विचारों के जंगल में-७
२७.१२.२०
आज लोक सभा की कार्रवाई देख रहा था, जी. एस. टी. पर चर्चा हो रही थी . एक के बाद एक सांसद केवल किन किन और बस्तुओं पर यह टैक्स कम कर देना चाहिये या हटा दिया जाये की अपनी राय दिये जा रहे थे. वे ऐसा कर रहे थे अपने वोटरों को बताने के लिये कि वे उनकी माँगों का कितना ख़्याल रखते हैं. पिछले तीन महीनों से बराबर टैक्स की वसूली में कमी हो रही है…..क्यों किसी का कोई सुझाव किसी बस्तु के टैक्स को बढ़ा टैक्स वसूली के बढ़ाने का नहीं आता. क्या सभी सांसद भी यही सोचते हैं कि सरकार के पास सब साधन है बिना टैक्स लगाये, बिना बैंकों से लिये क़र्ज़ की वसूली वापस के सरकार चल सकती है? शायद अधिकांश अर्थनीति का ‘अ’ भी नहीं जानते. हाँ, एक चीज़ वे ज़रूर जानते हैं…..लोकसभा की कार्रवाई मे नारे लगा ’बन्द करो, बन्द करो’, ‘नहीं चलेगा , नहीं चलेगा’, आज भी सुनाई दे रहा था.मोदी मामला कभी, अब हेगड़े को निकालो, या माफ़ी माँगे……टी. वी चैनेल उनकी चेहरे दिखाये, उनके नाम अख़बारों में छापे….उनको वोट देनेवाले समझें तो किसे उन्होंने चुना है….क्या बिरोध का कोई भद्र तरीक़ा नहीं हो सकता कि यह ट्रेड यूनियनवाला तरीक़ा ही अख़्तियार करते हैं……आप कोई उपाय बता सकते हैं? दिल्ली में हज़ारों या लाखों में ट्रेडर है अपनी दूकान के बाहर की ज़मीन दखल किये हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश उनको हटाने का है, पर सभी दिल्ली के राजनीति करनेवाले व्यवसायिओं के पक्ष में है…..हर व्यक्ति केवल वेईमानी या ग़ैरक़ानूनी ढंग से ही ज़िन्दगी की कमाई करना चाहता है, और समाज में उन्हीं का उच्च स्थान है…
१६.१२.२०१७
१
पता नहीं आप किस रामायण की बात करते हो…..एक को तो मर्यादा पुरोषत्तम रहने दो, यह चर्चा क्या देगा… अध्ययन करिये तुलसीदास दास के राम चरित को….हमें एक के रामायण से दूसरे रामायण को न मिक्स कीजिये…लोगों की आस्थाओं को बहस का मुद्दा मत बनाइये. बहुत सारी अन्य समस्याओं का हल कर आप सभी नाम कमा सकते हैं. मंजरी जी, राम-सीता , राधा- कृष्ण को छोड़िये, कुछ और कर नाम कमाइये, लोकप्रिय बनिये…..बहुत क्षेत्र हैं जहाँ आप अपने सकारात्मक सुझावों से समाज की सेवा , अपने नाम कमा सकते हैं, बहुतों ने किया है…
२
प्याज़ और टमाटर का दाम आसमान छू लिया है, सभी तकलीफ़ों के लिये मोदी या जो सरकार हो उसको ज़िम्मेवार बता लोग किनारा कस लेते है.