Make in India: Some New Developments

Make-in-India & Nuclear Plants

Why did India sleep on its own nuclear programme so long? India could have focused on R&D, continuous improvements, manufacturing and setting up of nuclear power plants of its own design in all these years as it did on space research through ISRO. By now the percentage on clean nuclear power in overall power generation capacity would have been significant. It would have made India stronger in negotiating on all fora for collaborating for nuclear energy related subjects and issues. It is a great idea that the government of Modi has finally taken an unprecedented excellent decision to go for “the 10 PHWR units in a fleet mode as a fully indigenous initiative and be one of the flagships ‘Make in India’ projects in the nuclear energy sector. This will also give manufacturing orders to the tune of Rs 70,000 crores to the domestic industry and create over 33,400 jobs in direct and indirect employment.” A PHWR uses natural Uranium as fuel and heavy water as both moderator and coolant. The natural Uranium for these reactors can be sourced from Tummallapalla in Kadapa, Andhra Pradesh. It is a shame for the governments, the present total installed nuclear power capacity in the country is of 6780 MW from 22 operational plants. Another 6700 MWs of nuclear power is expected to come onstream by 2021-22 through several under-construction projects. It must not remain a political announcement only of Modi. It will require the government to put the best team of Indians – scientists, technocrat managers, designers, reliable vendors for all major components and aggregation and with a mission to be the best with competition. Will Modi make India great peace loving nuclear power? Will some Indian deep pocket capable company or a consortium of it think of acquiring company with access to technology such as Westinghouse-Toshiba presently in financial difficulty?


Make in India and Bofors like Artillery Guns: India after Bofors ordered for 145 M 777s from BAE, US. The first two M777s have arrived in India, as a part of the 25 ready-to-use weapons to be supplied by the BAE over the next two years. As per the deal, 120 remaining howitzers would be produced in India under the ‘Make in India’ programme in collaboration between BAE and India’s Mahindra Defence in Faridabad….At present, a major portion of M777 is being manufactured at BAE’s UK plants, where core components like titanium forgings and fabrications, which make the M777 light, are produced. The final integration and testing phase, which is being handled at BAE’s Hattiesburg facility in Mississippi, US, will be shifted to India’s Mahindra Defence facility in Faridabad. Mahindra Defence will assemble, integrate and test the guns at the AIT facility, allowing an unhindered access to spare parts and reduce the maintenance time and cost. Will this joint understanding or collaboration will continue after the completion of 145 units? Will Mahindra be able to initiate the localisation of M777’s components or the total system? Will Mahindra be able to set up R&D and development centre to keep the the technologies incorporated in the M777 system updated to remain relevant and contemporary? three other resources or Make-in-India artillery gun systems are in pipe line. 

1. L&T has customised and co-developed the gun called K9 VAJRA-T , an enhanced version of Hanwha Tech Win’s K9 Thunder – a self-propelled Howitzer – to suit the specific requirements of the Indian Army, including desert operations. L&T will deliver the 100 guns, that will have over 50% indigenous content, in 42 months, from its manufacturing facilities, including a new Armoured Systems Complex at Hazira in Gujarat. guns. 

2. Dhanush 155mm Artillery Gun: A “Make in India” Marvel: Dhanush as an artillery system has proved to be one of the best amongst its class. A 45 Calibre towed gun system capable of targeting at long ranges incorporating autonomous laying features and having one of the most sophisticated suites of electronic and computing systems in the world.
3.Bharat Forge aims to become among the top-three artillery gun manufacturers in the world. “Bharat Forge is currently working on five artillery gun platforms.” ….Bharat Forge Group has participated in a project to convert old Russian 130 mm guns into new 155 mm guns. If trials are successful, this may lead to a total order of 1,500 guns from this project alone. To capitalise on contracts on making air defence systems, Bharat Forge has tied up with three of the best companies in the world: SAAB (Sweden), Rafael (Israel) and IAR (Israel aircraft industries).
4. 1.5.2017: Punj Lloyd Raksha Systems,Indian firm Punj Llyod and Israeli Weapons Industry have signed a joint venture to produce rifles under a new joint venture facility at Malanpur in Madhya Pradesh. The new joint venture has been named as PunjLlyod Raksha Systems (PRS). 
Punk are making the whole range of IWI weapon systems at its facility including the Tavor-21 and Galil assault rifles along with the Negev Light Machine Guns, Galil sniper rifles and the X-95 close quarter carbine rifles. It would be offering all the types of weapons required by the armed forces.

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बिचारों के जंगल में-१

ज़माने भर का मुझे क्या करना
जब अपने से ही फ़ुरसत नहीं

एक हैं अरविन्द केजरीवाल एक राज्य की जीत ने जिन्हें सपने देखना सीखा दिया, सब विद्याओं में महारत दे दी, दिल्ली की गद्दी ने बहुत सारे दोस्तों को दुश्मन बना दिया. दिल्ली को दुहराने की लड़ाई छड़ी गई गुजरात, पंजाब, गोवा और फिर टी. वी वालों ने बैठा दिया दिमाग़ में कि अगर नितिश, ममता, राहुल सपने देख सकते है मोदी को पटकनियाँ देने की तो मैं क्यों नहीं. आख़िर दिल्ली के मुख्य मंत्री के घर से दिल्ली में प्रधानमंत्री के घर की दूरी ही कितनी है ? एक छलाँग और ….,पर लगता है इन सपनों ने उन्हें आम नेताओं की तरह हौवा खड़ा करना सीखा दिया. क्या गुल खिलाता है अब उनका भाग्य? कौन जाने….आई. आई. टी का बन्दा है भोटिंग मशीन में दस तरह की कमज़ोरी की बात कर सकता है , काश पाँच सालों में दिल्ली कुछ तकनीकी तरीके से दुनिया सर्वश्रेष्ठ नगर ही बना दे, या यहाँ का मौसम ही बदल दे…..लोगों में भाँति भाँति की अफ़वाहें फैलाओ , शायद काम बन जाये इस प्रजातंत्र में…. अन्ना हज़ारे का भला हो …अरविन्द को खड़ा कर अपने ग़ायब हो गये…..गुरू गुड ही बना रहा , चेला चीनी हो गया, अब पछताने से क्या लाभ…..कुछदिन पहले कहे हैं “I am pained by the Shunglu committee report because Arvind was with me in the fight against corruption. I had great hopes from the young and educated Kejriwal and felt that young people like him will create a corruption-free nation. But he has dashed all my hopes.” and further “the Shunglu committee report shows that Kejriwal has forgotten everything in the pursuit of power….. …Kejriwal has gone off track, the CM’s chair has changed him.” और मुख्य मंत्री के काम का नायाब तरीक़ा चौरसिया को काम सौंप अपने ज़िम्मेदारी मुक्त…..हर महीने पैसे तो मिलते ही हैं…मुख्य मंत्री की अच्छी खाँसी पगार और पेंशन भी आजीवन और शायद सरकारी घर भी जैसा यू. पी. में …..)

पैदल चलने की आदत डालिये एवं स्वस्थ रहिये. ७७+ की उम्र में औसतन ५-६ मील चलता हूँ. पैदल चलने का कोई मौक़ा हाथ से निकलने नहीं देता हूँ. तकलीफ़ है शहरों के निर्माण के योजना कर्ता पैदल चलने वालों के लिये सड़कों पर कोई सुरक्षित जगह ही हीं देते . न सड़क के किनारे एक लाल पट्टी जहाँ द्रुत गति से चलती गाड़ियाँ न आयें या पैनलों की समतल पगडंडी. पूरी योजना सड़कों की केवल बाहनवालों के लिये सोची लगती है, उनके दिमाग़ में पैदल चलने वाले का इतने सम्पन्न लोगों के शहर में क्या काम.

अभिनन्दन बदलते नितिश कुमार का: शराबबन्दी उनकी पहली ग़लती का सुधार प्रयास था……बडी सख़्ती के साथ क्रियान्वयन हुआ…. कुछ ब्यवहारिक सुधार किया जा सकता तो और बेहतर होता…… पर नितिश का तिलक प्रथा और बाल बिबाह के बिरोध का अभियान एक अत्यन्त प्रशंसनीय प्रयास है जिसकी नितिश को जितनी शाबाशी दी जाये य वह कम ही होगी. वे अगर इसे एक सामाजिक आन्दोलन के रूप में औरतों एवं पढ़ी लिखी बच्चियों के ज़रिये फैला सकें या एक पूरे प्रान्त की इसी ध्येय को मुख्य रख यात्रा कर सकें तो उनकी बात को लोग ज्यादा गम्भीरता से लेंगे. सभी वर्ग के लोगों में इसकी बुरायियों के सत्य क़िस्से फैलाये जांये. बिहार के हर धर्म एवं जाति में। यह बिष ब्याप्त है. इसके बन्द होने से बिहार और प्रान्तों से आगे निकल जायेगा. एक और छोटी सी उम्मीद उनसे करता हूँ . वे हर मीडिया से अच्छी शिक्षा पर ज़ोर दें…..और लोगों को बताये की कि बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने वाले अभिभावकों ही स्वर्ग मिलता है और हर नक़ल का प्रयास करने में मदद करनेवाले को नर्क . बिहार की ख़ुशहाली का यह मार्ग है और दूसरा कुछ नहीं और यह सब हमारे हाथ में है…


लालू प्रसाद के बेटे फिर से समाचार में हैं. ………लालू के सब बेटे बेटियाँ करोड़पति तो पहले ही थे….मुलायम परिवार से रिश्ता बन चुका है तो बिचारों का लेने देन भी होगा ही…वे भी एक साधारण स्थिति से आज देश के सबसे सम्पन्न राजनीतिज्ञों में माने जाते हैं……लालू पुत्रों के सामने भी यही महात्वाकांक्षा ………कैसे अरबपति बना जाये जब तक शासन पर हाथ है …परिवार के कम से कम तीन लोगों का प्रत्यक्ष रूप से….उधर बिचारा पिता कहता है , क्यों न करें वे सब, क्या मेरे बच्चे ग़रीबी में मरें? ग़रीब कहाँ दो सौ करोड़ का मॉल बनाता है….मॉल बनाते वक़्त नींव से निकली मिट्टी को भी अपने ही सरकार के बिभाग में ७०-८० लाख में बेंच देता है…..मायावती, मुलायम परिवार , बादल, जयललिता, थाक्करे सभी तो अरबपति हैं….क्यों तेजस्वी और तेज़ प्रताप न बनने की कोशिश करें…


सभी सरकारें और वर्तमान मोदी सरकार भी पर्यटन को ज़ोर शोर से बढ़ावा देती हैं- विशेषकर बिदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये बहुत बिज्ञापन और अन्य एजेन्सिओं का उपयोग किया जाता है. उद्देश्य रहता कि वे बिदेशी ज्यादा से ज्यादा समय यहाँ बितायें.होटलों में रहने, जगह जगह मनपसन्द की चीज़ें खाने, सवारी के उपयोग करने, याददाश्त के लिये यहाँ की अनूठी चीज़ों को ख़रीदने में पैसा ख़र्च करें और इस तरह बिदेशी मुद्रा देश में आये. पर उनमें करीब शत प्रतिशत माँसाहारी होते हैं एवं मदिरापान के शौक़ीन. वे खाने पीने, प्राकृतिक दृश्यों के लिये मशहूर जगहों , पशु पक्षियों में ज्यादा आनन्द लेते हैं और हमारे देश के ऐतिहासिक धरोहरों की बारीकियों को समझने में कम. अत: अपनी सांस्कृतिक या धार्मिक हिरासत के नाम पर हम उन्हें शुद्ध शाकाहारी ब्यंजन एवं शरबतों से आकर्षित करना चाहेंगे तो शायद ही हम पर्यटन को बढ़ा पायें. फिर ये पर्यटक अपने आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार छोटे बड़े सभी तरह के होटलों और भोजनालयों में रहते खाते हैं, अत: पता नहीं माँस मदिरा का रोक कहाँ तक युक्ति संगत है, यह देशहित में है या नहीं? समय के साथ हमें चलना चाहिये. सोचें, समझें, आचरण करें अनुकर्णीय. World Economic Forum, Switzerland, ranked India at 40th position from 52nd in 2016 on World Travel and Tourism Index………

७.४.२०१७: समझ में नहीं आ रहा है कि देश में कुछ अच्छा काम हो भी रहा है या नहीं. टी वी न्यूज़ चैनलों पर लगातार चलते समाचार और उन पर विवाद और उनके राजनीतिक रंग से अब डर लगने लगता है. आज पिछले सत्तर सालों में क़ानून ब्यवस्था में इतनी ढील क्यों दी गई कि हर चीज़ समाधान से बाहर दिखती है. समस्या की शुरूआत एक घटना से होती है, पूरे देश में मीडिया उसे आग की तरह फैला देती है. फिर सभी सम्बन्धित लोग समस्या का एक सामयिक हल निकाल लोगों को शान्त कर देते हैं और फिर लोग भूल जाते हैं जब वही चीज़ फिर घटती है. कुछ समस्याओं का हवाला दूँ. कुछ नई भारी मत से चुनी राज्य सरकारें पिछले दिनों अवैध बूचडखानों को सख़्ती से बन्द करा दी. हायतौबा मच गया . क्यों हज़ारों लाखों ग़ैरक़ानूनी बिना स्वास्थ्यकर ब्यवस्था वाले बूचडखाने देश के हर गल्ली मुहल्ले के कोने में खुल गये सरेआम? मैं तो दिखते ही घबड़ा जाता हूँ, आँख बन्द कर जल्दी से निकल जाना चाहता हूँ . सरकारी महकमें के लोग जिन्हें इसे देखना रोकना था क्यों नहीं रोके समय पर, या उनके राजनीतिक आका क्यों नज़र अंदाज करते रहे और मीडिया इसके सम्बन्ध में कभी कोई ज़ोर का आवाज़ क्यों नहीं उठाई? आज सभी नई सरकार को दोष देते हैं, बेरोज़गारी का रोना रोते हैं, और कुछ इसे साम्प्रदायिक रंग दे देश का नाम बदनाम करते है. 

