तुलसीदास का रामचरितमानस एवं उपनिषद्, भगवद्गीता


कुछ दिनों से मैंने, अपना एक साहित्यिक दुख, जो अपनी मातृ भाषा हिन्दी या आंचलिक भाषाओं के बारे में है, बहुत हिन्दी के पंडितों, मित्रों से साझा किया है।क्यों हमारे हिन्दू धर्म के मूल ग्रंथों- उपनिषदों, भगवद्गीता या अष्टावक्र गीता आदि का सरल हिन्दी में अनुवाद नहीं हुआ? और आज हिन्दी का शायद पतन काल आ गया है और उम्मीद नहीं है कि हिन्दी इससे उबरे। आज यहाँ अगर और ग्रंथों को छोड़ दिया तब ही यह पीड़ादायक लगता है कि जब रामचरितमानस का सरल अंग्रेज़ी में बहुत ही अच्छा अनुवाद हुआ पिछले कुछ साल में ही, पर सरल हिन्दी में नहीं। ये अनुवाद हैं, पहला इंफ़ोसिस के संस्थापक प्रसिद्ध उद्योगपति श्री नारायनमूर्ति के पुत्र रोहन मूर्ति के ‘मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी फ़ाउन्डेशन’ के प्रयत्न से अमरीकन हिन्दी विद्वान फ़िलिप लूटेनजेनडौफ ( Philip Lutgendorf)द्वारा The Epic of Ram हार्वरड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा, जिसका शायद चा खंडों में अयोध्याकांड तक किया जा चुका है। दूसरा अनुवाद का प्रकाशन पेनग्यून क्लासिक के अंतर्गत रोहिणी चौधुरी द्वारा ‘तुलसीदास रामचरितमानस’ नाम से तीन खंडों में किया गया है।दोनों अच्छे लगे।पर रोहिणी चौधरी ने मूल को साथ साथ नहीं दिया है, जब पहले में मूल भी है, अत: हिन्दी जानने वालों को शायद अच्छा लगेगा।


यह तो अच्छा है कि गीता प्रेस के चलते पहले केवल मूल, फिर भावार्थ सहित,और फिर विशद व्याख्या करते हुए रामचरितमानस पर अलग अलग सस्ते इतनी रामचरितमानस का प्रकाशन हुआ कि यह अब सबके लिये सरल और शायद सब हिन्दू परिवारों में एक या अधिक उपलब्ध है। एक बहुत महत्वपूर्ण प्रकाशन है बहुत भारी भरकम ‘मानस-पीयूष’ सात खंडों में है।


क्या सरल हिन्दी में एक अनुवाद नहीं किया जा सकता था केवल मूल रामचरितमानस के दोहे छन्द, सोरठा, चौपाइयों का या मंगलाचरण का। वैसे भगवद्गीता का अनुवाद प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने ‘नागर गीता’ के नाम से किया था, मैंने ख़रीदा भी पर वह बहुत ही क्लिष्ट था, मैं नहीं समझ सका। भगवद्गीता का तो अंग्रेज़ी में हज़ार के आसपास एवं अन्य क़रीब क़रीब सब विदेशी भाषाओं में बहुत बढ़िया सरल अनुवाद हुआ है उस भाषा के जानकारों के लिये। एक भारतीय दक्षिण भारतीय एकनाथ एश्वरन् ने, जो अमरीका में जा अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध प्रोफ़ेसर हो गये थे,उपनिषदों एवं भगवद्गीता गीता का बहुत ही सरल सहज अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। हमारे यहाँ के हिन्दी के प्रोफ़ेसर लेखकों, कवियों ने इसकी ओर ध्यान क्यों नहीं दिया। एक मृदुल कीर्ति जी की उपनिषदों का अनुवाद देखा हूँ, पर कुछ समझ नहीं आता।