ब्यवसायी बेईमानी जमाख़ोरी रोकेंगे नहीं . राज्य सरकारें कुछ करेंगी नहीं और किसानों के पक्ष में बोलती रहेंगी. कोई यह बतलायेगा कि टमाटर और प्याज़ किस राज्य के खेतों की मिट्टी में पैदा नहीं हो सकता. लोग केवल धान, गेहूँ की खेती क्यों करते हैं. जमीन वाले तो वे भी नहीं करते, केवल खेतों को लीज़ पर दे रूपये वसूल लेते हैं, कुछ तो बैंकों से क़र्ज़ ले सूदखोरी करते हैं. खेती कितनी वैज्ञानिक हो गई है, ब्यवसाय की तरह कर लोग लोग लाखों कमा रहे हैं, सब्जी, फल, फूल लगा. एक सज्जन बाँस की पौध लगा लाखों कमाते हैं. खेत के मालिकों के लड़के नौकरियाँ कर खेती की आमदनी को अतिरिक्त आय समझते है, खेती की उत्पादकता बढ़ाने और अच्छी कमाई करने का वे क्यों मिहनत करें. मेरी एक मेड हरदोई की जो घर में सफ़ाई का काम करती है, ने बताया कि पति के पास ३० बीघे ज़मीन है पर वह यहाँ गार्ड का काम करता है, पर बाप के कहने पर भी खेती में रूचि नहीं है. पुरानी सोच एवं कट्टर रूढीयां देश को आगे बढ़ने नहीं देती. आश्चर्य हैं पति पत्नी कोई पढ़े नहीं है, लड़के को भी नोयडा में पढ़ाने की प्राथमिकता नहीं समझते. राज्य सरकारों को इन मूलभूत कमियों और मानशिकता को दूर करने पर ध्यान देना चाहिये, न कि क़र्ज़ माफ़ करने पर. गाँव के स्कूलों में खेती सम्बन्धी बातों को या किसी हस्तकला को क्यों नहीं सिखाया जाये इतिहास , भूगोल पढ़ाने की जगह. हर राज्य अपनी खपत के अनुसार सभी ज़रूरी चीज़ों को पैदा करने पर ज़ोर दें तो महाराष्ट्र का प्याज़ या टमाटर क्यों इतने महँगे हों .
…….
कल शाम मोदी FICCI के एक समारोह में शिरकत किये और कुछ सवाल उठाये पिछले सरकार के बारे में और वैसे सवाल हर क्षेत्र के बारे में पिछली सरकारों से किया जा सकता है. आज शिक्षा संस्थान और स्वास्थ्य केन्द्र भी ब्यवसायिकता की चरमसीमा पर पहुँच भविष्य को अंधकारमय बना रहे हैं, इनसे नुकशान बैंकों के ग़लत तरीके से क़र्ज़ों को उद्योगपतियों को देने और बड़े उद्योगपतियों को छोटों के शोषण की तरह ही है जिसका मोदी ने ज़िक्र किया अपने भाषण में. कृपया इसे ज़रूर सुनें और सुनायें. बहुत सवाल हैं कोई सरकार या उसका प्रमुख विना सबके निरन्तर सहयोग के देश की दशा को पाँच साल में सुधार नहीं सकता. हर क्षेत्र में आज़ादी के बाद रूपये कमाने की जो एक होड़ लगी है, अमरीकी समाज की नक़ल करने की प्रवृति आई है, और आत्महत्या, घृणित वलात्कार, हत्या, आदि को बढ़ाती जा रही है वह क़ानून से नहीं सुधरेगी . हर पाँच साल बाद सरकार बदल जायेगी, नये नेता पैदा हो जायेंगे, अगर जीत गये ,वे अपनी मनमानी तरह से सरकार चला चले जायेंगे (अरविन्द केजरीवाल) और आज के बिरोधियों की तरह सरकार की हर क़दम का बिरोध करते रहेंगे , पाँच साल में भी जो हो सकताहै उसकी गति भी कम हो जायेगी. दस साल सरकार चलानेवाला तीन साल के सरकार से जबाब तलब करता रहेगा, आम ब्यक्ति तक सरकारी सुधार के लाभ को भी नहीं पहुँचने देगा……समस्या गंभीर है. क्या ऐसे ही चलता रहेगा….
