दुर्गा सप्तशती, रामनवमी, एवं सुन्दर कांड


२१ अप्रैल, २०२१ आज बहुत ही शुभ एवं व्यस्त दिन था- दुर्गासप्तशती के नवरात्रि के नौ दिनों के थोड़े तपस्वी आचरणों के साथ रहने एवं पाठ समाप्ति का अन्तिम दिन, और साथ ही तुलसी के रामचरितमानस के नायक मर्यादा पुरूष राम का जन्मदिन। साथ में दैनिक सुन्दर कांड के पाठ को भी बरकरार रखने की ज़िद की भी रही।

दुर्गासप्तशती में मेरा आकर्षण तो बचपन से बंगाल में रहने के कारण आया, दादाजी दुर्गा पूजा के ‘महालया’ के दिन प्रसिद्ध तत्कालीन वीरेन्द्र कृष्ण भद्र के दिव्य स्वर में किसी को भी आकर्षित करने में समर्थ चंडी पाठ सुना करते थे रेडियो पर बंगला, संस्कृत मिले घंटे से ऊपर के आयोजन का। वह प्रोग्राम १९६६ तक चला, और आज भी उसका रिकॉर्डेड रूप रेडियो पर चलता है।

बहुत सालों से मैं यह अनुष्ठान पाठ करता रहा हूँ। यहाँ तक कि हिन्द मोटर या देश विदेश में जहां भी रहता था करता रहता था, सभी तकलीफ़ों के बावजूद। पर पता नहीं क्यों इस बार मुझे इस कार्य से हर साल से ज़्यादा ख़ुशी मिली। लगा कि आज के विश्व संकट की लड़ाई का एक अप्रत्यक्ष योद्धा इस तरह भी बना जा सकता है। संस्कृत पाठ कठिन है, पर ‘करत करत अभ्यास जडमत होत सुजान’ के अनुसार सालों से थोड़ी थोड़ी कोशिश से संस्कृत के श्लोक भी अब मुझे दुरूह नहीं लगते। मार्कण्डेय पुराण में शायद यह कथा है और ऋग्वेद की आठ ऋचाओं पर ‘देवी सूक्त’ के आठ मन्त्र दुर्गा हैं दुर्गा संबंधी। सप्तशती की दुर्गा इस बात की याद दिला दी कि वे पूरी ब्रह्म शक्ति का ही एक विचित्र रूप हैं जो संख्या में बहुत ही बड़े असुर शक्ति को हरा इसलिये पाईं क्योंकि सभी देवों की अलग अलग प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दिव्य शक्तियों का भी साथ मिला। सभी देवों से जुड़ी देवियाँ – नारायणी, शिवा, ब्रह्माणी के साथ समस्त नारी शक्ति (स्त्रिय: समस्त सरला जगत्सु..) मिल कर अपनी पूरी शक्ति से असुरों एवं उनके नायकों से लड़ने लगीं एवं उन्हें परास्त कर दिया। दशमोध्याय में शुम्भ कहता है- ‘ अन्यथा बलमाश्रित्य युद्धयसे यातिमानिनी’। देवी स्वीकार कहती हैं वे मेरी से ही बनी है, मेरा ही रूप हैं, तुम्हें अलग लगती हैं। आज हिन्दुस्तान की नारी शक्ति अपने को क्यों असहाय मानती है। क्योंकि समाज में असुरों का बोलबाला और मनमानी तो आज भी है।क्यों नहीं वे दुर्गा से सीख लेती हैं।

फिर अपने आदर्श पुरूष राम पर जब भी सोचता हूँ तो लगता है कि उस जमाने में सजातीय शक्तिशाली राजा असुरों के विरूद्ध के किसी न्याय युद्ध में एक दूसरे का साथ नहीं दिये और राम को भी वह नहीं मिला। फिर राम एक अलग वर्ग से सहायता लिये, कितने प्यार से पाये और उनकी हर कदम पर सहायता ली और आभार ज्ञापन किया, उन्हें अपना भाई बनाया, उन्हें सम्मान दिया, उनकी आन्तरिक आत्मशक्ति को जगाया, जिसे उस समय एवं आज के शक्ति शाली भी उन्हें नीच या दीन समझ छोड़ देते हैं, न उनकी सहायता करते हैं, न उनकी सहायता एवं शक्ति पर उनका विश्वास जगता है। केवट, गुह, शबरी, जटायु, हनुमान, जामवन्त सुग्रीव, हनुमान, विभीषण की सहायता कितनी सहजता से ली गई और दुनिया के सबसे शक्तिशाली असुर रावण से जीत हासिल की गई।

और सुन्दर कांड के नायक हनुमान राम कथा में चौथे कांड में राम से मिले और उनके हो कर रह गये। सभी असाध्य कर्म किया राम के लिये और राम ही तरह पूरे मानव जाति के लिये भक्ति का अनुपम उदाहरण रख राम की तरह हर हिन्दू के दिल में बस गये। मेरा पूरे हिन्दू समाज के हर परिवार के हर व्यक्ति से यह आग्रह है कि वे हनुमान चालीसा का यह मंत्र बराबर जाप करें जो पानी की तरह सहज है जीवनदायी अमृत है और जीवन सफल करें…
“बुद्धिहीन तनु जानके सुमिरौं पवनकुमार!
बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहीं
हरहु क्लेश विकार ….”।।।।

और कुछ नहीं तो तुलसी दास जी के मानस का निम्नलिखित छोटा सुभाषित ही ज़रा याद रखें, तो समाज में बढ़ती मानसिक एवं शारीरिक हिंसा कम हो जाये-
”परहित सरिस धरम नहिं भाई ।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।”
परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं और दूसरों को कष्ट देने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं ।

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An Emergency Writeup

Some Questions of National Importance: I saw a column written by one highly respected intellectual of the country on an issue that is totally irrelevant as on today- Weaponising faith: The Gyanvapi Mosque-Kashi Vishwanath dispute https://indianexpress.com/article/opinion/columns/gyanvapi-mosque-dispute-kashi-vishwanath-temple-asi-7270802/. Some so-called religious goons are raising this sort of issues or politicians at this moment of the country. Unfortunately most of these columnists in all national media are mostly engrossed about the mistakes of the politicians in power and their policies or any thing that supports or opposes divisive mentality.This is when a huge democracy of billions are facing many problems of their living condition and welfare put in hazard of serious consequences of Covid-19.

Why are our intellectuals not talking about these burning issues? Vaccine Manufacturing Hub of India and whatever health care services we have are the only hope to fight the spreading Covid-19. They require full support from all, particularly our argumentative masses that has been nurtured by our so called democratic processes.It must cause a serious concern to all Indians. Whereas, neither so call religious gurus sitting on huge wealth nor the politicians and other religious leaders have any concern. Perhaps they are neither capable nor interested still to get over this present crisis to Indian economy. The right- minded wise men of India must think about on these key issues. How can we all build a better disciplined mass of billion plus population? Why could not have beeen the election rallies or even the elections for that matter or Kumbha Mela could have been postponed? Heaven would not have fallen if it would not have been held for one or more years as no one on earth can bring a discipline required or demanded for controlling the spread of Covid with the sheep mentality of the Indian masses….Not even One politician worth name or a religious leader or even the leaders of the farmers protest have suggested this postponement in the interest of the country. How can a country like India sustain even the minimal living standards of its maximum number of poor families with lockdowns and uncertainty in all industrial and commercial sectors, particularly the service sectors employing the maximum number of these poor persons for sustaining their families. The richer classes are hardly sensitive enough to solve the problems of the almost half a billion of migrant labourers in providing them vaccines or a good enough dormitory living facilities. The government and richer peers in industry are not helping the vaccine manufacturers to enhance their facilities which they are asking for. Instead the government has imposed a price limit for their vaccines to make it look people-friendly to the vote bank ….Unfortunately none is talking about it or advising the decision makers in government or private sector to do something as one for a National Emergency situation… Further even after the first lockdown, the industrial units and other places have not worked out the best they could do face the repeat of the same or similar pandemics and keep their activities going. I remember from my own life that there was a somewhat much difficult condition in good olds in Bengal related to extreme shortage of electric power. And the industrial plants and almost every one found a way out to cross over the situation through various means from the reorganising the working systems to innovative new products etc. Every sector will have to think of the present situation of Covid Chaos to reappear again and again. Why the marriages or festivals like Kumbh or for that matter any activity where a crowding foreseen, look into the way it is causing spread.Let us all including huge number of columnists of media and other intellectuals and business leaders think over:

1. if our country need so many political parties going over thousand,

2. if the country can’t have all the elections of all levels, for centre, states including Panchayats simultaneously once in three, four or five years,

3. if the country need to have a national emergency in situation such as this type of worldwide pandemics and its consequences on the economy, education, etc that can take back the country and its people backward in every manners.

Can more and more raise these question to himself and in his known circles of people?

And please also consider a special case of democratic India when China and Pakistan are the type of enemy countries that we are having. Let the democracy must a boon into bane.

