कुछ सामयिकी…..

श्रद्धांजलि
क्यों यह मौत का बरण
बनते बनते एक भावुक कबि
एक समस्यायों के कथाकार
एक यथार्थ दार्शनिक या कुछ और
बदलने के लिये सदियों की रूढियां
बिना मरे कर सकते थे बहुत कुछ
मौत नहीं करती समस्या का समाधान
मरने पर केवल एक भीड़
जमा होती अपने लिये
चीख़ती चिल्लाती है
गर्दनों को काटने कर बात
कहीं खिसक जाती है
अपने गन्तव्य की ओर
और सब रह जाता
वहीं और वही
पर फिर मौत नहीं
समस्या समाधान

Indian Express had published this letter. However,it seems the original was not in English or Hindi. It made me write.
http://indianexpress.com/article/opinion/columns/writer-commits-suicide-my-suicide-note/
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……अभी न जाओ छोड़ के कि दिल अभी भरा नहीं………’ ४७ साल पहले की बात है, १९६२ की, हम ६ इंजीनियर हिन्दमोटर के बड़े फ़्लैट ४२ में रहा करते थे, चार आने में फ़िल्मफ़ेयर आती थी, लेते थे, जब काफ़ी जमा हो जाती तो कबाड़ी में बेंच देते थे, एक बार दो पुरानी पत्रिकाओं को हम दो- मैं और मुरलीधर- रखना चाहते थे क्योंकि एक के मुखपृष्ठ पर साधना थी, दूसरे पर सायरा बानों, बोली लगी, हमारी बोली २५ रूपये तक गयी, मैंने पहला रखा था पता नहीं कबतक…..
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आनन्द आया, आनन्द रहा, आनन्द गया, और आनन्द गया, पर हमें तो आनन्द के साथ ही रहना होगा । कुछ सीखा, कुछ सीखना है आनन्दित रहने के लिये । परिस्थितियाँ बच्चों का साथ और आनन्द सदा तो नहीं दे सकती । वैसे छोटी छोटी चीजें मुझे आनन्द देती रहती हैं । आज फुलवाले से बात की, उसने बताया कि अच्छी कमाई कर लेता है । मैंने फिर उसे सलाह दी-अगर दिवाली के पहले अपने ग्राहकों से पता कर लेते उनके फुलों और मालाओं की ज़रूरत और दे देते तो तुम्हें भी अच्छा लाभ होता और हमें भी उसे बाहर जा ख़रीदने की तकलीफ़ नहीं उठानी पड़ती । उसने माना और मुझे आनन्द मिला…..इसी तरह आनन्द खोजते रहता हूँ…..तीन प्रोजेक्ट आम्रपाली इडेन पार्क के पास आ रहे हैं- मेट्रो स्टेशन, एफ ब्लाक का क्लब, और मेदान्ता का हास्पिटल………आते जाते इनका बनते हुए देखना काफ़ी समय तक आनन्द देता रहेगा….हर ब्यक्ति इसी तरीक़े से आनन्द खोज सुखी रह सकता है……….
(आनन्द मेरा सबसे छोटा बेटा है जो सपरिवार कुछ दिनों के लिये अमरीका से आया हुआ था छुट्टियों पर भारत)
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सबसे पहले सभी भूमिहार ब्राह्मणों को प्रण करना है कि वे अपने बच्चों पर ध्यान देंगे, और लड़कियों पर भी उतना ही, पढ़ाई के बारे में. आज थोड़ी सी भी ज़मीन वाले बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते. आज की नौकरी पैरवी से नहीं मिलती, योग्यता से मिलती है.