१३.१२.२०१७: आज रामायण और गीता का अलख विदेशों में भारतीय मूल के लोगों के लिये चिन्मय मिशन और अन्य जगा रहे है, पर गाँवों जो प्रथा थी हर दरवाज़े पर रामायण को गवनई की तरह गाने की गाने की, ख़त्म हो गई टी वी के चलते, पाठ्यक्रम से भक्त कवियों के दोहे आदि हटा दिये गये सेक्ल्यूरिज्म के चलते, चरित्र निर्माण हो तो कैसे, किसी तरह ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना, अभक्ष्य खाना, आदि सर्व प्रमुख उद्देश्य या लक्ष्य हो गया जीवन का…..कहॉ पहुँचेंगे हम मालूम नहीं…
५.१२.२०१७: मेरे साथ हिन्द मोटर्स में काम किये हुये दुबेजी एवं अन्य खडगपुर के एलमनी को मैंने राजनीतिक विषयों के बारे में बेकार बहस न करने की पहल की कुछ दिन पहले. कारण, इन अति निम्न श्रेणी की राजनीतिक दांवपेचों की बहस में कुछ फ़ायदा नहीं क्योंकि भोट देने वालों की राय को हम बदल नहीं सकते. सत्य यह है कि इस देश में भोट का व्यवसाय पेशा या रोग बहुत ही व्यापक रूप से फैल चुका है. गुजरात के चुनाव ने सब सीमायें तोड़ दी. प्रजातंत्र का यह भविष्य होगा सोच कर मन में तकलीफ़ होती है, सोशल मीडिया एवं समाचार पत्र , टेलिविज़न उसमें ब्यवसायिक लाभ के लिये और हवा दे रहे हैं. पर अगर हम कुछ करना चाहते हैं तो हमें अपने ज्ञान एवं अनुभव को बाँटना चाहिये, यह मेरी राय है. कुछ तकनीकी और सुधारत्मक सुझावों की हम इंजीनियरों से लोगों को अपेक्षा भी होगी. मैं हरदम से विना बहुत देरी निर्णय और नये रास्तों को खोजने का पक्षधर रहा और जो थोड़ा मौक़ा मिला किया…यही कारण है कि मोदी मुझे पसन्द हैं और राहुल नहीं. राहुल कमसेकम दस साल में संसद और सरकार के द्वारा बहुत कुछ कर सकते थे, कम से कम अपने संसदीय क्षेत्रों में, जो मॉडेल बनते दूसरे सांसदों के लिये, माँ से ज्यादा पढ़े लिखे हैं, पर आज भी वे कुछ नयी तरह से करने की पहल नहीं कर रहें हैं, राजनीति में भी. राहुल अगर कम से कम कांग्रेस को एक मज़बूत विपक्षी दल की तरह ला सकें तो बहुतों को, और मुझे भी ख़ुशी होगी. पर हम वंशवादी परम्परा से जनतंत्र को नहीं चला सकते. उदाहरण भी हैं लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, मायावती, बादल, जयललिता, यहाँ तक की ममता भी……यह राजीव गांधी के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिये था, पर नहीं हुआ कांग्रेस के बहुत परिपक्व नेता मन मशोश कर रह गये होंगे, पर किसी को कहने का साहस नहीं हुआ….मान लें अबतक तो चल गया…पर आगे तो बदलना चाहिये….अब बताइये राहुल के बाद कौन गद्दी संभांलेगा….ऐसी कांग्रेस की कल्पना न तिलक ने की होगी, न लाजपत राय, न सुभाष बोस, यहाँ तक नेहरूजी भी नहीं…देश की युवापीढी नये एवं परिपक्व नेतृत्व देने में अब तक अक्षम रही है…..पता नहीं आगे क्या होगा…हम अपने जीवन मूल्यों को सभी क्षेत्रों में इतनी तेज़ी से भूलते जा रहे हैं कि डर लगने लगा है……
२
किसी देश या संस्था का बिकास यात्रा हर सरकार के साथ चलते रहना चाहिये, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य , उद्योग में विश्वीय स्तर का बना जा सके. किसी पाँच साल के लिये चुनी नई सरकार के सुधार दूरगामी होने चाहिये. दुर्भाग्यवश दसको से जो नीतियाँ बनती बदलती गईं, वे देश या लोक हित नहीं रहीं. देश का एक बहुत ही अल्प संख्यकवरग बहुत आगे निकल गया पर एक बडा तुड़ा बुरी तरह पिछ गया. यही मान्यदंड होना चाहिये हर सरकार के कृतित्व को समझने का. और अगर ऐसा हुआ तो क्यों हुआ, क्यो तत्काल चुनाव जिताने या लुभानेवाले कार्यों पर अधिकत्तम व्यय हुआ.देश का मध्यम वर्ग, आम ग़रीब जनता, किसान, मज़दूर को लूटता ब्यवसायी वर्ग किसकी देन है इस आर्थनीतिक अवस्था, किसने स्वतंत्रता के बाद तीन साल पहले तक राज्य किया, क्यों नहीं इसका कुछ उपाय सोचा? क्यों लोगों को ब्यवसायों में काम करते लोगों को न्यूनतम मज़दूरी नहीं दी जाती, क्यों किसानों को निम्नत्तम मूल्य से भी कम पर अपनी तैयार ऊपज बेचनी पड़ती है, क्यों देश के स्कूल , कालेजों से शिक्षक निकल कोचिंग सेन्टरों में भागे चले जाते हैं और स्कूल , कालेज वीरान हो गये? किन्होंने सरकार से यह ज्ञान केन्द्र क्षेत्र अपने क़ब्ज़े में कर लिये और ब्यवसायिक धंधा बना दिया?
