बिचारों के जंगल में-४

25.8.2017
कैसे ये गुरू देश के करोड़ों पुरूषों महिलाओं को बेवक़ूफ़ बना अपने राजसुख का उपभोग करते हैं? जीवन के चार लक्ष्यों -धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में दो – काम और अर्थ का ख़ुद सम्पूर्ण फ़ायदा उठाते हैं और बेवक़ूफ़, अनजान चेलों को अपने को धर्म और मोक्ष का रास्ता बतलाने वाले बाबा या यहाँ तक कि भगवान बताते हैं. और बीच में एक पढ़ा चालाक सौदा करने वाले बिचौलियों का दल तैयार करते हैं जो सहज सीधे धर्म -बिश्वासी अपार लोगों को बरगला कर गुरू के लिये अर्थ एकत्रित करता है और शिष्यों में कुछ गुरू के काम वासना के शिकार हो जाते है. ऐसे ही बापू आसाराम की तरह के गुरू हैं डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमित राम रहीम हैं जिनके पंथ के अनुआई करोड़ों में हैं और सालाना आमदनी ६० करोड़ रूपये के करीब है – रोज़ करीब साढ़े सोलह लाख से ज्यादा पैसा आता है. कुछ साल पहले एक महिला शिष्या ने उन पर बलात्कार का इल्ज़ाम लगा मुकदमा की थी, उसका आज निर्णय आना है. लाखों में अनुयायी आ जमा हुये हैं और ये राम रहीम को किसी तरह भी जेल नहीं जाने देंगे. यह ठान लिये हैं, ख़बर है बहुत मात्रा में अस्त्र शस्त्र भी जमा है. पिछले कुछ दिनों से पंजाब, हरियाना का सब काम ठप्प है, दोनों राज्यों की पुलिस तैनात है, सड़क और रेल परिवहन बन्द है, सेना का भी इंतज़ाम कर लिया गया है. स्कूल कालेज बंद हैं. कब तक देश को ऐसे बाबा छलते रहेंगे. नुकशान निम्न वर्ग का ही होता है सभी तरह से. पर यह भी तो प्रजातंत्र का अधिकार है, कैसे कोई कड़ा क़दम उड़ायेगा कोई, भोट के माध्यम भी यही गुरू हैं…. http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/here-are-some-unknown-facts-about-dera-chief-ram-rahim-singh/living-in-style/slideshow/60208019.cms

रविवार , अगस्त २०
पिछले दिनों में मीडिया में आया वह समाचार दिल को कहीं भीतर से हिला गया. “तीन महीने बाद बेटा विदेश से लौटता है , अपने माँ का मुम्बई के पॉश एपार्टमेंट का दरवाज़ा खटखटाता है, फिर तोडवाता है , भीतर सोफ़े पर माँ का कंकाल दिखता है….,यह कविता उसी घटना से लिया संदेश एवं सुझाव रूप है ऐसी परिस्थितियों में रहनेवाले लोगों के लिये……….आप अपनी राय ज़रूर दें…..
अपने की क्या परिभाषा हो
जीवन की आपाधापी में 

जाने कैसे यह साँझ हुई

जब बचे अकेले हम दोनों

और समय काटने के प्रयास 

विफल होते

तो एक प्रश्न करता शंकित 
‘अपने की क्या परिभाषा हो?’

