बढ़ती उम्र का राज

मैंने नोयडा में अपने जान पहचान एक सज्जन को १०३ पार करते जानता था। जब हम कुछ सीनियर मिल मेघदूतम् पार्क में सबेरे शाम एक जगह बैठते थे। वे सज्जन रेलवे के रिटायर्ड थे अपने बेटे के साथ रहते थे। वे उस समय शायद ९७ के थे। रोज सबेरे मेघदूतम् पार्क आते थे। मैंने उनको एक शाम सपरिवार बुलाया था अपने ग्रुप में । फ़ेसबुक में भी शायद इसके बारे में लिखा था।आज हर गाँव और शहर में ८० से ज़्यादा वर्ष के लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। मेरे एक हिन्दुस्तान मोटर्स के सहकर्मी ९४+ के हो चुके हैं। हमारे साथ के कुछ आई. आई. टी खड़गपुर के दोस्त ८५ के ऊपर है.

आज एक ११५ साल की महिला की कहानी पढ़ अच्छा लगा। बहुत सी सरल लगती हैं। उनके अनुसार किसी के साथ बहस में न पड़ना, सरल जीवन उनकी लम्बी उम्र का राज हैं। नीचे लिंक है-

ईशोपनिषद् का पहला दो मंत्र १०० साल तक जीने का गुर बताया है-

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
-यह दृश्यमान गतिशील,जगत सबका सब ईश्वर के आवास के लिए है। इस सबके त्याग द्वारा तुझे इसका उपभोग करना चाहिये; किसी भी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर ललचाई दृष्टि मत डाल।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥

इस संसार में कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिये। हे मानव! तेरे लिए इससे भिन्न किसी और प्रकार का विधान नहीं है, इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य में कर्म का लेप नहीं होता।


आज से तीन चार पहले मेरे आई. आई. टी के दोस्त और समधि जनार्दन शर्मा के न रहने का समाचार मिला। वे एक रह गये थे जिनसे जब इच्छा होती बात कर लेता था। वह भी ख़त्म हो गया।पूरी ज़िन्दगी बड़ी सादगी से बिताये। बहुत सारी यादें भी हैं उनसे सम्बन्धित, पर केवल शान्ति पाठ छोड़ क्या कर सकता हूँ। पिछली कुछ साल पहले मिला था जब राजेश उन्हें अमरीका से वापस पटना पहुँचाने के लिये लाये थे, मेरे अनुरोध पर रात को ठहरे थे, बहुत सारी बातें हुईं थी।शायद एक दिन पहले ही बताये थे कि अब उनकी खाना बनानेवाली महिला उनके में ही रहने के लिये राज़ी हो गई थी। मैंने प्रसन्नता ज़ाहिर की कि अब ठीक है। उतने बडेघर में अकेले रहना इस उम्र में अपने आप में एक समस्या होती है।

पर क्या किया जा सकता है। समय बदल गया है। अब परिवार में आख़िरी में केवल दो ही रहते हैं और एक दिन एक रह जाते हैं। ऐसे में कब वह समय आ जाये, जब वह एक भी अपने गन्तव्य की ओर चल देता, सब कुछ पीछे छोड़। ॐशान्ति…

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भारतीयों की राष्ट्रविरोधी मानसिकता


पिछले युद्ध ने यह ज़रूर इस सत्य को आम कर दिया कि भारत का मुख्य विरोधी पक्ष और उसके कुछ शीर्ष नेता और समर्थक प्रजातंत्र के बोलने की आज़ादी का नाजायज भायदा उठा देश का अहित कर रहे हैं। देश का नेतृत्व संभालने की इतनी जल्दी क्यों है? जिन दलों के पास एक एक राज्य भी हैं वहाँ जनताहित कुछ अभूतपूर्व नई सोच का बदलाव ला देश के निचले वर्ग का प्रति व्यक्ति कमाई को कम से कम समय में एक सम्माननीय स्तर पर ले जाने का प्रयत्न और उपाय की तो सोचें और कारवन्यन कर तो दिखाये।
केन्द्र और राज्य सरकार सभी को यह मौक़ा बराबर है।देश की विशेषकर उत्तर भारत के प्रदेशों में- बिहार, बंगाल आदि में शिक्षा का स्तर क्यों नहीं अच्छा हो रहा है? क्यों नहीं गाँव गाँव अपने शत प्रतिशत लोगों को शिक्षित करने का मुहिम लें।लड़कों के विज्ञान के विषयों में महारत का नया प्रयोग किया जाये। शिक्षक योग्य हों। हर लड़का कुछ न कुछ हुनर सीखे या सद्भाव से व्यवसाय करने की मिहनत के साथ चेष्टा करे।
अगर एक किसान उतने ही खेत से लाखों कमा समृद्ध हो सकता है, तो बाक़ी क्यों नहीं कर सकते? कब तक लोग अपनी छोटी जाति का होने का फ़ायदा लेंगे और कितने सौ साल। जो बड़ी जाति के लड़के हैं वे भी तो ही पढ़ना लिखना छोड़ वैसे ही निठल्ले हो ठ्ठरा पी ज़िन्दगी ख़राब कर रहे हैं। मुखिया से ले सांसद मन्त्री सब उन्हें इसी स्थिति में रखना चाहते हैं।


