भारत जातिय आधार पर जन गणना और संरक्षण

पता नहीं किस राजनीतिक दबाब से भारत सरकार जातिय आधार पर जनगणना कराने का निर्णय लिया। अबतक लगता था वर्तमान सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कल तक यह विचार नहीं था। मेरा बिचार इस पर अलग है। जातिय आधार पर कोई भेदभाव करना ही नहीं चाहिये। एक हिन्दू की तरह मैं अपना वर्ण बता सकता हूँ , पर जाति नहीं, क्योंकि इनके नाम का न ऐतिहासिक, न वैज्ञानिक कोई आधार  हैा परमहंस रामकृष्ण एवं विवेकानन्द की कहानी कहीं जाति को कोई मान्यता नहीं दी थी।  दक्षिणेश्वर मन्दिर बनानेवाली रानी रासमनि, माता पिता की जाति से शायद मल्लाह थी, रामकृष्ण ब्राह्मण, स्वामी विवेकानन्द कायस्थ। भारत के उदय को देखनेवाले उनको मानते है, देश विदेश में, क्योंकि राम कृष्ण मिशन देश विदेश में सनातन धर्म का आधुनिक युग में पताका फहराने वाली सनातन धर्म की एक बड़ी संस्था  है। अमरीकन और अन्य देश वाले बड़ी संख्या में हिन्दू बन रहे हैं। कल, अगर देश और यहां के समझदार लोगों नें ISKCON और रामकिशन मिशन को साथ दिया तो सनातन धर्म पूरे विश्व में ख़ुशी से ख़ुशी फैल जायेगा एक न एक दिन। सनातन धर्म सगुण राम, कृष्ण, रामकृष्ण आदि को भी मान लेगा और निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा को भी। जातियों का कोई आधार नही, क्योंकि वे केवल पेशे पर आधारित हैं और ये जातियां आती पीढ़ियों के नये नये पेशे के साथ बदलती गईं हैं और बदलती जायेंगी नये नये जीवन निर्वाह के धंधों के साथ, उसमें आजके भारत की सब जातियां समाहित हो जायेंगी। आप कोई भी एक कम्प्यूटिंग का काम करनेवालों को किस जाती का कहेंगी, उनके माता पिता की जाति का? क्या यह सामाजिक न्याय होगा। उसमें कौन कितना महीने में आमदनी करेगा वह जाति पर नहीं काम और काम जानने और करनेवाले की बुद्धि पर निर्भर करेगी। किसी रिजर्वेशन की जरूरत नहीं होगी, कम बेशी अर्जन के लिये जरूरी ज्ञान सबको उपलब्ध होगा। किस तरह यह आज की जाति आधारित जनगणना किस काम में सहायता देगी। 

भारत के राजनीतिज्ञों को अपनी विवेकशक्ति बढ़ाने की जरूरत है। जाति विशेष के होने से किसी का सम्मान नहीं बदलता। नहीं तो भक्ति काल के महापुरुष जाति के धर्म के बन के रह जाते महा पुरुष नहीं होते, पहले और आज की तरह पूजे नहीं जाते। 

यह केवल सठीक शिक्षा और विवेक ही है जो तुलसीदास, राम, कृष्ण, रविदास, कबीर, रसखान, मीरा, आदि को बराबर का सम्मान दिला रहा है, क्योंकि उन्होंने एक आदर्श रखा जो उनके मा-बाप की जाति के कारण नहीं आया था।आज कौन उनकी बंशवाली देख उनके बंशवालों को सम्मान देगा। किसी मौर्य को क्या चन्द्रगुप्त या अशोक का सम्मान मिलेगा?

संरक्षण सरकार की चीज है १५ साल के लिये था, राजनीति उसको ७५+ साल तक पोसती, संवर्धित करती रही है। बन्द करिये अपनी राजनीति, नहीं तो देश नहीं बचेगा। सब क्षेत्रों में विश्वगुरु, अग्रणी बनने दीजिये राष्ट्र को। लोगों को तोड़िये मत, जोड़िये, गाँव गाँवों में जाकर ज्ञान अर्जन, नवाचार, हुनर की अलख जगाईये झोपड़ी झोपड़ी तक ….यही विवेकानन्द का सपना था विश्वगुरु बनाने का भारत को… आइये इस यज्ञ में आहुति दें अमर बनिये। 

मेरे देश के गेरुआ, या सफेद या अन्य वेशधारी भी इस बात को समझे और समझाये। वे बताये सनातन धर्म क्या है सरल भाषा में। हमारे शास्त्र गीता, रामचरितमानस कहते हैं- 

१. एक ब्रह्म परमात्मा पूरे संसार में व्याप्त है- गांधी का प्रिय ईशोपनिषद का पहले श्लोक की पहली पंक्ति कहती है- 

१अ. ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।

-जगत्यां यत् किं च जगत् अस्ति इदं सर्वम् ईशा वास्यम्। यह सबका सब ईश्वर के आवास हैं- पूरे संसार के हर हर कण में ईश्वर का निवास है।

गीता (७.७) कहती है- मत्तः परतरं न अन्यत् किञ्चित् अस्ति धनञ्जय । मयि सर्वम् इदम् प्रोतम् सूत्रे मणिगणाः इव ॥

-मेरे सिवाय दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी नहीं है। जैसे सूत की मणियाँ सूत के धागे में पिरोयी हुई होती है, ऐसे ही यह सब संसार मुझमें ही ओतप्रोत है।

२. तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः। इस सबके भीतर है और इस सबके बाहर भी है।

३ यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सतेद॥परन्तु जो सभी भूतों  को परम आत्मा में ही देखता है और सभी भूतों या सत्ताओं में परम आत्मा को, वह फिर सर्वत्र एक ही आत्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के पश्चात्, किसी से कतराता नहीं, घृणा नहीं करता।

गीता कहती है-६.३२ आत्मा-उपम्येन सर्वत्र समम् पश्यति यः अर्जुन । सुखम् वा यदि वा दुःखम् सः योगी परमः मतः ॥

-जो भक्त अपने शरीर की तरह सब जगह सबमें मुझे समान देखता है, वह परम योगी है।

४. पूरी की पूरी गीता इन दोनों सनातन दर्शन से भरी है। तुलसीदास जी ने उन्हीं भावों लोकभाषा में गाया है। पर हम इन दोनों दुनिया हर वर्ण, रंग, कदकाठी के लोगों को जोड़नेवाले सत्यों को लोगों को समझाये दुनिया प्रेममयी होगी। 

