२०१९: ३६५ दिन में क्या किया?

२०१९: ३६५ दिन में क्या किया?

यह कहानी मेरी व्यक्तिगत है, अपने तरीक़े एवं विचारों, मान्यताओं या आदतों को किसी पर लादना नहीं चाहता, पर कुछ को अच्छा या अनुकरणीय लगे मेरे उम्र को देखते हुए तो स्वागत है….क्योंकि मैं खुद ही नहीं समझ पाता हूँ कि हिन्दमोटर के कार्यकाल में फ़ैक्ट्री में स्वेच्छा से १२-१६ घंटे काम करने वाला और अपने को पूरी तरह तकनीकी विषयों को जानने, उनका उपयोग करने, उन पर लिखने में लगा रहने वाला कैसे आज यह जीवन पद्धति एवं विषय अपना लिया है. अब की कहानी-

‘अध्यात्म ज्ञान नित्यत्व’ का अभ्यास करते हुए भगवत् गीता के कुछ जाने माने जाने माने अध्यात्म गुरू व्याख्याताओं की पुस्तकों को पढ़ने,समझने और व्यवहार में लाने की कोशिश की पिछले साल जो अभी जारी है और चूँकि परीक्षा तो होनी नहीं, चलता रहेगा यह अध्ययन, कुछ नज़दीक पहुँचने की इच्छा के साथ. यें ग्रंथ हैं-

१. Bhagawad Gita by Swami B. G. Narasinha

2. The Bhagawad Gita Swami Sivanand

3. The Holy Geeta by Swami Chinmayananda

4. Hindi Version of above translated by Swami Tejomayananda

5. The Bhagawad Gita for daily living (3volumes) by Eknath Easwaran

6. God Talks With Arjuna- The Bhagawad Gita by Sri Sri Paramahansa Yogananda

7. ऊपर की पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘ईश्वर-अर्जुन संवाद श्री मद्भगवद्गीता’

8. Bhagavad Gita as it is – A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada, ISKON

9. Hindi Translation of the above.

अंग्रेज़ी एवं हिन्दी दोनों भाषाओं की पुस्तकों को पढ़ने से आध्यात्मिक शब्दों को समझने में सहायता मिलती है. कभी कभी लगता रहा है कि सीमित मात्रा में सफलता भी मिल रही है.पर दूसरे ही क्षण आत्मनियंत्रंण की कमी का भान हुआ, पर प्रयत्नशील बना रहा हूँ. भगवत् गीता के व्याख्याकार विशेषकर योगानन्द के अनुसार सिद्ध गुरू से ही योग या ध्यान योग को सीखा जा सकता है, और वासनाओं का भी अन्त किया जा सकता है. पर असली ज्ञानी गुरू कहाँ ढूँढूँ? उन्होंने तो कहा है, अगर आप कर्म किये हैं उस तरह का तो अपने आप मिल जायेंगे. अंत: कोशिश करने कोई हर्ज नहीं. ध्यान लगाने के अभ्यास की ओर बढ़ा ज़रूर, पर पूरी असफलता ही मिली है. पर हाँ, इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि अपनी थोड़ी कोशिश के बाद भी बड़ी शान्ति मिलती है, ध्यान में १५-२० मिनट के बाद भी अच्छा लगता है।