योग्य नहीं बनना, हीन आचरण रखना, मिहनत से भागना, गलत से ग़लत तरीक़े से किसी तरह पेट भरने भर कमाई करना, दिनभर आवारागर्दी करना ओर तथाकथित नेताओं या बाहुबलियों के गलत कमाई में हाथ बँटाना।
किसी राजनीतिक दल ने क्या काम किया है इस दिशा में। सब केरल की तरह शिक्षित, तमिलनाडु की तरह के औद्योगीकरण आदि को आदर्श मान क्यों अपने कार्यकर्म बना सकते।


पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह की अवस्था क्यों लाना चाहते हैं लोग और नेता। क्या अब भी समझ नहीं आता कि हिन्दू प्रधान देश भारत को कोई मदद नहीं देगा, कोई इसका सच्चा दोस्त नहीं बनेगा।

गोरों में अभी भी अपनी चमड़ी के रंग का गुमान है, और अधिकांश इस्लामिक देश धर्मनिरपेक्ष बन ही नहीं सकते।

देश के सबसे बड़े धनी लोगों से सबसे छोटों तक को यह समझना होगा। क्या आज कोई महाराणा प्रताप का भामाशाह बन सकता है या सिराजुद्दौला का जगत सेठ।
क्यों नहीं, बिरला, और सैकड़ों ऐसे देश भावना से देश के लिये जरूरी उद्योग लगाते। क्यों आज चीन से आयात किये बिना उनका काम चल ही नहीं सकता? क्यों नहीं भारत चीन से श्रेष्ठ बन सकता? जब कि इतिहास कहता है भारत ही ज्ञान विज्ञान में सब देशों से उपर था। भारत आज भी वैसा ही है, पर भारतीय सबसे ज्यादा ख़ुदगर्ज़ हो गये हैं। बच्चों के लिये अकूत धन जमा करते है। और बच्चे मजे कर उस धन मौज मजा या विदेशों में जा बसने का प्रयास….पता नहीं क्या मिलता है और क्या खो देते हैं। नाम भी कोई नहीं याद रखता।

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Take a jump in life, be Entrepreneur

Take a jump in life, be Entrepreneur
Today I watched this podcast of Saurabh Mukhejea, a successful entrepreneur himself talking on how to get into your own startups, your own business rather than working for salary in established companies. I know there must be others too talking on the subject. But because of a great praise for Saurabh’s achievements by my son, Anand who has been again an employee only of a big well known company in US, I have become Saurabh’s fan. I have read and enjoyed one of Saurabh book, ‘ Behold The Leviathan’. The book was bought and sent by Anand only. I really loved it.
For all young men and women of India, today India is the best place to get into business rather than working for a company as salaried employee even on a very lucrative pay package. However, if you must have certain aptitude and tenacity for getting great success as entrepreneur. But that happened with all the richest entrepreneurs of the world but for those who inherited a lucrative business from their parents or family and continued with the same dedication.
Please watch this podcast and let your children see it…

“The Ecosystem for Entrepreneurial success in India” https://youtu.be/bFaK5SY8Wz8?si=plg-r3d1uMdxaGxd
India can become a great country and Indians really rich with this attitude only…Pl. share and encourage others to watch if that have an aspirations to make their kids really rich and well known in society and thus make their kids country of great. It is already happening and that will make our country join the group of developed countries of the world.

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भारत जातिय आधार पर जन गणना और संरक्षण

