किसान कैसे करें अपनी सालाना आय दुगनी

कुछ प्रश्न है पहले. किसे किसान कहना चाहिये: १.क्या वह जो ज़मीन का मालिक है और अपनी ज़मीन का अपने खेती करता है अपने/श्रमिक लगा/मशीन- ट्रैक्टर, कमवाइन हार्वेस्टर, धान रोपने की मशीन या पुरानी तरह से हल आदि से? या २.क्या वह जो अपनी ज़मीन को दूसरे को खेती पर देता है सालाना रेंट पर पूरा ख़र्चा रेंट पर लेनेवाले का, और अपने कुछ नहीं करता या अन्य धंधे या नौकरी में लगा है?३.या क्या वे कुछ ज़मीन के मालिक जो दोनों तरीक़ों को ब्यवसायिक दृष्टि से लाभ हानि तौल कर ज़मीन का ब्यवहार करते हैं? ज़मीन रेंट पर ले खेती करनेवाले को ज़मीन की उत्पादकता या चलते भाव के अनुसार पहली ऊपज के मौसम के चालू होने के पहले ही एक बार में तय सालाना रेंट ज़मीन के मालिक को दे देनी पड़ती है. साल भर खेती पर हुये ख़र्चे को ख़ुद बहन करना पड़ता है और साल भर की आमदनी भी उसकी का होता है.उसमें अधिकांश पहली खेती की आमदनी अधिकांश रेंट में दे चुका होता है, पर बाक़ी सब उसकी आमदनी होती है. उसकी आमदनी फ़सलों के चुनाव,उत्तम बीज, खाद, सिंचाई,और मौसम पर निर्भर करता है.सिंचाई का प्राकृत वर्षा, या मनुष्य निर्मित ढंग से हो सकती है,पर तूफ़ान, बहूत ज्यादा सूखा, या अन्य आपदा तो दैव आधारित है, पर उससे निपटने का बहुत उपाय हो रहा है फ़सल वामा योजना द्वारा. मज़दूरी वे अपने परिवार के लोगों द्वारा कर मज़दूरी का ख़र्च बचा सकते हैं। मुझे मालूम नहीं की रेंट पर खेती करने वाले को बैंक क़र्ज़ा देते हैं या नहीं, क्योंकि उसके पास आधार नहीं होता पैसा देने का, जबकि ज़मीन मालिक ज़मीन के दस्तावेज़ का फ़ोटो कॉपी दिखा उसकी कोलैटर्ल पर क़र्ज ले सकता है. ज़मीन अपनी न होने रेंट और अन्य ख़र्चों को कम कर ही कुल आय लिया जाना चाहिये.उदाहरण- हमारे जाने में हमारे इलाक़े में एक बड़े बीघे का सालाना रेंट १२-१६ हज़ार है जो धान के फ़सल के दाम का आधा है, साल की उस ज़मीन से हुये बाक़ी फ़सलों का फ़ायदा रेंट पर लेनेवाले का होता है.नये क़ानूनों के डर से ज़मीन मालिक रेंट लेनेवाले को बदलते रहते हैं, अत: खेत के उत्पादकता को लम्बे अरसे तक बढ़ाने के लिये जरूरी चीज़ें रेंट पर ज़मीन लेनेवाले की प्राथमिकता नहीं होती , दूसरे के ज़मीन पर कोई पैसा क्यों लगाये? २०१८ के बजट में निम्न समर्थन मूल्य को बढ़ाने के साथ दो और बातें हैं जो किसान की आमदनी बढ़ा सकती है- १.बहुत बडी संख्या में लोकल मिनी मंडियों का निर्माण, जिससे किसानों को प्राइवेट ट्रेडरों को निम्न समर्थन मूल्य से कम पर बेंचना न पड़े.२.चूंकि क़रीब ८५% खेत मालिकों के पांच बीघा या एक हेक्टेयर से ज़मीन कम है, आम किसान धान, गेहूँ की फ़सल से सुख की ज़िन्दगी नहीं जी सकते. उन्हें या तो सब्ज़ी फल या अन्य ब्यवसायिक दृष्टि से फ़ायदेमन्द में जाना होगा या इस बार के बजट में सहभागिता कर ज़मीन बढ़ानी की बात कही गई है और इस संगठन को ब्यवसायिक कम्पनी की तरह ब्यवस्थित और संचालित करने की अपेक्षा होगी. आज भी बिहार के ९०% किसान निर्धारित निम्न मूल्य नहीं पाते.करीब हर क्विंटल पर १५०-२०० रूपये का घाटा उठाते हैं.पर बजट में प्रस्तावित किसान संगठन को कारगर बनाने में सफलता उस गाँव के किसानों की आपसी सौहाद्रता और सहयोग के साथ ईमानदार नेतृत्व पर भी निर्भर करता है. आज भी गाँवों में सभी सरकारी योजनाओं का लाभ सठीक ज़रूरतमन्द के पास नहीं पहुचंता.कुछ लोग माहिर हो गये हैं सरकारी सहायता को हड़प जाने में आम किसानों को बेवक़ूफ़ बना. वैसे मेरे इलाक़े के गाँवों की खेती से हर बीघे साधारणत:आज क़रीब ७०हज़ार से एक लाख की उपज होती है, अगर दो फ़सल- धान, गेहूँकी खेती हो तो, जैसा मेरे पैतृक गाँव में हो रहा है, राशि कम होगी. इसमें धान २० क्विंटल और गेहूँ १० क्विण्टल प्रति बीघे का अनुमान लिया गया है. पर अगर तीन फसल- धान, दलहन, पिपरमेंट लिया जाये तो रक़म ज़्यादा होगा, जैसा मेरी ससुराल में करते हैं. इसमें प्रति बीघा उपज धान की २० क्विंटल, गेहूँ की जगह दलहन की ४ क्विंटल, और पिपरमेंट का ४-५ लीटर. उत्पादकता एवं ख़र्च बीज, सिंचाई, फर्टिलाइजर, कीटनासक दवा, और फ़सल के प्रकार पर निर्भर है. हमारे मानदंड से किसान केवल साल में ३०- ४० दिन या इससे भी कम काम कर पाँच बीघे पर पचास हज़ार माह की उपज कर सकता है. और भी बहुत तरीक़ों से लागत कम एवं उत्पादन अधिक किया जा सकता है. खेती के लिये कुछ ट्रेनिंग एवं पढ़ने एवं प्रयोग की ज़रूरत है….पर सबसे ज़्यादा मन में विश्वास ज़्यादा होना मिहनत पर, मुफ़्त की ख़ैरात पर नहीं…..’खेती उत्तम, मध्यम दाम, निकृष्ट चाकरी भीख निदान’ ….किसान अपनी खेती से आमदनी दुगनी, तिगुनी या पांचगुनी कर सकता है अगर खेती में रूचि ले, जानकारी हासिल करे, उसे उपयोग में लाये…….और हुआ भी है पिछले सालों में. अब नई पीढ़ी ज्यादा पढ़ी और समझदार है तो उसका फ़ायदा उठाये, नये तकनीकी ज्ञानों का ब्यवहार करते हुये…….निम्नतम मूल्य में बृद्धि और क़र्ज़ माफ़ी कभी ख़ुशहाली नहीं लायेगी……दुनिया गमलों, मकान के छत एवं फ़ैक्टरियों की तरह बहुमंज़िली कृत्रिम खेतों पर खेती करने चली है, हम अभी भी राजनीतिज्ञों के बहकावे में आकर बग़ावत, तोड़फोड़ …..

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