योगों को सरकारी या ग़ैरसरकारी तकनीकी शिक्षा संस्थानों से ९वी दसवी कक्षा के और उसके ऊपर के उत्सुक क्षात्रों को उद्योगों में कम से कम एक या दो सप्ताह की ट्रेनिंग करवाने की व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे बच्चों की रूचि का पता चले या बदले। पाठक्रम में औद्योगिक और विज्ञान के बड़े व्यक्ति सरल जीवनी पढ़ने की ब्यवस्था करे, राजनीतिक नेताओं के बारे में बता तो कुछ भी फ़ायदा नहीं। मैंने अपने ८५ साल में बंगाल और बिहार को पिछड़ते हुए देखा और अपने बाक़ी जीवन में गलती का अहसास कर बदलते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ । भगवान लोगों को सद्बुद्धि दें।

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देश का आज का विजनेस सम्प्रदाय-एक बिचार


देश के विदेश मंत्री का बिचार सुनिये –
Jaishankar’s Big Warning To Indian Businesses On China Trade। https://youtu.be/4H72VSILFss?si=mlDDNbfGaOJ6i5bN


अब पढिये कुछ मेरा ८५ साल का उद्योगक्षेत्र का अनुभव और अगर नहीं सहमत है तो बताइये।

देश के ग़द्दार विजनेस सम्प्रदाय का कोई धर्म ईमान नहीं हैं, एकमात्र ध्येय या लक्ष्य अपनी और अपनी सात पीढ़ी के लिये सम्पति जमा करने को छोड़ कर।


आप खुद बिचार करिये ये अरबपति जो अपने धन का नंगा प्रदर्शन कर और करवा रहे है कभी सोचते हैं कि कहाँ से आया है धन- क्या इसी भारत से नहीं? क्या वे खुद या उनकी संतानें अपने धन के बल पर अमर हो जायेंगे, सब दुखों से मुक्त? क्या कोई आजतक हुआ है? यही हमारे धर्मगुरुओं ने भी बताया है।


फिर
क्यों अपनी बच्चों की शादियों के समारोह में चार सौ बरात में निमंत्रित के अपने अपने विमान से आने के कारण जामनगर हवाई अड्डे के जैम हो जाने की खबर समाचार में आ जाता है? क्यों उनके अरबों के खर्च वाले शादी की चर्चा सब अख़बार करते है? उनके देश विदेश के शहरों में सैकड़ों करोड़ रूपये या विदेशी मु्द्रा के घरों या महलों का समाचार आये दिन होता है? क्यों आपके वारड्रोब का भंडार समाचार बनता है? क्यों क्यों आपका चार साल का पोता पैदा होते ही अरबों का मालिक बन जाता है?

अब आप बताये कितने अमरीका के उद्योगपति भारत में अपना घर ख़रीदते हैं? आप अपनी अमरीकन विश्वविद्यालयों को तो बड़ी राशि में अनुदान देते हैं जहां आप इसलिये पढ़ने गये क्योंकि भारत के टॉप यूनिवर्सिटी में आपको दाख़िला नहीं मिलता। कितने उद्योगपति IISc, IITs, या अन्य ऐसे संस्थाओं में करोड़ों का भी दान देते हैं, जब उनकी सेवा सब लेते हैं ज़रूरत पड़ने पर?


अपने हर उद्योग में कितना आयात करते हैं चीन या अन्य देशों से? क्या आपने अपनी कोई इच्छाशक्ति और भारत में उपलब्ध ज्ञान को इन आयातित चीजों के बदले में उन्हें अपने यहाँ उत्पादित करने पर लगाया है या अच्छी गुणवत्ता की चीजों को ज़्यादा से ज़्यादा निर्यात कर चीन की श्रेणी में भारत को पहुँचाने का यत्न किया है? कितने उद्योगपति यहाँ बनते चीजों को चीन के कम्पनियों को सैंपल दे वहाँ से सस्ता वैसे ही दिखता माल आयात कर भारतीयों को बेंचते है और धन कमाते हैं?
विकसित भारत का सपना क्या एक साधारण घर के प्रधान मंत्री, जिसका कुल धन ३.५० करोड़ है, का ही होना चाहिये? आपने अपने सभी व्यवसायों के लिये २०४७ के विकसित भारत के मेल का सपना क्यों नहीं बनाया या अभी भी बनाने की कोशिश कर रहे हैं? आप अपने धन को R&D में खर्च कर अपनी कम्पनियों को दुनिया की सबसे बड़ी ब्रैंडेड कम्पनी क्यों नहीं बना सकते है? क्या नये अनुसंधान सरकारी अनुसंधान केन्द्रो में ही होना चाहिये? ये अरबपति क्यों अपने सबसे छोटे से छोटे कर्मचारी को संसार के ‘पर कैपिटा’ के बराबर मासिक वेतन नहीं देने का सपना देखते, या कम से कम अपने जीवन काल में करोडपति?


