जीवन सत्य

२७.१२.२०१९ को अचानक मन में एक बात आई और सोचा कि लोगों से भी बताऊँ, कुछ दिनों में एक दशक के अन्त और दूसरे का प्रारम्भ होने के अवसर की एक अकस्मात् आई यह सोच है: ज़िन्दगी, जब बचपन से अब तक के, आजतक के बारे में सोचता हूँ, तो अंक गणित का बेसिक- जोड़, घटाव, या कभी कभी गुणा और भाग लगती है. शायद हम शून्य से प्रारम्भ कर शून्य में लय हो जाते हैं या शायद अनन्त से चल कर अनन्त में विलीन हो जाते हैं…

कभी भी जब हम चारों ओर देखते हैं तो बहुत जीवन सत्य समझ आता है. भगवद्गीता में बार बार कर्म की महिमा बताई गई है पर यह भी वह काम बिना फल की इच्छा या चिन्ता के किया जाना चाहिये- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ‘ इस दृढ़ विश्वास के साथ हम काम करते हैं, तो फल की चिन्ता करने से जो फल मिलता, उससे ज़्यादा अच्छा फल मिलते हुए देखा हूँ.

भगवद्गीता में अध्याय १८ में यह भी बताया है कि किसी कार्य में सफल होने के लिये पाँच चीजों की ज़रूरत होती है: पञ्चैतानि कारणानि  सिद्धये सर्वकर्मणाम्…..

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं पृथग्विधम्‌ विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌ १८.१४॥

१. अधिष्ठान, २. कर्ता, ३. करण, ४. चेष्टा, और ५. दैव

हम आज पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है हर कदम पर कर्म ज़रूरी है पर दैव सब जगह एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है… हमारे स्कूल में सबसे अच्छे होना और अपने कार्यकाल के परिश्रम पर यह नहीं निर्भर करता है कि हम सबसे सम्माननीय ओहदे पर पहुँचेंगे कि नहीं….इसी तरह सम्पन्नता एवं सुखी जीवन के प्राप्त होने में भी लगता है दैव एक बड़ी भूमिका अदा करता है….हाँ, पर हम किसी मोड़ पर प्रमाद नहीं ला सकते जीवन युद्ध में….

सोचिये भगवान, जिसे आप कोई नाम दे सकते हैं, कैसे कैसे सहायता करता है या किया आपको आगे बढ़ाने, सुखी, सम्पन्न बनाने में…..वह सबका ख़्याल करता रहता है अगर अपने कर्म को करते जायें…उसे स्मरण करते करते….

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२०१९: ३६५ दिन में क्या किया?

२०१९: ३६५ दिन में क्या किया?

यह कहानी मेरी व्यक्तिगत है, अपने तरीक़े एवं विचारों, मान्यताओं या आदतों को किसी पर लादना नहीं चाहता, पर कुछ को अच्छा या अनुकरणीय लगे मेरे उम्र को देखते हुए तो स्वागत है….क्योंकि मैं खुद ही नहीं समझ पाता हूँ कि हिन्दमोटर के कार्यकाल में फ़ैक्ट्री में स्वेच्छा से १२-१६ घंटे काम करने वाला और अपने को पूरी तरह तकनीकी विषयों को जानने, उनका उपयोग करने, उन पर लिखने में लगा रहने वाला कैसे आज यह जीवन पद्धति एवं विषय अपना लिया है. अब की कहानी-

‘अध्यात्म ज्ञान नित्यत्व’ का अभ्यास करते हुए भगवत् गीता के कुछ जाने माने जाने माने अध्यात्म गुरू व्याख्याताओं की पुस्तकों को पढ़ने,समझने और व्यवहार में लाने की कोशिश की पिछले साल जो अभी जारी है और चूँकि परीक्षा तो होनी नहीं, चलता रहेगा यह अध्ययन, कुछ नज़दीक पहुँचने की इच्छा के साथ. यें ग्रंथ हैं-

