देश के आज की शिक्षा व्यवस्था

आज के दिन मुझे दक्षिण भारत का पता नहीं पर उत्तर के हिन्दी प्रदेशों में सब सरकारी स्कूल और कालेज बन्द होते जा रहे हैं। आज के गरीब- अमीर सभी बच्चे प्राइवेट स्कूलों और ट्यूशन पर ही निर्भर हैं अपनी अपनी अगले पायदान की शिक्षा के लिये। सभी तरह के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिये बच्चे व्यवसायिक स्तर पर चलाये जानेवाले सभी तरह के फ़ीस वाले कोचिंग सेंटरों में दाख़िल हो और पढ़ाई करने के हावी होते जाते हैं। अभिभावक कोचिंग और अंग्रेज़ी माध्यम से ही अपने बच्चों को पढ़ा किसी भी इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या मेडिकल कालेजों में भर्ती के लिये आश्रित हैं। अधिकांश पढ़ानेवाले सरकारी स्कूल के अच्छे अध्यापक ही हैं, जो अपने स्कूल में गैरहाजिर हो, कोचिंग सेन्टर में कुछ घंटे पढ़ा रहे हैं और अच्छी ख़ासी कमाई कर रहें हैं।

बिहार में न स्कूल चलते हैं, न कालेज- विशेषकर सरकारी और यहां तक की बिहार सरकार के भी।यह मेरा अपना अनुभव है बिहार का, क्योंकि मैं बिहार में पैदा हुआ था और चार-पांच कक्षा तक पढ़ा भी।

संजीव बंगाल के प्रसिद्ध परिवार के हैं और विद्वान और भारत सरकार और मोदी सरकार आर्थिक सलाहकारों में हैं।
Sanjeev Sanyal on Education Crisis, Coaching Mafia, Youth Anger, Taxes, AI & Economy https://youtu.be/VVGPauwLVJ4?si=VURpfFaZFxccGMjo

सभी राज्यों में शिक्षा पर किया गया खर्चा अनर्थ है। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के नीचे से ऊपर के सभी कर्मचारी इसमें चोरी छिपे लगे हैं। क्यों नहीं उन सब संस्कारी शिक्षा संस्थानों को बन्द कर दिया जाये। केन्द्र सरकार भी इस राज्य सरकार के दायित्व में आते विभाग के बारे में चाहने पर भी कुछ भी बदलाव करने में अक्षम है।

दूसरे ऐसी स्थिति में तो सबसे निचले आमदनी वाले वर्ग के बच्चे तो शिक्षा प्रणाली के बाहर ही रहेंगे। जब पंचायतें सरकारी स्कूल चलातीं हैं और शिक्षकों की बहाली करतीं हैं और सभी भर्ती एक धनराशि खर्च कर होता हैं, फिर शिक्षकों की गुणवताकैसे रहेगी। स्कूल को चलाने की सब सरकारी व्यवस्थाएँ में धन का भी इसी तरह दुरुपयोग होता कहा जायेगा।

केन्द्र सरकार इसमें हस्तक्षेप कर ही नहीं सकती विशेषकर अगर दूसरे राजनीतिक दल की सरकार उस राज्य में है। बहुत सारे स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब बनवाये गये हैं, हुनर सिखाने के लिये, हाथ का काम सीखने के लिये, पर कितने में अच्छे योग्य सिखानेवाले हैं पता नहीं। अगर शिक्षक अनुभवी अपने विषय का ज्ञानी नहीं हो ऊपर से निष्ठा भी नहीं हो तो कितना और क्या सिखाया पायेगा, बच्चे बच्चियों को?

झोपड़ी से लेकर सम्पन्न परिवारों तक अगर सब विदेशी भाषा, विदेशी आचरण, विदेशी संगीत, विदेशी त्योहारों का बोलबाला होता जा रहा है, तो कैसे बचेगी भारतीयता की पहचान और हम केवल दूसरे की नक़ल करते रहेंगे और उनसे निर्यात। अगर मैं गलत होता तो कैसे बनारसी ओर कांजीवरम साड़ियों की जगह चीन से आती नक़ली सस्ती साड़ियाँ बाजारों में बिकती या हमारे भगवानों की गणेश लक्ष्मी की मूर्तियां।

मेरे विचार से भारतीय एकता को बनाये रखने के अब तक के अनुभवों को देखते हुए हमें केन्द्रीय विद्यालयों के मानदंडों को दुनिया का सर्वोत्तम बनाये रखते हुए सभी प्रदेशों में जनसंख्या के आधार केन्द्रीय विद्यालयों को उपलब्ध करा देने चाहिये आई. आई. टी की तरह और वे सभी इन्जीनियरिंग, मेडिकल, आई.आई, एम के लिये किये गये परीक्षाओं के लिये जरूरी पढ़ाई का भी ख़याल रखें।

मोबाइल फोन पर उपलब्ध प्रिण्ट मीडिया या सोशल मीडिया के दुरुपयोग के रोकना के उपायों को खोजना ज़रूरी है जिसके अभिशापों के बुरे प्रभावों को सरकार के सिवाय कोई नहीं रोक सकता। देश की नई पीढ़ियों को बचाना देश के लिये जरूरी है।अगर हम इसके लिये तैयार नहीं तो भगवान मालिक….

बिहार में कोचिंग के कुछ रूप और फिर ..

  1. Earlier Bihar Model of coaching centre- Super 30,
  1. Sasaram Railway Station version of group coaching
    और फिर आया खान सर का कोचिंग जहां लाखों या करोड़ों में कमाई भी की जाती है और खान सर की भाषा पर क्या कहें जो मैंने यूट्यूब पर सुनी है।

फिर मोदी जी का तरीका
Modi’s action of Universal Coaching- SATHEE (Self-Assessment, Test and Help for Entrance Examination), developed by the Ministry of Education in collaboration with IIT Kanpur. It provides free video lectures, mock tests, and doubt resolution for exams like JEE, NEET, SSC, CUET, and ICAR in multiple regional languages.

आज भारत के गरीब से गरीब के घरों में और विशेषकर हर पुरुषों, महिलाओं बच्चों के हाथ में दिखता है मोबाइल फोन जिससे कोई महान भी बन सकता है, महा बदमाश, पढ़ाई भी कर सकता और हर तरह गलत आचरणों के रीलों से पूरी ज़िन्दगी बिगाड़ सकता है।

क्या होगा ऐसी स्थिति में नई पीढ़ियों का देश के प्रगति में हाथ या उसे रोकने वाले कर्म …भगवान मालिक

पर हम ८७ साल की में क्या कहे। क्या मोदी जी इस बाधा को पार कर यह चरितार्थ कर देंगे कि ‘ मोदी है तो मुमकिन है’ या राहुल गांधी का केवल अपने को प्रधानमंत्री बनाने का या किसी दाम पर बनने का सपना साकार हो जायेगा, चाहे देश फिर ग़ुलाम हो जाये और कभी भी विकसित भारत न बन सकें।
आप सभी अनुरोध है भाषा शुद्ध कर लीजिये, सुनिये कुछ करिये सभी मिलकर क्योंकि ‘ जननी जन्मभूमि तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ यह हमारे महान पूर्वजों की चाहना थी अपनी संतानों से …
क्या कोई मेरे को बड़े प्लैटफ़ॉर्म से जाता लोगों तक पहुँचा सकता है?

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