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उपनिषदों की आचरण संहिता

उपनिषदों की आचरण संहिता
हमारे आदिग्रंथ- वेद, उपनिषद्, गीता सभी में व्यक्तिगत अनुशासन,संयम, नियम, आचरण की ज़रूरत पर बल दिया गया है। व्यक्ति के कर्ममय जीवन के किसी क्षेत्र में प्राचीन काल से आजतक इनको निष्ठा के साथ मान कर ही उच्चतम शिखर तक पहुँचा जा सकता है।
उपनिषदों में भी वर्णित है आत्म ज्ञान या ब्रह्म ज्ञान के पथिकों से सद आचरण की अपेक्षा। कुछ उपनिषद् धीर एवं मन्द शब्दों से बुद्धिमान एवं मन्द बुद्धि वाले दो तरह के व्यक्तियों की बात कही है। व्यक्ति के बुद्धि के द्वारा लिये इनके निर्णयों को श्रेय एवं प्रेय बताया गया है। दोनों के लक्षणों को भी बताया है। आदमी का चरित्र और आचरण कुछ हद तक जन्मजात होता है पूर्व जन्म के कर्मों के कारण, पर इस जन्म की संगति, परिवार,एवं शिक्षा और फिर स्वनिर्माण की प्रक्रिया, सद गुणों से भरे जीवन या दुर्गुणों में लिप्त जीवन की नींव डाल सकती है। यहाँ मैं उपनिषदों से लिये कुछ अपेक्षाओं के बारे में लिख रहा हूँ।

१. ईशोपनिषद् का पहला ही श्लोक एक ऐतिहासिक महत्व रखता है। महात्मा गांधी ने इसी के ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ पर अपने जीवन को जिया और वे महात्मा हो गये। इसके बारे में पहले भी लिख चुका हूँ। सभी अन्य उपनिषदों भी त्याग महिमा बताया। वह श्लोक या मंत्र है-
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
इस ब्रह्मांड के सभी चर अचर ईश्वर का है और हर व्यक्ति त्याग कर जीवन का आनन्द ले और किसी अन्य के, यहाँ तक की अपने भी धन का लोभ नहीं करे, क्योंकि वह तो ईश्वर का है।

२.कठोपनिषद् कहता है कि कैसे व्यक्ति आत्मा को जानने में असमर्थ होंगेव-‘ दुश्चरितां न अविरतः न अशान्तः न असमाहितः न वा अशान्तमानसः’(२.२४)
-जो दुष्कर्मों से विरत नहीं हुआ है, जो शान्त नहीं है, जो अपने में एकाग्र (समाहित) नहीं है अथवा जिसका मन शान्त नहीं है। उपनिषदों में अथिति के आदर का निर्देश है। कठोपनिषद् में यमराज भी कहते है कि जिसके घर में अतिथि ब्राह्मण को बिना भोजन रहना पड़ता है उनकी सब दौलत नष्ट हो जाती है-‘ब्राह्मणः अनश्नन् यस्य गृहे वसति तस्य अल्पमेधसः पुरुषस्य आशाप्रतिक्षे सङ्गतम् सुनृताम् इष्टापूर्ते पुत्रपशून् सर्वान् एतत् सर्वं वृङ्क्ते(१.८)-जिसके घर मे ब्राह्मण बिना खाए रहता है, उस अल्पबुद्धि मनुष्य की सारी आशा-प्रतीक्षाएँ, जो कुछ उसने पाया है, जो सत्य और शुभ उसने बोला है, जो कुएँ खुदवाए हैं तथा जो यज्ञ किये हैं, और उसके सब पुत्र एवं पशु उस अनादृत ब्राह्मण के द्वारा विनष्ट कर दिये जाते हैं। और अथिति नचिकेता की अपने ही घर में तीन दिन भूखे प्यासे रहने के कारण यमराज उसे तीन महत्वपूर्ण वर माँगने को कहते एवं उसे पूरा कर देते हैं जो कठोपनिषद का मूल विषय है।
आगे चल कर यज्ञ, दान, और तप- त्रिकर्म को निष्काम भाव से करने का विधान बताते हैं।

३. मुंडकोपनिषद में नित्य ऐसे ही आचरणों को करने की सलाह दी है आत्मा को पाने के लिये। ‘सत्येन तपसा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण च लभ्यः(३.१.५)- सत्य से, आत्म-संयम (तप) से, सम्पूर्ण एवं सम्यक् ज्ञान से, ब्रह्मचर्य से सर्वदा लभ्य है।
और फिर कहा है,’सत्यम् एव जयते अनृतं न’- सत्य’ की ही विजय होती है असत्य की नहीं।(३.१.६) ‘सत्यमेव जयते’यह भारत के संविधान का मूल मंत्र है। फिर ऋषि ने बताया है कि कैसे लोगों को आत्मज्ञान नहीं मिलता-‘अयम् आत्मा बलहीनेन न लभ्यः प्रमादात् च न वा अलिङ्गात् तपसः अपि न लभ्यः(३.२.४)बलहीन व्यक्ति के द्वारा लभ्य नहीं है, न ही प्रमादपूर्ण प्रयास से, और न ही लक्षणहीन तपस्या के द्वारा।

४. केनोपनिषद् में कहा गया-‘तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्‌ (४.८)-तप, आत्म-विजय (दम) तथा कर्म इस उपनिषद् के ज्ञान का आधार (प्रतिष्ठा) हैं, ‘वेद’ इसके सब अंग हैं, सत्य इसका धाम है। फिर
‘यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति’-जो इस अन्तरज्ञान को जानता है वह अपने पाप का उच्छेदन करके उस बृहत्तर लोक एवं अनन्त स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है, अवश्यमेव वह प्रतिष्ठित हो जाता है।

५. प्रश्नोपनिषद में ब्रह्म ज्ञान के इच्छुक आये विद्यार्थियों को गुरू ऋषि की पहली शर्त है- ‘तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया भूयः एव संवत्सरं संवत्स्यथ…’(१.२)-एक वर्ष ब्रह्मचर्य, श्रद्धा एवं तपस्यापूर्वक व्यतीत करिये फिर जो चाहें प्रश्न पूछिये।
फिर आगे भी कहा है- ‘अथ तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया आत्मानम् अन्विष्य..’(१.१०)- ‘आत्मा’ का ब्रह्मचर्य, विद्या, श्रद्धा एवं तपस्या के द्वारा अन्वेषण कर लिया है.. वे ‘सूर्यलोक’ के अपने स्वर्ग को जीत लेते हैं।वहाँ अमृतत्व अभय प्रदान करता है,वहीं से कोई लौटता नहीं हैं।
कुछ उन ऋषियों के व्यक्तिगत जीवन का अनुभव भी दर्शाता है या कारण के सम्बन्ध के कारण।जैसे श्लोक १.१३ में ‘ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते प्राणं वै एते प्रस्कन्दन्ति। रात्रौ यत् रत्या सयंयन्ते तत् ब्रह्मचर्यम्’ -जो दिन में स्त्री-रति में सुख लेते हैं वे स्वयं ही अपने प्राणों (जीवन) को नष्ट कर देते हैं; जो रात्रि में स्त्री-रति में सुख लेते हैं वे ब्रह्मचर्य का ही पालन करते हैं। पर १.१५ में ऋषि कहते है- ‘येषां तपः ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितं तेषाम् एव एषः ब्रह्मलोकः,’-किन्तु ब्रह्मलोक उनका है जिनमें तप तथा ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठित हैं।१.१६ में फिर इस बात पर बल देते हैं- ‘तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति’-उन्हीं का है यह निर्मल ब्रह्मलोक जिनमें न कुटिलता है, न मिथ्यात्व है, न कोई भान्ति है।’इसी उपनिषद् में आगे कहा है-‘यः अनृतं वदति एषः वै समूलः परिशुष्यति तस्मात् अनृतं वक्तुं न अर्हामि॥६.१॥-जो असत्य बोलता है वह समूल नष्ट हो जाता है।’

६. तैत्तरीय उपनिषद् में व्यक्ति के आचरणों पर बहुत साफ़ साफ़ रूप से कहा गया है- ‘ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च।सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च।तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च।शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। १’ – वेद के स्वाध्याय एवं प्रवचन के साथ सत्याचरण-ऋतम् हो; …सत्य हो; ….तपश्चर्या हो; …आत्म-प्रभुत्व (दम) हो;…. आत्म-शान्ति (शम) हो। फिर ‘स्वाध्यायप्रवचने च अनुष्ठेयानि सत्यम् एव अनुष्ठेयं इति सत्यवचाः राथीतरः मन्यते तपः एव अनुष्ठेयं इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः मन्यते स्वाधायप्रवचने एव अनुष्ठातव्ये इति नाकः मौद्गल्यः मन्यते । तत् हि तपः। तत् हि तपः। स्वाध्यायप्रवचने।… ”सत्य सर्वप्रथम है” सत्यवादी ऋषि राथीतर (रथीतर के पुत्र) ने कहा। ‘तप सर्वप्रथम है” नित्य तपोनिष्ठ ऋषि पौरुशिष्टि (पुरुशिष्ट के पुत्र) ने कहा। “वेदों का स्वाध्याय एवं प्रवचन सर्वप्रथम है” मुद्गल पुत्र नाक ऋषि ने कहा। कारण, यह भी तपस्या है तथा यह भी तप है।’
‘सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।सत्यान्न प्रमदितव्यम्‌। धर्मान्न प्रमदितव्यम्‌।कुशलान्न प्रमदितव्यम्‌। भूत्यै न प्रमदितव्यम्‌।स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्‌।
देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्‌। मातृदेवो भव।पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि।यान्यस्माकं सुचरितानि।तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि।
ये के चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः। तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम्‌। श्रद्धया देयम्‌। अश्रद्धयाऽदेयम्‌। श्रिया देयम्‌। ह्रिया देयम्‌। भिया देयम्‌। संविदा देयम्‌।११.१,२,३॥’
-सत्य बोलो, अपने धर्म के मार्ग पर चलो, वेदों के स्वाध्याय में अवहेलना मत करो। अपने आचार्य को उनका इष्ट धन लाकर देने के बाद तुम अपनी पुत्र परम्परा के दीर्घ सूत्र को नहीं काटोगे। सत्य के विषय में तुम प्रमाद मत करना। अपने कर्तव्य के विषय में तुम असावधान मत होना। कुशलता के सम्बन्ध में तुम असावधान मत होना। अपनी उन्नति, वृद्धि एवं उद्यम के प्रति असावधान मत होना। वेदों के स्वाध्याय एवं प्रवचन के विषय में प्रमाद मत करना।
देवों अथवा पितरों के प्रति अपने कर्तव्यों में अवहेलना मत करना। तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए देवतुल्य हों तथा तुम्हारे माता देवीतुल्या हों जिनकी तुम आराधना करते हो। अपने आचार्य की देवसमान सेवा करो तथा घर आये अतिथि की देवसमान अभ्यर्थना करो। लोगों के सम्मुख हो कर्म अनिन्द्य हैं तुम केवल उन्हीं कर्मों को सयत्न करना, अन्यान्य कर्मों को नहीं। हमने जिन सत्कर्मों को किया है वे ही तुम्हारे द्वारा धर्म-समान करणीय (उपास्य) हैं, अन्य कोई नहीं।
जो भी ब्रह्मचारी हमसे अधिक श्रेष्ठ एवं महान् हों तुम्हें उनको आसन देकर सम्मानित एवं परितृप्त करना चाहिये। तुम्हें श्रद्धा एवं आदरपूर्वक दान करना चाहिये; अश्रद्धा से तुम नहीं दोगे। (तुम श्री-सम्पत्ति के अनुरूप दान करोगे)*। तुम सलज्जभाव से दान करोगे, तुम सभय दान करोगे; तुम संविदभाव से (सहदयता एवं सहानुभूतिपूर्वक) दान करोगे। इसके अतिरिक्त यदि तुम्हें अपने कर्म तथा कर्मपथ (आचरण) के विषय में शंका हो तो जो भी ब्राह्मण वहाँ हों जो सुविचारशील हों भक्त हों, दूसरों से संचालित न हों धर्मपरायण हों, कठोर एवं क्रूर न हों, जैसा वे उस विषय में आचरण करे वैसा ही तुम करो। और यदि कोई व्यक्ति दूसरों के द्वारा अभियुक्त तथा अपराधी घोषित हो तो उसके साथ भी तुम उसी प्रकार आचरण करो जैसा उसके प्रति वे सब ब्राह्मण करते हैं जो सुविचारवान् श्रद्धावान् हैं, दूसरो के द्वारा संचालित नहीं हैं, धर्मपरायण हैं, जो कठोर एवं कूर नहीं हैं।
भृगुबल्ली में गृहस्थों, किसानों को कुछ निर्देश हैं जो सबके लिये ही हैं-
अन्नं न निन्द्यात्।…. (७.१) तुम अन्न की निन्दा नहीं करोगे; कारण, वह तुम्हारे श्रम का व्रत है।(८.१)’अन्नं न परिचक्षीत…’तुम अन्न का तिरस्कार नहीं करोगे।
(९.१)अन्नं बहु कुर्वीत।…तुम अन्नवृद्धि तथा अन्न-संचय करोगे।(१०.१)’वसतौ कम् चन न प्रात्यचक्षीत’-तुम अपने आवास में आये किसी भी व्यक्ति की अवमानना नहीं करोगे।