पर दुनियाभर के लोगों को लम्बी चौड़ी रसभरी कथाएं सुनाते रहते हैं सैकड़ों तथाकथित संतों, महात्माओं, गुरुओं आदि नाम से जानने वाले लोग।  

मैं सभी उत्सुक लोगों इन दो बातों के महत्व को समझाने के लिये प्रस्तुत हूँ जो विविधता में एकता की बार बार बात कर हमें परमात्मा-प्रदत्त शाश्वत सुख और शान्ति के पास पहुँचाने का मंत्र बताते है।

बहुत पंथ बन चुके, बहुत भाषाएं, बहुत मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर बन गये, अब उनकी जरूरी नहीं। अब आई.आई.टी चाहिये, आई. आई.एससी चाहिये, ISRO चाहिये।यही मौक़ा है, सही मौक़ा है। शिक्षा विशेषकर उत्तर भारत के प्रदेशों में बहुत सुधार की जरूरत रह है।शिक्षा के साथ हुनर सीखाने की जरूरत है, नहीं तो नौकरियाँ कहाँ मिलेंगी। सरकार में राजनीतिक कारण से लोगों को सरकारें भरती जा रही है, जो गलत है, बेकार का खर्चा है।

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डा. राजेन्द्र प्रसाद, भारत के प्रथम राष्ट्रपति

मैं १९५५-५७ में बंगाल में स्कूल फ़ाइनल के बाद में दो साल प्रेसीडेंसी कालेज में विज्ञान में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट किया। मुझे वहीं हिन्दू हॉस्टल में रहने का सौभाग्य मिला।वहीं मुझे कुछ देश के विभिन्न क्षेत्रों महान हस्तियों से मिलने का अवसर मिला। उनमें दो लोगों की जानकारी पहले से थी अत: मेरी श्रद्धा अगाढ थी। उनमें प्रथम स्थान पर डा. राजेन्द्र प्रसाद हैं, इसके पहले मैं अपने स्कूल की तरफ से बंगाल के राज्यपाल डा. कैलाशनाथ काटजू से हावड़ा रेलवे पर। हमारा एक घाटशिला में कैंप उसमें हम जा रहे थे और हिन्दी भाषाभाषी शायद मैं ही था। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से आशीर्वाद दिया था।

डा. राजेन्द्र प्रसाद को कालेज के लोग उनकी इच्छा पर हिन्दू हास्टल लाये होंगे, जहाँ वे वर्षों रहें। उनका नाम खुदा एक प्लेक भी वहाँ लगा है गेट पर। हम तब तक इतना ही जानते थे कि बिहार, ओड़िसा, पूरे बंगाल, आसाम आदि का एक ही संस्था थी जो मैट्रिक की परीक्षा का आयोजन करती थी और वे उस परीक्षा में सर्वप्रथम आये थे। बाद में भी वे प्रथम ही रहे।

मैंने जब उनसे कहा था ‘ बंगाल में त कौनो जातपात नइखे, एके संगे सब खा ला मेस में। उन्होंने जबाब दिया और हाथ उठा गेट पर से ही बताये कि ‘ना बाबु, देख ओह ओरे हमरा समय, कायस्थ, ब्राह्मण, आदि के अग़ल-अलग अलग-अलग रसोइया खाना बनाने ख़ातिर रहन।’ फिर वे वापस लौट गये समय की कमी के कारण।उसके बाद उनकी अपनी लिखी उनकी आत्मकथा भी पढ़ा और उनके बारे में समाचारों को चाव से पढ़ता रहा। जब नेहरू की उनके प्रति अवहेलना दिखाने की बात पढ़ा सुना बड़े होकर। मुझे लगता है नेहरू की हीनभावना ही रही कि वे अपने सब राजनैतिक साथियों के साथ दुर्व्यवहार किये। वे अपने बच्चों को छोड़ और किसी राजनीति के साथियों के बच्चों के भविष्य या परिवार के बारे में साथ उदासीन रहें और भाग्य भरोसे छोड़ दिया। अपने और अपने परिवार को देश का मालिक बनाकर रखा मरते तक और वह सब कर गये कि कोई दूसरा कोई उनकी तरह बन न पाये। उसी का फल है किनकी तिसरी पीढ़ी भी राजनीति में बिना किसी योग्यता के देश के राजनीतिक परिवारों में सबसे ज्यादा फ़ायदा उठा रही है। किस देश में एक परिवार का तीन तीन व्यक्ति सांसद है और उन पर करोड़ों का साल में खर्च होता है। स्वाधीनता की लड़ाई के महान कांग्रेसियों के बच्चों का कोई नाम भी नहीं जानता।कैसा चक्कर चलाया गया है और उदाहरण प्रस्तुत किया गया है मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू के चलते इस परिवार द्वारा और बाक़ी सब बैठे दूर से तमाशा देखते रहे और इतिहास के पन्नों से ग़ायब हो गये।

डा. राजेन्द्र प्रसाद पहलीअन्तरिम सरकार में खाद्य मंत्री थे। संविधान गठन होने पर डा. राजेन्द्र प्रसाद उसके चेयरमैन थे।उनकी अद्वितीय याददाश्त के बहुत क़िस्से हैं। एक दिन कुछ संविधान में पारित विषयों के काग़ज़ खो गये थे। जब उन्हें पता चला तो वे सेक्रेटरी को बुलाये और उसको लिखने को कहा। वे बोलते गये पूरा निर्णय और वह लिखता गया। फिर जब वे काग़ज़ किसी तरह मिल गये तो पता चला कि वे पूरी तरह से वही हैं जो राजेन्द्र बाबू ने लिखवाया था। एक दूसरी घटना कि कहानी भी मैंने अपने कालेज के दिनों में सुनी थी किसी अध्यापक ने उनके किसी परीक्षा के सवालों के जबाब को देख लिखा था, ‘ The examinee is better than the examiner.’ खैर इसमें कोई संदेह नहीं कि डा. राजेन्द्र प्रसाद का व्यक्तित्व एक महान था। उन्होंने कुछ किताबें भी लिखीं हैं अपनी जन्म कथा को छोड़ कर, जिसमें उस समय के देश की खाद्यान्न की समस्या पर थी, जिसकी बड़ी सराहना हुई थी।