कल तक राहुल गांधी ‘जनेऊधारी हिन्दू’ बने थे, आज अपने और अपने परिवार को ‘शिवभक्त’ बताया और शायद कल अपने को बंशीबट के नाचनचैया भी कह दें राधा के कृष्ण के भक्त होना घोषित कर दें द्वारका में. हिन्दुस्तान की जनता मान भी ले शायद. कहते है हम धर्म की राजनीति नहीं करते, पर पहली बार ग्यारह या एकीस मन्दिरों का आशीर्वाद हित ही दौरा तो शादी के लिये नहीं थी, राहुल को तो ग्यारह, मस्जिदों और गिरजाघरों में भी जाना चाहिये. चुनाव के चक्कर में देश की अर्थनीति को चौपट कर रहे हैं कल किसानों के क़र्ज़ों की माफ़ी की घोषणा की है, अपने साठ साल के वायदों को भूल जाते है और गुजरात की समृद्धि के मॉडल को ग़लत बताते चलते है. अपनी दो चुनाव क्षेत्र में वैसा ही बदलाव क्यों नहीं ला सके जिसे अपने परिवार की बपौती समझते हैं .कल बन्द दरवाज़े के पीछे ब्यवसायियों से भी बात की हैं पता नहीं क्या क्या वायदे किये होंगे, क्या उल्टा सीधा कहा होगा. इन्हीं के कारण यू पी में मोदी को क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा करनी पड़ी. चस्का लगा है २००९ के चुनाव जीतने का जिसके पहले क़र्ज़ों के माफ़ी की घोषणा की गई थी और उस समय के तरीके में जब बैंक खाते में पैसे नहीं जाते थे, आधार नहीं था. किसके खाते में गये रूपये? क्यों ऐसे वायदों को सुप्रीम कोर्ट रोक नहीं लगाती जो देश हित नहीं है? राहुल गांधी नेहरू परिवार की सबसे अपरिपक्व ब्यक्ति हैं, और सोनिया जिसने प्रियंका को पीछे ढकेल दिया. क्या उम्मीद रख सकता है यह देश ऐसे युवराजों से? गुजरातियों का सब आत्मसम्मान मर गया है कि वे अपने प्रधानमंत्री की बात न मान एक ग़ैर की बात मानेंगे. सभी हवा मीडिया की है…..वेईमान ब्यवसायी वर्ग की है….देश के लोगों को असली लड़ाई उस वर्ग से करना होगा.
Rahul Gandhi today said he and his family members were ‘Shiv Bhakts’ (devotees of Lord ShivaBSE 0.00 %) but asserted that he did not want to use his religion for political gains
30.11.2017: (गुजरात में महाभारत छिड़ा हुआ है. लगता है देश केवल चुनाव के लिये ही स्वतंत्र हुआ. केन्द्र की सरकार पाँच साल के लिये चुनी गई. पर नयी सुधारों का बिरोध जन मानस को विकृत करने के लिये, एक के बाद एक चुनाव जिनमें महीनों मीडिया और नेता ब्यस्त रह, कहीं न कहीं जनहित कार्यों की गति पर तो असर पड़ा ही, बच्चों की पढ़ाई पर भी क्योंकि सभी शिक्षक और बहुत सारे जनसेवा के अधिकारी लगे रहे चुनावों के काम में.