हिन्दुओं में धर्म से बढ़ती दूरी

हिन्दुओं में धर्म से बढ़ती दूरी
पता नहीं क्यों लगता है कि अपने को शिक्षित माननेवाले लोगों में एक होड़ मची है अभिजात वर्ग का कहाने की, नास्तिक बनकर, पुरानी सब मान्यताओं को बिना कारण समझे,गंवारपन या पुरानपंथी होने की संज्ञा देने की;धार्मिक प्रार्थना को एक और अनावश्यक तकलीफ़ समझ उससे छुटकारा लेने की. कुछ लोग व्रत करते हैं, पर इससे धार्मिकता को नहीं जोड़ना चाहते…उसके साथ प्रार्थना शामिल नहीं करना चाहते…मेरे विचार से हर व्यक्ति को किसी न किसी तरह की प्रार्थना करनी चाहिये. ये प्रार्थनाऐं अगर आपकी सब कामनाओं में सफलता नहीं दिलाये, पर फिर भी एक दैविक शक्ति में विश्वास बहुत आत्म बल बढ़ाता है, संतोष भी मिलता है. उस दैवी शक्ति को हम किसी नाम से पुकारे, वह आपके सभी कामों में सफलता न भी दे, पर दैविक हस्तक्षेप का भी एक महत्वपूर्ण आख़िरी स्थान ज़रूर होता है आपके नियत कामों की सफलता में सब अन्य बातों के साथ.कभी कभी यही दैव रक्षा भी करता है किसी बड़ी विपदा से अगर हम सोच कर देखें तो.
भगवत् गीता के अध्याय १८ में एक श्लोक हैं जो इसका एक समुचित व्याख्या करता है-
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌ ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा ‘दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌’॥
समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए पाँच कारण हैं- अधिष्ठान, कर्ता, विविध करण, विविध एवं पृथक् पृथक् चेष्टाएँ एवं पाँचवा देव….जब अन्त में लगता है कि सब करके की भी एक कार्य पूरा नहीं हुआ तो पता चलता है उसी दैव योग के चलते हम एक भयंकर हादसे से बच गये… मुझे पूर्ण विश्वास है अच्छे आचरणों की जो शिक्षा हमें बचपन में समय समय पर गुरूजनों से मिली मेरी ज़िन्दगी को सफल सुखी बनाने में जाने अनजाने काम आई…
मुझे याद है कि मेरी तथाकथित अशिक्षित केवल भोजपुरी जानने वाली परदादी मुझे गोद में ले याद कराती थीं- ‘राम अ गति, देहु सुमति’…मुझे तो सुमति का मतलब भी नहीं मालूम था तब. पर लगता है अच्छे शब्दों का असर तो पड़ता है भावी जीवन पर अगर हमें विश्वास हो…बहुत पहले गाँव के स्कूल में दूसरी तीसरी कक्षा तक पढ़ते समय रामायण की पुरी कहानी मुझे एवं मेरे चाचाजी को सुनाते थे आदरणीय अध्यापक स्वर्गीय पांडे जी…जो सदा याद रही और वही बढ़ते उम्र के साथ साथ हमारे अध्यात्मिक रुझान का कारण भी बनी शायद अन्य कारणों के साथ…. अध्यापक गंगा दयाल पांडे जी सबेरे प्रार्थना कराते थे, ‘हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये,लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बनें…’हिन्दी के पाठों में भक्त कवियों के दोहे होते थे जो हमने रट रट कर याद किये जो अच्छे आचरण की सीख देते थे…और बुरे आचरणों से दूर रहने के लिये सावधान करते हुए..ज़रूर हमें एक इंसान बनने में मदद किये. आज पता नहीं वे सब पढ़ाए जाते हैं या नहीं….या आधुनिकतावाद के चलते राजनीति उन्हें स्कूल की किताबों से हटा दी या अंग्रेज़ी मीडियम की प्राथमिकता के कारण ख़त्म हो गया रटने का रिवाज….
पढ़े हुए लोगों की नई पीढ़ी के माता-पिता तुलसीदास के रामचरितमानस को पढ़ने की अगर सीख न दे या कठिन समझे और न बता पायें, अगर वे तुलसीदास की ही जन साधारण में बहुत प्रचलित ‘हनुमान चालीसा’ की प्रथम चार पंक्तियों को भी प्रतिदिन सबेरे बोलते हुए प्रार्थना करते, कराते तो अच्छा होता, और अगर उतना भी नहीं तो केवल दो से भी काम चल जायेगा..नीचे की दो पंक्तियों को स्मरण करने कराने की कोशिश करें, गुनगुना लें, सबेरे शाम, अच्छा लगेगा.
‘बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ।।’
अगर वह भी नहीं तो केवल यही सुमिरन कर लें, ‘सब कुछ मिले तुम्हारे सरना, तुम रक्षक काहू को डरना।’ यह बहुत सेक्यूलर(secular) भी है….
मैं अपनी कहानी कहना चाहता हूँ….जो अच्छी लगे तो पढ़ें, काफ़ी लोगों के साथ ऐसा ही कुछ हुआ होगा.
समय, दायित्व एवं उम्र के साथ मेरी अध्यात्म एवं धार्मिक ग्रंथों की ओर रुझान भी बढ़ता गया, समय पर मेरी पत्नी एवं तीनों बच्चों के कारण इसे और बल मिल पाया…पहले सुन्दर कांड का पाठ हर मंगलवार को चालू हुआ, फिर शनिवार भी जुड़ गया….फिर रामचरितमानस का मासापरायण आरम्भ हुआ, इसकी प्रेरणा दादाजी की परम्परा को चालू रखने की इच्छा से हुई…फिर उन्हीं की यादों का पालन करता हुआ साल के दोनों नवरात्रों में रामचरितमानस का नवान्हपरायण….जो बहुत बार बहुत कठिन कार्य भार एवं व्यस्तता के बाद में भी देश विदेश के होटलों में, बहुत सबेरे की फ़्लाइट होने पर भी चलता रहा बिना बन्द हुए…हाँ, २०९७ में नोएडा आने के बाद २००० के हार्टऑटेक एवं ऑपरेशन के बाद अचानक सब कुछ कुछ समय के लिये बन्द हो गया….बहुत ख़राब लगता था…पर दैव योग समझ संतोष कर लिया…कुछ समय बाद अपने ही सब सामान्य हो गया…और अब नौकरी के कार्यभार से मुक्त होने पर मन रामचरितमानस से भगवत् गीता…और तत्पश्चात् उपनिषदों में रम गया है..पाठ की तरह नहीं, समझने के लिये…..दैनिक पाठ केवल रामचरितमानस के सुन्दरकांड का करता हूँ…..उसी से प्रेरित हो कभी कभी लिख भी देता हूँ, पता नहीं अच्छा, सामान्य या घटिया…एक आजीवन इंजीनियर गृहस्थ से अपेक्षा भी ज़्यादा बड़ी नहीं होनी चाहिये.. कोविद-१९ में मेरी आध्यात्मिक कार्यवाही मेरी सबेरे नीचे दिये चार श्लोकों से प्रारंभ होती है….महात्मा गांधी के चुने हुए श्लोकों ये हैं…पहला ईशोपनिषद् से है….जिसे वे नित्य (हरदम)पाठ कहते थे…अन्य अलग अलग जगहों से…

