महात्मा, धर्म, भगवद् गीता और हमारी असहिष्णुता

महात्मा गांधी के जन्मदिन पर एक अर्घ्य यह भी हो सकता है कि हम उनके ‘धर्म’ की मान्यता को समझें, जो निम्न है-

“धर्म से मेरा अर्थ प्रथा-गत धर्म से नहीं है, परन्तु धर्म जो सभी धर्मों का आधार है, जो हमें स्रष्टा के सम्मुख लाता है. वास्तव में धर्म हमारे प्रत्येक कार्य में व्याप्त रहना चाहिये.यहां धर्म का अर्थ साम्प्रदायिकता नहीं है.इसका अर्थ ब्रह्माण्ड के नियमबद्ध नैतिक शासन में विश्वास है.क्योंकि वह दीखता नहीं है,इसलिये कम वास्तविक नहीं है.यह धर्म हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, आदि धर्मों से परे है. यह उनका स्थान नहीं लेता.यह उनमें सांमजस्य स्थापित करता है और उन्हें वास्तविकता देता है.मेरा हिन्दू धर्म साम्प्रदायिक नहीं है. यह उस सर्वश्रेष्ठ को सम्मिलित करता है जिसे मैं इस्लाम, ईसाई, बौद्ध और पारसी धर्म से सबसे अच्छा जानता हूँ.धर्म विभिन्न पथ है जो एक बिन्दु पर मिलते हैं.यदि एक ही लक्ष्य पर पहुँचते हैं तो इसमें क्या अन्तर पड़ता है कि हम भिन्न-भिन्न रास्तों को लेते हैं?

इस समय की आवश्यकता एक धर्म नहीं, अपितु विभिन्न धर्मों के भक्त्तों के बीच आपसी सम्मान और सहिष्णुता की है. हम एक मृत स्तर तक पहुँचना नहीं चाहते, वरन् अनेकता में एकता चाहते हैं. धर्मों की आत्मा एक है, परन्तु यह अनेक रूपों से ढँका है. यह अवरोक्त्त, काल के अन्त तक बना रहेगा.” -महात्मा गांधी

इसी अवधारणा का भगवद् गीता में प्रतिपादित किया गया है बार बार-

अध्याय ४ में भी यही कहा गया है-

ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ ।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं॥11॥

विश्व के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि भगवद्गीता को पढ़कर मुझे ज्ञान हुआ कि इस दुनिया का निर्माण कैसे हुआ. महापुरुष महात्मा गांधी कहते थे कि जब मुझे कोई परेशानी घेर लेती है तो मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं. महान दार्शनिक श्री अरविंदों ने कहा है कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवन शैली है, जो हर उम्र के लोगों को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है.दु:ख तब होता है जब देश के अज्ञानी लोग राजनीति नेताओं के बहकावे में आ गीता बिरोध करते जो इस देश के आत्मा की आवाज़ है.

कल डी एम के एकक्षत्र बादशाह M.K. Stalin ने अन्ना विश्वविद्यालय द्वारा गीता के एक अंश का किसी कोर्स में शामिल करने पर निन्दा की.मुझे मालूम नहीं की उनकी क्या शिक्षा हुई है, पर उन्हें शायद मालूम नहीं की भगवद् गीता के सबसे प्राचीन से लेकर आधुनिक व्याख्याकार दक्षिण से हैं. आचार्य शंकराचार्य से चलती परम्परा डा. राधाकृष्णन और उसके बाद तक चली आ रही है…अगर देश के नेता कोशिश करें तो भगवद् गीता विश्व भर में मान्य बन सकती है सारकारिक स्तर पर…

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