आदिपुरुष के पटकथा लेखक और गीतकार के नाम यह निवेदन

आजकल मनोज मुंतशिर जो ‘आदिपुरुष’ फ़िल्म के पटकथा लेखक हैं और जिनका मैं अबतक प्रशंसक था, बड़ी चर्चा में हैं। मुझे समझ में नहीं आता तुलसीदास के रामायण में जब राम के लिये शायद यह नाम कहीं नहीं आता फिर आदि पुरूष राम कैसे बने जब वे त्रेता में हुए। वैसे ‘आदि पुरूष’ में ‘पुरूष’ मुख्य है जिसके ऊपर कुछ नहीं। कठोपनिषद् के श्लोक 1.3. 10 और 1.3.11 में ‘पुरूष’ को इस तरह कहा गया है-

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥1.3.10॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।

पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥1.3.11॥

-‘पुरुष’ से उच्चतर कुछ भी नहीं। वही सत्ता की पराकाष्ठा है, वही यात्रा का परम लक्ष्य (परा गति) है। पुरूष का न कोई आदि न अन्त।

सभी उपनिषदों में क़रीब क़रीब उन सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने जब वे सूक्ष्मतम पुरूष या ब्रह्म को जैसा अनुभव किया वैसा बताया है- जैसे ईशोपनिषद् के श्लोक 8 में, कठोपनिषद् के श्लोक १.३.१५ में। इन्हीं में सबसे छोटे उपनिषद माडूक्य में वह महावाक्य भी है ‘अयम् आत्मा ब्रह्म’ ‘This Atma is Brahman- यही आत्मा ब्रह्म है’।

राम एक सगुन ब्रह्म के रूप में अवतार हैं, उनका चित्रण केवल ज्ञानी ऋषियों की कथानक पर होना चाहिये। सदियों से इनकी मूर्तियाँ बनती रहीं हैं और उनके पहनावे का वर्णन दिया भी गया है। फिर आधुनिक काल में गीता प्रेस से प्रकाशित वाल्मीकीय रामायण, रामचरितमानस आदि में सभी पात्रों के चित्र आदि भी देखे गये हैं। क़रीब क़रीब सभी हिन्दूओं या अन्य धर्म के पाठकों या आम लोगों में वह छवि वसी हुई। उसको पूरी तरह से व्यक्ति इच्छानुसार बदलना शायद गलती है या बचपना।

मनोज के अपने बचाव में कही बातें बड़ी हास्यप्रद हैं। राम खड़ाऊँ पहन युद्ध नहीं किये थे, वे बिना कुछ पहने रहे अपने पूरे वनवास में, चित्रकूट में काफ़ी समय रहने के समय अपनी कुटिया में वे खड़ाऊँ पहनते थे, जैसा फ़िलहाल तक हमने गाँवों में देखा होगा।

युद्ध में विभीषण कहते हैं-

‘नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥’ क्या मनोज जी इसको पढ़े नहीं है? फिर युद्ध में चमड़े या कैनवास के चप्पल दिखाने की बात कहाँ आती है? हनुमान जी जैकेट पहनाने की क्या ज़रूरत है।

अब मैं रामचरितमानस के अयोध्या कांड में सीता,राम,लक्ष्मण के अपने आश्रम में आने पर बाल्मिकी ने जो उनके स्वागत में कहा-

संत तुलसीदास जिन्हें भगवान राम बार बार दर्शन दिये, फिर जिन्होंने राम और सीता के बारे लिखा अयोध्याकांड में वाल्मीकि के आश्रम में ऋषि ने कैसे राम का स्वागत किया लिखा-

‘श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।

जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ।।’

(यह साफ़ है राम सगुन ब्रह्म है जो राम एवं फिर कृष्ण की तरह अवतार लेते हैं।गीता में अर्जुन को दिखाये अपने विश्वरूप के वारे में कहा गया देश विदेश में प्रसिद्ध श्लोक है-