दूसरा निर्णय सर्व्वोच न्यायालय का आया. राजमार्ग के ५०० मीटर तक कोई शराब का ब्यवसाय नहीं होगा चाहे वे छोटी दुकानें या बार हों या पाँच स्टार का होटल . कारण बताया गया रोड किनारे की इन जगहों से शराब ड्राइवर गाड़ी या ट्रक चलाते हैं और भयंकर दुर्घटना करते जान लेते, साल में हज़ारों में. फिर इन रोकों के बिरोध में आन्दोलन होते हैं और सरकार या कोर्ट को क़ानून या देश का भला भूलने पर बाध्य किया जाता है. या कुछ दिनों में मामला अपने ही शान्त हो जाता , पुरानी अवस्था वापस आ जाती है, अफ़सर और कर्मचारी आँख बन्द कर लेते हैं. एक और दबाव का कारण बनता है लाखों साधारण पढ़े लिखे लोगों की कमाई के बन्द होने की बात. पर इसके मूल में सार्वभौमिक अच्छी शिक्षा या किसी हुनर में महरियत का अभाव जो एक अच्छी नौकरी दे सके. यह कैसा प्रजातंत्र है जिसमें किसान या बडी बड़ी कम्पनियों के लोग क़र्ज़ तो लेते हैं पर उसे लौटाने की इच्छा नहीं रखते और उसकी माफ़ी के लिये हर तिकड़मों का ब्यवहार करते हैं. बड़े और छोटों की एक ही लालसा होती है कैसे सरकार पर दबाव डाले और क़र्ज़े को माफ़ कराये. किसानों की समस्या का निदान क़र्ज़ा माफ़ी तो नहीं है जो कांग्रेस वालों ने की और इसबार पहला पहल राहुल का ही था, क्यों कि उनको इसके सिवाय कोई रास्ता सूझ नहीं सकता है. बात चार एकड़ और एक एकड़ की जमीनवाले किसानों की है. इन्हें खेती की फ़सलें बदलनी होगी, धान एवं गेहूँ की पुरानी तरीके की खेती के दिन लद गये. किसानों को दलहन, तेलहन, सब्जी, फल, की खेती करनी होगी; मछली, मुरग़ी, भेंड, बकरी, गाय, भैंस पालन को ब्यवसायिक ढंग से करना होगा. मसीन, अच्छे बीज, अच्छी खाद का अनुभव प्राप्त कर उपयोग करना होगा. हर ब्यक्ति पुराने ज्ञान- साम, दाम, दंड, और भेद का उपयोग कर अपना उल्लू सीधा करने में लगा हुआ है. एक देश का सासंद ए्अर इंडिया के कर्मचारी को पच्चीस चप्पल मारता है बिना किसी दोष के और देश के सभी बिरोधी दलों के लोग उसे संसद से निकालने की बात नहीं करते बल्कि उसके पक्ष में बोलते हैं. नोटबन्दी के दिनों के जौहरियों, तथाकथित ब्यवसायिओं के, कुछ बैंक कर्मचारियों के कारनामे अब जगज़ाहिर है. पिछले महीने मैं हरिद्वार गया था, देखा हमारे आवास आरोग्यम् और गुरू रामदेव के पातांजलि संस्थान के बीच हाई वे के किनारे दसों झोंपड़ियों की तरह छोटे मकान हैं. सबकी दीवालों पर लिखा है यहाँ अंग्रेज़ी शराब मिलती है. क्यों ऐसा है……होता है….क्या निदान है ……समस्यायें सदियों की है कुछ आर्थिक पर ज्यादा पुराणपंथी से जुड़ी. अच्छी शिक्षा, हुनर की शिक्षा, अनुशाशन, कठिन परिश्रम पर दृढ़ बिश्वास की बेसिक ज़रूरत देश के नागरिकों में . ठीक नियम क़ानून और उनके पालन में कोई कोताही कभी नहीं…शासन का दृढ़ संकल्प और कड़ी नज़र इस संकट से उबरने का एक मात्र रास्ता है…..I have a confidence that the government will go for long term solution.

२.४.२०१७: नोयडा में इस ७८ पहुँचते उम्र में हमारी तरह के लोगों के लिये बिना किसी युवा पीढ़ी के नज़दीकी ब्यक्ति के एक बहुत बडा संघर्ष लगता है. जब भी मेरी अपनी तबियत ख़राब होती है तो यह अहसास अचानक ज्यादा तकलीफ़ देने लगता है. यह और भी चिन्तित करता है जब जीवन साथी पूरी तरह दूसरे पर निर्भर है. यह अजीब ही इत्तफ़ाक़ है हम जब हम सक्षम थे तो बहुत सहायक भी थे. बहुत अन्य तकलीफ़ों को झेलते हुये घर की रोज़मर्रा की ज़रूरतों की चिन्ता नहीं होती थी. क्या यह नियतिनिर्धारित है या इसे किसी पूर्व प्लानिंग द्वारा निपटा जा सकता था या अभी भी संभावित समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है. 

१.४.२०१७ कल रात अजीबोग़रीब सपनों में परेशान हुआ, अब कहॉ मैं मैनेजर और कहॉ ऑटो सेक्टर के उन दिनों में किये कारनामे. पेट में गैस की तकलीफ़ भी, खाने पर कभी कभार अपना नियंत्रण खो देने के कारण. पिछले कुछ समय से देर तक सोने का प्रयास आज बिफल हो गया. पर उसके बाद घटित तकलीफ़ कुछ सोचने पर मजबूर कर दी: मच्छरों के दिमाग़ और पहचान शक्ति सम्बन्धित. हरदम की तरह मैं ड्राइंग रूम में आ कभी खड़ा हो, कभी बैठ पढ़ने लगा. सोचा पेट को कुछ आराम मिलेगा. पर फिर जब कुछ मच्छर काटे तो चाइनीज़ मच्छर मारने के बल्ले का ब्यवहार किया, कुछ पट पट की आवाज़ कर मरे, सोचा था इतने हीं होंगे, निजात मिल जायेगा, ….पर वे कहाँ रूकते बल्कि बार बार हमला करते रह समूह में, मैं इधर उधर घूमता रहा एवं रह रह कर चाइनीज़ बल्ला घूमाता रहा…..कभी लगातार चार पाँच चटकने की आवाज़ आती तो सोचता अब उस दिशा से आनेवाले ख़त्म हो गये….पर यह लड़ाई चलती रही है घंटों और मैं जूझता रहा अनचाहे मेहमानों से जो इतनी सफ़ाई के बावजूद समझ नहीं आता मेरे यहाँ कैसे आ गये हैं इतनी तदाद में? कुछ उनसे लड़ने और कुछ उनके हमले की प्रतीक्षा में रात कटी. पर क्या मच्छरों का दिमाग़ भी इतना बिकशित है कि वे अपने हन्ता को पहचान लेते हैं जगह बदलने पर भी, एक दल के बिनाश के बाद दूसरा दल हमला करता रहता है जबतक सब न मर जायें….. यह नोयडा की गन्दगी के चलते है या आम्रपाली की लापरवाही के कारण, शायद दोनों इसके ज़िम्मेदार हैं…..मच्छरों की बुद्धि बढती जा रही है, पर हमारे ब्यवसायी झूठमुठ में मच्छर मारने के बिभिन्न वस्तुओं से ग्राहकों को फुसला पैसा कमाने में ब्यस्त हैं…..और सरकारी तंत्र समुचित सफ़ाई रखने में हर छोटे बड़े शहरों में बेख़ौफ़, बेअसर हैं…कभी गाँव की याद आती है, फिर पुराने दिनों के सासाराम की, और अब नोयडा …..आज सब सुबिधा होने के बावजूद कभी कभी आदमी इतना असहाय हो जाता है….


२९.३.२०१७ केवल बूचडखाने हीं नहीं, कितने कारोबार बिना लाइसेंस के, और उसमें निहित ब्यवस्था के, या बिना फ़ी दिये और उनके नियमों के मानते हुये चलते हैं. हर ब्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वे क़ानून का पालन करे और अपनी असल तकलीफ़ों को सरकारी अफ़सरों के सामने रखे. यही नियम सी ए, वक़ील एवं डाक्टरों के लिये भी हो, वे अपनी फ़ीस और सर्टिफ़िकेट अपने आफ़िस में प्रदर्शित करें….बहुत बिना डिग्री के इन पेशों में हैं …बैंकिंग, कार्ड, या डिजिटली अपना फ़ीस लें….अपने उत्तरदायित्व को माने…ग़लत सर्टिफ़िकेट या ग़लत तरीक़ा न बताये अपने क्लायंटों को….दवाइयों का दाम पूरे देश में हर दूकान पर कम और एक हो, आज उन पर ० से ३०-४० प्रतिशत डिसकाउंट भिन्न तरीक़ों से दिये जाते हैं. मज़े की यह है कि जो समर्थ हैं उन्हें ही सबसे ज्यादा डिसकाउंट मिलता है. जिस देश में लोग और मीडिया सड़क के कुत्ते को मार देने पर बवाल कर देते हैं वहाँ गाय, भैंस, बकरी आदि के बिना इजाज़त और नियमों का पालन किये कटना तो बवाल का कारण हो ही सकता है और हर सरकार का कर्त्तव्य था और है कि यह नहीं होता या हो. सरकार राष्ट्रहित निर्यात के लिये नियम बना ही सकती है. इसी तरह शराबबन्दी न कर एक नियमबद्ध तरीके से उस पर रोक लगाना बेहतर होता. और बन्द करनेवाले पूरी पीढ़ियों को बरबाद करनेवाले एअरेटेड कोकाकोला, पेप्सी आदि पर पहले रोक लगना चाहिये. चीनी, आलू, चावल पर खपत कम करने की दिशा में बढ़ने के लिये नियंत्रण होना चाहिये या उन्हें नुकशान रहित बनाने की दिशा में प्रयत्न होना चाहिये. जो भी हो वह कुछ दिनों के लिये न हो, वह पार्टी का मैनिफेस्टों न हो, हर सरकार द्वारा ख़्याल रखा जाये और हर नागरिक के आदत का हिस्सा हो . …..उम्मीद है उतर प्रदेश बेहतर हो जायेगा और हम इस की सरकार के गुण गायें.?.


२६.३.२०१७ इस बसन्त में पहली बार आज सबेरे कोयल की कूक सुन उठ गया हूँ…..याद आती है….२३ मार्च को ही अलोक ने एक शुभ समाचार दिया था. मैने एक टेलिफ़ोन नम्बर माँगा था, हरदम की तरह अलोक शायद भूल गये हैं….समाचार था…..,अलोक की शादी में देखी वह छोटी ज्योति माँ बन गई..हरदम बडी प्यारी लगती रही है …….मेरा ओहदा कुछ और बढ़ गया …मेरे कानों में कोई धीरे से ‘नानू ‘कह भाग गया . और ख़ुशी से सराबोर.मैं और ..मेरे सपने ज़िन्दाबाद…..ज़िन्दगी में सुखी रहने के लिये ऐसे सभी सपने हीं तो साथ देते हैं….टनों आशीर्वाद तो हम देते ही रहेंगे….बच्चे और जच्चे के लिये….सब अपने से उम्र में छोटों के लिये वे चाहे हमें भूलते रहें….हम भूल जायेंगे तो सच के बुढ्ढे कहे जायेंगे..,,


२७.३.२०१७ मेरा आग्रह है अगर भूमिहार बराहम्ण का कार्य कर रहा हो जैसे अध्यापक, प्लानर, डिज़ाइनर अपने को उस बिधा में श्रेष्ठ बनाये, अगर क्षत्रिय का काम कर रहा हो जैसे सैनिक या मैनेजर तो वहाँ श्रेष्ठ बने, अगर बैश्य के काम ब्यवसाय में लगा है तो अच्छे वैश्य की भाँति उसे करे. अगर सेवा के छोटे या बड़े काम में लगा है तो वही अच्छी तरह कर हरदम आगे रहे. 

