बदलते गाँव, कुछ सलाह
Posted : May 27, 2005 at 4:55 am [IST]
भारत प्रगति पर है | कुछ बर्षोँ में भारत दुनिया के आर्थिक पैमाने पर
तीसरे नम्बर पर आ जयेगा| केवल अमरीका , चीन आगे रह जायेगें | पर इसके
लिये गाओँ को भी तेजी से प्रगति करनी होगी|यह करना बहूत कढिन भी नहीँ है|
पर राशता दूसरा होगा| सभी को काम करने मेँ मन देना होगा |
वैसे तो गावँ बदल रहे हैँ| आज भारत के गावोँ मेँ बैल नहीँ दीखते|
ट्रैक्टर से खेती होती है| कटाई का कढिन समय लगने वाले काम के लिये भी
मशीन क व्यव्हार होता है| केवल रोपनी का काम अभी भी हाथ का रह गया
है|गाओँ में अलग तरह के काम आ गये हैं| पर इसकी प्रशिकक्ष्ण की ब्यवस्था
जरूरी होगी| मेरे गावँ में २००० लोग रहते हैं| अच्छी खेती होती है, ४५
ट्रैक्टर हैं| साधारण चलाना तो गावं के लडके सीख जाते हैं, पर किसी
मरम्मत के लिये बगल के शहर से मिस्त्री बुलाना पडता है| अतः अगर २-४
लडकों को प्रशिक्षित करना जरूरी होगा उन्हे गावं में ही व्यस्थ करने के
लिये| यही बात अन्य उपकरणों के बारे में भी लगू होगा|डिजेल, बिजली,
रडियो, मोटर सायकिल, अब तो टीवी, गैस चूल्हा काफी मात्रा में गावों में आ
गयें हैं| इनके रख्रखाव का काम हर गाव में हीं करना सम्भव होना
चाहिये|कुछ लडकों को अपने को इस काम में रूचि लेना जरूरी है| ये लडके
रोजगार में लग जायेंगे और अपने को बेकार नहीं समझेंगे| ग़ांव के छोटे बडे
सभी के घर के सामने या चारो ओर कुछ खाली जमीन रहती है| उस जमीन में लोग
कुछ सब्जी लगा सकते है, दो चार पेड लगा सकते हैं| काफी सरकारी जमीन बीरान
पडी रहती है, जिसमें पेड लगाये जा सकते हैं|
गांवं में शिक्षा के प्रति रूझान कम होता जा रहा है| शिक्षक पढाने में
रूचि नहीं लेते |उनका यह व्यवहार ठीक नहीं| हर गांव में कुछ शिक्षक भी
रहते हैं, जो दूसरे गांव में पढाते हैं| उन्हे भी अपने गांव की शिक्षा
मेइं रूचि लेनी चाहिये|
ग़ांव जाने पर कुछ बातों की दुर्दशा कफी तकलीफ देती है| पुराने जीवनमूल्य
कमजोर पडते जा रहे हैं| गांव बहूत कुछ खोता जा रहा है| कुछ हैं-
गांव के बच्चो मेइं पढने की ललक मिटती जा रही है|
गांव का लोक संगीत दूषित हो रहा है| प्राचीन सोहर, कजरी, होरी फाग, या
चैता अपनी पहचान को रहे हैं |
गांव के खेल जैसे चिक्का, कुश्ती,दंगल खत्म हो रहा है|
गांव के बुजुर्ग अब रामायन की न बातें करते हैं, न उसका पाठ होता है, न
गाया जाता है|
गांव के बाग खत्म हो चले हैं और ताल तल्लैया भी भरते जा रहे हैं | कूवों
को तो इतिहास की तरह भूल गये हुम|
गांव के पकवान भी लोग भूलते जा रहे हैं, न लिट्टी लगती है द्वार पर| न तो
कोइ शाम गये कोई अतिथी आता है |शाम होते ही सब अपने घरों मेइं बन्द हो
जाते हैं|
अगर यही हाल रहा तो गांव की संस्क्रीति खत्म ही हो जायेगी| आनेवाली पीढी
के लिये बह तो बचा कर रखना ही चाहिये|
- Indra
Category: Government Policy/Administration |
4 Comments »
अंकल जी,
अच्छा लगा आप की हिन्दी की पहली प्रविष्टि पढ़ कर। मेरा गाँव से नाता कुछ ज्यादा तो नहीं है पर इतना अच्छे से समझता हूं कि अपना देश तो गाँवों में ही बसा है।
पंकज
Posted by: पंकज at May 27, 2005 @ 8:52 am
Hello Sir,
Nice to read something in hindi after a long time. I’m living in Canada right now but had been to India recently and was there from April 15 to May 15. I know all these talks of the economic prosperity in the coming times sounds good, but i was very disturbed emotionally by the poverty there. On your visit to USA, you would have noticed the huge differences between India and US. An averge person in US does not struggle to put food on the plates of his children … but that is the case with an average person in India, such as a plumber, a construction worker, etc. I don’t know if that’ll change or not. If that has to change, which means these classes of labour earn more, that will in turn result in a common man’s expenses to rise as well. I do not know if the salary levels will rise in that ratio or not.
All the NRI’s are outside of India for a better life. But now it’s not a question of choosing the better for ourselves but what’s better for the country. The brain drain is good personally for the people moving out of India but not for India. I myself am at a stage where I have to choose between making a decision of staying and settling down in Canada or of moving back to India. I know individually it does not make a difference but collectively it is better for the economy. I’m very confused!!!
Posted by: Varun Sehgal at May 27, 2005 @ 9:51 am
Alas
I could not understand anything.
Srinivas Ivaturi.
Posted by: Srinivas Ivaturi at May 27, 2005 @ 10:53 am
इन्दर भैया ,
बहुत अच्छा लगा यह लेख पढ्कर । गाँवों की संस्कॄति और अर्थतन्त्र पर आपकी पकड देखर बहुत अचरज भरी खुशी हो रही है ।
मेरे विचार से अगर गावों ने नये जमाने मे कुछ पाया है तो वो है सूचना । पहले गाववासी कुएँ के मेढक हुआ करते थे । अब वो चीज नही है ।
अनुनाद
Posted by: अनुनाद at June 13, 2005 @ 7:52 pm
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