एक पुरानी कबिता: केशव के लौटने के बाद

बड़े सकारे सपना देखा
हाथ बढ़ाये,मुस्काते तुम
ठुमक ठुमक तुम
आते हो मेरी बाहों में
तुमको पाकर सबकुछ पाता
सपने में ही
तुम हंसते हो, मैं हंसता हूँ
हंसी हमारी भर देती
सारे आंगन को
तुम्हे देख मैं सब भूला
हूँ,दर्द तुम्हारे आने का
मां की ममता तज ।
नींद खुली जब
खाली बिस्तर
खाली सब घर
फिर मिली को साथ लिये
जब निकला घर से
सम्मूख पूरा चाँद खिला था
रात चाँद की विदा घड़ी थी
मैंने तुमको हंसते देखा
उस परात पर
तरह तरह के रंग बदलते
तुम ही तो थे
आसमान में
खड़ा हूआ मैं अलसाया सा
सद्य स्वप्न की याद लिए
अपनी आँखों में
तुमको देखा
खिलखिला कर हंसा
तभी रज्जू की उस तनाव ने
नभ के सारे चित्र मिटाये
निरव सड़कों से होकर मैं
बहुत दूर तक
बहुत देर तक
भटका था मैं
तभी निकलते सूरज के गोले में
तुम्हे बिहंसते देखा
ठगा रहा गया
कंहा कंहा हो कुछ बतलाओ
आओ हाथ पकड़ लो मेरा
अंगुली से बढ़ कर कंधे पर
तुम तो मुझे सहारा देना !

This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a comment