विस्थापित-प्रवासी मज़दूरों की समस्या- समाधान


कुछ प्रदेशों की अर्थव्यवस्था स्वतंत्रता के कुछ सालों बाद राजनीतिक अव्यवस्था एवं नेतृत्व की कमजोरी के कारणों से लगातार गिरती रही है. दुर्भाग्यवश, तीन प्रदेश- बिहार जहां मैं पैदा हुआ, उत्तरप्रदेश जहां रह रहा हूँ एवं पश्चिम बंगाल जहां मेरी ८०+ साल ज़िन्दगी का सुनहरा समय व्यतीत हुआ- ऐसे ही हैं. बिहार एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पिछले बहुत सालों में खेती के काम में बढ़ते मशीनों के उपयोग एवं उद्योगीकरण या गाँव या शहरों में स्थानीय रोज़गार की कोई लघु उद्योग या अन्य व्यवस्था न किये जाने के चलते लाखों की तादाद में हर श्रेणी के लोग-पुरूष, स्त्री – देश के हर कोने में जा विभिन्न तरह की मज़दूरी या सहायक की छोटी बड़ी नौकरियों या सेवा क्षेत्रों में,निर्माण कार्य में, ढाबों में, दुकानों में के कामों में या छोटे छोटे ढेले पर घूम कर सामान बेंचने के विभिन्न क़िस्म के व्यवसाय में, या रिश्ता, ऑटो या ओला, उवेर, या अन्य कम्पनियों के धनिकों के गाड़ियों को चलाने के कामों में लग गये हैं. एक काफ़ी बड़ा अंश पंजाब, हरियाना, जम्मू कश्मीर से ले केरल, आदि तक वहाँ के खेतों में काम करता है, क्योंकि वहाँ खेती में काम करने वाले मिलते नहीं या बहुत ज़्यादा, क़रीब दुगना मज़दूरी माँगते हैं. इनमें बहुत कम उन स्थानों में अपने परिवार के साथ अपनी समझदारी से पैसे बचा अपना मकान बना एक हद तक ठीक ढंग की ज़िन्दगी जीने में सक्षम भी हुए हैं.पर बड़ी संख्या में वैसे ही लोग हैं जो अकेले ही आये हैं, कमाते हैं,कम से कम में में अपना खर्चा चला, कुछ बचा अपने गाँव में रह रहे परिवार के भरण पोषण के लिये पैसा भेजते रहते हैं. ऐसे लोगों की संख्या आश्चर्य होता है तीस लाख की है जैसा मीडिया से पता चलता है. ये वे लोग हैं जो आज कोविड-१९ या पहले भी कुछ स्थानीय दबाव या दंगों में गाँव भाग जाना चाहते हैं. कल मीडिया के ३२ लाख केवल बिहार के लोग वापस जाने का आवेदन भरें हैं, जिनके लिये कल से सरकार स्पेशल ट्रेन चालू की है. बिहार के साथ साथ, उत्तरप्रदेश, ओड़िसा, मध्यप्रदेश के भी मज़दूर घर जाने की माँग कर रहे हैं. कुछ प्रान्तों की सरकारों ने मदद देने की पहल भी की. उत्तर प्रदेश तो अपने स्पेशल बस भेज कोटा के विद्यार्थियों को वापस भी बुलाया, हरियाना के कुछ मज़दूरों को भी. पर बिहार सरकार ने लॉक आउट संहिता के विरूद्ध होने कारण यह नहीं किया. पर दबाव बढ़ता गया. ऊपर से महाराष्ट्र की सरकार ने बाहर के मज़दूरों को ले जाने की माँग भी कर डाली. इन सब कारण से २९ अप्रैल को केन्द्रीय सरकार ने अनुमति भी दे डाली. ज़रूर यह निश्चय राजनीतिक कारणों से किया गया है. जो आज की स्थिति को देखते हुए सही नहीं है और ख़तरनाक भी हो सकता है.