अचानक याद आया कि हमारे बचपन के एक गुरू जी एक अपने को अत्यन्त बुद्धिरहित समझनेवाले बालक बोपदेव की कहानी सुनाये थे, लगन और अभ्यास से सब कुछ सीखा जा सकता है.मैं गीता को पढ़ते हुए बहुत अध्यायों में अलग अलग तरीक़े के सिद्ध पुरूषों के आचरणों,लक्षणों का विस्तृत ब्यौरा पाया. अध्याय २-सांख्ययोग(श्लोक ५५-७१, कुल १७) में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का, अध्याय ६-ध्यानयोग(श्लोक ७-१०,कुल ४)में योगी का, अध्याय १२-भक्तियोग (श्लोक २-४, ६-८, १२-१९, कुल १४) में सच्चे भक्त का, अध्याय १३-क्षेतरक्षेत्रज्ञविभागयोग (श्लोक ८-१२, कुल ५) में ज्ञानी का, अध्याय १४-गुणत्रयविभाग (श्लोक २२-२७, कुल ६) में गुणातीत का, अध्याय १६-दैवासुरसंपद्विभागयोग (श्लोक १-३, कुल ३) में दैवी सम्पदयुक्त व्यक्ति का, अध्याय १८-मोक्षसन्यासयोग (श्लोक ४९,५१-५७,६१-६२, ६५-६६, कुल ११) में बह्मज्ञानी का….। एक चीज़ समझ आई कि बहुत से लक्षण इन सभी में दुहराये भी गये हैं जो एक आदर्श व्यक्ति में होने चाहिये.पर उन आदर्श गुणों को अपने आचरण में लाना तो उतना आसान नहीं है. फिर एक बचपन में सीखी बात की समझ आई. हमें स्कूल की प्रार्थना की याद आई और उसके अनजाने फ़ायदे का भी.’हे प्रभु आनन्ददाता, ज्ञान हमको दिजीए, लिजीए हमको शरण में हम सदाचारी बनें’. उसका कुछ असर तो पड़ा ही है हम पर. शब्दों अर्थ जानते हुए बार बार उच्चरित करते रहने से कुछ न कुछ गुण की प्राप्ति होती ही है. शायद जाप करनेवाले या मंत्रों को पढ़ने की बात इसीलिये कही गई है. उसी ध्येय से मैंने उन श्लोकों का नियमित पाठ करने की ठानी और करता जा रहा हूँ, अब तो सबेरे शाम कुछ समय निकाल कर इसे करना आदत बन गया है.चलो फ़ायदा तो होगा ही, बढ़ती उम्र की घटती ज़रूरतों के कारण भी सहायता मिलेगा, आत्मनियंत्रण भी समय सीखा ही देता है, समय की कोई कमी नहीं, फिर आदत बनती जा रही है इसमें ही व्यस्त रहने की. पिछले दिनों सर्दी के कारण बरामदे ही में घूम मेघदूतम् पार्क का काम पूरा करते वक्त इन्हीं श्लोकों को पढ़ते पढ़ते समय कटता रहा है. और अब किताब देखने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती. पहले सोचता था इस उम्र में मैं शायद ही इतने श्लोकों को याद कर पाऊँगा.पर शायद उम्र कोई मायने नहीं रखती.

हाँ, एक इससे भी पुरानी एक किताब है गीता के ३० श्लोकों का टी. आर.शेशाद्री का, २७.४.२००० को ख़रीदा हुआ-The Curative Power of the Holy Gita. उनका दावा था कि इनको पढ़ने से बहुत सारी बीमारियों में लाभ मिलता है. कोई दृढ़ विश्वास न होने पर इसे रोज़ पढ़ता रहा हूँ बहुत सालों से और अब यह कंठस्थ भी है.

नित्य घंटे दो घंटे पिछले साल में मैं गीता की ब्याख्याओं को पढ़ने एवं समझने की कोशिश करता रहा हूँ. यह अपने देश की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में है. वेद और उसी से अनुप्रेरित उपनिषद्, गीता और बहुत से ग्रंथ….फिर मध्यकालीन तुलसीदास कृत रामचरितमानस मानस.गीता कुछ कुछ समझ आ रहा है. अगले सालों में उपनिषदों को पढ़ने समझने की इच्छा है…

मानस का मासापरायण करता था कभी…फिर कुछ नवरात्रों में नवा-परायण भी किया….

आज के नित्य पाठ में है:

१.रामायण का आख़िरी दोहा

२.बाल्मिकी का अयोद्ध्या कांड में राम कहाँ बास करें के अंश, जिसे लता मंगेशकर ने गाया भी है.

३.विभीषण के राम के पास रथ न होने के दुख के उत्तर में राम का दिया प्रतिउत्तर

४. सुन्दर कांड पूरा

फ़ेसबुक पर तो लिखता रहता हूँ इन विषयों पर. पर एक इच्छा अपनी पसन्द के गीता के १००-१५० श्लोकों का एक संकलन हिन्दी अंग्रेज़ी में तैयार कर प्रकाशित करने का है. इसी तरह तुलसीदास के रामचरितमानस के सुभाषितों का एक संग्रह पर भी काम करने की इच्छा है.

शायद यही सब मुझे आगे भी व्यस्त रखेगा.

हाँ, इन आध्यात्मिक पुस्तकों के साथ मनबहलाव के लिये कुछ अन्य सामयिक किताबों में भी रूचि रखता हूँ. रामचन्द्र गुहा की दो मोटी किताबें आद्योपान्त- ‘India after Gandhi’ and ‘Gandhi That Years That Changed the World’, देवदत्त पट्टनायक की भी कुछ किताबें पढ़ी पिछले साल, जिनमें प्रमुख ‘Syam- Bhagavata’ थीं. दोनों अच्छा लिखते हैं.

देखें २०२० में क्या कर पाता हूँ….पर हर व्यक्ति को मेरी यही राय होती है कि वह पढ़ने में रूचि रखे. ज़िन्दगी की सफलता इसके बिना

…..

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