क्यों कम्पनी के कुल मुनाफ़ा के हक़दार केवल मालिक, शेयर होल्डर और ०.२ प्रतिशत उनके केवल सर्व्वोच अधिकारी ही होते है? आज भारत के व्यापार का सबसे बड़ा हिस्सेदार चीन बन गया है अमरीका को हटा। एक उदाहरण देखिये, टाटा, महिन्द्रा आदि बिजली के कार बहुत साल पहले बनाये, बाज़ार में भी लाये, पर आगे बढ़ टेस्स्ला की तरह नहीं बनने की कोशिश किये। वे आज भारत की ज़रूरत पूरा करने की भी कोई कोशिश करते भी नहीं दिखते, किसी अपना अस्तित्व बनाये रखने का ध्येय है। चीनी कार कम्पनियाँ आती जा रहीं हैं। बाहर के लोग भारत के मोटर उद्योग बार बार चेता रहे हैं, पर यहाँ कोई ऐसी हड़बड़ी नहीं हो जायेगा तो ठीक है, नहीं होगा तो हमारा क्या नुक़सान होगा। टाटा और महिन्द्रा दोनों विश्वस्तरीय कम्पनी बन सकते हैं, पर लगता है कहीं दृढनिष्ठा और आत्मविश्वास की कमी है।


आज विदेश मंत्री जयशंकर को बोलते देखा तो मुझे भी बहुत दुख हुआ और यह लिख बैठा। कौन पढ़ेगा, कौन सुनेगा, और कौन करेगा? पर अपने व्यक्ति प्यास की तरह पहले मोदीजी को एक ट्वीट किया” @narendramodi कृपया टाटा और महिन्द्रा को जल्दी EV cars के प्रोडक्शन को देश के ज़रूरत के बराबर करें हर महीनेलाखों में, नहीं तो चीन की EV की सैकड़ों कम्पनियाँ भारत में छा जायेंगीं ।टेस्सला या पैनासोनिक को गाड़ी की कम्पनी के पहले एक EV के बैट्री की कम्पनी यहाँ लगवाने की पहल कीजिये।”
और फिर यह ..
Jaishankar’s Big Warning To Indian Businesses On China Trade, Days After Xi Jinping’s Europe Tour”

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भारत बनाम चीन- भारत क्या जीत सकता-हाँ या नहीं, कैसे हाँ

भारत बनाम चीन- भारत क्या जीत सकता-हाँ या नहीं, कैसे हाँ
हमारी मानसिकता में समस्या से जुझने और हल निकालने का विचार इतने सालों की ग़ुलामी के कारण कम से कम होती गई है। आज फिर हर व्यक्ति में अपनी, समाज की, देश की वैसी मानसिकता को मिटाना है। चुनौती लेना है।