प्रधानमंत्री ने पुरज़ोर सिफ़ारिश की सभी चुनावों को हर पांचसाल में एक साथ करने की, कुछ बुद्धिजीवियों ने भी सुझाव दिया इसके लिये, बिरोधी दल एक साथ बैठ विचार विमर्श के लिये भी तैयार नहीं, देश राजनीतिक रंग में ऐसे रंगता जा रहा है कि कुछ दिनों में हम इसे छोड़ कुछ करेंगे ही नहीं, चुनाव सब आन्दोलनों से जुड़ते जा रहे हैं या तक कि देश हित के जी एस टी और आधार की तरह की चीज़ भी. धर्म उनसे जुड़ी संस्थाएँ, मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर भी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं. कल का समाचार तो और हास्यप्रद था. एक दल के शीर्ष नेता को किसी ने अपने को ग़ैर हिन्दू की श्रेणी में डाल सोम नाथ मन्दिर में प्रवेश करने का समाचार दिया, फिर उसी दल के प्रवक्ता ने उन्हें जनेऊधारी हिन्दू बताया, जब देश जानता है कि उनके पिता पारसी थे एवं उनकी माँ ईसाई हैं. कौन बताये कि वे हिन्दू हुये कि नहीं. अब हमारी तरह के बहुत लोग जनेऊ नहीं पहनते उन्हें जनेऊधारी हिन्दू बताने की क्या ज़रूरत आ पड़ी. क्या गुजराती जनता इतनी बेवक़ूफ़ है कि उन नेता की ११ या १११ मन्दिरों में जाने से प्रभावित हो उनके दल को भोट देगी और अपने प्रान्त में केन्द्र की बिरोधी सरकार बनायेगी. यह तो गुजरातियों का स्वर्णिम समय है. गुजरातियों को काम भी नहीं करना वे ब्यवसाय करना चाहते हैं, मोटी रक़म कमाना….देश देशान्तर तक यही उनका काम है…अमरीका के सभी मोटल पटेलों के, सभी डाक्टर पटेल, सभी भारतीय दुकानें पटेलों की…… http://indiatoday.intoday.in/story/rahul-gandhi-somnath-temple-row-congress-reaction/1/1099757.html Not only is Rahul Gandhi ji a Hindu, he is a ‘janeu dhari’ Hindu. Said, Surjewala, Congress spokesman )
१६ नवम्बर को रात गये राकेश आये . उनके अनुरोध के कारण मैंने यमुना को भी इस बात की सूचना नहीं दी थी. अब उम्र के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ सब की सब इच्छा बिना तर्क मान अपने को पाक साफ रखना चाहता हूँ. शायद यमुना को राकेश का सामने आ खड़ा होना आश्चर्यपूर्ण लगा होगा, और आकस्मिकता का आनन्द दिया होगा. सब कुछ तैयारियाँ बडी सावधानी से की गई, खाना भी ढीक ढाक ही मिल गया राकेश को. जितने समय साथ रहे, बहुत विषयों पर बातें की गीता से ले हिन्दी कविता की जो दोनों आज मेरा प्रिय विषय है समय के सदुपयोग का, मेघदूतम् पार्क में में मेरे साथ घूमने गये और मेरे दोस्तों से भी मिले अच्छा लगा. यह अच्छा है कि सभी अमरीका में रहनेवाले लड़के यहाँ आने अपना विशेष ख़्याल रखते हैं माँ की प्रेमपूर्ण आग्रह को विनमरता के साथ न मान कर . फिर भी राकेश बीमार पड़े पेट की ख़राबी से. यहाँ के डाक्टरों की बदनामी के क़िस्से अमरीका तक पहुँच चुके हैं और वे वहीं से तैयार हो आते हैं. पर हर मांबाप को कम से कम यहाँ के आम ब्यवहार में लाये जाने पानी से बचाना चाहिये और उन्हें अच्छे मिनरल बॉटल का पानी ही देना चाहिये. राकेश की सबसे अच्छी बात उनका अनुशासित जीवन पद्धति है, अल्पना के आदेशों का अनुकरण कर दो दिन में ढीक हो कार्य ब्यस्त हो गये. हम लोगों बच्चों की छोटी बीमारी से अब भी तनाव हो जाता है- बुढ़ापे की कमज़ोरी है , क्या किया जाये, स्वभाव बदलता नहीं, .आजभर हैं , कल के बाद अमरीका की ओर…..
