रिश्तो का संसार
Posted : June 14, 2009 at 10:40 am [IST]
कुछ दिनों से जब कभी अकेला हो जाता हूँ एक प्रश्न दिमाग को ब्यस्त कर देता है: मनुष्य का कौन रिश्ता सबसे ज्यादा मजबूत होता है? समय के साथ नए रिश्ते बनते हैं. पहला रिश्ता तो सभी सौभाग्यशाली ब्यक्ति का माँ से ही प्रारंभ होता है. फिर जिन्दंगी बढती जाती है, मित्र बनते हैं, बहूत और रिश्ते समझ में आते जाते हैं और बनते रहते हैं. और फिर बनता है पति पत्नी का रिश्ता. बहूत सारे खट्टे मीठे अनुभवों से यह रिश्ता चलता रहता है और प्रगाढ़ हो जाता है. और रिश्ते दूर होते जाते हैं. हर ब्यक्ति की जिंदगी के आखिरी दिनों में यह रिश्ता बहूत जरुरी हो जाता है. एक दूसरे पर आश्रित हो जाती है जिंदगी.
पर माँ बाप के लिए संतान से रिश्ता एक मधुर याद की तरह कायम रहता है. संपर्क सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए जरूरी है. संयुक्त परिवार की यही अच्छी बात थी. संपर्क बना रहता था और सम्बन्ध भी.
पर कभी कभी लगता है अब सभी रिश्ते स्वार्थपूर्ण होते जा रहे हैं. स्वार्थ के लिए ही व्यक्ति सम्बन्ध बनाता है. संपर्क बढ़ाता है. और फिर भूल जाता. अपनी दैन्यन्दिन में व्यस्त हमे कंहा याद रहती है संबंधो की या सम्बन्धियों की.
यह रिश्तो की कहानी और उनकी मधुर यादें अकेले में ब्यस्त रखती है अगर कोई और ब्यस्त रहने का कारन न हो . आज यमुना और अपने सम्बन्ध के नीवं के दिन के अवसर पर यही विचार मन में आया था जिसे लिख डाला.
- Indra
Category: Religious/Social issues |
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तुलसी बाबा तो कह ही गये हैं - सुर-नर-मुनि सब कर यह रीती। स्वारथ लाइ करैं सब प्रीती!
Posted by: ज्ञानदत्त पाण्डेय at June 14, 2009 @ 8:05 pm
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