गीता एवं आत्मोत्थान

भगवद् गीता के बिभिन्न अध्यायों में अलग अलग प्रकार के ब्यक्तियों के गुणों को एक एक कर बताया गया है: स्थितप्रज्ञ, योगयुक्त भक्त,आत्मचेता,गुणातीत साधक, दैवी सम्पदा युक्त ब्यक्ति,सात्त्विक कर्त्ता.पर हर ब्यक्ति के स्वभाव, आचरण एवं कर्म का बिभाजन भी बहुत बिस्तार से तीन अध्यायों में समझाया गया है. हर जीव, विशेषकर मनुष्य में प्रकृति के तीन गुण- सात्त्विक, राजसिक, तामसिक- कम अधिक मात्रा में होते है जो आचरण एवं स्वभाव को निर्धारित करते हैं.हर ब्यक्ति अपने ध्यान, श्रद्धा,चेष्टा एवं अभ्यास से अपने इन तीनों गुणों की मात्रा में बृद्धि या ह्रास कर सकता है. ध्येय तो हरदम तामसिक, राजसिक स्वभाव या कर्म से सात्त्विकता की ओर बढ़ने का होना चाहिये, और फिर तीनों गुणों से ऊपर उठ गुणातीत बनने का.भगवद् गीता का अध्याय १४ ‘गुणत्रयविभाग योग’ इन तीन गुणों के बिभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालते हैं.

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ॥

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥5॥

लक्ष्यप्राप्ति के लिये श्रद्धा एवं ज्ञान दोनों महत्वपूर्ण हैं.किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने के पहले उस लक्ष्य के अस्तित्व एवं उसकी प्राप्ति के साधन का ज्ञान ज़रूरी है और वैसे ही उसमें विश्वास ज़रूरी है जो श्रद्धा द्वारा ही सम्भव है.अध्याय १७ ‘श्रद्धात्रयविभाग योग’ में पहले श्रद्धा के और फिर हर ब्यक्ति के कर्त्तव्य कर्म-यज्ञ, तप, एवं दान के सात्विक, राजसिक, तामसिक प्रकारों का निर्देश है. साथ ही ब्यक्ति के सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहार का भी बिवरण तीन श्लोकों में किया गया है. वहीं अध्याय १८ ‘मोक्षसन्यासयोग’में ज्ञान,कर्त्ता,कर्म,बुद्धि,धृति,सुख के भी सात्त्विक, राजसिक, तामसिक लक्षणों को बताया गया है.फिर वर्ण ब्यवस्था में निर्धारित चार वर्णों- ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र- के कर्म एवं स्वभाव पर आधारित बिभिन्न कर्मों का उल्लेख है, जो जन्म आधारित नहीं है.हर ब्यक्ति जैसे अपने स्वभाव और आचरण में सात्तविकता को बढ़ा आत्मोन्नति कर सकता है, वैसे शूद्र,वैश्य, क्षत्रिय,ब्राहम्ण अपनी शिक्षा,दक्षता,आचरण में परिवर्तन ला उसके अनुसार वर्ण का दावेदार हो सकता है.हां,अध्याय १६ ‘दैवासुरसंपद्विभागयोग’में सार्वकालिक मानवजाति का तीन विभागों में बर्गीकरण स्वभाविक आचारनुसार किया गया है- दैवी,अासुरी(पापी)एवं राक्षसी(सुधार के सर्वथा अयोग्य अधम),पर दैवी एवं अासुरी गुणों का ही वर्णन है.

द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।….इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला।

केवल तीन श्लोकों में दैवी गुणों को बताया गया है, जब शेष पूरा अध्याय असुरी गुणों और उन गुणों से सम्पन्न अासुरी प्रवृति वाले लोगों के अचारण, उसके परिणाम एवं उनके उद्धार के तरीक़े का वर्णन है.राक्षसी प्रवृति के लोगों के आचरणों को अज्ञात कारणों से छोड़ दिया गया है.आज से ३००० साल पहले भी समाज में आसुरी प्रवृति वाले लोगों की वैसी बहुतायत थी जैसा आज है.इन तीनों अध्याय का अध्ययन, मनन, एवं अात्मोन्नति के प्रयत्न आज भी हम सभी के लिये ज़रूरी है.कृपया हम अपने को समझें, और सुधारने की कोशिश करे स्वयंहित एवं समाज के कल्याणहित.आगे के लेखों में इन सब पर जानकारी देते रहने का प्रयास रहेगा.

प्रश्न हो तो सम्पर्क करें irsharma@gmail.com

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