उपनिषदों की आचरण संहिता

उपनिषदों की आचरण संहिता
हमारे आदिग्रंथ- वेद, उपनिषद्, गीता सभी में व्यक्तिगत अनुशासन,संयम, नियम, आचरण की ज़रूरत पर बल दिया गया है। व्यक्ति के कर्ममय जीवन के किसी क्षेत्र में प्राचीन काल से आजतक इनको निष्ठा के साथ मान कर ही उच्चतम शिखर तक पहुँचा जा सकता है।
उपनिषदों में भी वर्णित है आत्म ज्ञान या ब्रह्म ज्ञान के पथिकों से सद आचरण की अपेक्षा। कुछ उपनिषद् धीर एवं मन्द शब्दों से बुद्धिमान एवं मन्द बुद्धि वाले दो तरह के व्यक्तियों की बात कही है। व्यक्ति के बुद्धि के द्वारा लिये इनके निर्णयों को श्रेय एवं प्रेय बताया गया है। दोनों के लक्षणों को भी बताया है। आदमी का चरित्र और आचरण कुछ हद तक जन्मजात होता है पूर्व जन्म के कर्मों के कारण, पर इस जन्म की संगति, परिवार,एवं शिक्षा और फिर स्वनिर्माण की प्रक्रिया, सद गुणों से भरे जीवन या दुर्गुणों में लिप्त जीवन की नींव डाल सकती है। यहाँ मैं उपनिषदों से लिये कुछ अपेक्षाओं के बारे में लिख रहा हूँ।

१. ईशोपनिषद् का पहला ही श्लोक एक ऐतिहासिक महत्व रखता है। महात्मा गांधी ने इसी के ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ पर अपने जीवन को जिया और वे महात्मा हो गये। इसके बारे में पहले भी लिख चुका हूँ। सभी अन्य उपनिषदों भी त्याग महिमा बताया। वह श्लोक या मंत्र है-
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥१॥
इस ब्रह्मांड के सभी चर अचर ईश्वर का है और हर व्यक्ति त्याग कर जीवन का आनन्द ले और किसी अन्य के, यहाँ तक की अपने भी धन का लोभ नहीं करे, क्योंकि वह तो ईश्वर का है।

२.कठोपनिषद् कहता है कि कैसे व्यक्ति आत्मा को जानने में असमर्थ होंगेव-‘ दुश्चरितां न अविरतः न अशान्तः न असमाहितः न वा अशान्तमानसः’(२.२४)
-जो दुष्कर्मों से विरत नहीं हुआ है, जो शान्त नहीं है, जो अपने में एकाग्र (समाहित) नहीं है अथवा जिसका मन शान्त नहीं है। उपनिषदों में अथिति के आदर का निर्देश है। कठोपनिषद् में यमराज भी कहते है कि जिसके घर में अतिथि ब्राह्मण को बिना भोजन रहना पड़ता है उनकी सब दौलत नष्ट हो जाती है-‘ब्राह्मणः अनश्नन् यस्य गृहे वसति तस्य अल्पमेधसः पुरुषस्य आशाप्रतिक्षे सङ्गतम् सुनृताम् इष्टापूर्ते पुत्रपशून् सर्वान् एतत् सर्वं वृङ्क्ते(१.८)-जिसके घर मे ब्राह्मण बिना खाए रहता है, उस अल्पबुद्धि मनुष्य की सारी आशा-प्रतीक्षाएँ, जो कुछ उसने पाया है, जो सत्य और शुभ उसने बोला है, जो कुएँ खुदवाए हैं तथा जो यज्ञ किये हैं, और उसके सब पुत्र एवं पशु उस अनादृत ब्राह्मण के द्वारा विनष्ट कर दिये जाते हैं। और अथिति नचिकेता की अपने ही घर में तीन दिन भूखे प्यासे रहने के कारण यमराज उसे तीन महत्वपूर्ण वर माँगने को कहते एवं उसे पूरा कर देते हैं जो कठोपनिषद का मूल विषय है।
आगे चल कर यज्ञ, दान, और तप- त्रिकर्म को निष्काम भाव से करने का विधान बताते हैं।

