अदने आदमी की अभिलाषा

Posted : February 6, 2011 at 4:26 pm [IST]

बचपन में था पढ़ा
पुष्प की अभिलाषा
चौबेजी की |

चाह भी था फूलों सा बनना
खिलना, और सदा मुस्काना
फिर से मिट्टी में मिल जाना |

अंत सुनिश्चित है जब जग में
इसीलिए अब यह अभिलाषा

नहीं तेल की नाव बनाना
बर्फ शिला पर नहीं लिटाना
रूकना नहीं किसी प्रियजन हित
यथाशीघ्र तुम पार लगाना

अगर कोई लेना चाहे
गर इसको ऐसे
ज्ञान बढ़ाने की मनसा से
उन्हें हर्ष से तुम दे देना
पर मेरा तुम नाम न कहना|

और अंत में
इसे जलाना पड़े अगर तो,
मुझे जलाना नहीं काठ से
बिजली की भठी बेहतर है|
और राख जो हाथ लगे
मिट्टी में दे डाल उसे
एक घना तुम बृक्ष लगाना,
अच्छा हो गर फूलों का हो
फल लगते हों |

और नहीं कोई पूजा करवाना |

नहीं बनूगा दैत्य,
रहूँगा मुक्त, दिव्य,
न होने पर भी
इसी धरा के मिटटी में मिल |

कहो अरे क्या हो पायेगा ?

- Indra

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2 Comments »

Jaroor Ho Payega Papa. That said, I think we have long ways to go. Abhi to bahut saare Naati/Natni ka khel dekhna baaki hai. So sit back and enjoy the ride..:-)

Posted by: Anand Sharma at August 30, 2011 @ 8:40 am

Yeah !!

Posted by: Ramesh Roy at March 23, 2012 @ 12:52 pm

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