वेदों की वाणी गीता रामायण तक

यमुना जब सोती रहतीं हैं, कुछ अकेलापन तो लगता है, पर वह समय किताबों की दुनिया में घूमने का एक अच्छा अवसर होता है, कुछ सोचने का भी. गीता एक श्लोक अध्याय २ का ४७वां जो सबसे ज़्यादा उद्धृत होता है वह है:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
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Thy right is to work only, but never to it’s fruits; let the fruit of action be not thy motive, nor let thy attachment be in action.
।।।।

पर शायद यह कम लोग ही जानते होंगे कि वही बात यजुर्वेद में पहले कही हुई है –
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥

हमें निष्काम करते हुये सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिये
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Be concerned with actions only, never with its results,
Leave the results in the hands of the Supreme.
Let not the fruits of action be thy motive
Of the actions, or the crave of anxiety.
Perform actions free from attachments.
-Yajur Veda_40:2

शायद तुलसीदास के रामायण में भी हो, पर याद नहीं आ रहा है…वह अपने सुधी मित्रों को कहता हूँ पूरा कर दें. जिन सत्यों का निरोपण वेदों में किया गया, उसे उपनिषदों विस्तार दिया गया, फिर गीता में तो बहुत प्रभावशाली और जनप्रिय कर दिया गया. हमारी ऋषियों की ज्ञान की पहिचान करने की कोशिश अब विश्व के विद्वानों ने किया और करते जा रहे हैं….

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