पता नहीं किस राजनीतिक दबाब से भारत सरकार जातिय आधार पर जनगणना कराने का निर्णय लिया। अबतक लगता था वर्तमान सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कल तक यह विचार नहीं था। मेरा बिचार इस पर अलग है। जातिय आधार पर कोई भेदभाव करना ही नहीं चाहिये। एक हिन्दू की तरह मैं अपना वर्ण बता सकता हूँ , पर जाति नहीं, क्योंकि इनके नाम का न ऐतिहासिक, न वैज्ञानिक कोई आधार  हैा परमहंस रामकृष्ण एवं विवेकानन्द की कहानी कहीं जाति को कोई मान्यता नहीं दी थी।  दक्षिणेश्वर मन्दिर बनानेवाली रानी रासमनि, माता पिता की जाति से शायद मल्लाह थी, रामकृष्ण ब्राह्मण, स्वामी विवेकानन्द कायस्थ। भारत के उदय को देखनेवाले उनको मानते है, देश विदेश में, क्योंकि राम कृष्ण मिशन देश विदेश में सनातन धर्म का आधुनिक युग में पताका फहराने वाली सनातन धर्म की एक बड़ी संस्था  है। अमरीकन और अन्य देश वाले बड़ी संख्या में हिन्दू बन रहे हैं। कल, अगर देश और यहां के समझदार लोगों नें ISKCON और रामकिशन मिशन को साथ दिया तो सनातन धर्म पूरे विश्व में ख़ुशी से ख़ुशी फैल जायेगा एक न एक दिन। सनातन धर्म सगुण राम, कृष्ण, रामकृष्ण आदि को भी मान लेगा और निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा को भी। जातियों का कोई आधार नही, क्योंकि वे केवल पेशे पर आधारित हैं और ये जातियां आती पीढ़ियों के नये नये पेशे के साथ बदलती गईं हैं और बदलती जायेंगी नये नये जीवन निर्वाह के धंधों के साथ, उसमें आजके भारत की सब जातियां समाहित हो जायेंगी। आप कोई भी एक कम्प्यूटिंग का काम करनेवालों को किस जाती का कहेंगी, उनके माता पिता की जाति का? क्या यह सामाजिक न्याय होगा। उसमें कौन कितना महीने में आमदनी करेगा वह जाति पर नहीं काम और काम जानने और करनेवाले की बुद्धि पर निर्भर करेगी। किसी रिजर्वेशन की जरूरत नहीं होगी, कम बेशी अर्जन के लिये जरूरी ज्ञान सबको उपलब्ध होगा। किस तरह यह आज की जाति आधारित जनगणना किस काम में सहायता देगी। 

भारत के राजनीतिज्ञों को अपनी विवेकशक्ति बढ़ाने की जरूरत है। जाति विशेष के होने से किसी का सम्मान नहीं बदलता। नहीं तो भक्ति काल के महापुरुष जाति के धर्म के बन के रह जाते महा पुरुष नहीं होते, पहले और आज की तरह पूजे नहीं जाते। 

यह केवल सठीक शिक्षा और विवेक ही है जो तुलसीदास, राम, कृष्ण, रविदास, कबीर, रसखान, मीरा, आदि को बराबर का सम्मान दिला रहा है, क्योंकि उन्होंने एक आदर्श रखा जो उनके मा-बाप की जाति के कारण नहीं आया था।आज कौन उनकी बंशवाली देख उनके बंशवालों को सम्मान देगा। किसी मौर्य को क्या चन्द्रगुप्त या अशोक का सम्मान मिलेगा?

संरक्षण सरकार की चीज है १५ साल के लिये था, राजनीति उसको ७५+ साल तक पोसती, संवर्धित करती रही है। बन्द करिये अपनी राजनीति, नहीं तो देश नहीं बचेगा। सब क्षेत्रों में विश्वगुरु, अग्रणी बनने दीजिये राष्ट्र को। लोगों को तोड़िये मत, जोड़िये, गाँव गाँवों में जाकर ज्ञान अर्जन, नवाचार, हुनर की अलख जगाईये झोपड़ी झोपड़ी तक ….यही विवेकानन्द का सपना था विश्वगुरु बनाने का भारत को… आइये इस यज्ञ में आहुति दें अमर बनिये। 

मेरे देश के गेरुआ, या सफेद या अन्य वेशधारी भी इस बात को समझे और समझाये। वे बताये सनातन धर्म क्या है सरल भाषा में। हमारे शास्त्र गीता, रामचरितमानस कहते हैं- 

१. एक ब्रह्म परमात्मा पूरे संसार में व्याप्त है- गांधी का प्रिय ईशोपनिषद का पहले श्लोक की पहली पंक्ति कहती है- 

१अ. ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।

-जगत्यां यत् किं च जगत् अस्ति इदं सर्वम् ईशा वास्यम्। यह सबका सब ईश्वर के आवास हैं- पूरे संसार के हर हर कण में ईश्वर का निवास है।

गीता (७.७) कहती है- मत्तः परतरं न अन्यत् किञ्चित् अस्ति धनञ्जय । मयि सर्वम् इदम् प्रोतम् सूत्रे मणिगणाः इव ॥

-मेरे सिवाय दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी नहीं है। जैसे सूत की मणियाँ सूत के धागे में पिरोयी हुई होती है, ऐसे ही यह सब संसार मुझमें ही ओतप्रोत है।

२. तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः। इस सबके भीतर है और इस सबके बाहर भी है।

३ यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सतेद॥परन्तु जो सभी भूतों  को परम आत्मा में ही देखता है और सभी भूतों या सत्ताओं में परम आत्मा को, वह फिर सर्वत्र एक ही आत्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के पश्चात्, किसी से कतराता नहीं, घृणा नहीं करता।

