तुलसीदास कृत रामचरितमानस – एक बिचार

रामायण एक लंबा गाथा काब्य है| काफी समय लगा होगा उसकी रचना में| मैं दादाजी के रास्ते चलते हुए उसका मासपारायण करता हूँ| समय समय पर कुछ प्रश्न उभर उठते हैं |

लगता है तुलसीदास जी रामायण ख़त्म करने के बाद उसे फिर से सरसरी निगाह से नहीं देखे | कुछ कथा की असंगतियाँ दिखती हैं| मैं केवल दो उदहारण दे रहा हूँ|

बालकाण्ड में पार्वती शिव से कथा सुनाने को कहती हैं और कुछ घटनाओं का जिक्र करती हैं :
बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम|
प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवाने निज धाम ||

तुलसीदास को जब राम कैसे अपने धाम गए नहीं बताना था तो पार्वती से यह प्रश्न नहीं करवाना चाहिए था| शायद रामायण लिखने का अंत आते आते वे भूल गए पार्वती का अनुरोध|

इसीतरह लंकाकांड के आखिरी में राम विमान से लौट रहे हैं| प्रयाग में त्रिवेणी पर दान देते हैं:
पुनि प्रभु आई त्रिबेनी हरषित मज्जनु कीन्ह |
कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुं दान बिबिध बिधि दीन्ह ||

कहाँ से ? बिभीषण का कोई धन तो वे लिए ही नहीं थे| बिभीषण से उसे सभी बानरों में बंटवा दिए थे | मैं तुलसीदास जी की आलोचना नहीं करता हूँ | चाहता हूँ अपने अज्ञान का अंत करना | कोई इसका समाधान करे तो अच्छा लगेगा, पर उत्तर तर्कसंगत होना चाहिए | नहीं तो मैं यह माँ लूँगा कि संपादन का समय ही नहीं मिला|

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