७. बृहदारण्यक उपनिषद् में कहानी है जो प्रजापति ने अपने तीन पुत्रों- देव, मनुष्य,और असुरों को कहा जब वे उनसे अलग होने लगे और पूछें कि हमें अपनी अन्तिम शिक्षा दीजिये। उन्होंने कहा, ‘द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रय शिक्षेद्दमं दानं दयामिति।’
वह आज भी बरसात में बिजली की गर्जना में ईश्वरीय आवाज़ बन द, द, द …में निहित होती है- पहला‘द’ देवों को दम (आत्म संयम), दूसरा ‘द’ मनुष्यों को दान, और तीसरा ‘द’ असुरों को दया या करुणा करते रहने की सीख देता है। That very thing is repeated even today by the heavenly voice, in the form of thunder, as “Da,” “Da,” “Da,” which means: “Control yourselves,” “Give,” and “Have compassion.”
यह आज के सभी मनुष्यों के लिये भी है, क्योंकि हम में ही दैविक, राजसिक, एवं आसुरी प्रवृति के लोग है।
क़रीब क़रीब सब मुख्य उपनिषदों की उद्धृति यहाँ दी गई है। सोचिये हज़ारों पहले सिद्ध ब्रह्म ज्ञानी ऋषियों ने समाज के लोगों से कैसे जीवन आचरण की उम्मीद की गई थी आज भी कितना सार्थक है एक अच्छे समाज, राष्ट्र एवं विश्व के लिये।
इन्हीं आचरणों को अधिक विस्तार से भगवद्गीता और फिर तुलसीदास के रामचरितमानस में किया गया है। अगर व्यक्ति सच्चरित्र नहीं, सदाचरण नहीं करता तो कभी कोई सफलता उसके हाथ नहीं लगेगी जिससे वह अन्त तक शान्तिमय जी सके। कभी देर नहीं होती है। जब जागो तभी सबेरा। आपके बहुमूल्य सुझाव की अपेक्षा रहेगी।

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ईशोपनिषद् और उसका महत्व -विद्या क्या है, कैसी हो एवं क्यों- ३

ईशोपनिषद् और उसका महत्व -विद्या क्या है, कैसी हो एवं क्यों- ३

एकाधिक उपनिषदों में विद्या और अविद्या विषय पर चर्चा है, जो औपनिषदिक है और लगता है वह व्यवहारिक नहीं है।
मण्डूकोपनिषद् में शिष्य रूप में आये महा-गृहस्थ शौनक का प्रश्न है ऋषि अंगिरा से, ‘क्या है जिसे जान लेने के पश्चात् यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है-कस्मिन् विज्ञाते सर्वं इदं विज्ञातं भवति’ (१.१.३)
ऋषि दो प्रकार की विद्या के बारे में बताते हैं। दो विद्या हैं- परा एवं अपरा।
उसमें अपरा विद्या वह है जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष के अध्ययन से मिलती है।
और परा विद्या वह है जिससे व्यक्ति ‘अक्षर तत्त्व’ या ब्रह्म या परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर उपनिषद् के ब्रह्म ज्ञानी ऋषियों के बताये उपायों से स्वंय ब्रह्म और अमरत्व को पा जाता है।
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्शा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥(१.१.५)
अपरा विद्या वैदिक काल में उन्हीं विषयों को बात करती है जो भाषा, व्याकरण, ही नहीं वल्कि नक्षत्र, पृथ्वी आदि अन्य ग्रहों के कक्षों आदि का आकलन करने के उपयोगी खगोल विज्ञान, गणित की विधाओं और चिकित्सा के आयुर्वेद, रसायन, के बारे में की शिक्षा में थी। सभी विधाओं में महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की और उसे गुरूकुलों के द्वारा शिष्यों को दिया। उदाहरण की तरह जैसे उस काल के ऋषि बौधायन,कात्यायन ने यज्ञ वेदिका को वेदों के अनुसार बनाने के सुलभ शास्त्र के सूत्रों की प्रमाण आधारित खोज की जो आगे चल गणित कहलाया।

एक और प्रसंग छान्दोग्योपनिषद् में (७.१.१) है। नारदजी आचार्य सनतकुमार के पास जा उनसे कहा,’भगवन्! मुझे उपदेश दीजिये’। सनतकुमार नारद जी से पूछते हैं, ‘कृपया आप बताए कि आप क्या क्या जानते हैं, फिर मैं बाक़ी विषयों को बताऊँगा।’
नारद ने कहा, ‘ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेद सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि॥-‘भगवन्! आचार्य, मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्ववेद,पाँचवाँ वेद- पुराण और इतिहास, वेदों का वेद (व्याकरण),श्राद्ध का कर्मकांड, गणित, निधिशास्त्र,तर्कशास्त्र,नीति, देवविद्या, ब्रह्म विद्या, भूतविद्या,धनुर्वेद,नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या और देवजनविद्या-नृत्य संगीत आदि सब जानता हूँ। मैं केवल मंत्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं, मैं वही बनना चाहता हूँ।’
इसी को उपनिषदों ने ‘विद्या’ माना है, पर उपनिषद् यह भी कहते हैं कि इसे प्राप्त के इच्छुक एवं इसके लिये ज़रूरी त्याग करनेवाले और आत्मवेत्ता बनने वाले ज्ञानी लोग बहुत कम ही होते हैं आम तौर पर। कठोपनिषद् में एक श्लोक कहता है-
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥१.२.७॥

  • इस संसार में अधिकांश के लिये तो इस आत्मत्तत्व विद्या के बारे में सुने जाने की ही संभावना नहीं होती। बहुत से लोग इसके बारे में सुन कर भी कुछ नहीं समझ सकते, इस आत्मत्तत्व विद्या को अच्छी तरह से समझानेवाले भी दुर्लभ हैं, इस ज्ञान को प्राप्त करने वाला कोई कोई ही होता है, और जिसे इसका ज्ञान हो गया हो, ऐसे आत्मत्तत्व की उपलब्धि से युक्त महापुरुष के द्वारा शिक्षा प्राप्त किया हुआ आत्मत्तत्व का ज्ञाता भी परम दुर्लभ ही है।
    आत्मत्तत्व की उपलब्धि के लिये व्यक्ति विशेष में जन्मजात दैविक गुणों की प्रधानता दिखती है और वे ऐसे ही परिवार में आते हैं जहाँ के आध्यात्मिक परिवेश के कारण उन्हें आत्मत्तत्व की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है, या पूर्वजन्म के अर्जित पुण्यों के कारण वे सब सांसारिक आकर्षणों से यथाशीघ्र विरक्त हो अपने आत्मत्तत्व के उपलब्धि के रास्ते चल पड़ते हैं, और एक पूर्वसिद्ध ज्ञानी की छत्रछाया में अपने भी ब्रह्मज्ञानी बन जाते हैं।

कठोपनिषद् में भी विद्या अविद्या की बात कही गयी है-
दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥१.२.४॥
यमराज कहते हैं नचिकेता से, ‘परस्पर सर्वथा भिन्न, विपरीत, अलग-अलग दिशाओं में जाने वाली ये, एक ‘अविद्या’ नाम से जानी जाती है तथा दूसरी ‘विद्या’ । परन्तु, हे नचिकेता! मैं तुम्हें विद्या का सच्चा अभीप्सु मानता हूं जिसे बहुविध काम्य वस्तुऐं भी अपने प्रति लोलुप नहीं बना सकीं।’
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥१.२.५॥
जो लोग अविद्या में, उसके भीतर ही वास करते हैं, अपनी बुद्धि में स्वयं को ज्ञानी तथा महापण्डित मानते हैं, वे मूढ होते हैं, वे उसी प्रकार ठोकरें खाते हुए चक्करों में भटकते रहते हैं जैसे अन्धे के द्वारा ले जाये जाने वाले अन्धे होते हैं।

