बंगाल का चुनाव- मेरी प्रतिक्रियाएँ

पश्चिम बंगाल की राजसत्ता- मुख्य मंत्री और उनका सत्ताकाल

यह सब काल मैं देख सका हूँ –
*1. Glorious Period- Durgapur, Salt Lake, Kalyani
Bidhan Chandra Roy: Jan 1950 – July 1962 (First CM of the state)
Prafulla Chandra Sen: July 1962 – Feb 1967

*2 Congress on decline
Ajay Kumar Mukherjee: Mar 1967 – Nov 1967 (First term)
Prafulla Chandra Ghosh: Nov 1967 – Feb 1968

  • Period of uncertainty with slow deterioration
    President Rule: Feb 1968 – Feb 1969
    Ajoy Kumar Mukherjee: Feb 1969 – Mar 1970 (Second term)
    President’s Rule: Mar 1970 – Apr 1971
    Ajay Kumar Mukherjee: Apr 1971 – June 1971
    President’s Rule: June 1971 – Mar 1972
    Siddhartha Shankar Ray: Mar 1972 – Apr 1977
    President’s Rule: Apr 1977 – June 1977Jyoti

*Communist Era- all major industries getting winding up
Jyoti Basu: June 1977 – Nov 2000
Buddhadeb Bhattacharjee: Nov 2000 – May 2011
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Mamta Era- Hope of revival vanished soon….Decline of communists era got speeded up she continued with cadres of communists converted as TMC member and bad practices like syndicate system flourished..
Mamta Banerjee: May 2011 – Present (as of May 2026)
*
4 May 2026 BJP Era begins with thumping majority. A new Era has begun with hope of Bengal getting its due place in five years (To be continued)
काश! अंग, बंग और कलिंग वैसे ही समृद्ध हो पाते जिसके लिये इतिहास उन्हें जानता है।
उदाहरण
बंगाल के चारों इंजीनियरिंग कालेज खड़गपुर, शिवपुर, यादवपुर और दुर्गापुर सभी आई. आई. टी. बन पाते। और १० नये मेडिकल कालेज होते AIMS भी से १०० नर्सिंग स्कूलों तक…
२०-२० केन्द्रीय और कस्तूरबा विद्यालय, सभी स्कूलों की शिक्षा STEM के विषयों को प्राथमिकता देती और सभी में अटल टिंकरिंग लैब होता। १००० आई.टी. आई सभी हुनर के इच्छुक बच्चे बच्चियों को प्रोत्साहित प्रशिक्षण के लिये।
सभी पुराने मैनुफैक्चरिंग के उद्योगों को फिर से नये रूप चालू किया जा सकता। हलदिया में पानी के जहाज़ बनाने की व्यवस्था…+++
बंगाल की हस्तकला मसलिन और प्रसिद्ध करघा कपड़ा उद्योग ……

सोनार बांग्ला की फिर वापसी- कला, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, नृत्य, नाटक, चित्रकला…

बंगाल चुनाव-कुछ लोगों की, कुछ जगहों की बातें

एक्ज़िट पोल आ चुका है। पर पता नहीं क्यों मेरा आज इस पर विश्वास नहीं रहा। सभी एसी पोल करानेवाली कंपनियाँ व्यवसायिक बन चुकी हैं और उनके विचारों में कहीं न कहीं से राजनीतिक प्रभाव निकल ही आता है।

पर यह पहली बार है कि इस बार यूट्यूब के कारण कुछ अच्छी जानकारियों को पा सका, बंगाल के, विशेषकर कोलकाता के बारे में, अपने आदर्श बंगाली महापुरूषों के जीवन सम्बन्धी और स्थान सम्बन्धी।

कोलकाता से ट्राम गईं या नहीं पता नहीं, पर यह ज़रूर जान पाया कि आदमी द्वारा खींचा जाने वाला रिक्शा ज़रूर अभी वहाँ हैं। मुझे अभी याद है कलकत्ता में बरसात के दादाजी कभी कभी मजबूर कर मजबूर कर देते उस पर चढ़ने के लिये। मुझे बहुत बुरा लगता था। अंग्रेजों के जमाने में वह चलता था।

कोलकाता में अभी भी हमारी एम्बेसडर पीली टैक्सियां हैं शान से चलती हुईं। हिन्दुस्तान मोटर्स के दिन आ जाते हैं। वैसे दक्षिण भारत में दिखने को मिलतीं हैं।वैसे ओला, उबर की टैक्सियाँ ही आजकल पूरे देश में दिखाई देती हैं।

कल मैंने एक वीडियो सर आशुतोष मुखर्जी (मुखोपाध्याय) के घर का देखा। सर आशुतोष मुखर्जी को बांग्ला बाघ ( Bengal Tiger) कहा जाता था, वे अपने समय के नामी गणितज्ञ और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।उनके प्रसिध्द पुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी और रामा प्रसाद मुखर्जी थे।बाद में श्यामा प्रसाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़े और राजनीतिक दल जन संघ की स्थापना की जिससे भारतीय जनता दल आया बाद में। वे नेहरू के प्रथम सरकार में रहे और काफी कुछ किया। बाद में कश्मीर में उनकी मृत्यु हुई। रामा प्रसाद मुखर्जी कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस थे।शायद इन्हीं के लड़के शिवतोष मुखर्जी, प्रेसीडेंसी कालेज में वायलोजी के मेरे प्रोफेसर भी रहे।

असीम दासगुप्ता जो प्रेसीडेंसी कालेज से अर्थशास्त्र के उनके जीवन सम्बन्धी वार्तालाप को सुना।वे अमरीका में भी पढ़ाने गये थे।