तुलसीदास पर मेरी श्रद्धा है,वे हिन्दी जगत में सबसे लोकप्रिय हैं। हिन्दी को इनकी तरह का रामचरितमानस को महाकाव्य की तरह लिखनेवाला शायद ही कोई भक्त ज्ञानी मिला या मिलेगा।यह मेरा विचार है। तुलसीदास के रामचरितमानस से परिचय पहली बार अपने शिक्षक और साहित्य-प्रेमी दादा जी द्वारा हुआ अपने बचपन में ही। फिर उस समय के मेरे घर में रहनेवाले हमारे प्राइमरी स्कूल के शिक्षक पाण्डे जी ने उसे कविताओं की अंत्याक्षरी के खेल से बढ़ाया पढ़ने के लिये कलकत्ता आने के पहले तक, यद्यपि दादाजी के साथ तो बहुत सालों रहा और इस पर चर्चा भी चलती रही। उन्हें रामचरितमानस का मासापरायण नवरात्र में करते देख बहुत अच्छा लगता था। हिन्दुस्तान मोटर्स में सालों तक मैंने भी मासापरायण और बहुत बार नवरात्र में नवापरायण की। फिर बाद में केवल प्रतिदिन सुन्दरकांड पर सीमित हो गया और देश विदेश सब जगह चलता रहा। वही आज तक चलता आ रहा है। अब स्नान के बाद और दोपहर के खाने के पहले सुन्दर कांड का पाठ करता हूँ। इसके अलावा गीता, उपनिषद् के साथ रामचरितमानस के चुने हुए तीन चार अंशों का सबेरे उठकर ही नित्य सबेरे पाठ करता हूँ। कोविद-१९ काल में घूमते हुए नित्य एक से ज़्यादा बार भी यह क्रम चलता रहता है केवल उनका जो मेरी याददाश्त में आ गया है।

तुलसीदास हिन्दू धर्म के महान ग्रंथों के सर्जक ऋषिओं के परम्परा के शायद आख़िरी व्यक्ति हैं। यह क़रीब क़रीब निश्चित हो चुका है कि उपनिषदों के ज्ञान का अगला सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लोकमान्य महाभारत में समाविष्ट भगवत् गीता है भगवान वेद व्यास का। उसके बाद अगर कोई ग्रंथ इतना लोकप्रिय हुआ तो वह रामचरितमानस मानस ही हुआ। और शायद भगवद्गीता की तरह केवल रामायण ही हाथ में रख सत्यता की शपथ को मान्यता है हिन्दुओं के लिये कचहरियों में।

इन तीनों कृतियों के समय काल में बहुत बड़े समय की खाड़ी रहीं हैं। अत: इन तीनों ग्रंथों में विषय अपने समय के समाज और उसकी सामाजिक समस्याओं की आवश्यकताओं को देखते हुए उसी तरह उठाया गया है। समय के साथ समाज बदला और लोगों के आचरण भी बदले। समाज एवं देश के बदलते समाजिक बदलाव को ऋषियों ने अपने अनुभवों से समाज को सही दिशा देने के लिये प्रयत्नों को अपनी रचनाओं में समाविष्ट किया।


मुख्य दस उपनिषदों का समय काल अनुमानतः १०००-५०० बी.सी ,महाभारत एवं भगवद्गीता को शायद तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व और तीसरी शताब्दी सीई के बीच संकलित किया गया माना जाता है,जबकि भक्त तुलसीदास का रामचरितमानस सदियों बाद क़रीब अकबर एवं जहांगीर के समय १७वीं सदी में रचा गया। रामचरितमानस के अनुसार ही तुलसीदास उसके प्रारंभ करने का दिन था विक्रम संवत् १६३१ के चैत्र मास की रामनवमी जो राम का जन्मदिन माना जाता था। यह १५७४ ईस्वी है। बहुत हद तक तुलसीदास ने अपने समय के सामाजिक मान्यताओं की चुनौतियों को ललकार और अपना रास्ता निकाला और दिखाया।
देश की आज़ादी के पहले के दिनों में उपनिषदों, भगवद्गीता एवं रामचरितमानस की महत्ता को समझा जाने लगा। स्वतंत्रता के बाद भी इन ग्रंथों को हर व्यक्ति के जीवन की समस्याओं को सुलझाने में सहायक बनाने की बात कही गई विशेषकर महात्मा गांधी द्वारा जिन्हें देश ने राष्ट्रपिता बनाया।यह तब तक चला, जब तक देश में दूरदर्शन का प्रचार प्रसार आज की तरह नहीं हुआ।गाँवों,शहरों में रामायण गान एवं इस पर प्रवचन चलते रहे।दुनिया में जहां जहां
तुलसीदास ने अपने कृति द्वारा एक अनोखा क्रान्तिकारी बदलाव लाया।संस्कृत के पंडित होते हुए संस्कृत में न लिख अपनी क्षेत्रीय भाषा अवधी में अपने मशहूर रामचरितमानस की रचना की। संस्कृत का भी मंगलाचरण आदि में ही उपयोग किया, शायद अपने विरोधी संस्कृत विद्वानों को यह बताने के लिये कि उनका संस्कृत ज्ञान भी उतना ही प्रगाढ़ था जिसमें वे रचना कर सकते थे उतनी ही सरलता से, पर फिर उससे जन जन में ज्ञान का प्रकाश नहीं पहुँच पाता।


