पार्क के बाबा साहब
Posted : November 7, 2009 at 5:52 pm [IST]
बाबा साहब !
देखा आज फिर
खड़े कर दिए गए हो
एक पार्क में, जो कल तक नहीं था.
पता नहीं कितने बर्षों
रहोगे इसी तरह खड़े
सहते शीत आतप बात.
क्यों नहीं लोग तुम्हें
घरों तक रखते,
मन में रखते.
रखते अपने पूजा घर में
राम कृष्ण की जगह.
कितनी छोटी लडाई
लड़ते तुम्हारे चाहनेवाले
तुम्हें गाँधी की बराबरी
देने का प्रयास कर.
मानो मेरी बात
मूर्तियों की संख्या में
गाँधी से आगे निकल
गए हो
पर रह गए हो नेताओं के
चुनाव युद्ध तक.
नहीं लगा था मुझे अच्छा
वह धर्म परिवर्तन,
तुम्हें बिना हटे
बदलना था इसको
और वह तुम से हीं संभव था.
आओ फिर एक बार
बनाओ नया बिधान
जोड़े जो लोगों को.
दर्द बहूत पाता हूँ
गाँव अपने जाकर
नहीं रहे शूकर,
न करीमन, न मरकट
उनके न नाती पोतें
आते अब घर पर
रिश्ते सब सर्द हुए
लूट गए गाँव डगर,
बाबा कुछ समझो.
गर न आ पाओ तो
देव बनो, सपने दो
चेलों को.
करें नहीं इतिहासों की गलती
तोडें नहीं देश, जोड़े इसे
स्वेद दे अपना
बनायें इसे महान
क्या यह न था
तुम्हारा सपना.
—-
‘बाबा’ बाबा आंबेडकर हैं.
- Indra
Category: Religious/Social issues |
Leave a Comment