जो अपने थे वे दूर गये

कुछ पास रहे फिर दूर हुये

अपनी अपनी मजबूरी है

तब

जो पास रहे वे अपने है

जो दूर गये वे सपने है

फिर आज कौन जो अपने हैं-
जब शंका से मन घबराया 

कोई आया , मिटा शंका,  

फिर बता गया 

वह सही राह .
जब गिरे कभी, एक हाथ बढ़ा ,

हमको थांभा, और खड़ा किया;
चिन्तित चेहरे को भाँप अगर 

आगे आया, मन बहलाया

वह क्यों न हमारा अपना है
क्या केवल अपने को लेकर
बाक़ी जीवन रो सकते हैं

जो मिले समय के आने पर

स्वेच्छा से आगे बढ़ आये

बिन झिझके उसको अपनाये

अपना वह ही हो सकता है .
सोमवार ,जुलाई ३१ 

नागेन्द्र जी का गृह प्रवेश. हमें चिम्पु ले गया पानी पड़ रहा था सबेरे से. शुभ माना जाता है किसी पवित्र समारोह के पहले. बहुत दिनों के बाद काफ़ी लोगों से मिलने का अवसर और बिधि को समझने का मौक़ा मिला. आधुनिक रहन सहन के माहौल एवं मजबूरियों के अनुसार कर्मकांडों में काफ़ी बदलाव आया है . निकट भविष्य में और आयेगा. श्रद्धा बनी रही तो अनुष्ठान पुराने पर्व, त्योहार मनाये जाते रहेंगे. कुछ कारण या मजबूरी वस मैं कोई गृह प्रवेश समारोह नहीं कर पाया, जब कि बहुत मौक़े थे. नागेन्द्र जी के घर ब्यवस्थित ढंग से हवन करवाया पंडितजी ने ..इन्द्र, अग्नि एवं स्वाहा की बातें समझाई. एक साथ आज का भारत एक साथ पूर्व वैदिक काल के साथ आधुनिकत्तम समय में रहता है. मुझे यह सब देख सुन बहुत कुछ प्रश्न भी उठते है पर बहुत अच्छा लगता है. अल्पना, अन्विता ग्रेटर नोयडा से आईं. अगस्त १ को भी जाते जाते मिलने आईं….. बृहस्पतिवार, जुलाई २०, २०१७ 

शाम को बहू अल्पना एवं पोती अन्विता आ गये और शनिवार तक रहे. हर क्षण लगा था ज़िन्दगी का मधुरतम, अन्विता की हर बातें इतनी प्यारी लगी कि लगता सुनता रहूँ . काफ़ी सालों बाद आये हैं, अब तो दो साल में कालेज चली जायेगी और ब्यस्त हो जायेगी, बडी हो जायेगी, आज की मासूमियत, निश्छलता पता नहीं किस तरह बदलेगी, अच्छा होता ऐसे ही रहती, हम जबतक होगा कम से कम फ़ेसटाइम पर देख पायेगें कुछ साल कम से कम. अन्विता को कटे आम के साथ मीठी दही पसन्द आ रही थी. अल्पना को मिष्टी दई के साथ चिउरा नाश्ते में पसन्द था. समय उड़ गया…बीच में दोनों आती जाती रहीं, पर महशूश होता रहा क़ि वे यहीं पास हीं हैं….निर्मल जी की पत्नी, बेटी और पोती से भी मिल ली….

8.8.2017
क्या बदलेगा नोयडा? हमारे नोयडा के सबसे पुराने मित्र हैं अरोरा जी, अधिकांश वे कभी कभी फ़ोन पर ही बात कर बाँट लेते हैं अपना ख़ुशी ग़म. कभी मैं अपना अनुभव सुना देता हूँ कभी वे , पर वे हरदम सरकार सरकार पक्ष में बातें करते हैं, मैं बिरोध में. कुछ दिन पहले उन्होंने इस घटना की कहानी सुनाई, जो नोयडा के पुलिस विभाग में किसी सुधार को नई सरकार आने की बात को नकारते हैं: कल सबेरे सबेरे उनके मकान के पास का कपड़ों पर आयरन करनेवाला (धोबी)उनकी घंटी बजाया. वे बाहर आये तो बताया , स्थानीय थाने से एक पुलिस कांस्टेबल आया और कहा अपना स्मार्ट फ़ोन दिखा. मैंने उसे दो दिन पहले किसी से ख़रीदा था. पुलिस स्टेशन ले गया और फिर धमका कर पूछा, किसके पास से ख़रीदा है, चल दिखा उसे. वह उस आदमी के यहाँ ले गया, पर फ़ोन रख लिया. कांस्टेबल ने, कहा अब तू जा, कल थाने आ ले जाना. आज जब उसके पास जा कहा मेरा फ़ोन तो दे दीजिये. वह पुलिस कांस्टेबल कहता है मैं इतना कुछ किया हूँ २००० रूपये ला ,फ़ोन ले जा….धोबी उसके पास वापस जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है…आप क्या कहेंगे इस घटना के बारे में…..अब याद आया मेघदूतम् पार्क के कोने के पुलिस मैन, हर के पास एक स्मार्ट फ़ोन देखा हूँ, मेरे पूछने पर बताये वह सब उनका ब्यक्तिगत है, सरकार नहीं देती…..मैंने फ़ेसबुक पर भी इसका ज़िक्र किया था…..पर अरोरा जी की कहानी सुन संदेह हो गया है उनकी बातों पर…शायद पुलिसवालों के अधिकांश स्मार्ट फ़ोन कहीं न कहीं से ऐसे ही आये होंगे……..अच्छा होता कि मैं शत प्रतिशत ग़लत होता …..क्या फ़र्क़ पड़ता है आम आदमी को सरकार के बदलने से…कैसे सुधरेगी क़ानून और ब्यवस्था ……

