ईशोपनिषद् और उसका महत्व

ईशोपनिषद् और उसका महत्व
ईशोपनिषद शुक्ल यजुर्वेद का अंश है, जिसे’ईशावास्योपनिषद’भी कहा जाता है। उपनिषदों में इसे प्रथम स्थान प्राप्त है। शंकराचार्य ने भी इस उपनिषद की विशेष प्रशंसा की है अपने भाष्य में। इसे वेदांत का निचोड़ मानने में शायद ही कोई जानकार आपत्ति कर सकता है।गागर में सागर की तरह है यह, शायद सबसे प्राचीनतम उपनिषद् या उनमें एक। लगता है इसके आधार पर सभी अन्य उपनिषदों का विकाश हुआ क्योंकि इसके सभी श्लोकों के मूल विषय बहुत विस्तार के साथ दुहराया गया है। बृहदारण्यकोपमनिषद् ऋषियों ने इनको श्लोकों को उद्धृत भी किया है। बाद में भगवद्गीता, यहाँ तक की लोकप्रिय रामचरितमानस में भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने भी बहुत अच्छी तरह जगह जगह पर इसके निष्कर्षों का व्यवहार किया। इस लिये इसमें सभी उपनिषदों का निचोड़ मिल जाता है। साथ ही एक सज्जन की ज़िन्दगी के कुछ महत्वपूर्ण गुर भी हैं जिसका हर ब्यक्ति फ़ायदा उठा सकता है। अपने अल्पज्ञान से भी मैं इसके कुछ श्लोकों को कंठस्थ कर बराबर पाठ करता हूँ, और मैंने यह लेख केवल अपने अपने बच्चों एवं सुधी मित्रों के लिये लिखा था जिससे इस एक उपनिषद से वे हमारे धर्म का बहुमुखी सार्वभौम उपदेश समझ लें। इनके कुछ श्लोकों में बहुत अच्छी कविता रस भी मिलता है पाठ में। संस्कृत एक ऐसी अद्वितीय भाषा है जो पहले पहले बहुत दुरूह लगने पर भी केवल पाठ करते रहने से बहुत सरल लगने लगती है और अगर आपकी प्रवृति पढ़ी चीजों को समझने की भी है, तो समझ भी आती जाती है और यह अपने पर है। एकनिष्ठ हो इन श्लोकों का मनन एवं चिन्तन से पता नहीं कितने मूल्यवान मोती भी मिल जायें जीवन भर के लिये और शान्तिमय जीवन का सहारा बन जायें।

ईशोपनिषद् का पहला श्लोक महात्मा गांधी को बहुत ही प्रभावित किया था, उन्होंने अपने एक सभा में कहा था: “मैं आपको हिंदू धर्म के संपूर्ण सार के रूप में एक श्लोक सुनाने जा रहा हूं। आप में से कई ईशोपनिषद जानते हैं। मैंने इसे वर्षों पहले अनुवाद और टिप्पणी के साथ पढ़ा। मैंने इसे यरवदा जेल में दिल से सीखा। लेकिन इसने मुझे उतना आकर्षित नहीं किया, जैसा कि पिछले कुछ महीनों के दौरान किया है, और मैं अब अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यदि सभी उपनिषद और अन्य सभी धर्मग्रंथ अचानक से किसी कारण से नष्ट हो गए होते और यदि ईशोपनिषद का केवल पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति में ज़िन्दा रहता, तब भी हिंदू धर्म हमेशा जीवित रहता।”
अमरीका में गीता, उपनिषद् आदि के विद्वान प्रोफ़ेसर भारतीय मूल के एकनाथ एश्वरन गांधी के उपरोक्त विचार के बारे में अपनी पुस्तक ‘Upanishads’ में लिखा है-
“What Gandhi had in mind with his great tribute he made clear in his reply to a journalist who wanted the secret of his life in three words, he said: “Renounce and enjoy!”(tena tyaktena bhunjittah), of the first verse of Isha.”

