कितने श्लोकों में आप समझना चाहते हैं गीता का पूर्ण सार एवं पाना चाहते हैं उसके लाभ?

कितने श्लोकों में आप समझना चाहते हैं गीता का पूर्ण सार एवं पाना चाहते हैं उसके लाभ?
भगवद्गीता भारत की एक अनमोल धरोहर है जिसका दुनिया के सभी मुख्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और वहाँ के विद्वान इसकी देश की नई पीढ़ियों को अच्छे नागरिक जीवन की नींव डालने के लिये ज़रूरी समझने लगे हैं। पर भारत में आम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिये कुछ ख़ास काम नहीं हुआ और बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। कर्मयोग, भक्ति योग, ज्ञान योग तो गीता के विषय हैं ही, पर साथ में गीता में स्थितप्रज्ञ, ज्ञानी, योगी, ज्ञानी, गुणातीत, दैवी सम्पदा युक्त व्यक्तियों के लक्षणों का भी वर्णन भी है जिसमें दिये आचरणों की तालिका को अपने जीवन मूल्य बनाकर भी हम सभी आम लोगों को ब्रह्म तक को प्राप्त कर सकने की चेष्टा की जा सकती है। यह सरल भाव से बताया गया है। पर शायद जीवन में ठीक समय पर इसकी चेष्टा न करने पर यह दुस्तर से दुस्तर होता जाता है। गीता पर हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में बहुत अच्छी व्याख्यायें आ गई हैं। उनमें एक तो ज़रूर हर हिन्दू के घर में होना चाहिये और उसका पाठ और उस पर चर्चा भी होना चाहिये सभी परिवार के लोगों द्वारा साथ बैठ २०-३० मिनट के लिये ही सही नित्य दिन।

मूल भगवद्गीता में कुल ७०० या ७०१* श्लोक १८ अध्यायों में हैं। इतने श्लोक आम व्यक्ति के लिये याद करना बहुत मुश्किल है। अत: समय समय पर इसका समाधान देश के कुछ भगवद्गीता के प्रसिद्ध पंडितों द्वारा सुझाया गया है। रमन महर्षि और स्वामी शिवानन्द ने अलग अलग केवल एक ही उस श्लोक को बताये जिसे उन्होंने समस्त गीता का सार कहा।
रमन महर्षि ने श्लोक १०.२० को वह दर्जा दिया-
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०.२०॥

स्वामी शिवानन्द ने गीता के आख़िरी श्लोक १८.७८ को:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८.७८॥

स्वामी शिवानन्द ने फिर सप्तश्लोकी गीता बता उसे पूरे गीता का सार कहा। यह उन्होंने अपनी गीता की व्याख्या की पुस्तक में दिया है। इन्हें छोड़ गीता प्रेस के श्रोत्र रत्नावली में भी एक सप्तश्लोकी गीता दी गई है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक दस श्लोकीय गीता बनाया है। http://brahmanisone.blogspot.com/search/label/Collections%20of%20Gita%20Verses
महर्षि रमन ने बाद में अपने शिष्यों के कहने पर एक दूसरा चयन किया जिसमें उन्होंने ४२ श्लोकों का संचयन किया जो पूरे गीता के सार की तरह है।यह इंटरनेट पर हैं।http://brahmanisone.blogspot.com/2008/12/selected-verses-from-gita-by-ramana.html


फिर एक ऐसा ही प्रयास कृष्णकृपामूर्ति श्री ए. एसी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के शिष्यों ने उनकी लिखित ‘श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप’के आधार पर पूरे गीता से १०८ श्लोकों का चयन कर किया है। वह भी इंटरनेट पर है-https://prabhupadagita.com/category/108-important-bhagavad-gita-slokas/


पर ये सभी महानुभाव बहुत पहुँचे हुए ज्ञानी थे। मैंने गीता का कोविद के क़रीब तीन वर्षों में पूरा समय अध्ययन किया और यह क्रम अभी भी चल रहा है- नित्य पठन, मनन, चिन्तन द्वारा, अपनी उम्र की कठिनाइयों के बावजूद।