७.८.२०१७ 
इस बार भी केशव की तरह ही अल्पना एवं अन्विता के आने के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं थी. अपर्ना और रवि जी के साथ मिल यह साज़िश की गई थी, क्योंकि डा. सिन्हा को भी मेरी तरह ही छकाया गया था. यह उसकी अनोखी योजना होती है और हम हर बार आश्चर्यचकित हो जाते हैं. हमें वे अपने असली हालत में देख लेते हैं. पर इस बार पहले दिन जब वे हमारे यहाँ आये , घंटी बजाते रहे, हम दोपहर की नींद में बातानूकुलन यंत्र के कारण बन्द अपने कमरे में सोते रहे . उन्हें आख़िरकार वापस लौटना पड़ा यह सोचते हुये कि हम शायद हरिद्वार में हैं . तीसरे दिन जुलाई १८, श्री सिरोही जी सबेरे ही फ़ोन करके बताये वे सपत्नीक शाम को आयेंगे, आये भी पाँच बजे बहुत महीनों बाद …….थोड़ी देर बाद अरोरा दम्पति भी आ गये….मैं उनकी ख़ातिरदारी में ब्यस्त हो गया……..और फिर घंटी बजी दरवाज़ा खोला और आश्चकित हो गया ख़ुशी में झूम उठा….अल्पना, अन्विता, अपर्ना, डा. सिन्हा सामने खडे थे , भीतर लाये, आये, एक अनोखे ख़ुशी का माहौल छा गया, जिसकी हरदम प्रतीक्षा रहती है…..पर ख़ुशी थोड़ी रही, वे बृहस्पतिवार को हमारे यहाँ आयेंगे साथ रहने….

…,….