३. मुंडकोपनिषद में नित्य ऐसे ही आचरणों को करने की सलाह दी है आत्मा को पाने के लिये। ‘सत्येन तपसा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण च लभ्यः(३.१.५)- सत्य से, आत्म-संयम (तप) से, सम्पूर्ण एवं सम्यक् ज्ञान से, ब्रह्मचर्य से सर्वदा लभ्य है।
और फिर कहा है,’सत्यम् एव जयते अनृतं न’- सत्य’ की ही विजय होती है असत्य की नहीं।(३.१.६) ‘सत्यमेव जयते’यह भारत के संविधान का मूल मंत्र है। फिर ऋषि ने बताया है कि कैसे लोगों को आत्मज्ञान नहीं मिलता-‘अयम् आत्मा बलहीनेन न लभ्यः प्रमादात् च न वा अलिङ्गात् तपसः अपि न लभ्यः(३.२.४)बलहीन व्यक्ति के द्वारा लभ्य नहीं है, न ही प्रमादपूर्ण प्रयास से, और न ही लक्षणहीन तपस्या के द्वारा।

४. केनोपनिषद् में कहा गया-‘तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्‌ (४.८)-तप, आत्म-विजय (दम) तथा कर्म इस उपनिषद् के ज्ञान का आधार (प्रतिष्ठा) हैं, ‘वेद’ इसके सब अंग हैं, सत्य इसका धाम है। फिर
‘यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति’-जो इस अन्तरज्ञान को जानता है वह अपने पाप का उच्छेदन करके उस बृहत्तर लोक एवं अनन्त स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है, अवश्यमेव वह प्रतिष्ठित हो जाता है।

५. प्रश्नोपनिषद में ब्रह्म ज्ञान के इच्छुक आये विद्यार्थियों को गुरू ऋषि की पहली शर्त है- ‘तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया भूयः एव संवत्सरं संवत्स्यथ…’(१.२)-एक वर्ष ब्रह्मचर्य, श्रद्धा एवं तपस्यापूर्वक व्यतीत करिये फिर जो चाहें प्रश्न पूछिये।
फिर आगे भी कहा है- ‘अथ तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया आत्मानम् अन्विष्य..’(१.१०)- ‘आत्मा’ का ब्रह्मचर्य, विद्या, श्रद्धा एवं तपस्या के द्वारा अन्वेषण कर लिया है.. वे ‘सूर्यलोक’ के अपने स्वर्ग को जीत लेते हैं।वहाँ अमृतत्व अभय प्रदान करता है,वहीं से कोई लौटता नहीं हैं।
कुछ उन ऋषियों के व्यक्तिगत जीवन का अनुभव भी दर्शाता है या कारण के सम्बन्ध के कारण।जैसे श्लोक १.१३ में ‘ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते प्राणं वै एते प्रस्कन्दन्ति। रात्रौ यत् रत्या सयंयन्ते तत् ब्रह्मचर्यम्’ -जो दिन में स्त्री-रति में सुख लेते हैं वे स्वयं ही अपने प्राणों (जीवन) को नष्ट कर देते हैं; जो रात्रि में स्त्री-रति में सुख लेते हैं वे ब्रह्मचर्य का ही पालन करते हैं। पर १.१५ में ऋषि कहते है- ‘येषां तपः ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितं तेषाम् एव एषः ब्रह्मलोकः,’-किन्तु ब्रह्मलोक उनका है जिनमें तप तथा ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठित हैं।१.१६ में फिर इस बात पर बल देते हैं- ‘तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति’-उन्हीं का है यह निर्मल ब्रह्मलोक जिनमें न कुटिलता है, न मिथ्यात्व है, न कोई भान्ति है।’इसी उपनिषद् में आगे कहा है-‘यः अनृतं वदति एषः वै समूलः परिशुष्यति तस्मात् अनृतं वक्तुं न अर्हामि॥६.१॥-जो असत्य बोलता है वह समूल नष्ट हो जाता है।’