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पिछले दिनों की बिचार यात्रा 

19.3.2017 कैसे ख़त्म होंगी हिन्दूओं में जाति प्रथा ? कैसे समझ पायेंगे साधारण रूढ़िवादी गाँव शहर के लोग जिन्हें जातियों एवं छूआछूत के भ्रम में रख न शिक्षित होने दिया गया, न सम्मानित , न समृद्ध कुछ धर्म के ठेकेदारों द्वारा. मौर्य और राजभर दुनिया के सबसे सम्मानित सम्राट और विदेशियों को मात देनेवाले राजा तो बन गये पर समय के अन्तराल के कारण उनके बंशजों को कुछ अर्द्ध ज्ञानी और स्वार्थ साधने वाले ठेकेदार नायकों ने समाज की दृष्टि में धीरे धीरे निम्न और अस्पृश्य बना दिया. भारतीय महर्षियों की सार्वभौम अलौकिक वर्ण के सिद्धान्त को न समझ चार तरह के कर्म के बदले एक ख़ास कारण से पिता के त्तत्कालीन जीविका अर्जन के काम के आधार जाति का नाम दे दिया, सामूहिक वर्चस्वता के कारण छोटी जाति का अस्पृश्य कह दिया. ये वही लोग है जो दूसरे जाति के घर अनुष्ठान कराने जा पूड़ी सब्जी, मिष्ठान तो दबा कर खाते है पर चावल नहीं खाते. धर्म सम्बन्धी अनर्गल बातें समझा लोगों को पिछड़ा बनाये रखने में मदद करते हैं. आज शिक्षा सबको बराहम्ण और वर्णों को बनाने में मदद कर रही हैं. किसी जाति में जन्मा ब्यक्ति अध्यापक बनते ही बराहम्ण है, सेना में नौकरी मिलते ही राजपूत, ब्यवसाय में लग धनार्जन करते ही वैश्य है. यह सार्वभौम सिद्धान्त है और तार्किक है. प्रत्येक संस्था इसी तरह के चार वर्ण चलाते है. हर ब्यक्ति ख़ुद भी समय समय पर इन चारों वर्णो का काम करता रहता है. जाति प्रथा का समय ख़त्म हो चुका है. केवल लोगों को समझना है. जाति प्रथा के कारण हिन्दू समाज अपनी synergy का पूरा फ़ायदा नहीं ले पा रहा है, और दुनिया के नज़रों में पिछड़ा हुआ है. पिछले दिनों आयोजित प्रांतों के सांसदीय चुनाव के नतीजे शायद एक मद्धिम सा संकेत देते हैं कि जातियों की दलबन्दी कम हो रही है, यहांतक की अल्पसंख्यक भी शायद पुराना कट्टरपन छोड़ते नज़र आ रहें हैं, शिक्षा चाहिये, नौकरी चाहिये, कारख़ाने बढ़े, इलाज चाहिये, सम्पन्नता चाहिये…देश के नेतृत्व को पुराना रास्ता छोड़ना होगा, जाति, धर्म के बल पर चुने लोग देश को दुनिया के अग्रिम पंक्ति में नहीं ला सकते….किसी को इस विषय में तार्किक मत दे हमें ग़लत बताने का अधिकार है…..

18.3.2017: कल से ही यहाँ आरोग्यम् के लॉन में किसी समारोह की तैयारी हो रही है. पता चला रुड़की के बीजेपी के सद्यसमाप्त चुनाव में जीते MLA श्री प्रदीप बत्रा के सम्मान में आज शाम पार्टी है. तैयारियाँ किसी धनी परिबार की शादी जैसी हो रही थी, लॉन में निमंत्रित लोगों के बैठने के लिये कुर्सियाँ , टेबल, एक तरफ़ मनोरंजन का स्टेज, कोने में खाना बनाने की ब्यवस्था, चारों तरफ़ किनारे पर खाने की टेबलें, पूरे लॉन में लाइटों की लड़ियाँ, होटल ब्लॉक के भीतर पीने पिलाने की ब्यवस्था. फिर किसी ने कहा ‘बत्राजी वे क्या घूम रहें हैं मिल लिजीये. मैं क्यों चूकता, सहर्ष मिले, अभी जवान हैं, निमंत्रित किये पार्टी में आने के लिये, मैंने यमुना की तकलीफ़ बता माफ़ी माँग ली, कहे हम फिर मिलेंगे. अच्छा लगा. मैं कहा कि ‘आप हरिद्वार और रुड़की जो विश्व में प्रसिद्ध हैं बदल डालो, हम सभी का आशीर्वाद है , आप और आगे जाओ, मंत्री , मुख्य मंत्री बनो’. ‘देखिये बदलाव तो आयेगा ही, ज़रूर आयेगा’. ऐसे युवक चाहें तो बदल सकते हैं इस धर्म स्थल हरिद्वार और कैन्टोन्मेन्ट और सौ साल से भी पुराने इंजीनियरिंग कालेज के लिये मशहूर रुड़की की तस्वीर, जो अब आई. आई. टी. हो गया है. दोनों ही शहरों में बहूत गन्दगी है और किसी तरह से आधुनिक नहीं कहे जा सकते, जबकि दोनों जगहों में विश्व के हर कोने से यात्री आते हैं और उनकी संख्या बढ़ने से यहाँ की आर्थिक उन्नति होगी. एक विश्व स्तर का कान्फरे हॉल भी रुड़की में ज़रूरी है और अच्छे स्तर के होटलों की कमी है. रुड़की IIT में एक सम्पन्न इंक्युबेटर्ज़ से नये उद्योगों की संभावना भी बढ़ेगी . कृषि पर आधारित उद्योग तो बडी मात्रा में लग सकते है हैं, साथ ही BHEL की एक बडी फ़ैक्टरी के कारण यहाँ छोटे छोटे इंजीनियरिंग उद्योग भी आ सकते हैं. कल दोपहर मनीष ढल मुझे न्यौता दिया था आठ बजे पार्टी में आने का, पर यमुना तो इतनी दूर भी नहीं चल सकती . अत: माफ़ी माँग ली. रात आवाज़ आती रही पार्टी के शोरगुल की. जबआज सबेरे घूमते समय किसी ने बताया. काफ़ी धनी ब्यक्ति हैं, रुड़की में होटल, रेस्टूरान्ट, मॉल हैं . पहले कांग्रेस के विधायक रहे पाँच साल , इस साल बीजेपी की टिकट ली और फिर जीत गये हैं. कल करीब लाखों ख़र्च किये दस हज़ार लोगों को बुलाया था. हमारे ही ब्लाक में आरोग्यम् में उनका एपारटमेंट है. सोचा ये तो बंगले एवंआलीशान कोठियों वाले हैं, यहाँ क्यों?)

कल रात यहाँ स्थान और परिवर्तित परिस्थितियों को ध्यान में रख एक छोटी होलिका दहन हुआ, पर जब मैं गया था तो कोई दिखा ही नहीं था. मुझे इस दिन की याद १९७० के लगभग के एक साल के एक रात की याद दिला गई. मैं हिन्दमोटर की कॉनभॉय की गाड़ी से रात करीब ११बजे लड्डूई स्कूल पर पहुँचा था और फिर एक मील चल अपने गाँव पिपरा. मैं अकेले ही गया था. परिवार के सदस्य होली जलाने के समारोह में जाने के लिये तैयार थे, सभी ख़ुश हो गये और आश्चर्यचकित भी. चाचीजी बहुत ख़ुश हुईं और खिलाने की ब्यवस्था कीं. उन दिनों गाँवों में ११ बजे चारों तरफ़ घोर अंधेरा होता था, और होली की पूर्णमासी का चन्द्रमा अपनी सुन्दरता की पराकाष्ठा पर रहते हुये आसमान से रोशनी और अमृत दोनों बरसाता था. होली गाँव के पूरब में देऊ बाबा के खेत में जलती थी, कुछ लगी फ़सल नुकशान होती थी, पर उनके समर्थ रहते तक परम्परा चलती रही, और मेरे देखते देखते वे सभी परम्परायें मरती गईं , पूरा माहौल बिद्वेष और छुटपन का बनता गया…..दूसरी बार देखा ….अब लोग होली अलग अलग मनाने लगे….गानेवालों की टोली जो गाँव की गलियों में कबिरा गाती फेरा लेती थीं, अब नहीं होता …..या हम भद्र हो गये होली हुड़दंगी को भी सहन नहीं कर सकते….पर फिर होलिका की कहानी की याद आती है….होलिका हिरण्यकश्यपु की बेटी थी, भक्त प्रह्लाद उसका भाई……., पिता बेटे की विष्णु की अप्रतिम भक्ति का बिरोधी और अपने को उनसे ज्यादा महान समझता था और बेटे को मारना चाहता था किसी तरह , क्योंकि जिसका बेटा ही पिता को किसी ब्यक्ति विशेष से बडा न माने तो दूसरे लोग कैसे मानते. अचानक पिता को याद आया की पुत्री होलिका को एक दिब्य वस्त्र पाप्त है जिसके ओढ़े रहने से आग भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती थी. फिर पिता का आदेश हुआ होलिका को भाई को गोदी में ले ओढ़नी अपने पर डाल चिता पर बैठने की . होलिका विवश थी पिता के आदेश के आगे कुछ न कर सकती थी, चिता में आग लगा दी गई. प्रिय भाई जलने को हुआ, कहानी है दिव्य ओढ़नी अपने उड़ प्रह्लाद ढक ली पर सत्य इससे परे था…..बहन का दिल पिघल गया था पहले ही, चिता की प्रारंभिक धुंआ की आड़ में बहन ने दिव्य चुनरी से भाई को ढक दिया था . भाई बेदाग़ बच गया, बहन भाई के लिये चिता की अग्नि में ख़त्म हो गई…..भक्त प्रह्लाद कितने लोक प्रिय हुये मालूम नहीं , होलिका अपना ही दहन दे भाई के लिये अमर हो गई. हर साल बसन्त में फाल्गुन की पूर्णिमा को बार बार जलती रही निमित्त स्वरूप ही सही……….काश! भाई समझ पाते होलिका की भातृ प्रेम को…..सक्षम बहनें समझ पातीं अपने दायित्व को……

11.3.2017आज का आता हुआ चुनाव परिणाम मुझे एक ख़ास ख़ुशी दे रह है. मेरा डर पंजाब को लेकर था उसके सीमान्त प्रान्त होने के कारण और मीडिया का बार बार अरविन्द केजरीवाल को जीतने का समाचार देते रहने के कारण. अरविन्द का कनाडा के खलिस्तानियों से साँठगाँठ और उनसे पैसा लेना और प्रचार कराना मुझे बहुत डरा रहा था. अरविन्द को किसी तरह विश्वास नहीं किया जा है. वह अपनी महत्वाकांक्षा के लिये किसी से , केवल अन्ना हज़ारे हीं नहीं देश से भी ग़द्दारी कर सकता है. बिना मतलब के मोदी से झगड़ा मोल ले दिल्ली का कितना नुकशान किया है, अन्यथा दिल्ली का चेहरा कुछ विश्वीय स्तर का होता…..गोवा में भी वैसा ही था……पंजाब में कांग्रेस पारिवारिक अकाली दल से अच्छी है…..

१०.३.२०१७: नोयडा क्या बदलेगा? सरकार वही रहेगी या पूरी तरह से नई हो जायेगी कल पता चल जायेगा. क्या अन्तर आयेगा अगर किसी तरह बी जे पी की सरकार आ गई, क्योंकि ऐसा नहीं होने की हालत में सबकुछ जैसा अब है चलता रहेगा. प्रान्तीय सरकार केन्द्र को सब कुछ के लिये ज़िम्मेवार ठहरा पल्ला झाड़ती रहेगी….सरकारी तंत्रों का पैसा कमाना चलता रहेगा, न नोयडा स्वच्छ होगा न तंत्र. पर क्या नये बदलाव के बाद सब कुछ ठीक हो जायेगा. नोयडा ऑथरिटी, रजिस्ट्रार आफ़िस, बेईमान बिल्डर्स या पुलिसवाले ईमानदार हो जायेंगे, काम मुस्तैदी से होने लगेगा. स्वच्छ भारत, सुगम्य भारत, सबके लिये मकान, स्टैंडअप इंडिया, दक्ष भारत के सठीक क्रियान्वयन से लोग ख़ुश हो जायेंगे. अधिकांश कहते हैं कुछ नहीं बदलेगा….शायद यही ठीक है…आफिसर वही रह जातें हैं और उनके काम करने का तरीक़ा भी. जबतक कोई चीफ़ मिनिस्टर या मिनिस्टर बहुत ही अच्छा नेता और योग्य मैन मैनेजर न हो किसी पॉलिसी या प्रोजेक्ट का क्रियान्वयन समयानुसार नहीं होता. क्या अच्छा होता सभी पत्यासियों को सभी आई आती एम मिल एक इंटेनसिव प्रशिक्षण देते चुनाव में जाने के पहले और उसके स्कोर के अनुसार टकट मिलता. पर दो छोटे छोटे प्रोजेक्ट हमारे यहाँ अभी अभी चल रहे है निर्वाचन के चलते रहने वावजूद और ख़ुशी मिलती है. काम प्रारम्भ होने में देरी लगती है, धीरे होता है पर फिर भी….मेघदूतम् पार्क में तीन स्टील के ढाँचे बन रहे हैं उन पर बल्लरियों को चढ़ाने के लिये -ये तीनों बजरीवाले घूमनेवाले रास्ते पर बन रहे हैं…..एफ ब्लाक के खुले बडे नाले की दीवाल हटा उसे ऊपर से ढका जा रहा है…..दिवाल टूट चुकी है…इंटें जमा की जा रहीं है….ठीकेदार फ़ायदे में रहेगा….,क्या यह आने वाले समाचार संकेत बदलने का? चलिये कल का और आने महीनों का इंतज़ार करें…..