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पिछले दो दिनों से सबेरे घना कोहरा आ जाता है, इस बार यह कम हुआ है, प्रदुषण भी कम है. सबेरे निकलने में डर लगता है इस उम्र में, ऐसे कोहरा में. शाम को जाता हूँ घूमने का कोटा पूरा करने. पढ़ने लिखने में ही समय लगाता हूँ. पर कभी कभी थक जाता हूँ . कितना पढू , इतना कुछ है. पर आज पढ़ने के लिये उत्साहित करनेवाली कुछ नई बातों की जानकारी मिली: पढ़ने से मांसपेशियों एवं हृदय का तनाव कम होता है. पढ़ने से मानसिक तनाव की मात्रा ६८ प्रति शत तक कम होती है, जब कि संगीत सुनने से ६१ प्रति शत, काफ़ी या चाय से ५४ प्रति शत् और घूमने से ४२ प्रति शत, भीडियो गेम से केवल २१ प्रति शत……http://www.telegraph.co.uk/news/health/news/5070874/Reading-can-help-reduce-stress.html चलिये पढ़ने में हम सभी थोड़ा और समय लगायें. अपने शौक़ के अनुसार किताबों या पत्रिकाओं का चुनाव करें, ख़रीदे और पढ़ें.
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कंहा से शुरू हुई, कंहा ले जायेगी इस देश को जाति प्रथा?

वर्ण ब्यवस्था को सदियों पहले तत्कालीन समाज को ब्यवस्थित करने के लिये प्रारम्भ किया गया था. यह ब्यक्ति के जन्म पर नहीं, वल्कि वह किस कार्य में लगा है उस पर आधारित थी. ब्राह्मण का पढ़ना-पढ़ाना, क्षत्रिय का युद्ध में लड़ना और समाज की रक्षा करना, बैश्य ब्यापार करना और सम्पति संजोना, और चौथा वर्ण अन्य सबका था जो ऊपरी तीनों को कार्य सिद्धि में सहायता करते थे. यही कारण था कि विश्वमित्र ब्राह्मण बनने के लिये तपस्या किये. रावण ब्राह्मण होते हुये भी समाज में राक्षस बन गया. धर्म एवं जातियाँ न लोगों को महान बनने से रोक सकीं, न बैबाहिक सम्बन्ध स्थापित करने से, न बाल्मीकी को, न बेदव्यास को और न हीं महाभारत काल के शान्तनु को, न चन्द्र गुप्त मौर्य को. समाज में कभी उनके जाति की चर्चा नहीं हुई, न उन्हें हेय समझा गया. http://timesofindia.indiatimes.com/india/70-generations-ago-caste-stopped-people-inter-mixing/articleshow/50859632.cms According to a a path-breaking genetic based study, the interbreeding between communities `abruptly’ ended around 70 generations ago, which translates to about 1,575 years ago, sometime in the 6th century . It coincided with the period when the Gupta Empire ruled India.
समय गुज़रता गया, और काम के अनुसार सैकड़ों, हज़ारों जातियाँ बनती गई , क्योंकि संतानें भी वही काम सीखती रहीं जो पूर्वजों की थी. फिर हर जातियां अनेक नामों से बँटतीं गईं, जैसे ब्राह्मणों में – कान्यकुब्ज, सकलद्वीपीय, मैथिल, गौड़, और पता नहीं कौन कौन……सब अपने को दूसरों से श्रेष्ठ सिद्ध करने में किसी हद तक मिथ्या प्रचार में जाने लगे. सब मुख्य जातियों में यह हुआ.
आश्चर्य है आज़ादी के बाद एक नई बात दिखी, कुछ तथाकथित नीचे की जातियां बड़ी जातियों की पदवियाँ लगाने लगीं- सिंह, ठाकुर, राय, शर्म्मा ……….सभी इसीतरह के एक नाम जादव सिंह से परिचित होंगे………यह मेरे बिचार में कहीं न कहीं ऊपर आने की आकांक्षा का चिन्ह था. एक और तरीक़ा अपनाया गया, लोगों ने अपने के आगे पदवी लगाना छोड़ कर ‘कुमार’, ‘प्रसाद’ लिखने लगे….,,,,,,,
पर फिर आया संरक्षण और अब होड़ लगी है अपने को उन जातियों में सम्मिलित करने का जिन्हें संरक्षण दिया गया है बिभिन्न पार्टियों की सरकारों द्वारा चुनाव जीतने के लिये ….. पर सार्वभौम शिक्षा का अधिकार जातिगत पेशा से निकाल कर सभी को एक समान धरातल पर ला दिया.