“गांधी ने अपने पहले श्लोक के विचार को और स्पष्ट किया था एक पत्रकार के अपने पहले के प्रकट किये विचार संम्बन्धी सवाल के जवाब में. पत्रकार को जो उनके जीवन के रहस्य को तीन शब्दों में जानना चाहता था, गांधी ने जवाब दिया- “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” मेरे जीवन का रहस्य है जो ईशोपनिषद् के पहले श्लोक का अंश है।”
उन श्लोक १ एवं २ को यहां कुछ समझने का प्रयत्न है।

पूरा पहला श्लोक इस तरह है
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
श्लोक का संधि-विच्छेद
ईशा वास्यम् इदं सर्वम् यत् किं च जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भूञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्वित् धनं॥१॥
अर्थ- विश्व की सभी वस्तुओं में ईश्वर का आवास है। इसलिये इन सबको अनासक्त भाव से उपभोग करना चाहिये; किसी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर ललचाई दृष्टि नहीं डालनी चाहिये।
पहली पंक्ति में है-
‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ -इस विश्व की सब चीज़ों के भीतर में ईश्वर(आत्मा)ही है और सब कुछ उसी (ईश्वर) का है।
‘यत्किञ्च जगत्यां जगत्’-यह अन्तर में रहनेवाला आत्मा (ईश्वर) जगत के चर एवं अचर सभी में व्याप्त है।
यानी
१. ईश्वर तुम्हारे अन्तर में आत्मा के रूप में है।
२. यही आत्मा विश्व के चर-अचर सबके भीतर में है।
और दूसरी पंक्ति है,
‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’-अनासक्त रह कर सब तरह की कामनाओं का त्याग कर काम करो, और जीवन का आनन्द लो।
‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌’- (अपने परिवार या)किसी अन्य के धन का लोभ न रखो। भावार्थ है ईश्वर का दिया जो है उसमें प्रसन्न रहे।
३. त्याग भाव को प्रमुख रख हर काम करो एवं जीवन का आनन्द लो।
४. किसी धन का लोभ न करो।
‘ईशावस्यम् इदम् सर्वम्’, सभी उपनिषदों का महानतम उपदेश सबके लिये यही है, जिसे समझना हर आदमी के लिये अपनी पवित्रता एवं शक्ति का सही मूल्यांकन के लिये ज़रूरी है।उपनिषदों के आत्मा ही परम-ब्रह्म या ‘ब्राह्मण’ भी है।

बहुत सालों पहले हिन्दमोटर के प्रारम्भिक दिनों में हावड़ा रेलवे स्टेशन के दुकान से गांधी जी के आश्रम में व्यवहृत ‘आश्रम भजनावलि’ की एक प्रति मैंने ख़रीदी थी। उसका पाठ पता ही नहीं चला कब कैसे मेरे जीवन का हिस्सा बन गया। सबेरे उसका पाठ करता रहा बिना कुछ समझे। पिछले साल जब उपनिषदों में रूचि हुई। ईशोपनिषद्, कठोपनिषद्, मंडूकोपनिषद्, केनोपनिषद् पढ़ रहा था एक एक करके। एक दिन माडूक्य उपनिषद् पर वेदान्त सोसाइटि के अति प्रभावशाली सर्वप्रियानन्द को सुना तो पहली बार तुरीयम् की जानकारी हुई और तब इस पुस्तिका के प्रात:स्मरण् के पहले श्लोक को ध्यान से पढ़ा। और समझने की कोशिश करता रहा कि हमारे सबेरे की प्रार्थना में आये ‘तुरीयम्’ शब्द का अर्थ क्या है। हम अपने हृदय में बसे आत्मा को छोड़ इधर उधर ईश्वर की कृपा पाने के लिये क्यों भटकते हैं नासमझ बन जहाँ तहां। कुछ दिनों पहले ही जाना कि यह आदि शंकराचार्य की लिखी है। शंकराचार्य अपने प्रांत: स्मरणीय इस श्लोक में इसी आत्मा को समझाया है और उसकी महिमा बताई है। इस एक श्लोक में आत्म परिचय मिल जाता है। उपनिषदों पर श्रद्धा और बढ़ गई-
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥
Praatah Smaraami Hrdi Samsphurad-Aatma-Tattvam
Sac-Cit-Sukham Parama-Hamsa-Gatim Turiiyam |
Yat-Svapna-Jaagara-Sussuptim-Avaiti Nityam
Tad-Brahma Nisskalam-Aham Na Ca Bhuuta-Sangghah ||1||
अर्थ-
मैं सबेरे अपने हृदय में स्फुरित होनेवाले आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ ।जो आत्मा सच्चिदानंद (सत्, ज्ञान, एवं आनन्द) है, परमहंसों की अन्तिम गति है, जो चतुर्थ अवस्थारूप (जिसे माडूक्योपनिषद् के ऋषि ने ‘तुरीयम्’कहा है) है, जो जाग्रति, स्वप्न,और गहरी निन्द्रा तीनों अवस्थाओं को हमेशा जानता है और जो शुद्ध ब्रह्म है, वही मैं हूँ- पंचमहाभूतों से बनी यह देह मैं नहीं हूँ ।
In early morning, I remember (meditate on) the Pure Essence of the Atman, Self shining within my heart,
which is the Sacchidananda (Existence-Consciousness-Bliss), which is the Paramahans (The Pure White Swan floating in Chidakasha) and takes the mind to the state of Turiya (the fourth state,Superconsciousness),
which knows as a witness beyond the three states of Dream, Waking and Deep Sleep, always- That Brahman which is without any division shines is me and I am not this body which is a collection of Pancha Bhuta (Five Elements).