बिहार एवं बाहर से आये मज़दूर वर्ग का यह हाल सदा रहा है. मैंने अपने हिन्दमोटर के कार्यकाल में भी अनुभव किया. गर्मी में शादी के महीने या खेती में काम के मौसम में वे कोई न कोई सच्चे झूठे बहाने बना भी गाँव चले जाते थे और इसके चलते महीनों फ़ैक्टरियों या अन्य कारोबारों में काफ़ी मुसीबत हो जाती थी.बिहार के मज़दूरों में स्थिरता की कमी रहती है. बहुत आसानी से अपने तथाकथित लीडरों की या अफ़वाहों पर जल्दी आवेश में आ जा जाते हैं और गाँवों के रीतिरिवाजों एवं मान्यताओं से जुड़े रहते हैं. उन्हें वहीं आसरा दिखता है अपने लोगों के बीच.

आज की अवस्था तो एक दम ही अलग है. कोरोना-१९ महामारी का प्रकोप मेरे ८०+ के जीवन का अद्भुत दहशत भरा अनुभव है..सभी सम्पन्न से सम्पन्न और आम लोगों के भी जीवन के साधारण ज़रूरतों की कमी की तकलीफ़ों को कम करने के साथ देश के करोड़ों लोगों के पेट भरने की समस्या जटिल है, ऐसी अवस्था में जब देश के आवागमन के सब साधनों को बन्द करना पड़ा है.सभी बच्चे, बड़े, वृद्ध को संक्रमण से रोकने, बचाने से एवं बढ़ते संख्या में मरीज़ों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने, मृत्यु दर को कम एवं ख़त्म करने की चुनौती है.जब इलाज करने की न कोई दवा मालूम है, न संक्रमित न होने की कोई वैक्सीन का इजाद हुआ है, न बना है….अभी तक विश्व में कहीं.वैसे बड़ी ज़ोर से देश विदेश के वैज्ञानिक तोड़ प्रयास कर रहे हैं.
देश की अर्थव्यवस्था चलाने के सभी कार्यकलाप- फ़ैक्ट्री कारख़ाने, व्यवसाय,आना जाना सभी बन्द है लॉकडाउन के चलते, जिसे संक्रमण को रोकने एक मात्र उपाय की तरह किया गया है. यह अवस्था क़रीब ४० दिनों के लॉक डाउन के बाद है.धीरे धीरे देश की रोज ख़राब होती आर्थिक अवस्था का ख़्याल रख देश के सभी ज़िलों को लाल, पीले एवं हरे विभाग में बाँटा गया है. कुछ सावधानी के साथ कुछ गतिविधियों को पूरे निर्धारित नियमों का पालन करते हुए धीरे धीरे खोला जा रहा है, जिनमें कुछ वस्तुओं की बाज़ार से लोगों को कमी न हो जाये.
ऐसी अवस्था में इन प्रवासी लोगोंको-जो चाहे तीर्थयात्री हों, शिक्षार्थी, या मज़दूर जहां थे वहीं रहना सबसे उत्तम उपाय था, क्योंकि कोई नहीं जानता था कि उनमें कौन संक्रमित है. देश के विभिन्न दूर जगहों से बसों या रेल से इनको ले जाना सबकी भलाई को देखते हुए न उचित माँग थी, न उनका कार्यान्वयन करना कुछ लोगों को खुश करने की राजनीति के सिवाय किसी तरह जायज़ है विशेषकर काम करने वाले मज़दूरों के लिये, जिनकी तुरन्त ज़रूरत पड़नेवाली थी. जैसा कि बड़े बड़े विद्वान अर्थशास्त्री एवं अनुभवी उद्योगपति भी कह रहे हैं…जहां जो मज़दूर अभी हैं वहाँ की सरकार एवं लोगों को विशेषकर उद्योगपतियों को उनके रहने, खाने पीने एवं सुविधाओं की समुचित व्यवस्था करनी चाहिये था निःस्वार्थ एवं देशहित की भावना के साथ.