९.३.२०१७: अखिलेश यादव अनर्थक आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे और उसे बलियाँ तक ले जाने का दावा अपने प्रोजेक्ट के तहत करते हैं, यह तो मायावती के राज्य में हो चुका था. मायावती से मैं उसके जातिय और साम्प्रदायिक गणित पर ज़ोर देने के कारण विरोध करता हूँ. मैं आशा करता हूँ कि मायावती उनकी बुद्धिमत्ता के लोग जैसे अम्बेडकर और अन्य अपने को ब्राह्मण समझें अपने ज्ञान के बल पर या आज जो पेशा करते हैं उसके अनुरूप जाति का दर्जा लें. अपने को जन्म के आधार पर उच्च वर्ग के लोग भी वै सा नहीं समझ सकते. अखिलेश का मुलायम के साथ किया वर्ताव ही काफ़ी होना चाहिये था उस पार्टी के हारने का, अगर भोटर समझदार होते…..यह मेरा बिचार है और इस पर मैं अटल हूँ क्योंकि जातियां और छुवाछूत बाद के अत्यन्त निम्न कोटि के ब्राह्मण के स्वार्थी दिमाग़ की ऊपज थी…वर्ण सिद्धांत यह नहीं कहता….

1.3.2017:आजकल मैं बहुत दुखी हूँ …टी वी पर दिखाये जाते उन विज्ञार्थियों पर जो ‘कश्मीर आज़ादी चाहे, बस्तर आज़ादी चाहे’. न ये न इनके बाप दादे किसी ने आज़ादी के लिये कोई तकलीफ़ नहीं उठाये…और आज ये मुफ़्त और बेईमानी के पैसे से पढ़ाई के ना म पर मज़े कर रहे हैं…..आज इस ७७+ की उम्र में भी अगर कोई उनमें मेरे सामने आ यह कहें तो मैं इनको मृत्यु के हवाले करने की कोशिश करूँगा. सफल होऊँ या नहीं, नहीं होने पर दुख होगा…कैसे हैं इनके माँ बाप । मुझे मेरादेश चाहिये ..अनर्गल बातों को कहने का अधिकार नहीं ….इन्हें भारत से कोई प्रेम नहीं, भारत से कोई श्रद्धा नहीं…इनका रहना न रहना कोई मायने नहीं रखता….इनकी पढ़ाई कोईमायने नहीं रखती, इनसे करोड़ों अशिक्षित अच्छे हैं…इन्हें बताया ही नहीं गया जननी जन्मभूमिश्च स्वरगादपि गरीयसी….कैसे जाने यह अंग्रेज़ी में नहीं लिखा है…..)

२८.२.२०१७: क्या शिक्षा क्षेत्र को राजनीतिज्ञ और मीडिया बख्स नहीं सकते? प्रतिदिन घटता गुणवत्ता स्तर, शिक्षकों की अपने पवित्र कार्य के प्रति उदासीनता, अभिभावकों का रोजीरोटी की ब्यस्तता के कारण बच्चों की पढ़ाई को ट्यूटरों पर छोड़ देना, सरकार का शिक्षा की अवनति के मूल कारणों की सुधार के प्रति दृढपरतिज्ञता का सम्पूर्ण अभाव, सब वर्गों की यनियन और सब अच्छी बुरी घटनाओं एवं निर्णयों पर आक्रामक बिरोध, शिक्षा और उसके मूल्यों को ख़त्म करती जा रही है. हम अगर नहीं चेतें तो क्या होगा अगले दस साल में पता नहीं.

२६.२.२०१७: बहुत शीघ्र किसानों को, विशेषकर कम ज़मीन के किसानों को खेती में आमूलचूल बदलाव लाना होगा. धान और गेहूँ मुख्य फ़सल नहीं रह सकेंगी और अपना एकाधिकार खो देंगी, न तो उत्पादन उतना बढ़ पायेगा , न सरकारी बाज़ार मूल्य, जिस कारण वह लाभदायक बनी हुई हैं. पहले दलहन, तेलहन को उचित महत्व दे उसकी खेती बढ़ानी होगी. कम ज़मीन के कारण भी सब्जी, फल, पशु, मछली, व्यवसायिक पेड़ किसानी मुख्य उत्पादन होंगे. सिंचाई में भी कम से कम जल के ब्यवहार के लिये धार में पानी न डाल बुन्दों में पानी की बौछार करनी होगी जो जड़ से उचित दूरी पर ही पड़े.हम अगर जातिय आधार पर खेतों से जुड़े हैं और किसी कारणबस पूरी तरह से शिक्षित नहीं हो पाये हैं, गाँव में रहने का निश्चय किया है तो बैज्ञानिक एवं ब्यवसायिक ढंग की खेती अपना ही समृद्ध और सुखी बनने के सपने को पूरा करना होगा और आज यह सम्भव है , अगर हम इस पर जीताने लगा जुट जायें…….गाँव के युवक मिल गाँव को सुन्दर बनायें, हर गाँव में एक साप्ताहिक बाज़ार की शुरूआत करें…..लाइब्रेरी बनाये…खेल, स्पोर्ट्स का आयोजन या प्रतियोगिता करें…. १०

२६.२.२०१७: परसों अशोक आये पर दाँत निकाले जाने के बाद की डाक्टरी की हिदायत के कारण खुल के अपने नहीं बोल सका. कुछ बातें दुख देतीं हैं और कुछ थोड़ी खुशी भी. चकरक्का में जहाँ अभी बावन गाँवोवाला आयोजित रामचरितमानस मानस यज्ञ हुआ था का पानी से भरा रहना दुख दिया. यह गाँव का शान था, यहीं सबकी खलिहानों होती थी, बेटियों के के शादियों के तम्बू लगते थे जिनकी बहूत मिट्ठी यादें आज भी है और बरसात में टिक्का भी खेला जाता था, फिर बदलते समय से लडके फ़ुटबॉल और शायद क्रिकेट खेलने लगे.


२३.२.२०१७: पुच्चु बताते हैं आपके सभी लड़के, पोते, पोतियाँ अमरीकी नागरिक बने. आख़िरी राजेश सेफाली को कल मिल गई अमरीका नागरिकता. पुच्चु ख़ुश दिखे, जिन्हें मिला वे भी ख़ुश होंगे, पर पता नहीं हमें ख़ुशी हुई कि नहीं .दूसरों के मुख से सुनते या कभी कभी अपने भी बताते अच्छा लगता है कि मेरे ती नों बेटे सपरिवार अमरीका में रहते हैं…….पर मन में कहीं न कहीं कसक भरी कमी महशूश होती है आख़िरी क्षण का हम दोनों के …..वह भी अपना ही दायित्व होगा या जो पास मिल जायेगा और दया खा सहायता कर पायेगा उसका सहारा लेना पड़ेगा…., हमें इसका दुख नहीं होना चाहिये ज के परिप्रेक्ष्य में, यह बात समझ तो आती है…….पर फिर दिल है कि मानता नहीं ….बार बार कुछ अकेले होने पर कुछ ज़िन्दगी में हारने की कसक उठती है जिसका मुझे को अफशोश नहीं……


मोदी को मैं पसन्द करने लगा हूँ क्योंकि उनके और अपने काम करने के तरीक़ों मैं सामंजस्य पाता हूँ. अपने कार्यकाल में चाहे मुझे जो भी काम मिला असीम परिश्रम से, अपनी तरह से, नये असाधारण तरीके से किया. प्रति दिन सोलह अठारह घंटे तक भी काम किया. हर मशीन के काम में बदलाव कर सहज, सरल और द्रुत काम हो वैसी ब्यवस्था की. अलग अलग पूरी तरह से भिन्न तकनीकी आधार और ज़रूरी ज्ञान के बिभागों के हेड की तरह अध्ययन और अवलोकन कर कुछ अत्यन्त महतपूरण योगदान दिया और जब अपनी इनिंग पूरी की बिना किसी लाग लाट के चुपचाप बेदाग़ निकल गया. कुछ प्रशंसक भी बने पर अधिकांश को नहीं मन भाया. पर भले ही चाहे डर सभी का प्रशंसा पात्र भी रहा….और फिर यह बनवास को अपना लिया….. सालों के परिचित लोगों से दूर चला आया…. मोदी जिस दिन    


पिपरा के बच्चों के फ़ोटो देखकर: कैसे पहचानूँ आप सबको? कल अशोक आये और बताये कि अब तो बच्चों के बाबा का नाम पूछना पड़ता है जानने के लिये कि वे किस परिवार के हैं. अमलाजी को बचपन में देखा था नंगे नंगे सूरज बाबा घूमाते थे हमारे दरवाज़े पर..त्रिलोकी जी को नगीना राय कंधे पर डाल घूमाया करते थे. समय कितना आगे चला आया…कल अशोक यज्ञ में आने को कह गये , आज ही सबेरे एक पैर में जूता और दूसरा ऐसे ही दौड़ना पड़ा यमुना को करैम्प हो गया था पानी के लिये आवाज़ दे रहीं थीं, मैं आख़िरी छोर पर के कमरे में कपड़ा बदल रहा था घूमने जाने के लिये….


कितने गाँव से निकली गाँव की लड़कियाँ आज गाँव के लिये कुछ भी करने को तैयार हैं. सभी आज की सुख सुबिधा का उपभोग कर भूल जातीं हैं अपना बचपन, पिता की मिहनत जो उन्हे बडा बनाई और के उनकी सफलता के पीछे थी. मधुलिका स्वागत है. कितना अच्छा होता हर गाँव का एक बेटा और बेटी अपने गाँव को बदलने में मदद करते…सब कुछ आसान हो जाता. हर बात के लिये सरकार का आसरा नहीं रहता…. हर गाँव एक वरक्सॉप, लोग बनाते, बेंचते, पैसा कमाते, समृद्ध होते……)


हम अब भी भोजपुरी बोलते हैं …पर तीसरी पीढ़ी का कोई बोल पायेगा या नहीं शंका है। 


शिवसेना मुम्बई की: मेरे ब्यक्तिगत बिचार के अनुसार शिवसेना हप्ता वसूल करनवालों की पार्टी है. उनकी संस्था इसी तरह अपने सदस्यों की रोज़ी रोटी का जुगाड़ करती है. उसी हप्ते का बडा हिस्सा पारिवारिक पार्टी शिवसेना के फ़ंड में भी जाता है जो उन्हें उच्चतम जीवन शैली बनाये रखने में मदद करता है. अपने १९९०-९७ की मुम्बई यात्राओं में मैं बराबर यू.पी. , बिहार के टैक्सी चालकों से बातें कर मैं इस नतीजे पर आया हूँ . तमिल, यूपीयन, बिहारी सभी बाहरीवाले ब्यवसायीयों या काम करनेवाले को देना पड़ता है. धर्म, क्षेत्र, जाति की राजनीति जिसमें देश भारत गौड़ हो जाये कैसे हमें आगे जा सकता है इस सैकड़ों राष्ट्रों के विश्वीय दौड़ में. क्या इस बार मुम्बई का म्यूनिसिपल चुनाव जीत बीजेपी शिवसेना के अत्याचारों को बन्द करा सकेगी? काश! ऐसा होता…..)


२१.२ अपनी संतान के कृतित्व का कुछ सेहरा अपने सर बाँधने में मां-बाप भी कुछ न कुछ हिस्सा तो लेना ही चाहते हैं, जो स्वभाविक है. कुछ बढाचढा कर बोलते बताते ही हैं. कुछ चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाते हैं. 

कल शाम पुच्चु (आन्नद)से बात बात करते हुये जब पूछा राजेश के बारे में कि अभी कल ही उसने मैराथन पूरा दौड़ा ह, उससे बात हुई थी. फिर मैं ही बात कर लिया. आस्टिन में वहाँ के हिसाब से कुछ ज्यादा ताम्रानुशासन और उमस के बावजूद राजेश २६.२ मील का माराथन करीब ६.२५ घंटे में पूरा किया जो उसका सर्वोत्तम नहीं है जो वह करना चाहता था. अभी तक तीन पूरा मैराथन कर चुका है राजेश. मुझे ख़ुशी इसके चलते परिवार से मिली कमज़ोरियों वह बिजय पायेगा..वैसे भी हर हफ़्ते वह हाफ मैराथन तो दौड़ ही लेता है…मुझे याद है वह एक मात्र सेवराफूलि से काँवर ले तारकेश्वर गया था स्कूल के दिनों ….मैंने भी यमुना की मनाती पर दो बार वह यात्रा की थी. ख़ाली पैर चलने की महत्ता के कारण वह बहुत कष्टकारी हो जाती थी… दूरी ३७ किलोमीटर यानी २३ मील थी. 

