नेताओं से अनुरोध
Posted : August 29, 2009 at 9:55 pm [IST]
हे नेता गन ,
क्यों बाँट रहे हो जन को?
बनो दलित या महादलित
या अगर कोई ब्रह्मण हो
क्या बदलेगा ?
और अभी
कहो क्या है अंतर?
ये परिभाषाएं
केवल भीख दिला देती हैं
बढ़ते आगे हम
केवल अपने बल से ही .
ये अंतर का पाठ
बढाता अंतर भारी
देश टूटता
अपनी नजरों में हम गिरते
हंसी कराते हम सब जग में
करो बंद अंतर की बातें
अन्तर्मन की शक्ति जगाओ
खून पसीना अपना देकर
ज्ञान बढाओ
पढो पढाओ.
पथ प्रशस्त है
आओ मिलकर चलो चलाओ
नहीं दान ले बढा कभी कद
किसी ब्यक्ति का
देने से बढ़ता है कद.
देने लायक बनो
हो देने का साहस भी.
नहीं अलग हो चलो
बढो संग ही चलकर.
याद करो तुम
मौर्य बंश की गोरव गाथा
चन्द्रगुप्त की भारत रचना
क्या जाति का अंतर
रोक सका
अशोक की विजय कहानी
और महान बन जाना उसका.
जिस बाबा की मूरत
आज लगाते फिरते
क्यों न सीख लेते भी उनसे
केवल अपने बल पर ही
हम बढ़ पाते हैं
नहीं रोक पाता इसको
वह कोई अंतर
बांधों नहीं निज अंश
तुम्हारा सब है.
बंद करो यह यह मूर्ति युद्ध
जनता भूखी है नंगी है
और नहीं सह सकती यह नाटकबाजी.
और जरा सोचो रूककर-
पढ़ न पाए चाणक्य तो
क्या यह हितकर होगा?
हे नेता
रोको अंतर का
पाठ पढाना.
सभी तुम्हारे हैं
और है यह देश तुम्हारा.
- Indra
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