ऐसा करने से ही कारख़ाने एवं अन्य व्यवसाय कोरोना के नियंत्रित होते ही जल्दी से जल्दी चालू हो सकते, एवं देश अर्थनीति कम से कम समय में पूरानी से भी ज़्यादा गति पकड़ सकती, इस नुक़सान की भरपाई के लिये…कल तक टी.वी आदि के द्वारा कुछ समझदार उनको यही मेसेज दे रहे थे, नहीं तो देश का संकट बहुत देर तक चल सकता है.पर जो हो स्पेशल रेल सेवा चालू हो चुकी है…राँची स्टेशन पर गुलाब के फूल दे स्वागत किया एक दल का…यह जनप्रियता हासिल करने का ग़लत रास्ता है. अगर उत्तरप्रदेश हो या बिहार या झारखंड या अन्य ऐसे प्रदेश दृढ़ संकल्प ले वहाँ का नेतृत्व पिछले सालों में अपने ही प्रांतों में शिक्षा का या रोज़गार का साधन खड़ा करता गाँव गाँव में जो सम्भव है यह विस्थापन इस हद तक नहीं पहुचंता. आज कोरोना-१९ के कारण लगाया लॉक डाउन धीरे धीरे खोला जा रहा है, सब सेवाओं एवं कार्य संस्थानों को चालू किये जाने का प्रयास चल रहा है, वैसे समय इन प्रवासियों को अपनी जगह पर ही रूक जाना चाहिये एवं देश की अर्थव्यस्था की गाड़ी को पुरानी गति पर फिर यथाशीघ्र वापस लाने देशहित मदद करनी चाहिये. यही एक कर्त्तब्य पालक नागरिक से माँग है देश का. इसके लिये…
१. इन्हें काम देनेवालों को इनसे संपर्क बना स्थिति से सदा अवगत कराना एवं इनकी वर्तमान असुविधाओं को मिटाने का प्रयास करना चाहिये.
२. उद्योग एवं व्यवसाय के मानवसंधान अफ़सरों को इस काम में पहल करना चाहिये.
३. स्थानीय जन नेताओं को प्रदेश की अर्थ व्यवस्था को शीघ्र पटरी पर लाने के लिये इन लोगों का आत्मबल बढ़ाना चाहिये.
४. ये प्रवासी जिस प्रदेश के हैं वहाँ के मुख्य मंत्रियों को बिना राजनीतिक फ़ायदे की सोचे इन्हें भी उचित राय एवं सम्भव सहायता करना चाहिये.
५. प्रवासी के अपने प्रदेश एवं जहां वे काम करते है, की सरकारों का ऐसे व्यक्तियों के कल्याण हित विभाग को पूरी ज़िम्मेदारी से इनके सम्बन्ध में पूरी जानकारी का आँकड़ा रखना चाहिये.
साथ ही देश के केन्द्र एवं विस्थापितों को काम देनेवाली राज्य सरकारों का नेतृत्ववर्ग, नगर व्यवस्था चलानेवाले, व्यवसायी वर्ग एवं उद्योगपति को आगे के लिये यथाशीघ्र उस व्यवस्था का कार्यान्वयन करना चाहिये, जिससे ऐसे मज़दूरों को जीवन में स्थिरता मिले…उद्योगपति एवं व्यवसायी वर्ग, मुनाफ़ाख़ोरी एवं शेयरहोल्डरों के ध्यान के साथ साथ छोटे से छोटे कर्मकार के परिश्रम का बिना उनकी ज़िन्दगी की साधारण ज़रूरतों का, ख़्याल रखें, केवल दोहन की नीति द्वारा कार्य करना बन्द करें….हर शहर, फ़ैक्टरियों के कल्स्टर के साथ मज़दूरों के अच्छे जीवन के लिये ज़रूरी उचित आवासों का समूह, सभी ज़रूरी सुविधा- स्कूल, अस्पताल, पार्क, और अन्य सुविधा का इंतज़ाम करे….हर नगरों में चाहे वह नोयडा हो या दिल्ली या और जगह, झुग्गियों,एवं झोपड़पट्टियों को ख़त्म करने एवं पैदा न होने देने का राष्ट्रीय संकल्प लिया जाये जो ज़रूरी है….