राम से अनुरोध

हे राम !
एक पक्षी के बियोग का दृश्य
पिघला दिया था कवि ह्रदय
जन्म हुआ तुम्हारा
अवतरित हुए धरा पर
प्रिय हुए जन मन में
पूजित हुए सबसे ..
क्या तुम्हें ठीक याद है
वह जगह
जंहा तुम पैदा हुए
वह अयोद्ध्या का कक्ष नहीं था
एक कवि की कुटिया थी
क्यों नहीं समझ पाते
नासमझ
क्या यही है कलि प्रभाव .
अब आओ, हो जाओ द्रवित
दुखित हैं नारी पुरुष
तुम्हें गलत समझ,
घट घट वासी हो,
मिलते हो सबसे तुम एक संग.
आओ फिर एक बार,
फूंको एक मंत्र सबके कानों में
‘तुम एक हो
तुम इनके हो, तुम इनमें हो
अयोद्ध्या में नहीं रहते अब
न बनायें ये तुम्हारे
तुम्हें छोटा इतना
आओ अभी, न देरी करो
कंही देरी में जल न जाये
तुम्हारी यह कर्मभूमि,
तुम्हारी स्थापित मर्यादाएं.

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