आज शिक्षा और कुछ कर गुज़रने की ठान लेने पर किसी जाति एवं धर्म का ब्यक्ति अपनी इच्छानुसार कार्य चुन सकता है. संस्कृत में एक कहावत है ‘बिद्वान सर्वत्र पूजयते’. बिद्वानों की पूजा असल में होने लगी है. स्वेच्छा से अंतरजातिय शादियाँ कर रहे हैं आज के युवक युवती और सम्मानित जीवन जी रहे हैं. हर किसी को अधिकार है शिक्षा और हुनर पाने की. फिर यह छोटी बड़ी जातियों की मानसिकता क्यों. यह केवल हार जाने पर हारने का बहाना हो सकता है सुविधा या सहारे की कमी नहीं. रोहित वेमुला या महेश बाल्मीकी या कोई जब उच्च शिक्षा संस्थान में दाख़िला लेता है तो वह ब्राह्मण बन जाता है, उसे वैसे ही अनुभूति होनी चाहिये. यह शिक्षित ब्यक्ति का कर्तव्य है कि अज्ञानियों के अंधकार से उन्हें मुक्ति दिलाये. यह अलग संस्था बना भीड़ इकट्ठा कर, एक दूसरे को नीचा दिखा, बल प्रयोग कर या आन्दोलन कर नहीं हो सकता. कोई सरकार इसे क़ानून बना नहीं ठीक कर सकती. इस ग़लत मानसिकता को राजनीति करनेवाले उपयोग कर भोट बटोर कुर्सी पा लेंगे और जनता आपस में लड़ती रहेगी. यही राजनीति करने वाले अशोक को कुसवाहा, राम को क्षत्रिय और कृष्ण को यादव बनाते रहते हैं. अत: हर मुल्य पर हर को अपनी पसंद की शिक्षा प्राप्त कर बिद्वान बनना है, परिश्रम कर धन अर्जित करना होगा, समर्थ बनना होगा. आज हर ब्यक्ति के लिये यह राह खुला है और यही कुछ कर गुज़रने का मार्ग है. राजनेता और मीडिया के लोग इस मसले को हल करने में सकारात्मक भूमिका अदा कर देश के बिगड़ते माहौल को और हानि न पहुचांयें

मेरी राय में भारतीय जनता दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय हिन्दु महासभा और ऐसी सभी हिन्दुओं की संस्थाओं का दायित्व बनता है पिछड़ी जातियों को, दलितों को पूरे सम्मान के साथ अपने में सब तरह से शामिल करना. जन्माधारित बड़े छोटे के भेद भाव को हरदम के लिये और सभी तरह से मिटाने के बिना न हिन्दु बचेंगे, न उनका धर्म, और न हीं यह राष्ट्र . तथाकथित बड़ी जातियों के लोग अपने समुचित ब्यवहार से इस बढ़ते ज़हरीले माहौल को रोकें और सौहार्द पूर्ण बनायें. यही समय की माँग है . यह हमारी राष्ट्रीय ज़िम्मेवारी हैं. यह न होने पर हम इस महान देश को असलियत में कभी दुनिया के प्रथम श्रेणी के देशों में नहीं ला पायेंगे. समय की माँग है कि हम समझ और सँभल जाये और सोच बदलें…. “जाति, धर्म हैं नहीं बड़े अब, सबसे श्रेष्ठ देश अभिमान ”
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राहुल गांधी को हैदराबाद के भूख हड़ताल में भाग लेने के बाद कापू सम्प्रदाय के संरक्षण की माँग करनेवालों के साथ रहना था, पर वह पहले ही ख़त्म हो गया, अब वे अगले बारदात की प्रतीक्षा कर रहे हैं. शायद सफ़ाई मज़दूरों के साथ हों कल. या फिर कौन जाने मुरूद पहुँच जायें या खेसारी दाल के रोक को हटाने का बिरोध करने लंगे. वही लोग जो मुसलमानों को बरगला भोट लिये और उनकी हालत बद से बदतर हो गई. आज फिर हिन्दुओं में फूट डाल दलितों के खैरख्वाह बन अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. हिन्दुओं की एकता से वे डरते हैं. आशा है हिन्दुओं के नेताओं को यह बात समय रहते समझ में आ जायेगा. देश को पीछे रखने की एक बड़ी साजिस चल रही है. जातिगत मतभेद समाज की रूढ़िवादिता के कारण है और राजनीतिज्ञ इसका फ़ायदा न लें. इसका हल शीघ्र गति से शहरीकरण और शिक्षा है. बढ़ना दयानन्द और बिबेकान्द की तरह किसी को यह करना होगा……किसी नये गांधी और अम्बेडकर को साथ साथ मिल यह हृदय परिवर्तन करवाना होगा देश को बचाने के लिये. देश हित कुछ मुद्दों के बारे में राजनीतिक दलों में सहमति होना चाहिये कि उन्हें ले राजनीति नहीं करनी चाहिये. प्रजातंत्र के अधिकार किसी जाति बिशेष को सरकारी सम्पति को जलाने और तोड़ने की कैसे अनुमति दे सकते हैं.
