डा. राजेन्द्र प्रसाद, भारत के प्रथम राष्ट्रपति

मैं १९५५-५७ में बंगाल में स्कूल फ़ाइनल के बाद में दो साल प्रेसीडेंसी कालेज में विज्ञान में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट किया। मुझे वहीं हिन्दू हॉस्टल में रहने का सौभाग्य मिला।वहीं मुझे कुछ देश के विभिन्न क्षेत्रों महान हस्तियों से मिलने का अवसर मिला। उनमें दो लोगों की जानकारी पहले से थी अत: मेरी श्रद्धा अगाढ थी। उनमें प्रथम स्थान पर डा. राजेन्द्र प्रसाद हैं, इसके पहले मैं अपने स्कूल की तरफ से बंगाल के राज्यपाल डा. कैलाशनाथ काटजू से हावड़ा रेलवे पर। हमारा एक घाटशिला में कैंप उसमें हम जा रहे थे और हिन्दी भाषाभाषी शायद मैं ही था। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से आशीर्वाद दिया था।

डा. राजेन्द्र प्रसाद को कालेज के लोग उनकी इच्छा पर हिन्दू हास्टल लाये होंगे, जहाँ वे वर्षों रहें। उनका नाम खुदा एक प्लेक भी वहाँ लगा है गेट पर। हम तब तक इतना ही जानते थे कि बिहार, ओड़िसा, पूरे बंगाल, आसाम आदि का एक ही संस्था थी जो मैट्रिक की परीक्षा का आयोजन करती थी और वे उस परीक्षा में सर्वप्रथम आये थे। बाद में भी वे प्रथम ही रहे।

मैंने जब उनसे कहा था ‘ बंगाल में त कौनो जातपात नइखे, एके संगे सब खा ला मेस में। उन्होंने जबाब दिया और हाथ उठा गेट पर से ही बताये कि ‘ना बाबु, देख ओह ओरे हमरा समय, कायस्थ, ब्राह्मण, आदि के अग़ल-अलग अलग-अलग रसोइया खाना बनाने ख़ातिर रहन।’ फिर वे वापस लौट गये समय की कमी के कारण।उसके बाद उनकी अपनी लिखी उनकी आत्मकथा भी पढ़ा और उनके बारे में समाचारों को चाव से पढ़ता रहा। जब नेहरू की उनके प्रति अवहेलना दिखाने की बात पढ़ा सुना बड़े होकर। मुझे लगता है नेहरू की हीनभावना ही रही कि वे अपने सब राजनैतिक साथियों के साथ दुर्व्यवहार किये। वे अपने बच्चों को छोड़ और किसी राजनीति के साथियों के बच्चों के भविष्य या परिवार के बारे में साथ उदासीन रहें और भाग्य भरोसे छोड़ दिया। अपने और अपने परिवार को देश का मालिक बनाकर रखा मरते तक और वह सब कर गये कि कोई दूसरा कोई उनकी तरह बन न पाये। उसी का फल है किनकी तिसरी पीढ़ी भी राजनीति में बिना किसी योग्यता के देश के राजनीतिक परिवारों में सबसे ज्यादा फ़ायदा उठा रही है। किस देश में एक परिवार का तीन तीन व्यक्ति सांसद है और उन पर करोड़ों का साल में खर्च होता है। स्वाधीनता की लड़ाई के महान कांग्रेसियों के बच्चों का कोई नाम भी नहीं जानता।कैसा चक्कर चलाया गया है और उदाहरण प्रस्तुत किया गया है मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू के चलते इस परिवार द्वारा और बाक़ी सब बैठे दूर से तमाशा देखते रहे और इतिहास के पन्नों से ग़ायब हो गये।

डा. राजेन्द्र प्रसाद पहलीअन्तरिम सरकार में खाद्य मंत्री थे। संविधान गठन होने पर डा. राजेन्द्र प्रसाद उसके चेयरमैन थे।उनकी अद्वितीय याददाश्त के बहुत क़िस्से हैं। एक दिन कुछ संविधान में पारित विषयों के काग़ज़ खो गये थे। जब उन्हें पता चला तो वे सेक्रेटरी को बुलाये और उसको लिखने को कहा। वे बोलते गये पूरा निर्णय और वह लिखता गया। फिर जब वे काग़ज़ किसी तरह मिल गये तो पता चला कि वे पूरी तरह से वही हैं जो राजेन्द्र बाबू ने लिखवाया था। एक दूसरी घटना कि कहानी भी मैंने अपने कालेज के दिनों में सुनी थी किसी अध्यापक ने उनके किसी परीक्षा के सवालों के जबाब को देख लिखा था, ‘ The examinee is better than the examiner.’ खैर इसमें कोई संदेह नहीं कि डा. राजेन्द्र प्रसाद का व्यक्तित्व एक महान था। उन्होंने कुछ किताबें भी लिखीं हैं अपनी जन्म कथा को छोड़ कर, जिसमें उस समय के देश की खाद्यान्न की समस्या पर थी, जिसकी बड़ी सराहना हुई थी।

मैंने मोदीजी को एक ट्वीट भी किया था उनकी पौत्री को यूट्यूब पर सुनने के बाद।
@narendramodi श्रद्धेय मोदीजी, मुझे और शायद देश के सब लोगों को दुख होगा डा. राजेन्द्र प्रसाद की पौत्री के इस पत्रकार के साक्षात्कार की बात सुनकर, मैं सोचता था आप अलग होंगे। भगवान का आशीर्वाद आप पर बरसता रहे, सुनिये …Dr. Rajendra Prasad की पौत्री का वीडियो https://youtu.be/J9VS-qIjo7o?si=@

पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे सुनें और सुनायें और जो आवाज़ उठा सकते हैं या जो भी कुछ कर सकते हैं वे करें।बिहार तो ऐसे ही मतलबी व्यक्तियों का सामाज है जहाँ लोग अपने परिवार को नहीं समझते अपने स्वार्थ के आगे। ऐसी बातों के लिये किसके पास समय है।

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