मैंने मोदीजी को एक ट्वीट भी किया था उनकी पौत्री को यूट्यूब पर सुनने के बाद।
@narendramodi श्रद्धेय मोदीजी, मुझे और शायद देश के सब लोगों को दुख होगा डा. राजेन्द्र प्रसाद की पौत्री के इस पत्रकार के साक्षात्कार की बात सुनकर, मैं सोचता था आप अलग होंगे। भगवान का आशीर्वाद आप पर बरसता रहे, सुनिये …Dr. Rajendra Prasad की पौत्री का वीडियो https://youtu.be/J9VS-qIjo7o?si=@

पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे सुनें और सुनायें और जो आवाज़ उठा सकते हैं या जो भी कुछ कर सकते हैं वे करें।बिहार तो ऐसे ही मतलबी व्यक्तियों का सामाज है जहाँ लोग अपने परिवार को नहीं समझते अपने स्वार्थ के आगे। ऐसी बातों के लिये किसके पास समय है।

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भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य

भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य
आजकल तीन किताबें पढ़ रहा हूँ, जिनके जिनके शीर्षक साथ के फ़ोटो में है।
पहली William Dalyrymple की पुस्तक The Golden Road- कैसे प्राचीन भारत दुनिया को बदल दिया था-प्राचीन भारत के ज्ञान – विशेषकर गणित और विज्ञान में और उनपर आधारित विभिन्न इन्जीनियरिंग क्षेत्र को। https://www.dawn.com/news/1866423
https://openthemagazine.com/lounge/books/there-was-a-whole-world-in-the-ancient-caves-in-the-deccan-says-william-dalrymple/

दूसरी किताब एक अद्भुत व्यक्ति पर है जो देश के एक प्रदेश का लगातार तीन बार मुख्य मंत्री बन सबसे विकसित प्रदेशों की श्रेणी में ला दिया।और वही क्रम देश के स्तर ११+ साल से चल रहा है। यह एक अपने क्षेत्रों के बहुत से धुरंधर व्यक्तियों ने लिखा है।
तीसरी किताब विकसित भारत@२०४७ का रोडमैप है देश के एक मुख्य अर्थनीति सलाहकार द्वारा लिखी गई और देश विदेश में सराही जा रही है। (दूसरी पुस्तक हमें श्री शुक्लाजी के सौजन्य से पढ़ने को मिली, जब मैं अचानक उसको ख़रीदने की उनसे चर्चा कर रहा था।दूसरी दोनों को मैंने अमाजन से मंगाया।यह कविता कल अचानक निकल आई ….
विकसित भारत@२०४७
चारों तरफ़ जब आवाहन है
विकसित राष्ट्र बनाने की
जाति जाति की बातें करते
कब तक समय गवांओगे?
पढ़ो पढावो हूनर सिखाओ
सब कुछ हमें बनाना है
नहीं रहेंगे निर्भर पर पर
जग को यह दिखलाना है।
हम्हीं खिलायेंगे सब जग को
हम ही स्वस्थ बनायेंगे।
आपद विपदा में जग की
हम ही सदा तत्पर रहते।
नहीं किसी के झाँसे में आ
हम अब भविष्य गवायेंगे।
आगे आओ हाथ बढ़ाओ
साथ साथ मिल चलना है।
दूर खडी माँ हाथ उठाये
आश लिये ‘कब?’आँखों में
हमको गोद उठाने को..
आशीष पा रहे निकलो आगे
सब घर स्वर्ग बनाने को।
भारत माँ एक आश लिये है
जिसे समझना ही होगा-
’राम आ गये अब अपने घर ..
‘राम राज्य‘ लाना होगा।
विकसित भारत ध्येय देश का
जन जन तक जाना होगा।
और परिश्रम चरमसीमा तक
हम सबको करना होगा।

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दिल्ली और आसपास के इलाक़े की दुर्दशा


आज यह इलाक़ा राजनीतिक दृष्टि से देश के सभी नगरों से महत्वपूर्ण है। यह देश की राजधानी है, दुनिया की राजधानियों में सबसे पुरानी भी क्योंकि यहीं पुराने क़िले के नीचे महाभारतकाल के पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ थी, जो अनूठे तरह के भवन निर्माण की कला से युक्त थी महाभारत काल में। उस समय के राजमहल के अद्भुत निर्माण कला के कारण नगर के साम्राज्य की रानी का एक वाक्य महाभारत का युद्ध का कारण बन गया। उसके बाद भी पृथ्वीराज के समय से आजतक भारत की राजधानी है। यहां बसनेवाले ही दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश चलाते हैं, जिसका नाम आज पूरे दुनिया में डंका बजा रहा है। दिल्ली और उसके उसके आसपास के शहर- गुरूग्राम, नोयडा, ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद देश के सबसे बड़े औद्योगिक केन्द्र भी हैं। देश का सबसे समृद्ध लोग भी रहते हैं और हमारे तरह के बृद्ध भी। यहां पर विज्ञान और इंजीनियरिंग के भी सबसे बुद्धिमान लोग भी रहते हैं और देश के सभी धनवानों के वासस्थान भी हैं।
पर कितना दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था इस जगह की यहाँ प्रदूषण स्तर दुनिया के सबसे भयानक स्तर का है और वह सब मानवीय कमज़ोरियों और उनके मनमाने व्यवहार के कारण है। और हम मूक द्रष्टा हैं। यहाँ के कोई वैसे व्यक्ति जो कुछ कर सकते हैं, वे मौन साधे बेबस लाचार अपने अपने घरों में बन्द जीवन यापन कर रहे हैं। शायद उन्हें पता नहीं कि कब उनकों यहाँ के किसी अस्पताल में जाना पड़ सकता है।
कैसे हम या हमारी तरह के लोग लोग जियें इस अवस्था में। कम से कम मैंने तो ज़िन्दगी में कभी यह सोचा नहीं था। प्रदूषण की मात्रा ४००-५०० में है और हमारे कर्णधारों में कोई जाति आधारित जनगणना कराने की लड़ाई लड़ रहा है और कोई एक देश, एक चुनाव- कराने का क़ानून बनाने में। जो पढ़ा लिखा कहाने वाला सालों से शासक है वह अगले चुनाव जीतने में लगा है जेल से निकल।
क्या बिडम्बना है और क्या इससे निकलने का उपाय? मैंने तो यहाँ से बाहर न जाने का प्रण किया हुआ, तो फिर क्या करूँ गीता में ही मन लगाता हूँ । जब तक यमुना थी तो उनकी देखभाल में दिन निकल जाते थे, पर अब वह व्यस्तता भी ख़त्म हुए साल होने को आये। क्या क…? कौन सुनेगा? शायद सर्व शक्तिमान!