भारतीयों को उपनिषदों और गीता से अपने जीवन के शुरुआती दिनों से लेकर जीवन के अंत तक सीखने और उसे आत्मसात् करके अपने नैतिक चरित्र के निर्माण के माध्यम से मानवीय उत्कृष्टता की ओर बढ़ने के लिये प्रेरित होने की आवश्यकता है। इसे हमारी शिक्षा पद्धति में समाहित करने की ज़रूरत है और यही एक श्रेष्ठ राष्ट्र बनाने का रास्ता है जिसे बिना किसी अनर्थक तर्क के प्रारम्भ करना चाहिये। यह दूसरे राष्ट्रों के लिये भी प्रेरणा दे सकता है एक खुशहाल विश्व बनने की दिशा में।
हम उपनिषद एवं गीता को पढ़ या समझ जान तो सकते हैं, पर ऋषियों ने इसे जीने और आचरण, व्यवहार के रूप में व्यक्त करने के लिए लिखा था। इसके बताये आचरणों को जीवन में प्रयोग कर और अपने उसके ख़ुद अनुभव कर ही उचित फल प्राप्त किया जा सकता है। श्री रामकृष्ण कहा करते थे, ‘कुछ ने दूध के बारे में सुना है, कुछ ने इसे देखा है, कुछ ने इसे छुआ है, और कुछ ने इसे पिया है और जो पिया है वही केवल दूध से लाभान्वित होता है और उसके गुण का अनुभव करता है।’
उपनिषद अध्ययन केवल विषय की जानकारी, तर्क, मानसिक अलंकरण, या बौद्धिक व्यायाम के लिए नहीं हैं। इनके विचारों को आत्मसात करने की क्षमता तो केवल चारित्रिक शुचिता एवं आत्म-अनुशासन से व्यक्ति को मिलती है, जो योग के अभ्यास का भी सबसे पहला कदम है। बिना अनुशासन के आप न योग में, न अध्यात्म में, न जीवन के अपने नियत काम में सफलता हासिल कर सकते हैं। और यह बचपन से प्रारम्भ कर पूरे जीवन तक चलता रहना चाहिये है।

आज के युग के लिये ईशोपनिषद् के रचयिता ने पहली बार एक क्रांतिकारी विचार व्यक्त किया है हज़ारों साल पहले, जहां ऋषि ने विद्या एवं अविद्या का एक साथ जानने की ज़रूरत पर बल दिया है। इसकी स्वामी विवेकानन्द एवं अन्य महापुरुष ने प्रशंसा की है।


उसका हमारी शिक्षा में मधुर मिश्रण ज़रूरी है प्रारंभिक शिक्षा से ले उच्चतम शिक्षा एवं विज्ञान या प्राविधिक संस्थानों में किये जा रहे किसी विषय सम्बन्धी सफल अनुसंधान के लिये भी।
आज के संदर्भ में वे सब विषय,जो प्रारम्भिक स्कूलों से उच्चतम शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थाओं द्वारा विद्यार्थियों को दिये जाते हैं सफल जीवन यापन के लिये विभिन्न क्षेत्रों में,वे सब अपरा विद्या है। दुर्भाग्य से हमारे तथाकथित धर्म निरपेक्ष देश में आध्यात्मिक शिक्षा को सर्वमान्य नहीं मानते हुए इसे शैक्षणिक विद्यालयों या संस्थाओं में नहीं दिया जाता हैं। जबकि नैतिक शिक्षा बहुत ज़रूरी है एक जागरूक नागरिक एवं सफल ब्यक्ति बनने के लिये। साथ ही बचपन से ही ईश्वर की प्रार्थना, सत्य आधारित आचरण और आगे चल ध्यान, योग आदि की शिक्षा देने की बहुत ज़रूरत है और अब विश्व के पश्चिमी समृद्ध देशों में भी स्वीकार किया जाने लगा है।इस विद्या के बिना किसी क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनने के लिये ज़रूरी एकनिष्ठ चेष्टा या एकाग्रता नहीं लाया जा सकता। भारत के ऋषियों ने प्राचीन काल में ही बहुत गहरे मनन, चिन्तन, आत्म प्रयोग कर इस विद्या का उपयोग आम जीवन जीनेवाले लोगों से ले से राजकीय प्रणाली चलानेवाले लोगों एवं उन परम ज्ञान प्राप्त करने के इच्छुक लोगों के किया। और सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ महापुरुष हुए जिनके नाम आज भी हमें प्रेरणा देते हैं।उपनिषद्, गीता, ब्रह्म सूत्र, या पतंजलि योग शास्त्र आदि ग्रंथों की रचना हुई भविष्य के ज्ञानियों का मार्ग दर्शन के लिये।

ईशोपनिषद् में मंडूकोपनिषद् के अपरा विद्या को सांसारिक जीवन यापन की विद्या या ‘अविद्या’ बताया है और ब्रह्म ज्ञान के लिये व्यवहृत विद्या,परा विद्या को ‘विद्या’बताया है जो आत्मा को हृदयंगम करनी के लिये थी। ‘विद्या’ ज्ञान के पथ पर चलने का निर्णय किये ब्यक्ति के लिये थी। उस विद्या को प्राप्त करने के लिये ज़रूरी प्राथमिक नैतिकता, आचरण एवं फिर ज्ञान योग आदि की शिक्षा थी, जिसको लक्ष्य ईश्वर, ब्रह्म, ब्राह्मण, पुरूष आदि कहा गया।

ईशोपनिषद में इस विद्या के विषय को लेकर तीन महत्वपूर्ण एवं कुछ हद तक अनूठे श्लोक हैं। ईशोपनिषद् में विद्या सम्बंधित पहले दो श्लोक- नौ एवं दस, बड़े अटपटे लगते है पहले बिना समझे ठीक तरह से औपनिषदिक ज्ञान को समझने के ढंग को जाने बिना अन्त:करण से।

ऋषि का विद्या एवं अविद्या को साथ साथ जानने का असली सुझाव इस विषय के आख़िरी ११वाँ श्लोक में आया है। जो शायद पहली बार किसी उपनिषद् के रचयिता ऋषि ने बेबाक़ तरीक़े से दिया है और आज भी अनुकरणीय है सब क्षेत्रों में लगे व्यक्तियों को श्रेष्ठ बनने के लिये ज़रूरी है।
विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥११॥
He who knows both vidya and avidya together overcomes death through avidya and experiences immortality by means of vidya.
लेकिन जो इन दोनों को एक साथ जानता है, विद्या और अविद्या, अविद्या से मृत्यु को पार करता है और विद्या के माध्यम से अनन्त जीवन प्राप्त करता है।

प्राचीन काल से ही हर व्यक्ति मृत्यु पर विजय एवं अमरत्व की कामना रखता है।

यही है ईशोपनिषद् के रचयिता अनाम ऋषि की विशेषता जिसने विद्या के साथ साथ अविद्या के भी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने पर बल दिया। यह शायद किसी अन्य उपनिषद् में नहीं किया गया है इतनी विशेषता के साथ जो इसके श्लोक ९ से ११ में किया गया।

हाँ, केनोपनिषद् में भी विद्या को ईशोपनिषद् की तरह अमरत्व का रास्ता बताया है, जब कि आत्मा को आत्मबल के लिये जो सांसारिक पुरूषों के लिये ज़रूरी है।
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्‌ ॥२.४॥
जब यह ऐसे प्रत्यक्ष बोध के द्वारा जाना जाता है जो ‘इसे’ प्रतिबिम्बित करता है, तभी व्यक्ति ‘इसका’ विचार बना पाता है, क्योंकि उससे व्यक्ति को अमृतत्व की उपलब्धि होती है; उपलब्धि के लिए व्यक्ति को आत्मा से शक्ति प्राप्त होता है तथा विद्या से अमृतत्व की प्राप्ति होती है।

सुधी पाठक अगर मेरे विचार के विपरीत अगर कुछ जानते हों वे कृपया मुझे बतायें

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India : A factory for the Quad

India : A factory for the Quad’: I am quoting from a columnist of India Express who in India Express today presents the case in the favour of India. Before giving his examples of India’s manufacturing power, I only add that all these together are just the tip of iceberg of the manufacturing capability of India. Because of the lack of serious implementation strategies of earlier government policies, India too started importing almost all items instead of getting them developed and manufactured in-house, as it was easier to follow other developed countries starting with US ….Today the trend and will to reverse that will make India a great manufacturing hub much faster than any other country with so many inherent reasons. Private entrepreneurs including big companies will have to wholeheartedly participate in making it happen.

“ What has changed between 2007 and 2020 that Quad 2.0 has become viable? The answer is the globally visible rise in India’s manufacturing ability.
Examples-

First, the success in PPE kits. At the beginning of the COVID-19 pandemic, India was manufacturing zero PPE kits. As the world — including the developed economies — was scrambling to secure supplies from China, India not just created an overnight world-class manufacturing capacity to meet its own needs but also started exporting PPE kits. From zero to almost a million kits a day — the ability to scale was breathtaking. The same was the case with ventilators and other essential supplies, such as the drug HCQ.
Second, the soft power of Vaccine Maitri. While the developed countries are scrambling to secure vaccines for their domestic population, India is not only vaccinating its own people faster than any other country but is also exporting millions of vaccines to countries in need — and all through domestically-manufactured vaccines. From Canada to Pakistan and from the Caribbean Islands to Brazil — Made in India vaccines have been a life vest across the globe.

Third, the enterprise of India’s private industry — a hallmark of the deepening manufacturing base. As a recent New York Times report noted, when it came to syringes — without which the vaccines were useless — the global scramble again led to India and Hindustan Syringes & Medical Devices, among other manufactures. Hindustan Syringes alone has ramped up its manufacturing capacity to almost 6,000 syringes a minute!


Fourth, India’s success in precision high-end manufacturing. The PLI scheme launched for electronics’ manufacturing evinced unprecedented global interest with 22 top companies, including the top manufactures for Apple and Samsung mobile phones. Over the next five years, a manufacturing capacity of over $150 billion and exports of $100 billion have been tied up through this scheme.
Fifth, the success of India’s fourth-generation fighter jet programme and the orders placed by the Indian Air Force for 83 Tejas jets. Very few countries have the ability to indigenously manufacture such high-tech fighter planes and India’s success is one more milestone in its journey towards emerging as a global manufacturing destination.”

https://indianexpress.com/article/opinion/columns/quadrilateral-security-dialogue-india-modi-foreign-policy-manufacture-sector-7224378/

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एक विस्मृत श्लोक कैसे पाया?