२३.११.२०१७
१ देश के हर माँ बाप को यह शिक्षा लेना चाहिये कि बेटियों को उतनी ही सुबिधा और बढ़ावा मिलना चाहिये जितना लड़कों को…..और आज अगर बच्चों के दिमाग़ में यह बात बैठा दी जाये कि आज उनका भविष्य उनकी मिहनत है….वे सब कुछ कर सकते हैं जो धनी परिवार के लोग कर सकते हैं….पैसे की कमी के कारण कोई IIT, या IIM में नहीं पढ़ सके , अब नहीं हो सकता……मेरे घर दो महिला सहायक हैं यमुना की हरदोई से, एक अपने बेटी और बेटे पर तीन हज़ार प्लस ख़र्चा करती है हर माह….दूसरी जो साल से ऊपर काम कर रही है समझती ही नहीं पढ़ाई की ज़रूरत लाख समझाने पर भी, न बैंक में खाता खोलने की..बहुत कहने पर छोटी लड़की पढ़ाना शुरू किया ५०० रूपये महीना ख़र्चा कर, पर यहाँ भी तथा कथित शिक्षक कुछ पढ़ाते नहीं…. शिक्षकों की रूचि पढ़ाने में ख़त्म हो चुकी है… राज्य सरकारों का शिक्षा पर न्यूनतम ध्यान है क्योंकि इसकी कमियों पर आन्दोलन नहीं होते…. जितना संरक्षण के लिये या क़र्ज़ माफ़ करने के लिये होते हैं…हम यह कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ग़रीब अपढ़ माँ बाप बच्चों को वह कुछ वातावरण नहीं दे सकते जो धनी मॉबाप करा सकते है… पर अच्छे शिक्षक और अपढ़ मां बाप का थोड़ा सामान्य ध्यान यह स्थिति बदल सकता है…
२
(आज स्वाधीनता के करीब ७० साल बाद भी राष्ट्रीयता से ज्यादा धर्म एवं विशेषकर जाति प्रथा ज़हर घोल रही है विश्वीय शक्ति बनने के प्रयास में एक बहुत बडी बाधा, आज गुजरात में दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दल या अन्य दल जातियों समीकरण से चुनाव जीतने की गन्दी लड़ाई में लगे है. मन्दिर, मस्जिद, संरक्षण चुनाव का मुख्य मुद्दा बना हुआ है. जब राजस्थान के राजपूतों को एक हो विदेशियों के भारत पर हुये आक्रमण का बिरोध कर बचाना था तब वे एक नहीं हुये, एक काल्पनिक चरित्र के अफ़वाहों पर पूरे देश के राजपूत एक हैं. सोचने की बात है, गीता के समय से राजपूतों को ही स्वभाव व कर्म से लडाकू जाति मानी जाती थी, पर वे आपस में रोटी, बेटी की बातों को ले एक दूसरे के जान के दुश्मन बनते रहे और देखते देखते देश ग़ुलाम हो गया.जाट, पट्टीदार पटेल जो सम्पन्न जाति के है, अमरीका के सारे मोटल पटेलों के हैं और सभी ब्यवसायों में वे आगे हैं, अन्य पिछड़ी जाति की तरह संरक्षण माँग रहे है, उन्हीं सब की देखा देखी भूमिहार जो अपने को अयाचक बराहम्ण कहते हैं, ज़मीनों के मालिक हैं, सम्पन्न है वे भी संरक्षण का आन्दोलन कर अपने को पिछड़ा बताने में ब्यस्त हैं. क्या सरदार पटेल या सहजानन्द सरस्वती ज़िन्दा होते तो संरक्षण मांगते? क्या देश के बुद्धिजीवियों को एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुला, बिचार विमर्श कर, संरज्ञण कैसे ख़त्म किया जाये, की पहल नहीं करनी चाहिये? यह अदभुद् बात है कि देश की सर्वमान्य जीवन दर्शन देने वाली गीता के अनुसार सभी जातियों को आज मौक़ा है अपने स्वभाव और कर्म के अनुसार शिक्षा एवं हुनर सीख गीता में वर्णित चार वर्णों में किसी वर्ण का बनने का और राष्ट्रीय एकता की तरफ़ बढ़ने का. वैसे स्वभाविक तर हम अपने शरीर से सभी वर्णों का काम रोज़ करते हैं, ज़िन्दगी के कार्यकारी समय में सभी वर्णों का काम करते हैं. एक व्यक्ति जब काम प्रारम्भ करता है तो शायद सेवक रहता है पर हर पदोन्नति के साथ वह सर्वश्रेष्ठ वर्ण की ओर बढ़ते जाता है आज के औद्योगिक समाज में. भूलें जातियाँ, बने राष्ट्र सेवक….आज की पीढ़ी करेगी तो केवल देरी होगी, पर जाति प्रथा का ख़ात्मा तो होना ही है. ’जाति, धर्म है नहीं श्रेष्ठ अब, एक श्रेष्ठ राष्ट्र अभिमान’.
http://www.bbc.com/hindi/india-42080687
पुनश्चः गीता से उद्धृत-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
भावार्थ : हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ॥41॥ (कहीं जन्म आधारित वर्ण का ज़िक्र नहीं है)
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
भावार्थ : अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ॥42॥
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
भावार्थ : शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ॥43॥
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
भावार्थ : खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम ‘सत्य व्यवहार’ है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ॥44॥(यह भी जाति पर नहीं आधारित हैं, अगर शिक्षा एवं हुनर के अभाव में वैश्य, क्षत्रिय, या वराहम्ण का काम हासिल नहीं कर सकते तो सेवा के कार्य से ही जीवन यापन प्रारम्भ करना होगा…….)
