निर्भया के जाने पर

मेरे शब्द कम पड गये हैं
मुझे अपने पर, अपने देश पर
शर्म आने लगी है ।
अपने देश के पुरूषों पर भी
मर्दानगी दिखाने के
घिनौनेपन पर भी 
पुरुष के पशुवत
आचरण पर भी ।
लड़ी पर हार गई
और सबको झकझोर गयी
सड़कों पर उतरी भीड़
दिल्ली की सर्दी में
दिन में रात में
मोमबत्ती हाथ में 
गले में लटकाये पोस्टर
और मुंह से बरसते
अंगारें ।
निर्भया शायद मर
कर अमर बनी
वह सब दे गयी
उन सबको जो शायद
जी कर न दे पाती ।

This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a comment