उसके उदाहरण है पिछले वर्षों की कुछ बदलाव की उपलब्धियों की कहानी। हमने कोविद की अपनी वैक्सीन बनाने की चुनौती ली, सफल हुए और अपने और अन्य देशों के करोड़ों की जान बचाई। ५ जी की और चन्द्रयान-३ की सफलता या अपनी डिजिटल अनुसंधानों से मोबाइल फ़ोन को हर हाथ में कहीं भी पैसे निकाल देने और लेने का साधन बना देने के पीछे भी उसी तरह की मानसिकता थी। हम चीन से मुक़ाबला अगर करने की सोचते हैं तो हर क्षेत्र और सामान बनानेवाले और आयात से अपनी जरूरत पूरा करनेवाले उद्योगों के मालिकों एवं उनके मैनेजरों इंजीनियरों वैसी मानसिकता लानी होगी। किसानों को कृषि क्षेत्र के हर पैदावार में विश्वस्तरीय उत्पादकता लाने के लिये भी उसी मानसिकता की जरूरत है। हर विद्यार्थी और उनके माता-पिता, शिक्षकों को वही उत्साह बच्चों में देना होगा। महंगे कोचिंग से देश का हर बच्चा न शिक्षा में, न हुनर में किसी काम का बन पायेगा। विशेषकर निजी क्षेत्र की बड़ी से बड़ी के साथ छोटी से छोटी इकाइयों के मालिकों और उनके द्वारा अपने यहाँ काम करते हर व्यक्ति में उसी मानसिकता को लाना होगा। अन्यथा केवल उनके पास में अकूत धनराशि होगी , चल अचल और बैंकों में या शेयरों में। हर सेक्टर के निजी औद्योगिक मालिक और उनके कुछ चुने हुए ऊपर के २-५ % एक्ज़ीक्यूटिव, कम्पनी के कुल लोगों के वेतन पर खर्च किये जाने वाली राशि का ८० % प्रतिशत हिस्सा लेते हैं, और ८-२०% जही राशि बाक़ी लोगों में बंटता हैं और सबसे नीचे की बड़ी संख्यक लोगों को तो बहुत ही कम वेतन या अन्य फायदा मिलता है, जिसके कारन न उनके पास घर होता है, न परिवार के लोगों को अच्छा खाना नसीब होता है, न उचित शिक्षा या हुनर। यह हाल विशेषकर पश्चिमी देशों के पूँजीपतियों की नक़ल के कारण हुआ है। यह भारतीय विचारधारा के पूरी तरह से विपरीत है।


मैं खुद उन पुराने बड़े पूँजीपतियों के यहाँ काम किया है १९६१-२००० तक और पहले भी औद्योगिक छोटे शहरों में ही रहा हूँ जहां मेरे दादाजी और चाचा काम करते थे।उस समय के मालिकों की सोच कुछ ज्यादा भारतीय थी परम्परागत थी। रामराज्य के सपने को साकार करती। वे अपने नीचे नीचे कर्मचारियों के बारे में सोचते थे और उनको सब तरह की सुविधा देते थे। रहने का घर, बच्चों के पढ़ने के स्कूल, या दक्षता की शिक्षा की व्यवस्था। मैंने उषा सिलाई मशीन और फ़ैन बनाने वाली कम्पनी के प्रमुख मैनेजर टी. आर. गुप्ता को सुना था, बात की थी और उनके बारे पढ़ा था। जो साल में ६ महीने का वेतन एक ख़ास अवसर पर हर साल हर को देते थे। यह कहानी लम्बी हो जायेगी। व्यवस्थित सेक्टरों के उद्योगपतियों को इसी तरह की सोच रखनी होगी। हर कर्मचारियों को कम्पनी का भाग बना हर चुनौती का मुक़ाबला करने की मानसिकता बनानी होगी जिससे हर छोटे बड़े और नये चीजों का अपने यहां बना या बनवा सकें, और निर्यात पर विशेषकर चीन जैसे देश पर नहीं निर्भर रहना पड़े। नये पुराने, छोटे बड़े सभी तरह के उद्योगों के नेतृत्व को जुझारू मानसिकता लाने की जरूरत है, केवल सरकारी रेवड़ी से एक दिन मौज किया जा सकता है, बराबर नहीं। पर चुनौतियों से लड़ने के बल पर आप हर कर्मी को मौज की ज़िन्दगी मुहैया करा सकेंगे और पुण्य कमा सकेंगे ।


प्रधानमंत्री ने भारत में एक विमान विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की कामना की, क्योंकि उन्होंने भारत के एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम), विशाल प्रतिभा पूल और भारत में स्थिर सरकार के मजबूत नेटवर्क की क्षमता पर प्रकाश डाला, ताकि बोइंग जैसी कंपनियां एक विनिर्माण संयंत्र शुरू कर सकें भारत में। वे बोइंग के अमरीका के बाहर भारत में बने सबसे बड़े डिजाइन सेंटर का उद्घाटन करते हुए कहा। इन उद्योगों के सर्वेसर्वा विश्व स्तर भारत सहित विश्व के लिये ज़रूरी स्तर पर अनुसंधान, गुणवत्ता एवं उत्पादन की क्षमता बनाने की मानसिकता होगी और उसी के अनुरूप अपने सभी कर्मियों को ढालना होगा, केवल निजी धनार्जन की नहीं।