और मैं समझता हूँ कि कुछ ज़रूरी श्लोकों को गीता ज्ञानियों से उतना महत्व नहीं मिला, जितना आज की सामाजिक अवस्था को देखते हुए ज़रूरी हैं और वे उन श्लोकों को लोगों तक ले नहीं गये, क्योंकि कुछ ख़ास वर्गों को उससे नुक़सान होता हुआ दिखा और इसी लिये छोड़ दिये गये। उदाहरण के लिये कृष्ण का अध्याय ९ का २९-३२ श्लोक हैं- श्लोकों को शामिल करने से बहुत सारे प्रचलित दुर्भाव आज समाज से ख़त्म हो जायेगा। जिसे आज की नये पीढ़ी के लोगों को जानना चाहिये और साथ ही अज्ञानी पंडितों की व्याख्याओं को ग़लत कर देगा। उनमें दो श्लोक हैं-कृष्ण कहते हैं-
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥९.३०॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥९.३२॥
कितना क्रान्तिकारी संदेश है। हम क्यों वर्ग के कुछ लोगों छोटा समझते हैं, उनसे दुर्व्यवहार करते हैं। यह न करने का उपदेश तो हज़ारों साल पहले उपनिषदों के ऋषियों ने दिया था।
गीता में सभी कर्मों में यज्ञ, दान, तप को कर्त्तव्य कर्म कहा गया है और उनकी सठीक परिभाषा भी बताया है जिसके बारे में शायद ही हिन्दू समाज में कोई सम्यक् समझ है लोगों में और आजतक के आम लोगों के सम्पर्क में आनेवाले तथा कथित पंडितों में।
पंडितों ने सभी धार्मिक पुस्तकों को निहित स्वार्थ के कारण संस्कृत में ही बने रहने दिया और मान्यता दी और मातृभाषा में न लिखे गये और न उन्हें मान्यता मिली। यहाँ तक की कर्मकांड सम्बन्धी पुस्तिकाओं के बारे में भी यही सत्य है और तथाकथित करोड़ों पंडितों के जीविका का आधार कर्मकांड सम्बन्धी पूजा करवाना हो गया है।आज शहरों में इन पंडितों की खासी अच्छी कमाई है, यद्यपि इन पंडितों को संस्कृत का कोई ज्ञान नहीं हो। शायद ही उनमें कुछ उपनिषद् एवं गीता के दो चार श्लोक और सही अर्थ जानते हों। गाँवों की ही हालत तो और ख़राब है। देश में विशेष कर हिन्दी प्रदेशों में इसमें एक बड़ा सुधार बहुत ज़रूरी है, अगर सही हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति बचानी है जिस पर हम गर्व करते हैं, पर जानने समझने कोई कोशिश नहीं करते। हर धार्मिक अनुष्ठान के लिये लिये पंडित खोजे जाते हैं और उनकी फ़ीस आज के डाक्टरों और अध्यापकों की तरह मनमाने भाव से बढ़ते जा रहे है। हिन्दूओं को इस सम्बन्ध में समझ की एवं सुधार की ज़रूरत है। पहले तो जो किये जा रहे हैं वे कितने धर्म की ठीक व्याख्या करते हैं फिर क्या हमारे हिन्दू ज्ञानियों इन्हीं कर्मकांड करने की व्यवस्था बताई थी।


आज मैं भगवद्गीता की चर्चा कर रहा हूँ और मेरे एक संकलन के बारे में बता रहा हूँ। यह संकलन भगवद्गीता के १५० मेरे मनपसन्द श्लोकों का ही है, पर जिसे पढ़ने में केवल बीस मिनट लगते हैं, श्लोक सभी अध्यायों से हैं, और गीता का पूरा सार बता देते हैं। अगर इस सम्बन्ध में किसी का कोई प्रश्न या सुझाव है तो कृपया सम्पर्क करे irsharma@gmail.com हिन्दी या इंग्लिश में।

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