गीता कहती है-६.३२ आत्मा-उपम्येन सर्वत्र समम् पश्यति यः अर्जुन । सुखम् वा यदि वा दुःखम् सः योगी परमः मतः ॥

-जो भक्त अपने शरीर की तरह सब जगह सबमें मुझे समान देखता है, वह परम योगी है।

४. पूरी की पूरी गीता इन दोनों सनातन दर्शन से भरी है। तुलसीदास जी ने उन्हीं भावों लोकभाषा में गाया है। पर हम इन दोनों दुनिया हर वर्ण, रंग, कदकाठी के लोगों को जोड़नेवाले सत्यों को लोगों को समझाये दुनिया प्रेममयी होगी। 

पर दुनियाभर के लोगों को लम्बी चौड़ी रसभरी कथाएं सुनाते रहते हैं सैकड़ों तथाकथित संतों, महात्माओं, गुरुओं आदि नाम से जानने वाले लोग।  

मैं सभी उत्सुक लोगों इन दो बातों के महत्व को समझाने के लिये प्रस्तुत हूँ जो विविधता में एकता की बार बार बात कर हमें परमात्मा-प्रदत्त शाश्वत सुख और शान्ति के पास पहुँचाने का मंत्र बताते है।

बहुत पंथ बन चुके, बहुत भाषाएं, बहुत मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर बन गये, अब उनकी जरूरी नहीं। अब आई.आई.टी चाहिये, आई. आई.एससी चाहिये, ISRO चाहिये।यही मौक़ा है, सही मौक़ा है। शिक्षा विशेषकर उत्तर भारत के प्रदेशों में बहुत सुधार की जरूरत रह है।शिक्षा के साथ हुनर सीखाने की जरूरत है, नहीं तो नौकरियाँ कहाँ मिलेंगी। सरकार में राजनीतिक कारण से लोगों को सरकारें भरती जा रही है, जो गलत है, बेकार का खर्चा है।

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डा. राजेन्द्र प्रसाद, भारत के प्रथम राष्ट्रपति

मैं १९५५-५७ में बंगाल में स्कूल फ़ाइनल के बाद में दो साल प्रेसीडेंसी कालेज में विज्ञान में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट किया। मुझे वहीं हिन्दू हॉस्टल में रहने का सौभाग्य मिला।वहीं मुझे कुछ देश के विभिन्न क्षेत्रों महान हस्तियों से मिलने का अवसर मिला। उनमें दो लोगों की जानकारी पहले से थी अत: मेरी श्रद्धा अगाढ थी। उनमें प्रथम स्थान पर डा. राजेन्द्र प्रसाद हैं, इसके पहले मैं अपने स्कूल की तरफ से बंगाल के राज्यपाल डा. कैलाशनाथ काटजू से हावड़ा रेलवे पर। हमारा एक घाटशिला में कैंप उसमें हम जा रहे थे और हिन्दी भाषाभाषी शायद मैं ही था। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से आशीर्वाद दिया था।

डा. राजेन्द्र प्रसाद को कालेज के लोग उनकी इच्छा पर हिन्दू हास्टल लाये होंगे, जहाँ वे वर्षों रहें। उनका नाम खुदा एक प्लेक भी वहाँ लगा है गेट पर। हम तब तक इतना ही जानते थे कि बिहार, ओड़िसा, पूरे बंगाल, आसाम आदि का एक ही संस्था थी जो मैट्रिक की परीक्षा का आयोजन करती थी और वे उस परीक्षा में सर्वप्रथम आये थे। बाद में भी वे प्रथम ही रहे।

मैंने जब उनसे कहा था ‘ बंगाल में त कौनो जातपात नइखे, एके संगे सब खा ला मेस में। उन्होंने जबाब दिया और हाथ उठा गेट पर से ही बताये कि ‘ना बाबु, देख ओह ओरे हमरा समय, कायस्थ, ब्राह्मण, आदि के अग़ल-अलग अलग-अलग रसोइया खाना बनाने ख़ातिर रहन।’ फिर वे वापस लौट गये समय की कमी के कारण।उसके बाद उनकी अपनी लिखी उनकी आत्मकथा भी पढ़ा और उनके बारे में समाचारों को चाव से पढ़ता रहा। जब नेहरू की उनके प्रति अवहेलना दिखाने की बात पढ़ा सुना बड़े होकर। मुझे लगता है नेहरू की हीनभावना ही रही कि वे अपने सब राजनैतिक साथियों के साथ दुर्व्यवहार किये। वे अपने बच्चों को छोड़ और किसी राजनीति के साथियों के बच्चों के भविष्य या परिवार के बारे में साथ उदासीन रहें और भाग्य भरोसे छोड़ दिया। अपने और अपने परिवार को देश का मालिक बनाकर रखा मरते तक और वह सब कर गये कि कोई दूसरा कोई उनकी तरह बन न पाये। उसी का फल है किनकी तिसरी पीढ़ी भी राजनीति में बिना किसी योग्यता के देश के राजनीतिक परिवारों में सबसे ज्यादा फ़ायदा उठा रही है। किस देश में एक परिवार का तीन तीन व्यक्ति सांसद है और उन पर करोड़ों का साल में खर्च होता है। स्वाधीनता की लड़ाई के महान कांग्रेसियों के बच्चों का कोई नाम भी नहीं जानता।कैसा चक्कर चलाया गया है और उदाहरण प्रस्तुत किया गया है मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू के चलते इस परिवार द्वारा और बाक़ी सब बैठे दूर से तमाशा देखते रहे और इतिहास के पन्नों से ग़ायब हो गये।