(PM wished to build an aircraft manufacturing ecosystem in India as he highlighted the potential of India’s strong network of MSMEs (micro, small and medium enterprises), huge talent pool, and stable government in India, so that the companies like Boeing starts a manufacturing plant in India.)

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देश एक संक्रमण काल में

देश एक संक्रमण काल में
पूरा शीतकालीन संसद का अधिवेशन में प्रदशित दृश्य मुझे अपने कार्य काल में हिन्दुस्तान मोटर्स में यूनियन के नेताओं के मनमानी हुड़दंगों की याद दिलाता है। जब इच्छा हो काम बन्द कर दे। संसद में देश की समस्याओं पर बहस क्यों नहीं होती? विपक्षी दल देश की समस्याओं पर बहस क्यों नहीं करना चाहता? क्यों विपक्ष कोई भी उल्टा सीधा माँग रख कर हल्ला क्यों करने लगता है? यह क्या यूनियन और मालिक वाले ढंग से चलेगा । देश के लिये यह सब अशोभनीय है। देश के सीमा पार के दुश्मन देश खुश हो रहे होंगे। कभी कभी इन सब बारदातों में उन्हीं विदेशी ताकतों का हाथ दिखने लगता है। एक प्रश्न यह भी आता है कि क्यों सदन को न चलने देनेवाले लोगों की तनख़्वाह कटनी चाहिये? अजीब लगता है हम पुराने लोगों को….समाचार पत्र लेना या टीवी के न्यूज़ चैनेल देखना तो बन्द कर दिया हूँ। लोगों की इन पर किये जानेवाली बातों भी सुनना बन्द कर दिया जाये। अगर संसद ही मर्यादाहीन आचरण करे, तो समाज के कुछ राक्षसी प्रवृति के लोग जो आचरण कर रहें है, उसे कौन रोकेगा। सभी धर्म के ठेकेदार तो शहरों के मालदारों से पैसे कमाने व्यस्त हैं, गाँव में हिन्दू को अपढ गंवार तथाकथित ब्राहमण जाति के लोगों पर छोड़ दिया गया है। बड़े बड़े या शादी ब्याह, मृत्यु आदि अवसर ही इन पंडितों की कमाई का साधन है। कौन लोगों के आचरण को बनायेगा। ऊपर से उनके प्रतिनिधि अगर ऐसे हों।


बड़ी संख्या में सांसदों को निलम्बित करना यद्पि ठीक नहीं है, विपक्षियों के कार्य तो वोट बैंक को आकर्षित करने के लिये किया जा रहा है। जया बच्चन अपनी स्वतंत्र पहचान छोड़ अमिताभ की बीवी बन अपने को एक ऐसे दल जो पूरी तरह के साथ एक वेईमान परिवार का रहा है । क्यों अपने यहाँ के कुछ शिक्षित लोग भी गांधी परिवार का समर्थन कर रहा है जिनमें सब तरह के दुर्गुण हैं। कबतक नेहरू और ग़लत ढंग से गांधी कहला यह परिवार देश के सहज साधारण बुद्धि के लोगों को बरगाला रहेगा।


देश के लोगों को एक उचित निर्णय लेना होगा, जब एक तरफ़ सुनहरा भविष्य दिखता हो, दूसरे तरफ़ पूरा अंधकार। खड़गे जो पूरी तरह से सोनिया गांधी के चमचे हैं, क्या प्रधान मंत्री बनने योग्य है। देश साम्यवादी विचारों के लोगी साजिश एक महान राष्ट्र इस अद्भुत प्रजातंत्र के कारण अपनी अपनी विराशत खो देगा?