13.2.2017: सहिजन या सहजन के पेड़ों से आप सब परिचित होगे. एक प्लांट पर खेती करो, ख़ास पानी भी नहीं चाहिये. एक स्वास्थ्य उपयोगी चीज़ बहुतायत में पैदा करो, बेंचों , पैसे कमाओ. आज की किसानी ऐसी चीज़ों की खेती से होगी, धान , गेहूँ से नहीं…….सभी प्रगतिशील किसान इस बात को समझ कर फल, सब्जी, पशुपालन से ज्यादा कमा रहे हैं. विशेषकर छोटे काश्तकारों को खेती से इससे बेहतर अच्छे जीवन यापन का बेहतर रास्ता नहीं हो सकता…..हाँ, विस्तृत जानकारी हासिल करना होगी……

११.२.२०१७ दो कोशिशों में श्री अरोरा, मेरे सबसे नज़दीकी दोस्त की सहायता से आख़िरकार आज मैं एक ज़िम्मेदार नागरिक का कर्त्तव्य निभा पाया. मेरे निर्वाचन कार्ड में मेरा नाम हिन्दी में ‘इन्द्र’ की जगह ‘इन्दु’ लिखा मिला था २०१३ में. मैं उनकी आफ़िस में जा सभी कार्रवाई कर आया था, उन्होंने कार्ड को घर भेजने के लिये पैसे भी माँगे थे और मैंने दिये थे. पर आदत के अनुसार सोचा हो ही जायेगा, कोई रिकार्ड भी नहीं रखा. कार्ड नहीं आया. २०१४ के लोक सभा चुनाव में भी आज की तरह बुथ पर जा अपना नाम खोज भोट दिया था. इसबार डी. एम. के पास ई-मेल किया, उनका आश्वासन तो मिला पर कार्ड नहीं मिले. सबेरे ११ बजे जा कोशिश कर नाकाम हो वापस आ गया था, पर अरोराजी ज़ोर दे बुला लिये और उनके साथ जा नाम खोज लिया वहाँ के अधिकारियों की सहायता से, भोट भी डाल दिया, ख़ुशी मिली. पर मुझे २०१९ के लिये आम्रपाली इडेन पार्क के पत्ते का कार्ड तो बनवाना ही होगा….


आज यू. पी. में पहले चरण का भोट हो रहा है. मेरे ख़्याल से बिहार के बाद यह दूसरा मौक़ा है देश के सबसे पिछड़े और सर्वाधिक जनसंख्या वाले हिन्दी क्षेत्र के लोगों के लिये जाति धर्म से ऊपर उठ मोदी सरकार को एक दस साल का सरकार चलाने के लिये मौक़ा देने का इंगित देने का और पिछले सत्तर सालों चलती हुई सरकारों की ग़लतियों को सुधारने का. यूपी की जीत के बिना राज्य सभा में न इनका बहुमत होगा , न सुधारों की प्रक्रिया को तेज़ गति मिलेगी. परीक्षा भारतीय जनता पार्टी की नहीं है परीक्षा यूपी के लोगों की है. एक उन्नत समृद्ध इमानदार भारत या बेईमान भारत. इस बात में ….कोई दो राय हो ही नहीं सकती कि मोदी ने ईमानदारी से पिछले ढाई सालों से देश को विश्व में सम्मान दिलाने का अथक प्रयास किया है. देश की जनता अपने पैरों में अपनी इच्छा से कुल्हाड़ी मारना चाहे तो मोदी क्या करे?


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MAKE IN INDIA-My Dreams, My Views


Defence Services are failing ‘Make in India’: Bharat Karnad, Professor for National Security Studies at the Centre for Policy Research, New Delhi, writes in Open Magazine this week, “The three services also have in common the acute institutional hankering for Western military hardware, which was thwarted for 30 odd years (the mid-60s to mid-90s) by Cold War politics and the availability of Russian equipment in the Soviet era at ‘friendship prices’. Now that that constraint is lifted, they are reverting wherever possible to buying cost-prohibitive Western armaments with a vengeance, often at the expense of indigenously designed and developed weapon systems, such as the Arjun Main Battle Tank and Tejas Light Combat Aircraft (LCA), that have proved as good, when not better, than foreign items.” The frequent media reports of infightings between the defence ministry, DRDO, Ordinance Factories, and Indian Army and Indian Air Force authorities or may be, vested interest of powerful individuals or politicians might be behind the preference of ‘import’ by making technical specifications unnecessarily different and difficult.

Instead, all these departments and the core team working on the projects would have been working on the principles of the concurrent management with each individuals working missionary zeal to attain the goal.


Make-in-India with world-class innovation: All PSUs will have to innovate with tremendous speed to get ahead on its own rather than collaborating for foreign technologies of MNCs, be it HAL, BHEL, BMEL, BEL, as ISRO has established itself. If necessary, let these firms have as strong R&D and development centres as Tata Motors, Mahindra, or Bajaj and Hero MotoCorp have established over years to compete with global auto companies operating from India. India just can’t be in manufacturing with laggard steam era technologies and can never think to complete with global companies. Those heading HAL, BHEL, BMEL must dream take to the level of Boeing, GE, Caterpillar or bigger and the government must support that. All these India companies and many more must get into the top 5-8 in the world. Here is one story from ICF of Indian Railways:


Make-in-India: We all know that this campaign of MiI is the only saviour to get into manufacturing sector in a big way. But perhaps we are in confusion in deciding how to go for it. Make-in-India will not come only if we get Boeing or Airbus to manufacture high-tech items such as fighter planes in collaborations with local partners such as private houses of Tata /Mahindra or public sector company such as HAL. It is to happen in every sector in India. With rising population of aspiring consumers with surplus to buy different contemporary commodities in large numbers that makes the scale good enough to setup viable domestic manufacturing facilities unlike some years ago. For example, the huge banking sectors and users forced to switch over to digital transactions from cash economy because of demonetisation suddenly discovered that India does not have sufficient number of the companies which manufacture equipment like PoS machines and micro ATMs or finger print readers, biometric cards and PIN cards or even provide services required to modifying the ATMs to accept the new currency notes. If the mindsets of Indian entrepreneurs are only of trading, importing everything India needs today or as we go on developing from China, Malaysia or some other country, may be Bangladesh or Nepal, how can India be a manufacturing nation any day? 

Let us look at huge housing sectors under implementation and the related accessories , hardwares and machineries required, and access its volumes and revenues. Why did our entrepreneurs and factory owners get into manufacturing those items rather resort to importing all those items? 

The most stunning case is that of mobile phones and other electronics. Indian government could not bring any other large scale manufacturers once Nokia had to close its largest in world plant near Chennai. 

At initial stage of MiI, it appeared the defence ministry under an IITian honest Minister with Modi would be more decisive and move fast on the indigenously manufactured items and equipment. A country that can be globally competitive in satellite and missile technologies could certainly build world class tanks, fighters or guns investing and focusing on its developmental work in number required for domestic requirements and even exports. The government could have gone ahead simultaneously working speedily with clinching the offer of building a totally greenfield projects offered by Boeing or Airbus or any other on its term. It is all a story of indecisive administration and red tape everywhere. 

On the grassroots rural level, India must follow the way China did. I know a China story of how China became the sole manufacturer and supplier of shocks of all type all over the world. It started with one teacher of a village leaving her job and starting producing shocks using just one machine and the village became a huge cluster of shock suppliers. Rural India has huge potential in exploring its capacity of low end manufacturing of all the items that we import and that are supplied through e-retailers of household items such Amazon, Snapdeal or many.

Innovation in Manufacturing-an unique new approach: ‘Public sector defence major Bharat Electronics (BEL) and HAL are jointly setting up a R50-crore defence innovation fund. The objective of the fund is to promote start-ups in the defence sector and enable them to design and develop products for the armed forces. Both the companies will set up a joint venture company to take this initiative forward. “To begin with, both BEL and HAL will contribute R2.5 crore each and create a R5-crore fund and going forward, it will be enhanced to R50 crore. It will be operational by the end of the current financial year.’ It will give innovative young entrepreneurs to get into high tech manufacturing. Will it mean many startups coming in manufacturing?
LCA fighter of HAL: I don’t think the order will stop at the current 123. Defence ministry is planning a single engine fighter to be made in India with the industry but even after that, there’s a gap of 200 odd fighters that we can make good. We have planned our manufacturing capability at 18-20 fighters a year and have started subcontracting – the wing to L&T and central fuselage to Vem Technologies. If they start delivering, it’ll enhance our capability. We are also making a more advanced version of the Hawk that will have a modified wing for high speed maneuverability and engine with more power. This we are looking for the external market. The Air Force did not express keenness for the project when we started but once we start proving the capabilities, even the internal market could get interested.
The Indian Navy’s rejection of the naval variant of the Light Combat Aircraft (LCA) Tejas provoked sharp reaction from former DRDO chief VK Saraswat on Sunday.
“We have recently heard that the Navy does not require the naval variant of the LCA. It is an unfortunate decision without understanding the complex technologies involved in making a fighter,” said Saraswat, now a member of the Niti Aayog, at an aerospace seminar here.
Without naming Navy Chief, Admiral Sunil Lanba, the former Director General of the Defence Research and Development Organisation (DRDO) said people who have poor information should not be bad mouthing something.
“Hopefully good sense will prevail and the LCA naval variant will go into production as it can be a good contender for a foreign aircraft,” Saraswat told about 1,000 delegates participating in the international seminar being held as part of the biennial Aero India 2017 expo here.
when the international community had been denying technology to India, decision-makers should not lose faith in the capabilities of the Indian establishments, their scientists and engineers.
Make-in-India and Apple: As reported, “Apple India Pvt. Ltd, the Indian arm of the Cupertino, California-based iPhone maker Apple Inc., seems to have reached an agreement with the Karnataka government to set up a manufacturing plant in Peenya Industrial Area of Bengaluru. …….Apple has chosen Taiwan-based contract phone maker, Wistron Corp., as its manufacturing partner in India. .And Wistron is believed to have identified a facility in Peenya, an industrial suburb of Bengaluru. ……The company will make phones for the Indian market in the first phase of its operations……Apple India reported a profit of Rs294 crore in the year ended 31 March 2016 on revenue of Rs9,997 crore. It recorded sales of over $1 billion in India in 2015.” However, I am still not very excited with this news, as it will neither have any significant value addition or investment in India nor create a lot of employment. For electronics manufacturing, more and more manufacturing startups must get into components. It requires a thrust on R&D in the sector and product development of world class.
‘Make in India’ Achievement- ‘Dhanush’ and Republic Day: People will see India’s first indigenous, long-range artillery gun ‘Dhanush’. Over so many years, the gun ‘Dhanush’, a towed howitzer, has been developed by Ordnance Factory Board, Kolkata. It is based on the technical documentations under the ‘transfer of technology’ of the Bofors gun deal in the late 1980s. As claimed, ‘Dhanush’ is comparable to the latest weapon systems used by different countries. Besides features like electronic gun-laying and sighting systems, the indigenous gun has a strike range of 38 km, which is 11 km more than the imported Bofors guns. It showcases well what the active cooperation from other ordinance factories and PSUs such as SAIL, BEL, and many private sector companies can do. But the story would unfortunately in all probabilities end here. The gun like so many other defence products such as Avadi’s Arjuna tanks or Tejas will never be productionised in scale sufficient to meet the requirements of our army, upgraded and exported to attain global recognitions. This is the most unfortunate part of the India’s capability to become a manufacturing power. We can never become Japan, South Korea, China or even North Korea or Malaysia in manufacturing. Our private sector even when endeavours is not encouraged by the corrupt system to get into globally recognisable manufacturing sector. as I know both Bharat Forge, L&T worked and developed the gun but the government run by the IAS tops and their politicians bosses hardly bothered to let them go ahead. Even Modi and his men are hardly different so far Make in India is concerned.. I and perhaps many don’t have any big hope.
Make-in-India On verge of Happening: Here is a right news that I have been talking for some time. As reported, ‘Reliance Industries has asked its Chinese and Taiwanese original device manufacturers (ODMs) partners, including Foxconn, to make its Lyf branded 4G smartphones, smart set-top boxes, home automation and automobile telematics devices among others in India.’ It’s very prudent decision and will have a big support of potential rational Indian customers and must get special support from the government too. Reliance with its deep pocket and competitive superiority can make it globally competitive product and services too, if Mukesh Ambani decides so.
Make in India for survival: There is hardly any hope of the business houses in private sector investing in a big way in the greenfield manufacturing projects and facilities in India. The only course left out for the government is to focus on PSU manufacturing companies in various sectors such as defence, power generation, transmission and distribution equipment including nuclear and non-fossil renewable, railways, oil refinery, electronics. The government must think of re-engineering the organisations engaged in say aircraft manufacture such as HAL. HAL must go for a reorganisation based on products- helicopters, fighters, and transport planes- each world class in research and product development , manufacturing, assembly and testing facilities. It must expand in serial production scale and product quality excellent enough to be globally competitive exporting about 30 percent of its output such as that of Tejas and advanced helicopters. Similar approaches are required to be taken up in shipbuilding sector. India has a great traditions in shipbuilding since many centuries. India can over the year become global leader in shipbuilding of all types- from aircrafts carriers, frigates, and submarines including the nuclear ones. With fully developed vendor companies, it can provide a huge employment potentials because of the manual nature of fabrication it demands. In every sector in India, say road construction, metro or mobile network, because of a huge domestic demand, its hardware requirements will provide commercially viable volume for setting up the manufacturing facilities. However, every manufacturing facilities must be backed up by product development facilities to keep it in the top few of the world. Without a big push for manufacturing hardwares and machinery related in every sector, India can not hope to be in the league of top powerful countries. )
Make in India: I-Phones vs. Tesla Electric cars
The news of Apple asking for certain special concessions from Indian government to start manufacturing facilities of i-phones in India. As suggested in a report in ‘The Mint’, ‘If concessions have to be given to persuade global companies to set up manufacturing in India, they are better off given to those at the forefront of technologies that will drive the future. Last year there was some talk of the Indian government urging the revolutionary car-maker and energy storage company Tesla Motors to set up its Asian manufacturing hub in the country and offered it strategically located land near major ports. Tesla isn’t convinced yet but said that it would evaluate the proposal depending upon the sales of its Model 3 car in India.’ It will certainly a prudent decision to have the manufacturing facilities for something like Tesla Electric car, power packs or solar roofs and to be in the right league of high tech manufacturing of tomorrow’s products.
Focus on Demonetisation perhaps killed the driving force required for Make-in-India that would have been the top priority of the governments-centre and states. Perhaps India and Indians lack the political will and the necessary leadership for getting ahead in manufacturing. Many a times, I am forced to believe that India does not want to be in the race for getting into manufacturing as it is a difficult sector and requires the tenacity for hard work for many years without lucrative enough profits that Indians look for as their first goal. India must create an ecosystem that breeds manufacturing related innovators and entrepreneurs such as Wright brothers or Elon Rusk. Forget about China, we don’t feel bad with getting behind Bangladesh and Vietnam doing better. The country that was the prime innovators and exporters of textiles now only tries to find excuses for loosing position as in every field. It is a shame. ‘Make in India’ seems to have lost the steam.
My comment on Airbus setting up manufacturing base in India: “Government must decide fast enough about the greenfield project of fighter manufacturing in India where the best of the two- Boeing and Airbus with an Indian partner out of Tatas and Mahendras establishes the fully integrated plant with R&D, design and development, production engineering and manufacturing facilities with world best testing facilities to cater to Indian as well as exports requirements for years to come. It must encourage and develop the network of strong vendors’ facilities to meet domestic as well as global requirements. It will be an image booster for India and take it into high tech manufacturing.” Interestingly, Boeing supply-chain includes 30 direct and 120 indirect suppliers in India.
‘Make-in-India’ can’t happen with total apathy of private sector in investing for any greenfield project in country. Big business houses are scared of manufacturing sector. Their education and nearness with USA have made them follow its model and allergic to manufacturing. However, USA still remains the only hope in high tech product manufacturing. In good old days, the Indian business houses of the time used to complain about the absence of market in India and were sceptical about the technical prowess to compete with global players. With the existence of near to the biggest number of R&D centres of all global companies developing its products for world in India, it is clear that India does not lack talents. Indian business houses are getting cosier and safer with easier businesses of services and finance sectors. India must go for positive competitive manufacturing strategy with China. India has become one of the biggest clients of Chinese photovoltaic and smart phone manufacturers. The central-government must plan to lift India’s own installed capacities in both the sectors as well as to create an export industry. India wants to raise renewable capacity to 175 gigawatt by 2022 from 45 gigawatts at present. It has market requirements of smartphones every year year in millions. The volume in both sectors and its business value is good enough to have a wholly integrated manufacturing sector in India. It obviously require to set up huge manufacturing capacities that with deep pockets and good market share. Reliance, Tata BP, Airtel, Videocon, Micromax, Birla can invest in manufacturing. Even BSNL can go great with professional management and autonomy and encourage some Indian mobile cell manufacturing with preferential offers. Unfortunately the government will have to tae some brave decision. And private sectors must be convinced to invest in sectors such as manufacturing that can only create the desired amount of employment push. But they have a mind set to squeeze all benefits from the government and let all be done by the government. Will India’s private business houses rise to the national need of the hour, cooperate in the task and help building related manufacturing sectors?
Make-in-India military planes : For quite sometime now, this government is talking about getting a joint venture for building military planes in India between a known foreign company such as Lockheed Martin, Boeing, Airbus or Sweden’s Saab and a domestic player such as Tata or Mahindra or any other capable and interested companies . As it is reported in media time and again, Lockheed Martin is interested in setting up a production line for its F-16 plane in India for not just the Indian military, but also for export. And Sweden’s Saab has also offered a rival production line for its Gripen aircraft. Government must encourage the private companies with deep pockets to go ahead and facilitate them. The new company must have its own product development to remain with products of latest in technologies and beside making its planes for Indian defence requirements must also export to keep the business viability in tact. The promised deal for 200-300 single engine planes may be a good number for the local facility. India as such is growing on with production facilities of the major components for Airbus, Boeing or Lockheed Martin. Perhaps the government is not that proactive rather it is hesitant. It must make up its mind to live with private companies in defence sector. Modi must shake off the old tradition of Nehru era. It must happen by 2017.
Infosy’ Make-in-India Award: In its bid to encourage innovators to make in India, Infosys has started ‘Infy Maker Awards’ in the country. For the first Indian edition, 20 winners were selected from more than 280 entries and over 2,500 registrations from categories like health, energy, education, sound and music, social change solutions, robotics, art and design, artificial intelligence and electronics, among others. Each of the 20 winners will be presented with Rs 5 lakh each, a trophy and a certificate.

