महाभारत के बाहर की दो महत्वपूर्ण

महाभारत के बाहर की दो महत्वपूर्ण गीता
पिछले तीन-चार महीनों में मैंने ‘अष्टावक्र गीता’ एवं ‘अवधूत गीता’ पढ़ी।दोनों अद्वैत दर्शन के महत्वपूर्ण ग्रंथ माने जाते हैं। अष्टावक्र गीता में २० अध्याय हैं, पहले १८ अध्यायों में अष्टावक्र का उपदेश या विचार है वेदान्त पर, और अध्याय १९ और २० में राजा जनक का, जो स्वयं ब्रह्मज्ञानी हैं, वेदान्त के अनुसार ब्रह्म ज्ञानी के चरम अवस्था का वर्णन है, जो पूर्ण ब्रह्म ज्ञान का आख़िरी लक्ष्य या ध्येय हो सकता है। अध्यायों के नाम हैं- साक्षी, आश्चर्यम्, आत्माद्वैत, सर्वमात्म, लय, प्रकृतेः परः, शान्त, मोक्ष,निर्वाण,वैराग्य, चिद्रूप, स्वभाव, यथासुखम्, ईश्वर, तत्त्वम्, स्वास्थ्य, कैवल्य, जीवन्मुक्ति,स्वमहिमा,अकिंचनभाव हैं ।
राजा जनक के ज्ञान के बारे में उपनिषदों में बहुत चर्चा है, भगवद्गीता में भी उन्हें श्रेष्ठों में उदाहरण कहा गया । हमारे ऋषियों ने उनके ज्ञानी होने और ज्ञान को समझने एवं ज्ञानियों को संरक्षण करनेवाला माना और इतना ऊँचा दर्जा दिया। अत: एक सांसारिक गृहस्थ के लिये भी राजा जनक आदर्श बन सकते है। अपने ज़िम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए भी व्यक्ति ब्रह्म ज्ञानी बन सकता है।


१. अष्टावक्र गीता
गीता में श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद है वैसे ही अष्टावक्र गीता में राजा जनक और बालऋषि अष्टावक्र की। भगवद्गीता गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति- तीनों मार्ग का विवरण है जबकि अष्टावक्र गीता में केवल ज्ञान योग का ही विवेचन हुआ है।
अष्टावक्र के नाना ऋषि उद्दालक का छान्दोग्य उपनिषद् में एक ब्रह्मज्ञानी के रूप में उल्लेख किया गया है। वेदांत के सबसे महत्त्वपूर्ण महावाक्य तत्त्वमसि का उपदेश इनके नाना उद्दालक के द्वारा इनके मामा श्वेतकेतु को दिया गया है जो अष्टावक्र के समवयस्क हैं, अतः अष्टावक्र उपनिषद् कालीन ऋषि हैं।
अष्टावक्र गीता’ के बारे में, टिपण्णी करनेवालों में से एक लिखते हैं, ‘उपनिषद निरपेक्ष की पूर्णता को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करने के लिए हकलाते हैं,ब्रह्मसूत्र अपने आप में समाप्त हो जाते हैं और भगवद गीता एक क्षम्य शर्म के साथ झिझकती है, अष्टावक्र गीता शब्दों के माध्यम से संवाद करने में अपनी भव्य सफलता और स्पष्टता के लिए प्रशंसा की पात्र है।’ शायद प्रस्थान त्रय (ब्रह्मसूत्र,उपनिषद्,गीता) की तुलना में सर्वोच्च वास्तविकता(स्वयं आत्मा)की पूर्णता अष्टावक्र गीता में अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है। (स्वामी सर्वप्रियानन्द का एक अष्टावक्र गीता पर प्रवचन, https://youtu.be/d6eKWLM0mHE)