अब ईशोपनिषद के पहले इस श्लोक के त्याग के बारे में कुछ बताऊँ। त्याग से निर्देश है सभी कामनाओं-केवल संतान, धन, या अपने सुख के लिये किये कर्मों-का त्याग करना है, जो व्यक्ति को इस मायामय संसार से बांधे रहती है और यही विचार अन्य उपनिषदों में भी व्यक्त किया गया है।यह अमरत्व दे सकता है। यही ज्ञानियों के जीवन ध्येय रहता है।उदाहरणार्थ कठोपनिषद में एक श्लोक है-
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥२.३.१४॥

  • जब मनुष्य प्रत्येक कामना से मुक्त हो जाता है तब वह अमर हो जाता है; वह यहीं, इसी मानव शरीर में ‘ब्रह्म’ का रसास्वादन करता है।
    इस त्याग की आवश्यकता को विवेकानन्द अपने गुरू रामकृष्ण के विचारों को एक विदेश में दिये भाषण में इस तरह कहा था- “However we may argue, however much we may hear, but one thing will satisfy us, and that is our own realisation; and such an experience is possible for every one of us if we will only try. The first ideal of this attempt to realise religion is that of renunciation. As far as we can, we must give up. Darkness and light, enjoyment of the world and enjoyment of God will never go together. “Ye cannot serve God and Mammon.” Let people try it if they will, and I have seen millions in every country who have tried; but after all, it comes to nothing. If one word remains true in the saying, it is, give up every thing for the sake of the Lord. This is a hard and long task, but you can begin it here and now. Bit by bit we must go towards it.”
    ब्रह्म एवं त्याग की महिमा से तो भगवत् गीता, रामचरितमानस सभी भरे पड़े हैं। भगवद्गीता के कृष्ण या रामचरितमानस के राम अवतार-रूप में‘ब्रह्म’ ही हैं- ‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना, मत्स्थानि सर्वभूतानि,..’(९/४), ‘सीयराममय सब जग जानी..’
    फिर कभी इस सन्दर्भ में विस्तार से लिखने की इच्छा है।
    पर इसके पहले सभी ऐसी इच्छा रखनेवाले व्यक्ति को यह पूरी दृढ़ निष्ठा रखनी होगी कि हमारे अन्त:करण में ही उस महत ईश्वर का निवास है, जो हमारी आत्मा ही है, जिसे उपनिषद ‘ब्राह्मण’, ‘पुरूष’, आदि कहता है एवं भगवद्गीता पुरुषोत्तम (अध्याय १५)में। अवतार रूप में गीता के कृष्ण और तुलसीदास के रामचरितमानस के राम भी वही हैं। हम अपने आत्म बल को समझे और उसकी शक्ति को इच्छित फल के लिये सभी बताये तरीक़े से पाने की किसी योग के रास्ते उपयोग करें, पर उसके पहले शरीर,मन एवं इन्द्रियों को पूरी तरह मज़बूत बनाने एवं जीतने के लिये सत्त्व गुणी बनने की चेष्टा करें। इसके बाद ही आप, किसी भी बताये तरीक़े से चाहे भक्तियोग हो या ध्यान योग या कर्मयोग- पूर्ण निष्ठा से चेष्टा करें। हमारे महान आध्यात्मिक गुरुओं ने चाहे गुरू नानक हो, या तुलसीदास, या फिर रामकृष्ण हों या विवेकानन्द, या फिर रमन महर्षि, सभीने यही किया। यही आत्मबल एवं एकनिष्ठ चेष्टा ही है कि दिव्यांग होने बाद भी, कृत्रिम पैर होने पर भी, एक साधारण महिला भी एवरेस्ट की चोटी पर पहुँच जाती है, और इसी तरह आज एवं पहले भी हज़ारों ने अपने अपने क्षेत्र में अविश्वसनीय कृतिमान बनाते या बनाये हैं।