१. Bhagawad Gita by Swami B. G. Narasinha

2. The Bhagawad Gita Swami Sivanand

3. The Holy Geeta by Swami Chinmayananda

4. Hindi Version of above translated by Swami Tejomayananda

5. The Bhagawad Gita for daily living (3volumes) by Eknath Easwaran

6. God Talks With Arjuna- The Bhagawad Gita by Sri Sri Paramahansa Yogananda

7. ऊपर की पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘ईश्वर-अर्जुन संवाद श्री मद्भगवद्गीता’

8. Bhagavad Gita as it is – A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada, ISKON

9. Hindi Translation of the above.

अंग्रेज़ी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं की पुस्तकों को पढ़ने से आध्यात्मिक शब्दों को समझने में सहायता मिलती है. कभी कभी लगता रहा है कि सीमित मात्रा में सफलता भी मिल रही है.पर दूसरे ही क्षण आत्मनियंत्रंण की कमी का भान हुआ, पर प्रयत्नशील बना रहा हूँ. भगवत् गीता के व्याख्याकार विशेषकर योगानन्द के अनुसार सिद्ध गुरू से ही योग या ध्यान योग को सीखा जा सकता है, और वासनाओं का भी अन्त किया जा सकता है. पर असली ज्ञानी गुरू कहाँ ढूँढूँ? उन्होंने तो कहा है, अगर आप कर्म किये हैं उस तरह का तो अपने आप मिल जायेंगे. अंत: कोशिश करने कोई हर्ज नहीं. ध्यान लगाने के अभ्यास की ओर बढ़ा ज़रूर, पर पूरी असफलता ही मिली है. पर हाँ, इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि अपनी थोड़ी कोशिश के बाद भी बड़ी शान्ति मिलती है, ध्यान में १५-२० मिनट के बाद भी अच्छा लगता है।

अचानक याद आया कि हमारे बचपन के एक गुरू जी एक अपने को अत्यन्त बुद्धिरहित समझनेवाले बालक बोपदेव की कहानी सुनाये थे, लगन और अभ्यास से सब कुछ सीखा जा सकता है.मैं गीता को पढ़ते हुए बहुत अध्यायों में अलग अलग तरीक़े के सिद्ध पुरूषों के आचरणों,लक्षणों का विस्तृत ब्यौरा पाया. अध्याय २-सांख्ययोग(श्लोक ५५-७१, कुल १७) में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का, अध्याय ६-ध्यानयोग(श्लोक ७-१०,कुल ४)में योगी का, अध्याय १२-भक्तियोग (श्लोक २-४, ६-८, १२-१९, कुल १४) में सच्चे भक्त का, अध्याय १३-क्षेतरक्षेत्रज्ञविभागयोग (श्लोक ८-१२, कुल ५) में ज्ञानी का, अध्याय १४-गुणत्रयविभाग (श्लोक २२-२७, कुल ६) में गुणातीत का, अध्याय १६-दैवासुरसंपद्विभागयोग (श्लोक १-३, कुल ३) में दैवी सम्पदयुक्त व्यक्ति का, अध्याय १८-मोक्षसन्यासयोग (श्लोक ४९,५१-५७,६१-६२, ६५-६६, कुल ११) में बह्मज्ञानी का….। एक चीज़ समझ आई कि बहुत से लक्षण इन सभी में दुहराये भी गये हैं जो एक आदर्श व्यक्ति में होने चाहिये.पर उन आदर्श गुणों को अपने आचरण में लाना तो उतना आसान नहीं है. फिर एक बचपन में सीखी बात की समझ आई. हमें स्कूल की प्रार्थना की याद आई और उसके अनजाने फ़ायदे का भी.’हे प्रभु आनन्ददाता, ज्ञान हमको दिजीए, लिजीए हमको शरण में हम सदाचारी बनें’. उसका कुछ असर तो पड़ा ही है हम पर. शब्दों अर्थ जानते हुए बार बार उच्चरित करते रहने से कुछ न कुछ गुण की प्राप्ति होती ही है. शायद जाप करनेवाले या मंत्रों को पढ़ने की बात इसीलिये कही गई है. उसी ध्येय से मैंने उन श्लोकों का नियमित पाठ करने की ठानी और करता जा रहा हूँ, अब तो सबेरे शाम कुछ समय निकाल कर इसे करना आदत बन गया है.चलो फ़ायदा तो होगा ही, बढ़ती उम्र की घटती ज़रूरतों के कारण भी सहायता मिलेगा, आत्मनियंत्रण भी समय सीखा ही देता है, समय की कोई कमी नहीं, फिर आदत बनती जा रही है इसमें ही व्यस्त रहने की. पिछले दिनों सर्दी के कारण बरामदे ही में घूम मेघदूतम् पार्क का काम पूरा करते वक्त इन्हीं श्लोकों को पढ़ते पढ़ते समय कटता रहा है. और अब किताब देखने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती. पहले सोचता था इस उम्र में मैं शायद ही इतने श्लोकों को याद कर पाऊँगा.पर शायद उम्र कोई मायने नहीं रखती.