तुलसीदास क़रीब क़रीब अनाथ थे। माँ मर गई जन्म देने के थोड़े दिनों बाद, पर पिताजी ने भी समाज के भविष्य बतानेवालों के लड़के को माता-पिता के मरण योग के साथ पैदा होनेवाला बताने के कारण त्याग दिया। पर दैविक कृपा से कुछ अच्छे ज्ञानी पंडितों की दृष्टि उन पर पड़ी, और उनको वे असाधारण लगे। वे उनको संस्कृत एवं प्राचीन शास्त्रों की शिक्षा दिये और तुलसीदास ने असाधारण गुरू भक्ति और बुद्धि के कारण सभी ग्रंथों को पूर्ण तरह से आत्मसात् किया।उनके पहले तक सभी ब्राह्मण विद्वानों ने अपने ग्रंथों को संस्कृत में ही लिखा था। और वे ग्रंथ केवल तत्कालीन समाज के एक नगण्य लोगों तक ही जा पाता था, क्योंकि सबकी समझ के बाहर था संस्कृत शिक्षा। पर तुलसीदास ने जब अपनी राम कथा रामचरितमानस को लिखने का निर्णय लिया तो उसे क्षेत्रीय भाषा अवधी में लिखा जन जन तक पहुँचाने के लिये और समय ने यह सिद्ध किया वे बहुत दूरदर्शी थे।


एक बहुत ही लोकप्रिय संस्कृत श्लोक हैं भगवान की महत्ता बताते हुए-
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥
तुलसीदास ने उसका अवधी अनुवाद किया और अपने बालकांड में निम्न रूप में रखा है-
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलिमल दहन॥

तुलसीदास ने रामचरितमानस में उपनिषदों एवं भगवद्गीता के संस्कृत के श्लोकों का विचार अपनी अवधी में इतनी सरलता से रखा है कि वह सबकी समझ में आ जाता है बहुत गूढ़ विषय होते हुए भी। मैं थोड़े उदाहरण लोगों तक पहुँचाने की चेष्टा करना चाहता हूँ शायद सबको अच्छा लगे।


ईशोपनिषद के पहले श्लोक की प्रसिद्ध प्रथम पंक्ति,’ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌’
बालकांड के प्रारम्भ के दोहे ७-ग में ही इस तरह कहा है तुलसीदास ने-‘जड़ चेतन जंग जीव जंतु सकल राममय जानि।’ फिर ‘सीय राममय सब जग जानी।करउं प्रनाम जोरि जुग पानी।’ अयोद्ध्या कांड के १२७ दोहा बाल्मिकी का उत्तर:
‘पूछेहु मोहि कि रहौं कहं मैं पूंछत सकुचाउं। जहं न होहु तहं देहि कही तुम्हहि देखावौं ठाउं॥’ फिर नवधा भक्ति बताये हुए, ‘सातंव सम मय जग देखा।…’ अर्थात् ‘मेरे सातवें प्रकार के भक्त मुझे व्यापित पूरे जग को देखते हैं।’