डा. राजेन्द्र प्रसाद पहलीअन्तरिम सरकार में खाद्य मंत्री थे। संविधान गठन होने पर डा. राजेन्द्र प्रसाद उसके चेयरमैन थे।उनकी अद्वितीय याददाश्त के बहुत क़िस्से हैं। एक दिन कुछ संविधान में पारित विषयों के काग़ज़ खो गये थे। जब उन्हें पता चला तो वे सेक्रेटरी को बुलाये और उसको लिखने को कहा। वे बोलते गये पूरा निर्णय और वह लिखता गया। फिर जब वे काग़ज़ किसी तरह मिल गये तो पता चला कि वे पूरी तरह से वही हैं जो राजेन्द्र बाबू ने लिखवाया था। एक दूसरी घटना कि कहानी भी मैंने अपने कालेज के दिनों में सुनी थी किसी अध्यापक ने उनके किसी परीक्षा के सवालों के जबाब को देख लिखा था, ‘ The examinee is better than the examiner.’ खैर इसमें कोई संदेह नहीं कि डा. राजेन्द्र प्रसाद का व्यक्तित्व एक महान था। उन्होंने कुछ किताबें भी लिखीं हैं अपनी जन्म कथा को छोड़ कर, जिसमें उस समय के देश की खाद्यान्न की समस्या पर थी, जिसकी बड़ी सराहना हुई थी।

मैंने मोदीजी को एक ट्वीट भी किया था उनकी पौत्री को यूट्यूब पर सुनने के बाद।
@narendramodi श्रद्धेय मोदीजी, मुझे और शायद देश के सब लोगों को दुख होगा डा. राजेन्द्र प्रसाद की पौत्री के इस पत्रकार के साक्षात्कार की बात सुनकर, मैं सोचता था आप अलग होंगे। भगवान का आशीर्वाद आप पर बरसता रहे, सुनिये …Dr. Rajendra Prasad की पौत्री का वीडियो https://youtu.be/J9VS-qIjo7o?si=@

पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे सुनें और सुनायें और जो आवाज़ उठा सकते हैं या जो भी कुछ कर सकते हैं वे करें।बिहार तो ऐसे ही मतलबी व्यक्तियों का सामाज है जहाँ लोग अपने परिवार को नहीं समझते अपने स्वार्थ के आगे। ऐसी बातों के लिये किसके पास समय है।

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भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य

भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य
आजकल तीन किताबें पढ़ रहा हूँ, जिनके जिनके शीर्षक साथ के फ़ोटो में है।
पहली William Dalyrymple की पुस्तक The Golden Road- कैसे प्राचीन भारत दुनिया को बदल दिया था-प्राचीन भारत के ज्ञान – विशेषकर गणित और विज्ञान में और उनपर आधारित विभिन्न इन्जीनियरिंग क्षेत्र को। https://www.dawn.com/news/1866423
https://openthemagazine.com/lounge/books/there-was-a-whole-world-in-the-ancient-caves-in-the-deccan-says-william-dalrymple/

