भारत बनाम चीन- भारत क्या जीत सकता-हाँ या नहीं, कैसे हाँ

भारत बनाम चीन- भारत क्या जीत सकता-हाँ या नहीं, कैसे हाँ
हमारी मानसिकता में समस्या से जुझने और हल निकालने का विचार इतने सालों की ग़ुलामी के कारण कम से कम होती गई है। आज फिर हर व्यक्ति में अपनी, समाज की, देश की वैसी मानसिकता को मिटाना है। चुनौती लेना है।

उसके उदाहरण है पिछले वर्षों की कुछ बदलाव की उपलब्धियों की कहानी। हमने कोविद की अपनी वैक्सीन बनाने की चुनौती ली, सफल हुए और अपने और अन्य देशों के करोड़ों की जान बचाई। ५ जी की और चन्द्रयान-३ की सफलता या अपनी डिजिटल अनुसंधानों से मोबाइल फ़ोन को हर हाथ में कहीं भी पैसे निकाल देने और लेने का साधन बना देने के पीछे भी उसी तरह की मानसिकता थी। हम चीन से मुक़ाबला अगर करने की सोचते हैं तो हर क्षेत्र और सामान बनानेवाले और आयात से अपनी जरूरत पूरा करनेवाले उद्योगों के मालिकों एवं उनके मैनेजरों इंजीनियरों वैसी मानसिकता लानी होगी। किसानों को कृषि क्षेत्र के हर पैदावार में विश्वस्तरीय उत्पादकता लाने के लिये भी उसी मानसिकता की जरूरत है। हर विद्यार्थी और उनके माता-पिता, शिक्षकों को वही उत्साह बच्चों में देना होगा। महंगे कोचिंग से देश का हर बच्चा न शिक्षा में, न हुनर में किसी काम का बन पायेगा। विशेषकर निजी क्षेत्र की बड़ी से बड़ी के साथ छोटी से छोटी इकाइयों के मालिकों और उनके द्वारा अपने यहाँ काम करते हर व्यक्ति में उसी मानसिकता को लाना होगा। अन्यथा केवल उनके पास में अकूत धनराशि होगी , चल अचल और बैंकों में या शेयरों में। हर सेक्टर के निजी औद्योगिक मालिक और उनके कुछ चुने हुए ऊपर के २-५ % एक्ज़ीक्यूटिव, कम्पनी के कुल लोगों के वेतन पर खर्च किये जाने वाली राशि का ८० % प्रतिशत हिस्सा लेते हैं, और ८-२०% जही राशि बाक़ी लोगों में बंटता हैं और सबसे नीचे की बड़ी संख्यक लोगों को तो बहुत ही कम वेतन या अन्य फायदा मिलता है, जिसके कारन न उनके पास घर होता है, न परिवार के लोगों को अच्छा खाना नसीब होता है, न उचित शिक्षा या हुनर। यह हाल विशेषकर पश्चिमी देशों के पूँजीपतियों की नक़ल के कारण हुआ है। यह भारतीय विचारधारा के पूरी तरह से विपरीत है।


मैं खुद उन पुराने बड़े पूँजीपतियों के यहाँ काम किया है १९६१-२००० तक और पहले भी औद्योगिक छोटे शहरों में ही रहा हूँ जहां मेरे दादाजी और चाचा काम करते थे।उस समय के मालिकों की सोच कुछ ज्यादा भारतीय थी परम्परागत थी। रामराज्य के सपने को साकार करती। वे अपने नीचे नीचे कर्मचारियों के बारे में सोचते थे और उनको सब तरह की सुविधा देते थे। रहने का घर, बच्चों के पढ़ने के स्कूल, या दक्षता की शिक्षा की व्यवस्था। मैंने उषा सिलाई मशीन और फ़ैन बनाने वाली कम्पनी के प्रमुख मैनेजर टी. आर. गुप्ता को सुना था, बात की थी और उनके बारे पढ़ा था। जो साल में ६ महीने का वेतन एक ख़ास अवसर पर हर साल हर को देते थे। यह कहानी लम्बी हो जायेगी। व्यवस्थित सेक्टरों के उद्योगपतियों को इसी तरह की सोच रखनी होगी। हर कर्मचारियों को कम्पनी का भाग बना हर चुनौती का मुक़ाबला करने की मानसिकता बनानी होगी जिससे हर छोटे बड़े और नये चीजों का अपने यहां बना या बनवा सकें, और निर्यात पर विशेषकर चीन जैसे देश पर नहीं निर्भर रहना पड़े। नये पुराने, छोटे बड़े सभी तरह के उद्योगों के नेतृत्व को जुझारू मानसिकता लाने की जरूरत है, केवल सरकारी रेवड़ी से एक दिन मौज किया जा सकता है, बराबर नहीं। पर चुनौतियों से लड़ने के बल पर आप हर कर्मी को मौज की ज़िन्दगी मुहैया करा सकेंगे और पुण्य कमा सकेंगे ।


प्रधानमंत्री ने भारत में एक विमान विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की कामना की, क्योंकि उन्होंने भारत के एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम), विशाल प्रतिभा पूल और भारत में स्थिर सरकार के मजबूत नेटवर्क की क्षमता पर प्रकाश डाला, ताकि बोइंग जैसी कंपनियां एक विनिर्माण संयंत्र शुरू कर सकें भारत में। वे बोइंग के अमरीका के बाहर भारत में बने सबसे बड़े डिजाइन सेंटर का उद्घाटन करते हुए कहा। इन उद्योगों के सर्वेसर्वा विश्व स्तर भारत सहित विश्व के लिये ज़रूरी स्तर पर अनुसंधान, गुणवत्ता एवं उत्पादन की क्षमता बनाने की मानसिकता होगी और उसी के अनुरूप अपने सभी कर्मियों को ढालना होगा, केवल निजी धनार्जन की नहीं।


(PM wished to build an aircraft manufacturing ecosystem in India as he highlighted the potential of India’s strong network of MSMEs (micro, small and medium enterprises), huge talent pool, and stable government in India, so that the companies like Boeing starts a manufacturing plant in India.)

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