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बचपन में देखा था गाँव में धान के खेत में खेसारी दाल की पैदावार, जो धान कटने के काफ़ी पहले ही पैर दिया जाता था. धान कटने के बाद पौधे तेज़ी से बढ़ते थे, पर कुछ ही खेतों में इसे पकने के लिये रखा जाता था. काफ़ी हिस्सा पौधों को बढ़ने पर मवेशियों के खाने में ब्यवहार किया जाता था पूरा पूरा, या मशीन में काट भूंसा में मिला. बाक़ी खेसारी पकने पर कटती थी, और अनाज को दाल में परिवर्तित कर दिया जाता था. गाँव के लोग बताते थे कि पहले यहाँ भी अरहर दाल की भी खेती होती थी, पर धीरे धीरे उन सब खेतों में धान एवं गेहूँ की खेती होने लगी. हमारे यहाँ दाल की पैदावार केवल चना एवं मसूर होती थी. अरहर ख़रीदा जाता था . उसमें घर चलाने वाली महिलाएँ कुछ खेसारी दाल भी मिला देती थी, पता नहीं चलता था. गाँव की अपनी यात्रा में कभी कभी सुनता था खेसारी दाल खाने से रतौंधी (रात को नहीं दिखाई देने की तकलीफ़) हो जाती है… फिर इसकी खेती पूरी तरह से बन्द हो गई. कुछ समय पता चला मीडिया से कि खेसारी दाल की खेती को ५५ साल पहले प्रतिबंध लगा दिया गया था. यह कहानी अख़बारों में भी आई है. कारण था १९६१ में चिकित्सकों एवं बैज्ञानिकों के अनुसार इसके खाने से शरीर के निचले भाग में लकवा हो सकता था. इसकी खेती पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया.अब इस प्रतिबंध को उठाने की बात चल रही है. यह देश की दाल की कमी को मिटाने में काफ़ी मदद करेगा. आशा है इस पर GM की तरह राजनीति नहीं होगी. सभी राज्य सरकारों को दलहन की खेती को बढ़ावा देना चाहिये न कि इसकी कमी पर राजनीति. सरकार, बैज्ञानिक और किसान मिल इस कमी को आसानी से मिटा सकेंगे. पर भी बेईमानों जमाखोरों पर तो नज़र रखनी होगी और उन्हें कठोर दंड देने में सरकारों को कोई नरमी न बरतना चाहिये जनहित.
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पेशावर के आर्मी स्कूल में हमले के बाद से पाकिस्तान में 182 मदरसों को सील कर दिया गया है. इन मदरसों पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप है. खबर के मुताबिक पंजाब, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा में इन मदरसों को बंद किया गया है क्योंकि ये कथित तौर पर आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे थे और अन्य संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त थे. क्या यह भारत में सम्भव है? भारत में तो उनके सिलेबस को भी वहाँ पढ़ते हुये बच्चों के अच्छे भविष्य के लिये भी नहीं बदला जा सकता. क्या सेक्युलर लोग कुछ सुझायेंगे. बिना आधुनिक शिक्षा के कैसे मुस्लिम सम्प्रदाय ग़रीबी से मुक्ति पायेगा?
