Akbar- The Great and his Greatness?

Akbar- The Great and his Greatness?
Yesterday I was reading the introduction of a book the English translation of an Indian scholar – Madhusudan Sarswati’s commentary of ‘The Bhagavad-Gita with the Annotation ‘Gudhartha Dipika’. It was translated by well-known Swami Gambhirananda. I found an interesting story about Madhusudan Saraswati related to his meeting Akbar, the Great: Prof J. N. Farquhar recorded this historically important event at Benares in Akbar Era in an article, ‘The Organizations of the Sannayasins of Vedanta’ in the Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, July 1925 (pages 479-86):
One of the notorious practices of Muslim priests, as good Muslims, was to frequently attack and kill the Hindus lay and monastic, especially at pilgrim centres such as Benares. Those priests were protected by a faulty law that exempted them from any legal punishment! So the hapless Hindus approached Madhusudan to do something to stop this injustice. Since Madhusudan was well known at the durbar of Emperor Akbar (who ruled between 1556-1605), he met the Emperor though Raja Birbal and narrated to him the religious atrocities at Benares. As a solution, the Emperor suggested that Madhusudan should organise a militant band of sannyasins to defend Hinduism and its followers. At the same time, he promulgated a law that henceforth protected the Hindu sannyasins too, like the Muslim priests, who were outside the purview of legal action. Thus was born at the hands of Madhusudan, the much respected, and feared Naga sect of Vedantic sannayasins. The recruits were mostly from the Kshatriya caste. They lived in monasteries called Akhadas, and were trained in the martial arts.

Now, with that sort of highly discriminatory law, would not have Akbar, called ‘The Great’ would have banned the law rather than giving the same ease for a religious group of Hindus created on his suggestion to be at war with the people of the other major religion freedom for religious killings and tortures instead of taking legal path. Can an Emperor who suggest such criminal acts be called ‘Great’ even by mistake? Will some friends interested in history let me enrich my knowledge why did our historian call him Great to make equal in rank with Ashoka?
अकबर- महान और उसकी महानता
कल मैं अकबर काल के एक भारतीय विद्वान मधुसूदन सरस्वती द्वारा किये भगवद् गीता के भाष्य ‘गूढ़ार्थ दीपिका’ के अंग्रेज़ी अनुवाद में दी गई विस्तृत भूमिका पढ़ रहा था। यह अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रसिद्ध स्वामी गंभीरानन्द द्वारा किया गया है। ये विवेकानन्द परम्परा के हैं। इन्होंने ही आदि शंकराचार्य के ८वीं शताब्दी में किये सबसे पहले भगवद् गीता के संस्कृत भाष्य का भी बहुत ही सुन्दर अंग्रेज़ी में भी अनुवाद किया है। मधुसूदन सरस्वती के भाष्य को शंकराचार्य के बाद का सबसे अच्छा भाष्य माना जाना जाता है।
मधुसूदन सरस्वती का काल १५९०- १६९७ ई. माना जाता है। भूमिका में एक ऐतिहासिक लेख से लिया अंश भी है। इसमें मुझे मधुसूदन सरस्वती के बारे में उनकी अकबर, महान से मुलाकात से संबंधित एक दिलचस्प कहानी मिली: प्रोफेसर जेएन फ़रक्वार ने इस ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण घटना को अकबर काल के बनारस में होते हिन्दू विद्वानों एवं भक्तों की धार्मिक स्थानों में मुसलमानों के धार्मिक तथाकथित मुल्लाओं के सह पर किये अत्याचार का वाक़यों के बारे में अपने एक लेख में बताया गया है। उनका यह लेख,’जर्नल ऑफ़ द बॉम्बे ब्रांच की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’ के जुलाई १९२५ अंक के पृष्ठ ४७९-८६ पेज पर है।
‘अच्छे मुसलमानों के रूप में मुस्लिम पुजारियों की कुख्यात प्रथाओं में से एक था, हिंदु पुजारियों एवं मठवासियों पर हमला करना और उन्हें मार डालना, विशेष रूप से बनारस जैसे तीर्थस्थलों में । उन मुस्लिम मुल्लाओं को एक दोषपूर्ण कानून द्वारा संरक्षित किया गया था जो उन्हें किसी भी कानूनी सजा से छूट देता था! असहाय हिंदुओं ने इस अन्याय को रोकने के लिए कुछ करने के लिए मधुसूदन से संपर्क किया, चूंकि मधुसूदन का सम्राट अकबर (जिन्होंने 1556-1605 के बीच शासन किया था) के दरबार में आना जाना था, वे राजा बीरबल के माध्यम से सम्राट से मिले और उन्हें बनारस में धार्मिक अत्याचारों के बारे में बताया। एक समाधान के रूप में, सम्राट ने सुझाव दिया और अमल किया वह आश्चर्यचकित किया मुझे। अकबर ने मधुसूदन सरस्वती को हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों की रक्षा के लिए अपने संन्यासियों के एक हथियार बन्द दल गठित करने को कहा। साथ ही, उन्होंने एक कानून की व्यवस्था की जो आगे इस हिंदू संन्यासियों को भी वैसी ही रक्षा प्रदान करता था, जैसा क़ानून मुस्लिम पुजारी को कानूनी कार्रवाई के दायरे से बाहर रखता था अपराध के बाद। इस प्रकार मधुसूदन के हाथों संगठित हुआ वेदांती संन्यासियों में हथियारबन्द नागा संप्रदाय। इस उस समय ज्यादातर क्षत्रिय जाति के लोग इसमें लिये गये थे। वे अखाड़ा नामक मठों में रहते थे, और उन्हें मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित किया गया था।
अब, उस तरह के अत्यधिक भेदभावपूर्ण कानून के साथ, अकबर, जिसे ‘द ग्रेट’ कहा जाता है, एक वर्ग के लोगों के साथ दूसरे वर्ग द्वारा हिंसक बर्ताव को बन्द करने के लिये पुराने क़ानून को बदल नहीं सके किस कारण, बल्कि हिन्दुओं को बदला लेने के लिये हिंसा कर मुक्त रहने का रास्ता खोल दिया और दोनों धर्म के लोगों में बैर भाव को आग देने का क़ानून बना दिया। कैसे महान करानेवाला सम्राट ऐसा कर सकता है। पर हमारे वामपंथी इतिहासकार अकबर ही नहीं अन्य मुग़लों की धार्मिक क्रूरता की कभी निन्दा नहीं किये। क्या इस तरह के आपराधिक कृत्यों का सुझाव देने वाले सम्राट को गलती से भी ‘महान’ कहा जा सकता है? क्या इतिहास में रुचि रखने वाले कुछ मित्र मुझे अपने ज्ञान को समृद्ध करने में मदद देंगे, हमारे इतिहासकार ने उन्हें अशोक के साथ बराबरी करने के लिए महान क्यों कहा? वैसे सर यदुनाथ सरकार ने नागा साधुओं के प्रारम्भ के बारे में इन्हीं बातों का उल्लेख किया है।
The article of Prof. J. N. Farquhar ‘ The Organizations of the Sannayasins of Vedanta in the Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, July 1925 (pages 479-86).

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