आज की कविता

जीवन का अन्तिम यह कालखंड
कुछ बात पते की कहना है
मैं क्या जाना या क्या समझा?
क्या कहूँ कि जीवन क्या होता
क्या जीवन एक भ्रम मुश्किल सा
या बहुत सरल यह कहानी सा ।
होता है प्रारंभ एक शून्य से जो
हर समय कुछ जुड़ता रहता है
पर साथ भी घटता रहता कुछ
कोई आता है कोई जाता है
कुछ खोता है फिर कुछ मिल जाता।
फिर गुणा भाग भी देखा हूँ
एक में बढ़ना एक में घटना ।
पर अन्त तो आना है निश्चित
इससे कोई न बच पाया।
शून्य शुरू भी अन्त भी है
कुछ शून्य को अनन्त समझते
है अनन्त शुरू अनन्त अन्त ।
क्या सत्य जानना है मुश्किल
आजतक का अनुभव तो यही रहा
गर कुछ बदल गया जाते जाते
तो शायद बतला कर जाऊँ ।

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