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥11.12॥

-यदि आकाश में सहस्रों सूर्यों की ज्योति एक साथ उठी हुई हो तो वह ज्योति उस महापुरुष के देह की ज्योति के सदृश कदाचित् ही हो सके ।

जो उपनिषदों के श्लोक में एक अन्य सुन्दर और लोकप्रिय रूप में कहा गया है-

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥

-वहाँ सूर्य प्रकाशमान नहीं हो सकता तथा चन्द्रमा आभाहीन हो जाता है, समस्त तारागण ज्योतिहीन हो जाते हैं; वहाँ विद्युत् भी नहीं चमकती, न ही कोई पार्थिव अग्नि प्रकाशित होती है। कारण, जो कुछ भी प्रकाशमान् है, वह ‘उस’ की ज्योति की प्रतिच्छाया है, ‘उस’ की आभा से ही यह सब प्रतिभासित होता है।)

और फिर तुलसीदास के बाल्मिकी आगे कहते हैं-

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।

जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥127॥

फिर वह जगह बताते हैं जहाँ उनका निवास हो-

‘काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया।…

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥2॥

जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥3॥

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥

तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥..

अगर मनोज की राम कथा इन मूल्यों पर ध्यान देती तो अच्छा होता।

आश्चर्य है राम की कथा और राम के रूप में तुलसीदास के सगुन राम के आदर्श चरित्र को क्यों नहीं दिखाने की कोशिश की गई| तुलसीदास से ज्ञानी और वास्तव के कवि तो आजतक कम से कम हिन्दी में नहीं हुए। मनोज राम के बारे में अलग अलग रामयणों को उद्धृत करते हैं। वाल्मीकीय रामायण के समय का काल और कल्पना अलग थी, तुलसीदास की अलग। जानकी जी जो स्वंय ब्रह्म राम की माया हैं वे रावण के कुटिया में उनका हरण करते ही माया रूप ले लीं। अग्नि परीक्षणों माया जली और पवित्र सीता प्रगट हुईं।वे जब चाहती रावण को भस्म कर सकती थी।

अब मैं उनके पुष्पक विमान सम्बन्धी ग़लतफ़हमी को दूर कर रहा हूँ। वह विमान कुबेर से जीत कर रावण लाया क्योंकि कोई असुर चरित्र का व्यक्ति विमान बना ही नहीं सकता।

अब मैं मनोज जी के कुछ व्यक्तिगत बातों पर कुछ कहना चाहूँगा-

१. कुछ समय से वे बार बार अपने को ब्राह्मण बताते रहते हैं और सनातनी। https://youtu.be/KzcVxyk_t90 कभी कभी इसमें राहुल गांधी के कुछ कथनों की याद आने लगती है।वह बचकानी लगती है। ब्राह्मण पैदा नहीं होते बनते हैं और प्रमाणित करते अपनी करनी द्वारा।

गीता की परिभाषा में ब्राह्मण के कर्म हैं-

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥18.42॥

-शान्त भाव, आत्मसंयम, तपस्या, मन और शरीर की पवित्रता, तितिक्षा, क्षमा, सरल व्यवहार, ज्ञान, विज्ञान, आध्यात्मिक सत्य को स्वीकार करना (उसमें श्रद्धा विश्वास)—ये ब्राह्मण के कर्म हैं जो उसके स्वभाव से उत्पन्न होते हैं ।

या

वे किस सम्पदा के धनी हैं गीता अध्याय 16 के 1-3 श्लोकों में दैवी सम्पदा या बाक़ी अध्याय में दिये आसुरी सम्पदा। अपने हृदय से पूछें और फिर जबाब दें या आम लोगों के सामने कहें। मैंने कल उन्हें कल Tweet किया था।