एक खोया श्लोक: आज सबेरे सबेरे यू. डी. चौबे जी का फ़ोन ने मेरी उनसे किये हुए एक श्लोक को सठीक जानने की इच्छा पूरी कर दी और इसके लिये मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ। मेरे दादा जी मेरे किसी ध्येय में असफलता के समय इसके द्वारा मुझे समझाते भी थे, हमको शान्त करने एवं कोशिश को जारी रखने में उत्साहित करने के लिये। उस समय तक तो संस्कृत की कोई जानकारी ही नहीं थी मुझे। कुछ और श्लोक थे जो गीता से थे, उन्हें तो गीता में रूचि आने पर जान लिया और याद भी कर लिया।वे थे…

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥२.४७॥
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल की चिन्ता न कर कर्म में भी पूरी निष्ठा को केन्द्रित करो।

You have the right to work, but never to the fruit of work. You should ever engage in action for the sake of reward, nor should you long for inaction.


या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥२.६९॥
सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जब रात्रि होती है, उस समय ज्ञानार्थी जगता हुआ पूर्ण निष्ठा के साथ चेष्टा रत होता है अपने ज्ञान अर्जन के लिये स्वाध्याय, मनन, चिन्तन में; और दिन में जब सभी सांसारिक व्यस्त हो जाते हैं सांसारिक सुख की प्राप्ति में और जागते हैं। तब ज्ञानार्थी के लिये वह रात्रि की तरह रहती है।

In the night of all livings, a sage remains awake. And so-called day of the livings is the night of ignorance to the wise.

पर समय समय पर उस न याद आनेवाले श्लोक की याद आती थी, पर इसके केवल भाव एवं केवल अन्तिम दो शब्द ही ग़लती सही याद थे। पिछले दिनों मैंने चौबे जी से इसके बारे में पूछा था, उस दिन उन्हें याद नहीं आया था, पर कल के समागम वार्ता में जब एक बार फिर अनुरोध किया तो उसको आज वे मुझे क़रीब क़रीब पूरा बता दिये ।मैं फिर इसे गुगल से खोज लिया….सबकी जानकारी के लिये वह श्लोक यहाँ दे रहा हूँ….यह बताता है कि लक्ष्मी देवी उन्हीं के पास आती हैं जो किसी चेष्टा में असफलता के बाद भी उस सफलता के बारे में कारण जानने का सतत प्रयास कर ग़लती को सुधार अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। यह संस्कृत के प्राचीन एवं अति लोकप्रिय पंचतंत्र से है-

उद्योगिनं पुरूषसिंहमुपैति लक्ष्मी ,
दैवं हि दैवम् इति कापुरूषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरू पौरूषम् आत्मशक्त्या,
यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोअत्र दोष: ।।
( पंचतंत्र, मित्रसम्प्राप्ति )
Goddess Lakshmi always stays with the industrious people. Everything depends on the Luck is the thinking of the lazy people. Therefore, we should leave apart the luck and devote ourself to do the hard work. If full efforts are made but desired results are not achieved, there is no harm in that.
उद्यमी पुरूष के पास ही सदैव लक्ष्मी जाती है । सब कुछ भाग्य पर निर्भर है ऐसा कायर पुरूष सोचते हैं । इसलिए भाग्य को छोड़ कर हमें उद्यम करना चाहिए । यथाशक्ति प्रयास करने के बावजूद भी यदि सफलता नहीं मिली तो इसमें कोई दोष नहीं है ।
फिर से चौबे जी की स्मरण शक्ति को दाद देते हुए जो भगवान की कृपा से प्राप्त होती है, जैसा गीता के १५ अध्याय के १५ श्लोक में बताया गया है-
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ॥
मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषों का नाश) होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य (सर्व वेदों का एकमात्र जानने योग्य ‘परमेश्वर’) हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ॥15॥
I am seated in everyone’s heart, and from Me come memory, knowledge and forgetfulness. By all the Vedas, I am to be known. Indeed, I am the compiler of Vedanta, and I am the knower of the Vedas.
हम में हर व्यक्ति में स्मृति शक्ति कम बेशी होती है, यद्यपि अभ्यास से इसे बढ़ाया जा सकता है। पर महापुरूषों में यह अनोखी होती है जैसे स्वामी विवेकानन्द जी की जो मेरठ में एक लाइब्रेरियन को आश्चर्यचकित कर दिया था। जब उन्हें पता चला था कि लाइब्रेरी में इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के सभी नये भ्लयूम उपलब्ध हैं तो अपने स्थानीय एक शिष्य के मार्फ़त दो दो कर मंगाने लगे एवं दूसरे दिन लौटा देते थे। एक दिन लाइब्रेरियन को उत्सुकता हुई और पूछ बैठा कि क्या वे अध्ययन भी करतें है या उलट पुष्ट कर लौटा देते हैं। इस पर विवेकानन्द ने उससे किसी भी पृष्ट के विषय में पूछने को कहा और सब अक्षरश: बता दिये। चौबे जी की भी याददाश्त बहुत अच्छी है। इतने दिनों के साथ से यही निष्कर्ष निकाला हूँ ।

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ईशोपनिषद् और उसका महत्व -२

आत्मा की सर्वव्यापकता की स्थापना एवं इसकी वैश्विक ज़रूरत

ईशोपनिषद के तीन श्लोक पूरे विश्व के मनुष्य जाति को यह संदेश देते है जो ग़लत धारणा के कारण इस विश्व में लोगों को एक दूसरे से अलग बता घृणा, द्वेष, युद्ध, हिंसा, अमानुषिक अन्याय, प्रकृति का विध्वंस, यहाँ तक कि आत्महत्या या तथाकथित आत्मजनों की हत्या करने को मजबूर कर रहा है, उससे बचा जा सकता है, अगर हम इन श्लोकों पूरी तरह आत्मसात् कर ले। हम अपनी शक्ति एवं साधन अपने वैज्ञानिक ज्ञान से सुख शान्ति लाने का ग़लत ढंग से प्रयास करते जा रहे हैं। अगर मानव जाति अपने एवं अगली पीढ़ी को इन श्लोकों के महत्व को सीखा कर, समझा कर, मन में गहरे बैठा कर, एक नई तरह से आगे बढ़ने एवं जीवन जीने का प्रयास करें तो हम सदियों की ग़लतियों को सुधार सकते हैं।

पाँचवाँ श्लोक
उपनिषद का पाँचवें श्लोक में आत्मा का परिचय देते हुए कहते हैं ऋषि,’तत् उ सर्वस्य अस्य वाह्यतः’-वही हम सबके भीतर है और वही हम सबके बाहर भी है। अर्थात् एक ही आत्मा हम सब चर-अचर में व्याप्त है।क्या यह एक चिर नूतन सोच नहीं है उपनिषद् के ऋषि की, जो इस सबसे पुराने उपनिषद् में जो केवल अठारह श्लोकों का है,किया गया है?

अगर हर व्यक्ति इसे समझ अपने आचरण से विभिन्नताएँ की सोच को मिटा देता है तो उसका संसार के लिये के लिये जो लाभ होगा, उस पर ज़रा सोच कर देखिये। पूरे विश्व के मनुष्य,अन्य सभी तरह के जलचर वनस्पति,पेड़,पौधे,जानवर,पक्षी आदि सभी तरह के चर अचर में पूर्ण तालमेल बनने से हमारी यह धरती कितनी सुखमय, एवं शान्तिमय हो जायेगी।

ईशा उपनिषद् वही ज्ञान भरा संदेश श्लोक छठवें, सातवें के द्वारा दे रहा है..यही हमें अनावश्यक आक्रामक हिंसा को भी कम करने में सहायता करेगा, जिसके कारण कितनी प्रजातियाँ ख़त्म हो गई या होने के कगार पर हैं। हम अपने नये आविष्कृत उत्पादों को किसी के नुक़सान के लिये व्यवसायिक नहीं बनायेंगे।प्रदूषण कम होगा। और हम अपनी इच्छित चीजें भी पा सकते हैं।हमें नई आविष्कारों एवं निर्माणों में इस ज़रूरत का ख़्याल रखना ही होगा।

यस्तु सर्वानि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
जो सभी प्राणियों को अपने स्वयं के आत्मा के रूप में देखकर, मानकर सभी अस्तित्व की एकता का एहसास करता है, फिर उसे क्या मोह या दुख हो सकता है?
The man who realises himself as the Atman perceives also that he is one with all beings, that none is separate from him. Then who can hate whom?

जो आदमी खुद को आत्मा समझ लेता है वह यह भी मानता है कि वह सभी प्राणियों में से एक है, कोई भी उससे अलग नहीं है। फिर कौन किससे नफरत कर सकता है?
यह दृष्टिकोण सार्वभौमिक प्रेम और सेवा मुक्त है; प्रेम एक बाध्यकारी शक्ति है, जबकि घृणा अलगाव की भावना से आगे बढ़ती है। यह विचार, भारतीय विचार के अनुसार, आधुनिक और साथ ही प्राचीन, मानव के उच्चतम बिंदु को चिह्नित करता है।

सातवाँ श्लोक
पिछले श्लोक के उपदेश को बल देने के लिये है क़रीब क़रीब दुहराता सा है।
यस्मिन्सर्वानि भूतानन्यात्मैवभुद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
जब ब्यक्ति को पता चलता है कि सभी प्राणियों की आत्मा वास्तव में उसकी अपनी ही तरह की आत्मा हैं, वह पूरी तरह सृष्टि के सब में एक पूर्ण एकत्व (अपनापा) को देख,समझ लेता है। इस तरह के व्यक्ति के लिये न भ्रम के लिए कोई वजह जगह दिखता है और न दु: ख के लिए।

आगे एक इस ज्ञान को अगर कोई अपने व्यवहार में ला सभी में उसी आत्मा को देखने लगे तो उसे अमरत्व प्राप्त हो जायेगा जो हर की एकमात्र इच्छा होती है।
बहुत उपनिषदों में यह कहा गया है। यह केनोपनिषद् में है – तस्मात् धीराः भूतेषु भूतेषु विचित्य अस्मात् लोकात् प्रेत्य अमृताः भवन्ति॥२.५॥

