भगवद्गीता:हिन्दूओं से एक आग्रह:जाति प्रथा को छोड़ें।

हम सब यह स्वीकार करते हैं कि हमारा धर्म हिन्दू है. हमारा धर्म एवं जीवन भारत के अति प्राचीन काल के मनीषियों द्वारा रचित वेद, उपनिषद्,महाभारत, भगवद् गीता, रामायण आदि धर्मग्रथों की शिक्षाओं पर आधारित है. उसी आधार पर मेरा यह समयानुकूल आग्रह है सभी प्रबुद्ध हिन्दू वर्ग से.अपने धर्म ग्रथों के आदेशों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें…पोंगा पंडितों के अज्ञान एवं स्वार्थी समाज-नेताओं के कारण जन्मी एवं फलीफूली जाति प्रथा का ख़ात्मा आज की राष्ट्रीय ज़रूरत है,समयानुकूल है एवं शास्त्र -सम्मत भी है. हमारे मनीषियों द्वारा प्रतिपादित और पूर्णत: वैज्ञानिक व्यक्ति के कर्म एवं स्वभाव पर आधारित चार वर्णों की वर्ण-व्यवस्था में माता पिता के वर्ण का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है गीता में, और साथ ही किसी वर्ण को दूसरे से नीचे या ऊपर का नहीं कहा गया है.

हम सब आज की ज़रूरत के अनुसार एक साथ ब्राह्मण बनें, क्षत्रिय बनें, वैश्य बनें एवं मिहनतकश सेवाप्रदान करने वाले मज़दूर बनें.एक दूसरे का सम्मान करें. आज घर में या बाहर परिवार-पालन के लिये किसी ज़िम्मेदारी को सफलता से निभाने एवं अपने कर्मक्षेत्र में समय के साथ पदोन्नति पाने के लिये हममें चारों वर्णों के गुणों के उचित मिश्रण की जरूरत है.

हमें अभ्यास,स्वाध्ययन एवं स्वनिर्माण से (ब्राह्मण का)शम, दम, तप, शौचम्, क्षान्ति, आर्जवम्,स्वाध्याय, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य; (क्षत्रिय का)शौर्य,तेज़,धृति, दाक्ष्य, युद्ध से अपलायन,दान, ईश्वरभाव; (वैश्य का)कृषि,गोपालन,वाणिज्य एवं (चतुर्थ वर्ण शूद्र का) परिचर्या गुण यथासम्भव हासिल करने की कोशिश करनी चाहिये.ब्राहम्ण स्वभाव के लोगों में सत्वगुण प्रधान,रजोगुण अल्प,तमोगुण न्यून होता है;क्षत्रिय स्वभाव में रजोगुण प्रधान,सत्त्वगुण अल्प एवं तमोगुण न्यून होता है;वैश्य स्वभाव में रजोगुण प्रधान,तमोगुण अल्प,सत्त्वगुण अल्प होता है;और शूद्र स्वभाव में तमोगुण प्रधान,रजोगुण अल्प,सत्त्वगुण अल्प होता है.अपने कार्यभार को सर्वोत्तम तरीक़े से सम्पादन के लिये आवश्यक गुणों को अभ्यास और तप द्वारा अपने में लाना पड़ता है. वह किसी जाति विशेष में पैदा होने कारण नहीं पाया जाता.सदियों से ऐसा ही होता रहा है. सब जाति के लोगों के लिये स्वाध्याय ज़रूरी है. अपने घर में सभी को परिचर्या एवं सफ़ाई अपने ही करनी पड़ती है जो पहले दूसरे कर देते थे, साथ ही वैश्य की तरह आर्थिक विषयों का ख़्याल रखना पड़ता है, ब्राह्मण बन बच्चों के पढ़ाई लिखाई पर भी ध्यान देना पड़ता है.