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भारतीय मुसलमानों को अयोध्या, मथुरा और काशी- इन तीन स्थानों के बारे में समस्त हिन्दुओं की सदियों आस्था का ख़्याल कर ज़िद छोड़ देनी चाहिये। यहाँ की मस्जिदें मोहम्मद या उनके किसी क़रीबी से किसी तरह नहीं जुड़ीं हैं, जब कि वे तीनों स्थल हिन्दुओं के आराध्य देव बिष्णु के दो अवतारों की जन्मस्थली और शिव की नगरी रही हैं ….थोड़ी उदारता भारतीय समाज को जोड़ देगा…भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों को बिना किसी राजनेता को लिये यह समझौता करना चाहिये…..कोई न्यायालय भी सठीक निर्णय नहीं कर सकता….भारतीय मुसलमान भारत के हैं, यहीं के हैं, अपने हैं, कुछ ही सदियों पहले …… उन्हें एक पूजा स्थान और एक जन्मस्थान का अन्तर तो समझना ही चाहिये …..और शायद समझते भी हैं….
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दुर्भाग्य से ऐसा नेता (मोदी) सदियों में कभी कभी आते हैं. हम भारतीय उसका समुचित स्थान और आदर नहीं दे पा रहें हैं, क्योंकि भ्रष्ट भारतीय को ग़लत फ़ायदे लेने की आदत पड़ी है पिछले साठ से अधिक सालों से…….
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देश के बुद्धिजीवियों से प्रश्न
कापू समुदाय ने अपने लिए आरक्षण की मांग करते हुए रत्नांचल एक्सप्रेस की आठ बोगियों समेत कई अन्य वाहनों को भी फूंक डाला. पर ये कापू कौन हैं और इनकी माँगें कंहा तक जायज़ है? तेलुगु में कपू या कापू शब्‍द का मतलब किसान होता है, जो मुख्य रूप से उत्तरी तेलंगाना और रायलसीमा में पाए जाते हैं. अभी इस समुदाय की गिनती अगड़ी जातियों में की जाती है. कापू की उपजातियों में बलीजा, तेलगा, ओंतरी, मुनुरू कापू और तुर्पू कापू शामिल हैं.आंध्र की आबादी में ये तकरीबन 16 से 20 फीसदी हैं. पर सरकारी सेवाओं में इनकी उपस्थिति 5 फीसदी से भी कम है. इनकी हैसियत दिल्ली के आस पास के । क्षेत्रों के जाटों और गुजरात के पटेलों या पाटीदारों की तरह है. उस्‍मानिया यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्‍त्र के एक प्रोफेसर के मुताबिक सूबे का कापू समुदाय काफी संपन्‍न है. संरक्षण की सुविधाओं का आकर्षण कारण है उपद्रवों का. दुर्भाग्यवश संरक्षण एक ऐसा अधिकार बनता जा रहा है जो देश को तबाह कर या ख़त्म कर ही शायद अपने ख़त्म हो. सभी सम्पन्न ऊपर रही जातियाँ जो सदियों से गाँवों की अधिकांश ज़मीन के मालिक रहें हैं अपने को पिछड़ा कह संरक्षण चाहते हैं और उसका फ़ायदा लेना चाहते हैं. कंहा तक उचित है यह? क्या यह ग़रीब ज़मीन से रहित तथाकथित उच्च वर्ण के लोगों के साथ अन्याय नहीं है. यही कारण आज ब्राह्मण भी अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल हो संरक्षण चाहते हैं. कब तक जन्म पर आधारित संरक्षण देश को स्थिर होने में बाधक बना रहेगा और समाज को बाँटता रहेगाँ? राजनीतिक राष्ट्र बिरोधी नेता असमझ नागरिकों को उनकी भावनाओं से खेलते हुये उन्हें बेवक़ूफ़ बनाते रहेंगे ौर वे बनते रहेंगे. अब तो कुछ लोग पद्म पुरस्कार को भी जाति संख्या के आधार पर संरक्षित करने की बात कर रहें हैं. हे सभी जाति के पक्षधरों देश के लोगों को जाति के नाम पर न बाँटों और देश को बचा लो.

समय के साथ देश के प्रति सर्व समर्पण की भावना ख़त्म होती जा रही है आम लोगों में. १९६५ में लाल बहादुर शास्त्री के आवाहान पर देश के असंख्य लोगों ने सोम वार का उपवास चालू कर दिये अन्न के आयात के खर्चे को कम करने के लिये.

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