हाँ, एक इससे भी पुरानी एक किताब है गीता के ३० श्लोकों का टी. आर.शेशाद्री का, २७.४.२००० को ख़रीदा हुआ-The Curative Power of the Holy Gita. उनका दावा था कि इनको पढ़ने से बहुत सारी बीमारियों में लाभ मिलता है. कोई दृढ़ विश्वास न होने पर इसे रोज़ पढ़ता रहा हूँ बहुत सालों से और अब यह कंठस्थ भी है.

नित्य घंटे दो घंटे पिछले साल में मैं गीता की ब्याख्याओं को पढ़ने एवं समझने की कोशिश करता रहा हूँ. यह अपने देश की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में है. वेद और उसी से अनुप्रेरित उपनिषद्, गीता और बहुत से ग्रंथ….फिर मध्यकालीन तुलसीदास कृत रामचरितमानस मानस.गीता कुछ कुछ समझ आ रहा है. अगले सालों में उपनिषदों को पढ़ने समझने की इच्छा है…

मानस का मासापरायण करता था कभी…फिर कुछ नवरात्रों में नवा-परायण भी किया….

आज के नित्य पाठ में है:

१.रामायण का आख़िरी दोहा

२.बाल्मिकी का अयोद्ध्या कांड में राम कहाँ बास करें के अंश, जिसे लता मंगेशकर ने गाया भी है.

३.विभीषण के राम के पास रथ न होने के दुख के उत्तर में राम का दिया प्रतिउत्तर

४. सुन्दर कांड पूरा

फ़ेसबुक पर तो लिखता रहता हूँ इन विषयों पर. पर एक इच्छा अपनी पसन्द के गीता के १००-१५० श्लोकों का एक संकलन हिन्दी अंग्रेज़ी में तैयार कर प्रकाशित करने का है. इसी तरह तुलसीदास के रामचरितमानस के सुभाषितों का एक संग्रह पर भी काम करने की इच्छा है.

शायद यही सब मुझे आगे भी व्यस्त रखेगा.

हाँ, इन आध्यात्मिक पुस्तकों के साथ मनबहलाव के लिये कुछ अन्य सामयिक किताबों में भी रूचि रखता हूँ. रामचन्द्र गुहा की दो मोटी किताबें आद्योपान्त- ‘India after Gandhi’ and ‘Gandhi That Years That Changed the World’, देवदत्त पट्टनायक की भी कुछ किताबें पढ़ी पिछले साल, जिनमें प्रमुख ‘Syam- Bhagavata’ थीं. दोनों अच्छा लिखते हैं.

देखें २०२० में क्या कर पाता हूँ….पर हर व्यक्ति को मेरी यही राय होती है कि वह पढ़ने में रूचि रखे. ज़िन्दगी की सफलता इसके बिना

…..

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80+ and Make it Enjoyable

In August 2019, I crossed 80, but more encouraging are the increasing shares of 80+ all around. We have been facilitating the known distinguished super citizens through our Adda at Meghdootam Park. We know of those at 93+, 90+, 85+ and some more. Even in the villages in Bihar among those whom I know are near 90 and 100 years of their life. Here are some data and views of a spiritual masters. I thought of writing about it, as I feel,it will help those senior citizens on the way to become the super citizens ad wish to enjoy that phase.