ब्राह्मण की एक परिभाषा दी गई है जिसे साथ के एक चित्र में देख सकते हैं।

मनोज मुंतशिर में लगता है अब थोड़ा अहंकार भाव आने लगा बढ़ती लोकप्रियता के साथ । अच्छा होता कि कवि, गीतकार या लेखक को केवल सम्पदा अर्जन और संग्रह का मशीन न बना अपने क्षेत्रों देश विदेश में नाम कमाते आम व्यक्ति को उच्च स्तर का बनने की प्रेरणा अपनी कृतियों से। तुलसी के राम के आदर्श पर अगर भरत चला होता तो न हम ग़ुलाम बने रहते सदियों तक, न आज के समाज की वह दशा होती जो तुलसीदास ने कलिकाल का वर्णन करते लिखा था और कागभुसुडी से पक्षीराज गरूड को कहलावाया था कुछ चौपाइयों के द्वारा-

नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥

गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥

हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥

मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥

नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥

कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनहिं चेरि निबेरि गती॥

सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं॥

कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥

नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥

क्या उस महान संत की अद्भुत दूरदर्शिता नहीं बताती।

हाँ, अगर वह उनका लक्ष्य होता।

२. वे अपने बारह वर्षीय लड़के पर दोष लगाते हैं कि भारतीय या हिन्दू मूल्यों को नहीं समझना और अभी ही अमरीकन बच्चों की तरह की फ़िल्म देखना चाहते हैं अतः: वही सोचकर यह फ़िल्म कुछ अमरीका पैटर्न पर बनी है और उसके पात्रों के पहनावे भी। इसका दोष केवल उनकी और उनकी पत्नी द्वारा बच्चों को पालने के एवं उसके सामने आदर्श रखने रखने के ज्ञान या चाहत पर है। मैं खुद अब 83 साल का IIT खडगपुर का 1957 का मेकेनिकल इंजीनियर। मेरे तीनों बेटे अमरीका में हैं, पाँच पोते भी। पर जब मैंने एक को एकनाथ ईश्वरन की अंग्रेज़ी में काव्य रूप में लिखी The Upanishads भेजा, वह एक बार में ख़त्म कर ही उठा। अपने दायित्व एक नागरिक, पिता, पति, पुत्र, भाई, बहन रूप में समझिये फिर आप एक युगान्तरकारी फ़िल्म की कथा लेखक या गीतकार बनिये या फ़िल्म बनाइये।हम फ़िल्म निर्माता से कुछ ज़्यादा उम्मीद नहीं करते, पर आपसे ज़रूर- पैसा साथ में नहीं जाता, पर देवदास की तरह सफल कहानी लिखना या फिर उसका फ़िल्म।

तुलसीदास आज के हिन्दूओं के लिये राम चरित्र का वर्णन किया है- आदर्श बीर एवं महान व्यक्ति- बालकांड में जनकपुर जाते वक्त यज्ञों के बाधक असुरों का संहार, समाज त्यक्त अहिल्या देवी का सम्मान दिला समाजिक सम्मान दिलाना, मज़बूत संयुक्त परिवार के आदर्श पुत्र, भाई; पूरे देश भर से आये आयु में बहुत बड़े बलवान द्वारा न टूटनेवाले धनुष को तोड़ना, माता के कारण पिता की आज्ञा पर १४ साल का वनवास पूरी मर्यादा बनाते हुए, ऋषियों से ज्ञान प्राप्त किया, रक्षा की, निम्न जाति कहे जानेवाले केवट, निषाद, कोल, भील को गले लगाया, निम्न जाति की ही शबरी को जीवन्मुक्त बनाया, पक्षीराज जटायु को सम्मान दिया, फिर बालि के अन्याय रूप से वनवासित भाई वानरराज सुग्रीव को दोस्त बना उनकी सहायता ली, और तब हुआ समुद्र पर पुल बांध लंकापति से युद्ध और विजय का गुर बताना विभीषण को-

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥4॥

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥5॥

और आख़िरी में

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥80 क॥

काश! आज भी हम तुलसीदास की रामचरितमानस को अपने समझते और अपने बच्चों को समझाते। राम भारत के आदर्श पुरूष हैं और सीता आदर्श नारी और उसी तरह उनका सम्मान होते रहना चाहिये पीढ़ी दर पीढ़ी….अगर हम भारतीय या हिन्दू बने रहना चाहते हैं।

This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s