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Modi’s 11 Resolutions for Countrymen 

Modi’s 11 Resolutions for Countrymen 

The 11 resolutions should guide both citizens and the government in building a stronger and more inclusive nation.

Modi appealed for collective efforts and commitment to constitutional values to be made essential for national progress.

The first resolution- Let every individual perform their duties. “Be it individuals or the administration, everyone must adhere to their responsibilities.”

The second resolution-a  call for inclusive development across all regions and communities, encapsulated in the philosophy of ‘sabka saath, sabka vikas’.

The third resolution- A pledge of zero tolerance towards corruption, underscoring the need for society to reject corrupt individuals. “There should be no social acceptance of those involved in corruption.”

The  fourth resolution- Instill pride in the country’s laws and regulations among citizens, ensuring that they reflect the nation’s aspirations.

The fifth resolution-  Every Indian must break free from colonial mindset and foster pride in India’s heritage and legacy.

The sixth resolution called for an end to dynastic politics and promoting meritocracy over nepotism in governance.

The seventh resolution highlighted the importance of respecting the Constitution in the seventh resolution and urged that the guiding document should not be misused for political gains.

In the eighth resolution, the prime minister assured that reservations granted to marginalised communities would not be taken away and strongly opposed any attempts to introduce religion-based reservations.

The ninth resolution proposed an envisioned India as a global example in women-led development, promoting gender equality and leadership.

The tenth resolution stressed on the mantra of national development through regional growth, emphasising the symbiotic relationship between state and national progress.

The eleventh and final resolution underscores the vision of ‘Ek Bharat, Shrestha Bharat’, fostering unity and national pride.

देशवासियों के लिए मोदी के 11 संकल्प

मोदी ने राष्ट्रीय प्रगति के लिए सामूहिक प्रयासों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को आवश्यक बनाने की अपील की है- लोकसभा में। 

पहला संकल्प- प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। “चाहे वहआम व्यक्ति हो या प्रशासन का हिस्सा, सभी को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए।”

दूसरा संकल्प- सभी क्षेत्रों और समुदायों में समावेशी विकास हो, जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ के दर्शन में समाहित है।

तीसरा संकल्प- हम भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता की प्रतिज्ञा करे , समाज द्वारा भ्रष्ट व्यक्तियों को अस्वीकार करने की आवश्यकता को समझे अपने निर्णयों में। “भ्रष्टाचार में शामिल लोगों को कोई सामाजिक स्वीकृति न मिले। “

चौथा संकल्प- नागरिकों में देश के कानूनों और नियमों के प्रति गर्व पैदा हो करना, और सबको सुनिश्चित करें कि वे राष्ट्र की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करते हैं।

पांचवां संकल्प- प्रत्येक भारतीय को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होना चाहिए और भारत की विरासत पर गर्व करना चाहिए।

छठे संकल्प- ‘वंशवादी राजनीति को समाप्त करना और शासन में भाई-भतीजावाद की बजाय योग्यता को बढ़ावा देना’ देश और सभी नागरिक का लक्ष्य होना चाहिये। 

सातवाँ संकल्प-हम  सभी संविधान का सम्मान करने के महत्व को समझे और राजनीतिक लाभ के लिए संविधान की तरह के मार्गदर्शक दस्तावेज का दुरुपयोग नहीं करें। 

आठवें प्रस्ताव में, प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया और दूसरों से भी आश्वासन चाहा कि हाशिए पर पड़े समुदायों को दिए गए आरक्षण को नहीं हटाया जाएगा और धर्म आधारित आरक्षण शुरू करने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध किया जायेगा।

नौवां प्रस्ताव- महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को एक वैश्विक उदाहरण के प्रस्तुत किया जायेगा। भारत को इस परिकल्पना को बल देना चाहिये,  जिसमें लैंगिक समानता और नेतृत्व को बढ़ावा दिया जा रहा है।

दसवाँ प्रस्ताव- क्षेत्रीय विकास के माध्यम से राष्ट्रीय विकास के मंत्र पर जोर दिया जाय, जिसमें राज्य और राष्ट्रीय प्रगति के बीच सहजीवी संबंध पर जोर होना चाहिये। 

ग्यारहवें और अंतिम प्रस्ताव में एकता और राष्ट्रीय गौरव को बढ़ावा देते हुए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया।

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भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य

आजकल तीन किताबें पढ़ रहा हूँ।

पहली William Dalyrymple की पुस्तक The Golden Road- कैसे प्राचीन भारत दुनिया को बदल दिया था-प्राचीन भारत के ज्ञान – विशेषकर गणित और विज्ञान में और उनपर आधारित विभिन्न इन्जीनियरिंग क्षेत्र को। 

दूसरी किताब एक अद्भुत व्यक्ति पर है जो देश के एक प्रदेश का लगातार तीन बार मुख्य मंत्री बन सबसे विकसित प्रदेशों की श्रेणी में ला दिया।और वही क्रम देश के स्तर ११+ साल से चल रहा है। यह एक अपने क्षेत्रों के बहुत से धुरंधर व्यक्तियों ने लिखा है।

तीसरी किताब विकसित भारत@२०४७ का रोडमैप है देश के एक मुख्य अर्थनीति सलाहकार द्वारा लिखी गई और देश विदेश में सराही जा रही है। (दूसरी पुस्तक हमें श्री शुक्लाजी  के सौजन्य से पढ़ने को मिली, जब मैं अचानक उसको ख़रीदने की उनसे चर्चा कर रहा था।दूसरी दोनों को मैंने अमाजन से मंगाया।यह कविता कल अचानक निकल आई ….

विकसित भारत@२०४७

चारों तरफ़ जब आवाहन है 

विकसित राष्ट्र बनाने की

जाति जाति की बातें करते

कब तक समय गवांओगे?