दूसरी किताब एक अद्भुत व्यक्ति पर है जो देश के एक प्रदेश का लगातार तीन बार मुख्य मंत्री बन सबसे विकसित प्रदेशों की श्रेणी में ला दिया।और वही क्रम देश के स्तर ११+ साल से चल रहा है। यह एक अपने क्षेत्रों के बहुत से धुरंधर व्यक्तियों ने लिखा है।
तीसरी किताब विकसित भारत@२०४७ का रोडमैप है देश के एक मुख्य अर्थनीति सलाहकार द्वारा लिखी गई और देश विदेश में सराही जा रही है। (दूसरी पुस्तक हमें श्री शुक्लाजी के सौजन्य से पढ़ने को मिली, जब मैं अचानक उसको ख़रीदने की उनसे चर्चा कर रहा था।दूसरी दोनों को मैंने अमाजन से मंगाया।यह कविता कल अचानक निकल आई ….
विकसित भारत@२०४७
चारों तरफ़ जब आवाहन है
विकसित राष्ट्र बनाने की
जाति जाति की बातें करते
कब तक समय गवांओगे?
पढ़ो पढावो हूनर सिखाओ
सब कुछ हमें बनाना है
नहीं रहेंगे निर्भर पर पर
जग को यह दिखलाना है।
हम्हीं खिलायेंगे सब जग को
हम ही स्वस्थ बनायेंगे।
आपद विपदा में जग की
हम ही सदा तत्पर रहते।
नहीं किसी के झाँसे में आ
हम अब भविष्य गवायेंगे।
आगे आओ हाथ बढ़ाओ
साथ साथ मिल चलना है।
दूर खडी माँ हाथ उठाये
आश लिये ‘कब?’आँखों में
हमको गोद उठाने को..
आशीष पा रहे निकलो आगे
सब घर स्वर्ग बनाने को।
भारत माँ एक आश लिये है
जिसे समझना ही होगा-
’राम आ गये अब अपने घर ..
‘राम राज्य‘ लाना होगा।
विकसित भारत ध्येय देश का
जन जन तक जाना होगा।
और परिश्रम चरमसीमा तक
हम सबको करना होगा।

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दिल्ली और आसपास के इलाक़े की दुर्दशा


आज यह इलाक़ा राजनीतिक दृष्टि से देश के सभी नगरों से महत्वपूर्ण है। यह देश की राजधानी है, दुनिया की राजधानियों में सबसे पुरानी भी क्योंकि यहीं पुराने क़िले के नीचे महाभारतकाल के पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ थी, जो अनूठे तरह के भवन निर्माण की कला से युक्त थी महाभारत काल में। उस समय के राजमहल के अद्भुत निर्माण कला के कारण नगर के साम्राज्य की रानी का एक वाक्य महाभारत का युद्ध का कारण बन गया। उसके बाद भी पृथ्वीराज के समय से आजतक भारत की राजधानी है। यहां बसनेवाले ही दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश चलाते हैं, जिसका नाम आज पूरे दुनिया में डंका बजा रहा है। दिल्ली और उसके उसके आसपास के शहर- गुरूग्राम, नोयडा, ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद देश के सबसे बड़े औद्योगिक केन्द्र भी हैं। देश का सबसे समृद्ध लोग भी रहते हैं और हमारे तरह के बृद्ध भी। यहां पर विज्ञान और इंजीनियरिंग के भी सबसे बुद्धिमान लोग भी रहते हैं और देश के सभी धनवानों के वासस्थान भी हैं।
पर कितना दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था इस जगह की यहाँ प्रदूषण स्तर दुनिया के सबसे भयानक स्तर का है और वह सब मानवीय कमज़ोरियों और उनके मनमाने व्यवहार के कारण है। और हम मूक द्रष्टा हैं। यहाँ के कोई वैसे व्यक्ति जो कुछ कर सकते हैं, वे मौन साधे बेबस लाचार अपने अपने घरों में बन्द जीवन यापन कर रहे हैं। शायद उन्हें पता नहीं कि कब उनकों यहाँ के किसी अस्पताल में जाना पड़ सकता है।
कैसे हम या हमारी तरह के लोग लोग जियें इस अवस्था में। कम से कम मैंने तो ज़िन्दगी में कभी यह सोचा नहीं था। प्रदूषण की मात्रा ४००-५०० में है और हमारे कर्णधारों में कोई जाति आधारित जनगणना कराने की लड़ाई लड़ रहा है और कोई एक देश, एक चुनाव- कराने का क़ानून बनाने में। जो पढ़ा लिखा कहाने वाला सालों से शासक है वह अगले चुनाव जीतने में लगा है जेल से निकल।
क्या बिडम्बना है और क्या इससे निकलने का उपाय? मैंने तो यहाँ से बाहर न जाने का प्रण किया हुआ, तो फिर क्या करूँ गीता में ही मन लगाता हूँ । जब तक यमुना थी तो उनकी देखभाल में दिन निकल जाते थे, पर अब वह व्यस्तता भी ख़त्म हुए साल होने को आये। क्या क…? कौन सुनेगा? शायद सर्व शक्तिमान!

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Modi’s 11 Resolutions for Countrymen 

Modi’s 11 Resolutions for Countrymen 

The 11 resolutions should guide both citizens and the government in building a stronger and more inclusive nation.

Modi appealed for collective efforts and commitment to constitutional values to be made essential for national progress.

The first resolution- Let every individual perform their duties. “Be it individuals or the administration, everyone must adhere to their responsibilities.”

