ईशोपनिषद् और उसका महत्व -२

आत्मा की सर्वव्यापकता की स्थापना एवं इसकी वैश्विक ज़रूरत

ईशोपनिषद के तीन श्लोक पूरे विश्व के मनुष्य जाति को यह संदेश देते है जो ग़लत धारणा के कारण इस विश्व में लोगों को एक दूसरे से अलग बता घृणा, द्वेष, युद्ध, हिंसा, अमानुषिक अन्याय, प्रकृति का विध्वंस, यहाँ तक कि आत्महत्या या तथाकथित आत्मजनों की हत्या करने को मजबूर कर रहा है, उससे बचा जा सकता है, अगर हम इन श्लोकों पूरी तरह आत्मसात् कर ले। हम अपनी शक्ति एवं साधन अपने वैज्ञानिक ज्ञान से सुख शान्ति लाने का ग़लत ढंग से प्रयास करते जा रहे हैं। अगर मानव जाति अपने एवं अगली पीढ़ी को इन श्लोकों के महत्व को सीखा कर, समझा कर, मन में गहरे बैठा कर, एक नई तरह से आगे बढ़ने एवं जीवन जीने का प्रयास करें तो हम सदियों की ग़लतियों को सुधार सकते हैं।

पाँचवाँ श्लोक
उपनिषद का पाँचवें श्लोक में आत्मा का परिचय देते हुए कहते हैं ऋषि,’तत् उ सर्वस्य अस्य वाह्यतः’-वही हम सबके भीतर है और वही हम सबके बाहर भी है। अर्थात् एक ही आत्मा हम सब चर-अचर में व्याप्त है।क्या यह एक चिर नूतन सोच नहीं है उपनिषद् के ऋषि की, जो इस सबसे पुराने उपनिषद् में जो केवल अठारह श्लोकों का है,किया गया है?

अगर हर व्यक्ति इसे समझ अपने आचरण से विभिन्नताएँ की सोच को मिटा देता है तो उसका संसार के लिये के लिये जो लाभ होगा, उस पर ज़रा सोच कर देखिये। पूरे विश्व के मनुष्य,अन्य सभी तरह के जलचर वनस्पति,पेड़,पौधे,जानवर,पक्षी आदि सभी तरह के चर अचर में पूर्ण तालमेल बनने से हमारी यह धरती कितनी सुखमय, एवं शान्तिमय हो जायेगी।

ईशा उपनिषद् वही ज्ञान भरा संदेश श्लोक छठवें, सातवें के द्वारा दे रहा है..यही हमें अनावश्यक आक्रामक हिंसा को भी कम करने में सहायता करेगा, जिसके कारण कितनी प्रजातियाँ ख़त्म हो गई या होने के कगार पर हैं। हम अपने नये आविष्कृत उत्पादों को किसी के नुक़सान के लिये व्यवसायिक नहीं बनायेंगे।प्रदूषण कम होगा। और हम अपनी इच्छित चीजें भी पा सकते हैं।हमें नई आविष्कारों एवं निर्माणों में इस ज़रूरत का ख़्याल रखना ही होगा।

यस्तु सर्वानि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
जो सभी प्राणियों को अपने स्वयं के आत्मा के रूप में देखकर, मानकर सभी अस्तित्व की एकता का एहसास करता है, फिर उसे क्या मोह या दुख हो सकता है?
The man who realises himself as the Atman perceives also that he is one with all beings, that none is separate from him. Then who can hate whom?

जो आदमी खुद को आत्मा समझ लेता है वह यह भी मानता है कि वह सभी प्राणियों में से एक है, कोई भी उससे अलग नहीं है। फिर कौन किससे नफरत कर सकता है?
यह दृष्टिकोण सार्वभौमिक प्रेम और सेवा मुक्त है; प्रेम एक बाध्यकारी शक्ति है, जबकि घृणा अलगाव की भावना से आगे बढ़ती है। यह विचार, भारतीय विचार के अनुसार, आधुनिक और साथ ही प्राचीन, मानव के उच्चतम बिंदु को चिह्नित करता है।

सातवाँ श्लोक
पिछले श्लोक के उपदेश को बल देने के लिये है क़रीब क़रीब दुहराता सा है।
यस्मिन्सर्वानि भूतानन्यात्मैवभुद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
जब ब्यक्ति को पता चलता है कि सभी प्राणियों की आत्मा वास्तव में उसकी अपनी ही तरह की आत्मा हैं, वह पूरी तरह सृष्टि के सब में एक पूर्ण एकत्व (अपनापा) को देख,समझ लेता है। इस तरह के व्यक्ति के लिये न भ्रम के लिए कोई वजह जगह दिखता है और न दु: ख के लिए।