१५.११.२०१७: राजपूत करनी सेना का पद्मावती का बिरोध सुन पढ़ हँसने का मन करता है. कुछ लोग अपनी जातिय निष्ठा के बीमार सब तरह के हथकंडे अपना रहे हैं इस देश में अपना उल्लू सीधा करने के लिये. दुर्भाग्यवश , देश का प्रजातांत्रिक संविधान ऐसे सामूहिक बिरोध से हुये देश की एकता, सम्पति आदि के किसी सीमा तक की हानि पर कोई दंडबिधान नहीं किया है. साथ ही जब शान की लड़ाई के समय धनराशि अर्जन करने का समाचार आता है, जातीय श्रेष्ठता पर भी सवालिया निशान लग जाता है. पैसा कमाने के लिये ऐसे हथकंडें? कभी वे करनी सेना के सदस्य यह क्यों नहीं सोचते कि केवल राजपूताना के सभी राजपूत एक हो बिदेशी आक्रमणकारियों का सामना करते तो देश ग़ुलाम नहीं होता.कैसे यह सुदूर बिहार के चन्द्रगुप्त और अशोक सारे देश को अफ़ग़ानिस्तान तक एक कर सके, जब मौक़ा आया तो राजपूताना फिसड्डी निकल गया. आज किस बात पर यह अपने को श्रेष्ठ दिखाने की लड़ाई? मुहम्मद जायसी की एक क़लम से लिखी एक पंक्ति कुछ भी कर सकती थी उनकी इज़्ज़त का. जब इतनी बडी शहादत हुई उसके बारे में कोई राजस्थानी कुछ न लिखा…..बन्द करो यह बकवास टी.वी और मीडिया पर इन देशद्रोहियों को दिखा, आज तो कुछ करो राजस्थान की शान बढ़ाने के लिये….बंसाली, दीपिका को नुकशान पहुचांनेवाली संस्था या ब्यक्ति केवल नामर्द हो सकता है या रावण के बंश का…..
…भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के अभियान से हासिल हुईं उपलब्धियां क्रांतिकारी हैं, लेकिन देश के अंदर मौजूद भ्रष्ट तत्वों की सफाई अभी बाकी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई काफी गंभीर और जटिल है। इसमें वापसी का कोई रास्ता नहीं है, सिर्फ आक्रामकता के साथ आगे बढ़ना होगा। जाहिर है कि इसे कुछ देर के लिए भी रोका नहीं जा सकता। …..
१५.११.२०१७: कल से प्रदूषण बहुत कम हो रहा ह, विशेष कर सबेरे. मीठी मीठी ठंढ भी है हूड्डी लायक. पर मेघदूतम् पार्क में घूमनेवाले लोगों की संख्या एकदम गिर गई है. हमारी उमरवाले तो एकदम ग़ायब है. घूमने के रास्ते सुनसान हैं. यह मीडिया का कमाल है. बडी बडी चेतावनियाँ दे लेख छपे, डाक्टरों के साक्षात्कार और टी.वी. तो केवल यह समाचार ही देती है. शायद यह भी टी आर पी का धंधा हो. हमारी तरह के लोगों को सबेरे न निकलने पर बहुत कोफ़्त होती होगी. मुझे तो होती है क्योंकि पढ़ पढ़ कर थक जाता हूँ, क्योंकि पढ़ने भी मन माफ़िक़ चुनाव करना पड़ता है. मुझे पार्क आ एक बात की ख़ुशी होतों है कि सैफाबाद एवं होशियारपुर गाँव के बहुत बच्चे आते है अलग अलग दल में , दौड़ते हैं , वर्जिस करते है. कुछ बृद्ध भी गाँवों से बराबर आते हैं, उनसे कभी कभी बात कर अच्छा लगता है. वे तो पैदल आते हैं पर उनके बड़े बच्चे बडी बडी गाड़ियों में, सभी करोड़पति हो गये हैं नोयडा के बिस्तरा से. सभी ने बडी बडी चालों की लाइन के लाइन घर बना लिये बाहर आये मज़दूरों के लिये. लाखों में केवल भाड़े से कमाते हैं. हमारी एक महरी २५०० रू देती है, दूसरी ४००० रू हर माह. कोई टैक्स नहीं, पूर्व जन्म की कमाई लगती है….हाँ, मेघदूतम् पार्क इतना अच्छा होते हुये भी एफ ब्लॉक के शायद ही स्कूली बच्चे यहाँ आते हैं, अब तो खुले में जिमनाजियम का नया आकर्षण भी हो गया है….नई पीढ़ी ज़रूर अपने को नई तरह से स्वस्थ रहने और आगे बढ़ने के महँगे रास्ते ढूँढ ली होगी….
