कुछ याद आया

अपने बरामद से

अपने बरामदे में लगे 

लोहे के सिकंचों के पीछे से

आज जो देखा, क्यों नहीं देख 

पाया था पहले।

होली के दिन प्रात: प्रात: 

लाल लाल सोने की थाली से 

प्यारे लगते सूरज को 

देखा और देखता रहा।

अनजानी ख़ुशी आँखों से 

पूरे शरीर को पुलकित कर गई, 

मैं देखता रहा जबतक संभव न रहा।

उसी दिन रात गये 

अचानक जब  नींद खुली

उसी बरामदे से एक और नजारा 

देखा

अद्भुत सुन्दर चाँद को 

अपनी छटा बिखेरते 

और देखता रहा 

जबतक आँखें झपने न लगी। 

क्यों हो गये आज 

सूरज चाँद दोनों इतने प्रेय

यह घर यह बरामदा तो 

बरसों से मेरा ही रहा 

पर इस सूरज और चाँद को 

पाने में कैसे लगे इतने दशक।

और आज ही एक और दृश्य 

शाम का था

मन को असीम आनन्द देता-

आसमान साफ था और आज नीला नीला 

दूर गगन में पक्षियों की छोटी छोटी पाँतें 

देखा लौटते हुए दूर बसेरे की तरफ ।

लगा था मैं भी दिन का थका हारा 

लौट रहा हूँ फिर 

अपने घर की तरफ 

सबेरे शायद इन्हें जाते देंख पाता नहीं

शायद हमारा समय रहा अलग अलग।

जीवन की शाम में अकेला रहते हुए

ऐसे ही छोटी छोटी बातें 

कुछ क्षण की ख़ुशी दे जातीं 

जीने का कुछ तो बहाना बन जातीं।

जीवन ऐसे ही निकल जाता है

एक पटाक्षेप जब होता है तबतक 

हमें ख़ुशी का बहाना ही

नहीं मिल पाता….

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