The second resolution-a  call for inclusive development across all regions and communities, encapsulated in the philosophy of ‘sabka saath, sabka vikas’.

The third resolution- A pledge of zero tolerance towards corruption, underscoring the need for society to reject corrupt individuals. “There should be no social acceptance of those involved in corruption.”

The  fourth resolution- Instill pride in the country’s laws and regulations among citizens, ensuring that they reflect the nation’s aspirations.

The fifth resolution-  Every Indian must break free from colonial mindset and foster pride in India’s heritage and legacy.

The sixth resolution called for an end to dynastic politics and promoting meritocracy over nepotism in governance.

The seventh resolution highlighted the importance of respecting the Constitution in the seventh resolution and urged that the guiding document should not be misused for political gains.

In the eighth resolution, the prime minister assured that reservations granted to marginalised communities would not be taken away and strongly opposed any attempts to introduce religion-based reservations.

The ninth resolution proposed an envisioned India as a global example in women-led development, promoting gender equality and leadership.

The tenth resolution stressed on the mantra of national development through regional growth, emphasising the symbiotic relationship between state and national progress.

The eleventh and final resolution underscores the vision of ‘Ek Bharat, Shrestha Bharat’, fostering unity and national pride.

देशवासियों के लिए मोदी के 11 संकल्प

मोदी ने राष्ट्रीय प्रगति के लिए सामूहिक प्रयासों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को आवश्यक बनाने की अपील की है- लोकसभा में। 

पहला संकल्प- प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। “चाहे वहआम व्यक्ति हो या प्रशासन का हिस्सा, सभी को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए।”

दूसरा संकल्प- सभी क्षेत्रों और समुदायों में समावेशी विकास हो, जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ के दर्शन में समाहित है।

तीसरा संकल्प- हम भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता की प्रतिज्ञा करे , समाज द्वारा भ्रष्ट व्यक्तियों को अस्वीकार करने की आवश्यकता को समझे अपने निर्णयों में। “भ्रष्टाचार में शामिल लोगों को कोई सामाजिक स्वीकृति न मिले। “

चौथा संकल्प- नागरिकों में देश के कानूनों और नियमों के प्रति गर्व पैदा हो करना, और सबको सुनिश्चित करें कि वे राष्ट्र की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करते हैं।

पांचवां संकल्प- प्रत्येक भारतीय को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होना चाहिए और भारत की विरासत पर गर्व करना चाहिए।

छठे संकल्प- ‘वंशवादी राजनीति को समाप्त करना और शासन में भाई-भतीजावाद की बजाय योग्यता को बढ़ावा देना’ देश और सभी नागरिक का लक्ष्य होना चाहिये। 

सातवाँ संकल्प-हम  सभी संविधान का सम्मान करने के महत्व को समझे और राजनीतिक लाभ के लिए संविधान की तरह के मार्गदर्शक दस्तावेज का दुरुपयोग नहीं करें। 

आठवें प्रस्ताव में, प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया और दूसरों से भी आश्वासन चाहा कि हाशिए पर पड़े समुदायों को दिए गए आरक्षण को नहीं हटाया जाएगा और धर्म आधारित आरक्षण शुरू करने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध किया जायेगा।

नौवां प्रस्ताव- महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को एक वैश्विक उदाहरण के प्रस्तुत किया जायेगा। भारत को इस परिकल्पना को बल देना चाहिये,  जिसमें लैंगिक समानता और नेतृत्व को बढ़ावा दिया जा रहा है।

दसवाँ प्रस्ताव- क्षेत्रीय विकास के माध्यम से राष्ट्रीय विकास के मंत्र पर जोर दिया जाय, जिसमें राज्य और राष्ट्रीय प्रगति के बीच सहजीवी संबंध पर जोर होना चाहिये। 

ग्यारहवें और अंतिम प्रस्ताव में एकता और राष्ट्रीय गौरव को बढ़ावा देते हुए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया।

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भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य

आजकल तीन किताबें पढ़ रहा हूँ।

पहली William Dalyrymple की पुस्तक The Golden Road- कैसे प्राचीन भारत दुनिया को बदल दिया था-प्राचीन भारत के ज्ञान – विशेषकर गणित और विज्ञान में और उनपर आधारित विभिन्न इन्जीनियरिंग क्षेत्र को। 

दूसरी किताब एक अद्भुत व्यक्ति पर है जो देश के एक प्रदेश का लगातार तीन बार मुख्य मंत्री बन सबसे विकसित प्रदेशों की श्रेणी में ला दिया।और वही क्रम देश के स्तर ११+ साल से चल रहा है। यह एक अपने क्षेत्रों के बहुत से धुरंधर व्यक्तियों ने लिखा है।

तीसरी किताब विकसित भारत@२०४७ का रोडमैप है देश के एक मुख्य अर्थनीति सलाहकार द्वारा लिखी गई और देश विदेश में सराही जा रही है। (दूसरी पुस्तक हमें श्री शुक्लाजी  के सौजन्य से पढ़ने को मिली, जब मैं अचानक उसको ख़रीदने की उनसे चर्चा कर रहा था।दूसरी दोनों को मैंने अमाजन से मंगाया।यह कविता कल अचानक निकल आई ….