१४.११.२०१७: मैं बार बार सभी से कहता हूँ , लिखता हूँ कि कृषि को ब्यवसाय की तरह करना चाहिये. यही रास्ता है खेती से धन उपार्जित कर सम्पन्न, समृद्ध होने का. जिस तरह से खेतों की उत्पादकता बढ़ाई जा सके, नये तरीके, अच्छे बीज, सठीक ज़मीन के आवश्यकता के अनुसार खाद. सभी लागत में लाभ का भी हरदम ख़्याल रखना. आश्चर्य है कृषि, पशुपालन, ब्यवसाय को गीता में एक स्वभाविक गुण के ब्यक्तियों का पेशा बताया गया है, बैश्यों की. मुझे केवल यह कहना है यह स्वभाविक जाति से परे किसी भी ब्यक्ति में हो सकता है. पर मजबूरी से अगर पैतृक ज़मीन की खेती ही जीवन यापन के लिये करना है, तो उसे पूरी निष्ठा से करनी चाहिये. उसकी सभी बारिकियाँ को जानना समझना चाहिये, सबसे अच्छे तरीके से करना चाहिये, जिससे घाटा न हो, अधिक से अधिक लाभ हो. अच्छी खेती करने के लिये खेती आधुनिक ब्यवहृत तरीके का ज्ञान जरूरी है, अच्छे सफल खेतिहरों से , कृषि में पारंगत लोगों से सीखना होगा उन्हें गुरू मान, गुरू दक्षिणा दे अगर ज़रूरी हो.यह सदा ध्यान रखना होगा, और खेती को साइड बिज़नेस की तरह नहीं किया जा सकता. गीता की तरह सर्बमान्य ज्ञान की पुस्तक में यह है, यह है कर्म योग, अपने नियत या स्वाभाविक काम को पूजा की तरह करना और यही सहज रास्ता परमात्मा को सरल रूप में पाने का. मोदी किसानों की आमदनी दुगनी नहीं कर सकते, यह किसानों को ख़ुद करना पड़ेगा अपने अध्यव्यवसाय से. दो बातें कह सकता हूँ आज के बाज़ार मूल्य को देख जिसका मैं भी भुक्ति भोगी हूँ, हर साल में एक दो बार या ज्यादा टमाटर , प्याज़ का दाम आसमान चूमने लगता है, और उसका फ़ायदा कौन खाता? ब्यवसायिक समाज. क्या इसे किसानों के पास लाने का तरीक़ा नहीं निकल सकता? सरकार द्वारा नहीं, हमारे देश के आम किसानों द्वारा..
१३.११.२०१७ न इनका न इनके माताजी का धर्म हिन्दू है, राजीव गांधी केवल पारसी हो सकते हैं क्योंकि उनके पिता धर्म परिवर्तन कर हिन्दू धर्म अपनाये थे कि ख़बर मुझे नहीं, सोनिया गांधी के धर्म परिवर्तन की बात कहीं पढ़ी नहीं. फिर राहुल तो पारसी या ईसाई होंगे, अगर ये अपना धर्म परिवर्तन नहीं किये हैं हिन्दू में. यह शायद हिन्दू धर्म की उदारता है कि वे सभी धर्मवालों को पूजा करने का प्रबंध कर देते है . पता नहीं धर्म में यह मान्य है या राजनीतिक फ़ायदे के लिये पुजारी ऐसा करते है.