  • ज्ञानीजन विविध भूत-पदार्थों में ‘उस’ एक आत्मा का विवेचन कर, इस लोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं।
    *
    कठोपनिषद् में भी यही कहा गया है-
    एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥२.२.९/१०॥
    समस्त प्राणियों में विद्यमान ‘अन्तरात्मा’ एक ही है परन्तु रूपरूप के सम्पर्क से वैसा-वैसा प्रतिरूप धारण करता है; इसी प्रकार वह उनसे बाहर भी है।
    *
    एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। २.२.१२
    -समस्त प्राणियों के अन्तर् में स्थित, शान्त एवं सबको वश में रखने वाला एकमेव ‘आत्मा’ एक ही रूप को बहुविध रचता है।
    *
    नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्‌।२.२.१३
    -अनेक अनित्यो में ‘एक नित्य’, अनेक चेतन सत्ताओं में ‘एक तत्त्व’ ‘एकमेव’ होते हुए भी जो बहुतों की कामनाओं का विधान करता है।
    कठोपनिषद में भी विस्तार से ३-४ श्लोकों में यह बताया गया है और अन्य उपनिषदों में भी- अग्नि, वायु, सूर्य के द्वारा दृष्टान्त देते हुए कहा है- ‘एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च’।

जो इसे पूरी समझ और अनुभव कर लेता है, जब में सबमें एक ही आत्मा को, तो किसी तरह का न नफ़रत का भाव रहता है, न कोई मोह होता है न शोक और शाश्वत सुख एवं शान्ति भरा जीवन जी सकता है।
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इस समानता को महसूस करने की क्षमता एक नागरिक के रूप में सामाजिक जागरूकता में अनुशासन द्वारा और एक आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में आवक अनुशासन द्वारा मानव मन में आती है। यह आज की शिक्षा मूल अंग होना चाहिये, एवं बहुत कम उम्र से ही बच्चों के दिल में बैठाना ज़रूरी है। यह अनुशासन धर्म है। वेदांत के अनुसार ब्यक्ति ‘निर्दोषी हिम समं, नादोṣयं हि सामं ब्रह्म’। उपनिषदों के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति अस्तित्व की इस बुनियादी एकता के बारे में जागरूकता में लगातार रहता है, और फलस्वरूप वह अलगाव के भ्रम से मुक्त हो किसी से भी नफरत नहीं कर सकता है।

गीता में फिर इस विषय पर बार बार कृष्ण ने कहा है, इसी दृष्टिकोण की महिमा मानव जीवन को महिमान्वित कर सकती है। जीवन के कर्म के वृक्ष के बेहतरीन फल के रूप में है।
भगवद्गीता
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०.२०॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥१०.३९॥

‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च’- जो मेरा भक्त किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, समस्त प्राणियों के प्रति मित्रता और करुणा का भाव रखता है- भगवद् गीता १२.१३
‘यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः’-जिससे जगत् (जीव वर्ग) क्लेशित नहीं होता और जो जीवों से क्लेश का अनुभव नहीं करता।भगवद्गीता १२.१५

‘अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।…वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियों में विभक्त की तरह स्थित हैं….॥१३.१७॥

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२८॥
जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियों में परमेश्वर को नामरहित और समरूप से स्थित देखता है, वहीं वास्तव में सही देखता है।

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३.२९॥
क्योंकि सब जगह समरूप से स्थित ईश्वर को समरूपरूप से देखनेवाला मनुष्य अपने आप से अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिए वह परम गति को प्राप्त हो जाता है।

गीता में कृष्ण बार बार कहे, ‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि….आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है’, ‘क्षेत्रज्ञं चापि मा विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत…१३.३ ‘सम: सर्वेषु भूतेषु…’ १८.५४ ।
यहाँ तक तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस मानस में भी यह बात बताई नवधा भक्ति के संदर्भ में…’….सातवं सम मोही मय जग देखा।…’

अगर व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने स्वयं से अलग नहीं मानता है, और सभी प्राणियों के आत्मा के रूप में अपने स्वयं के आत्मा के ही रूप में देखता है, फिर इस विचार के अवधारणा के आधार पर,वह हम बनाई विविधता की समझ के कारण किसी से भी नफरत नहीं करेंगे, हिंसा, द्वेष मिट जायेगा, क्योंकि सबमें किसी तरह की विभिन्नताएँ रह ही नहीं जायेगी। एक नया आदर्श समाज और फिर सारी दुनिया भी वैसी ही हो सकती है।

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ईशोपनिषद् और उसका महत्व

ईशोपनिषद् और उसका महत्व
ईशोपनिषद शुक्ल यजुर्वेद का अंश है, जिसे’ईशावास्योपनिषद’भी कहा जाता है। उपनिषदों में इसे प्रथम स्थान प्राप्त है। शंकराचार्य ने भी इस उपनिषद की विशेष प्रशंसा की है अपने भाष्य में। इसे वेदांत का निचोड़ मानने में शायद ही कोई जानकार आपत्ति कर सकता है।गागर में सागर की तरह है यह, शायद सबसे प्राचीनतम उपनिषद् या उनमें एक। लगता है इसके आधार पर सभी अन्य उपनिषदों का विकाश हुआ क्योंकि इसके सभी श्लोकों के मूल विषय बहुत विस्तार के साथ दुहराया गया है। बृहदारण्यकोपमनिषद् ऋषियों ने इनको श्लोकों को उद्धृत भी किया है। बाद में भगवद्गीता, यहाँ तक की लोकप्रिय रामचरितमानस में भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने भी बहुत अच्छी तरह जगह जगह पर इसके निष्कर्षों का व्यवहार किया। इस लिये इसमें सभी उपनिषदों का निचोड़ मिल जाता है। साथ ही एक सज्जन की ज़िन्दगी के कुछ महत्वपूर्ण गुर भी हैं जिसका हर ब्यक्ति फ़ायदा उठा सकता है। अपने अल्पज्ञान से भी मैं इसके कुछ श्लोकों को कंठस्थ कर बराबर पाठ करता हूँ, और मैंने यह लेख केवल अपने अपने बच्चों एवं सुधी मित्रों के लिये लिखा था जिससे इस एक उपनिषद से वे हमारे धर्म का बहुमुखी सार्वभौम उपदेश समझ लें। इनके कुछ श्लोकों में बहुत अच्छी कविता रस भी मिलता है पाठ में। संस्कृत एक ऐसी अद्वितीय भाषा है जो पहले पहले बहुत दुरूह लगने पर भी केवल पाठ करते रहने से बहुत सरल लगने लगती है और अगर आपकी प्रवृति पढ़ी चीजों को समझने की भी है, तो समझ भी आती जाती है और यह अपने पर है। एकनिष्ठ हो इन श्लोकों का मनन एवं चिन्तन से पता नहीं कितने मूल्यवान मोती भी मिल जायें जीवन भर के लिये और शान्तिमय जीवन का सहारा बन जायें।

ईशोपनिषद् का पहला श्लोक महात्मा गांधी को बहुत ही प्रभावित किया था, उन्होंने अपने एक सभा में कहा था: “मैं आपको हिंदू धर्म के संपूर्ण सार के रूप में एक श्लोक सुनाने जा रहा हूं। आप में से कई ईशोपनिषद जानते हैं। मैंने इसे वर्षों पहले अनुवाद और टिप्पणी के साथ पढ़ा। मैंने इसे यरवदा जेल में दिल से सीखा। लेकिन इसने मुझे उतना आकर्षित नहीं किया, जैसा कि पिछले कुछ महीनों के दौरान किया है, और मैं अब अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यदि सभी उपनिषद और अन्य सभी धर्मग्रंथ अचानक से किसी कारण से नष्ट हो गए होते और यदि ईशोपनिषद का केवल पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति में ज़िन्दा रहता, तब भी हिंदू धर्म हमेशा जीवित रहता।”
अमरीका में गीता, उपनिषद् आदि के विद्वान प्रोफ़ेसर भारतीय मूल के एकनाथ एश्वरन गांधी के उपरोक्त विचार के बारे में अपनी पुस्तक ‘Upanishads’ में लिखा है-
“What Gandhi had in mind with his great tribute he made clear in his reply to a journalist who wanted the secret of his life in three words, he said: “Renounce and enjoy!”(tena tyaktena bhunjittah), of the first verse of Isha.”

“गांधी ने अपने पहले श्लोक के विचार को और स्पष्ट किया था एक पत्रकार के अपने पहले के प्रकट किये विचार संम्बन्धी सवाल के जवाब में. पत्रकार को जो उनके जीवन के रहस्य को तीन शब्दों में जानना चाहता था, गांधी ने जवाब दिया- “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” मेरे जीवन का रहस्य है जो ईशोपनिषद् के पहले श्लोक का अंश है।”
उन श्लोक १ एवं २ को यहां कुछ समझने का प्रयत्न है।

पूरा पहला श्लोक इस तरह है
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
श्लोक का संधि-विच्छेद
ईशा वास्यम् इदं सर्वम् यत् किं च जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भूञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्वित् धनं॥१॥
अर्थ- विश्व की सभी वस्तुओं में ईश्वर का आवास है। इसलिये इन सबको अनासक्त भाव से उपभोग करना चाहिये; किसी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर ललचाई दृष्टि नहीं डालनी चाहिये।
पहली पंक्ति में है-
‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ -इस विश्व की सब चीज़ों के भीतर में ईश्वर(आत्मा)ही है और सब कुछ उसी (ईश्वर) का है।
‘यत्किञ्च जगत्यां जगत्’-यह अन्तर में रहनेवाला आत्मा (ईश्वर) जगत के चर एवं अचर सभी में व्याप्त है।
यानी
१. ईश्वर तुम्हारे अन्तर में आत्मा के रूप में है।
२. यही आत्मा विश्व के चर-अचर सबके भीतर में है।
और दूसरी पंक्ति है,
‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’-अनासक्त रह कर सब तरह की कामनाओं का त्याग कर काम करो, और जीवन का आनन्द लो।
‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌’- (अपने परिवार या)किसी अन्य के धन का लोभ न रखो। भावार्थ है ईश्वर का दिया जो है उसमें प्रसन्न रहे।
३. त्याग भाव को प्रमुख रख हर काम करो एवं जीवन का आनन्द लो।
४. किसी धन का लोभ न करो।
‘ईशावस्यम् इदम् सर्वम्’, सभी उपनिषदों का महानतम उपदेश सबके लिये यही है, जिसे समझना हर आदमी के लिये अपनी पवित्रता एवं शक्ति का सही मूल्यांकन के लिये ज़रूरी है।उपनिषदों के आत्मा ही परम-ब्रह्म या ‘ब्राह्मण’ भी है।