सबेरे आम्रपाली इडेन पार्क एपार्टमेंट के एक्ज़िट गेट से निकलते ही दो कुत्ते हमारी तरफ़ बढ़े , गार्ड के डाँटने पर पीछे चले गये, मैं निकल गया, फिर क्या सोच खड़ा हो गया , कुत्ते फिर गेट पर थे किसी के इंतज़ार में. कोई उन्हें सबेरे सबेरे भोजन खिला पुण्य अर्जन करते हैं. आज सबेरे घूमते समय जिन लोगों ने कुतिया के काटने की ख़बर सुनी थी मुझसे अफ़सोस जाहिर किये. दोनों मेरे जानकार सज्जन जो कुत्तों को रोज़ पार्क में भोजन देते हैं वे भी आये और मुझे ऑथरिटी में किसी से कहकर इन पार्क के कुत्तों को किसी तरह हटवाने की ब्यवस्था कराने का आग्रह किया , आश्चर्य हुआ. दोनों मुझसे जवान हैं और नोयडा के काफ़ी प्रभावशाली लोगों में नोयडा ऑथरिटी के सर्व्वोच्च अफ़सरों और यहाँ के सांसद आदि से जान पहचान रखते हैं. मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा. पार्क से बाहर आते मेन गेट पर ही दो कुत्तों को लड़ते देखा, गार्ड से पूछने पर उसका कहना था, ‘जब आप लोग खाना खिलाता है तो मैं कैसे रोक सकता हूँ’. आगे बढ़ा तो पुलिस की भैन खड़ी थी, कुछ को उनमें मैं जानता था, अत: पूछा, “क्या इन रोड पर घूमते देशी कुत्तों को आप या मैं गोली मार सकते हैं?’ जवाब मिला, “सर नहीं, आप लात से भी नहीं मार सकते.” क़ानून यह है क्यों? क्या हमारा जीव प्रेम इतना दृढ़ है कि नागरिकों के तकलीफ़ों का भी ख़्याल नहीं रखता. बात कुछ आगे बढ़ी क्योंकि मैं अन्तर्निहित रूप से दुखी था, शहर के बहुमंज़िली इमारतों के एपार्टमेंट में रहनेवालों को इन देशी कुत्तों का क्या काम? पर पाप करनेवालों को कुछ सस्ता सहज पुण्य कर्म तो करने पड़ते हीं हैं पाप से मुक्ति के लिये. कुछ और जानकारी यह मिली की केरल के कुछ शहरों में दो साल पहले कुत्तों का आतंक फैला, कुछ युवक संगठित हो उनका सफ़ाया करने लगे, पीड़ितों ने उनका समर्थन किया, पर फिर सेवा केन्द्र मीडिया की सहायता से सामने आ गये, भोट की ज़रूरतमंद सरकार को राहत मिली. सुप्रीम कोर्ट कुत्तों पर नागरिकों के उत्पीड़न को ग़ैरक़ानूनी क़रार दी. अब तो शायद वैसा करने पर श्वान रक्षक दल उठ खडे हों. एक पुराने अनुमान के अनुसार भारत में ३ करोड़ सड़क छाप कुत्ते हैं . २०१२ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार हर साल २०,००० कुत्ते काटने की बारदातें भारत के हास्पिटलों में आतीं हैं. २००५ में करीब १२,७०० मृत्यु का कारण कुत्ते का काटना था. सरकार के सामने दो –तीन सुझाव है और उपाय है नागरिकों को विशेषकर हमारी तरह के बुद्धों को बचाने का. १. कुत्तों को बुचडखाने लेजाने और उनके लज़ीज़ माँस का निर्यात करने का ठेका दे. २. सभी कुत्तों का परिवार बढ़ाने की क्षमता ख़त्म कर दे या फिर हर कुत्ते के बच्चे का क़ानूनीतौर पर इम्यूनाइजेसन किया जाये जैसे पालतू कुत्तों के मालिक करते हैं. (मोदी जी या अमिताभ बच्चन की तरह का कोई पक्षधर हर चैनलों पर लोगों से उनके टीकाकरण का अपील करे) ३. सरकार हर कुत्ते के काटनेवालों को उनके मानशिक संताप के एवज़ में दस लाख भरपाई करे. मृत्यु होने पर यह राशि एक करोड़ होनी चाहिये. इति कुत्ता प्रकरण ….अच्छा होगा आप में से जिसकी नोयडा ऑथरिटी में कुछ पैठ हो तो नागरिकों की मदद करें और मेरी तरह किसी कुत्ते से कटवाने की प्रतीक्षा न करें…..खैर, विदेश में रहते बच्चों के सुझाव पर मैं तो अब एक मज़बूत छड़ी ले कर चलने लगा हूँ…..

1.8.2017 
आपको कभी कुत्ता काटा है…..मुझे भी नहीं काटा था जुलाई ३० के पहले….बहुत पहले सुना था क्यों यह ख़तरनाक है….इलाज के लिये बड़े बड़े अत्यन्त कष्टदायक इंजेक्शन लेने पड़ते हैं बहुत दिनों तक ……और नहीं लेने पर ब्यक्ति की मृत्यु होती है भयानक तरीके से कुत्ते की तरह भूंकते भूंकते……

