सरकारी गरीब

Posted : December 11, 2009 at 3:36 pm [IST]

हर हिन्दुस्तानी भगवान और सरकार के खाते में अपना नाम गरीबों में लिखवाना चाहता है. नहीं तो कैसे दीनदयाल तिजोरी भरने में सहायता करेंगें. और फिर सरकार तो सभी तरह का फायदा केवल गरीब कहलाने पर ही दे सकती है. बिना गरीब बने कैसे वह हरदम मांगता रह सकता है. हर राज्य सरकार अपने राज्य के गरीबों की संख्या बढा चदा कर बताने में गर्ब मह्शूश करती है. गरीबों की संख्या के हिसाब से केंद्र से धनराशी मिलेगी= ज्यादा से ज्यादा गरीब होने पर ज्यादा से ज्यादा. तभी तो उस धनराशि का लाभ राजनेताओं और उनके चमचों को मिलेगा.

सक्सेना साहब के अनुसार देश के ३० प्रतिशत गरीब थे, अब किसी और बिद्वान ने उनका प्रतिशत ४० बता दिया है. इससे भी राज्य के मुख्य मंत्री प्रसन्न नहीं हैं. उनके अनुसार उनके राज्य में ८० प्रतिशत गरीब हैं और केंद्र को उसी के अनुसार सहायता देनी चाहिए. एक अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता थे उनके अनुसार देश के ८० प्रतिशत लोगों की कमाई २० रूपये प्रति दिन से कम है. सभी बड़े खुश थे और उन्हें उधृत करते थे हरदम. कौन ऐसा देश है जो कंगाल कहा खुश होता है?

शायद भारत को ही यह गौरव प्राप्त होगा

- Indra

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