जब जब होहीं धरम के हानि

एक ६५ वर्ष का ब्यक्ति एक १ साल की बच्ची के साथ बलात्कार करता है और उसकी हत्या कर देता है.तुलसी का कलिकाल असल होता दिखता है:’कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥’ इसी तरह की ख़बर छपती है- पिता अपनी नाबालिग़ बेटी के बच्चे का बलात्कार द्वारा पिता बनता है. समाचार पत्र भरे हैं ऐसे बलात्कार एवं दरिंदगी के समाचारों से.छोटे बच्चों से बड़ों तक में ड्रग की, शराबखोरी की आदत समाजमें ज़हर फैलाती जा रही है. बच्चों का बड़े पैमाने पर अपहरण गिरते समाज का संकेत है.हर व्यक्ति या व्यवसायी केवल असद् मार्ग से अकूत कमाई करता है सामान्य नागरिकों या देश को धोखा दे. करोड़ों की सम्पति के मालिकों को भी देश के क़ानून के रास्ते हट धन एकत्रित करने में आनन्द आ रहा है.देश में बेईमानी की अरबों की कमाई कर लोग बिदेश भाग जाते हैं. कमजोरों को कष्ट देने की घटनाएँ आम होती जा रहीं हैं. शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी लोग येन केन प्रकारेण धन अर्जन में लग गये हैं. स्कूल, कालेज में पढ़ाई लिखाई ख़त्म हो चली है. रोज़ लगता है अब वह समय आ गया है, जब परमेश्वर को प्रकट होना पड़ता है धरती पर? आसपास घटित होती चीज़ों की जानकारियां,टी वी पर अनवरत चलते समाचारों एवं इंटरनेट पर उपलब्ध कहानियों से तो यह परमेश्वर का अवतरण आवश्यक और अभिनन्दनीय लगता है. क्या यह कलिकाल की पराकाष्ठा है? नहीं, तो क्या होता है पराकाष्ठा पहुँचने पर?

अवतरण की अवस्था की यह बात पहले गीता में कही गई हैं

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥”

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥

फिर तुलसीदासजी ने उसी बात को रामचरितमानस में इस तरह कहा –

“जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।

जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।”

जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते है । और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है॥

पता नहीं हमारे काल में कोई ऐसा युगपुरूष हो या नहीं, पर अगर ऐसा हो तो वह कैसा होगा, क्या, किस तरह बदलेगा सोच कर रोमांच हो आता है? वह स्वर्णिम युग देखनेवाले धन्य होंगे.

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