भगवद् गीता – कुछ दृष्टिकोण

भगवद् गीता का समय आज से २०००-३००० साल पहले का है. पर बहुत प्रकरण एवं बिबेचन आज भी उतना ही सठीक है. हर ब्यक्ति के ब्यवहार में सत्त्व, रजस एवं तमस गुणों को अलग अलग अनुपात में हम देख सकते है. गीता के सत्तरहवें अध्याय में तीन अलग श्लोकों में सात्विक, राजसी एवं तामसिक आहार का बिबरण है. हम आज भी इसे सुखी स्वस्थ जीवन के लिये सोच विचार कर अपना सकते हैं.

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।……

आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥८॥

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।

आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌॥१०॥

भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है।

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले भोजन (जिसका सार शरीर में बहुत काल तक रहता है) तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं ॥8॥

कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं ॥9॥

जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट तथा अपवित्र भी है, तामस पुरुष को प्रिय होता है ॥10॥

Sattvic people enjoy food that is mild, tasty, substantial, agreeable, and nourishing, food that promotes health, strength, cheerfulness, and longevity.8

Rajasic people like food that is salty or bitter, hot, sour, or spicy-food that promotes pain,discomfort, and disease.9

Tamasic people like overcooked, stale, leftover, and impure food, food that has lost its taste and nutritional value. (Eknath Easwaran).

The above three divisions of food habits mentioned in Gita are for self consumption and realisation of every individual and not for finding faults or for rating the habits of others. Bhagwad Gita has nowhere a mention of word Hindu.So are not the advices in Gita universal and secular for everyone in the world? Similarly, Bhagwad Gita has emphasised on Ahinsa (nonviolence) in many slokas. While searching for food, I could not find the mention of non-vegetarian ones by name. Please appreciate the age of this dietary prescription. Will you comment?

भगवद् गीता में लोगों की प्रवृत्तियों, स्वभाव, चरित्र, कर्म के आधार पर दो तरह में श्रेणियाँ की हैं. अध्याय १६ (दैवासुरसंपद्विभाग योग)में दैवी, असुरी और राक्षसी बिभाग किये हैं. गुणानुसार बहुत विशद रूप में अध्याय १४, १७, १८ में सात्त्विक, राजसिक, तामसिक लोगों के आहार-ब्यवहार, ज्ञान, कर्म,तप, दान, आदि का वर्णन है. मैं बार बार सोचता हूँ- हमारे देश के पतन को रोकने के लिये हमारे नेताओं- राजनीति, ब्यवसाय, समाज- में इस विषय पर एक गहरे प्रशिक्षण की ज़रूरत है, जो स्कूल के दिनों में ही प्रारम्भ कर देना चाहिये.और मैं उदाहरण के लिये असुरी प्रकृति प्रवृति के लोग के लिये लिखे दो तीन श्लोक उद्धृत कर रहा हूँ, जो करीब ३००० साल पहले लिखी गई. वे विचार आज के समय भी उतने ही उपयुक्त हैं. ख़ैर, सामयिकता का निर्णय आप ख़ुद कर सकते हैं:

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।

ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्‌॥

भावार्थ : वे आशा की सैकड़ों फंदों से बँधे हुए काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं ॥12॥

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्‌।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्‌॥

भावार्थ : वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर इतना और बढ़ जाएगा ॥13॥

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥

भावार्थ : वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्य को भोगने वाला हूँ। मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान्‌ तथा सुखी हूँ ॥14॥

आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥

भावार्थ : मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त असुरलोग अपवित्र नरक में गिरते हैं, (नर्क वे यहीं बनाते हैं) ॥15-16॥

अगर किसीको इसकी बिस्तृत जानकारी हासिल करनी है तो स्वामी चिन्मयानन्द की गीता हिन्दी या अंग्रेज़ी में पढ़ सकता है. अगर किसी सज्जन को ज़िन्दगी में केवल एक किताब ही पढ़नी हो तब भी भगवद् गीता ज़रूरी पढ़नी चाहिये. यह धर्म पुस्तक नहीं है, बल्कि एक अच्छे एवं पूर्ण जीवन जीने की कला की सीख देता है.

हाँ, गीता का अासुरी (जो ‘सुर’ प्रवृति के नहीं हों)प्रवृति के लोगों का इतना बिस्तृत बिबरण देना यह ज़रूर संकेत करता है कि उन दिनों भी उनकी संख्या काफी बड़ी थी. समाज के लिये हानिकारक समझा होगा गीताकार ने. गीता उन्हें अपनी प्रवृति, स्वभाव एवं आदतों को सुधारने का प्रयत्न करने की संभावना पर ज़ोर देती है.दैवी सम्पदा के लोगों के गुणों की चर्चा तीन श्लोकों(श्लोक १,२,३)में है. आज की तरह उस समय में भी दैवी स्वभाव वाले लोगों की कमी थी…..

Advertisements
This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s