राम चरित मानस: एक मित्र को लिखा पत्र

राम चरित मानस: एक मित्र को लिखा पत्र

राम-सीता (पुरुष-प्रकृति, परमात्मा- माया)
एक दिन आपकों सीता के बारे में कुछ कहा था। आपने मुझे रामायन के उन अंशों को उद्धृत करने को कहा था। मुझे अब याद नहीं रहता। मैं उन अंशों उदृत कर कर भेज रहा हूँ ।

पुरुष और प्रकृति
रामचरितमानस (बालकाण्ड के मंगलाचरण से)
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥5॥

उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥5

२ शिव पार्वती जनकपुर की वाटिका में सीता का उमा का वन्दन-

नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥4॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥4॥

अयोध्या कांड वाल्मिकी की सीता-राम का स्वागत भाषण
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।

गीता में भगवान कृष्ण ने चौथे अध्याय की शुरुआत में श्लोक है-

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥४.६॥

अजः अपि सन् अव्यय-आत्मा भूतानाम् ईश्वरः अपि सन् ।
प्रकृतिम् स्वाम् अधिष्ठाय सम्भवामि आत्म-मायया ॥४.६॥

मैं अजन्मा और अविनाशी रूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके योगमाया से प्रकट हूँ । अपरा प्रकृति और परा प्रकृति का विवरण अध्याय ७ में आया है-

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥७.४॥

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आकाश, मन (पांच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के साथ), बुद्धि और अहंकार यह मेरी आठ रूपों में विभक्त हुई प्रकृति है ।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥७.५॥

 अर्जुन ! यह (आठ प्रकार की प्रकृति) अपरा प्रकृति है; किन्तु इससे भिन्न मेरी परा प्रकृति है जो जीवों का रूप धारण करती है और जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है, उसे तू जान ।

गीता के अध्याय १५ पुरुषोत्तम योग के श्लोक १६, १७, और १८ में क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम को इस तरह अलग अलग बतलाया गया है।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१५.१६॥

-इस संसार में नाशवान् और अविनाशी भी ये दो प्रकार के पुरुष है। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी है।

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१५.१७॥

इन दोनों में उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका भरण पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा कहा गया है।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥१५.१८॥

क्योंकि मैं नाशवान क्षर-शरीर से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।

प्रकृति को गीता और तुलसीदास जी माया भी कहते हैं और सभी कुछ करने में प्रकृति और उसकी माया का ही हाथ होता है।

अपने धर्म ग्रंथों को अच्छे व्याख्यों की सहायता पढ़ कर थोड़ी अच्छी समझ तो आ जाती पर कुछ गहरे में जाने के लिये भगवान की कृपा या योग- कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्ति योग को गहरे समझ कर और अभ्यास कर ही सफलता मिलती है।

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