आज लागत को घटाने के लिये हर उद्योगपति हर कारखाना लगाते वक्त अपने कर्मचारियों की इन सुविधाओं पर न कोई लागत दिखाता है, न पहले से इसकी व्यवस्था करता है…और फ़ैक्ट्री के पूरी तरह चालू होने के पहले कुछ व्यवसायी वृति वाले लोग वहाँ के आसपास की सरकारी ज़मीन में या पास के गाँववाले मजदूरो को शरण देने के लिये अपनी कमाई बनाने के लिये अपने यहाँ झोपड़पट्टी बना देते हैं, और वह बढ़ती जाती है…पहले यह नहीं होता था….हर फ़ैक्ट्री के साथ वहाँ के लिये ज़रूरी हर स्तर के लोगों के रहने की सुविधा भी बनाये या बढ़ाते ज़ाया जाता थे. ऐसी फ़ैक्टरियों के मानव संसाधन विभाग को क्या यह ख़्याल नहीं रखना चाहिये. क्या यह स्मार्ट सीटी एवं शहर की बात करनेवालों को सोचना नहीं चाहिये..मीडिया राजनेताओं की उठापटक एवं चालवाजियों की कहानियाँ बन्द कर इन समस्याओं पर ध्यान दें तो देश का हित होगा, प्रजातंत्र स्थायी बन पायेगा, देश दुनिया में अपना सम्माननीय स्थान बना पायेगा…काश! देश का नेतृत्व कुछ इन अत्यन्त ज़रूरी मानवीय पहलू का भी ख़्याल रखता…प्रधान मंत्री आवास योजना में शहरों के इस आवास समस्या का समुचित ख़्याल भी किया जाता.
अब मैं नोएडा नगर के आज के रूप की चर्चा करता हूँ जो विशेषकर उद्योगों की स्थापना के साथ साथ हर वर्ग के धनी, एवं मध्यमवर्गीय नौकरी पेशा के लोगों के रहने वाले शहर की तरह किया गया था. आज सौ से भी ज़्यादा सेक्टरों में फैल गया है. यहाँ सरकार के हर विभाग के लोगों के सेक्टर है और बाक़ी आम लोगों के लिये अलग अलग छोटे बड़े आकार के घरवाले सेक्टर हैं. पहले ज़्यादा कोठियाँ बनती थी, अब बहुमंज़िली या गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ बनती हैं…बड़े बड़े मॉल बने, बाज़ार बने, अस्पताल बने, व्यवसायिक केन्द्र बने. इनके बीच बीच पुराने गाँवों को भी उनके गाय, भैंस, बकरी, आदि के साथ रहने दिया गया…पर इनमें इन घरों, अपार्टमेंट, दुकानों, अस्पतालों के निम्नतम काम करनेवाले मेड,मिस्त्री,गार्ड, आदि कई लाख लोगों के लिये कोई व्यवस्था नहीं की गई. वे सभी नोएडा के गाँवों में वहाँ के जमीन्दारों के बनाए झुग्गियों, दरबो की तरह के कमरों में मोटा भाड़ा दे रहते है…..नोयडा के फ़ैक्टरियों या मकानों के निर्माण में लगे मज़दूरों को तो अस्थायी झोपड़ियाँ ही नसीब होती हैं….देश के बुद्धि वर्ग के लोगों को, मीडिया को क्या इस समस्या के बारे में नहीं मालूम,या वे छोटे लोगों के बारे सोचना ही नहीं चाहते….अनुभव कहता है ऐसी कोरोना-१९ महामारी को ऐसी वस्तियों में रोकना नामुमकिन होगा.
अजीब देश का विकाश हुआ है और हो रहा है…क्या ऐसा ही चलता रहेगा? कोविद-१९ हो या कोविद-५० इनका कौन ख़्याल करेगा….

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