मेरा गाँव, मेरे सपने
Posted : June 28, 2009 at 9:13 am [IST]
मैथिली शरण गुप्त राष्ट्रकवि थे. उनकी एक कविता थी- ग्राम्यजीवन. दादाजी उस कविता और शिक्षा के अभाववाले अंश का बराबर जिक्र करते थे. आज भी वही हालत है. गाँव के लोगों की शिक्षा में रुचि कम होती जा रही है. यही कारन है की गाँव स्वर्ग नहीं बन पाए हैं.
गाँव से पढ़ लिख कर जो बाहर गए वे बाहर के ही हो कर रह गए. शायद मजबूरी हो गयी बाहर रहने की. या बच्चे और पत्नी नहीं माने गाँव वापस लौटने की बात पर. मैं भी उन्ही में से एक हूँ. बच्चे तो अमरीका निकल गए, शायद हीं वापस आयें. पर दूर रह कर भी मैं सपने गाँव की ही देखता हूँ.
मैं दो गाँव से जुडा हूँ. एक ननिहाल था बोदार्ही, थाना दावथ. माँ अपने खानदान की एकमात्र संतान थीं.अतः वहीँ रहने के लिए मजबूर थीं. बचपन की कुछ अच्छी मधुर यादें अभी भी है ननिहाल की. माँ की इच्छा पूरी करने के लिए एक घर भी बनाया था आधुनिक दंग का. पर माँ के न रहने पर मैं उस सम्पति को बेंच देने के लिए बाध्य हो गया.बिहार में ननिहाल में बिना बलबूते के सम्पति बचाना मुश्किल था बंगाल में नौकरी करते हुए. पर बेंचने के पहले बहूत कोशिश किया था अपने गाँव के चाचाजी से और ससुराल के सालों से कि वे ननिहाल के जमीन की देखभाल करें, कुछ अपने लें, कुछ हमें दे दें, पर कोई तैयार नहीं हुआ. सभी चाहते थे मैं उन्हें रगिस्ट्री कर दूं मुफ्त.
अपनी गाँव की सम्पति से कुछ मिलता तो था नहीं, अतः जब नोएडा में घर ख़रीदा और पैसे की कुछ कमी हुई तो यमुना के कहने पर अपने पैत्रिक सम्पति को भी सन् २००० में चाचाजी को दे दिया. चाचाजी ने जो दिया उसे ले लिया. अब गाँव में केवल एक घर बनाने भर जगह रखा हूँ अपने पास. पर शायद हीं वंहा कभी घर बनेगा. मेरे बाद तो शायद बच्चे वहां जाएँ ही नहीं. उनका गाँव से कोई लगाव नहीं रहा. शायद दोष मेरा था. नौकरी में इतना रमा कि इसका ख्याल ही नहीं रहा . अब उम्र के इस मोड़ पर दृढ़ता से कुछ कह पाना मुश्किल है.
कभी कभी गाँव जाता हूँ क्योंकि चाचा-चाची का प्यार बना हुआ है. पिछले बार जब गया तो गाँव का एक चक्कर लगाया था. काफी लोगों से मिला था. बड़ा अच्छा लगा था. अपने एक देयाद के बाबा से भी मिला था. उनका बड़ा लड़का इंजिनियर है और बड़े ओहदे पर है एक बड़ी सरकारी कंपनी में. अपनी जवानी में वे एक नामी पहलवान थे. मैं आदर करता हूँ उनका. वे एक मंदिर बना रहे थे. मुझसे मूर्ति के लिए सहायता करने को कहे. बीस हजार की मांग किये. भिजवा दिया. पर केवल दस हजार की मूर्ति लगी हनुमानजी की. पता नहीं क्यों मूर्ति पूरा पैसा लगा ज्यादा बड़ी और भब्य क्यों नहीं ली गयी .
गाँव में काफी कुछ किया जा सकता है. मेरे गाँव के दक्षिण में एक बहूत बृहत् भूभाग है. पहले इस में गाँव की खलिहान होती थी. अब तो हार्वेस्टर से कटाई, सफाई होती है और अधिकांश फसल खेत से ही बिक जाती है. इस मैदान को गाँव का पार्क या बाग बनाया जा सकता है, गाँव का हर परिवार अपने पुरखों की याद में दो दो पेड़ लगा सकता हैं. चारो तरफ घूमने के लिए रास्ता बनाकर बीच में खेलने का मैदान बन सकता है. अगर कोई पहल करे तो एक साप्ताहिक बाजार लगाया जा सकता है. यह कुछ कमजोर तबके के लोगों के लिए कुछ अतिरिक्त आमदनी का जरिया भी हो सकता है.