क्या है अष्टावक्र गीता में?
पहले अध्याय के पहले श्लोक में राजा जनक अष्टावक्र से पूछते हैं-
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च कथं प्राप्तं एतद् ब्रूहि मम प्रभो ॥१.१॥
Teach me this, O Lord! how can Knowledge be acquired? How can liberation come? How is renunciation achieved?
हे स्वामी! ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है? मुक्ति कैसे मिल सकती है? संन्यास कैसे प्राप्त होता है?
फिर जनक ही इसी अध्याय के ११वें श्लोक में वह कुछ कहते हैं जो एक शिष्य द्वारा साधारणत: पूछे जानेवाले सवालों से कुछ अलग और विस्मित करनेवाला है-
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥१.११॥
He who considers himself free becomes free indeed and he who considers himself bound remains bound. ‘As one thinks, so one becomes’, is a proverbial saying in this world and it is indeed quite true.
जो स्वयं को मुक्त समझता है वह वास्तव में मुक्त हो जाता है और जो स्वयं को बंधा हुआ समझता है वह बंधा रहता है। ‘जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है’ (या मति: सा गति) यह एक प्रचलित कहावत है और यह वास्तव में एक सत्य है जो उपनिषद् भी कहते हैं।
हाँ, अध्याय १९ के तीन या चार एवं २० का एक श्लोक में दिये राजा जनक के अनुभव की गहराई को समझने के लिये मैं नीचे उन्हें उद्धृत कर रहा हूँ-
क्व स्वप्न: क्व सुषुप्तिर्वा क्व जागरणं तथा।
क्व तुरीयम् भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य में॥१९.५॥
Where are dreams? Where is deep sleep? Where is wakefulness? And also where is the fourth state of Consciousness? Where is even fear for me, who abide in my own grandeur?
श्वपनावस्था(सपने दिखनेवाली नींद)कहाँ हैं? सुसुप्तावस्था(गहरी नींद)कहाँ है? जाग्रत अवस्था कहाँ है? और फिर चैतन्य की चौथी अवस्था, तुरीयम् कहाँ है? मेरे लिए भय भी कहाँ है, जो मेरी ही ऐश्वर्य में रहता है?
क्व मृत्युजीर्वितं क्व लोका: क्वास्य लौकिकम्।
क्व लय: क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्यमे॥१९.७॥
Where is life or where is death? Where are the worlds or where are the worldly relations? Where is dissolution of Consciousness? Where is samadhi for me, who in my own grandeur abide?
जीवन कहाँ है या मृत्यु कहाँ है? संसार कहाँ हैं या सांसारिक सम्बन्ध कहाँ हैं? चेतना का विघटन कहाँ है? मेरे लिए समाधि कहाँ है, जो मेरी ही भव्यता में निवास करती है?
अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम्।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि।।19.8।।
For me, who repose in the Self, talks about the three goals of life (dharma, artha, kama) are useless, and even talks about direct knowledge are needless.
मेरे लिए, जो स्वयं में विश्राम करता है, जीवन के तीन लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम) के बारे में बात करना बेकार है, और यहां तक ​​कि प्रत्यक्ष ज्ञान की बात करना भी बेकार है।
और
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम्।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम।।20.14।।
Where is existence or where is ‘non-existence’?Where is the one(unity) and where is duality?What need is there to say more? Nothing indeed emanates from me.
अस्तित्व कहाँ है या ‘अस्तित्व’ कहाँ है? एक (एकता) कहाँ है और द्वैत कहाँ है? अधिक कहने की क्या आवश्यकता है? वास्तव में मुझसे कुछ भी नहीं निकलता है।

अष्टावक्र गीता के २० अध्यायों की विषय सामग्री अद्वैत वेदांत की व्याख्या है। स्वामी नित्यस्वरुपानंद ने अपने 1940 के अपने अंग्रेजी अनुवाद के परिचय में इसके बारे में एक किस्सा लिखा था, जिसके अनुसार रामकृष्ण ने उन्हें नरेंद्रनाथ दत्त (विवेकानन्द का असली नाम)में वेदांत के प्रति उत्सुकता जगाने के लिए अष्टावक्र गीता का बंगाली में अनुवाद करने के लिए कहा था। अब अष्टावक्र गीता पर स्थानीय भाषाओं और अंग्रेजी में भी बहुत अनुवाद और व्याख्यायें उपलब्ध हैं।
मेरे द्वारा पढ़ी पुस्तक स्वामी चिन्मयानन्द की लिखी अंग्रेज़ी में चिन्मय मिशन द्वारा प्रकाशित है। अष्टावक्र गीता, जिसे अष्टावक्र संहिता के रूप में भी जाना जाता है, भगवद गीता के बाद रचित, जनक और अष्टावक्र के बीच एक संवाद है, जो बीस अध्यायों की अष्टावक्र गीता के पहले १८ अध्यायों में चलती है। इसमें पहले अठारह अध्यायों में शिष्य राजा जनक और गुरू अष्टावक्र हैं। अष्टावक्र १८वें अध्याय में अपने पहले १७ अध्यायों में बताये विचारों का निष्कर्ष रखते है। फिर जनक ही शिक्षक के रूप में दिखते हैं। राजा जनक ब्रह्म ज्ञानी हैं। इस गीता के १९वे एवं २० वे अध्याय में जनक अपने विदेह एव अपनी आत्मा के ब्रह्मरूप के अन्तिम अनुभव बता इस गीता की समाप्ति करते हैं।
https://openthemagazine.com/voices/janakas-questions/

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