गीता दो अन्य गुणों के आधार पर व्यक्ति विशेष में अन्तर की बात विस्तार से करती है.एक व्यक्तियों को तदानुसार सात्त्विक, राजसिक और तामसिक प्रकृति का बताता है (गुणत्रयविभागयोग अध्याय १४,श्रद्धात्रयविभागयोग अध्याय १७,मोक्षसंन्यासयोग अध्याय १८); एवं दूसरा दैविक,आसुरी और राक्षसिक प्रवृति का (देवासुरसंपद्विभागयोग अध्याय १६). हम देश के सभी नागरिक को कम से कम इन अध्यायों की व्याख्याओं को एक बार अपने गृहस्थ जीवन की शुरूआत में ज़रूर पढ़ना चाहिये.

गीता में कृष्ण का आग्रह है कि व्यक्ति इन्द्रिय अनुशासन एवं संयमन द्वारा अपने आचरण एवं स्वभाव को धीरे धीरे अपने को तामसिक से राजसिक एवं फिर सात्त्विक बनाये. राक्षसी प्रवृतियाँ का पूर्ण त्याग एवं आसुरिक प्रवृतियाँ का परित्याग कर दैविक सम्पदा का मालिक बने एवं अच्छे नागरिक का कर्त्तव्य निभाये.यह वर्ण विभाजन सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है. अर्वाचीन भाषा में पुराने नामकरण को इस प्रकार बदलने की ज़रूरत है- १. रचनात्मक विचार करनेवाला चिन्तक, २.राजनीतिज्ञ,३.व्यापारी वर्ग, ४. श्रमिक वर्ग.

हमारे दो महत्वपूर्ण प्राचीन मान्यताएँ हैं-

१. सभी जीवों में एक ही आत्मा विराजमान है.आत्मा न पैदा होती है, न मरती है, वह केवल देह बदलती रहती है.अगर हम इसे मानते हैं तो हम एक दूसरे व्यक्ति को जन्म पर आधारित जाति, धर्म में कैसे बाँट सकते हैं.

सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि….६.२९….आत्मौपम्येन सर्वत्र समय पश्यति…६.३२ ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: अर्थात् जगत् में सारे जीव मेरे शाश्वत अंश हैं……८.७; अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:,मैं समस्तजीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूं १०.२०; यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन,न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्,मैं समस्त सृष्टि का जनक बीज हूँ,१०.३९; सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो, अर्थात् मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ, १५.१५; ईश्वर:सर्वभूतानामं हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति, अर्थात् परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं,१८.६१;

फिर हर व्यक्ति से अपेक्षा भी करते हैं, ‘सर्वभूतात्मभूतात्मा’.समस्त जीवों के प्रति दयालु, ५.७;…..छिन्न द्वैधा यतात्मान:सवभूतहिते रता: ५.२५ सुहृद सर्वभूतानां….५.२९ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति, अर्थात् जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है,६.३०;सम: सर्वेषु भूतेषू अर्थात् वह प्रत्येक जीव पर सम भाव रखता है,१८.५४;

२. हिन्दू धर्म पुनर्जन्म पर विश्वास करता है एवं उनका यह जन्म और अगला जन्म उनके अच्छे या बुरे कर्म पर आधारित है. फिर किसी के माता पिता पिछले जन्म में किस जाति के थे कैसे जानते हैं. कोई भी अच्छे या बुरे कर्मों के आधार पर श्रेष्ठतर या नीचे के जाति में पैदा हो सकता है.

अगर हम उपरोक्त मान्यता में विश्वास करते हैं तो फिर जाति के नाम पर वैमनस्य क्यों क्यों, हिंसक झगड़ा क्यों। जब सभी जीवों में आत्मा एक ही है तो हिंसा क्यों, जब हमें यह नहीं पता कि हम ख़ुद और हमारे पूर्वज किस जाति, धर्म के थे या अगले जन्मों मे किस जाति, धर्म के होंगे, तो फिर जातियों में वैमनस्य क्यों?