आगे एक इस ज्ञान को अगर कोई अपने व्यवहार में ला सभी में उसी आत्मा को देखने लगे तो उसे अमरत्व प्राप्त हो जायेगा जो हर की एकमात्र इच्छा होती है।
बहुत उपनिषदों में यह कहा गया है। यह केनोपनिषद् में है – तस्मात् धीराः भूतेषु भूतेषु विचित्य अस्मात् लोकात् प्रेत्य अमृताः भवन्ति॥२.५॥

  • ज्ञानीजन विविध भूत-पदार्थों में ‘उस’ एक आत्मा का विवेचन कर, इस लोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं।
    *
    कठोपनिषद् में भी यही कहा गया है-
    एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥२.२.९/१०॥
    समस्त प्राणियों में विद्यमान ‘अन्तरात्मा’ एक ही है परन्तु रूपरूप के सम्पर्क से वैसा-वैसा प्रतिरूप धारण करता है; इसी प्रकार वह उनसे बाहर भी है।
    *
    एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। २.२.१२
    -समस्त प्राणियों के अन्तर् में स्थित, शान्त एवं सबको वश में रखने वाला एकमेव ‘आत्मा’ एक ही रूप को बहुविध रचता है।
    *
    नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्‌।२.२.१३
    -अनेक अनित्यो में ‘एक नित्य’, अनेक चेतन सत्ताओं में ‘एक तत्त्व’ ‘एकमेव’ होते हुए भी जो बहुतों की कामनाओं का विधान करता है।
    कठोपनिषद में भी विस्तार से ३-४ श्लोकों में यह बताया गया है और अन्य उपनिषदों में भी- अग्नि, वायु, सूर्य के द्वारा दृष्टान्त देते हुए कहा है- ‘एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च’।

जो इसे पूरी समझ और अनुभव कर लेता है, जब में सबमें एक ही आत्मा को, तो किसी तरह का न नफ़रत का भाव रहता है, न कोई मोह होता है न शोक और शाश्वत सुख एवं शान्ति भरा जीवन जी सकता है।
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इस समानता को महसूस करने की क्षमता एक नागरिक के रूप में सामाजिक जागरूकता में अनुशासन द्वारा और एक आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में आवक अनुशासन द्वारा मानव मन में आती है। यह आज की शिक्षा मूल अंग होना चाहिये, एवं बहुत कम उम्र से ही बच्चों के दिल में बैठाना ज़रूरी है। यह अनुशासन धर्म है। वेदांत के अनुसार ब्यक्ति ‘निर्दोषी हिम समं, नादोṣयं हि सामं ब्रह्म’। उपनिषदों के अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति अस्तित्व की इस बुनियादी एकता के बारे में जागरूकता में लगातार रहता है, और फलस्वरूप वह अलगाव के भ्रम से मुक्त हो किसी से भी नफरत नहीं कर सकता है।

गीता में फिर इस विषय पर बार बार कृष्ण ने कहा है, इसी दृष्टिकोण की महिमा मानव जीवन को महिमान्वित कर सकती है। जीवन के कर्म के वृक्ष के बेहतरीन फल के रूप में है।
भगवद्गीता
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६.३०॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०.२०॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥१०.३९॥

‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च’- जो मेरा भक्त किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, समस्त प्राणियों के प्रति मित्रता और करुणा का भाव रखता है- भगवद् गीता १२.१३
‘यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः’-जिससे जगत् (जीव वर्ग) क्लेशित नहीं होता और जो जीवों से क्लेश का अनुभव नहीं करता।भगवद्गीता १२.१५

‘अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।…वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियों में विभक्त की तरह स्थित हैं….॥१३.१७॥

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२८॥
जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियों में परमेश्वर को नामरहित और समरूप से स्थित देखता है, वहीं वास्तव में सही देखता है।

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३.२९॥
क्योंकि सब जगह समरूप से स्थित ईश्वर को समरूपरूप से देखनेवाला मनुष्य अपने आप से अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिए वह परम गति को प्राप्त हो जाता है।

गीता में कृष्ण बार बार कहे, ‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि….आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है’, ‘क्षेत्रज्ञं चापि मा विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत…१३.३ ‘सम: सर्वेषु भूतेषु…’ १८.५४ ।
यहाँ तक तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस मानस में भी यह बात बताई नवधा भक्ति के संदर्भ में…’….सातवं सम मोही मय जग देखा।…’

अगर व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने स्वयं से अलग नहीं मानता है, और सभी प्राणियों के आत्मा के रूप में अपने स्वयं के आत्मा के ही रूप में देखता है, फिर इस विचार के अवधारणा के आधार पर,वह हम बनाई विविधता की समझ के कारण किसी से भी नफरत नहीं करेंगे, हिंसा, द्वेष मिट जायेगा, क्योंकि सबमें किसी तरह की विभिन्नताएँ रह ही नहीं जायेगी। एक नया आदर्श समाज और फिर सारी दुनिया भी वैसी ही हो सकती है।

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