प्रथम श्लोक के विषय को ध्यान में रखते हुए जीवन कैसे जिया जाये और उसका फल क्या होगा बताते हैं इस उपनिषद् के रचयिता ऋषि आगे दूसरे श्लोक में-
दूसरा श्लोक-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् सतं समाः
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२
श्लोक सन्धि-विच्छेद
कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेत् शत: समा।
एवं त्वयि न अन्यथा इत:अस्ति न कर्म न लिप्यते नरे॥२॥

  • दुनिया में, एक सौ साल जीने की इच्छा होनी चाहिए। केवल पहले श्लोक के निर्देशानुसार कर्म करने से यह सम्भव है। इस प्रकार, और न कि किसी अन्य तरीके से यह सम्भव होगा, कि उसके कर्म का फल उसके भविष्य के जीवन पर कोई अनिष्ट फल नहीं दे और इस तरह मनुष्य कार्यों के तनाव से मुक्त हो काम कर सकता है।
    (In the world, one should desire to live a hundred years, but only by performing actions. Thus, and in no other way, can man be free from the taint of actions.)

पहले श्लोक के निर्देश को स्मरण रख अगर उसी तरह आसक्त भाव से काम करते हुए आदमी अपनी सांसारिक जीवन भी जीता है- ‘कुर्वन् एव इह कर्माणि’, तब वह ‘जिजीविषेत् शत: समा’, सौ साल तक जीवन रहने की इच्छा रख सकता है।
इसे छोड़ कोई दूसरा रास्ता नहीं है, जीवन के कर्म से नहीं जुड़ने का। इसी विचार को गीता में कृष्ण(आत्मा)ने अर्जुन(ममत्व से जकड़ा शरीर को अलग समझने वाला) को अध्याय २ से ही उपदेश शुरू कर दिया करणीय कर्म के करने के ढंग का ‘योगस्थ कुरू कर्माणि, संग त्यक्त्वा’ से।
क्या हो सकता है किसी व्यक्ति के लिये इससे बेहतर निर्देश एक सत्-चित्त-आनन्द के लक्ष्य-भाव से दीर्घ ज़िन्दगी का? श्लोक कहता इस तरह अनासक्त भाव से से व्यक्ति कर्म से बंधता नहीं, ‘न कर्म लिप्यंते नरे’। यही केवल दूसरा अन्य कोई रास्ता ही नहीं है, ‘एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति’।

  • ईशोपनिषद के बाक़ी कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण श्लोकों के बारे में अगली बार…..किसी एक रविवार को…
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