कभी लगता है कि इसके पीछे विदेशी बडी शक्तियाँ और वहाँ के सोरोस के अरबपति लोगों और चीन की तरह धनी दुश्मन देशों का हाथ हैं। देश का दुर्भाग्य है कि नेहरू परिवार के प्रति लोग उनकी अपनी विदेश यात्राओं दिये व्यक्तव्यो को देखने सुनने के बाद उस परिवार को यहाँ रहने ही दे रहे हैं, पर उनको मनमानी करने की छूट है। कांग्रेस की अकूत सम्पत्तियों के मालिक हैं।क्या सब विरोधी पार्टियाँ देश के लिये बहरी, गूंगी, अंधी बन गईं और यही देश के असंख्य बुद्धिजीवियों का भी है।क्या हम ‘जननी, जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’, ‘ कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’, ‘श्रेयान् स्वधर्मः विगुणः पर-धर्मात् स्वनुष्ठितात्’?

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आज के प्रदेशों के चुनावों के नतीजे- एक विचार


भारत एक अजीब देश है शायद यह हरदम ही ऐसा ही था। इतिहास गवाह है। हवा ऊपर से नीचे नहीं बही, ऊपर से नीचे ही बहती रही। कांग्रेस, चाहे केरल हो, या कर्नाटक या तेलंगाना या तमिलनाडू- अगर वोट पाती है या जीतती है तो स्थानीय परिवारिक दलों के प्रदेश में वर्चस्व मिलने पर किये जानेवाले मनमानी हरकतों के कारण होती है। चन्द्रशेखर बेताज बादशाह होते जा रह थे और उनके उत्तराधिकारी उनके बेटे योग्य होते हुए भी नवीन पट्टनायक नहीं बन पाये दस सालों में। यही हाल पश्चिम बंगाल का भी है, वहाँ भी क्षेत्रीय भावना दृढ़ रही है और इसी कारण भाजपा कुछ थोडी उठी पर फिर नीचे आ गई। पर वहाँ बीजेपी असफल रही। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को क्षेत्रीय शक्ति बननी होगी। वहाँ के अच्छे लोगों को पार्टी में शामिल करना होगा। उन्हें क्षेत्रानुसार रणनीति बदलनी होगी। हिन्दी प्रदेशों के नेताओं के बल पर बीजेपी सरकार पूरे देश का नेतृत्व नहीं कर सकती। सफल नहीं हो सकती। मुझसे बहुत विद्वान बीजेपी में होंगे और उन्हें इन प्रदेशों की रणनीति का कुछ आज की लीक से हटकर एक दम नया और कारगर रास्ता खोजना पडेगा। उन्हें एक इन रणनीतियों में पारंगत नेता खोजना होगा या तैयार करना पडेगा। अगर तेलंगाना की विजय को गांधी परिवार अपनी विजय मानती है तो यह बड़ी गलती होगी।जीत दिलाने वाला अखिल भारतीय छात्र परिषद से निकला और आज तेलंगाना मुख्य मंत्री बनेगा। दक्षिण के आज के कांग्रेस के प्रेसीडेंट खरगे और कर्नाटक के कुछ नेताओं का तेलंगाना के राजशेखर को हराने में मुख्य भूमिका रही है। राहुल गांधी या प्रियंका गांधी या उनकी माताजी का इसमें कोई बडा योगदान नहीं समझना चाहिये। दुर्भाग्य है अब कांग्रेस के पास नये नेता नहीं हैं २०२४ के चुनाव के लिये। इन्दिरा, राजीव गांधी जमाने के नेता या तो नहीं रहे या बहुत ही वृद्ध या बदनाम हो चुके हैं। कमलनाथ और गहलोत उन्हीं में है। देश के मजबूत विपक्षी पार्टी होनी चाहिये। पर भारत में ३०-४० पार्टियों का गठबंधन कभी ज़रूरी शक्तिशाली विपक्षी पार्टी नहीं बना सकता। अब देश हित बहुत सारी पार्टियाँ को विलय हो, दो या तीन राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां पैदा होनी चाहिये।
जहाँ तक भाजपा का सवाल है, २०२४ के बाद मोदीजी अपने समान ही कुछ लोगों को उत्तराधिकारी बनने के लिये तैयार करने चाहिये। यह उनका राष्ट्रीय हित का दान होगा और तभी २०४७ का ‘अमृत उन्नत भारत’ बना सकेगा।

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