इन्हीं सबमें समय निकल जाता है आजकल

बंगाल प्रेम और मेरा कड़वा अनुभव
मैं बहुत बचपन में सात आठ की उम्र से बिहार के गांव से दादाजी बंगाल में आया था। वहीं पढ़ा, पहले ‘बिरलापुर विद्यालय’, फिर प्रेसीडेंसी कालेज और उसके आई. आई. आई. टी। प्रेसीडेंसी कालेज के हिन्दू हास्टेल में शाकाहारी खानेवाला मैं शायद ही किसी दिन पेट भर पाया। हिन्दी भाषी और बहुत थोड़े ही थे २-३। पर बिरलापुर और प्रेसीडेंसी में बहुत कम दोस्त बन पाये।लगता काफी बंगाली शायद हमें हेय दृष्टि से देखते थे। पर खड़गपुर माहौल बदल गया और भारत के हर कोने के लड़के मिले। हाँ, स्टाफ़ में अधिकतर लोकल थे। उनसे बहुत सावधानी बरतनी पड़ती थी। अम्बैसेडर बनाने वाली उत्तरपारा के नज़दीक की हिन्दुस्तान मोटर्स फिर देश के हर देश के लोग थे। कामगारों और निचले सुपरवाइज़र स्तर तो बंगाली थे पर ग़ैर बंगालियों की काफ़ी संख्या थी। लेबर यूनियन बड़ी तगड़ी थी पहले कांग्रेस की, फिर कम्युनिस्ट की और उनका प्रबंधन बहुत समझदारी से करना पड़ा। मैं वहां करीब ३७ साल तक काम किया।कुछ दिन बिधाननगर साल्टलेक में रहा, क्योंकि मैंने वहाँ मकान बनवाया था। पर माहौल पूरा बंगाली तरीक़े का था और कहीं आना जाना संभव नहीं लग रहा था कभी कभी पड़ोसी सेन बाबू के घर को छोड। अपने निर्णय की ग़लती का धीरे धीरे अहसास होने लगा। और २००५-७ तक राजेश राजेश सेफाली के अमरीका जाने पर बेंच दिया, क्योंकि लगा कि नोयडा में रहते हुए अपनी विधान नगर की CJ ब्लॉक की सम्पत्ति बचानी मुश्किल होगी।
बंगाली भद्र कहानेवाले पुरूष एवं महिला बंगाल के बाहर जा कुछ और बन जाते स्थानुसार। पर बंगाल की माया नहीं छोड़ते। पहले ही जैसे थे आज भी वहां पहुंचते वैसे से ही हो जाते हैं। आज आख़िरी चुनाव का दिन है। चल रहा है। कल मैं एक यूट्यूब इस विषय पर, जिसे मैं आप सबके लिये साझा कर रहा हूँ, जो देखेंगे , वे मान लेंगे कि मैंने ठीक कहा या नहीं।
राष्ट्रीय सेवा संघ बहुत वर्षों से वहां काम कर रही है। पहली संसद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, उनका योगदान बंगाल हर व्यक्ति जानता है और भी लोग भद्र परिवार जो हिंदू परम्परा के साथ हैं। कोलकाता के पुराने लोग १९४७ के अगस्त महीने के स्वतंत्रता दिवस पर महात्मा गांधी कलकत्ता में थे क्योंकि वहां उस समय सबसे बड़ा हिन्दू मुसलमान का दंगा हुआ था। कुछ बंगाली हिन्दू ही मिहनत कर कलकत्ता को भारत में रख पाये।
पर उसके बंगाल के सभी चीफ मिनिस्टर प्रधानमंत्री को वह सम्मानित दर्जा नहीं दिये जो देना चाहिये। बिधानचन्द्र राय न दिल्ली जाते थे पर नेहरू से काम करवा लेतेथे। इसी कारण पहली आई आई टी खड़गपुर में बनी। जो नया काम हुआ, उद्योग फूले फले उन्हीं के समय हुआ। बंगाल पूरे देश की शिरमौर बना रहा।
पर बिधान राय के बाद बंगाल के पतन का वह दौर चला कम्युनिस्ट ज्योति बसु के लम्बे राज्य काल में, जिसके के कारण उनके बाद के कम्युनिस्ट नेता नहीं सँभाल पाये। ममता कांग्रेस में रही, फिर अटल बिहारी की सरकार में भी मंत्री बनीं। वही मौक़ा देख अपनी नई पार्टी बना बंगाल का चुनाव जीत मुख्य मंत्री हैं और अब तो अपने भतीजे को अपना उत्तराधिकारी बना परिवारवादी राजघराना बनाने में सफल हो गई। शायद आजीवन वही या उसका परिवार ही राज्य करे गांधी परिवार की तरह। ममता से बहुत उम्मीदें थीं, पर वह अपनी गद्दी को बचाये रखने के लिये सब कुछ करती रहीं है, करतीं रहेंगी।
इस बार के चुनाव में मोदी, अमित साह और बहुत से भाजपा के लोग पूरा जोर लगा दिये है, पर बंगाल लोगों को मा, माटी, मानुस प्यारा है, भारतवर्ष से भी ज्यादा। आप इस यूट्यूब को जरूर देखें हिन्दी, अंग्रेज़ी दोनों में वार्तालाप है। मैंने कुछ चीज नोट की- १. रास्ते की दुकानों के मालिक अधिकांश ग़ैरबंगाली हैं, उनके लिये यह काम निम्न है। २. कलकत्ता में आदमी के खींचे जानेवाले रिक्शे अभी हैं। ३. एम्बेसडर कार पीली टैक्सी की तरह चलती है।

“Bengal Elections | Who’s On Track To Victory? Bengal’s Most Iconic Ride | NDTV Chai Stop” on YouTube-

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