भगवद् गीता की वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी मान्य होनी चाहिये क्योंकि वह व्यक्ति के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा किए गए हैं. शास्त्रों के वर्णाश्रम की अवधारणा में प्रत्येक व्यक्ति शूद्र पैदा होता है और प्रयत्न और विकास से अन्य वर्ण अवस्थाओं में पहुंचता है। प्रत्येक व्यक्ति में चारों वर्ण के स्वाभाविक तीनों गुण-सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक- अलग अलग अनुपात में रहते हैं। इस व्यवस्था को ही ‘वर्णाश्रम धर्म’ कहते हैं।अर्थ है- वर्ण + आश्रम अर्थात, वह वर्ण (रंग, व्यक्तित्व) जो स्वभाव द्वारा अपने आप (आश्रम या बिना श्रम के) बन जाये।

सबसे पहले वेदों में प्रतीकात्मक रूप से पुरूष या परम सत्ता के शरीर से चारों प्राकृतिक वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है:”उनके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ था, उनकी दो भुजाओं से राजन्य(क्षत्रिय), उनकी दोनों जाँघों से वैश्य; उनके पैरों से शूद्र ।”

बृहदारण्यकोपनिषद के पहले अध्याय के चौथे ब्राह्मण में वर्णों के चार नामों एवं उनकी ब्रह्म से उत्पत्ति की बात कही गई है. पर भगवद् गीता में बहुत सरल तरीक़े से इनके अन्तर को बताया गया है -पहले ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:…..’४.१३ फिर १८वें अध्याय में अपने चारों वर्णों का नाम भी दे देते हैं-“ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥”वे चार वर्ण हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के तथा शूद्र और यह विभाजन कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा किए गए हैं ( माता पिता के वर्ण के अनुसार किसी व्यक्ति का वर्ण निर्धारित करने की व्यवस्था नहीं की है) १८.४१-४४.और अगले तीन श्लोकों में चारों के लक्षणों को अलग अलग बताया है।

श्री श्री परमहंस योगानन्द ने अपनी श्री मद्भगवद्गीता के अध्याय २ के ३१ श्लोक की व्याख्या करते हुये कहते हैं, “….प्रत्येक देश के पास उसके बौद्धिक और आध्यात्मिक लोग या ब्राह्मण , उसके योद्धा और शासक अथवा क्षत्रिय,उसके व्यवसायी या वैश्य और उसके श्रमिक या शूद्र होते हैं….सर्वप्रथम भारत के ऋषियों ने ही शरीर की शासन प्रणाली के तर्ज़ पर मनुष्य की प्राकृतिक योग्यता और कार्यों के अनुसार चार प्राकृतिक वर्णों की व्यवस्था पर बल दिया ….भारत में चार वर्ण मूल रूप से लोगों के जन्मजात गुणों और बाहरी कार्यों पर आधारित थे.समाज में सभी का समान सम्मान और आवश्यक स्थान था…..” बाद में, समाज के नेतृबृन्द ने स्वार्थ एवं अज्ञानता के कारण चार वर्ण असंख्य जातियों में परिवर्तित हो गये. “ ब्राह्मणों के अयोग्य बच्चे ज़रूरी आध्यात्मिक ज्ञान एवं शिक्षा के बिना ही मात्र जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने का दावा करने लगे.और इन्होंने अन्य वर्णों को नीचा बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा.शूद्रों को उनकी श्रेष्ठतर योग्यता होने पर भी, हीन कार्यों एवं दासता तक ही सीमित रखा गया.” जातियाँ की संख्याएँ बढ़ती गईं..एक दूसरे में विद्वेष का सिलसिला आरक्षण के बाद और बढ़ गया.

चिन्मय मिशन के स्वामी चिन्मयानन्द ने गीता के अध्याय १८ के ४०-४४ श्लोकों में वर्ण सम्वन्धी व्याख्या में ऐसा बिचार ब्सक्त किया है, जो सभी सुधी पाठकों को पढ़ना,समझना एवं मनन कर समाज की भ्रान्तियाँ को दूर करने में मदद करनी चाहिये और एक शान्तिमय प्यार, एक दूसरे के कार्यों के प्रति श्रद्धा के आधार पर समाज को आगे ले जाना चाहिये.

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