६. तैत्तरीय उपनिषद् में व्यक्ति के आचरणों पर बहुत साफ़ साफ़ रूप से कहा गया है- ‘ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च।सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च।तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च।शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। १’ – वेद के स्वाध्याय एवं प्रवचन के साथ सत्याचरण-ऋतम् हो; …सत्य हो; ….तपश्चर्या हो; …आत्म-प्रभुत्व (दम) हो;…. आत्म-शान्ति (शम) हो। फिर ‘स्वाध्यायप्रवचने च अनुष्ठेयानि सत्यम् एव अनुष्ठेयं इति सत्यवचाः राथीतरः मन्यते तपः एव अनुष्ठेयं इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः मन्यते स्वाधायप्रवचने एव अनुष्ठातव्ये इति नाकः मौद्गल्यः मन्यते । तत् हि तपः। तत् हि तपः। स्वाध्यायप्रवचने।… ”सत्य सर्वप्रथम है” सत्यवादी ऋषि राथीतर (रथीतर के पुत्र) ने कहा। ‘तप सर्वप्रथम है” नित्य तपोनिष्ठ ऋषि पौरुशिष्टि (पुरुशिष्ट के पुत्र) ने कहा। “वेदों का स्वाध्याय एवं प्रवचन सर्वप्रथम है” मुद्गल पुत्र नाक ऋषि ने कहा। कारण, यह भी तपस्या है तथा यह भी तप है।’
‘सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।सत्यान्न प्रमदितव्यम्‌। धर्मान्न प्रमदितव्यम्‌।कुशलान्न प्रमदितव्यम्‌। भूत्यै न प्रमदितव्यम्‌।स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्‌।
देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्‌। मातृदेवो भव।पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि।यान्यस्माकं सुचरितानि।तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि।
ये के चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः। तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम्‌। श्रद्धया देयम्‌। अश्रद्धयाऽदेयम्‌। श्रिया देयम्‌। ह्रिया देयम्‌। भिया देयम्‌। संविदा देयम्‌।११.१,२,३॥’
-सत्य बोलो, अपने धर्म के मार्ग पर चलो, वेदों के स्वाध्याय में अवहेलना मत करो। अपने आचार्य को उनका इष्ट धन लाकर देने के बाद तुम अपनी पुत्र परम्परा के दीर्घ सूत्र को नहीं काटोगे। सत्य के विषय में तुम प्रमाद मत करना। अपने कर्तव्य के विषय में तुम असावधान मत होना। कुशलता के सम्बन्ध में तुम असावधान मत होना। अपनी उन्नति, वृद्धि एवं उद्यम के प्रति असावधान मत होना। वेदों के स्वाध्याय एवं प्रवचन के विषय में प्रमाद मत करना।
देवों अथवा पितरों के प्रति अपने कर्तव्यों में अवहेलना मत करना। तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए देवतुल्य हों तथा तुम्हारे माता देवीतुल्या हों जिनकी तुम आराधना करते हो। अपने आचार्य की देवसमान सेवा करो तथा घर आये अतिथि की देवसमान अभ्यर्थना करो। लोगों के सम्मुख हो कर्म अनिन्द्य हैं तुम केवल उन्हीं कर्मों को सयत्न करना, अन्यान्य कर्मों को नहीं। हमने जिन सत्कर्मों को किया है वे ही तुम्हारे द्वारा धर्म-समान करणीय (उपास्य) हैं, अन्य कोई नहीं।
जो भी ब्रह्मचारी हमसे अधिक श्रेष्ठ एवं महान् हों तुम्हें उनको आसन देकर सम्मानित एवं परितृप्त करना चाहिये। तुम्हें श्रद्धा एवं आदरपूर्वक दान करना चाहिये; अश्रद्धा से तुम नहीं दोगे। (तुम श्री-सम्पत्ति के अनुरूप दान करोगे)*। तुम सलज्जभाव से दान करोगे, तुम सभय दान करोगे; तुम संविदभाव से (सहदयता एवं सहानुभूतिपूर्वक) दान करोगे। इसके अतिरिक्त यदि तुम्हें अपने कर्म तथा कर्मपथ (आचरण) के विषय में शंका हो तो जो भी ब्राह्मण वहाँ हों जो सुविचारशील हों भक्त हों, दूसरों से संचालित न हों धर्मपरायण हों, कठोर एवं क्रूर न हों, जैसा वे उस विषय में आचरण करे वैसा ही तुम करो। और यदि कोई व्यक्ति दूसरों के द्वारा अभियुक्त तथा अपराधी घोषित हो तो उसके साथ भी तुम उसी प्रकार आचरण करो जैसा उसके प्रति वे सब ब्राह्मण करते हैं जो सुविचारवान् श्रद्धावान् हैं, दूसरो के द्वारा संचालित नहीं हैं, धर्मपरायण हैं, जो कठोर एवं कूर नहीं हैं।
भृगुबल्ली में गृहस्थों, किसानों को कुछ निर्देश हैं जो सबके लिये ही हैं-
अन्नं न निन्द्यात्।…. (७.१) तुम अन्न की निन्दा नहीं करोगे; कारण, वह तुम्हारे श्रम का व्रत है।(८.१)’अन्नं न परिचक्षीत…’तुम अन्न का तिरस्कार नहीं करोगे।
(९.१)अन्नं बहु कुर्वीत।…तुम अन्नवृद्धि तथा अन्न-संचय करोगे।(१०.१)’वसतौ कम् चन न प्रात्यचक्षीत’-तुम अपने आवास में आये किसी भी व्यक्ति की अवमानना नहीं करोगे।