हरि ओम्
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥
जगत के सब चर अचर में ईश्वर व्याप्त हैं। तुम त्याग पूर्वक जीवन का आनन्द लो, किसी अन्य के धन का लोभ कभी न करो।

प्रात: स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ:।।
मैं प्रात:काल, हृदय में स्फुरित होते हुए आत्मतत्त्व का स्मरण करता हूँ, जो सत, चित और आनन्दरूप है, जो ‘तुरीयम्’परमहंसों की अवस्था है और जो स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत- तीनों अवस्थाओं में जाग्रत रहता है, वह स्फुरणा रहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पंचभूतों का शरीर मैं नहीं हूँ।

न त्वहम् कामये राज्यम् न स्वर्गम् न पुनर्भवम्।
कामये दु:खतप्तानम् प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
न तो मुझे राज्य की कामना है और न ही स्वर्ग चाहिए, न ही पुनर्जन्म चाहिए। मुझे दु:ख में जलते हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश चाहिए।

स्वस्ति: प्रजाभ्यः परिपालयंतां, न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः ।
गो ब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं, लोकाः समस्ताः सुखिनोभवंतु ॥
हे ईश्वर! शक्ति शाली और सत्तातंत्र द्वारा सभी लोगों की भलाई न्यायूपर्वक हो..ईश्वर सभी विद्वानों और भले लोगों का हर दिन शुभ करें…सारा लोक सुखी हो!

और सोने के जाने पहले हम दोनों एक नामकीर्तन एवं शान्तिपाठ करते है…‘श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव…’ यह कठिन समय भी कटता जा रहा है उस अदृश्य शक्ति के बल पर….कट ही जायेगा…बहुत कुछ सीखाते हुए….काश! हम सब समझ पाते…हम दूसरी संस्कृतियों, या देशों से ग़लत अनुकरण करना बन्द करें एवं अपने मिट्टी ऋषियों के बताए रास्ते चलें जो सार्वभौम है सनातन है….हम का मानने का तरीक़ा अलग हो सकता है, पर ध्येय एक होना चाहिये सुदृढ़ राष्ट्र, मनसा वाचा कर्मसा स्वस्थ समाज…हम मानें कि हम सभी में वहीं आत्मा व्याप्त है, एक ही के हम अलग अलग नाम रूप हैं….
अगर अच्छा लगे तो आप भी ऐसा सोचें, करें….अगर लाभ नहीं तो हानि नहीं होगी, इतना विश्वास है, सृष्टि के रचयिता, पालक के प्रति ….

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