पढ़ो पढावो हूनर सिखाओ 

सब कुछ हमें बनाना है

नहीं रहेंगे  निर्भर पर पर 

जग  को यह दिखलाना है।

हम्हीं खिलायेंगे सब जग को

हम ही स्वस्थ बनायेंगे।

आपद विपदा में जग की

हम ही सदा तत्पर रहते।

नहीं किसी के झाँसे में आ

हम अब भविष्य गवायेंगे।

आगे आओ हाथ बढ़ाओ 

साथ साथ मिल चलना है।

दूर खडी माँ हाथ उठाये

आश लिये ‘कब?’आँखों में

हमको गोद उठाने को..

आशीष पा रहे निकलो आगे

सब घर स्वर्ग बनाने को।

भारत माँ एक आश लिये है 

जिसे समझना ही होगा-

’राम आ गये अब अपने घर ..

‘राम राज्य‘ लाना होगा।

विकसित भारत ध्येय देश का 

जन जन तक जाना होगा।

और परिश्रम चरमसीमा तक 

हम सबको करना होगा। 

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राहुल गांधी- विकृत सोच

राहुल गांधी- विकृत सोच
अचानक ही एक उम्र जनित गलती के कारण मैं कल फिर राहुल गांधी का नेता विपक्षी की तरह दूसरी बार लोकसभा को सम्बोधित करते सुना। मन में एक बड़ा प्रश्न आया। उन्होंने माता पिता से क्या सीखा है और जिस माहौल में बढ़े हैं वह क्या ऐसा ही व्यक्तित्व गढ़ता है? राहुल गांधी को पिछले कुछ समय से प्रशिक्षित करनेवाले किस तरह के लोग हैं? राजगद्दी पर बैठने के लिये वे ऐसे झूठ और ग़लत रास्ते का सहारा ले रहे है। जिससे यह लगता है कि उन्हें इस देश और उसके लोगों का रत्तीभर भी ख़्याल नहीं है।
आज पचास से ऊपर की उम्र में ऐसी अपरिपक्वता पता नहीं उन्हें गद्दी दिलायेगी या नहीं, पर एक बात तय है कि हिन्दू समाज का सत्यानाश हो जायेगा।
पिछले सालों का जाति प्रथा को हिन्दू समाज से मिटाने का मोदी सरकार एवं आर.एस.एस के भागवत का प्रयास मिट्टी में मिल जायेगा। देश में अराजकता फैल जायेगी। कैसे हज़ारों जातियों में बंटे जनसंख्या से सभी जातियों से सभी पदों पर उनकी संख्या के प्रतिशत के आधार पर हर लेवल पर लोग हो सकते है?
राहुल आजकल हिन्दू धर्म के देवों के ब्रह्म रूपों के बारे में विना किसी सनातन धर्म के ग्रंथों के ज्ञान के बातें कर रहे हैं। कहीं कहाई या सुनी सुनाई बातों को तर्क में देना वैसे ही है जैसे मेरे अपने एक बाबा को मैं समझा नहीं पाया की धरती घुमती है। पर हिन्दू धर्म के ग्रंथों को सभी ध्यान से पढ़ने की ज़रूरत और उसका संदर्भ लें बोलने के वक्त उसका सत्य भाव से रखना जरूरी है नहीं तो अनर्थ हो जायेगा। हिन्दू धर्म और संविधान का विना किसी प्रौढ़ता का हवाला देना बहुत नुक़सान करता रहेगा आज डिजीटल मीडिया के सार्वभौमिक उपलब्धता के कारण। राहुल न शिव के बारे में जानते, न महाभारत के, न कृष्ण, न राम के। अगर नहीं जानते तो ग़लत मनगढ़ंत चीजों को न कहें। बहुत बवाल हो सकता है । हिन्दू धर्म और उनके श्रेष्ठ सगुन नाम को ले, आगे बात न करें।
राहुल गांधी को इस रास्ते हटना चाहिये। यह विजातीय रास्ता है। पता नहीं सुनहरे भारत, विकसित भारत की परिकल्पना ऐसी राजनीतिक स्थिति में संभव हो पायेगी। शायद नहीं, जो सभी विदेशी शक्तियाँ चाहती हैं।

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मैनुफ़ैक्चरिंग- मेरा जीवन, मेरा देश


एलान मस्क (Elon Musk) युगान्तरकारी टेस्ला ईवी गाड़ियों के लिये प्रसिद्ध हो गया, वह स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से है। भारत अगर आई. आई. टी आदि देश के जाने माने इंजीनियरिंग कालेजों से अगर अमरीका के एलान मस्क, स्टीव जॉब्स आदि की तरह का इंटरप्रेनर और इनोभेटर पैदा करना चाहती है तो मेरे विचार हमारे कालेजों के भर्ती से ले पढ़ाने के तरीक़े में आमूल परिवर्तन करना होगा। इसके लिये इन सभी कालेज के डायरेक्टरों को अच्छे फैक्लटी की सलाह से बदलाव लाना होगा। यह सरकार का निर्देश हो सकता है, सरकार आर्थिक सहायता दे सकती है अगर चाहे। पर करना इन इंस्टीट्यूट के शिक्षाविदों को ही होगा।


दो विशेष कमियाँ मेरी नज़र में हैं अपने अनुभव के अनुसार और आधार पर-
१. भर्ती के लिये चिन्हित विद्यार्थियों की स्वाभाविक रूचि को जानना जरूरी है जो आज नहीं होता- मैं १९५७ में खडगपुर आई.आई. टी प्रवेश परीक्षा से होकर गया था। उस समय भी ४०,००० परीक्षा देते थे। पर भर्ती होने के पहले मुझे मेकेनिकल ब्रांच के लिये चार प्रोफ़ेसरों के एक इंटरव्यू में यह बताना पड़ा था कि मुझे मेकेनिकल में क्यों भर्ती चाहिये, मेरी इसकी रूचि का कारण क्या है? मैंने उत्तर दिया कि मैं जहां मैट्रिक तक का शिक्षा पाया, वह देश का जाना माना जूट मिल था, जहां एक कोयले से चलने वाला अच्छा ख़ासा पावर हाउस भी था और जूट उद्योग मशीनें अलग से। मैं वहाँ के चीफ़ इंजीनियर को मिलते सम्मान से प्रभावित था, स्कूल में कक्षा में प्रथम होते रहने के चलते मिला भी था। वहाँ हुगली नदी में एक जेटी थी जहां दो क्रेन भी थे जो बड़े वोटों से सामान उतारते थे।मैं अकेले जेटी पर हर शाम हुगली नदी को निहारता रहता था। इसका हमारे मेकेनिकल इंजीनियर बनने में बहुत हाथ था। मैंने क़रीब पंद्रह बीस मिनट इस विषय पर इंटरव्यू लेनेवालों को बताया और शायद इसी कारण मुझे वह विभाग मिल गया।