अल्पना , अन्विता शाम को चली गईं थी…काफ़ी दिनों से घूमना बन्द प्राय: था.इच्छा हुई घूम आया जाये मन बहल जायेगा, यमुना ने भी हांमी भर दी….मैं मेघदूतम् पार्क के लिये निकल लिया. अभी नये बनते सामुदायिक केन्द्र के पास पहुँचा था कि पीछे से एक कुतिया चुपचाप आई , मुझे पता भी नहीं चला और मेरे दांये पैर को मुँह से पकड़ ली ज़ोर से, सोचा पैंट मोटे कपड़े का है कुछ नहीं हुआ होगा. दस क़दम आगे जा पैंट उठा देखा, कुतिया के दाँत के गड़ने से ख़ून निकल गया है. चिन्ता हुई, पास ही खड़े गार्ड ने बताया, ‘लाल मिर्ची पिस कर लगा दीजिये…’मुझे उस पर ग़ुस्सा था, वह कुतिया को मेरे पीछे आते देखा तो बताया क्यों नहीं. पार्क गया दोस्तों की सलाह लेने. दो भुक्तभोगियों ने बताया डाक्टर की सलाह लेने के लिये. एक, दो या तीन इन्जेक्शन लेने होंगे. दो मित्र डाक्टरों को फ़ोन किया. डा. गोयल ने बताया – पाँच इंजेक्शन लगेंगे, पहले तो सरकारी हास्पिटल में ही लगते थे, अब किसी हास्पिटल में लग जाते हैं. मैं Neon यहीं सेक्टर ५० चला गया एमरजेंसी में , डाक्टर ने देख टेटनस और ‘रेबीपुर’ की एक एक इंजेक्शन लगा दी बाक़ी चार का सेडेयूल बना दिया. रजत भी आ गया था , मैं निश्चिंत हो घर वापस आ गया.देशी कुत्तों की संख्या साल में पता नहीं कितनी बढ़ जाती है हमारी जनसंख्या के अनुपात में. हमारे सेक्टर ५० के F ब्लॉक में मेघदूतम् पार्क मे पचास के करीब तो ज़रूर होंगे और साल में कई गुना बढ़ जाते हैं, पर नियंत्रण को लोग तैयार नहीं, न निर्मूलन के लिये नोयडा ऑथरिटी. करोड़ों के एपार्टमेंट में रहनेवाले लोग इन देशी कुत्तों को जिलाये रोज़ सबेरे अामरपाली इडेन पार्क और मेघदूतम् पार्क के किनारे रोटियों को तोड़ तोड़ किनारे फैला देते हैं, पार्क के भीतर भी दस कुत्ते होंगे, कुछ बड़े ओहदों से रिटायर हुये लोग, एक पति-पत्नी उन्हें हर रोज़ खिलाते हैं . शायद वह जीव सेवा का कार्य जो स्वर्ग देगा या पापों से निवृत्ति . मैंने मना करने की जब कोशिश की तो दबावों से हैरान हो गया. गाँव की तरह ये कुत्ते न तो चोरों से रखवाली करने वाले हैं घर की , न कोई और भलाई. नोयडा की तरह जगह में तो बहुत सेवाकार्य है. एक उसमें हैं गाँवों के या ग़रीब तबके के बच्चों की शिक्षा. पर इन्हीं कुत्ता पोषकों में किसी को वे काट दें, तो उसे जान से मार देने से भी बाज़ नहीं आयेंगे. मेरा नोयडा ऑथरिटी के सर्वोच्च अधिकारियों से निवेदन है कि वे नोयडा को वे देशी कुत्तों से यथा शीघ्र मुक्त कराये जैसे, केरल सरकार ने कराया. आज सबेरे मैंने जितने दोस्तों से बात किया वे यह ब्यथा भोग चुके हैं. हर दूकान पर इसके उपचार वाले इंजेक्शन का मिल जाना दूसरा प्रमाण है कुत्ते के काटने की घटना का आम बात होना. किसी निर्यात एजेंसी को इसका चीन या उत्तर पूरब के अंचल में भेजने का ठेका भी अच्छा रहेगा…..आकिरकार जीव जीवस्य भोजनम्…..क्या इन देशी कुत्तों के ज़हरीले दाँतों से मुक्त करने का उपाय हो सकता है. यह मैं मेनका गांधी का ध्यान रख कह रहा हूँ……….

