मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग में कैसे चीन का वर्चस्व

मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग में कैसे चीन का वर्चस्व
मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्री बनने के बाद से भारत का मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर सिकुड़ता गया और इस सेक्टर में आयात बढ़ता गया। हमारे यहाँ के व्यवसायिक और ओ इ एम भी अपने यहाँ पुर्ज़ों को न बनाने का प्यास कर सस्ते पुर्ज़े आयात करने लगे चीन से और उसके बाद से भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर में केवल असेम्बली प्लांटों की तेज़ी से बृद्धि होने लगी। बहुत बड़े बड़े मशीनों के बनानेवाले प्लांट और मैनुफ़ैक्चरिंग के मंझले प्लान्ट बन्द हो गये, पूरे टर्नकी बेसिस पर पूरे के पूरे प्लांट बाहर से आने लगे।
पंजाब मशीनटूल्स एवं कृषि क्षेत्रों उपयोगी मशीनों का दुनिया सबसे बडा केन्द्र हो सकता था, पर वहाँ की राजनीति केवल सरकार से सब कुछ मुफ्त ले पूरे देश के कृषि क्षेत्र को कमजोर कर अपना उल्लू सीधा करती रही।
बंगाल का उन्नत मैनुफ़ैक्चरिंग सेक्टर देखते देखते खत्म हो गया वहाँ की राजनीतिक बदलती कमजोरी से।
गुजरात एक उदाहरण है कि कैसे राजनीति एक पिछड़े प्रदेश को उद्योग और कृषि क्षेत्रों देश का सिरमौर बना सकती है।
महाराष्ट्र की राजनीति का विघटन समय रहते नहीं रोका गया तो वह भी बंगाल की अवस्था में पहुँच जायेगा।
मैंने भी देश के १९७०-८० का सबसे बड़े एक आटोमोवाइल के प्लांट में एक मुख्य भूमिका निभाया है और देखा है कि कैसे बेईमान निवेशक मालिकों की पीढ़ी आने पर वह कैसे मटियामेट हो गया, नहीं तो वह आज भारत का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल कहलाता।
वहीं बजाज ऑटो भी वैसा ही होता अगर वहाँ के भी परिवारवादी मैनेजमेंट में अच्छे उत्तराधिकारी नहीं आये रहते। आज के मैनुफ़ैक्चरिंग क्षेत्रों के मालिक और सी इ ओ पता नहीं क्यों भारत को चीन के रास्ते चल खुद दुनिया बड़ा मैनुफ़ैक्चरिंग उद्योग नहीं बनना चाहते। उनके मैनेजमेंट का ध्येय चीन को जहां तक जबतक नहीं छोड़ने की है जब तक समर्थ सरकार इसके लिये उन्हें थोड़ी दृढ़ता से समझाने की कोशिश न करे। चीन भारत के प्रगति पर हर तरह का रोड़ा लगाने के लिये तुला हुआ। उनके चंगुल से मुक्त भारती य उद्योगों के लिये जरूरी है। अगर ISRO चीन रशिया के सहायता से मुक्त हो सकता है, तो प्राइवेट क्षेत्र की कम्पनियाँ क्यों नहीं? क्यों नहीं अनुसंधान पर खर्च बढ़ाया जा सकता?
अख़बारों के अनभिज्ञ या पैसे के लालची पत्रकारों के लेख इसी बात का संकेत देते हैं, जो नीचे बताया है। अगर टाटा और महिन्द्रा बिजली की कार में अपनी कैपेसिटी यथा शीघ्र न बढ़ायेंगीं तो चीन के उद्योगपति ही पिछले द्वार से भारत पर छा जायेंगे। अगर इस सरकार के रहते यह न रूका तो फिर किसी दूसरे में भारत को मैनुफ़ैक्चरिंग में आत्मनिर्भर या शिरमौर बनाने का ताक़त नहीं होगा। देखिये दो प्रेस रिपोर्ट
https://economictimes.indiatimes.com/news/india/let-the-chinese-come-for-aatmanirbhar-bharats-sake/articleshow/111051275.cms यह लेख सिफ़ारिश करता है कि चीन की बैसाखी के सहारे भारत को आत्मनिर्भर बनना चाहिये।
https://economictimes.indiatimes.com/industry/cons-products/electronics/pcb-dumping-duty-hits-it-hardware-making-under-pli/articleshow/111093438.cms यह लेख बताते चीन के आयात को रोकने के सरकारी प्रयत्न में भारतीय मैनुफ़ैक्चरिंग का नुक़सान हो रहा है।
बहुत कुछ लिखने को है पर अब शक्ति नहीं। अगर आज से ४० साल पहले हम १०० % आयातरहित मोटर कार बना सकते थे तो आज क्यो नहीं, जब मारुति सुज़ुकी के चलते सैकड़ों उद्योग गुरुग्राम के चारों ओर उस समय लग सकते थे तो आज क्यो नहीं? हम उद्योगों को उन सब चीज़ों को भारत में बनाने की कोशिश क्यों नहीं कर सकते। फिर हमारे भारतीय इंजिनियर्स ही कैसे दुनिया के बड़ी कम्पनियों अनुसंधान केन्द्रों को चला रहे हैं?

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