ईशोपनिषद् में सोलहवें श्लोक में अंतिम पंक्ति है- ‘योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥’ तुलसीदास रामचरितमानस ने इसको उत्तरकांड में दोहा ११७ घ के बाद की पहली चौपाई में व्यवहार किया है इस तरह-
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥1॥
फिर कठोपनिषद् के श्लोक —
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृद्स्येह ग्रंथय: अथ मर्त्यों ऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्।॥२.३.१५॥
जब हृदय की सभी ग्रंथियाँ पूरी तरह खुल जातीं है, मनुष्य उस ब्रह्म को पा लेता है।-का विषय रामचरितमानस में इस तरह आया है।
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥
छोरत ग्रंथ जानि खगराया। बिघ्न नेक करइ तब माया॥
राम ब्रह्म है और तुलसीदास ने राम के लिये भी उपनिषद् की ‘नेति नेति’ कहा रामचरितमानस में एक से ज़्यादा जगहों पर और


फिर कैसे मिलते हैं ब्रह्म? मुंडकोपनिषद के ३.२.३ श्लोक के दूसरी पंक्ति में कहा है,
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’॥ यह ब्रह्म जब किसी साधक पर अनुग्रह करता है तब ही वह अपने स्वरूप को दिखाता है।
और बाल्मिकी श्री राम की प्रार्थना में कहते हैं,
“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥’
-वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

मंगलाचरण में ही अपने इष्टदेव राम के बारे में लिखे श्लोक में एक उपनिषद् और अद्वैत विचारधारा में काफ़ी बार व्यवहृत हए। वह श्लोक ५ की पहली दो पंक्ति और उसका हिन्दी अर्थ इस तरह है-
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति ‘सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः’।
जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्ता से ‘रस्सी में सर्प के भ्रम की भाँति’ यह सारा दृश्य जगत्‌ सत्य ही प्रतीत होता है…..
इसे बालकांड के ही दोहा सं.१११ के बाद की चौपाई में व्यवहार किया इस तरह-
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥1॥
जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है और जिसके जान लेने पर जगत का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम जाता रहता है।


इसी तरह उपनिषदों द्वारा परम ब्रह्म के लिये व्यवहृत शब्द ‘सदचिदानन्द-(सत्-चित्-आनन्द) के राम के लिये तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में बार बार किया है।
तुलसीदास के राम सगुन हैं पर तुलसी दास ने सगुन और निर्गुण में कोई अन्तर माना और समझाते हुए बार बार कहा है। उदाहरण के तौर पर बालकांड के ही दोहा ११५ के बाद की चौपाइयों में-
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥1॥
-सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है- मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है॥1॥
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥
-निर्गुण है वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओले में भेद नहीं। (दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं।)
इसी क्रम फिर एक बार सच्चिदानन्द का भी व्यवहार यहीं आगे की चौपाई में किया है- ‘राम सच्चिदानंद दिनेसा।…और आगे फिर-‘राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना।…’


तुलसीदास के ‘सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा’ निर्णय को भी ईशोपनिषद् के ऋषि ने अपने श्लोक १४ में इस तरह कहा था-
सम्भूतिञ्च विनाशञ्च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥१४॥
वैसे इस श्लोक में असम्भूति को अगुन है एवं विनाशम् से सगुन का मतलब है। और दोनों को एक साथ पूर्ण रूप से जानने की हिदायत है पूर्ण ज्ञानी व्यक्ति को। और फिर उसकी मृत्यु को पार कर लेने एवं अमरता (अमृत) को पा लेने की इच्छाओं में क्या अन्तर है?