२. पर पूरे चार की पढ़ाई में मज़ा हमें चौथे साल में ही आया जब हमारे तीन प्रोफ़ेसर अमरीकन यूनिवर्सिटी के आये और उनसे पढ़ने का सौभाग्य मिला। आश्चर्य कि बात यह हुई कि चौथे साल के जिस सेमेस्टर में वे पढ़ाये मैं क्लास में औवल हो गया। मुझे उनके सिवाय शायद ही किसी प्रोफ़ेसर की कक्षा में पढ़ाये चीजों की पूरी समझ हुई और उनके औद्योगिक उपयोग की कोई जानकारी हुई।
मैं बराबर अपने तीनों बच्चों और अन्य दोस्तों को कहता रहा कि खडगपुर के पूरे चार साल में मैं शायद ही कुछ इंजीनियरिंग सीखा। जो कुछ भी इंजीनियरिंग सिखा वह हिन्दमोटर के कारख़ाने काम करते करते सीखा और इतना सीखा कि पूरे उद्योग में लोग जाने। मैंने आज के टाटा मोटर्स के इंजीनियरों को कुछ विषयों पर बताने के लिये बुलाया गया। इंजीनियरिंग की किताबें भी लिखीं जिन्हें उद्योगों ने मेरे माँगे दाम पर ख़रीदा। आज भी वह एक मेरी रूचि का अंश है।


३. मेरे ख़्याल से सभी इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को अपने रूचि के जाने माने उद्योग में चारों साल ट्रेनिंग अनिवार्य होना चाहिये। उन्हें मन लगा कर उद्योगों की ज़रूरतों को समझना चाहिये, वैसे ही ज्ञान अर्जन भी करना चाहिये। वहाँ के बड़े इंजीनियरों को अपने मिहनत प्रभावित करना चाहिये। नौकरी पहले ही पक्की हो जायेगी। उद्योगों एवं इंजीनियरिंग में बहुत ज़्यादा तालमेल होना चाहिये।


४. आज बदले परिवेश में प्रोजेक्ट के जरूरी धनराशि का प्रबंध इतना आसान है तो फिर स्टार्ट अप न बना नौकरी क्यों? सभी आई आई टी के लड़कों की तरह मिहनत करनेवाले भी नारायनमूर्ति, धीरूभाई अम्बानी, या गौतम आदानी बन सकते हैं। सोचिये क्यों नहीं आयेंगी और बढ़ेगी मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग और हम क्यों नहीं चीन को मात दे सकते हैं बिना युद्ध किये।


मुझे दुख होता है कि मेरे तीनों मेकेनिकल इंजीनियर बेटे अपने को आई. टी उद्योग के बन गये अमरीका जा, जब सबको इसी देश के मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग मे। मुझसे अच्छा जॉब मिला था। वे अमरीका में एम.एस किये और फिर वही नौकरी करने लगे।बाद एक ने एक ने आई.टी का छोटा कम्पनी स्थापित किया और वह और उसकी पत्नी कुछ भारत के लोगों भारत में नौकरी दे काम करवाते हैं।


इससे उनके मैनुफ़ैक्चरिंग पढ़ने का कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ। यही कारण है कि हमारा देश मैनुफ़ैक्चरिंग में फिसड्डी बनता गया १९९० के बाद से और देश चीन के दबाब में है।


उद्योगपति इस बात को समझते नहीं, उन्हें तो सस्ते सस्ते लोग चाहिये जो देश में बहुतायत से हैं। बहुत निम्न से अतिश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कालेज हैं। हमारे देश के इंजीनियरों ने आई. टी उद्योग में देश के लिये नाम तो कमाया, पर दूसरी तरफ़ करोड़ों को काम देनेवाला उद्योग नहीं स्थापित कर सके।चीन की तरह का सोच रख कर ही हम उनकी बराबरी कर सकते हैं और हो सकता है कि आगे भी जा पहुँचे। क्या सरकार और प्राइवेट सेक्टर मिल कर यह सुविधा प्रदान कर सकते हैं कि देश का ९५% व्यक्ति – पुरूष और स्त्री दोनों किसी न किसी या एक से हुनर में प्रशिक्षित हो
यह विषय बहुत विशद है । और विना समझे बनाये गये व्यापारिक धंधों से लाभ को प्राथमिकता दे, एक छोटा वर्ग तो ज़रूरत से ज़्यादा सम्पन्न हो सकता है, पर अधिकांश जन वर्ग नहीं…यह समझना और मेरे बताये रास्ते पर चल ही देश का कल्याण होगा। दुख है कि जो यह कर सकते हैं उनके मन में यह विचार नहीं और मुझमें ८५ साल की उम्र वह ताक़त नहीं मैं उन लोगों से मिलने का प्रयास करूँ और अपने मत को समझाऊँ । क्या कोई मेरा मदद कर सकता है? मेरे पोस्ट कोई भी किसी तरह से उपयोग कर सकता है, अगर इससे देश का लाभ हो।
मेरी पूरी कहानी उपलब्ध है http://www.drishtikona.com पर …

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प्रशान्त किशोर बचा, बढ़ा सकते हैं पर रास्ता बदल


(गलती माफ़ करें, उसे ठीक ले, इस उम्र में अब इस में ज़्यादा का इजाज़त नहीं देता)
प्रशान्त किशोर चुनाव जिताने के धंधे से आगे बढ़ अब बिहार की राजनीति में आने का उपक्रम कर रहें हैं। गांव गांव घूम आम वोटरो के सोच की ग़लतियों को बता रहे हैं। वह यह मान कर चल रहे हैं कि बिहार के लोगों की बदहाली में वहाँ के लोगों का कोई दायित्व नहीं है और सब कुछ सरकारों की गलती है। अगर गुजरात में बिहार का बैंक में जमा धन जा रहा है, इस दुरवस्था से उबरने का उन्हें और शायद सभी बिहारियों को दुख है, उसके लिये बिहार में रहनेवाले या बिहार के बाहर रहनेवाले लोग ही ज़्यादा बड़ा कारण हैं।