Further, Times Network, part of India’s largest media conglomerate Times Group, has launched the Make In India Summit and Awards, which are aimed at laying out key imperatives and the framework for turning the vision of ‘Make In India’ into a reality.
GE India, Sun Pharmaceutical Industries, Bharat Forge, Indian Space Research Organisation, Bosch India, Patanjali Ayurved and Tata Steel were given awards for their work in taking this initiative forward.
28.10.2016 Mukesh Ambani! Be bold, manufacture your own smart phones to offer to your clients in India and export too. This will be something to feel proud of and create an Ambani Legacy. If not now, it will be never for an Indian manufacturer. As reported, “India has overtaken the US in smartphone connections and is second to China, said Groupe Speciale Mobile Association (GSMA). The country is expected to grow its unique mobile subscriber base to approximately one billion by the end of 2020, at a compound annual growth rate (CAGR) of 9%.”)

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विचारों के बगिया से


कल नोयडा में भोट है. किस पार्टी को यू. पी. के चुनाव में जीतना चाहिये? मीडिया के रिपोर्टों से यही लगता कि पार्टी की जीत जातिय समीकरण एवं अल्पसंख्यकों के झुकाव पर निर्भर है. मेरे ख़्याल से भारत के सबसे बडी समस्याओं में है बहुसंख्यक हिन्दुओं में अभी तक घर बनाई हुई जाति प्रथा. जाति प्रथा पर आधारित भेद भाव, एक दूसरे से बडा या छोटा समझने की मानसिकता, यहाँ तक कि जाति के आधार पर जीवन यापन के कार्य का चयन पूरी तरह से अवैज्ञानिक और सामाजिक है. जो दल इस जाति प्रथा को मिटा सकता है वही देश के लिये श्रेय है. दूसरी समस्या है कि सबसे बड़े अल्पसंख्यक सम्प्रदाय के अधिकांश लोग कुछ फैलाई हुई ग़लतफ़हमियों के कारण सबसे बड़े राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को केवल हर जगह से हरवाने के लिये एक जुट हो भोट का निर्णय लेते हैं जो प्रजातंत्र एवं समाजिक सद्भावना को बनाये रखने के लिये ग़लत है. साथ ही यह भी ज़रूरी है कि वह पार्टी किसी परिवार विशेष या व्यक्ति विशेष की मालिकाना न हो. मेरे बिचार से और यू.पी के नोयडा में रहते हुये अनेक सालों के अनुभव से यह कह सकता हूँ कि समाजवादी पार्टी मुलायम परिवार की कम्पनी है और अभी अभी इस पार्टी के नवयुवक मालिक ने एक दूसरी ख़त्म होती पारिवारिक पार्टी के नवयुवक कर्णधार से यू.पी के चुनाव में एक साथ लड़ने का निर्णय लिया है. बहुजन समाज पार्टी भी मायावती की मालिकाना है. पर इन कमियों के बावजूद यू.पी में यही पार्टियाँ जीतती रही हैं. कैसे कहूँ कि यह ठीक है या ग़लत. पता नहीं उम्मीदवार की ईमानदारी और योग्यता कोई मायने रखती है कि नहीं. यह कैसा प्रजातंत्र है जहाँ पैसे की ताक़त, सम्प्रदाय , जाति, और पार्टी की छवि निर्णय करती है जीत? अत: सोचता हूँ क्यों भोट दूँ, जो ग़लत होगा?

कैसा प्रजातंत्र है जहाँ भक्तों की भीड़ और भक्ति एक गुनाहगार अयोग्य महिला को एक सभी मापदंडों पर अति उन्नत प्रान्त की मुख्य मंत्री बना देती है, कैसा है यह हमारा संविधान, प्रश्न उठता है मन में. जिस महिला के बारे में केवल यही मालूम है कि वह असीम सम्पति की मालिक है जयललिता की सखी या सेवक रही है. तमिलनाडू की बिद्वद वर्ग के पास, संबिधान, केन्द्र सरकार या सर्व्वोच्च न्यायलय के पास कोई बेहतर बिकल्प नहीं……अद्भुत है देश देश मेरा, जहाँ कभ मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री बना देती है , कभी राबड़ी देबी को पति लालू मुख्य मंत्री . क्या यही प्रजातंत्र है ?…,


मुझे नालन्दा विश्वविद्यालय सम्बन्धित चिन्ता और आक्रोश अच्छा लगा. २००६ में और से इस विषय पर बहुत लिखा था. पर फिर लगा अमर्त्य सेन की तरह हस्ती के बिरूद्ध कुछ नहीं किया जा सकता. नालन्दा को नीतीश अपने बिहार को एक अपने अवदान की तरह ले सकते थे, श्री N K Singh भी अपने सम्पर्कों से बहुत कुछ कर सकते थे. पर ये सभी पीछे हट गये. अगर कुछ अब भी करना है तो बिहार के देश और परदेश में रहनेवाले होनहार शिक्षित वर्ग का नये बनते नालन्दा विश्वविद्यालय के बारे में कोई ठोस बिचार या रोडमैप तैयार होना चाहिये. उसके बाद उस रोडमैप को लेकर श्रीमती सुषमा स्वराज को देना चाहिये और विश्वबिद्यालय के नये उपकुलपति को भी. श्री नीतीश कुमार को भी विश्वास में लेना ज़रूरी है. यह विश्वविद्यालय दुनिया के सभी बिश्वविद्यालयों से अच्छा और अलग हो….एशिया के सभी मुख्य बौद्ध देश के लिये अभिमान हो….एक कोर ग्रुप बने जो सभी देश के राजज्ञों से सम्पर्क कर उन देशों को नालन्दा के साथ जोड़े. पास में एक एशिया नगर बसे क्षेत्र में मेल जोल बढ़ाने के लिये….नालन्दा, बिकर्मशिला, बौद्ध गया का क्षेत्र दुनिया का एक अनूठा शान्ति क्षेत्र में परिवर्तित हो जाये, जिसे देखने देश देशान्तर से लोग आयें…”
आश्चर्य होता है नई पीढ़ी के नेताओं की राजनीतिक दाँवपेंच को देख और पता नहीं कैसे नई पीढ़ी का युवावर्ग उनमे अपना नेता खोज लेता है और बिना किसी गम्भीर चिन्तन के उनके पीछे चल पड़ता है. राहुल, अरविन्द केजरीवाल, अखिलेश की तरफ़ देश के लोगों की नज़र है. पाँच प्रदेशों के होने जा रहे चुनाव इनकी क्षमता का परिचायक भी होगा. शायद जीत भी जाये लोगों को फिर एक बार झाँसा दे. राहुल में मुझे गम्भीर नेता की झलक नहीं मिलती , न उनके ब्यक्तब्यों में कोई देश की उत्थान का कोई नये रास्ता का ख़ाका दिखता है. पर वे भारत का परधान मंत्री बनना चाहते है नेहरू, इंदिरा के बंशज होने के कारण, बिना संसद में कोई प्रतिभा दिखाये, बिना कोई ज़िम्मेदारी का पदभार संभाले. लगता है अखिलेश उत्तर प्रदेश की राजनीति तक ही अपने को सीमित रखना चाहते है. फिर जब वे अपने परिवार को जोड़े रखने में सक्षम नहीं हो पाये, तो कैसे आशा की जाये कि बहुत सारी अन्य पार्टियों को मिला वे आगे बढ़ सकते हैं. अरविन्द मीडिया के बनाये नेता हैं. आश्चर्य तब होता है जब पंजाब या गोवा में उनसे कोई यह एक साधारण सवाल नहीं पूछता कि उन्होंने दिल्ली में कौन सा तीर मार लिया जो पंजाब और गोवा में कर लेंगे. क्या अरविन्द दिल्ली की तरह छोटी जगह में वहाँ के लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने की दिशा में कुछ युगान्तकारी क़दम उठाये. आश्चर्य तब होता है जब सभी इन्हें युवाओं के नेता कहते है. क्या आज के युवक एक योग्य नेता में क्या होना चाहते वह भी नहीं जानते, समझते……
अद्भुत बंगाल- बहुसंख्यक हिन्दू कहाँ जायें? उलूबेरिया मुझे अच्छी तरह याद है. बिरलापुर से हुगली पार कर उलूबेरिया से मैं खडगपुर (IIT)जाता था. इसी उलूबेरिया के पास के एक स्कूल की यह घटना है. बंगाल में बडी धूमधाम के साथ सरस्वती पूजा मनाने की प्रथा बहूत साल पुरानी है. हमारे बिरलापुर विद्यालय में भी थी. इस साल ममता बनर्जी के बंगाल के उलूबेरिया के पास के एक स्कूल में दसकों बाद सरस्वती पूजा नहीं मनाया जा सका क्योंकि अल्पसंख्यक वर्ग ने इसका बिरोध किया, वे नबी दिवस मनाना चाहते थे. यह नये झगड़े बढती समाजिक कलह की निशानी है. बंगाल के हिन्दू विभाजन का सभी दर्द भूल गये हैं या ममता सरकार के डर से अपने धर्म के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं. यह उनकी नपुंसकता है या उदासीनता. ममता हिन्दूओं को क्या संदेश देना चाहती है? क्या वे अपने ही देश में मुग़ल काल की स्थिति में जीवन यापन करें सेक्यूलर राष्ट्र के नाम पर या ममता को अल्प संख्यकों का भोट दिलाने के लिये. मुझे कल आश्चर्य तब हुआ जब राज्यसभा में प्रख्यात पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता इस विषय पर अपना बिचार रख रहे थे उन्हें ममता बनर्जी की पार्टी के सदस्य बोलने नहीं दे रहे थे. यह कैसा प्रजातंत्र है…..क्या गांधी और नेहरू यही चाहते थे? और वे अगर चाहते भी थे आज का कोई आत्मसम्मान वाला हिन्दू क्या इसे बर्दास्त करेगा? 
इतिहास और फ़िल्म या सीरियल: (पहली बात,… चाहे ‘करनी सेना हो या जल्लीकट्टू के वे लोग जो मरीना बीच पर आज भी जमे हुये हैं. यह सरासर ग़ैरक़ानूनी है, और बिचार स्वतंत्रता के नाम पर देश को पीछे ढढकेलते रहने की साज़िश है. यह कैसा राज्य सरकार की गुप्तचर और पुलिस ब्यवस्था है कि किसी को कभी भी हंगामा और उपद्रव करने का अधिकार है और पुलिस इसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेती. मुझे मालूम नहीं लीला बंसाली पद्मिनी की कहानी को कैसे मरोड़ा है और लोग क्यों इतने ख़फ़ा हो गये करनी सेनावाले कि मारधाड़ की नौबत आ गई. पर लीला बंसाली ज़िम्मेदार फ़िल्म बनानेवाले हैं , बाजीराव मस्तानी उसका उदाहरण था. देश की बौद्धिक परिपक्वता के अभाव में लोगों को बरगलाना आसान है. इतिहास जो हो हमें बचपन में जो पढ़ाया गया, और टूरिष्ट की तरह जो चित्तौड़गढ़ में बताया गया, पद्मिनी देश, धर्म और समाज की आदर्श महिला का है. पर आज इतिहास या धर्म ग्रंथों के नायकों के कथानक और चरित्र को मरोड़ कर लोक मान्यता से हट कर अपने देश में नहीं करना ही बेहतर है. अच्छा होता अगर ये निर्देशक और निर्माता ऐसा नहीं करते. कुछ दिनों से पता नहीं क्यों अशोक और चन्द्रगुप्त मौर्य पर टी वी सीरियल बनाने का दौर चल रहा है. ‘चन्द्र नन्दिनी’ चन्द्रगुप्त मौर्य की कहानी चल रही है स्टार प्लस चैनल पर, पर गढ़े गये घटिया सम्बन्धों को सस्ते ढंग से ऐसे दिखाया जा रहा है जो असहनीय है किसी इतिहास के जानकार को. चन्द्रगुप्त मौर्य या अशोक या अकबर के नाम ब्यवहार कर फ़िल्म या सीरियल बनाना और दिखाना क्यों ज़रूरी है? यही बात समाज द्वारा पूज्य देवी देवताओं की कहानियों के बारे में भी ख़्याल रखना चाहिये. नये रिसर्च की जानकारी को पहले समाचार पत्रों या लेखों के द्वारा लोगों तक पहुँचाना चा हिये. 