Interestingly, “at global level, the share of 80+ people rose from 0.6% in 1950 (15 million) to around 1.6% (110 million) in 2011, and it is expected to reach 4% (400 million) by 2050.”

I came across a book, ‘Living with Siva’ by Satguru Sivaya Subramuniyaswami, who American by birth became a respected Acharya. I found the content in Chapter 16: वृद्धावस्था ‘Old and Gray’ that is given below. It will be a good guide for the super citizens above 80 in our country too. It’s number is gradually increasing in rural as well as urban society not as exception but as normal.

“When I met Satguru Yogaswami, spiritual king of Jaffna, he was 77 ( lived a life of 92 years) still walking 20 miles a day, still meditating hours a day, and he would go on dynamically for another fifteen years…..Sri Chandrasekharendra passed on in his hundredth year, and we recently read of the passing away of a 116-year-old yogi. The US Census Bureau reported that from 1900 to 2000, the number of people in USA 85 and over population grew ten-fold, to four million, while the overall population grew less than four-fold, and the bureau projects that the 85-and-over population will exceed 13 million by 2040. The number of centenarians is expected to grow to more than 834,000, from 63,000 in 1900. Those who know wisdom’s ways have overcome the “I’m getting old” syndrome, a mantra no one should ever repeat, even once. They know how the minds work, and by applying the laws, they have lived long, useful, happy and healthy lives. …The psychological secret is to have a goal, actually many goals, in service to humanity to accomplish. ….Good goals and a will to live prolong life. It is even more life-giving when the goal of human existence, in helping people to fulfill dharma through a predawn morning pujas, scriptural Reading, devotionals acts and meditation are performed without fail, the deeper side of ourselves is cultivated, that in itself softens our kar as and prolong life….This body is impermanent, but it is only one you have, so make the best use of it. …..The older you get, the more disciplined you should get, the more sadhana you should perform…find new eager children to teach, new ways to serve and be useful to others, keep planting the trees, help in maintains clean ambience, be helpful to others as you are “old and gray and but here to stay’, see into the lives of promising people around and encourage them to greater heights….There is another 40 years before the natural life span of 120 years is reached, …to get out and give of wisdom that has been accumulated through the past eighty years….” Plan for your activities in next 5, 10, 15, 20 years. Do never feel defeated till end.

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भगवद् गीता एवं तुलसीदास कृत रामचरितमानस

श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा रचित गीता के अध्याय १२ के १२वें श्लोक (जिसका मूल एवं हिन्दी अर्थ है-

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते ।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌ ॥

अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है॥12॥)

के अर्थ एवं व्याख्या में तुलसीदास की कृति का उल्लेख है. अंग्रेज़ी एवं हिन्दी दोनों में केवल हरी प्रसाद शास्त्री की रचना का गद्य में अर्थ दिया गया है..तुलसीदास ने गीता के बहुत से श्लोकों को रामचरितमानस मानस में अपनी भाषा में प्रस्तुत किया है. ‘यदा यदा हि धर्मस्यग्लानि भवति….’ का तुलसीदास की चौपाई, ‘जब जब होहीं धर्म के हानि….’प्रसिद्ध है. मेरी इच्छा १२वें श्लोक की मूल तुलसीदास द्वारा तर्जुमा उनकी चौपाई या दोहा में जानने की है. मेरे मित्र श्री राम निवास चतुर्वेदी आजकल विदेश में हैं- शायद वे बता सकते थे…अगर पढ़नेवालों में कोई इसे बता दे तो मेरी उत्सुकता जल्द ख़त्म हो जायेगी, नहीं तो चतुर्वेदी जी का इंतज़ार करना पड़ेगा….वैसे कर्म फल के त्याग का जीवन बनाने का अभ्यास ज़रूरी है अगर हम सच में शान्तिपूर्ण जीवन चा होते हैं….

“ The ornament of a servant of God is devotion; the jewel of devotion is consciousness of nonduality.

“ The ornament of knowledge is meditation; the decoration of meditation is renunciation; and the pearl of renunciation is pure, unfathomable Shanti.