गौरक्षकों से मेरा नम्र निवेदन है कि गौ रक्षा के साथ हम वृद्धों का लावारिस सड़क एवं गली के कुत्तों से भी रक्षा करने की सोचो. एक नया संघटन बनाओ….और इन सबको निर्यात कर चीन या जहाँ ये भक्ष्य है , कुछ देश का आर्थिक लाभ भी करो…..अगर ग़लत लगे तो माफ़ करना . आजकल ७८ की उम्र में पाँच सुइयाँ ले रहा हूँ..,
३१.७.२०१७: बिरोध औंर प्रश्न न कर हम पॉज़िटिव सुझाव से भी बदलाव ला सकते हैं. यह क्यों हैं कि कुछ लोग केवल नेगिटिव बातें ही करतें रहते है. उसी शक्ति को अद्भुत प्रिय सुझावों में बदल कर पहल की जा सकती है….प्रभात पाण्डे जी प्रश्न तो प्रश्न होता है ….. यह अगले की सोच पर निर्भर करता है कि प्रश्न सकारात्मक है या नहीं. दोनों पक्ष जब मानसिक रूप से सुनने-सुनाने के समान स्तर पर हों तभी सुझाव सुझाव का रूप लेते हैं वरना उन्हें आलोचना का चोंगा पहनाकर दरकिनार कर दिया जाता है या मार दिया जाता है….कोशिश तो किया जाये..देखा तो जाये सुझाव, जनता तक तो पहुँचें। निस्पृह काम तो किया जाये…

सभी बिहार के उन लोगों से जो बिहार के बाहर रहते हैं , सक्षम हैं और गाँव के हैं उनसे एक अनुरोध है : वे अपने परिवार, और गाँव के लोगों मे जाति प्रथा के अवगुणों को समझाने का प्रयत्न करें. हाँ उस गाँव की आत्म कथा लिखें और गाँव में एक पुस्तकालय बनाने और चलाने का इंतज़ाम ज़रूर करें.. खेतिहरों से आधुनिक खेती ब्यवसायिक ढंग से करने में सहायक बनें.. जब भी अमरीका गया हूँ यही बात मैं वहाँ के हर भारतीय को कहता हूँ. अगर देश का क़र्ज़ उतारना है या दूर रहते इससे प्यार होने का इज़हार करते हैं तो मेरे ख़्याल से इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. बाक़ी अपने आप हो जायेगा. 

1.8.2018

जय किसान: भारत के किसानों, किसानों के नेताओं और राजनेताओं से कुछ सवाल ह और उनके लिये कुछ सुझाव है. क़र्ज़ की मुआफी, या किसानों की आत्महत्यायें देश के सम्मान्न की बात नहीं है, न समस्या का मूल समाधान. किसी वर्ग का अपनी क़र्ज़ की मुआफ़ी या न्यूनतम समर्थन मूल्य की तर्कहीन बृद्धि या इसी तरह की अन्य टैक्स कम करने के लिये माँग को मनवाने का तरीक़ा हड़ताल, रास्ता रोको, या सरकारी सम्पति को जलाने की तरह का बिरोध देश के हित में नहीं है. इन हिंसात्मक और नकारात्मक तरीके को छोड़ क्या कोई सकारात्मक सुझाव और उसके क्रियान्वयन का रास्ता ज्यादा स्थायी हल नहीं होगा समस्या के उचित समाधान का. यहाँ मैं केवल किसानों के हाल में हुए बिरोध के बारे में अपना मत दूँगा जो क़र्ज़ माफ़ी को लेकर हुआ. 

पहले हमें यह तय करना है कि किसान कौन है ज़मीन का पुश्तैनी मालिक जो खेती ख़ुद करता है सब ख़र्च कर या वह जो ज़मीन को एक भाड़े के समझौता के तहत ले उसपर खेती करता है. कौन खेती पर ख़र्च करता है और कौन केवल पूर्व निश्चित धनराशि पहले ही ले लेता है या अपना तय हिस्सा फ़सल तैयार हो जाने के बाद जैसे फ़सल का १/२-२/३ पूरा ख़र्च बहन करते हुये. अधिकांशत: क़र्ज़ कम जमीनवाले छोटे किसान लेते हैं या वे किसान जो बैंक से क़र्ज़ ले जो बहुत कम सूद पर मिलता है उसका अन्य लाभदायक मदों में ख़र्च करते हैं , 

क्या राज्य सरकारें पूरी ज़मीनों के मालिकाने को डिजिटाइज कर किसी वेब साइट पर डाल चुकी हैं? क्या बिना मालिकाने के कोई बैंक असल में खेती करनेवाले को क़र्ज़ देते हैं? अब समय आ चुका है यह सब प्रक्रिया लिखित रूप में हो? फ़ायदा उसी को मिले क़र्ज़ मुआफ़ी जो इसका हक़दार है,अन्यथा किसी दिन यह समस्या भयंकर न्यायपूर्ण संघर्ष का रूप ले सकती है. 