विकसित भारत@२०४७

चारों तरफ़ जब आवाहन है 

विकसित राष्ट्र बनाने की

जाति जाति की बातें करते

कब तक समय गवांओगे?

पढ़ो पढावो हूनर सिखाओ 

सब कुछ हमें बनाना है

नहीं रहेंगे  निर्भर पर पर 

जग  को यह दिखलाना है।

हम्हीं खिलायेंगे सब जग को

हम ही स्वस्थ बनायेंगे।

आपद विपदा में जग की

हम ही सदा तत्पर रहते।

नहीं किसी के झाँसे में आ

हम अब भविष्य गवायेंगे।

आगे आओ हाथ बढ़ाओ 

साथ साथ मिल चलना है।

दूर खडी माँ हाथ उठाये

आश लिये ‘कब?’आँखों में

हमको गोद उठाने को..

आशीष पा रहे निकलो आगे

सब घर स्वर्ग बनाने को।

भारत माँ एक आश लिये है 

जिसे समझना ही होगा-

’राम आ गये अब अपने घर ..

‘राम राज्य‘ लाना होगा।

विकसित भारत ध्येय देश का 

जन जन तक जाना होगा।

और परिश्रम चरमसीमा तक 

हम सबको करना होगा। 

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राहुल गांधी- विकृत सोच

राहुल गांधी- विकृत सोच
अचानक ही एक उम्र जनित गलती के कारण मैं कल फिर राहुल गांधी का नेता विपक्षी की तरह दूसरी बार लोकसभा को सम्बोधित करते सुना। मन में एक बड़ा प्रश्न आया। उन्होंने माता पिता से क्या सीखा है और जिस माहौल में बढ़े हैं वह क्या ऐसा ही व्यक्तित्व गढ़ता है? राहुल गांधी को पिछले कुछ समय से प्रशिक्षित करनेवाले किस तरह के लोग हैं? राजगद्दी पर बैठने के लिये वे ऐसे झूठ और ग़लत रास्ते का सहारा ले रहे है। जिससे यह लगता है कि उन्हें इस देश और उसके लोगों का रत्तीभर भी ख़्याल नहीं है।
आज पचास से ऊपर की उम्र में ऐसी अपरिपक्वता पता नहीं उन्हें गद्दी दिलायेगी या नहीं, पर एक बात तय है कि हिन्दू समाज का सत्यानाश हो जायेगा।
पिछले सालों का जाति प्रथा को हिन्दू समाज से मिटाने का मोदी सरकार एवं आर.एस.एस के भागवत का प्रयास मिट्टी में मिल जायेगा। देश में अराजकता फैल जायेगी। कैसे हज़ारों जातियों में बंटे जनसंख्या से सभी जातियों से सभी पदों पर उनकी संख्या के प्रतिशत के आधार पर हर लेवल पर लोग हो सकते है?
राहुल आजकल हिन्दू धर्म के देवों के ब्रह्म रूपों के बारे में विना किसी सनातन धर्म के ग्रंथों के ज्ञान के बातें कर रहे हैं। कहीं कहाई या सुनी सुनाई बातों को तर्क में देना वैसे ही है जैसे मेरे अपने एक बाबा को मैं समझा नहीं पाया की धरती घुमती है। पर हिन्दू धर्म के ग्रंथों को सभी ध्यान से पढ़ने की ज़रूरत और उसका संदर्भ लें बोलने के वक्त उसका सत्य भाव से रखना जरूरी है नहीं तो अनर्थ हो जायेगा। हिन्दू धर्म और संविधान का विना किसी प्रौढ़ता का हवाला देना बहुत नुक़सान करता रहेगा आज डिजीटल मीडिया के सार्वभौमिक उपलब्धता के कारण। राहुल न शिव के बारे में जानते, न महाभारत के, न कृष्ण, न राम के। अगर नहीं जानते तो ग़लत मनगढ़ंत चीजों को न कहें। बहुत बवाल हो सकता है । हिन्दू धर्म और उनके श्रेष्ठ सगुन नाम को ले, आगे बात न करें।
राहुल गांधी को इस रास्ते हटना चाहिये। यह विजातीय रास्ता है। पता नहीं सुनहरे भारत, विकसित भारत की परिकल्पना ऐसी राजनीतिक स्थिति में संभव हो पायेगी। शायद नहीं, जो सभी विदेशी शक्तियाँ चाहती हैं।

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