“ The pure and unfathomable Shanti cuts the root of all misery. He who holds Shanti in his heart dwells in a sea of Bliss. All sins that breed suffering, anxiety, and anguish disappear, together with all limitations….

“ Know him to be perfect who is most peaceful, who is taintless and free from all personal desires, whose mind vibrates with Shanti.”

हिन्दी में योगानन्दजी के पुस्तक का अनुवाद

“ईश्वर के सेवक का भूषण भक्ति है,भक्ति का गहना अद्वैत की चेतना है।

“ज्ञान का आभूषण ध्यान है, ध्यान का अलंकरण त्याग है, और त्याग का मोती रूपी फल, विशुद्ध अथाह शान्ति है।

“विशुद्ध एवं अथाह शान्ति सब दु:खों की जड़ को काट देती है।जो अपने हृदय में शान्ति को धारण करता है, वह परमानन्द के सागर में बसता है।सभी पाप जो दु:ख, चिन्ता तथा पीड़ा उत्पन्न करते हैं, अपनी सभी सीमाओं के साथ विलीन हो जाते हैं।….

उसे सिद्ध जानो जो सर्वाधिक शान्तिपूर्ण है, जो निष्कलंक तथा सभी व्यक्तिगत इच्छाओं ये मुक्त है, जिसका मन शान्ति से स्पन्दित होता है।”

-Tulsidas, in Indian Mystic Verse, translated by Hari Prasad Shastri (London: Shanti Sadan, 1984).

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Present Economic Slowdown-Some Reasons and Solutions

On 9.12.2019 A good article , interestingly from Bloomberg by Pankaj Misra has also dealt with the issue of slow down and its reason in very balanced and rational manner:

‘As India suffers another downgrade in global reputation, is the new narrative about India as simplistic and misleading as the old?

Certainly, it has long been clear that India, which failed to invest in primary education and health, did not have the human capital and infrastructure necessary for what it urgently needed in last 70 years after independence, a labor-intensive manufacturing revolution of the kind that made such “East Asian Tigers” as South Korea and Taiwan.

Economic growth in India was built on such shaky foundations as speculative finance capital and construction, and never seemed strong and consistent enough to generate jobs for the approximately million people entering the workforce each month.

Nor was India robust enough to contribute effectively to the Western coalition against China. It has not even come close to matching its neighbor’s economic performance.” https://www.business-standard.com/article/economy-policy/present-crisis-is-just-a-symptom-india-s-problems-started-much-before-2014-119120900060_1.html

However, India Today in last week edition has covered extensively on the reasons of this economic slowdown and reasons of Raghuram Rajan, our former Governor of Reserve Bank of India as major story.

Here are the five burdens Raghuram Rajan says PM Narendra Modi inherited from the UPA:

1) One of the legacy problems inherited by PM Modi was that a large number of stalled infrastructure projects “because of difficulties in land acquisition, lack of inputs like coal or gas, or the slow pace of obtaining government clearances”.

2)Raghuram Rajan identifies a problem in power production and distribution as an old legacy. “Existing power producers were running into difficulties as heavily indebted power distribution companies delayed payments or stopped buying. India experienced the absurdity of surplus power capacity even as power demand went unmet.”

3) Next was credit drying up in the market. With more and more promoters running into financial distress, bad loans increased on banks’ balance sheets. As a result, the flow of new credit slowed.

4) Agricultural sector too was in a “mess”. This was in part because of “decades of misguided” government interventions like distorted pricing and subsidies, that resulted in anomalies such as a water-short nation exporting water-thirsty rice.”

5) And then Rajan identifies past governments’ failure to eliminate hordes of middlemen in the agricultural sector as another problem when Modi became the prime minsiter in 2014. Instead of spending its scarce resources on improving farmer access to new technologies, seeds or land, the governments spent their resources on loan waivers. These loan waivers was “a form of misdirected cash transfer”.( https://www.indiatoday.in/business/story/economy-in-a-mess-raghuram-rajan-lists-5-burdens-that-modi-govt-inherited-from-upa-1625850-2019-12-06)

But more welcome for was that unlike others Rahu has given his 10 points plan to deal with slow down too:

1. LAND ACQUISITION: Accelerate the mapping of land and the process of establishing ownership titles, especially in the poorest states. Set up transparent processes to determine and alter land zoning, and to register changes in ownership. Make forcible land acquisition extremely rare. Ease acquisition procedures in rare cases while protecting the interests of sellers.