पर मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तब हुआ जब अरण्य कांड में अत्रि ने सोरठा में गाये श्लोक ९ में राम की प्रार्थना में ‘तुरीयमेव’ शब्द का व्यवहार किया जो निम्न तरह से है-
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥
जगद्गुरुं च शाश्वतं। ‘तुरीयमेव’केवलं॥9॥ उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणों से सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूप में स्थित) हैं।
यह उपनिषदों में सबसे छोटे (कुल केवल १२ श्लोक) मांडूक्योपनिषद्,जिसे जगद्गुरु शंकराचार्य ने सबसे महत्वपूर्ण उपनिषद् माना और जिसका शंकराचार्य के गुरू के गुरू गौडपाद ने २१५ श्लोकों की कारिका लिखी और ७वें श्लोक में कहे चौथी अवस्था का नाम तुरियम् दिया।
ईशोपनिषद के पहले श्लोक की प्रसिद्ध प्रथम पंक्ति,’ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌’
बालकांड के प्रारम्भ के दोहे ७-ग में ही इस तरह कहा है तुलसीदास ने-‘जड़ चेतन जंग जीव जंतु सकल राममय जानि।’ फिर ‘सीय राममय सब जग जानी।करउं प्रनाम जोरि जुग पानी।’ अयोद्ध्या कांड के १२७ दोहा बाल्मिकी का उत्तर:
‘पूछेहु मोहि कि रहौं कहं मैं पूंछत सकुचाउं। जहं न होहु तहं देहि कही तुम्हहि देखावौं ठाउं॥’ फिर नवधा भक्ति बताये हुए, ‘सातंव सम मय जग देखा।…’ अर्थात् ‘मेरे सातवें प्रकार के भक्त मुझे व्यापित पूरे जग को देखते हैं।’
ईशोपनिषद् में सोलहवें श्लोक में अंतिम पंक्ति है- ‘योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥’ तुलसीदास रामचरितमानस ने इसको उत्तरकांड में दोहा ११७ घ के बाद की पहली चौपाई में व्यवहार किया है इस तरह-
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥1॥
फिर कठोपनिषद् के श्लोक —
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृद्स्येह ग्रंथय: अथ मर्त्यों ऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्।॥२.३.१५॥
जब हृदय की सभी ग्रंथियाँ पूरी तरह खुल जातीं है, मनुष्य उस ब्रह्म को पा लेता है-का विषय रामचरितमानस में इस तरह आया है।
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥
छोरत ग्रंथ जानि खगराया। बिघ्न नेक करइ तब माया॥
राम ब्रह्म है और तुलसीदास ने राम के लिये भी उपनिषद् की ‘नेति नेति’ कहा रामचरितमानस में एक से ज़्यादा जगहों पर। और फिर कैसे मिलते हैं ब्रह्म? मुंडकोपनिषद के ३.२.३ श्लोक के दूसरी पंक्ति में कहा है,
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌’॥ यह ब्रह्म जब किसी साधक पर अनुग्रह करता है तब ही वह अपने स्वरूप को दिखाता है।
और बाल्मिकी श्री राम की प्रार्थना में कहते हैं,
“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥’
-वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

अब भगवद्गीता के रामचरितमानस पर प्रभाव की बात देखी जाये।
सबसे पहले दो लोकप्रिय श्लोक गीता के जो नीचे हैं-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ॥7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥8॥
जिसको रामचरितमानस में निम्न तरीक़े से कहा गया है-
“जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।”
जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते है । और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है॥


अगर कोई पाठक शिव पत्नी सती द्वारा सीता के विरह में दुखित वनवासी राम की परीक्षा लेनेवाले प्रसंग को पढ़ता है, तब एक बार भगवद्गीता के कृष्ण के विश्वरूप वाले अध्याय ११ की याद आ जाती है। आप भी पढ़िये- राम के उस स्वरूप के वर्णन की एक झलक:
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥
दो- सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥54॥
देखे जहँ जहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥


तुलसीदास के विचारों की महत्वपूर्ण चीज है उनकी ब्रह्म के राम, कृष्ण या अन्य किसी नाम की महिमा की बखान जो सामान्य से सामान्य व्यक्ति द्वारा भी अगर पूर्ण रूप से पूरी श्रद्धा के साथ किया जाए तो ब्रह्म को पाया जा सकता है। और शायद यह उपनिषदों में वर्णित ॐ शब्द को ब्रह्म मानने से आया है। और हर व्यक्ति के लिये अपने इष्ट के नाम में लीन हो जाना आसान है और ॐ की तरह उसके सठीक उच्चारण की ज़रूरत नहीं है।


यह मेरी तुलसीदास के प्रति अपनी श्रद्धांजलि है।

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