कटियार और शरद यादव के नारी सौन्दर्य के बयानों को लेकर सोचने पर कुछ कुछ वैसा लगता है जैसा अमीर खान का दंगल में लड़कियों को लड़कों से कुश्ती कराने पर कुछ लोगों ने किया था…..राजनीति में उतरने पर फिर नारी पुरूष का कहाँ भेद रखना जायज़ है….वह भेद आजकल आम जीवन व्यवहार में भी न सिखाया जाता है न कोई आज सीखना चाहता है….बेकार में टी.वी चैनलों पर यह चर्चा हो रही है…वैसे तो टीवी और पत्रकारिता का माध्यम का स्तर और ब्यवसायिककरण असहनीय होता जा रहा है…)


जल्लीकट्टू को मनाने की स्वतंत्रता की माँग में लाखों की स्वत: जुटती गई भीड़ और बिहार में सरकारी तंत्र द्वारा जमा की गई शराबबन्दी के समर्थन में रची गई करोड़ की मानव श्रृंखला बहुत प्रश्न खड़ी करती है. पहला प्रश्न -क्या भीड़ इस बात का द्योतक नहीं कि कहीं कुछ ग़लत है? क्या अगर हम किसी माँग के लिये भीड़ जुटा सकते हैं चाहे संरक्षण हो या अन्य सामान्य माँगें, तो वह माँग देशहित जायज़ है? क्या यह संविधान संगत है? क्या पता कल एक दूसरी भीड़ किसी दूसरी तरह से जमा कर ली जाये उस माँग के बिरोध में. देश को नेतृत्व देनेवाले लोगों को तय करना होगा कल के लिये क्या यह तरीक़ा ठीक ह बहुत जल्द, बहुत देरी होती जा रही है?????????? क्या हम पिछड़ते जा रहे हैं अपने देशहित ज़रूरी ध्येय से , प्रगति के रास्ते से…)

२६.१.२०१७: (६८वां गणतंत्र दिवस, हर साल की तरह टीवी पर परेड देखने की इच्छा थी, पिछले कितने सालों से यही करता रहा हूँ. एक अलग तरह से देश की प्रगति को समझने का प्रयत्न रहता है. पहले तो दिल्ली दूर थी पर १९९७ से तो नोयडा ही घर हो गया, पर कभी साहस नहीं हुआ कि परेड देखने चला चला जाये. आज जब झंडोत्तोलन के लिये कहा गया तो अपना विचार ब्यक्त किया कि यह सौभाग्य सबसे बडी उम्र के ब्यक्ति को मिलना चाहिये. पता चला कि मैं ही वह हूँ , आश्चर्य हुआ पर कुछ ज़िम्मेदारी का अहसास भी हुआ. इस अवसर पर दो इच्छा ब्यक्त की उपस्थित लोगों के साथ- एक, बच्चों में पढ़ने की आदत को बढ़ाने के लिये एक छोटी पर अच्छी पुस्तकों के लाइब्रेरी की; दूसरी, नये बनते सामुदायिक भवन के पास की ख़ाली ज़मीन में स्कूली बच्चों के खेलने का मैदान बनाने की कोशिश. सभी का स्वागत है इस प्रोजेक्ट में जुड़ने के लिये. F-ब्लॉक की ऊँची ऊँची वासस्थानों में इसकी ब्यवस्था ही नहीं रखी गई है…अगर यह पहल सफल नहीं हुई तो ज़मीन बिल्डरों के हाथ चली जायेगी…स्कूल के बाद लड़के क्या करें ..खेलने का मैदान ज़रूरी है, इसकी सभी सेक्टरों में कमी है…अगर नोयडा अॉथरिटी वाले मान जायें तो अच्छा हो……

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Budget 2017 and Real Indian Character

Arun Jaitley in a first of the sort budget revealed the true character of the Indian that has evolved after independence. We, Indians assisted by financial experts and professionals called Chartered Accountants and tax lawyers try perhaps our best to evade to pay our taxes to the government and still keep on blaming the government for not doing anything. Read: “certain data indicate that our direct tax collection is not commensurate with the income and consumption pattern of Indian economy. 1. As against estimated 4.2 crore persons engaged in organised sector employment, the number of individuals filing return for salary income are only 1.74 crore.  2. As against 5.6 crore informal sector individual enterprises and firms doing small business in India, the number of returns filed by this category are only 1.81 crore.

3. Out of the 13.94 lakh companies registered in India upto 31st March, 2014, 5.97 lakh companies have filed their returns for Assessment Year 2016-17. 

4. Of the 5.97 lakh companies which have filed their returns for Assessment Year 2016-17 so far, as many as 2.76 lakh companies have shown losses or zero income.  

@ 2.85 lakh companies have shown profit before tax of less than ` 1 crore.  

@ 28,667 companies have shown profit between ` 1 crore to ` 10 crore, and 

@ only 7781 companies have profit before tax of more than ` 10 crores.

Among the 3.7 crore individuals who filed the tax returns in 

@ 99 lakh show income below the exemption limit of ` 2.5 lakh p.a., 

@ 1.95 crore show income between ` 2.5 to ` 5 lakh, 

@ 52 lakh show income between ` 5 to ` 10 lakhs and 

@ only 24 lakh people show income above ` 10 lakhs.  

Of the 76 lakh individual assesses who declare income above ` 5 lakh, 
@ 56 lakh are in the salaried class. 

@The number of people showing income more than ` 50 lakh in the entire country is only 1.72 lakh.  

And Let us contrast this with the fact that in the last five years, more than 1.25 crore cars have been sold, and number of Indian citizens who flew abroad, either for business or tourism, is 2 crore in the year 2015. From all these figures we can conclude that we are largely a tax non-compliant society. The predominance of cash in the economy makes it possible for the people to evade their taxes. When too many people evade taxes, the burden of their share falls on those who are honest and compliant.

After the demonetisation, the preliminary analysis of data received in respect of deposits made by people in old currency presents a revealing picture.  
@During the period 8th November to 30th December 2016, deposits between ` 2 lakh and ` 80 lakh were made in about 1.09 crore accounts with an average deposit size of ` 5.03 lakh.  

@Deposits of more than 80 lakh were made in 1.48 lakh accounts with average deposit size of ` 3.31 crores. This data mining will help us immensely in expanding the tax net as well as increasing the revenues, which was one of the objectives of demonetisation.

Is it not a shame for all of us? Demonetisation at least revealed how strongly powered are fraudsters and how low can our officers managing money can go. And how extensive and deep is the net. And who all are involved in this crime against the nation: jewellers, chartered accountants, tax lawyers, priests, freighter exchange handlers, politicians and their chamchas, manufacturers using greedy poor workers and perhaps all of us who had opportunity…..And when it was revealed ,the MPs laughed that we all noticed . I don’t know if it was disgust, shame or joke!

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विमुद्रीकरण पर मेरी प्रतिक्रियायें

3.12.2016 विमुद्रीकरण और काला धन: नोयडा आने के पहले कलकत्ता में मुझे केवल वहाँ के सेठों के घर अपार नगदी रूपयों के होने की जानकारी थी. मैंने मारवाड़ी वयस्क महिलाओं को अपने बैग से मुठ्ठी भर भर न्यू मार्केट में नोट निकाल दुकानदार को हीं गिन लेने के लिये कहते देखा था. हमारे एक हिन्द मोटर के सहकर्मी, जो बम्बई के प्रसिद्ध सेटलवाद परिवार के थे , नोटों से भरे घरों की बातें भी बताये थे. विश्वास नहीं होता था, यद्यपि कुछ हिन्दी चलचित्रों में ऐसे दृश्य देखे थे. नोयडा आने के बाद नोटों से ठसाठस भरे कालेधन की कमाई कीबातें समय समय से छोटे बड़े पदासीन लोगों से सुनता रहा हूँ. दो परिवारों का नाम चर्चित रहा है, एक मायावती और उसके भाई आनन्द , और दूसरा मुलायम के बड़े कुनबे का. नोयडा में रहते अब बीस साल हो गये. बहुत लोगों से परिचय हुआ. लोगों ने पौंटी चढ्ढा, यादव सिंह, आनन्द और बहुत ऐसे मुलायम, मायावती से जुड़े लोगों की बहुत कहानियाँ सुनाई. मीडिया में भी यदाकदा ख़बरें छपतीं रहीं.टीवी के समाचार चैनलों पर रजत शर्म्मा जैसे लोग इनकी दिल्ली से मुम्बई तक फैले अकूत चल अचल सम्पति की बातें करते रहे हैं. नोयडा आथरिटी के भ्रष्टाचार का तो मायावती के आयकर में घोषित ६०-७० करोड़ की बात भी आई. लगा, मैं इतने बड़े शिक्षा संस्थानों से पढ़ लिख अच्छे ओहदे पर काम कर क्या कमाया. विमुद्रीकरण की घोषणा से मुझे यह उम्मीद थी कि कम से कम सौ पचास राजनीतिक नेतागण और इतने या इससे ज्यादा सेक्रेटरी स्तर के सरकारी अफ़सरों के नाम ज़रूर सामने आयेंगे कालेधन के मालिकों के नामों की सूची में . यह बात आम जनता के मन में था. मोदी ने भी कुछ राजनीतिक नेताओं के बिरोध का कारण बताते हुये कहा कि उनकी बौखलाहट इस लिये है कि उन्हें अपने धन को ठिकाने लगाने का समय नहीं मिला. अभी तक तो ऐसा कुछ ज्ञात नहीं हुआ समाचारों से अगर राजनीतिक समझौता नाम को गुप्त रखने का न किया गया हो …चेहरे ज़रूर उड़े हुये हैं, पर बोली नहीं बदली है….अब तो लोगों में विश्वास होता जा रहा है कि राज नेता और सरकारी बाबू लोग मोदी के इस प्रहार से भी किसी अपने बचा जायेंगे. शायद यह प्रयास केवल कैशलेस या कमकैस की अर्थ ब्यवस्था भर का ही कुछ सफलता पाप्त कर सके….कालेधन के मालिकों को कुछ कड़ा आघात न दे सके………आयकर विभाग सम्बंधित एक बिल आया है काला धन रखनेवालों के लिये. मेरा इसके बारे में एक अलग बिचार है. काला धन दो तरह का है पहली श्रेणी में वे लोग आते हैं जो टैक्स की चोरी कर या असल आय को छिपा, जितना देना चाहिये उसे न दे, धन जमा करते हैं. एक दूसरा वर्ग है जिसमें राजनीतिक नेता, बाबू, या वे अफ़सर आते हैं यहाँ तक की न्यायाधीश भी, जो एक मोटी तनख़्वाह लेते हैं, पर बहुत सारे अनैतिक क़ानून बिरोधी काम कर घूस में धन लेते है नियत मूल्य का मिहरबानियों के बदले लेते हैं . मेरे बिचार से ऐसे धन पर किसी तरह की छूट नहीं मिलना चाहिये, वह पूरी सम्पति सरकार को ज़ब्त कर उन्हें क़ानून के अनुसार दंड देना चाहिये. क्या ऐसा होता है…..आप कृपया इस पर अपने बिचार दीजिये…..