७. बृहदारण्यक उपनिषद् में कहानी है जो प्रजापति ने अपने तीन पुत्रों- देव, मनुष्य,और असुरों को कहा जब वे उनसे अलग होने लगे और पूछें कि हमें अपनी अन्तिम शिक्षा दीजिये। उन्होंने कहा, ‘द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रय शिक्षेद्दमं दानं दयामिति।’
वह आज भी बरसात में बिजली की गर्जना में ईश्वरीय आवाज़ बन द, द, द …में निहित होती है- पहला‘द’ देवों को दम (आत्म संयम), दूसरा ‘द’ मनुष्यों को दान, और तीसरा ‘द’ असुरों को दया या करुणा करते रहने की सीख देता है। That very thing is repeated even today by the heavenly voice, in the form of thunder, as “Da,” “Da,” “Da,” which means: “Control yourselves,” “Give,” and “Have compassion.”
यह आज के सभी मनुष्यों के लिये भी है, क्योंकि हम में ही दैविक, राजसिक, एवं आसुरी प्रवृति के लोग है।
क़रीब क़रीब सब मुख्य उपनिषदों की उद्धृति यहाँ दी गई है। सोचिये हज़ारों पहले सिद्ध ब्रह्म ज्ञानी ऋषियों ने समाज के लोगों से कैसे जीवन आचरण की उम्मीद की गई थी आज भी कितना सार्थक है एक अच्छे समाज, राष्ट्र एवं विश्व के लिये।
इन्हीं आचरणों को अधिक विस्तार से भगवद्गीता और फिर तुलसीदास के रामचरितमानस में किया गया है। अगर व्यक्ति सच्चरित्र नहीं, सदाचरण नहीं करता तो कभी कोई सफलता उसके हाथ नहीं लगेगी जिससे वह अन्त तक शान्तिमय जी सके। कभी देर नहीं होती है। जब जागो तभी सबेरा। आपके बहुमूल्य सुझाव की अपेक्षा रहेगी।

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