बहुत सालों पहले हिन्दमोटर के प्रारम्भिक दिनों में हावड़ा रेलवे स्टेशन के दुकान से गांधी जी के आश्रम में व्यवहृत ‘आश्रम भजनावलि’ की एक प्रति मैंने ख़रीदी थी। उसका पाठ पता ही नहीं चला कब कैसे मेरे जीवन का हिस्सा बन गया। सबेरे उसका पाठ करता रहा बिना कुछ समझे। पिछले साल जब उपनिषदों में रूचि हुई। ईशोपनिषद्, कठोपनिषद्, मंडूकोपनिषद्, केनोपनिषद् पढ़ रहा था एक एक करके। एक दिन माडूक्य उपनिषद् पर वेदान्त सोसाइटि के अति प्रभावशाली सर्वप्रियानन्द को सुना तो पहली बार तुरीयम् की जानकारी हुई और तब इस पुस्तिका के प्रात:स्मरण् के पहले श्लोक को ध्यान से पढ़ा। और समझने की कोशिश करता रहा कि हमारे सबेरे की प्रार्थना में आये ‘तुरीयम्’ शब्द का अर्थ क्या है। हम अपने हृदय में बसे आत्मा को छोड़ इधर उधर ईश्वर की कृपा पाने के लिये क्यों भटकते हैं नासमझ बन जहाँ तहां। कुछ दिनों पहले ही जाना कि यह आदि शंकराचार्य की लिखी है। शंकराचार्य अपने प्रांत: स्मरणीय इस श्लोक में इसी आत्मा को समझाया है और उसकी महिमा बताई है। इस एक श्लोक में आत्म परिचय मिल जाता है। उपनिषदों पर श्रद्धा और बढ़ गई-
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥
Praatah Smaraami Hrdi Samsphurad-Aatma-Tattvam
Sac-Cit-Sukham Parama-Hamsa-Gatim Turiiyam |
Yat-Svapna-Jaagara-Sussuptim-Avaiti Nityam
Tad-Brahma Nisskalam-Aham Na Ca Bhuuta-Sangghah ||1||
अर्थ-
मैं सबेरे अपने हृदय में स्फुरित होनेवाले आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ ।जो आत्मा सच्चिदानंद (सत्, ज्ञान, एवं आनन्द) है, परमहंसों की अन्तिम गति है, जो चतुर्थ अवस्थारूप (जिसे माडूक्योपनिषद् के ऋषि ने ‘तुरीयम्’कहा है) है, जो जाग्रति, स्वप्न,और गहरी निन्द्रा तीनों अवस्थाओं को हमेशा जानता है और जो शुद्ध ब्रह्म है, वही मैं हूँ- पंचमहाभूतों से बनी यह देह मैं नहीं हूँ ।
In early morning, I remember (meditate on) the Pure Essence of the Atman, Self shining within my heart,
which is the Sacchidananda (Existence-Consciousness-Bliss), which is the Paramahans (The Pure White Swan floating in Chidakasha) and takes the mind to the state of Turiya (the fourth state,Superconsciousness),
which knows as a witness beyond the three states of Dream, Waking and Deep Sleep, always- That Brahman which is without any division shines is me and I am not this body which is a collection of Pancha Bhuta (Five Elements).

अब ईशोपनिषद के पहले इस श्लोक के त्याग के बारे में कुछ बताऊँ। त्याग से निर्देश है सभी कामनाओं-केवल संतान, धन, या अपने सुख के लिये किये कर्मों-का त्याग करना है, जो व्यक्ति को इस मायामय संसार से बांधे रहती है और यही विचार अन्य उपनिषदों में भी व्यक्त किया गया है।यह अमरत्व दे सकता है। यही ज्ञानियों के जीवन ध्येय रहता है।उदाहरणार्थ कठोपनिषद में एक श्लोक है-
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥२.३.१४॥

  • जब मनुष्य प्रत्येक कामना से मुक्त हो जाता है तब वह अमर हो जाता है; वह यहीं, इसी मानव शरीर में ‘ब्रह्म’ का रसास्वादन करता है।
    इस त्याग की आवश्यकता को विवेकानन्द अपने गुरू रामकृष्ण के विचारों को एक विदेश में दिये भाषण में इस तरह कहा था- “However we may argue, however much we may hear, but one thing will satisfy us, and that is our own realisation; and such an experience is possible for every one of us if we will only try. The first ideal of this attempt to realise religion is that of renunciation. As far as we can, we must give up. Darkness and light, enjoyment of the world and enjoyment of God will never go together. “Ye cannot serve God and Mammon.” Let people try it if they will, and I have seen millions in every country who have tried; but after all, it comes to nothing. If one word remains true in the saying, it is, give up every thing for the sake of the Lord. This is a hard and long task, but you can begin it here and now. Bit by bit we must go towards it.”
    ब्रह्म एवं त्याग की महिमा से तो भगवत् गीता, रामचरितमानस सभी भरे पड़े हैं। भगवद्गीता के कृष्ण या रामचरितमानस के राम अवतार-रूप में‘ब्रह्म’ ही हैं- ‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना, मत्स्थानि सर्वभूतानि,..’(९/४), ‘सीयराममय सब जग जानी..’
    फिर कभी इस सन्दर्भ में विस्तार से लिखने की इच्छा है।
    पर इसके पहले सभी ऐसी इच्छा रखनेवाले व्यक्ति को यह पूरी दृढ़ निष्ठा रखनी होगी कि हमारे अन्त:करण में ही उस महत ईश्वर का निवास है, जो हमारी आत्मा ही है, जिसे उपनिषद ‘ब्राह्मण’, ‘पुरूष’, आदि कहता है एवं भगवद्गीता पुरुषोत्तम (अध्याय १५)में। अवतार रूप में गीता के कृष्ण और तुलसीदास के रामचरितमानस के राम भी वही हैं। हम अपने आत्म बल को समझे और उसकी शक्ति को इच्छित फल के लिये सभी बताये तरीक़े से पाने की किसी योग के रास्ते उपयोग करें, पर उसके पहले शरीर,मन एवं इन्द्रियों को पूरी तरह मज़बूत बनाने एवं जीतने के लिये सत्त्व गुणी बनने की चेष्टा करें। इसके बाद ही आप, किसी भी बताये तरीक़े से चाहे भक्तियोग हो या ध्यान योग या कर्मयोग- पूर्ण निष्ठा से चेष्टा करें। हमारे महान आध्यात्मिक गुरुओं ने चाहे गुरू नानक हो, या तुलसीदास, या फिर रामकृष्ण हों या विवेकानन्द, या फिर रमन महर्षि, सभीने यही किया। यही आत्मबल एवं एकनिष्ठ चेष्टा ही है कि दिव्यांग होने बाद भी, कृत्रिम पैर होने पर भी, एक साधारण महिला भी एवरेस्ट की चोटी पर पहुँच जाती है, और इसी तरह आज एवं पहले भी हज़ारों ने अपने अपने क्षेत्र में अविश्वसनीय कृतिमान बनाते या बनाये हैं।

प्रथम श्लोक के विषय को ध्यान में रखते हुए जीवन कैसे जिया जाये और उसका फल क्या होगा बताते हैं इस उपनिषद् के रचयिता ऋषि आगे दूसरे श्लोक में-
दूसरा श्लोक-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् सतं समाः
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२
श्लोक सन्धि-विच्छेद
कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेत् शत: समा।
एवं त्वयि न अन्यथा इत:अस्ति न कर्म न लिप्यते नरे॥२॥

  • दुनिया में, एक सौ साल जीने की इच्छा होनी चाहिए। केवल पहले श्लोक के निर्देशानुसार कर्म करने से यह सम्भव है। इस प्रकार, और न कि किसी अन्य तरीके से यह सम्भव होगा, कि उसके कर्म का फल उसके भविष्य के जीवन पर कोई अनिष्ट फल नहीं दे और इस तरह मनुष्य कार्यों के तनाव से मुक्त हो काम कर सकता है।
    (In the world, one should desire to live a hundred years, but only by performing actions. Thus, and in no other way, can man be free from the taint of actions.)

पहले श्लोक के निर्देश को स्मरण रख अगर उसी तरह आसक्त भाव से काम करते हुए आदमी अपनी सांसारिक जीवन भी जीता है- ‘कुर्वन् एव इह कर्माणि’, तब वह ‘जिजीविषेत् शत: समा’, सौ साल तक जीवन रहने की इच्छा रख सकता है।
इसे छोड़ कोई दूसरा रास्ता नहीं है, जीवन के कर्म से नहीं जुड़ने का। इसी विचार को गीता में कृष्ण(आत्मा)ने अर्जुन(ममत्व से जकड़ा शरीर को अलग समझने वाला) को अध्याय २ से ही उपदेश शुरू कर दिया करणीय कर्म के करने के ढंग का ‘योगस्थ कुरू कर्माणि, संग त्यक्त्वा’ से।
क्या हो सकता है किसी व्यक्ति के लिये इससे बेहतर निर्देश एक सत्-चित्त-आनन्द के लक्ष्य-भाव से दीर्घ ज़िन्दगी का? श्लोक कहता इस तरह अनासक्त भाव से से व्यक्ति कर्म से बंधता नहीं, ‘न कर्म लिप्यंते नरे’। यही केवल दूसरा अन्य कोई रास्ता ही नहीं है, ‘एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति’।

  • ईशोपनिषद के बाक़ी कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण श्लोकों के बारे में अगली बार…..किसी एक रविवार को…
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२०१९-२०२०:भगवद्गीता से उपनिषदों की ओर

२०१९-२०२०:भगवद्गीता से उपनिषदों की ओर
पिछले साल में अपने को गीता के विभिन्न व्याख्या पुस्तकों में अधिकांश समय लगाया था। २०२० में विशेषकर कोविद काल की त्रासदी को भोगते कब उपनिषदों की तरफ़ झुकाव हुआ और फिर बढ़ता गया पता ही नहीं चला, पर अच्छा रहा है और अभी चल रहा है।