उदाहरण के लिये अब गाँव गाँव में स्कूल बने हैं, शायद उनमें अन्य ज़रूरी व्यवस्था जैसे पुस्तकालय, मैदान के साथ खेलकूद का सामान, अब तो कुछ स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब आदि भी हो सकता है। पर बिहार के लोगों में शिक्षित होने की अरूचि और गलत या सही ढंग से परीक्षा पास की प्राथमिकता को कौन हटा सकता है। ऐसी स्थिति में वहाँ की शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाना और हुनर प्रशिक्षण पर बल देना, अभिभावकों की, गांव में रहनेवाले पढ़े लिखे लोगों का शिक्षकों से मिलना और उनकी सहायता माँगना जरूरी तरीक़ा है। इसके बिना बिहार किसी तरह से सम्पन्न नहीं हो सकता। प्रशान्त किसोर जी को इन सबके बारे में आम लोगों में जागृति लानी होगी। आज सरकार से सब तरह की सुविधाएँ दी जा रहीं है, उनका सब तक पहुँचाने की सफलता को संभव बनाने के लिये गांव के ही जागरूक युवकों को बिना किसी लाभ की सोचे, काम करना होगा। गांव गाँव में ऐसे लोगों का पाँच दस लोगों का एक दल भी यह कर सकता है थोड़े प्रशिक्षण के बाद।

गांव के पंचायत के प्रबुद्ध लोग स्कूल परिसर और वहाँ के साधनों का व्यवहार कर गांव के हर उम्र के लोगों को साल भर छुटूटी के दिन या महीनों में अनेक तरह के शिविर लगवा सकते हैं और अपने गांव को शिक्षित और प्रशिक्षित सकते हैं। वहाँ के फैलते हुए नशाखोरी और अन्य गलत आचरणों पर लगाम लगेगा। मैं केवल चीन के प्रगति के एक घटने की कहानी बताना चाहता हूँ । एक गांव की महिला शिक्षक का काउंसिल के स्कूल की तनख़्वाह से घर का खर्चा नहीं चलता था, वह सोचती रही , कुछ हल नहीं निकल रहा था। अचानक उसके मन में आया कि मैं एक मोज़ा बनाने की मशीन ख़रीद कर मोज़ा बनाना क्यों न चालू करूँ जिसमें वह प्रशिक्षित थी। उसने वही किया, फिर नौकरी छोड़ दी। उसका व्यवसाय बढ़ता गया और अन्य औरतें अपने घरों में उससे प्रशिक्षित हो मोज़ा की मशीन ख़रीद मोज़ा बनाने लगी। एक दिन सब मिल एक कम्पनी बना दी और स्वचालित मशीनें ख़रीद ली।वह गाँव पूरे देश के कोने कोने में मोज़ा भेजने लगा। धीरे धीरे वह गांव एक छोटे शहर में परिगणित हो गया। सभी जरूरी सुविधाएँ आ गईं और पूरी दुनिया के मोज़े सप्लाई का केन्द्र बन गया। स्वाभाविकत: शहर के सभी लोग सम्पन्न हो गये। हमारे यहाँ यह क्यों नहीं हो सकता है?

पर हम एक सरकारी शिक्षक बन बिना कुछ किये खुश है।उन्हींमें से एक गलत तरह से पैसा कमा धनी बन जाता है और सभी केवल उसके चमचे बन रह जाते है।
गांव में मेरे बचपन में सब परिवारों में १५-२० विघा से अधिक ज़मीन हुआ करता था। गेहूं, धान मुख्य फसल थे। सब्ज़ी की खेती नहीं के बराबर होती थी। बरसात परदादी कुछ सब्ज़ियाँ लगा देती थी जैसे लौकी, कुम्हड़ा, तोरी आदि। साल भर आलू भी नहीं मिलता था, सुखवता आलू की सब्ज़ी ही बनती थी। परिवार बंटते गये हैं, ज़मीनें कम होती गई हैं। अब शायद औसतन ४-५ विघे ज़्यादा खेत नहीं। धान, गेहूं छोड़ सब्ज़ी, फल आदि की खेती कोई करना नहीं चाहता, फिर कहां से तो सम्पन्नता आये। लड़के पढ़ते नहीं। रामायण का गाना नहीं होता सब टीवी और अपने फ़ोन पर समय काटते हैं। अधिकांश लोग वीए, एम. ए करते हैं। विज्ञान, कॉमर्स आदि पढ़ता नहीं, क्योंकि उसमें अच्छा करने में मिहनत लगती है। आज से ३० साल पहले गांव के स्कूल से दो लड़के इंजीनियर बने, उसके बाद शायद कोई नहीं। लोग घर छोड़ छोड़ दूसरे प्रदेशों में निकल जाते हैं मज़दूरी से कमाने के लिये। हाँ, गाँव में मज़दूर मिलते नहीं, जो हैं वे भी काम करना नहीं चाहते। हमारे गाँव के पास डेहरी ऑन सोन में डालमिया के क़रीब छोटे बड़े २०कारख़ाने थे, वे यूनियन के कारण बन्द हो गये। नये कारख़ाने खुले नहीं। इंजीनियरिंग कालेज खुले नहीं, स्कूल, कालेज बन्द हो गये, लड़के लड़कियाँ केवल परीक्षा का फार्म भरते हैं और इंतहान देते हैं।

अब समाज की कुछ कुप्रथाएं के बारे में बताना चाहता हूँ। गाँवों में आम गरीब लोगों को अमीरों या बड़ी जातियों के ग़लत स्वभावों से ऊपर उठने की बात करनी चाहिये थी। दुर्भाग्यवश आज भी सभी बड़ों के गलत स्वभावों का नक़ल करते हैं, चाहे तिलक माँगने में या बेटे की शादी करने में। अबतक लोग जन्मोत्सव में शक्ति के बाहर क़र्ज़ लेकर भी खर्च करते जा रहे हैं।