4.12.2016 ममता क्यों विमुद्रीकरण के ख़िलाफ़ इतनी बौखला गईं है जितना और कोई नहीं? ममता नीतीश को भी विमुद्रीकरण का समर्थन करने के कारण और ममता के भारतव्यापी बिरोध का साथ न देने पर विश्वासघाती क़रार दिया. फिर ममता अपने हत्या के षड्यंत्र की बात कही जब उनके हवाई जहाज़ को कलकत्ता एअरपोर्ट पोर्ट पर पटना से आने के समय उतरने के पहले कुछ चक्कर लगाते रहना पड़ा और देरी हुई. उसके बाद ममता ने बृहस्पतिवार को भारतीय सेना पर निशाना साधा और नाटकीय ढंग से राईटर बिल्डिंग के आफ़िस में सेना द्वारा कूप बात घोषित कर रात भर बैठी रहीं. उनके निशाने पर केन्द्र सरकार और मोदी हैं- वे मोदी को हटा देने की बात की , केन्द्र सरकार को लुटेरा कहा….क्या यह उनके दिमाग़ की ऊपज है या बंगाल का कोई चाणक्य यह रास्ता दिखा रहा है ममता को नीतीश और राहुल को हटा २०१९ में भारत के प्रधान मंत्री के पद के लिये मोदी के बिरूद्ध अपने को सबसे मज़बूत प्रतिद्वन्दी दिखाने की कोशिश कर रहा है उनके इसारे पर और समर्थन से यह सब किया जा रहा है? क्या बंगाल का दुर्भाग्य नहीं है? प्रदेश पिछड़ता जा रहा है दूसरे उन्नत प्रदेशों की तुलना में, रोज़गार का कोई सुबिधा नही, कोई नई सोच नहीं , राहुल गांधी के तर्ज़ पर ममता का भी एक सूत्रीय एजेंडा मोदी की हर बात का बिरोध करना रह गया है और वह भी अत्यधिक नीच ढंग से……करीब करीब केन्द्र के ख़िलाफ़ बग़ावत की आवाज़ को बल देते हुये.. क्या यही चाहे होंगे बंगाल के वे राष्ट्र भक्त जो देश के लिये अपनी जान न्योछावर कर दिये देश को आज़ाद करने के लिये?ममता ने गुरुवार को आरोप लगाए थे कि राज्य सरकार को सूचित किए बगैर सेना तैनात की गई थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि सैन्यकर्मी वाहनों से पैसा वसूल रहे थे जो उन्हें नहीं करना था। मेजर जनरल यादव ने कहा कि नवंबर 2015 में इसी तरह का एक अभ्यास उत्तरी कमान ने उन्हीं स्थानों में किया था।

…..बचपन में एक भोजपुरी के शब्द- ‘खनगीन’ का उपयोग कुछ ख़ास तरह के महिलाओं के लिये गाँवों में सुना था. पता नहीं क्यों इतने सालों तक बंगाल में रहने के कारण और ममता बनर्जी के आचरणों को नज़दीक से देखने के अनुभव के आधार पर उसके लिये भी कभी कभी उसी बिशेषण या संज्ञा लगाने की इच्छा होती हैं . वहीं असम के मुख्य मंत्री चायबगानों के लाखों लोगों का बैंक खाता खुलवाने के लिये बैंकों से मिल युद्धस्तर पर प्रयास कर रहे हैं जिससे मज़दूरों की तनख़्वाह सीधे बैंक में जाये, दूसरी तरफ़ ममता बनर्जी भूखी शेरनी की तरह सब तरह की देश बिरोधी हरकतें कर रही हैं और उसके मातहत काम करने वाले इस को सह दे रहे. कल तक मोदी जी एस टी पर साथ देने के बाद अब उसे समय सीमा में न लागू होने देने में सबसे बडी भूमिका निभा रही है और अमित मित्रा, जो अपने को अर्थशास्त्री कहते हैं ममता का भरपूर साथ दे रहे हैं. बंगाल को तो कंगाल बना दिया अब देश को पिछड़ा बनाये रखने का लोगों को बेवक़ूफ़ बनाये रख प्रयास है. काश, बंगाल के बुद्धिजीवी समझ पाते…. 

4.12.2016 जैसा बाप वैसा बेटा: बाप कहा था भारत में ट्रैक्टर से खेती नहीं होनी चाहिये, बैलों और हलवाहोंका क्या होगा? ट्रैक्टर बन्द करा देंगे….कम्प्यूटर इस देश के लिये नहीं है…….बेटा बाप को झुठला दिया ….लैप टॉप बँटवा दिया …. बेटा को स्वच्छ भारत अभियान देश के लिये क्यों ज़रूरी है समझ नहीं आया……पी.एम के बुलाने के बावजूद उनका साथ नहीं दिये…..यही कारण है नोयडा की स्वच्छता में कोई ध्यान नहीं दिया गया….और नोयडा को स्मार्ट सिटी की लिस्ट में नहीं रखा गया. अब अखिलेश को मोदी के कम कैश और फिर कैस रहित भारत की अर्थ व्यवस्था बनाने की की बात की वे कैसे समर्थन करते….मुझे तकलीफ़ इसलिये हो रही है कि वे अपने को आस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा लिया हुये बताते हैं …..केवल पैसे के बल पर शिक्षित होने पर ऐसे ही ज्ञान मिलता है…मज़े की बात है कि अखिलेश के सुझावों पर पहले ही काम हो रहा है……….हर राज्य सरकार को केन्द्र से मिले सहायता भरपूर स्वागत करना चाहिये……पर दुर्भाग्य से सभी बिरोधी सरकारें सभी काम में राजनीति पर ज्यादा बल देती हैं…..,राज्य के ज़िम्मे दो महत्वपूर्ण बिभाग है शिक्षा और स्वास्थ्य …..क्या उन दोनों की बदहाली के लिये केन्द्र ही ज़िम्मेवार है’?

दिसम्बर ९, मुझे यमुना की दवाई लेने सेक्टर ५० के मेन मार्केट की एक दूकान पर गया, जब पी.ओ.एस से देने की बात कही तो पता चला, नहीं चल रहा है . पेटीएम पर देने की कोशिश की. ‘पे’ बटन पर दबाता रहा ….पर वह भी नहीं हुआ. आख़िर में दवाई का लिफ़ाफ़ा वहीं छोड़ना पड़ा . दूसरे दुकानों पर मसीनें ठीक थीं…एक बिजली का सामान लिया, फिर दूसरे दूकान से वे दवाइयाँ भी ली …..सब कार्ड से….पर पार्किंग का २० रूपया डीजिटल तरीके से देने का कोई उपाय नहीं है अभी….यह कैस के बिना भी हो सकता है कार्ड के ज़रिये….नोयडा के सी.इ. ओ. को आज मेल भेजा…यह तो काले धन जमा करने का ज़रिया है ठेकेदारों और पुलिस के लिये..देश के सभी शहरों में……हॉ, एक बात और हुई शाम को फ़ोन में एक मेसेज देखा पेटीएम का मेरा दवाई का ५९७ रूपया कट गया है…अब मुझे वह दवाई लाना होगा जो मेरे पास अगले तीन महीने के लिये है…पैसे तो वह लौटायेगा नहीं…पता नहीं यह सोफ़्टवेयर की समस्या है या ऐअरटेल के इंटरनेट की…,,

9.12.2016 (मुझे बडी उत्सुकता है दो बातों के बारे में लोगों की राय जानने की, जिसका मौक़ा मोदी की नोटबन्दी से मिला था. क्या शादियों को अंजाम देनेवाले लाखों लोगों ने तिलक छोड़ दिया ……कैशवाला अंश, …..बेकार के तामझाम के ख़र्चे कम हुये? घर में आये काले धन के नगदी का ब्यवहार कर शॉपिंग करनेवालों पर असर पड़ा? घर के बेकार ख़र्चों में कोई कमी आई? ७० साल से समानांतर चलनेवाली काली अर्थ ब्यवस्था को बदलने में तकलीफ़ तो बहुतों को महशूश होगी. मोदी तो हर छोटे से छोटे ब्यक्ति को, जिसके जन धन खाते का बदनीयत लोगों ने ब्यवहार करना चाहा हो, उठ खड़ा हो साहस से न लौटाने तक का , मौक़ा दिया. अब एक मोदी क्या करे? अगर कुछ बैंक के कर्मचारी मिल करोड़ों में नये नोट सामर्थ्यवानों को दे देने की साजिस करें….अगर सभी बिरोधी पार्टियाँ, मीडिया, यहाँ तक की सर्वोच्च न्यायालय के मान्य लोग भी बग़ावत करने के लिये उकसाते रहें…..मोदी किस किस से लड़े जब चरितरहीनता, लालच, इतने गहरे जा चुका हो सत्तर सालों में….नोटबन्दी से उपजे हैं कितने कमीने ठंग से कमाने के रास्ते लोगों को बरगलाने का..सावधान रहिये और लालच से बचिये..मज़ेदार बात यह है कि हिन्दू महासभा, मुलायम, ममता, मायावती, राहुल सभी मोदी को धमकी दिये जारहे हैं ….यह परीक्षा देश के ईमानदार लोगों की भी है जो अल्पसंख्यक बाहुबलियों या बेईमानों पर थोड़ी मानसिक दृढ़ता दिखा देश को जीता सकते हैं, सम्मानित करा सकते है कुछ धैर्य और साहस का परिचय दे. )

दिसम्बर ११ आज रविवार है, राकेश कलकत्ता या कोलकात्ता से वापस आ जायेंगे शाम तक. मुझे याद नहीं रहा कि मेघदूतम् पार्क में एक बच्चों का अनुष्ठान था…..रविवार पूरी छुट्टी रखता हूँ और केवल मनोरंजन के लिये घूमने निकलता हूँ …..आज भी वैसे ही निकला १०.३० बजे और मेघदूतम् की तरफ़ से आती आवाज़ से अनुष्ठान की याद आई और उधर ही निकल चला…..काफ़ी भीड़ थी….मन कुछ ज्यादा नहीं लगा …बाहर निकलते समय सिद्दीक़ी मिल गये उन्हीं के साथ आलोकबिहार के गेट से बाहर निकल गया….रास्ते में सोचा कि केन्द्रीय विहार से सेक्टर ५०-५१ के बीच के रास्ते से निकला जाये….. इस रास्ते के किनारे मोबाइल फल वालों की दूकानों से हरदम की तरह कुछ घर के लिये फल लेना चाहता था, पैसे तो लिया नहीं था पर फ़ोन था सोचा था कुछ दूकानवालों के पास तो पेटीएम से ख़रीदना सम्भव हो जायेगा…..पर यह हुआ नहीं ….उनमें किसी ने यह सुबिधा लेने की कोशिश नहीं की है….मेरे पूछने पर अपने पास स्मार्ट फ़ोन न होने का कारण बताये……..फिर पेटीएम से पैसे के देनलेन समझ में नहीं आने की बात भी कही…. मुझे एकमात्र समझ में नहीं आई ….उन दूकानों की संख्यायें तो बढती ही जा रही है….ब्यवसाय भी ढीकढाक चल रहा है……मतलब फल ख़रीदनेवालों के पास पैसे की कमी नहीं है….केवल मेरी तरह के कुछ लोगों के पास नगदी की कमी है…..क्या मैं भी अब ज़िद छोड़ दूँ .,,., पेटीएम की तरह की कम्पनियों के लिये तगड़ा ब्यवसाय इंतज़ार कर रहा है….हाँ, आते समय यह ज़रूर पता लग गया कि सफल और मदर डेरी में पेटीएम तो स्वीकार है पर डेविट कार्ड से ख़रीदारी की कोई ब्यवस्था नहीं है, जबकि इन दोनों अर्ध सरकारी कम्पनियों को इसकी ब्यवस्था ज़रूर करनी चाहिये……पर देश के लाखों ठेलेवालों और वैसे लोग जो रोज़ सड़क किनारे अपनी दूकान लगाते हैं या मुहल्ले मुहल्ले घूमते चलते हैं ठेले को ले, कोई सस्ता, सहज और सुरक्षित तरीक़ा भी होना चाहिये…..फिर उसे सहज तरीके से सीखाने की पहल भी होनी चाहिये….देश के नये स्टार्ट-अपों को यह बडा मौक़ा है … कहते हैं साधारण फ़ीचर फ़ोनों से भी पैसा लिया दिया जा सकता है……मुझे नहीं मालूम … क्या कोई जानकार बतायेगा…,,

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