पहले कठोपनिषद् को चिन्मयानन्द की व्याख्या सहित पढ़ा, समझने की कोशिश की, पर असमर्थ हूँ जान पड़ा। बहुत वर्षों से सहेज कर रखी गीता प्रेस के कल्याण के विशेष उपनिषद् अंक से बात कुछ समझ आई। शंकराचार्य द्वारा सभी भाष्य उपनिषदों को, जिन्हें प्रमुख उपनिषद् कहा जाता है, पढ़ गया नियमित रूप से थोड़ा थोड़ा समझते हुए। फिर राकेश जी एकनाथ एश्वरन की अंग्रेज़ी की पुस्तक Upanishads को पी.डी.एफ द्वारा मेल कर दिये। पुस्तक अमरीकन अंग्रेज़ी में काव्य रूप में बहुत सरल भाव से लिखा गया है। उपनिषदों को प्रस्तुत करने के पहले की ‘उपनिषद्’ पर भूमिका बहुत अच्छी है और फिर हर उपनिषदों के पहले उन पर भी उनके मुख्य विषय पर लेख है। बड़े उपनिषदों, जैसे बृहदारण्यकोपनिषद के कुछ विशेष अंश ही दिये है। पर अधिकांश का पूरा काव्यमय अनुवाद बहुत अच्छा एवं सरल है समझने लायक़। अब तो किताब भी है मेरे पास बहुत बार के आमेजन से पर्यास के बाद। फिर अचानक यू-ट्यूब पर वेदान्त सोसाइटी के स्वामी सर्वप्रियानन्द के प्रवचन दिख गये गये और उनके हर प्रवचन बहुत प्रभावशाली लगता रहा, पढ़ने की रुचि को बढ़ाता गया। लोग उन्हें विवेकानन्द की तरह अमरीका में लोकप्रिय मानते हैं। अमरीका के सभी आध्यात्मिक विषयों के गुरुओं में वे प्रतिष्ठित हैं। एक दिन अचानक ‘Hindu Wisdom’ के साइट पर एक रामकृष्ण मिशन के स्वामी निर्विकारानन्द की तीन उपनिषदों-ईशोपनिषद्, कठोपनिषद् एवं केनोपनिषद् पर अति सुन्दर रूप से व्याख्यायित पुस्तकें दिख गई। इन तीनों को मैं बार बार पढ़ता रहा। अब थोड़ी समझ बढ़ रही थी उपनिषदों के अन्त:निहित आध्यात्मिक अद्वैत दर्शन का और फिर रामकृष्ण परमहंस_ विवेकानन्द की कथाएँ एवं कथनों के अंश उन्हें बहुत सुगम बनाते गये। दुर्भाग्यवश ये सब किताबें अंग्रेज़ी में ही हैं। फिर एक इससे भी दो सुगम पुस्तकों से परिचय हुआ, मंगाया, लेखक हैं श्री. M। अंग्रेज़ी में सभी लोकप्रिय उपनिषदों-ईश,कठ, केन, मुंडक, माडूक्य,प्रश्न-की व्याख्या उनकी दोनों पुस्तकें में सबसे सरल एवं सुगम लगी जो हर व्यक्ति समझ सकता है। गीता प्रेस को छोड़ मुझे अन्य किसी की हिन्दी में उपनिषदों के श्लोकों को देते हुए व्याख्या की कोई सरल रूप में प्रस्तुत पुस्तक नहीं मिली है अब तक। अगर कोई पाठक जानते हों तो मुझे ज़रूर सूचित करें, आभारी हूँगा।
उपनिषदों के अलावा मैं दो और मन की पसन्द पुस्तकों को मंगाया बहुत प्रसिद्ध व्यक्तियों का लिखा। पहली पुस्तक थी श्री पवन कुमार वर्मा की ‘आदि शंकराचार्य’ के बाद की लिखी ,’The Greatest Ode to Lord Rama’ जो तुलसीदास के रामचरितमानस के कुछ उनके पसन्द अंशों पर उनके विचारों के साथ है।पवन कुमार वर्मा श्री नीतीश कुमार के साथ राजनीति में लग गये थे पर काफ़ी बड़े विचारक है और उसकी प्रशंसा तो की जानी ही चाहिये। दूसरी पुस्तक मारुति सुज़ुकी के चेयरमैन श्री R. C. Bhargava की अपने वर्षों के उद्योग के साथ जुड़े अनुभव के आधार पर ‘ Getting Competitive- A practitioner’s Guide for India’.मेरी धारणा के विरूद्ध यह किताब एक आई.ए.एस. की ज़्यादा और एक एक प्राविधिक या बल्कि सामान्य प्रबंधन के अनुभव पर आधारित है और जिसमें केवल सरकारी तंत्रों के कमियों की बात ज़्यादा है। मारुति सुजुकी के जापानी चेयरमैन ओ.सुज़ुकी ने भारत में पैसेंजर ऑटोमोबाइल के मैनुफ़ैक्चरिंग में बड़ा योगदान दिया बहुत सारे ऑटो पार्टों के भारतीय उद्योग को बढ़ावा देने के लिये। बहुत फ़ैक्टरियों को प्रारम्भ करने एवं उनमें जापानी मैनेजेमेंट पद्धतियों का व्यवहार कर सफल बनाने में उनका बहुत बड़ा हाथ था। श्री. भार्गव से मैं आशा करता था कि वे भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर को विस्तारित करने, आयात को ख़त्म करने, निर्यात बढ़ाने आदि विषयों में एक रोडमैप सुझाते ऑटोमोबाइल एवं मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर के लिये।
ख़ैर,आजकल स्वामी शिवानन्द की बृहदारण्यक उपनिषद् की व्याख्या पढ़ रहा हूँ और तीसरे अध्याय तक पहुँचा हूँ। याज्ञवल्क्य ऋषि के प्राचीन वैदिक युग के अपने समय के सबसे बड़े ज्ञानी ऋषि थे इस उपनिषद् में ब्राह्मण को समझाना मुख्य विषय है।इसी में उनकी विदुषी पत्नी मैत्रेयी एवं गार्गी का विवरण है।
पिछले साल के मेरे वायदा के तीनों संग्रहों पर काफ़ी काम किया हूँ पिछले साल, पर संतोष नहीं है और उस पर और काम बाक़ी है…चल रहा है धीरे धीरे, जो अपने अमरीका एवं यहाँ के इष्ट मित्रों के लिये है अत: अंग्रेज़ी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं को जाननेवाले लोगों के लिये है। अमरीका के हिन्दी भाषी लोगों के अधिकांश बच्चे हिन्दी शायद ही जाने, इसीलिये यह प्रयास है। देखें क्या कर पाता हूँ नये साल में।

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Ishopanishad and Mahatma Gandhi

I may have different views about many things about Mahatma Gandhi over the years of my life though I came in this world when Mahatma Gandhi was almost taken up as the saviour of India freeing it from 200 years of British rules and then was made The Father of Nation, that Indian who got this honour in the whole written history of India. But now I believe Gandhi grew in his life itself as one of the great Mahtma India has produced. I have written briefly about his statement on the first Sloka of Ishopanishad:

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
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ईशा वास्यम् इदं सर्वम् यत् किं च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भूञ्जीथाः मा कस्यस्वित् धनं ।।सं
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īśā vāsyam idaṃ sarvaṃ yat kiñca jagatyāṃ jagat |
tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasya sviddhanam ||T
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जगत के सब चल अचल जीवों में ईश्वर हैं और यह जगत उनका बनाया है. तुम त्याग पूर्वक ही भोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ न करो।
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The Lord is enshrined in the hearts of all.
The Lord is the supreme Reality.
Rejoice in him through renunciation.
Cover nothing. All belongs to the Lord.


I have found the source of that material and the story that I am giving below to which I fully agree..

For the first time at the public meeting in Quilon Gandhiji summed up the credal belief of Hinduism in an Upanishadic mantra, and thereafter at every meeting gave lucid and simple commentaries on the numerous implications of that all-comprehensive mantra. The pure exposition without much of a commentary was given on the previous day at Quilon and is reproduced below :

I have fixed upon one mantra that I am going to recite to you, as containing the whole essence of Hinduism. Many of you, I think, know the Ishopanishad. I read it years ago with translation and commentary. I learnt it by heart in Yeravda Jail. But it did not then captivate me, as it has done during the past few months, and I have now come to the final conclusion that if all the Upanishads and all the other scriptures happened all of a sudden to be reduced to ashes, and if only the first verse in the Ishopanishad were left in tact in the memory of Hindus, Hinduism would live forever.

Now this mantra divides itself in four parts. The first part is ईशावास्यमिदं सर्वं | यत्किं च जगत्यां जगत | It means, as I would translate, all I this that we see in this great Universe is pervaded by God. Then come the second and third parts which read together, as I read them : तेन त्यक्तेन भुंजीथा | I divide these into two and translate them thus: Renounce it and enjoy it. There is another rendering which means the same thing : Enjoy what He gives you. Even so you can divide it into two parts. Then follows the final and most important part, मा गृध कस्यस्विद् धनम् | which means: Do not covet anybody’s wealth or possession. All the other mantras of that ancient Upanishad are a commentary or an attempt to give us the full meaning of the first mantra.

It seems to me to satisfy the craving of the socialist and the communist, of the philosopher and the economist. I venture to suggest to all who do not belong to the Hindu faith that it satisfies their cravings also. And if it is true— and I hold it to be true—you need not take anything in Hinduism which is inconsistent with or contrary to the meaning of this mantra. What more can a man in the street want to learn than this, that the one God and Greator and Master of all that lives pervades the Universe? The three other parts of the mantra follow directly from the first. If you believe that God pervades everything that He has created, you must believe that you cannot enjoy anything that is not given by Him. And seeing that He is the Greator of His numberless-children, it follows that you cannot covet anybody’s possession. If you think that you are one of His numerous creatures, it behoves you to renounce everything and lay it at His feet. That means that the act of renunciation of everything is not a mere physical renunciation but represents a second or new birth. It is deliberate act, not done in ignorance. It is there­fore a regeneration. And then since he who holds the body must eat and drink and clothe himself, he must naturally seek all that he needs from Him. And he gets it as a natural reward of that renunciation. As if this was not enough the mantra closes with this magnificent thought: Do not covet anybody’s possession. The moment you carry out these precepts you become a wise citizen of the world living at peace with all that lives. It satisfies one’s highest aspirations on this earth and hereafter.

Gandhiji described at another meeting spoke about this mantra as the golden key for the solution of all the difficulties and doubts that may assail one’s heart. Remember that one verse of the Ishopanishad and forget all about the other scriptures. You can of course drown yourselves and be suffocated in the ocean of scrip­tures. They are good for the learned if they will be humble and wise, but for the ordinary man in the street nothing but this

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