गाँव क्या करे- रोयें या शहर भागे

आज रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता दिखी जो बहुत सामयिक है। पर मुझे इसके रचनाकार के विवाद में नहीं पड़ना, जिसकी भी हो बहुत सठीक एवं साम्य की दशा को दर्शा रही है।

प्रभु रथ रोको!
क्या महाप्रलय की तैयारी है।
बिना शस्त्र का युद्ध है जो,
महाभारत से भी भारी है
कितने परिचित कितने अपने
आखिर यूं चले गए
जिन हाथों में धन-संबल
सब काल से छले गये
हे राघव-माधव-मृत्युंजय
पिघलो, ये विनती हमारी है
ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो
महाभारत से भी भारी है।

१. धर्म नेता एवं राजनेता ने गाँवों पिछड़ापन दिया। इस पूरे भयंकर महामारी के बाद भी हमारे धर्म गुरू कुम्भ की तरह के घातक धार्मिक जमघटों का आयोजन करने से आम धर्मांध लोगों को नहीं समझाते। अपने अपने मठों में बैठे धनवान अंधे उनको और उनके शिष्यों का भरण पोषण कर रहे हैं। अगर उनमें थोड़ी मानवीय संबेदना रहती तो गाँव गाँव जाते और उनको समझाते उपनिषदों के अद्वैत ज्ञान को,उनके साथ रहते। राजनीतिक नेताओं की तरह इन्होंने भी गाँवों का वहिष्कार कर दिया है, क्योंकि गाँवों में उस धन की प्राप्ति नहीं होती जो उनके उन आयोजनों को करती अपना महत्व बनाये रखने के लिये झूठे स्वर्ग या नर्क का भय दिखा । पर भगवान तो बार बार कहते हैं लोक संग्रह के लिये ‘सर्वभूते रता’ काम करने के लिये है यह मनुष्य रूप में जन्म और वे उन्हें ही मिलते हैं…..यही राजा से लेकर साधारण परिवार के लोगों यही सिखाया जाता है। यह सभी धर्मों में कहा गया है; अतिथि देवों भव । मैं अपने बचपन में गाँव पर की जमीन्दारी संभालने वाले छोटे दादाजी को करते देखा था जब तक वे ज़िन्दा रहे।सभी सांसदों की, गुरू रामदेव, श्री श्री रविशंकर महाराज के लाखों शिष्य हैं, वे एवं चारों शंकराचार्य के लाखों शिष्य हैं जो गाँवों की सेवा में मदद कर सकते हैं। हर गाँव में अस्पताल बनवा सकते हैं वहीं के लोगों की मदद से। राम कृष्ण मिशन, चिन्मयानन्द की देश विदेश फैली संस्था और ऐसी बहुत से ग्रुप गाँवों को स्वर्ग बना सकते हैं दस साल के भीतर। पूरानी पीढ़ी के उद्योगपतियों को जैसे बिरला, टाटा, डालमिया आदि थे, वे बहुत सारा ऐसा काम करते थे। अब सभी पैसा कमाने की लिये शहरों में इस काम में बहुत धन निवेश कर रहे हैं। गाँव के भी बहुत लोग ऐसे काम जो शिक्षा एवं स्वास्थ्य के लिये होती थी, में रूचि रखते थे, अब भी नहीं दिखते। सब एक दूसरे से ज़्यादा धनी बनना चाहता है।
२. राज्य सरकारों द्वारा गाँवों स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। आज तक हर बड़े गाँव या हर पंचायत में भी अस्पताल नहीं है। मैं बिहार, बंगाल को तो नज़दीक से वर्षों से जानता हूँ। इसके लिये सभी राज्य सरकारें और राजनीतिज्ञ दोषी हैं। कहाँ टेस्टिंग होगी, कहाँ चिकित्सा दिया जायेगा। कौन वैक्सीन लगायेगा, इतने बड़ी संख्या में पीड़ित लोगों के लिये। चुननेवाले लोग भी ज़िम्मेदार और पंचायत चलानेवाले। सभी लोग पैसा कमाते रहे एक दूसरे के नाम ज़िम्मेदारी डालकर। कैसा दुर्भाग्य है। अब तो चेते केन्द्र, राज्य सरकार, सरकारी अफ़सर, और नेता पंचायत से ले संसद तक के। गाँव के लोग भी , तिलक, यज्ञ आदि में लाखों में खर्च कर सकते हैं पर हास्पिटल बनाने में नहीं। वे सब शहर भाग गये और गाँव के बचे खिंचे गरीब निबटे इससे।
क्या आज भी देश, समाज, लोग जागेगे?
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कोविद-१९ का भयंकर आक्रमण जो गाँवों बर्बाद कर देगा और देश को भी
अशोक गुलाटी का आज का लेख जिसे हर गाँव के व्यक्ति को समझने की ज़रूरत है। क़रीब क़रीब भारत के सभी गाँवों ऐसी स्थिति है। लोगों में सभी अंध विश्वास वैसे ही हैं जैसे आज से १०० साल पहले। नारी शिक्षा अभाव, ग़रीबी, जनसंख्या की वृद्धि को रोकने की कोई मानसिकता नहीं। न किसी के बताये ज़रूरी अनुशासनात्मक कदमों को उठाने, बताये निर्देशों को मानने की, न ठीक तरह सही मास्क का उपयोग न दो गज से ज़्यादा की दूरी बनाये रखना, न हाथों का ठीक साबुन से सफ़ाई; न अपना टेस्ट कराने की इच्छा, वैक्सीन लेने में उत्साह, या दर्द का भय या कोई और ग़लतफ़हमी, फिर कैसे बचेंगे इस काल देवता से। शादी, तिलक, दाह संस्कार,त्योहार,अन्य घरेलू परम्परागत कार्यक्रम, आदि को पता नहीं क्यों ४ या पाँच आदमी से निपटाया नहीं जा सकता। सभी गाँव की औरतों और लोगों को बुलाना, न आनेवाले के प्रति दुश्मनी चालू कर देना, यह कैसी बुद्धिमानी है। सभी सच्चे धर्मग्रंथ कहते हैं मरने बाद देह का कोई महत्व नहीं। यहाँ हम अन्य जीवों से भी बेकार हैं, क्योंकि मरने के बाद भी वे काम के होते हैं। फिर कैसे भी कोई इसको निपटा दे क्या फ़र्क़ पड़ता है जब श्मशानों में भीड़ लगी हो एवं अस्पताल पहले से शरीर दान किये के स्वीकृति के बावजूद भी शरीरों को न ले रहे हों। https://indianexpress.com/article/opinion/columns/what-we-need-to-save-lives-and-livelihoods-as-covid-reaches-rural-india-7327210/

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