गाँव का स्कूल अभी भी अपर क्लास तक ही है. अतः लड़कियाँ आगे पढ़ नहीं सकती. पता नहीं क्यों पहले स्कूल गाँव के काफी बाहर बनते थे. मेरे सपने में इस स्कूल में १२ क्लास तक की पढाई की ब्यवस्था भी है. मेरे गाँव में दो चार अच्छे अध्यापक है जो अब अवकाश के बाद पास के शहरों में रहते हैं. एक बार उनसे बात भी हुई पर किसी ने इसमें रुचि नहीं दिखाई. उनके अनुसार गाँव की राजनीति इतनी ख़राब हो गई है कि कुछ किया नहीं जा सकता. शायद वे ठीक कहते हों.
गाँव में चारों किनारे पब्लिक शौचालय बनाना जरूरी है, पर उसके लिए कोई पहल करने को तैयार नहीं. बरसात में गाँव से बाहर निकलना बहूत मुश्किल होता होगा. पैसे की समस्या नहीं है, करवाने वाले लोगों का अभाव है.
उपरोक्त सभी सुझावों पर गाँव और बाहर रहने वाले लोगों से बात की थी और अभी भी जब किसी से मिलता हूँ करता रहता हूँ पर अभी तक कोई रास्ता नहीं निकला है.
मेरे बिचार में गाँव में लोगों को काम मिलना जरूरी है. पहले जिस काम में लोग लगते थे वे काम अब मशीन (ट्रेक्टर, पम्प) से होने लगे. यहाँ तक की धान की रोपनी के लिए भी लोग बाहर से आते हैं. क्या हल है इसका. गाँव में वहां के बचे लोगो को क्या काम ब्यस्त रखे, सोचने की बात है. गाँव का कोई युवक या बयस्क कोई नए धंधे की बात नहीं सोचता.वह नोकरी की इच्छा रखता है और शहर भागना चाहता है. कोई हाथ का काम नहीं सीखता. गाँव के ट्रेक्टर, पम्प, मोटर सायकिल की गाँव में हीं मरम्मत करने की पहल क्यों नहीं हो?. क्यों इसके लिए शहर भागना पड़ता है? गाँव में क्या एक इन्टरनेट सहित कंप्यूटर सेंटर व्यासायिक रूप से नहीं लगाया जा सकता? अबतक तो बिजली की असुबिधा थी, पर अब तो उसका भी समाधान हो गया. गाँव में गैर कृषि उत्पादन की बात सोचनी होगी. वही रोजगार दे सकता है.
गाँव की महिलाओं के पास कोई काम नहीं खाना बनाने के अलावा. क्या उनकी शिक्षा, और सिलाई, बुनाई, संगीत या चित्रकारी के ज्ञान को कोई व्यवसायिक फायदा में नहीं बदला जा सकता? दुर्भाग्यबस पुरुषों से कोई बढावा नहीं मिलता. मेरे भाई की पत्नी कुछ बच्चों को पढाती थी, पर भाई को पसंद नहीं था, बंद कर दी.
लगता एक नए सोच की जरूरत है कुछ पढ़े लिखे लोगों को पहल करनी होगी. पर सबसे पहले सभी की शिक्षा में रुचि जगाना जरूरी है. उसके बिना कुछ संभव नहीं. और सबसे जरूरी है श्रम के प्रति श्रधा. अब कोई काम किसीजाति बिशेष की जागीरदारी नहीं.
पर मेरे सपने अपने हैं. इस उम्र में इसे ब्यवहारिक रूप देने की क्षमता कहाँ से लाऊं. क्या यह केवल मेरे अकर्म्णयतI का बहाना भर है?
- Indra
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1 Comment »
सर,
ये कहानी कामोवेश हर गाँव की है आज के तारीख में. गाँव कितना भी छुट जाए, जो वहां रह कर आया है उसका मन वहीँ बसता है. बच्चे जो गाँव में नहीं रहे हैं वो वहां के लोगो की प्रेम, एकजुटता, जरूरत पड़ने पर मदद को तत्पर रहने जा जज्बा नहीं समझ पायेंगे. गाँव के लोगो को शायद counselling की जा सकती है की केवल नौकरी के चक्कर में ना रहें. उन्हें एक हिसाब बताना होगा की कैसे वो गाँव में रह कर ज्यादा कम सकते हैं बनिस्पत की दिल्ली, लुधियाना या दुसरे शहरों में मजदूरी करने की. शायद ये कदम आप या हम दूर बैठे mass level पर नहीं शुरू कर सकते. हमें जरूरत है एक या दो लोगो को पकड़ कर उनको रास्ता दिखाने की. और उनके देखा देखि दुसरे भी शायद शुरुआत कर सकें. इस उम्र में तो शायद आपका स्वास्थ्य allow नहीं कर सके भाग दौड़ करने की लेकिन कुछ युवकों को आप प्रोत्साहित कर सकते हैं ऐसा करने में. वहां रहने वाले लोग तो पहल करने से कतराते हैं, और सबकी एक ही लय है की गाँव की राजनीति बहुत ख़राब है.
Posted by: Sarvesh Upadhyay at June 28, 2009 @ 4:57 pm
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