दुख है कि प्रशांत जी कोई व्यवसाय नहीं हैं चलाये हैं और न वैसे उनकी सोच है। उन्हें व्यवस्था चलाने का कोई अनुभव नहीं है और पिछले चुनाव के उनकी टीवी पर के व्यस्तता से यही लगा कि अभी भी वे पुराने धंधे में ही रूचि रखते हैं, नहीं तो इतनी गहरी रूचि क्यों? और इसीलिये वे अपने भविष्यवाणियों में वे ग़लत सिद्ध हुए। एक साथ दो नाव पर पैर नहीं रखा जा सकता।

मेरी सलाह है प्रशांत जी किसी एक ज़िले के हर कोने के दस गाँवों को ले वहीं नवजवानों से उन्हेंसुधारने की कोशिश करते और उस सफलता को मॉडल बना अन्य ज़िले के अपने दोस्तों के सहायता में उनमें भी उसे चालू करते जाते।

मेरे बिचार से उनका आंदोलन लोगों के मन से दो चीजों निकाल देने का होना चाहिये था कि सरकार नौकरी दे सकती है सबको और वे घूस ले पैसा कमा सकते है।
उन्हें उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। उन्हें लोगों को अपने बच्चों को पढ़ने और हुनर सिखाने पर उतना ही मन लगाना चाहिये था जितना दक्षिण भारत के लोग कर रहे हैं। उनको आम लोगों के मन से स्थानीय राजनीति से नाता तोड़ नियमसंगत रास्ते पर चलने के लिये बताना चाहिये।

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मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग में कैसे चीन का वर्चस्व

मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग में कैसे चीन का वर्चस्व
मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्री बनने के बाद से भारत का मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर सिकुड़ता गया और इस सेक्टर में आयात बढ़ता गया। हमारे यहाँ के व्यवसायिक और ओ इ एम भी अपने यहाँ पुर्ज़ों को न बनाने का प्यास कर सस्ते पुर्ज़े आयात करने लगे चीन से और उसके बाद से भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर में केवल असेम्बली प्लांटों की तेज़ी से बृद्धि होने लगी। बहुत बड़े बड़े मशीनों के बनानेवाले प्लांट और मैनुफ़ैक्चरिंग के मंझले प्लान्ट बन्द हो गये, पूरे टर्नकी बेसिस पर पूरे के पूरे प्लांट बाहर से आने लगे।
पंजाब मशीनटूल्स एवं कृषि क्षेत्रों उपयोगी मशीनों का दुनिया सबसे बडा केन्द्र हो सकता था, पर वहाँ की राजनीति केवल सरकार से सब कुछ मुफ्त ले पूरे देश के कृषि क्षेत्र को कमजोर कर अपना उल्लू सीधा करती रही।
बंगाल का उन्नत मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर देखते देखते खत्म हो गया वहाँ की राजनीतिक बदलती कमजोरी से।
गुजरात एक उदाहरण है कि कैसे राजनीति एक पिछड़े प्रदेश को उद्योग और कृषि क्षेत्रों देश का सिरमौर बना सकती है।
महाराष्ट्र की राजनीति का विघटन समय रहते नहीं रोका गया तो वह भी बंगाल की अवस्था में पहुँच जायेगा।
मैंने भी देश के १९७०-८० का सबसे बड़े एक आटोमोवाइल के प्लांट में एक मुख्य भूमिका निभाया है और देखा है कि कैसे बेईमान निवेशक मालिकों की पीढ़ी आने पर वह कैसे मटियामेट हो गया, नहीं तो वह आज भारत का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल कहलाता।
वहीं बजाज ऑटो भी वैसा ही होता अगर वहाँ के भी परिवारवादी मैनेजमेंट में अच्छे उत्तराधिकारी नहीं आये रहते। आज के मैनुफ़ैक्चरिंग क्षेत्रों के मालिक और सी इ ओ पता नहीं क्यों भारत को चीन के रास्ते चल खुद दुनिया बड़ा मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग नहीं बनना चाहते। उनके मैनेजमेंट का ध्येय चीन को जहां तक जबतक नहीं छोड़ने की है जब तक समर्थ सरकार इसके लिये उन्हें थोड़ी दृढ़ता से समझाने की कोशिश न करे। चीन भारत के प्रगति पर हर तरह का रोड़ा लगाने के लिये तुला हुआ। उनके चंगुल से मुक्त भारती य उद्योगों के लिये जरूरी है। अगर ISRO चीन रशिया के सहायता से मुक्त हो सकता है, तो प्राइवेट क्षेत्र की कम्पनियाँ क्यों नहीं? क्यों नहीं अनुसंधान पर खर्च बढ़ाया जा सकता?
अख़बारों के अनभिज्ञ या पैसे के लालची पत्रकारों के लेख इसी बात का संकेत देते हैं, जो नीचे बताया है। अगर टाटा और महिन्द्रा बिजली की कार में अपनी कैपेसिटी यथा शीघ्र न बढ़ायेंगीं तो चीन के उद्योगपति ही पिछले द्वार से भारत पर छा जायेंगे। अगर इस सरकार के रहते यह न रूका तो फिर किसी दूसरे में भारत को मैनुफ़ैक्चरिंग में आत्मनिर्भर या शिरमौर बनाने का ताक़त नहीं होगा। देखिये दो प्रेस रिपोर्ट
https://economictimes.indiatimes.com/news/india/let-the-chinese-come-for-aatmanirbhar-bharats-sake/articleshow/111051275.cms यह लेख सिफ़ारिश करता है कि चीन की बैसाखी के सहारे भारत को आत्मनिर्भर बनना चाहिये।
https://economictimes.indiatimes.com/industry/cons-products/electronics/pcb-dumping-duty-hits-it-hardware-making-under-pli/articleshow/111093438.cms यह लेख बताते चीन के आयात को रोकने के सरकारी प्रयत्न में भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग का नुक़सान हो रहा है।
बहुत कुछ लिखने को है पर अब शक्ति नहीं। अगर आज से ४० साल पहले हम १०० % आयातरहित मोटर कार बना सकते थे तो आज क्यो नहीं, जब मारुति सुज़ुकी के चलते सैकड़ों उद्योग गुरुग्राम के चारों ओर उस समय लग सकते थे तो आज क्यो नहीं? हम उद्योगों को उन सब चीज़ों को भारत में बनाने की कोशिश क्यों नहीं कर सकते। फिर हमारे भारतीय इंजिनियर्स ही कैसे दुनिया के बड़ी कम्पनियों अनुसंधान केन्द्रों को चला रहे हैं?

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