कुछ यादें, कुछ सपने-५

दूसरे साल में मेरी छात्र बृति बंद हो गयी, क्योंकि परीक्षा में अव्वल दर्जा नहीं आया  था । श्रीकांत के साथ मैंने बहुत कोशिश की छात्र बृति बहाल हो जाने के लिये पर कुछ नहीं हुआ ।यही आइ. आइ.टी की खूबी थी । श्री राजेंद्र प्रसाद हॉल से लाइब्रेरी पास थी, पढ़ने के लिये वहीं की किताबों पर निर्भर थे हम सभी , क्योंकि कोई टेक्स्ट बुक तो थे नहीं ।

श्री राजेंद्र प्रसाद हॉल में हमारे साथ के मेकानिकल के चार-पांंच लोग ही थे, उनमें एक मखीजा काफी नज़दीकी बन गया, वह कलकता के सेंट ज़ेबियार कॉलेज से था, उनकी रासबिहारी एबेन्यु पर कपड़े की दुकान थी । प्रेसीडेंसी कॉलेज के बहुत थोड़े लड़के आइ० आइ० टी में आये थे । अपना सबसे नज़दीकी दोस्त श्री अशोक कुमार सेनगुप्ता बी० ई० कॉलेज शिवपुर से इंजीनियरिंग किया सिबिल से ।

१९६३ में एक औद्योगिक यात्रा का आयोजान डिपार्टमेंट द्वारा किया गया था, हम पहली बार जमशेदपुर, आसनासौल कुल्टी, चितरंजन  और कलकत्ता गये और वंहा के बड़े औद्योगिक प्रतिष्ढ़ानों को देखे । उस समय यह क्षेत्र उद्योग में देश में सब क्षेत्रों में आगे था ।एक रेलवे बोगी रिज़र्व किया गया था । यह यात्रा काफी अच्छी और उद्योगिक ज्ञान बढ़ानेवाली रही थी । टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टेक्स्मेको, बर्न आदि काफी बड़े संस्थान थे और हजारों लोग उनमें काम करते थे । आसनसोल में घटी दो घटनाएं अभी भी याद आने पर हंसी आती है ।हम चार पांच दोस्त आसनसोल स्टेशन के कैफ़ेटेरिया में गये नाश्ते के लिये ।हममें से एक को टमाटर का केचअप बहूत ही भा गया ।वे बोतल का सारा केचअप चट कर गये ।दूसरे दोस्त ने जब बेयरे से केच अप मांगा, तो वह आश्चर्य से बोतल की तरफ देखा, पर कहा कुछ नहीं और एक छोटी कटोरी में ला रख दिया । हम बहूत दिनों तक केचआप की कहानी का मज़ा लेते रहे थे ।उसी दिन शाम को साउथ इंस्टीच्यूट में हम एक मूवी देखने गये ।हम बैठे ही थे कि एक दोस्त ने कहा, ‘ देखो, शर्मिला टैगोर जा रही है ।’ उसी समय उसकी पहली मूवी आइ थी बंगाली में । अब क्या था, हमारे सभी मित्र उचक उचक उसी तरफ देखने लगे और यह सिलसिला तबतक चलता रहा, जब तक हाँल की बत्ती गुल नहीं हुइ ।

कलकत्ता में हम मिंट देखने गये जो नया नया बना था, और टेक्स्मैको भी देखे जो इंजीनियरिंग की नामी फैक्टरी थी । हम कुछ अन्य फ़ैक्ट्रीयां भी गये ।हां, कलकता के महात्मा गांधी रोड पर उन्ही दिनों एक नया भोजनालय खुला था इन्द्रपुरी । वहाँ हम दोस्तों में रबड़ी खाने की प्रतियोगिता हो गयी और थापा जीता । 

अगले साल हम मद्रास, बंगलौर और बम्बई गये । बहूत सी फ़ैक्टरियों को देखे ।आज केवल HMT, Integral Coach Factory ही याद हैं । NCC के एक कैंप में भी शामिल हुये, जो मेरठ में था । वंहा बड़े खाने पर आर्मी के एक बड़े ओहदवाले सज्जन से भोजपुरी में बात कर बड़ी खुशी हुइ ।लौटते समय ब्रज भूषण पांडेय साथ थे । उनके साथ ही दिल्ली में घूमे और बनारस में रुक  विश्वनाथ मंदिर और सारनाथ भी देखे ।

दूसरे और तीसरे साल के गर्मी के अवकाश में फ़ैक्टरी में कुछ सीखने के लिये गये और महीने से ऊपर रहे ।पहली बिरलापुर के जुट मिल में और दूसरी जमशेदपुर के टाटा मोटर्स में थी ।टाटानगर में हम पांच उत्कल निवास में ठहरे ।सायकिल लाया गया था फ़ैक्टरी तक जाने के लिये । पर टाटानगर के उँचे नीचे रास्ते पर उतनी दूरी तक सायकिल चलाना बहुत कष्ट का काम था ।सभी की तरह हम भी आटो से जाने आने लगे, खर्चा पड़ता था एक चौअनी जाने में और उतना ही आने में । गर्मी के कारण हम भी बाहर सोने लगे रात को और सबेरे तक ब्लॉस्ट फर्नेस की धूल की एक परत शरीर पर मिलती थी ।खैर, काफी सीखा, जो बाद में भी काम आया । 

फिर कभी…..

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