दूसरा अहसास यह होना चाहिये ज़मीन पर खेती करनेवाले को कि कृषि भी एक वैज्ञानिक ब्यवसाय है. इसमें फ़सल का चुनाव, मज़दूरी, बीज, खाद, सिंचाई, मशीन या उसके भाड़े पर जो ख़र्च होता है, वह अनुमानित आय से हरदम कम होना चाहिये. खेती के ब्यवसाय में लागत कम करने और उपज बृद्धि करने के हर उपाय खोजना और ब्यवहार करना चाहिये. अभी भी अपने देश के हर फ़सल की गुणवत्ता और उत्पादन अन्य खेतिहर देशों की तुलना में बहुत कम है. 

हर अच्छे किसान खेती और उसमें ब्यवहार किये जाने वाले विज्ञान की आवश्यक जानकारी होनी चाहिये और उसे उपलब्ध कराई जानी चाहिये , उसी तरह से उसके ब्यवसायिक पक्ष का भी. अभी अधिकांश खेती देखी-दिखाई या सुनी-सुनाई ज्ञान से हो रही है. मोदी ने खेत की मीट्टी के जाँच और कार्ड बनाने की बात कही है, जागरूक किसानों ने नई पद्धतियाँ ब्यवहार कर उत्पादकता बढ़ाई है, पर उनकी संख्या नगण्य है. गाँव के स्कूल के बच्चों को कृषि की प्राइमरी शिक्षा का प्रावधान ज़रूरी है. बहुत राज्यों में ज़मीन के सठीक ब्यवहार से खेतिहरों में समृद्धि भी आई है, पर अधिकांश राज्यों में, विशेषकर पूर्व के राज्यों में, खेती का मतलब केवल धान और गेहूँ ही समझा जाता है. दलहन, तेलहन, सब्जी, फल, फूल, दूध का ब्यवसायिक स्तर पर उत्पादन बहुत कम या केवल कुछ सीमित क्षेत्रों में ही होता है . यहाँ तक की गन्ने की खेती भी मिलों के बन्द होने से ख़त्म हो गई है.  

बचपन में देखा करता था धान कटते ही बेंचा नहीं जाता था, चावल बना कर बेंचा जाता था, घरों की महिलाऐं और बाहर से मज़दूरी पर औरतें करती थीं यह काम, दाम अच्छा मिलता था. बची हुई चीज़ों का भी अन्य कामों में इस्तेमाल हो जाता था. गन्ने की खेती करने वाले गुड , भूर्रा या राब बना रखते थे और जब अच्छा दाम मिलता था बेंचते थे, दालों के साथ या तेलहन में भी वही किया जाता था. किसान या उनके नेता ब्यवसायियों के हाथों से मुनाफ़ा छीन अपने क्यों दूकानदार नहीं बन सकते हैं और मुनाफ़ा का ज्यादा हिस्सा ले सकते हैं. सरकारी या ग़ैर सरकारी कम्पनियाँ गाँव के किसानों के घर में कम लागत की फ़ूड प्रोसेसिंग के यंत्र लगवा किसानों के परिवार की आमदनी बढ़ाने में सहायता कर सकतीं हैं. किसानों को ख़ुद अपनी आमदनी बढ़ाने की सोच पैदा करनी होगी. सरकार को भी इन विषयों पर सोचना होगा जो ज़रूरी है किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिये. पिछले दो मानसून अच्छे रहे. पर मौसम का क्या भरोसा . सिंचाई ब्यवस्था तो बराबर तेज़ी से बढती रहनी चाहिये. पता नहीं सरकार द्वारा घोषित उन लाखों की संख्या में तालाबों के निर्माण का काम कहाँ तक आगे बढ़ा? अच्छी मानसून के पानी को इकट्ठा करने के सभी पुराने संसाधन- तालाब, पोखर, अहरा किसानों ने भर खेती की ज़मीन बना दी. अब नये सिरे से ज़मीन के १/१० वें हिस्से में तालाब बनाने की पानी संग्रह की नई योजना है यह. कृषि ब्यवसाय चुननेवाले किसानवर्ग और उनके नेताओं को शिक्षित और समझदार होने की ज़रूरत है. सरकार को भी बहुत कुछ करना है जिससे सप्लाई चेन के बीच वाले ब्यवसायी और दलाल किसानों को ठेंगा दिखा उनके परिश्रम का बडा हिस्सा ख़ुद न हड़पते रहें. कोल्ड स्टोरेज, भंडारण, हर पंचायत में एक बाज़ार , शहरों में किसान बाज़ार, आदि बहुत ब्यवस्थाओं को बढ़ावा देना होगा. उदाहरणत: राजनीतिक पार्टियाँ सबको लैपटॉप न बाँट सब छोटे किसानों के खेतों में सोलर पम्प लगवा देतीं तो किसान ख़ुद ही अपने बच्चों को लैपटॉप ख़रीद देता. किसान नेताओं और राजनीतिज्ञों को इनको बख़्श देना चाहिये स्वार्थ भरे चालों से. 

