कुछ आध्यात्मिक विचार

२.८.२०२६
आज सबेरे मेरे पाठ में यह नीचे का श्लोक आ गया,जो दुनिया के सब बाल, युवा, गृहस्थ, वृद्ध के लिये सबके लिये उपयुक्त है। कृपया पढ़े, समझे पढ़ायें।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥५.२९॥
भोक्तारम् यज्ञ-तपसाम् सर्व-लोक-महेश्वरम् ।
सुहृदम् सर्व-भूतानाम् ज्ञात्वा मां शान्तिम् ऋच्छति ॥
मुझे यज्ञ और तपस्याओं का भोक्ता, समस्त लोकों का बलशाली ईश्वर, समस्त प्राणियों का मित्र जानकर मनुष्य शान्ति को प्राप्त होता है ।

स्वामी रामसुखदास के किये गीता की मेरे सबसे अच्छी व्याख्या में उन्होंने यह लिखा है-

भगवान सभी भक्तों के द्वारा होनेवाली सभी क्रियाओं के भोक्ता भी है (९.२७)। भक्तों के प्रेम के भोक्ता भी भगवान ही हैं। कोई किसी को श्रद्धा से नमस्कार करता है तो उसके भोक्ता भी भगवान ही हैं, क्योंकि सबमें में तो वही विराज मान है। कोई किसी अपने देवता की पूजन करता है तो उसके भी भी वही हैं। सम्पूर्ण संसार के कण-कण में वही हैं। अत: सभी के द्वारा किये गये सभी शुभ कर्मों के भोक्ता हैं, संपूर्ण लोकों के ईश्वरों केभी ईश्वर हैं और सबके सुहृद है- ऐसा दृढता पूर्वक स्वीकार से ममता हटकर भगवान में आत्मीयता हो जाती है, जिसके चलते परम शान्ति की प्राप्ति मिल जाती है। यही परम निर्वाण है, यही ब्रह्म-परमात्मा स्वरूप, सत्- चित-आनन्द स्थिति है।

भारत के सभी शास्त्र ग्रंथों- वेदों, उपनिषदों, रामायनों में कहा गया है। केवल एक प्राचीन ईशोपनिषद् (उपनिषद) का एक मंत्र दे रहा है नीचे-

यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥मंत्र ७॥
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य के अन्दर यह परमोच्च चेतना जाग गयी है कि स्वयम्भू आत्मसत्ता ही, परम आत्मा ही स्वयं सभी भूत, सभी सत्ताएं या सम्भूतियां बना है, उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र आत्मा की एकता ही देखता है।


In what I consider the best commentary on the Gita—authored by Swami Ramsukhdas—he writes:
The Lord is the enjoyer of all actions performed by all devotees (9.27). It is the Lord who accepts and enjoys the love offered by devotees. When someone offers salutations to another with reverence, the Lord is the ultimate recipient, for He resides within everyone. When someone worships a particular deity, He is the one being worshipped there as well. He pervades every single particle of the entire universe. Therefore, He is the enjoyer of all auspicious deeds performed by everyone, the Supreme Lord of the lords of all worlds, and the true friend of all. Firmly accepting this truth dissolves worldly attachments and fosters a deep sense of kinship with the Lord, leading to the attainment of supreme peace. This is supreme liberation (Nirvana); this is the state of Sat-Chit-Ananda (Truth, Consciousness, and Bliss)—the very nature of the Supreme Spirit (Brahman).

When a man has known Me as the Enjoyer of sacrifice and tapasya (of all askesis and energisms), the mighty lord of all the worlds, the friend of all creatures, he comes by the peace.

He in whom it is the Self – Being that has become all existences that are Becomings, for he has the perfect knowledge, how shall he be deluded, whence shall he have grief who sees everywhere oneness ? (महर्षि अरविन्द का अनुवाद)

By recognizing Me as the enjoyer of sacrifices and penances, the mighty Lord of all worlds, and the friend of all living beings, man attains peace.

राम चरित मानस: एक मित्र को लिखा पत्र

राम-सीता (पुरुष-प्रकृति, परमात्मा- माया)
एक दिन आपकों सीता के बारे में कुछ कहा था। आपने मुझे रामायन के उन अंशों को उद्धृत करने को कहा था। मुझे अब याद नहीं रहता। मैं उन अंशों उदृत कर कर भेज रहा हूँ ।

पुरुष और प्रकृति
रामचरितमानस (बालकाण्ड के मंगलाचरण से)
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्‌।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्‌॥5॥

उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥5

२ शिव पार्वती जनकपुर की वाटिका में सीता का उमा का वन्दन-

नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥4॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥4॥

अयोध्या कांड वाल्मिकी की सीता-राम का स्वागत भाषण
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी (आपकी स्वरूप भूता) माया हैं, जो कृपा के भंडार आपका रुख पाकर जगत का सृजन, पालन और संहार करती हैं।

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