2. LABOUR: Allow more flexibility in labour contracts. Amend the law to allow for an intermeidate contract where workers gain rights steadily over time of employment but don’t have to be made permanent.

3. DECENTRALISE: Empower ministers. Engage states. Start by amending the terms of reference of the 15th Finance Commission. Don’t curtail states’ share of tax revenue.

4. INVESTMENTS: Stabilise tax and regulatory regimes and make them predictable. Discuss proposed changes publicly and give the industry time to adapt. Consider an independent economic watchdog agency to give investors confidence that the government won’t suddently set them back. Avoid leaning on an untrained judiciary for remedies.

5. DISINVESTMENT: Disinvestment isn’t primarily about raising resources. Avoid selling to already dominant family enterprises to avoid concentration of power.

6. REAL ESTATE/CONSTRUCTION/INFRASTRUCTURE: Fast-track bankruptcy for developers in default. Make super senior loans to insolvent developers to complete projects.

7. NBFCs: The RBI could do an quick asset quality review of the largest NBFCs. Give a clean chit to the well-capitalised ones. Give government funds for the undercapitalised ones only at a stiff price.

8. POWER: Ensure power is adequately priced and metered. Encourage competition among power distributors.

9. TELECOM: Preserve sufficient competitors in the telecom sector in the short run. In the longer run, re-examine regulatory processses to ensure a level playing field.

10. AGRICULTURE: Ensure easier access to inputs like seeds, technology, power finance and insurance. Allow land leasing and cooperative sharing of resources like tractors. Effect greater connectivity — both virtual and through logistical networks — of farmers to warehourse, rural industry and final consumers. Eliminate distortionary government intervention in pricing and procurement. Compensate farmers for withdrawn subsidies through direct cash transfer based on acreage. Enable some farmers to move out of agriculture, allowing economies of scale for those who remain.

(https://www.indiatoday.in/business/story/raghuram-rajan-plan-fix-indian-economy-10-points-1625829-2019-12-06)

I wish the readers and citizens of India will overcome soon this nightmare despair of the country’s slow down.

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Hundred years of Human life in Vedas

Recently I got a small booklet titled ‘Thus Spake The Vedas’with a book on Upanishads that I had ordered. It is a publication of Sri Ramkrishna Math, Myalapore, Chennai-4. In 90 small pages, it has brought out the salient uttering of Rishis who created the Vedas and Upanishad in it. Here is the portion on the life span of human being.

“May we see for a hundred years the lustrous eye(of the sky-the sun), placed by the Devas, arise. May we live for a hundred years.”

“May we hear for a hundred years, speak for a hundred years, hold our head high for a hundred years, yes, even more than a hundred years.”

May we know for a hundred years, rise through a hundred years, prosper through a hundred years….”

“….Having surmounted all difficult stages, may we be happy for a hundred years with all our brave men.”

“Doing, indeed, different kinds of work here, one should wish to live a hundred years.” The mantra in most of the references about 100 years of lifespan of humans is – शतायुः पुरुषः शतेन्द्रियः – Shatayu Purusha Shatendriya,from Taittiriya Samhita.

And the well known verse 2 from Ishavasya Upanishad indicates that a good lifespan of human being is about 100 years and he should desire to live that long , because it is declared by the vedas as such .

This is also confirmed from Commentary of Adi Shankaracharya on this mantra.

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् सतं समाः |

एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे… || 2 ||

kurvanneveha karmāṇi jijīviṣet sataṃ samāḥ

evaṃ tvayi nānyatheto’sti na karma lipyate nare…

‘In the world, one should desire to live a hundred years, but only by performing actions. Thus, and in no other way, can man be free from the taint of actions.’

we must try to live our lives to the full span, and the full span of life, according to the Vedas, is one hundred years: Shatāyur vai purushah.

