मोह भंग
Posted : February 14, 2010 at 8:00 am [IST]
शीत निशा
बीत गई,
प्रीत मेरी
रीत गई |
कोटि कोटि
मोती से ओस बिन्दु,
अश्रू या अमृत. भी
पाट गए धरती को,
पर मेरी गगरी
फिर भी न भरी |
बीते इस पूनम को
चाँद खिला बड़ा बड़ा
अमृत बर्षा तो हुई
तन मन भिंगो जो गई
पर न कहीं प्रीत बढ़ी |
और यहाँ आज जब
आ रहा बसंत मंद मंद
भर रहा हवा में रंग रंग
स्वप्न में खिले हैं अंग अंग
प्रश्न क्यों रहा यह संग संग
हो नहीं कहीं यह मोह भंग
- Indra
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