पर गाँव के समाजिक जीवन और सोच में भी बदलाव की ज़रूरत है……मर्द औरत सबको काम करना होगा परिवार को सम्पन्न बनाने के लिये, ग़लत आदतों को छोड़ना होगा….बच्चों की अच्छी शिक्षा एक मात्र वैसी चीज़ है जिसकी माँग में हर तरह के आन्दोलन ज़रूरी है…नहीं तो नेता गाँवों को पीछे रख कर बरबाद कर देंगे…..हाँ एक बात और – देश के हर परिवार में खेती की ज़मीनें पीढ़ी दरपीढी कम होती जा रही है, अब तो यह बन्द होनी चाहिये.घर के जो सदस्य बाहर चले जातें हैं और बस जाते हैं उन्हें अपनी ज़मीन को उस सदस्य को जो खेती में रहता, सहर्ष दे देना सहज शर्तों पर. इस या किसी अन्य उपायों से हर कृषक के पास ज्यादा ज़मीन एक जगह हो की ब्यवस्था करनी चाहिये, बहुत उपाय हो सकते हैं कृषि को लाभदायक, सम्माजनक पेशा बनाने के लिये. ..जो सरकारी अनुदान पर आश्रित न हो…..कृषक आगे बढ़ो, पूरी दुनिया की भूख को तुम्हें ही मिटाना है……भारत के किसान कर सकते हैं…,,

२६.७.२०१७
कल कॉफ़ी टेबल आ गया था अमाजॉन से पर एसेम्बल अपने करना होगा पैकेट का वज़न और साइज़ देख ही समझ आ गया. पर जो आगे हुआ वह मेरी हीं ग़लती कारण मुझे बुरी तरह ज़ख़्मी कर गया…..ज़रा सी ग़लती और इतना कष्ट…..ग़लती ग़लती होती है छोटी बडी नहीं…..

जयदेव के ‘गीत गोबिन्द’ का एक श्लोक जिसके पाठ से विष्णु के सभी अवतारों की बन्दना की जा सकती है….गुग्गल की कृपा से चौबेजी की प्रेरणा और मेरे अल्पभिज्ञ के प्रयास से यहाँ है, जिसका जो चाहे उपयोग कर सकता है: 

वेदानुद्धरते जगन्निवहते भूगोलमुद्बिभ्रते

दैत्यम् दारयते बलिम् छलयते क्षत्रक्षयम् कुर्‌वते।

पौलस्त्यम् जयते हलम् कलयते कारुण्यमातन्वते

म्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यम् नमः॥ १-५

As a reviver of Veda s as a fish, bearer of this earth as tortoise, uplifter and supporter of earth as wild boar, slasher of Hiranyakashyapa as lion man, deluder of Bali as dwarf boy, annihilator of Kshatriya s as Parashu Rama, conqueror of Ravana, the legatee of Paulastya, as Rama, wielder of plough as bala raama, fosterer of non violence as Buddha, mangler of fractious races as Kalki, you alone can put on ten semblances, thus oh, Krishna, my reverences are unto you… [1-5]

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