There are many other portions that indicates how great were those sages and how deep, advanced and practical were their thoughts. At least a good many even in the society of the time must be leading that life. Why can we learn from those Rishis putting their very spiritual but scientifically confirmed views from our scripture. Our modern society could get in return much better quality of life for every member for the society.

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मेघदूतम् पार्क एवं कालिदास का मेघदूत

रविवार, १० नवम्बर को नोयडा के मेघदूतम् पार्क में ९.३० प्रात: श्री बिनोद अग्रवाल एवं ‘सम्वाद’ की सम्पादक श्रीमती शिखा सिन्हा द्वारा एक साहित्यिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया. वक्ता थीं डा.प्रतिभा जैन, संस्कृत, हिन्दी की विद्वान अध्यापक, लेखक, कवि, एवं कलाकार, अभिनेत्री, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित।विषय था, ‘मेघदूतम् पार्क और महाकवि कालिदास का जगत प्रसिद्ध, विश्व साहित्य का शायद पहला और सर्वश्रेष्ठ खंडकाव्य मेघदूत’. डा. जैन द्वारा विषय की सुन्दर चर्चा बड़ी भावुकता, स्पष्टता एवं कुछ नये तरीक़े से किया गया जो सभी श्रोताओं को बहुत पसन्द आया. प्रारम्भ डा. जैन ने मेघदूतम् पार्क का मेघदूत में वर्णित उज्जैयनी के वाटिकाओं के वृक्षों और सजावट के साथ साम्यताओं से की. फिर कालिदास के एक लकड़हारा युवक से कपटी राज्य सभा के पंडितों द्वारा एक मौनी ज्ञानी बनाने, उसके सांकेतिक सरल उत्तरों को ठीक बता विजयी घोषित करने, फिर राजकुमारी विदुषी विद्योत्तमा से विवाह कराने एवं पहली रात को ही विद्योत्तमा का अपने संस्कृत में किये प्रश्न के उत्तर न देने के कारण कालिदास को पंडित बन आने को कह निष्कासित करने की कहानी डा. जैन ने बहुत मार्मिक ढंग से बताया. फिर कालिदास के अज्ञातवास,महान कवि,नाटककार बनने और मेघदूत की रचना की बात कही. मेघदूत में कुबेर के एक नौकर यक्ष के निर्वासन एवं पत्नी से अलगाव में मेघ को दूत बना अपनी पत्नी को अपना संदेश भेजने की कहानी है, जिसमें एक प्रेमी की कोमल भावना है और है रामगिरि से अलकापुरी तक के पथ में आनेवाले पर्वतों, शहरों, वहाँ की वाटिकाओं एवं वहाँ के नवयुवक, नवयुवतियों के सुन्दरता एवं प्रेम का चित्रण. डा. जैन ने मेघदूत के मूल संस्कृत के श्लोकों एवं हिन्दी में नागार्जुन द्वारा अनूदित काव्य को उद्धृत करते हुये विषय को बहुत ही आकर्षक ढंग से पेश किया. सभी मग्न हो उसका लाभ उठायें.प्रश्नोतर भी हुये…बहुत मज़ेदार रही वार्त्ता…उपस्थिति कम थी, पर बहुत ज़्यादा होने की आशा भी नहीं थी…जब देश के लोगों में पढ़ने की रूचि इतनी कम होती जा रही है. हाँ,क्रम चलते रहना चाहिये….

नागार्जुन ने कालिदास पर लिखा है-

प्रथम दिवस आषाढ़ मास का

देख गगन में श्याम घटाएँ

विधुर यक्ष का मन जब उचटा

खड़े-खड़े तब

चित्रकूट से सुभग शिखर से

भेजा था अपना संदेशा

पुष्करावर्त मेघों के द्वारा

साथी बनकर उड़ने वाले

कालिदास! सच-सच बतलाना

प्रिया पीर से पूर-पूर हो

धवल गिरि के तुंग

शिखर पर

रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!

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